ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स का भरोसेमंद ठिकाना बनता उत्तर प्रदेश

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– प्रदेश में 1000 से अधिक जीसीसी स्थापित करने, पांच लाख से अधिक युवाओं को रोजगार दिलाने का लक्ष्य

-योगी सरकार की नीतिगत स्पष्टता से उत्तर प्रदेश पर बढ़ा वैश्विक कंपनियों का भरोसा

-हाई स्किल रोजगार के सृजन की ओर बढ़ रहा है प्रदेश, थमेगा प्रतिभा पलायन

लखनऊ, 13 जनवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश तेजी से विकसित होती अवसंरचना के कारण वैश्विक कंपनियों को दीर्घकालिक निवेश के लिए अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। यह प्रदेश ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) निवेश की दृष्टि से एक उभरता हुआ गंतव्य बन गया है। पिछले नौ वर्षों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश नॉलेज और सर्विस आधारित अर्थव्यवस्था की ओर भी मजबूती से अपने कदम बढ़ा रहा है। उद्योग जगत के विशेषज्ञों का कहना है की आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश वैश्विक कंपनियों का एक बहुत बड़ा केंद्र बनेगा। प्रदेश में 1000 से अधिक जीसीसी स्थापित करने का लक्ष्य है, जिसके माध्यम से प्रदेश के पांच लाख से अधिक युवाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे।

उत्तर प्रदेश जीसीसी नीति 2024 के माध्यम से योगी सरकार ने जिस नीतिगत स्पष्टता और दीर्घकालिक दृष्टिकोण को अपनाया है उससे वैश्विक कंपनियों की सबसे बड़ी चिंता दूर हो गई है। इनमें नियमों की अनिश्चितता और प्रक्रियाओं में देरी सबसे प्रमुख थी। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार ने स्पष्ट ढांचा तैयार किया है, जिससे निवेशकों को शुरुआत से ही नियम शर्तें और दायित्व समझ में आ सकें। इससे भरोसे का वातावरण बना है, निर्णय लेने की गति तेज हुई है। इसी का परिणाम है कि प्रदेश में इस समय लगभग 90 जीसीसी हैं।

भूमि आधारित प्रोत्साहन, निवेश की शुरुआती लागत को घटाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। प्रदेश सरकार की सोच है कि जब निवेशक को शुरुआती चरण में संरचनात्मक सहयोग मिलेगा तो वह लंबे समय तक प्रदेश से जुड़ा रहेगा। यही कारण है कि अस्थायी ऑफिस या किराए की व्यवस्था के स्थान पर स्थायी औद्योगिक ढांचे को प्राथमिकता दी जा रही है। यह मॉडल प्रदेश के औद्योगिक परिदृश्य को मजबूत और स्थिर बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है। प्रदेश सरकार का जोर केवल निवेश आकर्षित करने तक सीमित नहीं है, इसके समयबद्ध क्रियान्वयन पर भी है। इसके लिए जवाबदेही तय की गई है, जिससे परियोजनाएं तय समय में पूरी हो सकें। निवेशकों की नजर में उत्तर प्रदेश अब परिणाम देने वाला राज्य है जहाँ पर निवेश करना फायदेमंद है।

राज्य सरकार के प्रवक्ता ने बताया कि ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स के जरिये प्रदेश में हाई वैल्यू रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, डेटा और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में स्थानीय युवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव प्राप्त होने का रास्ता मिल रहा है। इससे न केवल प्रदेश की मानव संसाधन क्षमता सुदृढ़ होगी बल्कि प्रतिभा पलायन की प्रवृत्ति पर भी प्रभावी रूप से नियंत्रण संभव होगा। विशेष रूप से कम विकसित क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित कर सरकार क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की दिशा में भी आगे बढ़ रही है। जब वैश्विक कंपनियां इन क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करेंगी तो स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

सरकार की पहल से रफ्तार ले रही मुख्यमंत्री ग्रामोद्योग रोजगार योजना

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योजना के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2025–26 में 94 नई इकाइयां स्थापित

648.63 लाख रुपये का पूंजी निवेश, 2,586 युवाओं को मिला रोजगार

लखनऊ, 13 जनवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार की प्राथमिकताओं में ग्रामीण रोजगार और ग्रामीण औद्योगिकीकरण सबसे ऊपर है। इसी कड़ी में मुख्यमंत्री ग्रामोद्योग रोजगार योजना वित्तीय वर्ष 2025–26 में उल्लेखनीय गति से आगे बढ़ रही है। इस वित्तीय वर्ष में अब तक योजना के अंतर्गत 94 इकाइयां स्थापित की गई हैं, जिसके तहत 648.63 लाख रुपये का पूंजी निवेश संभव हुआ है। इसके माध्यम से 2,586 युवाओं को रोजगार दिलाने में सफलता मिली है। यह आंकड़े बताते हैं कि वित्तीय वर्ष में योजना ने मजबूत प्रगति दर्ज की है और शेष अवधि में लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।

