प्राचीन कथा परंपरा के समर्थक राधेश्याम कथावाचक

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जन्म: 25 नवंबर 1890, बरेली, उत्तर प्रदेश

मृत्यु: 26 अगस्त 1963 (लगभग 73 वर्ष की आयु)

भारतीय धार्मिक कथा परंपरा में अनेक वक्ताओं ने अपनी वाणी, विद्वता और मनोहर प्रस्तुति से जन-मानस को प्रभावित किया है, लेकिन जिन कुछ नामों ने कथा-शास्त्र को नयी गरिमा और व्यापक लोकप्रियता प्रदान की, उनमें राधेश्याम कथावाचक का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने केवल कथा सुनाई नहीं, बल्कि उसे जीवंत कर दिया। उनके कथन में अध्यात्म की गहराई, भक्ति की सुवास, साहित्य की मधुरता और संस्कृति की जड़ों से निकली निष्कपट सरलता एक साथ दिखाई देती है। वे कथा को मनोरंजन या प्रवचन मात्र नहीं, बल्कि भाव-जागरण, सामाजिक सुधार और आत्म-चिंतन का माध्यम मानते थे। इसी दृष्टिकोण ने उन्हें अपने समय का अत्यंत प्रभावशाली कथावाचक बनाया।

राधेश्याम कथावाचक प्राचीन कथा परंपरा के समर्थक थे जिसमें रामायण, भागवत पुराण, शिवपुराण और देवी भागवत जैसी महान ग्रंथों का सरस वर्णन होता है। लेकिन उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे शास्त्रों की विद्वता को सरल भाषा में ढालकर आम जन तक पहुँचाने में सर्वथा सक्षम थे। सामान्य जन वेद-पुराणों के गूढ़ सिद्धांत आसानी से नहीं समझ पाते, परंतु राधेश्याम जी उन्हें रोज़मर्रा के उदाहरणों, जीवंत उपमाओं और सहज संवाद शैली में खोलकर प्रस्तुत करते थे। इसीलिए उनकी कथाओं में न केवल बुजुर्ग, बल्कि युवा वर्ग भी बड़ी संख्या में सम्मिलित होता था।

कथावाचन की कला में स्वर, भाव और पात्र-अभिनय अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। राधेश्याम कथावाचक इन तीनों तत्वों में निपुण थे। उनका स्वर इतना मधुर और भावपूर्ण था कि कथा की प्रत्येक घटना सुनने वालों के हृदय पर सीधी छाप छोड़ती थी। वे किसी प्रसंग को केवल पढ़ते नहीं थे, बल्कि उसे पूरी आत्मा से जीते थे। जब वे राम वनवास का दृश्य सुनाते, तो ऐसा लगता मानो अयोध्या का समूचा वातावरण श्रोता सभा में उतर आया है। जब वे कृष्ण की बाल लीलाएँ वर्णित करते, तो बच्चे तक मंत्रमुग्ध हो जाते। कथा के विभिन्न पात्रों—जैसे कौशल्या, जनक, सीता, हनुमान, पात्र, गोपियाँ—के संवाद वे अलग-अलग आवाज़ और भाव से प्रस्तुत करते, जिससे दर्शकों को ऐसा लगता मानो वे स्वयं उस दृश्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हों।

राधेश्याम कथावाचक की कथा का एक प्रमुख आकर्षण था उनका गहरी आध्यात्मिक अनुभूति से भरा हुआ दृष्टिकोण। वे केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करते थे, बल्कि उनके भीतर छिपे चिरंतन संदेश को उजागर करते थे। उदाहरण के लिए, रामायण के प्रसंगों में वे बताते कि राम का चरित्र एक आदर्श पुरुष के रूप में क्यों महत्वपूर्ण है, उनकी नीतियाँ आधुनिक जीवन में क्या संदेश देती हैं, और कैसे उनके आचरण से वर्तमान सामाजिक समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है। इसी प्रकार भागवत कथा में वे कृष्ण की लीलाओं में छिपे प्रेम, करुणा, समर्पण और धर्म-आधारित जीवन की शिक्षा पर विशेष बल देते थे। उनकी कथा में उपदेश नहीं, बल्कि अनुभूति होती थी; इसलिए लोग संदेश को सहज रूप से स्वीकार कर लेते थे।

कथावाचन में उनका एक महत्त्वपूर्ण योगदान यह भी था कि वे धार्मिक ग्रंथों को सामाजिक मूल्यों और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ते थे। उनका मानना था कि कथा का लक्ष्य केवल भक्ति जगाना नहीं, बल्कि समाज को सजग, नैतिक और संस्कारित बनाना भी है। इसलिए वे कथा के माध्यम से नशा-मुक्ति, शिक्षा, स्त्री-सम्मान, परिवार की एकता, युवा-सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों को भी सहजता से जोड़ देते थे। वे कहते थे कि धर्म वही है जो समाज को उन्नति की ओर ले जाए, और अध्यात्म वह है जो मनुष्य को विनम्र और संवेदनशील बनाए।

राधेश्याम जी की कथाओं की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहाँ भी उनका कार्यक्रम होता, वहाँ हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। ग्रामीण क्षेत्र हो या महानगर, मंदिर हो या मैदान—हर जगह उनकी कथा सुनने वालों का उत्साह एक जैसा रहता था। वे मंच पर आते ही अपनी मधुर वाणी और सौम्य व्यक्तित्व से ऐसा वातावरण बना देते थे कि लोग कथा समाप्त होने तक अपनी जगह से हिलना भी नहीं चाहते थे। उनकी कथा की विशेषता यह भी थी कि वे दर्शकों के साथ गहरा संवाद स्थापित करते थे। वे बीच-बीच में श्रोताओं से प्रश्न पूछते, उदाहरण साझा करते और उन्हें आत्म-मंथन के लिए प्रेरित करते।

उनके व्यक्तित्व का एक और अद्भुत पक्ष था उनकी सरलता और विनम्रता। लोकप्रियता के शिखर पर रहने के बावजूद वे स्वयं को एक साधारण कथाकार ही मानते थे। वे कहते थे कि “कथा मेरा नहीं, भगवान का काम है। मैं तो केवल माध्यम हूँ।” इस विनम्रता ने उन्हें और भी अधिक प्रिय बना दिया था। लोग उन्हें कथा-वाचक से अधिक एक सच्चे संत के रूप में देखते थे।

कथावाचन की परंपरा में राधेश्याम कथावाचक का स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने नई पीढ़ी के कथाकारों को प्रशिक्षित किया। वे अपने शिष्यों में कथा के शास्त्रीय स्वरूप के साथ-साथ उसकी सामाजिक और भावनात्मक संवेदना भरते थे। उनका जोर रहता था कि कथाकार केवल वक्ता न बने, बल्कि समाज के लिए एक पथ-प्रदर्शक हो। आज अनेक युवा कथाकार उनके मार्गदर्शन से प्रेरणा लेकर मंच पर सक्रिय हैं।

राधेश्याम कथावाचक की कथा का सबसे बड़ा आधार उनकी साधना और धार्मिक अनुशासन था। वे प्रतिदिन नियमित पूजा, ध्यान और शास्त्र अध्ययन करते थे। वे मानते थे कि कथाकार की वाणी तभी प्रभावशाली हो सकती है जब उसका जीवन भी उतना ही पवित्र और संयमित हो। उनके जीवन की यह अनुशासनप्रियता उनकी कथाओं में स्पष्ट दिखाई देती थी। यही कारण था कि वे कथा सुनाते समय केवल ज्ञान नहीं बाँटते थे, बल्कि अनुभव की गहराई भी साझा करते थे।

