भय के माहौल में जी रही है आधी आबादी

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                                                        बाल मुकुन्द ओझा

25 नवम्बर को अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस हम ऐसे समय मना रहे है जब महिलाएं लगातार हिंसा की शिकार हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है वैश्विक प्रयासों के बावजूद इस दिशा में कोई साथक सुधर  नहीं हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की नई रिपोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा की भयावह तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर लगभग तीन में से एक महिला, यानी करीब 84 करोड़ महिलाओं ने अपने जीवनकाल में कभी न कभी यौन हिंसा का शिकार होने का दर्द झेला है। यह आंकड़ा मानवता के सबसे पुराने और व्यापक अन्याय को उजागर करता है, जिस पर अभी भी पर्याप्त कार्रवाई  नहीं हो रही है। हाल ही जारी इस रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि पिछले एक वर्ष में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की 31.6 करोड़ महिलाओं और लड़कियों को उनके इंटीमेट पार्टनर द्वारा शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करना पड़ा। यह संख्या वैश्विक स्तर पर इस आयु वर्ग की सभी महिलाओं और लड़कियों के 11 प्रतिशत के बराबर है। यह रिपोर्ट 2000 से 2023 के बीच 168 देशों से एकत्रित डेटा पर आधारित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयेसस ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा मानवता की सबसे पुरानी और सबसे व्यापक ज्यादतियों में से एक है, फिर भी इस पर सबसे कम कार्रवाई की जाती है। कोई भी समाज खुद को निष्पक्ष, सुरक्षित या स्वस्थ नहीं कह सकता जब तक कि उसकी आधी आबादी भय के माहौल में जी रही हो। इस हिंसा को समाप्त करना केवल नीतिगत मामला नहीं है; यह सम्मान, समानता और मानवाधिकारों का मामला है।

भारत की बात करें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की हाल ही में आई रिपोर्ट के मुताबिक,  भारत में साल 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4 लाख 48 हजार 211 मामले दर्ज किए गए थे, जो पिछले दो सालों यानी 2022 और 2021 की तुलना में  काफी ज्यादा है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि प्रति 1 लाख महिलाओं पर अपराध की राष्ट्रीय दर 66.2 है. तो वहीं, दूसरी तरफ रिपोर्ट के मुताबिक, बलात्कार के 29 हजार 670 मामले (दर 4.4 प्रतिशत ) और महिलाओं पर शील भंग करने के इरादे से हमले के 83 हजार 891 मामले दर्ज किए गए हैं।  भारत को संस्कार, संस्कृति और मर्यादा की त्रिवेणी कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में नारी अस्मिता को बहुत महत्व दिया गया है। संस्कृत में एक श्लोक है- यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता। अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। मगर आज सब कुछ उल्टा पुल्टा हो रहा है। न नारी की पूजा हो रही है और देवताओं की जगह सर्वत्र राक्षस ही राक्षस दिखाई दे रहे है। समाज के नजरिए में भी महिलाओं के प्रति अब तक कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला है। ऐसा लगता है जैसे हमारा देश भारत धीरे-धीरे बलात्कार की महामारी से पीड़ित होता जा रहा है। यौन अपराध चिंताजनक रफ्तार से बढ़ रहे हैं।

आजकल रोज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर महिलाओं के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ की खबर दिखाई जाती रहती है परंतु इसकी रोकथाम के उपाय पर चर्चा कहीं नहीं होती है। इस तरह के अत्याचार कब रुकेंगें। क्या हम सिर्फ मूक दर्शक बन खुद की बारी का इंतजार करेंगे। लड़कियों पर अत्याचार पहले भी हो रहे थे और आज भी हो रहे हैं अगर इसके रोकने के कोई ठोस उपाय नहीं किये गये। आज भी हमारे समाज में बलात्कारी सीना ताने खुले आम घूमता है और बेकसूर पीड़ित लड़की को बुरी और अपमानित नजरों से देखा जाता है । न तो समाज अपनी जिम्मेदारी का माकूल निर्वहन कर रहा है और न ही सरकार। ऐसे में बालिका कैसे अपने को सुरक्षित महसूस करेगी यह हम सब के लिए बेहद चिंता की बात है।

सच तो यह है कि एक छोटे से गांव से देश की राजधानी तक महिला सुरक्षित नहीं है। अंधेरा होते-होते महिला प्रगति और विकास की बातें छू-मंतर हो जाती हैं। रात में विचरण करना बेहद डरावना लगता है। कामकाजी महिलाओं को सुरक्षित घर पहुँचने की चिंता सताने लगती है। देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में कमी नहीं आरही है। भारत में आए दिन महिलाएं हिंसा और अत्याचारों का शिकार हो रही हैं। घर से लेकर सड़क तक कहीं भी महिला सुरक्षित नहीं है। देश में महिला सुरक्षा को लेकर किये जा रहे तमाम दावे खोखले साबित हुए है। महिला सुरक्षा को लेकर देशभर से रोजाना अलग-अलग खबरें सामने आती रहती हैं। देश में महिलाओं की स्थिति पर हमेशा ही सवाल खड़े होते रहे हैं। महिलाओं की सुरक्षा के तमाम दावों और वादों के बाद भी उनकी हालत जस की तस है। महिलाएं रोज ही दुष्कर्म, छेड़छाड़, घरेलू हिंसा और अत्याचार से रूबरू होती है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

                                                                                                                         M – 9414441218

उमा देवी खत्री (टुनटुन) : हिंदी फिल्मों की पहली महिला कॉमेडियन

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उमा देवी खत्री, जिन्हें पूरा देश प्यार से टुनटुन के नाम से जानता है, हिंदी फिल्म जगत की पहली और अत्यंत लोकप्रिय महिला कॉमेडियन थीं। उन्होंने अपने विशिष्ट अंदाज़, अनोखी आवाज़, खास व्यक्तित्व और हास्य से भरे अभिनय से एक ऐसा मुकाम बनाया, जिसे आज भी कोई नहीं भूल सकता। वे केवल हंसी की दुनिया की सितारा ही नहीं थीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और प्रतिभा की मिसाल भी थीं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि कठिन परिस्थितियाँ भी यदि मन में दृढ़ निश्चय हो तो महान सफलता की राह रोक नहीं सकतीं।

उमा देवी का जन्म 11 जुलाई 1923 को उत्तर प्रदेश में हुआ। बचपन अत्यंत कठिनाइयों से भरा था। कम उम्र में ही माता-पिता का साया उठ गया और वे अनाथ हो गईं। गरीबी, अकेलापन और जीवन की संघर्षपूर्ण परिस्थितियों ने उन्हें समय से पहले ही बड़ा बना दिया। लेकिन इन कष्टों के बीच भी उमा देवी के मन में संगीत और कला के प्रति गहरा प्रेम बना रहा। उनकी आवाज़ अत्यंत अनूठी थी—मधुरता और भारीपन का एक ऐसा संगम, जो पहली ही बार सुनने पर ध्यान खींच ले।