योग्य बेरोजगार युवाओं को 10 लाख रुपये तक का ऋण

इस योजना ने गांवों में उद्योग स्थापित कराकर स्थानीय युवाओं को उनके ही घर के पास रोजगार उपलब्ध कराने का रास्ता खोला है। योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्र के शिक्षित एवं तकनीकी योग्य बेरोजगार युवक-युवतियों को 10 लाख रुपये तक का बैंक ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। योगी सरकार ने उद्यमियों के लिए ब्याज सब्सिडी की बड़ी सुविधा दी है, जिसमें सामान्य वर्ग के उद्यमियों के लिए 4% से ऊपर का ब्याज सरकार देती है, जबकि आरक्षित वर्ग के उद्यमियों का पूरा ब्याज सरकार वहन करती है।

जिला स्तरीय टास्क फोर्स के माध्यम से चयन

योजना में 18 से 50 वर्ष आयु वर्ग के पुरुष एवं महिला उद्यमी पात्र हैं। चयन प्रक्रिया जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित जिला स्तरीय टास्क फोर्स के माध्यम से की जाती है। सामान्य वर्ग को परियोजना लागत का 10 प्रतिशत, जबकि आरक्षित वर्ग को 5 प्रतिशत स्वयं का अंशदान देना होता है। सरकार का लक्ष्य आने वाले समय में और अधिक युवाओं को इस योजना से जोड़कर स्व-रोजगार आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है।

योगी सरकार का ग्रामीण विकास मॉडल

योगी सरकार ग्रामीण विकास को केवल सड़क और बिजली तक सीमित नहीं रख रही, बल्कि ग्रामीण उद्योगों का नेटवर्क विकसित कर रही है। पारंपरिक कारीगरों व हस्तशिल्पकारों को सशक्त बना रही है। महिला उद्यमिता को बढ़ावा दिया जा रहा है और साथ ही, स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार सृजन हो रहा है। सरकार का मानना है कि “गांव मजबूत होंगे तो प्रदेश मजबूत होगा।” इसी सोच के साथ मुख्यमंत्री ग्रामोद्योग रोजगार योजना को बड़े पैमाने पर विस्तार दिया जा रहा है।

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कुत्ते के काटने से बुजुर्ग−बच्चे की मौत पर राज्य सरकार पर होगा जुर्माना

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश

नई दिल्ली, 13 जनवरी (हि.स.)। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि अगर कुत्तों के काटने से किसी बुजुर्ग या बच्चे की मौत होती है तो हम कुछ न करने के लिए राज्य सरकार को जवाबदेह मानते हुए उस पर भारी जुर्माना लगाएंगे। मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी को होगी।

उच्चतम न्यायालय ने आवारा कुत्तों को खुले में खाना खिलाने वालों के रवैये पर सवाल खड़ा करते हुए यह टिप्पणी की। आवारा कुत्तों के मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कुत्तों को खुले में खाना खिलाने के हिमायती लोगों को भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर लोगों को कुत्तों को खाना खिलाना ही है, तो अपने घर में खिलाइये। उन्हें घर में रखिए। कुत्ते क्यों सड़क पर घूमते रहे, गन्दगी फैलाते रहे या लोगो को काटते रहे। उच्चतम न्यायालय ने पूछा कि क्या सारे जज़्बात कुत्तों के लिए ही है, इंसानों के लिए नहीं। कोर्ट ने कहा कि अगर 9 साल की बच्ची को आवारा कुत्ते मार डालते हैं, तो इसके लिए किसको जिम्मेदार माना जाए। क्या कुत्तों को खुले में खाना खिलाने के हिमायती संगठन को इसके लिए जिम्मेदार न माना जाए।

एशियन गेम्स से पहले कराटे में भारत की तैयारी मजबूत,अलीशा के कांस्य ने बढ़ाया भरोसा