उनके जीवन की एक बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने कथा को आधुनिक तकनीक और मंचीय शैली के साथ भी जोड़ा। वे नई पीढ़ी की रुचियों को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुति शैली में छोटे-छोटे बदलाव लाते, लेकिन कथा की शास्त्रीयता से कभी समझौता नहीं करते थे। उनके प्रवचनों की वीडियो रिकॉर्डिंग, ऑनलाइन प्रसारण और डिजिटल संग्रह आज भी लाखों लोगों तक पहुँच रहे हैं।

राधेश्याम कथावाचक का जीवन इस बात का प्रमाण है कि कथा केवल कला नहीं, बल्कि एक साधना है। यह मनुष्य के भीतर छिपे दिव्य गुणों को जगाने का माध्यम है। उनकी कथाएँ सुनकर असंख्य लोगों के जीवन में परिवर्तन आया—किसी ने नशा छोड़ा, किसी ने परिवार को संभाला, किसी ने सेवा का मार्ग चुना और किसी ने धर्म का सही स्वरूप समझा। यही एक महान कथावाचक की पहचान है कि उसकी कथा मंच पर समाप्त नहीं होती, बल्कि लोगों के जीवन में उतरकर अपना प्रभाव छोड़ती है।

आज भी राधेश्याम कथावाचक की विद्वता, आत्मीयता और आध्यात्मिक गहराई कथाकारों के लिए आदर्श है। उन्होंने कथा-वाचन को एक नया आयाम दिया, उसे समाजोसुधारक शक्ति से जोड़कर उसे जीवंत बनाया। उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों तक प्रेरणा बनकर पहुँचेगा, क्योंकि उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि कथा केवल इतिहास का बयान नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण का मार्ग भी है।

इस प्रकार, राधेश्याम कथावाचक भारतीय कथा परंपरा के उन दुर्लभ रत्नों में से एक हैं जिन्होंने अपनी वाणी, सरलता, आध्यात्मिक शक्ति, सामाजिक चेतना और अनोखी प्रस्तुति शैली से कथा को नया जीवन दिया। उनका जीवन संदेश देता है कि जब वाणी साधना से जुड़ती है, तो वह केवल सुनने वालों को आनंद ही नहीं देती, बल्कि उन्हें आंतरिक रूप से बदल देती है। यही राधेश्याम कथावाचक की अमूल्य विरासत है, और यही उन्हें भारतीय अध्यात्म और कथा-साहित्य की दुनिया में अमर बनाती है।

पंडित राधेश्याम कथावाचक का जन्म 25 नवंबर, 1890 को उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में हुआ था। उनका जन्म बिहारीपुर मोहल्ले में हुआ था, उनके पिता का नाम पंडित बांकेलाल था।

उनके परिवार की आर्थिक स्थिति प्रारंभ में बहुत साधारण थी। उनके कच्चे घर में गरीबी थी, और बचपन में उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। हालांकि, उनके पिता को नाटकों, भजन-गायकियों की परंपरा की समझ थी, और इसी के चलते राधेश्याम को संगीत, गायन और नाटक की दुनिया में शुरुआती रूचि मिली।

बचपन से ही नाटकीय और लोक गायन-शैली के वातावरण में पले-बढ़े थे। बरेली में नाटक कम्पनियाँ (पारसी थिएटर कंपनियाँ) उनके इलाके के “चित्रकूट महल” नामक स्थान में रिहर्सल के लिए रुकती थीं, और राधेश्याम वहाँ के संगीत-रागों और गायन से काफी प्रभावित हुए।हारमोनियम बजाना और गायन उन्होंने अपने पिता और नाटक कंपनियों के कलाकारों से सीखा था।उनकी रामकथा (राधेश्याम रामायण) खास शैली में लिखी गई — लोक-नाट्य ढंग और “तर्ज़ राधेश्याम” नामक छंद में।उनकी लेखन शैली और संगीत समझ उनकी आत्म-अध्ययन, संगीत-अनुभव और लोक परंपरा के गहरे जुड़ाव से आई थी — वे मात्र कथावाचक नहीं, बल्कि नाटककार, पद्यकार और संगीतकार भी थे।


पंडित राधेश्याम कथावाचक का निधन 73 साल की आयु में 26 अगस्त, 1963 को हुआ था।राधेश्याम कथावाचक ने रामायण को खड़ी बोली में 25 खंडों में पद्य के रूप में लिखा, जिसे आज “राधेश्याम रामायण” के नाम से जाना जाता है और ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय हुआ।उनके लेखन, कथावाचन और नाट्यकला में पारसी रंगमंच शैली का बहुत बड़ा असर था। उन्होंने अपने जीवन में करीब 57 पुस्तकें लिखीं और अनेक पुस्तकों का संपादन किया। कथावाचन और मंचीय काम में उनका लगभग 45 वर्षों का सक्रिय योगदान रहा।

6 महाद्वीपों और 43 देशों के 43 कवियों ने की सहभागिता

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नारनौल। मनुमुक्त ‘मानव’ मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा भारतीय पुलिस सेवा के दिवंगत अधिकारी डॉ. मनुमुक्त ‘मानव’ की 43वीं जयंती पर विशाल वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय कवि-सम्मेलन ’43वीं जयंती : 43 देश, 43 कवि’ का आयोजन गत शाम किया गया, जिसमें छह महाद्वीपों और तेतालीस देशों के तेतालीस कवियों ने सहभागिता की। सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) के कुलपति तथा भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी डॉ. अशोककुमार गर्ग की अध्यक्षता में आयोजित इस कवि-सम्मेलन में भाषा आयोग, काठमांडू (नेपाल) के अध्यक्ष डॉ. गोपाल ठाकुर मुख्य अतिथि थे, वहीं विश्व बैंक, वाशिंगटन डीसी (अमेरिका) की वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ. एस. अनुकृति स्वागताध्यक्ष के रूप में उपस्थित रहीं। उद्योग विस्तार अधिकारी डॉ. सुनील भारद्वाज द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना-गीत के उपरांत ट्रस्टी डॉ. कांता भारती के प्रेरक सान्निध्य और डॉ. पंकज गौड़ के कुशल संचालन में सम्पन्न हुए इस कवि-सम्मेलन के प्रारंभ में चीफ ट्रस्टी डॉ. रामनिवास ‘मानव’ ने ट्रस्ट की गतिविधियों और उपलब्धियों का विवरण प्रस्तुत किया तथा दोहों के माध्यम से अपने दिवंगत पुत्र मनुमुक्त को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उनका एक दोहा था- पुत्र-शोक के बाद भी, करता हूँ उपभोग। मुझसे थे दशरथ भले, सह ना सके वियोग।। मुख्य अतिथि डॉ. गोपाल ठाकुर ने अपने संबोधन में मनुमुक्त-परिवार द्वारा अपने व्यक्तिगत दुख को वैश्विक सौहार्द और संपर्क का सेतु बनाने के प्रयास को अत्यंत सराहनीय और प्रेरणादायी बताया, वहीं डॉ. मनोजकुमार गर्ग ने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. मनुमुक्त के असामयिक निधन को देश और समाज के लिए अपूरणीय क्षति बताते हुए कहा कि एक प्रतिभाशाली और ऊर्जावान पुलिस अधिकारी का अल्पायु में निधन किसी हृदय-विदारक त्रासदी से कम नहीं है।