जीवन में संघर्ष करते हुए वे मुंबई पहुंचीं और फिल्मों में काम पाने का प्रयास किया। शुरुआती दिनों में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन प्रतिभा और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने अपना रास्ता स्वयं बनाया। सबसे पहले उनका नाम उभरकर सामने आया एक गायिका के रूप में। 1947 में उनकी गायकी ने फिल्म जगत को चौंका दिया। “अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का” जैसे गीतों ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया। उस समय की महान गायिका लता मंगेशकर द्वारा उन्हें अत्यंत सम्मान दिया गया और माना जाता है कि लता जी ने उमा देवी को सम्मानपूर्वक यह समझाया कि उनकी आवाज़ का उपयोग एक सीमित दायरे में ही संभव है, और अभिनय की ओर बढ़ना उनके लिए बेहतर राह हो सकती है।

उसी समय से उमा देवी ने अभिनय को अपनी नई दिशा बनाया। उनका भारी-भरकम शरीर, अलग अंदाज़ और सहजता से किए गए हास्य ने उन्हें दर्शकों का सबसे चहेता कलाकार बना दिया। वे कॉमिक भूमिकाओं में इस तरह रच-बस जाती थीं कि कई बार दर्शक केवल उनकी एक झलक से ही हंस पड़ते थे। निर्देशक और कलाकार उन्हें सेट पर “टुनटुन” कहकर बुलाने लगे और यही नाम बाद में उनकी पहचान बन गया। उनका नया नाम टुनटुन फिल्म इतिहास में अमिट हो गया।

1950 और 1960 के दशक में टुनटुन उस दौर की लगभग हर बड़ी फिल्म में हास्य भूमिका में दिखाई देती थीं। वे गुरु दत्त, देव आनंद, दिलीप कुमार, किशोर कुमार, मेहमूद और राज कपूर जैसे सितारों के साथ काम कर चुकी थीं। “आर-पार”, “मिस्टर एंड मिसेज 55”, “अड़चनें”, “सीआईडी”, “दिल्ली का ठग” और “कश्मीर की कली” जैसी फिल्मों में उनके हास्य प्रदर्शन को दर्शक आज भी याद करते हैं। उनकी विशेषता केवल मज़ाक करना ही नहीं थी, बल्कि वे दैनंदिन जीवन की छोटी-छोटी बातों में भी हास्य ढूंढ लेती थीं और उसे पर्दे पर इस तरह प्रस्तुत करती थीं कि किरदार जीवंत हो उठता था।

टुनटुन का हास्य कभी भी भद्दा नहीं होता था। वे शालीन, मधुर और स्वाभाविक अभिनय से हंसी पैदा करती थीं। महिलाओं के लिए हास्य भूमिका निभाना उस दौर में आसान नहीं था। समाज, फिल्म उद्योग और दर्शकों की दृष्टि में महिला कलाकारों के लिए एक तय दायरा था। लेकिन टुनटुन ने इस दायरे को तोड़ा और साबित किया कि चाहे अभिनय का कोई भी क्षेत्र हो—महिलाएं उसमें उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती हैं। वे बताती थीं कि हंसाने वाला कलाकार लोगों के मन में सबसे गहरा असर छोड़ता है, क्योंकि वह दुखों के बीच मुस्कान पैदा करता है।

टुनटुन का निजी जीवन भी संघर्षों से भरा था, परंतु उन्होंने कभी इसे अपने करियर पर हावी नहीं होने दिया। वे एक समर्पित पत्नी और मां थीं। अपने परिवार के प्रति उनका प्रेम और जिम्मेदारी भी उतनी ही दृढ़ थी जितनी उनकी कला के प्रति समर्पण। काम के साथ वे हर परिस्थिति में अपने परिवार को सँभालती रहीं और अपने बच्चों को अच्छी परवरिश दी।

अपने लंबे करियर में टुनटुन ने लगभग 200 से अधिक फिल्मों में काम किया। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि निर्माता-निर्देशक फिल्में लिखते समय विशेष रूप से हास्य दृश्यों में टुनटुन का चरित्र जोड़ देते थे। उनका नाम ही दर्शकों को थिएटर तक खींच लाने के लिए काफी होता था। 1990 के दशक तक वे फिल्म जगत से कुछ दूर हो गईं, लेकिन उनकी पहचान, लोकप्रियता और सम्मान में कभी कोई कमी नहीं आई।

24 नवंबर 2003 को टुनटुन का निधन हो गया। उनके जाने के बाद भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे कलाकार को खो दिया, जिसने न केवल हंसी दी, बल्कि फिल्म जगत में महिलाओं के लिए हास्य भूमिकाओं का मार्ग भी प्रशस्त किया। वे एक ऐसी कलाकार थीं जिनका योगदान सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि संघर्ष किसी भी सपने को रोक नहीं सकता।

अंततः, उमा देवी खत्री ‘टुनटुन’ भारतीय फिल्मों की वह धरोहर हैं, जिन्होंने भारतीय सिनेमा में हास्य अभिनय को नए आयाम दिए। वे हंसी की रानी थीं—एक ऐसी रानी, जिसकी मुस्कान और आवाज़ आज भी लोगों के दिलों में गूंजती है। उनका जीवन प्रेरणा है कि प्रतिभा, साहस और आत्मविश्वास से हर कठिनाई पर विजय पाई जा सकती है।

हीरालाल शास्त्री, वनस्थली विश्व विद्वालय के संस्थापक

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हीरालाल शास्त्री का जन्म 24 नवम्बर 1899 को जयपुर जिले में जोबनेर के एक किसान परिवार में हुआ था। वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी तथा राजनेता तथा वनस्थली विद्यापीठ के संस्थापक थे। वे राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री बने।

उनकी प्रारम्भिक शिक्षा जोबनेर में हुई। 1920 में उन्होंने साहित्य-शास्त्री की डिग्री प्राप्त की। 1921 में जयपुर के महाराज कालेज से बी.ए. किया और वे इस परीक्षा में सर्वप्रथम आए।

हीरालाल की बचपन से ही यह उत्कट अभिलाषा थी कि वे किसी गाँव में जाकर दीन-दलितों की सेवा सेवा में अपना सारा जीवन लगा दें। हालाँकि 1921 में वे जयपुर राज राज्य सेवा में आ गए थे और बड़ी तेजी से उन्नति करते हुए गृह और विदेश विभागों में सचिव बने थे, फिर भी 1927 में उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। प्रशासनिक सेवा के दौरान उन्हेंने बड़ी मेहनत, कार्यकुशलता और निर्भीकता से काम किया था।