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नई दिल्ली, 13 जनवरी (हि.स.)। भारतीय कराटे के लिए यह साल ऐतिहासिक साबित हो रहा है। जॉर्जिया के त्बिलिसी में आयोजित डब्ल्यूकेएफ सीरीज ए कराटे चैंपियनशिप में अलीशा सुबुधि द्वारा जीता गया कांस्य पदक इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यदि गैर-मुख्यधारा खेलों को निरंतर और संरचित सहयोग मिले, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बड़े नतीजे सामने आ सकते हैं। यह सफलता भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) की टारगेट एशियन गेम्स ग्रुप (टीएजीजी) योजना के प्रभाव को भी रेखांकित करती है।

टीएजीजी योजना के अंतर्गत सहयोग प्राप्त कर रहीं अलीशा सुबुधि कराटे 1 – सीरीज ए प्रतियोगिता में पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी बन गईं। उन्होंने कांस्य पदक मुकाबले में क्रोएशिया की प्रतिद्वंद्वी को 8-0 से पराजित किया। यह उपलब्धि साई द्वारा तैयार किए गए मजबूत हाई-परफॉर्मेंस इकोसिस्टम का नतीजा है, जिसमें लक्षित वित्तीय सहायता, शीर्ष स्तरीय कोचिंग और गहन राष्ट्रीय शिविरों की अहम भूमिका रही।

राष्ट्रीय कोचिंग कैंप में मिला निर्णायक फायदा

साई ने नवंबर–दिसंबर 2025 में लखनऊ स्थित साई क्षेत्रीय केंद्र में वरिष्ठ राष्ट्रीय कोचिंग कैंप का आयोजन किया था। इस 45 दिवसीय शिविर के लिए 1.2 करोड़ रुपये की सहायता एएनएसएफ योजना के तहत प्रदान की गई थी, जिसमें कुल 48 एथलीटों ने भाग लिया। इस कैंप में मैच सिमुलेशन, रणनीतिक तैयारी, मानसिक मजबूती और रिकवरी प्रोटोकॉल पर विशेष ध्यान दिया गया। अलीशा भी इस शिविर का हिस्सा थीं।

अलीशा ने अपनी सफलता पर कहा,“मैं टीएजीजी का विशेष रूप से धन्यवाद करती हूं, जिसने हमें वित्तीय सहायता दी और डब्ल्यूकेएफ सीरीज ए की तैयारी के लिए लखनऊ में उत्कृष्ट राष्ट्रीय कैंप आयोजित किया।”

राष्ट्रीय महासंघ के अभाव में साई की अहम पहल

कराटे के लिए मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय खेल महासंघ के अभाव में भी साई ने खिलाड़ियों की तैयारी में कोई बाधा नहीं आने दी। इसके लिए साई ने एक कराटे आयोजन समिति का गठन किया, जिसने चयन ट्रायल, राष्ट्रीय शिविरों और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए एक्सपोजर की जिम्मेदारी संभाली। इससे एथलीटों का प्रदर्शन मार्ग पूरी तरह सुरक्षित रहा।

पारदर्शी चयन प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय मानक

इस समिति ने 12 से 14 अक्टूबर के बीच शिलॉन्ग स्थित साई ट्रेनिंग सेंटर, एनईएचयू कैंपस में सीनियर वर्ग के लिए ओपन नेशनल चयन ट्रायल भी आयोजित किए। चयन प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय मानकों, एंटी-डोपिंग नियमों और वीडियो आधारित मूल्यांकन प्रणाली के तहत पूरी पारदर्शिता के साथ की गई।

एशियन गेम्स 2026 की ओर मजबूत कदम

इस वर्ष होने वाले एशियन गेम्स को देखते हुए, टीएजीजी योजना और साई द्वारा संचालित राष्ट्रीय कैंपों के माध्यम से मिल रहा निरंतर सहयोग भारत के लिए निर्णायक साबित हो सकता है—खासकर उन खेलों में, जहां अब तक देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खास प्रभाव नहीं छोड़ पाया है। अलीशा का कांस्य पदक न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि भारतीय कराटे के उज्ज्वल भविष्य की भी मजबूत झलक पेश करता है।

गायक समर हजारिका के निधन पर मुख्यमंत्री सरमा ने जताया शोक

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गुवाहाटी, 13 जनवरी (हि.स.)। असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व सरमा ने माघ बिहू के उरुका के दिन मंगलवार काे असम की सांस्कृतिक जगत के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व और प्रसिद्ध कलाकार समर हजारिका के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।

मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर अपने शोक संदेश में कहा कि समर हजारिका के निधन का समाचार अत्यंत मर्माहत करने वाला है और यह असम की सांस्कृतिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने कहा कि दिवंगत कलाकार ने अपने गायन और रचनात्मक योगदान से असमिया संगीत और सिनेमा को समृद्ध किया।