*इन कवियों ने की सहभागिता :* इस अवसर पर दिवंगत मनुमुक्त को श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए टोक्यो (जापान) की डॉ. रमा पूर्णिमा शर्मा, सूवा (फीजी) की सुएता दत्त चौधरी, सिडनी (आस्ट्रेलिया) के प्रगीत कुँअर, ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) के रोहितकुमार ‘हैप्पी’, होचिमिन्स सिटी (वियतनाम) की साधना सक्सेना, बैंकाॅक (थाईलैंड) की शिखा रस्तोगी, मेडान (इंडोनेशिया) के आशीष शर्मा, सिंगापुर सिटी (सिंगापुर) की आराधना सक्सेना, तियान्जिन (चीन) के हरप्रीतसिंह पुरी, काठमांडू (नेपाल) के डॉ. पुष्करराज भट्ट, थिंपू (भूटान) की अर्चना  ठाकुर, लाडनूँ (भारत) के डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’, कोलंबो (श्रीलंका) की डॉ. अंजलि मिश्रा, मस्कट (ओमान) की सिम्मी कुमारी, दुबई सिटी (दुबई) की अनु बाफना, शारजाह सिटी (शारजाह) की अंजू मेहता, आबूधाबी सिटी (आबूधाबी) के अंकुर रांका, दोहा (कतर) के डॉ. बैजनाथ शर्मा, कुवैत सिटी (कुवैत) की नाज़नीन अली ‘नाज़’, बेल रोज (माॅरिशस) की डॉ. सुरीति रघुनंदन, दार-ए-सलाम (तंजानिया) के अजय गोयल, लागोस (नाईजीरिया) की राखी बिलंदानी, अकरा (घाना) की मीनाक्षी सौरभ, जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) की झरना दीक्षित, मास्को (रूस) की श्वेतासिंह ‘उमा’, अंकारा (तुर्किये) के ऐमराह करकोच, सोफिया (बुल्गारिया) की डॉ. मोना कौशिक, स्टाॅकहोम (स्वीडन) के सुरेश पांडे, कोपनहेगन (डेनमार्क) की सविता जाखड़, बर्लिन (जर्मनी) की डॉ. योजना शाह जैन, आसन (नीदरलैंड) की डॉ. ऋतु शर्मा, ब्रुसेल्स (बैल्जियम) के कपिल कुमार, लक्जमबर्ग सिटी (लक्जमबर्ग) के मनीष पांडेय, वियना (आस्ट्रिया) की अमिता लुग्गर, मिलान (इटली) की उर्मिला चक्रवर्ती, मैड्रिड (स्पेन) की पूजा अनिल, लिस्बन (पुर्तगाल) के डॉ. शिवकुमार सिंह, लंदन (ब्रिटेन) के आशीष मिश्रा, बेलफास्ट (आयरलैंड) के डॉ. अभिषेक त्रिपाठी, टोरंटो (कनाडा) की डाॅ. शैलजा सक्सेना, वर्जीनिया (अमेरिका) की मंजू श्रीवास्तव, पोर्ट आॅफ स्पेन (ट्रिनिडाड) की आशा मोर और लैडिंग (सूरीनाम) की सुषमा खेदू के अतिरिक्त सिडनी (आस्ट्रेलिया) की डॉ. भावना कुँअर और भारत से अलवर के संजय पाठक तथा नारनौल के डॉ. जितेंद्र भारद्वाज, डॉ. पंकज गौड़ और डॉ. सुनील भारद्वाज ने उनकी स्मृति में मर्मस्पर्शी काव्य-पाठ किया, जिसे भरपूर सराहना मिली। 

*इनकी रही उल्लेखनीय उपस्थिति :* ‌लगभग तीन घंटों तक चले इस यादगारी कवि-सम्मेलन में वाशिंगटन डीसी (अमेरिका) के प्रो. सिद्धार्थ रामलिंगम, आॅकलैंड (न्यूजीलैंड) के बाबूलाल शर्मा, कोपनहेगन (डेनमार्क) के गजेंद्रसिंह जाखड़ तथा भारत से  प्रो. विजयकुमार मिर्चे, सुरेंद्र कागद, रवि श्रीवास्तव, मुहम्मद आरिफ गौरी, महीपाल सिंह, डॉ. भीमसिंह सुथार, सुरेशचंद्र शर्मा, रंजीता‌ वर्मा, डॉ. शर्मिला यादव, रिधु कँवर आदि साहित्य-प्रेमियों की गरिमापूर्ण उपस्थित उल्लेखनीय रही।

 डॉo सत्यवान सौरभ, 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,दिल्ली यूनिवर्सिटी,कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

कथक सम्राज्ञी सितारा देवी

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भारतीय शास्त्रीय नृत्य के इतिहास में यदि किसी नाम ने परंपरा, तकनीक, ऊर्जा और सौंदर्य का अनूठा संगम रचा, तो वह नाम है सितारा देवी। उन्हें नृत्य की दुनिया में “कथक सम्राज्ञी” कहा जाता है। उन्होंने न केवल कथक को नया आयाम दिया, बल्कि इस नृत्य को विश्व मंच पर सम्मान भी दिलाया। उनके नृत्य में बनारस की शास्त्रीयता, लोक लय की मस्ती और व्यक्तिगत प्रतिभा की चमक हमेशा साथ रहती थी।

सितारा देवी का जन्म 8 नवम्बर 1920 को कोलकाता में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से बनारस का था और पीढ़ियों से संगीत एवं नृत्य की साधना में रचा-बसा हुआ था। उनके पिता पंडित सुखदेव महाराज स्वयं प्रसिद्ध कथक गुरु थे और संत कबीर के पदों तथा रामलीला के विश्लेषण में भी विशेष रुचि रखते थे। पारिवारिक वातावरण में संगीत और नृत्य स्वाभाविक रूप से बहता था, इसलिए छोटी उम्र से ही सितारा देवी की नृत्य प्रतिभा निखरने लगी।

जब वे महज दस साल की थीं, तभी मंच पर उनका पहला सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ। इस प्रस्तुति ने दर्शकों के साथ-साथ आलोचकों को भी चकित कर दिया। उनकी गति, भाव-प्रदर्शन, ताल की समझ और अभिव्यक्तियों ने सभी को प्रभावित किया। यह वह दौर था, जब समाज का बड़ा हिस्सा नृत्य को प्रतिष्ठित कला के रूप में स्वीकार नहीं करता था, परंतु सितारा देवी ने अपने आत्मविश्वास और दृढ़ निश्चय से इस सोच को बदलने की पहल की।

कथक नृत्य में तीन प्रमुख घराने—जयपुर, लखनऊ और बनारस—विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। सितारा देवी ने अपने पिता और परिवार के अन्य गुरुओं से विशेष रूप से बनारस घराने की शैली में प्रशिक्षण प्राप्त किया। बनारस घराना अपनी ऊर्जा, ठुमरी-आधारित अभिव्यक्तियों और मंच-प्रस्तुति की भव्यता के लिए जाना जाता है। सितारा देवी ने इस शैली को और अधिक समृद्ध करते हुए उसमें ऐसा आकर्षण जोड़ा कि उनकी शैली की नकल करने वाले अनेक शिष्य आगे चलकर स्वयं गुरु बने।