हीरालाल शास्त्री, वनस्थली विश्व विद्वालय के संस्थापक थे

रजनीकांत शुक्ला

मिस यूनिवर्स सेलीना जेटली

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सेलीना जेटली का जन्म 24 नवंबर 1981 को शिमला , हिमाचल प्रदेश , भारत में हुआ था। वे एक भारतीय सौंदर्य प्रतियोगिता की खिताब धारक और पूर्व अभिनेत्री हैं। उन्होंने मुख्य रूप से हिंदी सिनेमा में काम किया है। उन्होंने फेमिना मिस इंडिया 2001 का खिताब जीता और मिस यूनिवर्स 2001 में चौथी रनर-अप बनीं ।

उनके पिता पंजाबी हिंदू थे, कर्नल विक्रम कुमार जेटली और मां ईसाई थीं, मीता फ्रांसिस मनोविज्ञान और साहित्य की प्रोफेसर थीं। उनके नाना कर्नल एरिक फ्रांसिस भारतीय सेना की राजपूताना राइफल्स में सेवारत थे। उनकी नानी उषा एक पंजाबी ईसाई परिवार से थीं, और अपनी अफगान हिंदू दादी के माध्यम से दूसरी पीढ़ी की अफगान-भारतीय भी थीं ।

वह बड़ी होकर अपने पिता की तरह सेना में भर्ती होना चाहती थी, या तो पायलट या डॉक्टर के रूप में। उनके बचपन का अधिकांश समय उनके पिता के भारत भर के शहरों और कस्बों में स्थानांतरित होने के कारण अलग-अलग स्थानों पर बीता – परिणामस्वरूप उन्होंने एक दर्जन से अधिक विभिन्न स्कूलों में पढ़ाई की। उन्होंने सिटी मॉन्टेसरी स्कूल, स्टेशन रोड, लखनऊ और कैनोसा कॉन्वेंट स्कूल, रानीखेत में पढ़ाई की, जबकि उनका परिवार संबंधित शहरों में था। उन्होंने इग्नू ( खल्लिकोट कॉलेज अध्ययन केंद्र) से अकाउंटेंसी (ऑनर्स) के साथ वाणिज्य में डिग्री हासिल की, जबकि उनका प्रवास ब्रह्मपुर, ओडिशा में था । उनकी माँ ने वहाँ डेपॉल स्कूल में पढ़ाया। स्नातक होने के बाद, जेटली ने कोलकाता , पश्चिम बंगाल में एक सेल फोन कंपनी में मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव के रूप में कुछ समय के लिए काम किया। परिवार अब महू में बस गया है।

उन्होंने 2003 की थ्रिलर जानशीन से अभिनय की शुरुआत की । उनकी उल्लेखनीय भूमिकाओं में नो एंट्री (2005), अपना सपना मनी मनी (2006), गोलमाल रिटर्न्स (2008) और थैंक यू (2011) शामिल हैं, जिनमें से पहले तीन बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं।

जेटली एलजीबीटीक्यू समुदाय के अधिकारों और समानता की समर्थक हैं और भारत में समलैंगिक अधिकार आंदोलन का समर्थन करती हैं। वह मानवाधिकारों और महिलाओं के अधिकारों से संबंधित गतिविधियों में भी शामिल रही हैं।

जेटली भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को समाप्त करने की समर्थक थीं , जिसने भारत में समलैंगिकता को अपराध घोषित कर दिया था , जब तक कि 2018 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला नहीं आ गया । 2014 में, जेटली ने समलैंगिक अधिकारों पर एक संगीत वीडियो में गायन की शुरुआत की। ‘ द वेलकम ‘ शीर्षक वाला यह वीडियो अप्रैल 2014 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा होमोफोबिया के खिलाफ एक अभियान के रूप में लॉन्च किया गया था।

रजनीकांत शुक्ला

डेल कार्नेगी , आज जिनका जन्मदिन है

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डेल कार्नेगी का जन्म 24 नवंबर, 1888 को मिसौरी के मैरीविले के एक फार्म में हुआ था। वे एक अमेरिकी लेखक और आत्म-सुधार, सेल्समैनशिप, कॉर्पोरेट प्रशिक्षण, सार्वजनिक भाषण और पारस्परिक कौशल के पाठ्यक्रमों के शिक्षक थे।

वे किसान अमांडा एलिजाबेथ हार्बिसन (1858-1939) और जेम्स विलियम कार्नेगी (1852-1941) के दूसरे पुत्र थे। कार्नेगी मैरीविले के दक्षिण-पूर्व में बेडिसन, मिसौरी के आसपास पले-बढ़े और उन्होंने ग्रामीण रोज़ हिल और हार्मनी के एक कमरे वाले स्कूलों में पढ़ाई की। कार्नेगी की मैरीविले के एक अन्य लेखक, होमर क्रॉय के साथ एक लंबी दोस्ती थी।

1904 में, 16 साल की उम्र में, उनका परिवार मिसौरी के वॉरेंसबर्ग स्थित एक फार्म में रहने चला गया । युवावस्था में, उन्हें सार्वजनिक रूप से बोलने में बहुत आनंद आता था और वे अपने स्कूल की वाद-विवाद टीम में शामिल हो गए। कार्नेगी ने बताया कि स्कूल जाने से पहले उन्हें सुबह 3 बजे उठकर सूअरों को चारा डालना और अपने माता-पिता की गायों का दूध निकालना पड़ता था। हाई स्कूल के दौरान, उन्हें विभिन्न चौटाउक्वा सभाओं में दिए जाने वाले भाषणों में रुचि होने लगी। उन्होंने 1906 में अपनी हाई स्कूल की शिक्षा पूरी की।

उन्होंने वॉरेंसबर्ग में स्टेट टीचर्स कॉलेज में दाखिला लिया और 1908 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

कॉलेज के बाद उनकी पहली नौकरी पशुपालकों को पत्राचार पाठ्यक्रम बेचने की थी। इसके बाद उन्होंने आर्मर एंड कंपनी के लिए बेकन , साबुन और चर्बी बेचना शुरू किया। वे इस हद तक सफल रहे कि उन्होंने नेब्रास्का के दक्षिण ओमाहा क्षेत्र को अपनी कंपनी का राष्ट्रीय स्तर का अग्रणी बना दिया।