समर हजारिका, महान गायक और सांस्कृतिक प्रतीक डॉ. भूपेन हजारिका के कनिष्ठ भ्राता थे। उन्होंने आकाशवाणी और विभिन्न संगीत एलबमों के लिए गीत गाए, साथ ही कई असमिया फिल्मों में पार्श्वगायक के रूप में ख्याति अर्जित की। उनकी आवाज में सजी ‘प्रथम मरमे जदि’ और ‘इ जे रणांगणर कहानी’ जैसी कालजयी रचनाएं आज भी श्रोताओं के हृदय में जीवंत हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि समर हाज़रिका का निधन ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई संभव नहीं है। इस शोकाकुल क्षण में उन्होंने दिवंगत आत्मा की चिरशांति की कामना की और शोकसंतप्त परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की।

मशहूर गायक समर हजारिका का निधन

गुवाहाटी, 13 जनवरी (हि.स.)। असम के दिग्गज गायक भूपेन हजारिका के छोटे भाई और मशहूर गायक-संगीतकार समर हजारिका का निधन हो गया है। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। परिवार की ओर से उनके निधन की पुष्टि की गई है।

हाल ही में अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद मंगलवार 13 जनवरी को गुवाहाटी के निजारापार स्थित अपने आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। 75 वर्षीय समर हजारिका अपने पीछे पत्नी, एक बेटा और एक बेटी छोड़ गए हैं। उनके निधन से असम की सांस्कृतिक दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई है।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने जताया शोक

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने समर हजारिका के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि समर की भावपूर्ण आवाज हर मंच और अवसर को रोशन करती थी। उन्होंने असम के सांस्कृतिक परिदृश्य में अहम योगदान दिया और डॉ. भूपेन हजारिका की विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुख्यमंत्री ने कहा कि समर हजारिका के जाने से असम ने एक और अनमोल और सुनहरी आवाज खो दी है। उन्होंने दिवंगत कलाकार के परिवार और प्रशंसकों के प्रति संवेदनाएं व्यक्त करते हुए ओम शांति कहा।

कौन थे समर हजारिका

समर हजारिका का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ, जिसने आधुनिक असमिया संगीत को नई पहचान दी। जहां उनके बड़े भाई भूपेन हजारिका वैश्विक स्तर पर भारतीय सिनेमा और संगीत के दिग्गज बने, वहीं समर हजारिका ने असम की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर अपनी अलग पहचान कायम की। उन्होंने 1960 के दशक में अपने संगीत करियर की शुरुआत की और कई असमिया फिल्मों को अपनी आवाज दी। इसके अलावा उनके कई संगीत एल्बम भी रिलीज हुए, जिन्हें श्रोताओं का भरपूर प्यार मिला। समर हजारिका असमिया संगीत जगत के उन कलाकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने सादगी और भावनाओं के साथ संगीत को लोगों के दिलों तक पहुंचाया।

संभल में सरकारी तालाब की भूमि पर बने मकानों की पैमाइश शुरू

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−40 मकानों पर मंडराया खतरा,-पांच थानों की फोर्स और पीएसी तैनात

संभल, 13 जनवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के संभल में सरकारी तालाब की भूमि पर अवैध रूप से बने मकानों की पैमाइश शुरू हाे गई है। हयातनगर क्षेत्र के वाजिदपुर सराय में राजस्व प्रशासन की टीम ने यह कार्रवाई कर रही है। यह काम शाम तक पूरा हाेने की उम्मीद जताई जा रही है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पांच थानों की पुलिस और पीएसी बल तैनात किया गया।

मंगलवार सुबह करीब 11 बजे नायब तहसीलदार दीपक कुमार जुरैल के नेतृत्व में राजस्व टीम वाजिदपुर सराय पहुंची। टीम में चार कानूनगो और 20 लेखपाल शामिल हैं। नक्शे के आधार पर गाटा संख्या 332 में दर्ज सरकारी 5 बीघा तालाब की भूमि को चिह्नित किया गया और फीता लगा कर एक-एक मकान की पैमाइश की जा रही है। कार्रवाई के दौरान मौके पर लोगों की भीड़ जमा हो है।