सितारा देवी का नृत्य केवल तकनीक तक सीमित नहीं था। उनमें अद्भुत अभिनय-शक्ति थी। कृष्ण-लीला, रामायण के प्रसंग, नायिका-भेद और ठुमरी की भावप्रवणता—इन सब में वे बेजोड़ थीं। कहते हैं कि जब वे किसी ठुमरी पर नृत्य करती थीं, तो दर्शकों को ऐसा लगता था मानो गीत की प्रत्येक पंक्ति जीवंत हो उठी हो। उनके पांवों की कठोरता और हाथों की लचीली मुद्राओं का संगम एक ऐसी लय पैदा करता था, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था।

उनका व्यक्तित्व अत्यंत स्वतंत्र और दृढ़ था। उन्होंने कथक को नारी शक्ति और आत्मसम्मान से जोड़ते हुए इसे सम्मानजनक मंच दिया। वे कहती थीं कि नृत्य साधना है, आत्मिक ऊर्जा का प्रकट रूप है, और यह किसी भी प्रकार के बंधन को स्वीकार नहीं करता। इस दृष्टि से वे आधुनिक भारतीय नृत्य की अग्रणी हस्ती थीं।

भारतीय सिनेमा से भी उनका गहरा जुड़ाव था। 1930 और 40 के दशक में उन्होंने कई फिल्मों में नृत्य निर्देशन किया और स्वयं भी मंच-नृत्य प्रस्तुतियों के माध्यम से फिल्मों के कलाकारों को प्रेरणा दी। राज कपूर से लेकर महादेवी वर्मा जैसे साहित्यकार भी उनके प्रशंसकों में शामिल थे। मशहूर निर्देशक मेहबूब खान ने उन्हें “भारतीय नृत्य की जीवित देवी” कहा था।

सितारा देवी के योगदान को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1969 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और भारत सरकार सहित अनेक सांस्कृतिक संस्थाओं ने सम्मानित किया। बाद में उन्हें पद्म भूषण देने का निर्णय हुआ, परंतु उन्होंने इसे यह कहकर स्वीकार नहीं किया कि उनका योगदान इससे कहीं अधिक है और वे उच्चतम सम्मान की अधिकारी हैं। यह घटना उनके स्वाभिमान और उनके कला-गौरव का परिचायक है।

उनकी नृत्य यात्रा सात दशकों से भी अधिक चली। वे वृद्धावस्था तक नृत्य सिखाती रहीं। मुंबई में उनका निवास कलाकारों और शिष्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत था। उन्होंने हजारों विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया और कथक को नई पीढ़ियों तक पहुँचाया। 25 नवंबर 2014 को वे इस दुनिया से विदा हो गईं, लेकिन उनकी नृत्य-धारा अब भी जीवित है।

सितारा देवी की विरासत केवल नृत्य तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय कला संस्कृति की आत्मा में दर्ज हो चुकी है। उन्होंने कथक को एक नवीन पहचान दी, इसे समाज और वैश्विक मंच पर गौरव दिलाया और आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश दिया कि कला केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान, स्वतंत्रता और सौंदर्य की अनंत साधना है।

आज भी जब कथक की चर्चा होती है, तो सितारा देवी का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। वे न केवल एक महान नृत्यांगना थीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की एक अद्भुत प्रतिनिधि थीं। उनकी साधना, ऊर्जा और जीवन-दृष्टि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।

गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस पर, प्रधानमंत्री मोदी ने उनकेे बलिदान को श्रद्धांजलि अर्पित कीं

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श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस पर, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज उनके अद्वितीय साहस और सर्वोच्च बलिदान को श्रद्धांजलि अर्पित की।

श्री मोदी ने कहा कि आस्था और मानवता की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर जी की शहादत हमारे समाज को सदैव आलोकित करती रहेगी।

एक्स पर एक पोस्ट में प्रधानमंत्री ने कहा:

“श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस पर, हम उनके अद्वितीय साहस और बलिदान को नमन करते हैं। आस्था और मानवता की रक्षा के लिए उनकी शहादत हमारे समाज को सदैव आलोकित करती रहेगी।”

‘हमेशा ऑनलाइन’ रहने के मायाजाल  की दौड़ में थकते युवा

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 डिजिटल पहचान की अंधी प्रतिस्पर्धा ने मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और वास्तविक अनुभवों को संकट में डाल दिया है। 

सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव युवाओं के मानसिक संतुलन और जीवनशैली पर गहरा असर डाल रहा है। लाइक, व्यूज़ और फॉलोअर्स की प्रतिस्पर्धा ने उन्हें एक अदृश्य दबाव में धकेल दिया है, जहाँ डिजिटल मान्यता ही आत्मविश्वास का आधार बनती जा रही है। घंटों स्क्रोल करना, हर पल ऑनलाइन बने रहना और दूसरों से तुलना करना तनाव, अनिद्रा, चिंता और अकेलेपन को जन्म दे रहा है। वास्तविक रिश्ते, संवाद और अनुभव स्क्रीन के पीछे छूटते जा रहे हैं। समाधान डिजिटल अनुशासन, सीमित उपयोग, नोटिफिकेशन नियंत्रण और वास्तविक दुनिया को प्राथमिकता देने में है। संतुलन ही मानसिक शांति का आधार है।

-डॉ सत्यवान सौरभ

आज का भारतीय समाज एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रहा है जहाँ तकनीक अवसर भी दे रही है और संकट भी खड़ा कर रही है। सोशल मीडिया का तेजी से बढ़ता दायरा इस संक्रमणकाल का सबसे बड़ा प्रतीक है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स और अन्य प्लेटफॉर्म ने आम लोगों को वह मंच दिया है, जिसकी कल्पना कुछ दशक पहले संभव नहीं थी। लेकिन यह सशक्तिकरण जितनी उम्मीदें लेकर आया था, उतने ही उलझाव उसने मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्तर पर पैदा कर दिए हैं। युवा पीढ़ी लाइक, व्यूज़, फॉलोअर्स और डिजिटल सेलिब्रिटी बनने की सतही चाह में उलझकर मानसिक थकान और सामाजिक दूरी के ऐसे भंवर में फंसती जा रही है जो दिखाई तो नहीं देता, पर भीतर तक कमजोर कर रहा है। भारत में सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की संख्या 50 करोड़ पार कर चुकी है—यह दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल समुदायों में से एक है। यह संख्या जितनी विशाल है, उससे कहीं अधिक विशाल है वह दबाव, जो इसने युवाओं के मन पर डाला है। सुबह उठते ही फोन उठाकर रात को आंख बंद होने तक स्क्रीन पर स्क्रोल करते रहने की आदत आज सामान्य लगती है, लेकिन यह सामान्यता ही सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। लाइक-व्यूज़ के माध्यम से मान्यता पाने की चाह युवाओं को धीरे-धीरे वास्तविक जीवन से काट रही है।