200 डॉलर बचाने के बाद, डेल कार्नेगी ने 1911 में बिक्री छोड़ दी ताकि वह चॉटोक्वा लेक्चरर बनने के अपने आजीवन सपने को पूरा कर सकें। इसके बजाय उन्होंने न्यूयॉर्क में अमेरिकन एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में दाखिला लिया, लेकिन एक अभिनेता के रूप में उन्हें बहुत कम सफलता मिली, हालांकि ऐसा लिखा है कि उन्होंने पोली ऑफ द सर्कस के रोड शो में डॉ॰ हार्टले की भूमिका निभाई थी। जब उत्पादन समाप्त हो गया, तो वह न्यूयॉर्क लौट आए, 125वीं स्ट्रीट पर वाईएमसीए में रहने लगे । वहाँ उन्हें सार्वजनिक बोलना सिखाने का विचार आया, और उन्होंने वाईएमसीए प्रबंधक को 80% शुद्ध आय के बदले में एक कक्षा को निर्देश देने की अनुमति देने के लिए राजी किया। अपने पहले सत्र में, उनके पास सामग्री समाप्त हो गई थी। सुधार करते हुए, उन्होंने सुझाव दिया कि छात्र “किसी ऐसी चीज़ के बारे में बोलें जिससे उन्हें गुस्सा आए ” , कार्नेगी ने औसत अमेरिकी की अधिक आत्मविश्वास की इच्छा का लाभ उठाया था, और 1914 तक, वह हर हफ्ते 500 डॉलर (2024 में लगभग 15,700 डॉलर) कमा रहे थे।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने अमेरिकी सेना में सेवा की और कैंप अप्टन में समय बिताया। उनके ड्राफ्ट कार्ड में उल्लेख था कि उन्होंने कर्तव्यनिष्ठ आपत्तिकर्ता का दर्जा प्राप्त करने के लिए आवेदन किया था और उनकी एक तर्जनी उंगली कट गई थी।

1916 तक, डेल ने कार्नेगी हॉल में एक व्याख्यान दिया जिसके सभी टिकट बिक गए । कुछ समय बाद उन्होंने अपने अंतिम नाम की वर्तनी बदल दी क्योंकि – जैसा कि उन्होंने 1930 के दशक में अपने साथी मिसौरीवासियों को समझाया था – “उनके किसी भी मित्र या संवाददाता ने इसकी वर्तनी सही नहीं लिखी थी और वह उन्हें बार-बार सही नहीं करना चाहते थे।” कार्नेगी के लेखन का पहला संग्रह पब्लिक स्पीकिंग: अ प्रैक्टिकल कोर्स फॉर बिज़नेस मेन (1926) था , जिसे बाद में पब्लिक स्पीकिंग एंड इन्फ्लुएंसिंग मेन इन बिज़नेस (1932) शीर्षक दिया गया। 1936 में, साइमन एंड शूस्टर ने हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लुएंस पीपल प्रकाशित किया । यह पुस्तक अपनी शुरुआत से ही बेस्टसेलर थी। कार्नेगी की मृत्यु के समय तक, पुस्तक की 31 भाषाओं में पांच मिलियन प्रतियां बिक चुकी थीं पुस्तक में कहा गया है कि उन्होंने उस समय के वयस्क शिक्षा आंदोलन में अपनी भागीदारी में 150,000 से अधिक भाषणों की आलोचना की थी।

वे हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लुएंस पीपल (1936) के लेखक थे , जो आज भी लोकप्रिय एक बेस्टसेलर है। उन्होंने हाउ टू स्टॉप वरीइंग एंड स्टार्ट लिविंग (1948), लिंकन द अननोन (1932) और कई अन्य पुस्तकें भी लिखीं ।

उनकी पुस्तकों में एक मुख्य विचार यह है कि दूसरों के प्रति अपने व्यवहार में परिवर्तन करके उनके व्यवहार को बदलना संभव है।

कार्नेगी की मृत्यु 1 नवंबर, 1955 को न्यूयॉर्क के फॉरेस्ट हिल्स स्थित उनके घर पर हॉजकिन लिंफोमा से हुई। उन्हें मिसौरी के कैस काउंटी के बेल्टन कब्रिस्तान में दफनाया गया।

अपने बचपन में मैंने (शायद आपने भी) इनकी हिंदी में अनुवादित पुस्तकें पढ़ी हैं।

रजनीकांत शुक्ला

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शिया धर्मगुरु कल्बे सादिक : शिक्षा, सुधार और एकता के प्रवर्तक

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कल्बे सादिक आधुनिक भारत के उन विशिष्ट धर्मगुरुओं में से रहे, जिन्होंने धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर समाज में एकता, शिक्षा और साम्प्रदायिक सौहार्द का अद्भुत संदेश दिया। वे शिया मुस्लिम समुदाय के प्रतिष्ठित विद्वान, चिंतक और सुधारक थे, लेकिन उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी—समाज के हर वर्ग के लिए समान प्रेम और सेवा की भावना। वे धार्मिक उपदेशों को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखते थे, बल्कि उन्हें जीवन में उतारकर दिखाते थे। इसी कारण वे देशभर में सम्मान और विश्वास के प्रतीक बने।

कल्बे सादिक का जन्म 22 जून 1939 को लखनऊ शहर के एक प्रतिष्ठित धार्मिक परिवार में हुआ। उनके पिता मौलाना कल्बे हुसैन एक प्रसिद्ध आलिम थे। घर का वातावरण धार्मिक, विद्वत्तापूर्ण और समाजसेवा के संस्कारों से भरा हुआ था। बचपन से ही कल्बे सादिक की रूचि अध्ययन, चिंतन और तर्कपूर्ण चर्चा में रहती थी। उन्होंने अरबी, फारसी, उर्दू, इतिहास, इस्लामी दर्शन और अन्य धार्मिक विषयों में गहन अध्ययन किया। बाद में इंग्लैंड से आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर वे एक प्रखर वक्ता और गहन विचारक के रूप में विकसित हुए।

धर्मगुरु होने के बावजूद उनका दृष्टिकोण आधुनिक, वैज्ञानिक और प्रगतिशील था। वे हमेशा कहते थे कि “यदि शिक्षा नहीं है तो धर्म का असली उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।” इसी विचारधारा के चलते उन्होंने शिक्षा को अपने जीवन का मुख्य साधन बना लिया। उन्होंने लखनऊ में तल्लीम-ओ-तरबिय्यत आंदोलन को नई गति दी और गरीब तथा वंचित बच्चों की पढ़ाई के लिए कई संस्थान स्थापित किए। टूटी पैर वाली कुर्सियों और बिना बिजली के कमरों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए उन्होंने आधुनिक स्कूल, कॉलेज और टेक्निकल संस्थान खड़े किए। उनकी यह सोच थी कि सिर्फ मदरसों की शिक्षा पर्याप्त नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान, गणित और तकनीक में भी मुस्लिम समाज को आगे आना होगा।

कल्बे सादिक केवल शिक्षा सुधारक ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक सुधार के भी बड़े पैमाने पर प्रवर्तक थे। उन्होंने दहेज के खिलाफ बहुत मजबूत आवाज उठाई। वे मंचों से खुलकर कहते थे कि दहेज लेना या देना इस्लाम के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने अपने समुदाय में सादगीपूर्ण निकाह का अभियान चलाया और स्वयं भी अपने घराने में इसका पालन किया। वे सामाजिक बुराइयों को धार्मिक आदेशों के माध्यम से नहीं, बल्कि तर्क, करुणा और मानवीयता के आधार पर समझाते थे।