नायब तहसीलदार दीपक कुमार जुरैल ने बताया कि तीसरी बार इस सरकारी भूमि की पैमाइश की जा रही है। शिकायत के आधार पर की गई इस कार्रवाई में करीब 40 मकानों को चिह्नित किया गया है। इन मकानों का निर्माण लगभग 25 से 30 साल पुराना प्रतीत होता है। यह कार्रवाई शाम तक जारी रहने की उम्मीद है।

संभल तहसीलदार धीरेंद्र कुमार सिंह ने गांव वाजिदपुर सराय के गाटा संख्या 332 रकबा 0.332 हेक्टेयर तालाब की भूमि की पैमाइश के लिए नायब तहसीलदार दीपक कुमार जुरैल को प्रभारी नियुक्त किया है। टीम में कानूनगो पंकज गुप्ता, सुरेंद्र सिंह, अमीचंद्र, चंद्रपाल सिंह और लेखपाल आयुष कुमार, मुकेश कुमार यादव, अमित कुमार, नितिन शर्मा, मुकेश कुमार शर्मा, गुन्नू बाबू, अनुराग शर्मा, सुभाष चंद्र, सुरेंद्र सिंह, पुष्पेंद्र सिंह, पीयूष शर्मा, हरीश कुमार, रोहित कुमार, नीरज सैनी, देवेंद्र कुमार सैनी, आशू कुमार गौतम, विकास कुमार, चंपत सिंह, सचिन गुप्ता, शहराज उसमानी शामिल हैं।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने नेता प्रतिपक्ष के काफिले पर हमले की सीबीआई जांच की याचिका स्वीकार की

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कोलकाता, 13 जनवरी (हि. ,स.)। पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी के काफिले पर बीते सप्ताह हुए कथित हमले की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच की मांग को लेकर दायर याचिका को कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया है। यह याचिका सोमवार को हाईकोर्ट की एकल पीठ में दाखिल की गई थी।न्यायमूर्ति शुभ्रा घोष की एकल पीठ ने याचिका को स्वीकार कर लिया है, हालांकि मामले की पहली सुनवाई की तारीख अभी तय नहीं की गई है।

यह मामला केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने भी गंभीरता से लिया है। गृह मंत्रालय ने इस संबंध में नेता प्रतिपक्ष के कार्यालय से विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। शुभेंदु अधिकारी के कार्यालय ने 10 जनवरी की रात उनके काफिले पर हुए हमले से जुड़े पांच वीडियो पहले ही गृह मंत्रालय को भेज दिए हैं।

सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्वयं शुभेंदु अधिकारी से फोन पर बातचीत कर घटना की जानकारी ली। लगभग 15 मिनट चली बातचीत के दौरान अधिकारी ने चंद्रकोणा में हुई पूरी घटना का विस्तृत विवरण गृह मंत्री को दिया।

बताया गया है कि 10 जनवरी की देर शाम पश्चिम मेदिनीपुर जिले के चंद्रकोणा इलाके में शुभेंदु अधिकारी के काफिले पर हमला हुआ। वह पुरुलिया जिले में एक राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद कोलकाता लौट रहे थे।

शुभेंदु अधिकारी का आरोप है कि चंद्रकोणा रोड मार्केट क्षेत्र के चार रास्तों के चौराहे को पार करने के बाद तृणमूल कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं ने अचानक सड़क जाम कर दी। उनके अनुसार, हमलावर तृणमूल कांग्रेस के झंडे लिए हुए थे।

नेता प्रतिपक्ष ने यह भी दावा किया कि सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं ने उनके काफिले पर बांस के डंडों से हमला किया और उनकी बुलेटप्रूफ गाड़ी को भी निशाना बनाया। उन्होंने आरोप लगाया कि काफी देर तक हमले के बावजूद स्थानीय पुलिस मौके पर नहीं पहुंची।

किसी तरह मौके से निकलने के बाद शुभेंदु अधिकारी सीधे चंद्रकोणा पुलिस चौकी पहुंचे, जहां उन्होंने जमीन पर बैठकर विरोध जताया।

यह पहली बार नहीं है जब नेता प्रतिपक्ष के काफिले पर हमला हुआ हो। इससे पहले अगस्त 2025 में उत्तर बंगाल के कूचबिहार शहर में भी उनके काफिले पर कथित तौर पर तृणमूल कांग्रेस से जुड़े लोगों ने हमला किया था और वाहनों को रोकने की कोशिश की गई थी।