सोशल मीडिया का सबसे आकर्षक और सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह एक समानांतर दुनिया रचता है—एक ऐसी दुनिया जहाँ आप अपनी इच्छानुसार छवि गढ़ सकते हैं, अपनी वास्तविकता से अलग व्यक्तित्व प्रदर्शित कर सकते हैं और अपनी जिंदगी को चमकदार फ्रेम्स में पिरो सकते हैं। लेकिन इस दुनिया में स्वीकृति की कीमत बहुत भारी है। कुछ सेकंड का ध्यान पाने के लिए लगातार नए पोस्ट, नई तस्वीरें, नए रील्स और नई अभिव्यक्तियाँ देनी पड़ती हैं। युवाओं में यह दबाव बढ़ रहा है कि यदि उनकी पोस्ट को पर्याप्त लाइक या व्यूज़ नहीं मिले, तो वे किसी अदृश्य प्रतियोगिता में पिछड़ गए हैं। यह डिजिटल पहचान की एक ऐसी प्रतिस्पर्धा है जिसमें न कोई स्पष्ट लक्ष्य है, न कोई अंत, और न ही कोई वास्तविक विजेता। हर युवा अपनी ही छवि की तुलना दूसरों से करता है। किसी और की मुस्कुराहट, जीवनशैली, शरीर, छुट्टियाँ, करियर, रिश्ते—सब कुछ तुलना का आधार बन जाता है। यह तुलना आत्म-सम्मान को चोट पहुंचाती है और धीरे-धीरे युवा महसूस करने लगते हैं कि वास्तविक जीवन में जितना वे पाते हैं, वह पर्याप्त नहीं है।

कई सर्वे बताते हैं कि 18–34 आयु वर्ग के 59% युवा स्वीकार करते हैं कि सोशल मीडिया उनके मानसिक संतुलन को प्रभावित कर रहा है। इनमें चिंता, तनाव, अनिद्रा, ओवरथिंकिंग, अत्यधिक उत्तेजना और आत्म-संदेह जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। युवाओं के दिमाग में हर समय दो सवाल घूमते रहते हैं—इस पोस्ट पर कितने लाइक आए? लोग मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे? इन सवालों का बोझ इतना बढ़ चुका है कि वास्तविक उपलब्धियाँ भी कई बार डिजिटल प्रतिक्रिया के बिना युवा को अधूरी लगती हैं। आत्मविश्वास की नींव खुद के मूल्य पर नहीं, बल्कि दूसरों की डिजिटल स्वीकृति पर टिकने लगती है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने वाले युवाओं में अवसाद और अकेलेपन की समस्या तेजी से बढ़ी है। बाहर से वे “कनेक्टेड” दिखते हैं, लेकिन भीतर वे अत्यधिक अलगाव महसूस करते हैं। वास्तविक बातचीत में कमी आने से भावनात्मक अभिव्यक्ति भी कमजोर हो गई है। आज कई परिवारों में यह आम दृश्य है कि भोजन की मेज पर बैठे सभी लोग मोबाइल स्क्रीन में झुके हैं। माता-पिता कभी समझ नहीं पाते कि बच्चे किस पोस्ट को बनाने में इतना वक्त लगा रहे हैं, या क्यों एक तस्वीर को कई बार परफेक्ट एंगल से लेना आवश्यक है। युवा पीढ़ी की भावनाएँ, संवाद शैली और प्राथमिकताएँ तेजी से डिजिटल स्वरूप में बदल रही हैं, जबकि बुजुर्ग अभी भी वास्तविक संवाद और संबंधों को महत्व देते हैं। इस पीढ़ीगत अंतर ने परिवारों को भावनात्मक रूप से दूर कर दिया है।

दोस्तों के साथ घूमने जाना अब एक अनुभव नहीं, बल्कि कंटेंट बनाने का अवसर बन गया है। हर जगह “पोस्ट करने लायक” तस्वीर ढूंढना मानो एक अनिवार्य कार्य बन गया है। रिश्ते धीरे-धीरे वास्तविकता से हटकर प्रदर्शन के माध्यम बन रहे हैं। कई युवा स्वीकार करते हैं कि वे सोशल मीडिया पर दिखने वाले “परफेक्ट रिश्तों” से प्रभावित होकर अपने संबंधों को लेकर अनावश्यक उम्मीदें पाल लेते हैं, जो बाद में निराशा का कारण बनती हैं।

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी समस्या है—हमेशा उपलब्ध रहने का दबाव। नोटिफिकेशन की लगातार झंकार, मैसेज का तुरंत जवाब देने की आदत, किसी नए ट्रेंड में पीछे न छूटने का डर, और हर समय अपडेटेड दिखने की चाह युवाओं की मानसिक ऊर्जा को धीरे-धीरे खत्म कर रही है। डिजिटल थकान आज एक वास्तविक समस्या बन चुकी है। कई युवा रात को देर तक नींद नहीं ले पाते क्योंकि उन्हें लगता है कि वे कुछ मिस कर देंगे। दिन में उनकी एकाग्रता भंग रहती है क्योंकि दिमाग हर समय स्क्रीन की ओर खिंचता रहता है। यह चक्र अंतहीन है और जितना समय बढ़ता है, उतनी थकान गहराती जाती है।

प्लेटफॉर्म्स का उद्देश्य सरल है—उपयोगकर्ता को जितना अधिक समय स्क्रीन पर रोके रखा जाए, उतना अधिक लाभ। एल्गोरिद्म इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि उपयोगकर्ता स्क्रोल करना बंद ही न करे। वीडियो एक के बाद एक चलते रहते हैं, नोटिफिकेशन लगातार आकर्षित करते रहते हैं और कंटेंट का चयन इस प्रकार किया जाता है कि उपयोगकर्ता को लगे—“बस थोड़ा और।” इस रणनीति का सबसे अधिक प्रभाव युवा दिमागों पर पड़ता है, जो अभी भावनात्मक और बौद्धिक रूप से परिपक्व हो रहे होते हैं। उन्हें यह समझ नहीं आता कि सोशल मीडिया की यह दुनिया उनके समय, ऊर्जा और आत्मसम्मान को लगातार प्रभावित कर रही है।

समस्या जितनी बड़ी है, उसका समाधान भी उतना ही व्यवहारिक है—डिजिटल अनुशासन। युवाओं को प्रतिदिन एक निश्चित समय तय करना चाहिए—इससे आदतें नियंत्रित होंगी और थकान कम होगी। अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करने से मन पर होने वाला दबाव कम होता है। खुद को दूसरों के बनाए ‘हाइलाइट रील’ से तुलना करना बंद करना जरूरी है। परिवार, दोस्तों, किताबों, प्रकृति, खेल और रचनात्मक गतिविधियों पर ध्यान देना सकारात्मक ऊर्जा देता है। स्कूलों-कॉलेजों में डिजिटल व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य पर पाठ्यक्रम जोड़ना समय की मांग है। अभिभावकों को भी बच्चों में मोबाइल उपयोग की आदतों पर संयमित और संवेदनशील निगरानी रखनी चाहिए।