भारत में धार्मिक तनाव और साम्प्रदायिक संघर्ष लंबे समय से चुनौती रहे हैं। ऐसे समय में कल्बे सादिक हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे सशक्त चेहरों में से रहे। उनकी तकरीरों में हमेशा भाईचारे, राष्ट्रीय एकता और मानवीय मूल्यों का संदेश होता था। वे कहते थे कि “धर्म बांटता नहीं, जोड़ता है। जो जोड़ता नहीं, वह धर्म नहीं।” उनकी सभाओं में सभी धर्मों के लोग शामिल होते थे और उनकी बातों से प्रेरणा लेते थे। वे राम और रहीम की एकता पर जोर देते थे और भारत की सांझी विरासत को एक अमूल्य धरोहर बताते थे।

कल्बे सादिक का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, सौम्य और विनम्र था। वे बड़े से बड़े मंच पर भी सादगी भरा पहनावा रखते थे और सामान्य भाषा में जटिल धार्मिक विषयों को समझा देते थे। उनकी शैली में संयम, करुणा और गंभीरता का अनोखा मेल होता था। वे आलोचना से घबराते नहीं थे और न ही किसी विवाद में कठोरता दिखाते थे। उनकी वाणी में ऐसी मिठास थी कि कटु से कटु दिल भी पिघल जाता था।

स्वास्थ्य कमजोर रहने के बावजूद वे आखिरी समय तक समाजसेवा और शिक्षा के कार्यों में लगे रहे। उन्होंने गरीबों की सहायता, छात्रवृत्ति कार्यक्रमों और सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा दिया। उनका यह भी मानना था कि यदि समाज को आगे बढ़ाना है तो महिलाओं की शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लड़कियों की पढ़ाई के लिए विशेष प्रयास किए और उनके लिए कई संस्थान स्थापित कराए।

कल्बे सादिक ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि धर्म का उद्देश्य मनुष्य को श्रेष्ठ बनाना है, न कि उसे दूसरों से अलग करना। वे धार्मिक श्रेष्ठता की जगह मानवीय श्रेष्ठता को महत्व देते थे। वे इस्लाम को ज्ञान, तर्क और प्रेम का धर्म मानते थे और उसकी व्याख्या आधुनिक संदर्भों में करते थे। उनकी यह विशेषता उन्हें सिर्फ एक धर्मगुरु नहीं, बल्कि एक समाज-सुधारक और मानवतावादी चिंतक के रूप में स्थापित करती है।

24 नवंबर 2020 को उनके निधन से देश ने एक अद्भुत व्यक्तित्व खो दिया। परंतु उनके विचार, उनके कार्य और उनकी शिक्षाएं आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं। उनसे जुड़ी संस्थाएं आज भी हजारों बच्चों और गरीब परिवारों का जीवन बदल रही हैं। उनकी याद में आयोजित कार्यक्रमों में अक्सर एक ही बात दोहराई जाती है—“कल्बे सादिक ने इंसानियत का पैगाम दिया, और यह पैगाम कभी नहीं मिटेगा।”

अंततः, कल्बे सादिक का जीवन भारतीय मुस्लिम समाज ही नहीं बल्कि पूरे देश की सामाजिक-सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने शब्दों से ज्यादा कार्यों से यह साबित किया कि शिक्षा, भाईचारा और मानवता ही समाज को सही दिशा दे सकते हैं। उनका जीवन आज भी नई पीढ़ी के लिए एक प्रकाशस्तंभ की तरह है।

सर छोटू राम : किसान आंदोलनों के आधार स्तंभ

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सर छोटू राम भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन किसानों, मजदूरों और ग्रामीण समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। उन्हें आधुनिक भारत का किसान मसीहा कहा जाता है। उनका व्यक्तित्व केवल एक नेता का नहीं बल्कि सामाजिक सुधारक, दूरदर्शी चिंतक और न्यायप्रिय प्रशासक का रहा। उनके विचारों और नीतियों ने उत्तर भारत के ग्रामीण समाज को नई दिशा दी और बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में ग्रामीण चेतना को मजबूत किया।

सर छोटू राम का जन्म 24 नवंबर 1881 को तत्कालीन पंजाब प्रांत के रोहतक जिले के गढ़ी सांपला गांव में हुआ। उनका मूल नाम राऊ रिचपाल था, जिसे बाद में छोटू राम के रूप में जाना गया। सामान्य कृषक परिवार में जन्म लेने के कारण उन्होंने बचपन से ही किसानों की कठिनाइयों को नजदीक से देखा। यही अनुभव उनके पूरे जीवन के आधार बने और यही कारण था कि उन्होंने पढ़ाई-लिखाई के बाद भी शहरों की चमक-दमक से दूर रहकर ग्रामीण भारत की समस्याओं को केंद्र में रखा।

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव और जिला मुख्यालय में पूरी की। आगे की उच्च शिक्षा के लिए वे दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज गए और फिर कानून की पढ़ाई के लिए आगरा और अलाहाबाद में अध्ययन किया। वे अत्यंत तेजस्वी, स्पष्टवादी और मेहनती विद्यार्थी थे। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की, परंतु उनका मन हमेशा किसानों और मजदूरों की दुर्दशा पर चिंतित रहता था। इसी चिंता ने उन्हें राजनीति और सामाजिक सेवा की ओर मोड़ा।

राजनीति में प्रवेश के बाद उनका लक्ष्य बहुत स्पष्ट था—किसानों को साहूकारों और जमींदारों की शोषणकारी व्यवस्था से मुक्त कराना। उन्होंने यूनियनिस्ट पार्टी के माध्यम से पंजाब के ग्रामीण समाज को संगठित किया। उस समय किसानों पर अत्यधिक कर्जा होता था और सूदखोरी की वजह से उनकी जमीनें लगातार छीनी जा रही थीं। सर छोटू राम ने इस समस्या को जड़ से समझा और किसानों के लिए ऐतिहासिक कानून बनवाए। उनमें सबसे महत्वपूर्ण था—पंजाब राहत-ए-कर्ज अधिनियम। इस कानून ने किसानों को साहूकारों की पकड़ से काफी हद तक मुक्त कराया और उनकी जमीनों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके अलावा उन्होंने पंजाब कृषि उत्पादक विपणन अधिनियम बनवाया, जिससे किसानों को अपने उत्पादों की बेहतर कीमत मिल सके। मंडियों की व्यवस्था को नियंत्रित कर उन्होंने बिचौलियों के शोषण पर रोक लगवाई। सर छोटू राम के प्रयासों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार हुआ। उन्होंने किसान सभा, सहकारी समितियों और ग्रामीण विकास योजनाओं को बढ़ावा दिया। वे हमेशा जोर देते थे कि भारत की असली शक्ति गांवों में है और यदि गांव मजबूत होंगे, तो राष्ट्र भी मजबूत होगा।