चौथे दिन ‘द राजा साब’ की रफ्तार थमी,धुरंधर’ भी पड़ी फीकी

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साउथ सुपरस्टार प्रभास की हॉरर-कॉमेडी फिल्म ‘द राजा साब’ सिनेमाघरों में रिलीज के बाद दर्शकों और समीक्षकों से मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली है। इसका सीधा असर फिल्म के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन पर देखने को मिला। जहां वीकेंड पर फिल्म ने ठीक-ठाक कमाई की, वहीं कारोबारी दिनों की शुरुआत होते ही इसकी रफ्तार बुरी तरह थम गई। उधर रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ भी अब बॉक्स ऑफिस पर फीकी पड़ती नजर आ रही है और रिलीज के बाद अब तक का सबसे कमजोर कारोबार दर्ज किया है।

चौथे दिन ‘द राजा साब’ की कमाई में आई बड़ी गिरावट

सैकनिल्क के आंकड़ों के मुताबिक, ‘द राजा साब’ ने चौथे दिन यानी पहले सोमवार को महज 6.6 करोड़ रुपये की कमाई की, जो अब तक का इसका सबसे कम कलेक्शन है। फिल्म ने पहले दिन 53.75 करोड़ रुपये की शानदार ओपनिंग ली थी, दूसरे दिन इसकी कमाई 26 करोड़ और तीसरे दिन 19.1 करोड़ रुपये रही। तीसरे और चौथे दिन के आंकड़ों में आई भारी गिरावट ने निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि इसके बावजूद फिल्म ने चार दिनों में कुल 114.6 करोड़ रुपये का कारोबार कर लिया है।

‘धुरंधर’ की रफ्तार भी हुई सुस्त

आदित्य धर के निर्देशन में बनी ‘धुरंधर’ की कमाई भी अब धीमी पड़ती दिख रही है। सैकनिल्क के अनुसार, फिल्म ने 39वें दिन यानी छठे सोमवार को सिर्फ 2.25 करोड़ रुपये का कारोबार किया। इसके साथ ही घरेलू बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की कुल कमाई 807.90 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। हालांकि फिल्म का अगला लक्ष्य अब भी 1000 करोड़ क्लब में शामिल होना है। खास बात यह है कि फिल्म के निर्माताओं ने इसके सीक्वल की घोषणा पहले ही कर दी है, जो 19 मार्च को रिलीज होने वाला है।

मकर संक्रांति: पतंगबाजी, आनंद, संस्कृति और चेतना

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— डॉ. सत्यवान सौरभ

मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति में सिर्फ़ एक तारीख वाला त्योहार नहीं है, बल्कि यह मौसम के बदलाव, सामाजिक जीवन और लोक संस्कृति का एक रंगीन रूप है। यह वह समय है जब सूरज दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाता है और प्रकृति और मानव जीवन दोनों में नई ऊर्जा आती है। इस त्योहार के साथ सदियों पुरानी पतंग उड़ाने की परंपरा को भी सदियों का साथ मिला है। अपने पूरे इतिहास में, यह सिर्फ़ मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रहा है और इसमें सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य से जुड़े पहलू भी जुड़े हैं। हालांकि अब पतंग उड़ाना छत पर खड़े होकर और डोर खींचने का खेल नहीं रहा, आजकल यह सामूहिक उत्सव, मानसिक खुशी और शारीरिक व्यायाम का प्रतीक है।

भारत में पतंग उड़ाने को एक बहुत पुरानी परंपरा माना जाता है। इसका ज़िक्र इतिहास और लोककथाओं में मिलता है। यह शाही महलों में पराक्रम और चतुराई का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन समय के साथ यह जीवन की रोज़मर्रा की ज़रूरत बन गया है। मकर संक्रांति, बसंत पंचमी और अन्य उत्सवों के दौरान आसमान में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें भारतीय समाज की सामान्य जागरूकता और उत्सव का संकेत हैं। यह त्योहार न केवल एक परंपरा है, बल्कि हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में एक बड़ा सामाजिक आयोजन भी है।

पतंगबाजी खेल का सबसे खूबसूरत सामाजिक पहलू है। यह लोगों को उनके घरों से बाहर निकालता है और उन्हें दूसरों से जोड़ता है। छतों पर बातचीत, बच्चों की हंसी, युवाओं की प्रतियोगिताएं और बुज़ुर्गों की मुस्कान, ये सभी दृश्य इस त्योहार को जीवंत बनाते हैं। “वो काटा… वो मारा” की गूंज न केवल खेल की तीव्रता है, बल्कि एक साथ सुनाई देने वाली आवाज़ भी है। आधुनिक युग में जहाँ सामाजिक मेलजोल कम हो रहा है, ऐसे त्योहार एक विकल्प हैं जिनका उपयोग मानवीय संबंधों को बनाए रखने के लिए किया जा सकता है।