युवाओं को यह समझने की आवश्यकता है कि उनकी वास्तविक प्रतिभा, भावनाएँ, रचनात्मकता और मेहनत किसी स्क्रीन पर आए आंकड़ों से अधिक मूल्यवान हैं। जीवन का अर्थ डिजिटल तालियों से नहीं, बल्कि वास्तविक अनुभवों, रिश्तों और आत्मविकास से बनता है। सोशल मीडिया ने दुनिया को छोटा जरूर बनाया है, लेकिन इसका उपयोग यदि संयमित न हो तो यह हमारे ही जीवन का दायरा छोटा कर देता है। समय आ गया है कि युवा इस मायाजाल से जागें, स्क्रीन से थोड़ी दूरी बनाएं और अपनी वास्तविक पहचान की ओर लौटें। क्योंकि लाइक-व्यूज़ की यह दौड़ अंतहीन है—और इसमें थकना निश्चित है। लेकिन जीवन की दौड़ के रास्ते अनंत हैं, अर्थपूर्ण हैं और सच्चे हैं।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

वैश्विक दूध उत्पादन में 25 प्रतिशत योगदान के साथ पहले नंबर पर भारत

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बाल मुकुन्द ओझा

राष्ट्रीय दुग्ध दिवस हर साल 26 नवम्बर को मनाया जाता है। यह दिवस भारत में श्वेत क्रांति के जनक डॉ. वर्गीज कुरियन की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। यह भारत की अर्थव्यवस्था और पोषण सुरक्षा में डेयरी क्षेत्र के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डालता है। राष्ट्रीय दुग्ध दिवस केवल दूध का उत्सव नहीं है अपितु यह उन लोगों और प्रक्रियाओं के लिए एक श्रद्धांजलि है जो इस आवश्यक भोजन को हमारी मेज तक लाते हैं। यह स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिरता और सांस्कृतिक परंपराओं को बढ़ावा देने में दूध की भूमिका को रेखांकित करता है। यह डेयरी किसानों की कड़ी मेहनत की सराहना करने और स्थायी उपभोग प्रथाओं के लिए प्रतिबद्ध होने का अवसर है। एक अधिकृत रिपोर्ट के अनुसार दूध के उत्पादन एवं उत्पादकता में स्वतंत्रता के बाद से सर्वाधिक वृद्धि हुई है। भारत दूध उत्पादन में दुनिया में अग्रणी बना हुआ है। भारत का दूध उत्पादन दुनिया की कुल सप्लाई का लगभग एक-चौथाई हिस्सा है। पिछले एक दशक में भारत के दूध उत्पादन में रिकॉर्ड ग्रोथ दर्ज की गई है। 2014-15 में उत्पादन 146.30 मिलियन टन था, जो 2023-24 में 239.30 मिलियन टन तक पहुँच गया। यह 63.56 प्रतिशत  की वृद्धि है, यानी लगभग 5.7 प्रतिशत की औसत वार्षिक वृद्धि दर। यह ग्रोथ दर बताती है कि भारत ने लगातार डेयरी क्षेत्र को मजबूत बनाने पर काम किया है। भारत न केवल दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, बल्कि यहां की बड़ी आबादी की पोषण ज़रूरतें भी काफी हद तक दूध और उससे बने उत्पादों पर निर्भर करती हैं।

दूध हर उम्र के लोगों के लिए अमृत समान है। दूध स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक और संपूर्ण आहार है। गर्म दूध के सेवन से कई फायदे मिलेंगे। दूध को गर्म करने से इसमें मौजूद पौष्टिक तत्व कई गुना बढ़ जाते हैं। आयुर्वेद में गर्म दूध के अनेक फायदे बताये गए है। विशेषकर सर्द मौसम में गर्म दूध का सेवन करना सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है। एक स्टडी के मुताबिक हर रोज एक गिलास गर्म दूध पीने से स्वास्थ्य बेहतर रहता है। दूध में लौंग अथवा हल्दी को मिलाकर पीने से कई लाभ हो सकते हैं। एक स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक दूध और लौंग कई सारे पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। दूध फॉस्फोरस, मैग्नशियिम, आयोडीन, वटिामनि ए, डी, के से भरपूर होते हैं तो वहीं लौंग में कॉर्बोहाइड्रेट, आयरन, सोडयिम की अच्छी मात्रा मौजूद होती है। आयुर्वेद के अनुसार हल्दी मिला दूध अपने एंटी बैक्टीरियल और एंटीसेप्टिक गुणों के कारण बैक्टीरिया को पनपने नहीं देता। साथ ही शरीर के दर्द में आराम देता है। हाथ पैर व शरीर के अन्य भागों में दर्द की शिकायत होने पर रात को सोने से पहले हल्दी वाले दूध का सेवन करें। अच्छी नींद, वजन कम, सर्दी-खांसी दूर ,ब्लड सर्कुलेशन आदि का कार्य भी करता है। लौंग वाले दूध के लिए बताया जाता है यह गले के लिए फायदेमंद, शरीर में एनर्जी, कब्ज की समस्या से राहत, मुंह की बदबू दूर करने में सहायक और दांतों के दर्द से राहत का काम करेगा।

इंटरनेशनल डेयरी जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक जो लोग रोजाना कम से कम एक ग्लास दूध पीते हैं वे हमेशा मानसिक और बौद्धिक तौर पर बेहतर स्थिति में होते हैं। शाकाहारी हो या मांसाहारी, बच्चा हो या बुर्जुग सभी वर्ग के लोग दूध सेवन कर सकते हैं। ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के अनुसार गाय का दूध और उससे बनी चीजें, जैसे पनीर, दही, मक्खन बड़ी मात्रा में कैल्शियम और प्रोटीन प्रदान करते हैं, जो संतुलित आहार के लिए जरूरी हैं। कैल्शियम और प्रोटीन के अलावा दूध में कई तरह के विटामिन पाए जाते हैं। यह विटामिन ए और डी का बेहतर स्रोत है। आयुर्वेद के अनुसार गाय का दूध सबसे अधिक पौष्टिक होता है। दूध आपकी भूख को शांत कर आपको मोटापे से भी छुटकारा दिलाने में बहुत सहायक होता है। दूध अपने आप में एक सम्पूर्ण आहार है। इससे हड्डियां मजबूत होती हैं और दिमाग तेज होता है इसीलिए घर के बड़े बुजुर्ग से लेकर डॉक्टर्स तक रोजाना दूध पीने की सलाह देते हैं

भारत का विश्व दुग्ध उत्पादन में 18 प्रतिशत हिस्सा है। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में कृषि के बाद डेयरी उद्योग की प्रमुख भूमिका है।  आजादी के बाद से दूध उत्पादन में यह सबसे अधिक वृद्धि है। भारत में प्रत्येक वर्ष दूध उत्पादन 5.9 प्रतिशत से ज्यादा की दर से बढ़ रहा है, जबकि दुनिया में दूध की औसत वृद्धि दर मात्र दो प्रतिशत प्रतिवर्ष है। भारत के दूध की विदेशों में भी मांग बढ़ने लगी है। लगभग डेढ़ सौ देशों में भारत के डेयरी प्रोडक्ट की मांग है। पिछले वर्ष 65 लाख टन डेयरी प्रोडक्ट का निर्यात हुआ है। देश की अर्थव्यवस्था में डेयरी सेक्टर का पांच प्रतिशत का योगदान है। लगभग आठ करोड़ लोगों के रोजगार का साधन भी है। सरकार दूध की बढ़ती मांग को पूरा करने और डेयरी को अधिक लाभकारी बनाने के लिए प्रयासरत है। नई योजना से देसी नस्लों के पशुओं की संख्या और दूध की उपलब्धता में वृद्धि हो रही है।

      बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

              

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 25 नवंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ


ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार 25 नवंबर वर्ष का 329 वाँ (लीप वर्ष में यह 330 वाँ) दिन है। साल में अभी और 36 दिन शेष हैं।

25 नवंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

  • 1667- रूस के उत्तरी कॉकसस क्षेत्र के सेमाखा में आये विनाशकारी भूकंप में 80 हजार लोग मारे गये।
  • 1744 – आस्ट्रिया की सेना ने पराग्वे के यहूदियों के खिलाफ जान लेवा हमले किये और लूटपाट की।
  • 1758 – ब्रिटेन ने फ्रांस के ड्यूक्वीसन किले पर क़ब्ज़ा किया।
  • 1866 – इलाहाबाद उच्च न्यायालय का उद्घाटन।
  • 1867- अल्फ्रेड नोबल ने डायनामाइट का पेटेंट कराया।
  • 1930 – जापान में एक ही दिन में भूकंप के 690 झटके रिकार्ड किये गये।
  • 1936 – जर्मनी और जापान के बीच कोमिंटन (कम्युनिस्ट इंटरनेशनल) विरोधी समझौते पर हस्ताक्षर।
  • 1937- फ्रांस की राजधानी पेरिस में विश्व मेले का समापन।
  • 1948 – भारत में राष्ट्रीय कैडेट कोर की स्थापना हुई।
  • 1949 – स्वतंत्र भारत के संविधान पर संवैधानिक समिति के अध्यक्ष ने हस्ताक्षर किये तथा इसे तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया।
  • 1951 – अमेरिकी प्रान्त अल्बामा में ट्रेन दुघर्टना में 17 लोगों की मौत।
  • 1952 – जार्ज मेनाय आस्ट्रेलियन फुटबाल लीग के अध्यक्ष चुने गये।
  • 1960 – टेलीफ़ोन की एसटीडी व्यवस्था का भारत में पहली बार कानपुर और लखनऊ के बीच प्रयोग किया गया।
  • 1974 – संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव ऊ थांट का बर्मा में निधन।
  • 1998 – पाकिस्तान ने अंधेरे में भी प्रहार कर सकने में सक्षम ‘भक्तर शिकन’ नामक नव विकसित टैंक-भेदी प्रक्षेपास्त्र का सफल परीक्षण किया।
  • 2001 – ‘अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद’ (आई.सी.सी.) ने भारत को निलंबन की धमकी दी, बेनजीर भुट्टो नई दिल्ली में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिलीं।
  • 2002 – लुसियो गुटेरेज इक्वाडोर के राष्ट्रपति निर्वाचित।
  • 2004 – पाक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ के कश्मीर फ़ार्मूले को पाक-कश्मीर समिति ने खारिज किया।
  • 2006 – कोलंबो द्वारा भारतीय पंचायती मॉडल का अध्ययन प्रारम्भ।
  • 2007 – पाकिस्तान में आम चुनाव के लिए पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने लरकाना से अपना पर्चा दाखिल किया।
  • 2008- योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूबालिया ने वैश्विक मंदी के बावजूद भारत का विकास 9% रहने की सम्भावना व्यक्त की। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित व मालेगाँव के अन्य आरोपियों द्वारा एटीएस पर लगाये गये शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना के आरोपों के मद्देनज़र माकोका अदालत ने महाराष्ट्र सरकार से जबाव मांगा। बस्तर ज़िले में नक्सलों के ज़िला पुलिस जवानो को निशाना बनाकर किये गये बारूदी सुरंग हमले में 7 जवान शहीद हुए।
  • 2012 – नाइजीरिया में एक चर्च के पास दो कार बम धमाकों में 11 की मौत, 30 घायल।
  • 2013 – इराक की राजधानी बगदाद के कैफे में धमाके में 17 मरे, 37 घायल।

25 नवंबर को जन्मे व्यक्ति

25 नवंबर को हुए निधन

फिल्म और टेलीविजन अभिनेता वीरेन्द्र सक्सेना

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वीरेन्द्र सक्सेना का जन्म 25 नवंबर 1960 में उत्तर प्रदेश मथुरा, में हुआ। वे भारतीय थिएटर, फिल्म और टेलीविजन अभिनेता हैं। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व छात्र भी हैं। सक्सेना को उनके चरित्र अभिनय और अद्वितीय आवाज के लिए जाना जाता है। उन्होंने अपने फिल्मी करियर में 100 से ज्यादा फिल्में कीं। फिल्मी जगत से लेकर टीवी की दुनिया तक वीरेंद्र सक्सेना ने फैंस के दिलों में अपनी एक जगह बनाई. सिनेमा की दुनिया में उन्होंने अपने हुनर के बल पर अपनी एक पहचान बनाई।

कम उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया था, जिसके बाद से ही उन्होंने कमाना शुरू कर दिया था। सबसे पहले उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढाए, लेकिन बाद में वो दिल्ली आ गए और वहां राजा महेंद्र प्रताप के सेक्रेटरी, बने। जहां पर उन्हें चिट्ठी लिखनी पड़ती थी, लेकिन इसी बीच उनको एक छोटा रोल हासिल हो गया और फिर उनका मन फिल्मी दुनिया में लग गया हालांकि, स्ट्रगल के दौरान एक्टर ने पेंटिंग का भी काम किया।

वे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिल हुए और थिएटर शुरू कर दिया। कुछ वक्त के बाद वे मुंबई आ गए और उन्होंने टीवी सीरियल में काम किया, फिर उनकी लोगों के बीच पहचान बननी शुरू हुई।

उन्होंने 1975 में “उलझन” से फ़िल्मी करियर की शुरुआत की । लेकिन उन्हें पहली पहचान 1985 की फ़िल्म ” मैसी साहब ” से मिली । उन्होंने आशिकी (1990), धारावी (1992), दिलवाले (1994), कभी हां कभी ना (1994), स्प्लिट वाइड ओपन (1999), साथिया (2002), समय: व्हेन टाइम स्ट्राइक्स (2003), बंटी और बबली (2005), सरकार (2005), एक चालीस की लास्ट लोकल (2007),जैसी भारतीय फिल्मों में अभिनय किया है। वेडनसडे (2008), द स्टोनमैन मर्डर्स (2009) और नाम शबाना (2017), रब्बी (2017), सोनू के टीटू की स्वीटी (2018) और सुपर 30 (2019) और कुछ अंग्रेजी भाषा की फिल्में जैसे व्हाइट रेनबो , कॉटन मैरी और इन कस्टडी की हैं। उनके द्वारा अभिनीत प्रमुख टीवी धारावाहिकों में अजनबी और जस्सी जैसी कोई नहीं शामिल हैं ।

उन्होंने टेलीविजन तारिका समता से विवाह किया और अब दोनों मुम्बई में रहते हैं।

सक्सेना ने विभिन्न प्रमुख अभिनेताओं जैसे शाहरुख खान, आमिर खान, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, जॉन अब्राहम, ओम पुरी और अन्यों के साथ काम किया है और अपनी एक्टिंग को लेकर उन्होंने दर्शकों से काफी तारीफें बटोरी हैं।

रजनीकांत शुक्ला

राम मंदिर निर्माणा पूरा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी धर्मध्वजा चढ़ाएंगे

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500 वर्षों के संघर्ष और 7 वर्षों के निर्माण के बाद भगवान राम की अयोध्या में उनका मंदिर आज पूरा हुआ । जिस बाबरी ढांचे पर धर्म पताका फहराते हुए मुलायम सिंह यादव की पुलिस ने कोठारी बन्धुओं को गोलियों से भून डाला था , वहीं बने मंदिर के ऊंचे शिखर पर आज मंगलवार के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी धर्मध्वजा चढ़ाएंगे । गत वर्ष रामलला के मंदिर में भगवान के बालरूप की प्राण प्रतिष्ठा के बाद मंदिर अब संपूर्ण हो गया है ।

अशोक सिंहल , आचार्य गिरिराज किशोर , अटल जी , लालकृष्ण आडवाणी , कल्याण सिंह , बाबा रामचंद्र परमहंस , नृत्यगोपाल दास , स्वामी सत्यमित्रानंद , आचार्य धर्मेंद्र , साध्वी ऋतम्भरा , उमा भारती , डॉ मुरलीमनोहर जोशी , सुषमा स्वराज ,स्वामी परमानंद सरस्वती आदि असंख्य महापुरुषों के तपस्या आज पूरी हो जाएगी । हमारा सौभाग्य है कि एक पत्रकार के रूप में हमें भी दशकों तक इन महापुरुषों की नजदीकी कवरेज का मौका मिला । इस वर्ष के प्रारंभ में अयोध्या जाकर राम लला की शयन आरती में शामिल होना जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है ।

राम लला स्थापन समारोह में देश विदेश की विभिन्न हस्तियां आमंत्रित की गई थी । मंदिर न्यास में स्वयं बड़े बड़े नेताओं , उद्यमियों , खिलाड़ियों , संतों , अभिनेताओं को उनके घर जाकर निमंत्रण पत्र दिया था । उन अभागों का नाम भी हम आज नहीं लेना चाहते जिन्होंने न जाकर अवसर गंवा दिया । इस बार भी काफी बड़ी हस्तियों को बुलाया गया है । लेकिन वैसे चेहरों को नहीं जिनके चेहरे राम नाम सुनकर लटक जाते हैं । राम मंदिर पूरा होने के बाद अब काशी तथा मथुरा के मंदिरों के लिए काम शुरू करना चाहिए । भारत सरकार प्लेसेज ऑफ वरशिप एक्ट को भी किसान एक्ट की तरह निरस्त करे , सनातन जगत की यह मांग है ।

अयोध्या आज फिर सज गई । वैसे तो बारह महीने सजी ही रहती है । 2024 जनवरी में रामलला के विराजमान होने की छटा भी निराली थी और आज भी निराली है । ऐसा लगता है मानों वैकुंठ अयोध्या में उतर आया है या क्षीरसागर अयोध्या में उमड़ पड़ा है । वही अयोध्या जहां राम , लखन , भरत , शत्रुघ्न थे , जहां सीता , उर्मिला , मांडवी और श्रुतकीर्ति थीं , जहां दशरथ , कौशल्या , कैकेई , सुमित्रा थीं , जहां गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र थे , जहां मंथरा और प्रजा थी ।

जहां रामदरबार था रामराज्य था ।

वही अयोध्या , वही सरयू , वही दशरथ महल , वही जानकी महल , वही हनुमान गढ़ी और सम्पूर्ण राम मंदिर । कौशल्या के महल से बजने लगी राम लला की पद चाप ….

ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ ……

,,,,,, कौशल सिखौला

प्रधानमंत्री 25 नवंबर को अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर पर भगवा ध्वज फहराएंगे

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ध्वज में कोविदारा वृक्ष के साथ दीप्तिमान सूर्य और भगवान श्री राम की प्रतिभा और पराक्रम तथा राम राज्य के आदर्शों को दर्शाने वाला ‘ॐ’ अंकित है।

ध्वजारोहण श्री राम और माता सीता की विवाह पंचमी के अभिजीत मुहूर्त के साथ होगा।

प्रधानमंत्री सप्तमंदिर भी जाएंगे, जहां महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, देवी अहिल्या, निषादराज गुहा और माता शबरी से संबंधित मंदिर हैं।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी 25 नवंबर को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर जाएंगे, जो देश के सामाजिक-सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण अवसर होगा।

सुबह करीब 10 बजे प्रधानमंत्री सप्तमंदिर जाएंगे, जिसमें महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मिकी, देवी अहिल्या, निषादराज गुहा और माता शबरी से संबंधित मंदिर हैं। इसके बाद शेषावतार मंदिर के दर्शन होंगे।

सुबह लगभग 11 बजे प्रधानमंत्री माता अन्नपूर्णा मंदिर जाएँगे। इसके बाद वे राम दरबार गर्भगृह में दर्शन और पूजा करेंगे, जिसके बाद वे रामलला गर्भगृह के दर्शन करेंगे।

दोपहर लगभग 12 बजे, प्रधानमंत्री अयोध्या में पवित्र श्री राम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर भगवा ध्वज फहराएंगे, जो मंदिर निर्माण के पूर्ण होने और सांस्कृतिक उत्सव एवं राष्ट्रीय एकता के एक नए अध्याय की शुरुआत का प्रतीक होगा। इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री उपस्थित जनसमूह को भी संबोधित करेंगे।

यह कार्यक्रम मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की शुभ पंचमी को, श्री राम और माता सीता के विवाह पंचमी के अभिजीत मुहूर्त के साथ, दिव्य मिलन के प्रतीक दिवस के रूप में आयोजित होगा। यह तिथि नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर जी के शहीदी दिवस का भी प्रतीक है, जिन्होंने 17वीं शताब्दी में अयोध्या में 48 घंटे तक निरंतर ध्यान किया था, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

दस फुट ऊँचे और बीस फुट लंबे समकोण त्रिभुजाकार ध्वज पर भगवान श्री राम के तेज और पराक्रम का प्रतीक एक दीप्तिमान सूर्य की छवि अंकित है, जिस पर ‘ॐ’ अंकित है और कोविदारा वृक्ष की छवि भी अंकित है। यह पवित्र भगवा ध्वज राम राज्य के आदर्शों को साकार करते हुए गरिमा, एकता और सांस्कृतिक निरन्तरता का संदेश देगा।

ध्वज पारंपरिक उत्तर भारतीय नागर स्थापत्य शैली में निर्मित शिखर के ऊपर फहराया जाएगा, जबकि मंदिर के चारों ओर निर्मित 800 मीटर का परकोटा, जो दक्षिण भारतीय स्थापत्य परंपरा में डिजाइन किया गया है, मंदिर की स्थापत्य विविधता को प्रदर्शित करता है।

मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर की बाहरी दीवारों पर वाल्मीकि रामायण पर आधारित भगवान श्री राम के जीवन से जुड़े 87 जटिल रूप से तराशे गए पत्थर के प्रसंग और परिसर की दीवारों पर भारतीय संस्कृति से जुड़े 79 कांस्य-ढाल वाले प्रसंग अंकित हैं। ये सभी तत्व मिलकर सभी आगंतुकों को एक सार्थक और शिक्षाप्रद अनुभव प्रदान करते हैं, जिससे उन्हें भगवान श्री राम के जीवन और भारत की सांस्कृतिक विरासत की गहरी समझ मिलती है।