सर छोटू राम ने केवल किसानों के आर्थिक हितों की ही नहीं, बल्कि उनके सामाजिक उत्थान की भी चिंता की। उन्होंने समाज में फैली छुआछूत, जातिगत भेदभाव और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। वे शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम मानते थे। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मानना था कि शिक्षित किसान ही अपने अधिकारों और कर्तव्यों को बेहतर तरीके से समझ सकता है।

सर छोटू राम अत्यंत सादगीपूर्ण और उच्च नैतिक मूल्यों वाले व्यक्ति थे। सत्ता में रहते हुए उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत लाभ नहीं उठाया। उनका जीवन अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी का उदाहरण रहा। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद उनके विरोधी भी उनकी सत्यनिष्ठा और दूरदर्शिता का सम्मान करते थे। ब्रिटिश सरकार ने सामाजिक योगदान और प्रशासनिक दक्षता को देखते हुए उन्हें “सर” की उपाधि दी, परंतु उन्होंने हमेशा खुद को किसानों का सेवक ही माना।

उनका प्रभाव इतना व्यापक था कि उन्हें आज भी हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के ग्रामीण समाज में गहरी श्रद्धा से याद किया जाता है। उनकी नीतियों से लाभान्वित किसान उन्हें अपने पथप्रदर्शक के रूप में देखते हैं। कहा जाता है कि यदि सर छोटू राम का निधन 1945 में न हुआ होता, तो स्वतंत्र भारत की कृषि नीति और भी अधिक किसान-केंद्रित होती।

सर छोटू राम का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाए, जो अपने पद का उपयोग सेवा और सुधार के लिए करे, न कि स्वार्थ के लिए। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे—विशेषकर आज के दौर में, जब किसान मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं।

अंततः, सर छोटू राम केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि एक आंदोलन थे—ग्रामीण चेतना का, न्याय के संघर्ष का और भारत के किसानों को सम्मान दिलाने का। उनका जीवन देश के भविष्य के लिए प्रेरणा-स्रोत है और रहेगा।

सरकार बनाकर गिराना कांग्रेस की नीति

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देश के वर्तमान विपक्ष को यह बात कभी समझ नहीं आएगी । हां जनता खूब समझ रही है । गौर करेंगे तो पाएंगे कि कांग्रेस जिस भी सरकार को समर्थन देकर पीएम बनाया , कुछ ही दिनों में उसे गिरा भी दिया । हम राज्यों की बात नहीं करते चूंकि सूची लम्बी हो जाएगी ।

केंद्र सरकार के उदाहरणों से समझ लीजिए । कांग्रेस ने इस शर्त पर चौधरी चरण सिंह , चंद्रशेखर , देवगौड़ा , इंद्रकुमार गुजराल आदि की सरकारें बनवाई कि भाजपा को अलग रखना पड़ेगा । समय समय पर बनी चारों सरकारें गिर गई चूंकि कांग्रेस ने कुछ ही महीनों में एक एक एककर चारों सरकारों को कुछ ही महीनों में गिरा दिया । कांग्रेस की हमेशा डिमांड रही है कि विपक्ष उनका पीएम या सीएम बनवाए तो वह यूपीए , महागठबंधन अथवा इंडी गठबंधन बनाए ।

यही वजह है कि हाल के बिहार चुनाव में कांग्रेस ने तेजस्वी को कभी भी सीएम उम्मीदवार घोषित नहीं किया । यहां तक कि बड़े नेताओं ने बिहार जाना ही छोड़ दिया । मतदान के करीब जाकर समर्थन दिया । इसके विपरीत बीजेपी ने आपातकाल के बाद जनता पार्टी सरकार बनवाई , कांग्रेस के पुराने नेता मोरारजी भाई को पीएम बनाया । बाद में कांग्रेस के बागी विश्वनाथ प्रताप सिंह को पीएम बनाया । वीपी सिंह यदि मंडल न लाते तो बीजेपी कमंडल न लाती । लेकिन वीपी सरकार अपने कुकर्मों से गिर गई ।

देश में आज जितनी भी पार्टियां हैं लगभग उन सभी का जन्म कांग्रेस से लड़ते हुए हुआ है । यहां तक कि डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना भी कांग्रेसवाद के खिलाफ लड़ते हुए की थी । मतलब यह कि जिन पार्टियों का जन्म कांग्रेस से लड़ते हुए हुआ वे सभी आज कांग्रेस से मिलकर बीजेपी के साथ लड़ रही हैं । अजीब चक्र है न ? मतलब तब कांग्रेस से नफ़रत थी तो जन्म लिया अब बीजेपी नफरत है तो मिट जाने को तैयार ?

हमारे कुछ मित्र कहते हैं कि हम कांग्रेस के निंदक हैं । ऐसा नहीं , कांग्रेस नहीं उसके नेताओं की छद्मवादिता निराश करती है। अरे भाई देश की जनता जिन्हें बार बार चुन रही है , उस जनता को तो चोर मत ठहराओ ? लोकतंत्र की असली मालिक सरकार नहीं , जनता है । चूंकि जनता विपक्ष को हराकर बीजेपी को वोट देती है तो जनता द्वारा चुनी गई सरकार को आप चोर चोर चिल्लाओगे ? अपने कर्म देखिए कि आपने किस तरह चंद्रशेखर , चरण सिंह , देवगौड़ा और गुजराल की सरकारों को बीच रास्ते गिराया था ? इतनी पिटाई के बाद कम से कम अब तो बाज आइए , कुछ सोचिए , कुछ समझिए । वरना यूँ ही सत्ता को ढूंढते रह जाएंगे….?