मकर संक्रांति के दौरान आयोजित होने वाले पतंग उत्सवों और सामूहिक कार्यक्रमों के साथ इस परंपरा ने एक नया मोड़ लिया है। ऐसे आयोजन स्थानीय सरकारों, सामाजिक संस्थानों, स्वैच्छिक संस्थानों द्वारा अलग-अलग जगहों पर एक साथ किए जाते हैं, ताकि न केवल मनोरंजन, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण, सामाजिक सह-अस्तित्व भी हासिल किया जा सके। इन आयोजनों में बुज़ुर्ग, महिलाएं और बच्चे समान रूप से शामिल होते हैं, जिससे यह समाज के सभी वर्गों का त्योहार बन जाता है, न कि सिर्फ़ समाज के एक हिस्से का। पतंग उड़ाना एक ऐसा खेल है जिसके कई स्वास्थ्य फायदे हैं और इसे आमतौर पर एक मौसमी खेल माना जाता है। पतंग उड़ाने से शरीर के ज़्यादातर हिस्सों की कसरत होती है, जिसमें हाथ, कंधे और आँखें शामिल होती हैं, जिससे शरीर एक्टिव रहता है। बाहर घूमने से शरीर को सूरज की रोशनी मिलती है और मानसिक थकान दूर होती है। डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी ग्रुप और मज़ेदार एक्टिविटीज़ तनाव कम करने में मदद कर सकती हैं।

पतंग उड़ाना मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बहुत फायदेमंद है। खुले आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को उड़ते देखना मन को खुशी और सुकून देता है। यह आपको वर्तमान पल में लाता है और एक तरह से सहज ध्यान का अनुभव कराता है। आज लोग जिस तेज़ रफ़्तार और तनाव भरी ज़िंदगी जी रहे हैं, उसमें मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए ऐसे अनुभव भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यह न सिर्फ़ मनोरंजन है, बल्कि बच्चों के लिए शिक्षाप्रद भी है जब वे पतंग उड़ाते हैं। यह धैर्य, संतुलन, तालमेल और प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा करता है। हवा की दिशा के बारे में जानना, डोर का सही तनाव, समय पर सही फ़ैसले लेने की क्षमता, ये सभी क्षमताएँ बच्चों में फ़ैसले लेने की क्षमता को मज़बूत कर सकती हैं। इसके अलावा, जब यह अभ्यास परिवार के माहौल में किया जाता है, तो यह बच्चों में सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक जुड़ाव को बढ़ाता है।

फिर भी, पतंग उड़ाने को खुशी और रोमांच के उत्सव के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन यह सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को भी दिखाता है। समय के साथ, चीनी मांझे और नायलॉन की डोर से कई गंभीर दुर्घटनाएँ हुई हैं। यह न सिर्फ़ इंसानों के लिए जानलेवा रहा है, बल्कि पक्षी और दूसरे जानवर भी मारे गए हैं। सड़क दुर्घटनाएँ, गले कटना और पक्षियों की मौत, ये सब इस परंपरा के विकृत रूप का सबूत हैं।
यह सरकार और प्रशासन द्वारा बनाए गए नियमों से किया गया है जो काफ़ी नहीं हैं। यह ज़रूरी है कि लोग इसके बारे में जागरूक हों और ज़िम्मेदारी की भावना विकसित करें। पतंगों को सूती धागे, सुरक्षित और खुली जगहों, बच्चों की देखरेख और समय पर ध्यान देने जैसी चीज़ों से सुरक्षित बनाया जा सकता है, ये सभी उपाय पतंग उड़ाने की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं। सबसे ज़रूरी बात यह है कि त्योहार की खुशी किसी के लिए दुख का कारण न बने।

पतंग उड़ाने को पर्यावरण के नज़रिए से भी दोबारा देखने की ज़रूरत है। पतंग का कचरा पेड़ों, बिजली की तारों और सड़कों पर भी पहुँच जाता है, जिससे पर्यावरण संबंधी चुनौतियाँ पैदा होती हैं। प्लास्टिक और नायलॉन की पतंगें लंबे समय तक नष्ट नहीं होतीं और वे वन्यजीवों के लिए खतरनाक होती हैं। इसलिए, इस समय इको-फ्रेंडली पतंगों और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल ज़रूरी है। ज़्यादातर सोशल ऑर्गनाइज़ेशन और वॉलंटियर ग्रुप ये अच्छे प्रयास कर रहे हैं। वे बच्चों और युवाओं को सुरक्षित और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील पतंग उड़ाने के लिए मोटिवेट कर रहे हैं। स्कूलों और सोशल फोरम में जागरूकता फैलाई जा रही है ताकि परंपरा और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे। बदलते समय के साथ पतंग उड़ाना भी बदल रहा है। अब यह सिर्फ़ छतों तक सीमित नहीं रहा। डिजिटल और सोशल मीडिया ने इसे इंटरनेशनल पहचान दी है। पतंग उत्सव के वीडियो और फ़ोटो पूरी दुनिया में घूम रहे हैं। इसी तरह, विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय मकर संक्रांति पर पतंग उत्सव मनाकर अपनी संस्कृति से जुड़े रहते हैं।

यह बदलाव दिखाता है कि सभी परंपराएं एक जैसी नहीं रहतीं, बल्कि समय के साथ बदलती हैं। ऐसा ही एक बदलाव पतंग उड़ाना है, जहाँ आधुनिकता, परंपरा, मनोरंजन और स्वास्थ्य एक साथ उड़ते हैं। यह त्योहार हमें समझाता है कि खुशी और ज़िम्मेदारी के बीच कोई विरोध नहीं है, बल्कि वे एक-दूसरे के पूरक हैं। आखिर में, मकर संक्रांति और इसके साथ होने वाला पतंग उड़ाना सिर्फ़ एक त्योहार नहीं है, बल्कि जीवन का उत्सव भी है। यह हमें सामूहिकता, संतुलन और खुशी का मतलब सिखाता है। जब परंपरा को सही तरीके से और ज़िम्मेदारी के साथ अपनाया जाता है, तो यह न सिर्फ़ अतीत की याद दिलाती है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनती है। आसमान में उड़ती पतंगें यह विचार लाती हैं कि सीमाएं सिर्फ़ ज़मीन पर होती हैं और आसमान सपनों के लिए खुला है, आपको बस इतना जानना है कि डोर कैसे पकड़नी है और संतुलन कैसे बनाए रखना है।

−डॉ. सत्यवान सौरभ

(एक कवि और सामाजिक विचारक)

रणदीप हुड्डा का ‘ओ रोमियो’ से हटना, वजह अब हुई साफ

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शाहिद कपूर की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘ओ रोमियो’ का दर्शक बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। विशाल भारद्वाज द्वारा हाल ही में जारी किया गया टीजर सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोर रहा है। हालांकि टीजर में रणदीप हुड्डा की गैरमौजूदगी ने फैंस को हैरान कर दिया, क्योंकि पहले खबरें थीं कि फिल्म में विलेन की भूमिका रणदीप निभाने वाले हैं। अब इस पूरे मामले को लेकर एक अहम खुलासा सामने आया है।

निजी परेशानियों के चलते रणदीप ने लिया बाहर होने का फैसला

बॉलीबुड सूत्र ने बताया कि रणदीप हुड्डा ने फिल्म की तैयारी भी शुरू कर दी थी। सूत्र के अनुसार, “रणदीप के हिस्से की शूटिंग शुरू होने से ठीक पहले उनकी निजी जिंदगी में कुछ गंभीर परेशानियां आ गईं। यह दौर पिछले साल अप्रैल का था, जब उनकी फिल्म ‘जाट’ (2025) रिलीज हुई थी।” बताया गया कि इस दौरान रणदीप अपनी पत्नी लिन लैशराम की सेहत से जुड़ी समस्याओं और निजी हालातों से जूझ रहे थे, जिस वजह से उन्होंने काम से पहले परिवार को प्राथमिकता देने का फैसला किया।

रणदीप के बाहर होते ही हुई नई कास्टिंग

सूत्र के मुताबिक, रणदीप का प्रोजेक्ट से अलग होना पूरी तरह आपसी सहमति और मित्रतापूर्ण माहौल में हुआ। उनके बाहर निकलने के बाद निर्माताओं ने तुरंत विलेन के किरदार के लिए नई कास्टिंग की और अभिनेता अविनाश तिवारी को इस भूमिका के लिए साइन कर लिया। फिल्म में शाहिद कपूर के साथ विक्रांत मैसी, तृप्ति डिमरी, दिशा पाटनी, तमन्ना भाटिया, नाना पाटेकर और फरीदा जलाल जैसे दमदार कलाकार भी नजर आएंगे। ‘ओ रोमियो’ 13 फरवरी 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने के लिए तैयार है।