,,,,, कौशल सिखौला

वरिष्ठ पत्रकार

24 नवंबर का इतिहास

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  • 1759 – इटली में विसूवियस पर्वत शिखर पर ज्वालामुखी विस्फोट।
  • 1859 – चार्ल्स डार्विन की ‘आन द ओरिजिन आफ स्पेशीज’का प्रकाशन।
  • 1963 – अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनेडी के हत्यारे ली हार्वे ऑस्वाल्ड की हत्या की गई।
  • 1871 – नेशनल राइफल एसोसिएशन (एनवाईसी) का गठन।
  • 1926 – प्रख्यात दार्शनिक श्री अरविंदो को पूर्ण सिद्धि की प्राप्ति।
  • 1966 – कांगो की राजधानी किंसासा में पहला टीवी स्टेशन खुला।
    • स्लोवाकिया के ब्रातिस्लवा के निकट बुल्गारिया का विमान दुर्घटनाग्रस्त, 82 यात्रियों की मौत।
  • 1986 – तमिलनाडु विधानसभा में पहली बार एक साथ विधायकों को सदन से निष्कासित किया गया।
  • 1988 – दल बदल कानून के तहत पहली बार लोकसभा सांसद लालदूहोमा को अयोग्य करार दिया गया।
  • 1989 – चेकेस्लोवाकिया में तत्कालीन कम्युनिस्ट पार्टी के पूरे नेतृत्व ने सामूहिक रूप से इस्तीफ़ा दे कर एक नए युग की शुरूआत की।
  • 1992 – चीन का घरेलू विमान दुर्घटनाग्रस्त, 141 लोगों की मौत।
  • 1998 – एमाइल लाहौद ने लेबनान के राष्ट्रपति पद की शपथ ली।
  • 1999 – एथेंस में सम्पन्न विश्व भारोत्तोलन चैंपियनशिप में भारत की कुंजुरानी देवी ने रजत पदक जीता।
  • 2001 – नेपाल में माओवादियों ने सेना व पुलिस के 38 जवान मार डाले।
  • 2006 – पाकिस्तान और चीन ने एक मुक्त व्यापार क्षेत्र संधि पर हस्ताक्षर किये तथा अवाक्स बनाने पर भी सहमति हुई।
  • 2007 – पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ आठ वर्षों के निर्वासन के बाद स्वदेश पहुँचे।
  • 2008- मालेगाँव बम ब्लास्ट के मामले में आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने एटीएस द्वारा अश्लील सीडी दिखाने का आरोप लगाया।

24 नवंबर को जन्मे व्यक्ति

24 नवंबर को हुए निधन

बड़वा गाँव : हरियाणा की ‘छोटी काशी’

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परंपरा, अध्यात्म और संस्कृति से धरा एक जीवंत ग्राम

बड़वा, हरियाणा के भिवानी ज़िले का एक ऐसा प्राचीन और गौरवशाली गाँव है, जिसके कण–कण में इतिहास, अध्यात्म और संस्कृति रच-बस गए हैं। गाँव के उत्तर-पूर्व में हिसार, दक्षिण में सीवानी कस्बा, उत्तर में चौधरीवास, पूर्व में रावतखेड़ा तथा पश्चिम में नलोई और गावर गाँव स्थित हैं। इसका पिन कोड १२७०४५ है। अपनी विशिष्ट संस्कृति, मंदिरों की बहुलता और आस्थापूर्ण जीवन के कारण बड़वा को हरियाणा की ‘छोटी काशी’ कहा जाता है। यहाँ का वातावरण इतना सौम्य, सादा और मानवीय है कि कोई भी आगंतुक गाँव में प्रवेश करते ही आत्मिक शांति का अनुभव करता है।

यह गाँव हरियाणवी और राजस्थानी संस्कृति के सुंदर संगम का अद्भुत प्रमाण है। यहाँ के लोग सहज, शरीफ़, धार्मिक प्रवृत्ति के और अत्यंत विनम्र स्वभाव के हैं। सरल जीवन और ऊँचे विचार इस समुदाय की पहचान हैं। जीवन को त्यौहार की तरह जीने की कला, हर पल में आनंद ढूँढ लेने का दृष्टिकोण और मिल-जुलकर रहने की परंपरा इस गाँव की सामाजिक आत्मा है। बड़वा का सामुदायिक माहौल इतना सौहार्दपूर्ण है कि यह गाँव केवल एक बस्ती नहीं, बल्कि एक विस्तृत परिवार की तरह दिखाई देता है।

गाँव के उत्तर भाग में स्थित माँ दुर्गा मंदिर नवरात्रों का प्रमुख केंद्र है। नवरात्रों के दिनों में यहाँ प्रतिदिन सवा मणि भोग का वितरण भक्तिभाव और परंपरा का अनुपम उदाहरण है। मंदिर में उमड़ने वाली श्रद्धा, रोज़ाना कीर्तन और सामूहिक सहभागिता गाँव की आध्यात्मिकता को सजीव करती है। चारों दिशाओं में फैले मंदिरों का विस्तार बड़वा की धार्मिक विरासत को और भी उजागर करता है। उत्तर दिशा में पुराना ठाकुर जी मंदिर, श्रीकृष्ण मंदिर, शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, पक्का (केसर) जोहड़, दुर्गा मंदिर और सती दादी मंदिर स्थित हैं। दक्षिण दिशा में बाबा रामदेव मंदिर, बाबा गोगा पीर मंदिर, विश्वकर्मा मंदिर, गाँव का स्टेडियम और पशु चिकित्सालय है। पूर्व दिशा में शनि देव मंदिर, निर्माणाधीन श्री श्याम मंदिर तथा कई छोटे मंदिरों की शृंखला है। पश्चिम दिशा में गोरी दादी मंदिर और झांग आश्रम गाँव की पवित्र पहचान को और भी गहरा करते हैं।

बड़वा की प्राचीनता उसकी हवेलियों से झलकती है। यहाँ की २० से अधिक भव्य और कलात्मक हवेलियाँ गाँव के सुनहरे अतीत की प्रतिनिधि हैं। इन्हें देखकर स्पष्ट होता है कि यह गाँव कभी समृद्ध व्यापारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्र रहा होगा। पुराने समय में यहाँ कई प्रतिष्ठित और बड़े सेठ रहते थे, जिनमें श्री परशुराम सेठ और श्री लायक राम सेठ के नाम विशेष सम्मान और श्रद्धा के साथ स्मरण किए जाते हैं। हवेलियों की विशालता, स्थापत्य कला और परिवारों की विरासत आज भी इस गाँव की गरिमा को उजागर करती हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़वा अग्रणी है। गाँव में १०+२ राजकीय बालक विद्यालय, राजकीय बालिका उच्च विद्यालय, शिवालिक हाई स्कूल, टैगोर सीनियर सेकेंडरी स्कूल, दयानंद हाई स्कूल तथा उच्च शिक्षा प्रदान करने वाला टैगोर कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन स्थित है। यह शैक्षणिक विस्तार ग्रामीण परिवेश में शिक्षा के सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त करता है। गाँव के मध्य में अवस्थित रामलीला मैदान सांस्कृतिक चेतना का केंद्र है, जहाँ हर वर्ष अत्यंत विधि-विधान और भक्ति के साथ रामलीला का मंचन किया जाता है। वर्षभर सत्संग-किर्तन का सिलसिला गाँव की आध्यात्मिक ऊर्जा को निरंतर सक्रिय बनाए रखता है।

गौशाला का संचालन ग्रामीणों के सहयोग, दान और सेवा-भाव पर आधारित है, जो बड़वा के सामुदायिक संस्कारों का सच्चा प्रतीक है। गाँव के भीतर व आसपास के धार्मिक स्थलों में बाबा कमलगिरी की कुटिया, गुरु जाम्बेश्वर मंदिर, जमानी बुआ स्थित श्रीकृष्ण मंदिर, मुख्य बाज़ार का श्री रघुनाथ मंदिर और रोषड़ा (स्थानीय उच्चारण–रोहसड़ा) जोहड़ के समीप स्थित भभूता मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दक्षिण दिशा में सीवानी मार्ग पर स्थित काली माई मंदिर (महावतार धाम) अपनी दिव्य ऊर्जा और आस्था के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।

पिछले बीस वर्षों से सतत साहित्य-साधना में रत तथा पच्चीस से अधिक कृतियों के रचनाकार, गाँव के युवा साहित्यकार एवं सामाजिक चिंतक दम्पति — डॉ. सत्यवान सौरभ और डॉ. प्रियंका सौरभ — के अनुसार बड़वा केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना, परंपरा, अध्यात्म और आधुनिकता के संतुलन का जीवंत उदाहरण है। उनके शब्दों में, “बड़वा हरियाणा के उन विरल गाँवों में से है, जहाँ संस्कृति केवल संरक्षित नहीं, बल्कि प्रतिदिन जी जाती है।”

इसी सांस्कृतिक जीवंतता का प्रमाण है कि पिछले ३० वर्षों से रोषड़ा (स्थानीय उच्चारण–रोहसड़ा) जोहड़ पर कलयुग के अवतार माने जाने वाले ‘रुन्चे वाले बाबा रामदेव महाराज’ का विशाल मेला और खेल प्रतियोगिताएँ निरंतर आयोजित होती आ रही हैं। यह मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह खेल भावना, सामाजिक सहभागिता और सामुदायिक एकजुटता का भी महत्त्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। इसी प्रकार गोगा पीर मंदिर प्रांगण में आयोजित डफ प्रतियोगिता हर वर्ष क्षेत्रीय लोक-संस्कृति को जीवंत करती है, जिसमें दूर-दराज़ के कलाकार और श्रद्धालु बड़ी संख्या में भाग लेते हैं।

बड़वा की पहचान केवल मंदिरों, मेलों और परंपराओं से ही नहीं बनती, बल्कि यहाँ की जनता के संस्कार, व्यवहार, शिक्षा-स्तर और सरलता भी इसे विशेष बनाती है। लोग अत्यंत शालीन, शिक्षित, व्यवस्थित और आपसी सहयोग की भावना से परिपूर्ण हैं। यहाँ की सामाजिक एकता, पारिवारिक संस्कृति और आपसी सम्मान का वातावरण एक आदर्श ग्रामीण जीवन की छवि प्रस्तुत करता है।

अंततः, बड़वा हरियाणा की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक पहचान का एक उज्ज्वल प्रतीक है — एक ऐसा गाँव, जहाँ परंपरा और आधुनिकता सहज संतुलन में सह-अस्तित्व रखती हैं; जहाँ धर्म, लोक-जीवन, शिक्षा और सामाजिक सौहार्द एक ही धारा में प्रवाहित होते हैं; और जहाँ हर आने वाला व्यक्ति अपनत्व और शांति का अनुभव करता है।

बॉक्स आइटम

बड़वा गाँव एक नज़र में

हरियाणा का प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध गाँव

‘छोटी काशी’ के नाम से प्रसिद्ध

२० से अधिक भव्य हवेलियाँ — ‘हवेलियों का गाँव’

प्रत्येक दिशा में प्रतिष्ठित मंदिरों का विशाल विस्तार

माँ दुर्गा मंदिर में नवरात्रों के दौरान प्रतिदिन सवा मणि भोग

पिछले ३० वर्षों से रोषड़ा (रोहसड़ा) जोहड़ पर बाबा रामदेव महाराज का विशाल मेला

गोगा पीर मंदिर प्रांगण में वार्षिक डफ प्रतियोगिता

उत्कृष्ट शैक्षणिक संस्थान: १०+२ विद्यालय, हाई स्कूल, टैगोर कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन

साहित्यकार दम्पति डॉ. सत्यवान सौरभ एवं डॉ. प्रियंका सौरभ का प्रेरक योगदान

अत्यंत शालीन, शिक्षित, धार्मिक और सुसंस्कृत ग्रामीण समाज

केसर तालाब और ‘मुक्तिधाम’ — बड़वा गाँव की सांस्कृतिक धरोहर

बड़वा गाँव की पहचान उसके ऐतिहासिक केसर तालाब से गहराई से जुड़ी है। कहा जाता है कि सेठ परशुराम ने अपनी बहन केसर की मर्यादा की रक्षा हेतु यह तालाब बनवाया था। उस समय गाँव की स्त्रियाँ गोबर चुनने जाती थीं, और यह कार्य सम्पन्न तथा उच्च जाति के लोगों के लिए अपमानजनक माना जाता था। बहन को इस अपमान से बचाने के लिए सेठ ने वहाँ एक विशाल, पक्का तालाब निर्माण करवाया, जो आगे चलकर केसर तालाब के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

तालाब के ठीक पास एक गहरा कुंड स्थित है, जिसे मुक्तिधाम के नाम से जाना जाता है। लोककथाओं के अनुसार दुखी महिलाएँ कभी-कभार यहाँ कूदकर अपनी जीवनयात्रा समाप्त कर लेती थीं। इसी कारण यह स्थान लोकमानस में ‘मुक्तिधाम’ कहलाया। कुंड के किनारे बनी छतरियों की दीवारों पर राधा-कृष्ण की रासलीला के अद्भुत चित्र आज भी सुरक्षित हैं। इन चित्रों में ढोलक, नगाड़े, बांसुरी, हारमोनियम जैसे लोकवाद्य सुंदरता से उकेरे गए हैं। लाल, पीले और नीले रंगों की चमक चित्रों को जीवंत बनाती है—श्रीकृष्ण नीले रंग में और राधा गोरे रंग में अंकित की गई हैं। मोर, तोता, चिड़िया जैसे पशु-पक्षियों की आकृतियाँ भी चित्रकला की शोभा बढ़ाती हैं।

बड़वा की सांस्कृतिक समृद्धि इतनी पुरातन और आकर्षक रही है कि हरियाणवी सिनेमा भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। प्रसिद्ध हरियाणवी फिल्मों ‘चंद्रावल’ और ‘बैरी’ के कई दृश्य इसी गाँव के केसर और रूसहड़ा जोहड़ और आसपास के कुओं के पास फिल्माए गए थे। आज भी वे पनघट, जहाँ कभी ‘चंद्रो’ के दृश्य फिल्माए गए थे, गाँव की सामूहिक स्मृतियों में गर्व का स्थान रखते हैं। गाँववाले उन स्थानों को आज भी अपने इतिहास और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक मानते हैं।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट