कृषि क्षेत्र में हरित ईंधन आधारित प्रौद्योगिकियों को अपनाने की कृषि मंत्रालय की वकालत के साथ

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ईआईएमए एग्रीमैच इंडिया 2025 का समापन

कृषि मशीनरी, उपकरण और कृषि तकनीक समाधान पर 9वीं अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी और सम्मेलन ‘ईआईएमए एग्रीमैच इंडिया 2025’ का समापन आज भविष्य में हरित ईंधन आधारित कृषि मशीनरी पर फोकस करने के आह्वान के साथ हुआ। इसका आयोजन फिक्की और इतालवी कृषि उद्योग निकाय फेडरउनाकोमा ने कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के सहयोग से संयुक्त रूप से किया था।

नई दिल्ली में पूसा स्थित आईएआरआई मैदान में 27-29 नवंबर, 2025 को आयोजित इस प्रदर्शनी में उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और ओडिशा के लगभग 20,000 किसानों, 4000 से ज़्यादा घरेलू डीलरों और वितरकों, 180 से ज़्यादा घरेलू और विदेशी कंपनियों, और अल्जीरिया, नेपाल, श्रीलंका, केन्या, ओमान, मलेशिया, मोरक्को, नाइजीरिया, युगांडा, वियतनाम, ज़िम्बाब्वे, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड के 100 से ज़्यादा विदेशी खरीदारों ने हिस्सा लिया। इटली इस प्रदर्शनी का भागीदार देश था। नीदरलैंड, जापान, अमेरिका और पोलैंड ने भी इस प्रदर्शनी में भाग लिया।

प्रदर्शनी में कृषि मशीनरी की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदर्शित की गई, जो हमारे देश के किसानों के लिए बेहद फायदेमंद हो सकती है। इसके अलावा, इस आयोजन ने कृषि क्षेत्र की संपूर्ण मूल्य श्रृंखला को पूरा करने वाले भारतीय और विदेशी दोनों ही प्रकार के उद्यमियों को बेहतरीन अवसर प्रदान किए।

उद्घाटन सत्र में मुख्य भाषण देते हुए, कृषि एवं किसान कल्याण सचिव डॉ. देवेश चतुर्वेदी ने उद्योग जगत से अनुरोध किया कि वे हरित ईंधन (पर्यावरण में कम से कम कार्बन उत्सर्जन करने वाला ईंधन) आधारित मशीनीकरण को प्राथमिकता देकर भारतीय कृषि क्षेत्र के 2047 के विजन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं और कार्यभार को कम करने के लिए महिला-पुरूष निरपेक्ष कृषि उपकरण बनाकर महिला किसानों के कठिन परिश्रम को कम करें।

डॉ. चतुवेदी ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा, “अगले 5-10 वर्षों में, हमें अपनी तकनीकों को हरित ईंधन पर आधारित कर देना चाहिए—चाहे वे विद्युत चालित ट्रैक्टर हों या ग्रामीण सीबीजी संयंत्रों के लिए उपलब्ध सीबीजी (संपीड़ित बायोगैस) पर चलने वाली मशीनें। इस बदलाव से किसानों के रखरखाव और संचालन लागत, दोनों में कमी आएगी। हमारी योजनाओं में हरित ईंधन आधारित तकनीकों को प्राथमिकता दी जाएगी। मैं अपने इतालवी उद्योग साथियों से इस क्षेत्र में सहयोग करने का आग्रह करता हूं।”

विजन 2047 को प्राप्त करने में महिला किसानों को महत्वपूर्ण बताते हुए, सचिव ने उद्योग जगत का ध्यान महिला-पुरुष समानता को बढ़ावा देने वाले बजट (जेंडर बजटिंग) की ओर आकर्षित किया और उनसे महिलाओं के अनुकूल उपकरणों के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया।

डॉ. चतुवेदी ने यह भी बताया कि संयुक्त राष्ट्र ने 2026 को अंतर्राष्ट्रीय महिला किसान वर्ष घोषित किया है। इसलिए, ऐसे उपकरण डिज़ाइन किए जाने चाहिए जो महिलाओं को कठिन परिश्रम से राहत दिलाने का काम करें। उन्होंने कहा कि अक्सर नीति निर्माता यह मान लेते हैं कि ‘जेंडर बजटिंग’ का मतलब केवल महिलाओं को मशीनरी का स्वामित्व देना है, लेकिन केवल इससे उनका कठिन परिश्रम कम नहीं होता। उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “अधिकांश कठिन कृषि कार्य महिलाएं करती हैं, और इसलिए हमें महिलाओं के अधिक अनुकूल उपकरणों की जरूरत है, चाहे वे मैनुअल हों या मोटर चालित, जो वास्तव में उनके कार्यभार को कम करें।”

भारत में इटली के राजदूत श्री एंटोनियो बार्टोली ने आशा व्यक्त की कि दोनों देशों के बीच कृषि क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत में इतालवी दूतावास में शीघ्र ही एक कृषि अताशे (एक ऐसा अधिकारी जो कृषि क्षेत्र का विशेषज्ञ हो और दो देशों के बीच कृषि संबंधों को मजबूत करने के विभिन्न पक्षों का ध्यान रखे) की नियुक्ति की जाएगी।

प्रदर्शनी का अंतिम दिन दौरा करने वाले कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में संयुक्त सचिव श्री अन्बलगन पी ने प्रदर्शनी एवं सम्मेलन की उपलब्धि पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में किसानों की भागीदारी तथा घरेलू एवं विदेशी कम्पनियों, डीलरों, वितरकों की प्रमुख उपस्थिति इस आयोजन की सफलता को दर्शाती है।

ईआईएमए एग्रीमैच इंडिया की आयोजन समिति के अध्यक्ष और टैफे के बोर्ड निदेशक एवं समूह अध्यक्ष श्री टी.आर. केसवन ने कृषि को सेवा के रूप में बढ़ावा देने की जरूरत पर बल दिया, क्योंकि किसानों को केवल कुछ दिनों के लिए इस्तेमाल होने वाला सीडर खरीदना महंगा पड़ेगा। उन्होंने कहा कि कृषि सेवा के रूप में सीडर मददगार साबित हो सकता है। इसलिए, हमें सेवा के रूप में कृषि का एक नया क्षेत्र बनाने की जरूरत है। उद्योग ने कृषि मंत्रालय के साथ इस पर चर्चा की है और इस दिशा में कुछ प्रगति भी हुई है।

कृषि क्षेत्र में भारत-इटली सहयोग के भविष्य को लेकर उत्साहित फेडेरुनाकोमा की महानिदेशक सुश्री सिमोना रापस्टेला ने कहा कि भारत पर इतालवी व्यापार एजेंसी (आईसीई) की रिपोर्ट के अनुसार, यह क्षेत्र 2023 में कुल 13.7 अरब अमेरिकी डॉलर का था और अगले दस वर्षों में इसमें उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है, जो 2033 में 31.6 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाएगा। इसकी वार्षिक वृद्धि दर लगभग 9 प्रतिशत होगी।

फिक्की राष्ट्रीय कृषि समिति के सह-अध्यक्ष और कॉर्टेवा एग्रीसाइंस के दक्षिण एशिया अध्यक्ष श्री सुब्रतो गीद ने कहा, “भारत के लिए अपने खाद्य भविष्य को सुरक्षित करने हेतु उत्पादकता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। हमें किसानों को उच्च-गुणवत्ता वाले बीजों और कृषि उपज बढ़ाने के साधनों जैसे सही सामाग्रियों तक पहुंच प्रदान करके शुरुआत करनी होगी। हमें ऐसे आधुनिक तरीकों की आवश्यकता है जो श्रम को कम करें और दक्षता में सुधार करें। मशीनीकरण इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे प्रौद्योगिकी और प्रगतिशील सुधारों से मदद प्राप्त है। इन सभी कदमों के साथ मिलकर, एक ऐसी सुदृढ़ कृषि प्रणाली का निर्माण किया जा सकता है जो किसानों और राष्ट्र दोनों के लिए लाभकारी हो।”

कार्यक्रम के दौरान फिक्की-पीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट ‘फार्म मैकेनाइजेशन: द पाथ टुआर्ड्स फ्यूचर रेडी इंडिया’ भी जारी की गई।

इतालवी व्यापार एजेंसी की उप व्यापार आयुक्त सुश्री सबरीना मंगियालावोरी ने कहा कि भारतीय किसान आधुनिक यांत्रिक समाधानों, जैसे जुताई, बुवाई, सिंचाई, फसल संरक्षण और फसल के डंठल से अनाज या दानों को अलग करने की प्रक्रिया (थ्रेसिंग) को अपना रहे हैं।

इस आयोजन का 10वां संस्करण अगले वर्ष इटली में आयोजित किया जाएगा।

INS माहे के जलावतरण समारोह में सेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी उपस्थित रहे

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नीलगिरि श्रेणी (प्रोजेक्ट 17ए) का चौथा और मझगांव डॉक शिपबिल्डिंग लिमिटेड (एमडीएल) द्वारा निर्मित तीसरा जहाज, तारागिरि (यार्ड 12653), 28 नवंबर 2025 को एमडीएल, मुंबई में भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया । ये युद्धपोत डिजाइन और निर्माण में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। प्रोजेक्ट 17ए के फ्रिगेट बहुमुखी बहु-मिशन प्लेटफॉर्म हैं, जिन्हें समुद्री क्षेत्र में वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों का समाधान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

तारागिरी , पूर्व आईएनएस तारागिरी का एक नया रूप हैजो एक लिएंडर-श्रेणी का युद्धपोत था और 16 मई 1980 से 27 जून 2013 तक भारतीय नौसेना के बेड़े का हिस्सा रहा और जिसने राष्ट्र को 33 वर्षों की शानदार सेवा प्रदान की। यह अत्याधुनिक युद्धपोत नौसेना के डिज़ाइन, स्टेल्थ, मारक क्षमता, स्वचालन और उत्तरजीविता में एक बड़ी छलांग को दर्शाता है, और युद्धपोत निर्माण में आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।

युद्धपोत डिज़ाइन ब्यूरो (डब्ल्यूडीबी) द्वारा डिज़ाइन और युद्धपोत निरीक्षण दल (मुंबई) की देखरेख में निर्मित, पी17ए फ्रिगेट स्वदेशी जहाज़ डिज़ाइन, स्टेल्थ, उत्तरजीविता और युद्ध क्षमता में एक पीढ़ीगत छलांग को दर्शाते हैं। एकीकृत निर्माण के दर्शन से प्रेरित होकर, इस जहाज़ का निर्माण और वितरण निर्धारित समय-सीमा में किया गया।

P17A जहाज़ों में P17 (शिवालिक) श्रेणी की तुलना में उन्नत हथियार और सेंसर सूट लगे हैं। इन जहाजों में संयुक्त डीज़ल या गैस प्रणोदन संयंत्र लगे हैंजिनमें एक डीज़ल इंजन और एक गैस टर्बाइन शामिल है जो प्रत्येक शाफ्ट पर एक नियंत्रणीय पिच प्रोपेलर (सीपीपी) और अत्याधुनिक एकीकृत प्लेटफ़ॉर्म प्रबंधन प्रणाली (आईपीएमएस) को चलाता है।

शक्तिशाली हथियार और सेंसर सूट में ब्रह्मोस एसएसएमएमएफएसटीएआर और एमआरएसएएम कॉम्प्लेक्स, 76 मिमी एसआरजीएमऔर 30 मिमी और 12.7 मिमी निकटरक्षा हथियार प्रणालियों का संयोजनसाथ ही पनडुब्बी रोधी युद्ध के लिए रॉकेट और टॉरपीडो शामिल हैं।

तारागिरी पिछले 11 महीनों में भारतीय नौसेना को सौंपा जाने वाला चौथा P17A जहाज है। पहले दो P17A जहाजों के निर्माण से प्राप्त अनुभव के आधार पर तारागिरी के निर्माण की अवधि को घटाकर 81 महीने कर दिया गया है, जबकि प्रथम श्रेणी (नीलगिरी) के निर्माण में 93 महीने लगे थे। प्रोजेक्ट 17A के शेष तीन जहाज (एक एमडीएल में और दो जीआरएसई में) अगस्त 2026 तक क्रमिक रूप से वितरित किए जाने की योजना है।

तारागिरी की डिलीवरी देश की डिज़ाइन, जहाज निर्माण और इंजीनियरिंग क्षमता को दर्शाती है, और जहाज डिज़ाइन और जहाज निर्माण दोनों में आत्मनिर्भरता पर भारतीय नौसेना के निरंतर ध्यान को दर्शाती है। 75% स्वदेशीकरण के साथइस परियोजना में 200 से अधिक एमएसएमई शामिल हैं और इसने लगभग 4,000 कर्मियों को प्रत्यक्ष रूप से और 10,000 से अधिक कर्मियों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार सृजन में सक्षम बनाया है।

56वें ​​भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के समापन समारोह में रजनीकांत सम्मानित

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56वें ​​भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) के पुरस्कार समारोह में, दिग्गज अभिनेता रजनीकांत शाम के मुख्य आकर्षण रहे। उन्हें इस अवसर पर सिनेमा में उनके 50 उल्लेखनीय वर्षों के लिए सम्मानित किया गया। समारोह में उत्कृष्ट फिल्मों के लिए प्रतिष्ठित गोल्डन और सिल्वर पीकॉक पुरस्कारों के साथ-साथ उत्कृष्ट फिल्मों के लिए विशेष पुरस्कार भी प्रदान किए गए। समापन समारोह में सिनेमाई उत्कृष्टता का महोत्सव मनाया गया और साथ ही फिल्म जगत की प्रमुख हस्तियों के योगदान को श्रद्धांजलि दी गई।रजनीकांत को सिनेमा में उनके 50 वर्ष के उत्कृष्ट योगदान के लिए गोवा के मुख्यमंत्री श्री प्रमोद सावंत और सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन द्वारा सम्मानित किया गया।

सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री श्री एल. मुरुगन, गोवा के मुख्यमंत्री श्री प्रमोद सावंत, सूचना एवं प्रसारण सचिव श्री संजय जाजू और अभिनेता रणवीर सिंह ने महान अभिनेता श्री रजनीकांत को भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान और भारतीय सिनेमा में 50 स्वर्ण जयंती वर्ष पूर्ण करने के लिए सम्मानित किया।

ऋषभ शेट्टी को प्रसिद्ध यक्षगान कलाकार विद्या कोल्युर द्वारा सिर पर सम्मान स्वरूप साफा पहनाकर सम्मानित किया गया।सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन और सूचना एवं प्रसारण सचिव श्री संजय जाजू ने सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ वेब सीरीज के लिए पुरस्कार प्रदान किए।सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री श्री एल. मुरुगन ने करण सिंह त्यागी को “केसरी चैप्टर 2” के लिए सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक का पुरस्कार प्रदान किया।(सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री श्री एल. मुरुगन और सूचना एवं प्रसारण सचिव श्री संजय जाजू आनंद तिवारी को “बंदिश बैंडिट्स सीजन 2” के लिए सर्वश्रेष्ठ वेब सीरीज का पुरस्कार प्रदान किया।

सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन, गोवा के मुख्यमंत्री श्री प्रमोद सावंत, सूचना एवं प्रसारण सचिव श्री संजय जाजू, महोत्सव निदेशक शेखर कपूर और आईसी जूरी के अध्यक्ष ओमप्रकाश मेहरा ने आईएफएफआई समापन समारोह में फिल्म “स्किन ऑफ यूथ” के लिए निर्देशक ऐश मेफेयर और अभिनेत्री ट्रान क्वान को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का गोल्डन पीकॉक पुरस्कार प्रदान किया।एनएफडीसी के प्रबंध निदेशक श्री प्रकाश मगदुम ने आईएफएफआई समापन समारोह में “सेफ हाउस” फिल्म के लिए एरिक स्वेन्सन को आईसीएफटी यूनेस्को गांधी पदक प्रदान किया।

सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन, गोवा के मुख्यमंत्री श्री प्रमोद सावंत, सूचना एवं प्रसारण सचिव श्री संजय जाजू और महोत्सव निदेशक शेखर कपूर एवं ओमप्रकाश मेहरा ने आईएफएफआई समापन समारोह में फिल्म “माई फादर्स शैडो” के लिए अकिनोला डेविस जूनियर को विशेष जूरी पुरस्कार प्रदान किया।

सड़क दुर्घटनाओं में जीडीपी का होता है तीन फीसदी नुकसान

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बाल मुकुन्द ओझा

भारत में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में हर साल लाखों की संख्या में लोग अपनी जान गवां देते हैं। सड़क दुर्घटनाओं के ग्राफ में तेजी से वृद्धि हो रही है। दुर्घटनाओं में मौतें और घायल होने के समाचार प्रतिदिन पढ़ने और देखने को मिल रहे हैं। सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद देश में सड़क हादसों में कमी नहीं आई है, बल्कि साल दर साल इसमें इजाफा हो रहा है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है जब तक समाज का सहयोग नहीं मिलेगा, मानवीय व्यवहार नहीं बदलेगा और कानून का डर नहीं होगा, तब तक सड़क हादसों पर अंकुश नहीं लगेगा। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी अपनी साफगोई के लिए जाने जाते है। गडकरी के अनुसार देश में हर साल औसतन 4.80 से 5 लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिसमें लगभग 1.80 लाख लोगों की मौत हो जाती है। इन दुर्घटनाओं से जीडीपी को 3 फीसदी का नुकसान होता है, जो किसी बीमारी या युद्ध से भी अधिक है। सभी दुर्घटनाओं में 66.4 फीसदी मौतें 18 से 45 साल के युवाओं की होती हैं, जो देश के भविष्य के लिए गंभीर चिंता है।

वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत में दुनिया के केवल एक फीसदी वाहन हैं इसके बावजूद पूरे विश्व में होने वाले हादसों का 11 फीसदी देश में ही घटित होते हैं। भारत ही नहीं विश्व भर में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या बहुत ज्यादा है। भारत में सड़कों और हाईवे की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। इसी के साथ हादसों की रफ्तार भी थमने का नाम नहीं ले रही। देश में सड़क दुर्घटनाओं के ग्राफ में तेजी से वृद्धि हो रही है। भारत में कोई दिन नहीं ऐसा नहीं जाता जब देश के किसी भाग में सड़क हादसा न होता हो।  सड़क पर ट्रक पार्क करना दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण हैं और कई ट्रक लेन अनुशासन का पालन नहीं करते हैं। ऐसा लगता है जैसे सड़के आतंकी हो गयी है और हादसे थमने के नाम नहीं ले रहे है। देश में मोटर वाहन कानून 2019 लागू होने के बाद भले ही सरकार के राजस्व में वृद्धि हुई हो मगर दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों की संख्या में कमी नहीं आयी। सख्त कानून का उनपर कोई असर नहीं हुआ है। नीति आयोग की रिपोर्ट है कि सड़क हादसों के शिकार 30 प्रतिशत लोगों की मौत जीवन रक्षक उपचार नहीं मिल पाने के कारण होती है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के सड़क हादसों के आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे देश में लोग जान हथेली पर लेकर चलते है। देश में सड़कों और हाईवे की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। इसी के साथ हादसों की रफ्तार भी थमने का नाम नहीं ले रही। सड़क दुर्घटनाओं में पैदल चलने वाले लोग भी सुरक्षित नहीं है। इन सभी दुर्घटनाओं के पीछे शराब मादक पदार्थों का इस्तेमाल, वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करना, वाहनों में जरुरत से अधिक भीड़ होना, वैध गति से अधिक तेज गाड़ी चलाना और थकान आदि होना है। महानगरों और नगरों में किसी चौराहे पर लाल बत्ती को धता बताकर रोड पार कर जाना, गलत तरीके से ओवरटेकिंग, बेवजह हार्न बजाना, निर्धारित लेन में न चलना और तेज गति से गाड़ी चलाकर ट्रैफिक कानूनों की अवहेलना आज के युवकों का प्रमुख शगल बन गया है।

सड़क सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है, आम जनता में खासतौर से नये आयु वर्ग के लोगों में अधिक जागरुकता लाने के लिये इसे शिक्षा, सामाजिक जागरुकता आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों से जोड़ा गया है। सड़क दुर्घटना, चोट और मृत्यु आज के दिनों में बहुत आम हो चला है। सड़क पर ऐसी दुर्घटनाओं की मुख्य वजह लोगों द्वारा सड़क यातायात नियमों और सड़क सुरक्षा उपायों की अनदेखी है। गलत दिशा में गाड़ी चलाना, सड़क सुरक्षा नियमों और उपायों में कमी, तेज गति, नशे में गाड़ी चलाने आदि । सड़क हादसों की संख्या को घटाने के लिये उनकी सुरक्षा के लिये सभी सड़क का इस्तेमाल करने वालों के लिये सरकार ने विभिन्न प्रकार के सड़क यातायात और सड़क सुरक्षा नियम बनाये हैं। हमें उन सभी नियमों और नियंत्रकों का पालन करना चाहिये जैसे रक्षात्मक चालन की क्रिया, सुरक्षा उपायों का इस्तेमाल, गति सीमा को ठीक बनायें रखना, सड़क पर बने निशानों को समझना आदि।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-.32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

“सेना की वर्दी में आस्था की संवैधानिक परिधि”

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– डॉ सत्यवान सौरभ

भारतीय संविधान नागरिकों को धर्म का पालन, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, परंतु यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है। विशेषकर उन सेवाओं में, जहाँ सामूहिक अनुशासन, पदानुक्रम, आज्ञापालन और इकाई-एकजुटता ही अस्तित्व की शर्तें हैं, वहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दायरा स्वाभाविक रूप से सीमित हो जाता है। भारतीय सशस्त्र बल इसी श्रेणी में आते हैं, जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा, युद्धक क्षमता और सामूहिक मनोबल किसी भी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद या धार्मिक व्याख्या से कहीं ऊपर रखे जाते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक सैन्य अधिकारी की बर्खास्तगी को उचित ठहराया जाना इस बात का प्रमाण है कि ‘‘आवश्यक धार्मिक आचरण’’ और ‘‘व्यक्तिगत धार्मिक व्याख्या’’ में स्पष्ट अंतर किया जाएगा, और वर्दी में रहते हुए यह अंतर और अधिक कठोर हो जाता है। यह निर्णय यह संकेत भी देता है कि सैन्य सेवा का मूल स्वर ‘‘सैकुलर यूनिट-कल्चर’’ पर आधारित है, जहाँ किसी भी धर्म की मान्यताएँ सम्मानित हैं, किंतु किसी एक धर्म की निजी व्याख्या रेजिमेंटल परंपराओं, आदेशों या सैन्य अनुशासन पर प्रभाव नहीं डाल सकती।

भारत जैसे बहुधर्मी समाज में सेना का चरित्र हमेशा से विशिष्ट रूप से धर्मनिरपेक्ष रहा है। एक ही पलटन में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और अन्य धर्मों के सैनिक कंधे से कंधा जोड़कर लड़ते हैं। उनकी एकता का आधार ‘‘धर्म’’ नहीं, बल्कि ‘‘रक्त संबंधी बंधुत्व’’ और ‘‘राष्ट्र के प्रति साझा निष्ठा’’ है। यही कारण है कि भारतीय सेना की रेजिमेंटल परंपराओं में धार्मिक रंग तो दिखते हैं, पर उनका उद्देश्य किसी विशेष धर्म का प्रचार नहीं, बल्कि सैनिक भावना, युद्धक मनोबल और ऐतिहासिक गौरव की निरंतरता को बनाए रखना होता है। उदाहरणस्वरूप कई रेजिमेंट अपने पारंपरिक युद्ध-नाद या शुभ प्रतीकों का उपयोग करती हैं, जो उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और युद्धों में प्रदर्शित वीरता की गवाही देते हैं।

किसी सैनिक के लिए धार्मिक आस्था उसका व्यक्तिगत अधिकार अवश्य है, पर जब वह वर्दी धारण करता है, तो वह व्यक्ति नहीं, राष्ट्र का प्रतिनिधि बन जाता है। सेना किसी सैनिक को किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान को त्यागने या नया अपनाने के लिए बाध्य नहीं करती, किंतु यह अपेक्षा अवश्य करती है कि भीतर की किसी निजी व्याख्या को सैनिक अपने कर्तव्यों, आदेशों या इकाई-परंपराओं से ऊपर न रखे। सर्वोच्च न्यायालय ने इसी संदर्भ में स्पष्ट किया कि क्या कोई धार्मिक ग्रंथ वास्तव में किसी विशेष क्रिया को प्रतिबंधित करता है या यह केवल व्यक्ति की निजी धारणा है—यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘‘आवश्यक धार्मिक आचरण’’ वही होता है जो धर्म के मूलभूत स्वरूप का अंग हो, जिसे त्याग देने पर धर्म का स्वरूप ही बदल जाए। इसके विपरीत यदि कोई आचरण केवल व्यक्तिगत व्याख्या पर आधारित है, तो उसे सेवा-आवश्यकताओं से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि यदि किसी सैनिक को आदेश दिया जाए कि वह किसी आधिकारिक कार्यक्रम या परेड में भाग ले, और वह ‘‘धार्मिक कारणों’’ का हवाला देते हुए मना करे, तो उसकी इस असहमति के दो स्तरों की जाँच होगी—पहला यह कि क्या वह आचरण सचमुच धर्म-आवश्यक है? और दूसरा यह कि क्या उसका पालन रेजिमेंटल अनुशासन या सामूहिक मनोबल को प्रभावित करता है? यदि कोई सैनिक आदेश का पालन नहीं करता, तो वह केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता—वह पूरी संरचना के अनुशासन को चुनौती देने का कार्य बन जाता है। सेना में एक भी अस्वीकार उदाहरण चेन-ऑफ-कमांड को कमजोर करने का कारण बन सकता है, क्योंकि युद्धकालीन या संकट की परिस्थितियों में आदेशों का तुरंत पालन ही जीवन और मृत्यु का अंतर तय करता है।

सैन्य अनुशासन केवल बाहरी नियमों का पालन नहीं है; यह मनोवैज्ञानिक एकजुटता और मानसिक तैयारी की वह अवस्था है जिसमें प्रत्येक सैनिक स्वयं को इकाई का अभिन्न घटक मानता है। धार्मिक आधार पर स्वयं को अलग करना या रेजिमेंटल परंपराओं से दूरी बनाना उस भावना को कमजोर कर सकता है। इसलिए न्यायालय और सैन्य नेतृत्व दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ‘‘व्यक्तिगत विश्वास’’ और ‘‘व्यक्तिगत व्याख्या’’ का सम्मान तो किया जा सकता है, पर ‘‘व्यक्तिगत धार्मिक औचित्य’’ देकर सैन्य आदेशों का उल्लंघन न तो स्वीकार्य है, न ही वह किसी भी प्रकार ‘‘धर्म के अधिकार’’ के अंतर्गत आता है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि सेना किसी सैनिक को दूसरे धर्म के अनुष्ठानों में ‘‘भाग लेने’’ के लिए बाध्य नहीं करती, बल्कि केवल ‘‘उपस्थिति’’ या ‘‘प्रोटोकॉल’’ पूरा करने की अपेक्षा करती है। उदाहरणस्वरूप—यदि किसी कार्यक्रम में किसी देवी-देवता की प्रतिमा लाई जाती है या आशीर्वाद की औपचारिक प्रार्थना होती है, तो सैनिक को ‘‘उपस्थित’’ रहना होता है, ‘‘पूजा’’ करना अनिवार्य नहीं होता। यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सेना किसी की अंत:करण-स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं करती। सैनिक चाहे तो मन ही मन अलग विश्वास रख सकता है, पर वह सार्वजनिक रूप से असहमति दिखाकर अनुशासन को चुनौती नहीं दे सकता।

सवाल यह है कि क्या सेना ‘‘उचित समायोजन’’ (Reasonable accommodation) कर सकती है? हाँ, पर इसकी सीमा वही है जहाँ तक वह सामूहिक हितों को प्रभावित न करे। कई बार सैनिकों को उनके धार्मिक त्यौहारों, पूजा-पद्धतियों या आहार-मान्यताओं के अनुसार उचित छूट दी जाती है। सेना में गुरुद्वारा, मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि के लिए स्थान भी निर्धारित होते हैं। पर यह ‘‘धर्म-आधारित सुविधाएँ’’ तभी तक संभव हैं जब तक वे ‘‘सेवा के मूल कार्य’’ या ‘‘युद्धक आवश्यकताओं’’ से संघर्ष न करें। यदि किसी व्यक्तिगत आस्था का पालन इकाई की गतिविधियों, युद्ध-तैयारी या आदेशों में अवरोध डालता है, तो उसका समायोजन संभव नहीं होता।

सैन्य अधिकारी के लिए दायित्व और भी अधिक कठोर हो जाते हैं। अधिकारी केवल आदेश का पालन करने वाला सैनिक नहीं होता—उसे दूसरों के लिए उदाहरण बनना होता है। यदि वह स्वयं आदेश मानने से इनकार करता है, और वह भी व्यक्तिगत धार्मिक कारणों का हवाला देकर, तो उसके अधीनस्थों का मनोबल प्रभावित होता है और अनुशासन के टूटने की संभावना बढ़ती है। इसलिए न्यायालय ने इसे ‘‘सबसे गंभीर प्रकार की अनुशासनहीनता’’ माना। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि कोई अधिकारी निजी धार्मिक व्याख्या को सेवा के ऊपर रखता है, तो वह स्पष्ट रूप से यह प्रदर्शित करता है कि वह वर्दी की माँगों के अनुरूप स्वयं को ढालने में असमर्थ है।

धर्म और सैन्य अनुशासन के संबंध में एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न है—क्या ‘‘धार्मिक स्वतंत्रता’’ सैनिक की पहचान है या उसकी प्राथमिक पहचान ‘‘राष्ट्र-सेवक’’ होना है? भारतीय सेना का चरित्र सदैव ‘‘धर्म-निरपेक्ष पेशेवरिता’’ पर आधारित रहा है। सैनिक का प्राथमिक धर्म ‘‘कर्तव्य’’ है—‘‘धर्मनिष्ठा’’ नहीं। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके व्यक्तिगत धार्मिक जीवन को दबा दिया जाए; बल्कि यह है कि वर्दी में रहते हुए उसका धर्म ‘‘राष्ट्र-धर्म’’ बन जाता है। व्यक्तिगत आस्था उसकी निजी सीमा में सुरक्षित रहती है, और सेना यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी सैनिक अपने धर्म के कारण न तो उपेक्षित महसूस करे, न ही उसे विशिष्ट विशेषाधिकार मिले।

इस पूरे विषय का सार यह है कि ‘‘व्यक्तिगत धार्मिक भावना’’ और ‘‘सैन्य अनुशासन’’ के बीच संतुलन तो आवश्यक है, पर यह संतुलन सदैव सैन्य आवश्यकताओं के पक्ष में झुकता है। क्यों? क्योंकि सेना की विफलता किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि राष्ट्र को प्रभावित करती है। यदि युद्धभूमि पर कोई सैनिक कहे कि धार्मिक कारणों से वह आदेश का पालन नहीं कर सकता, तो उसके परिणाम घातक हो सकते हैं। इसीलिए सैन्य नेतृत्व और न्यायपालिका, दोनों इस सिद्धांत को दोहराते हैं कि—‘‘वर्दी में रहते हुए व्यक्ति निजी नहीं रहता, वह राष्ट्र का संरक्षक बन जाता है।’’

सेना में धार्मिक आचरण की स्वतंत्रता ‘‘अनुमति-आधारित’’ होती है, ‘‘पूर्ण अधिकार’’ नहीं। यह स्वतंत्रता सेवा-नियमों और संचालन-हितों के अधीन होती है। आवश्यक धार्मिक आचरण का सम्मान किया जा सकता है, पर यदि वही आचरण अनुशासन, आदेश-पालन या इकाई-एकजुटता को क्षति पहुँचाए, तो वह संरक्षित नहीं रहेगा। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय इसी सिद्धांत को सुदृढ़ करता है—कि सैन्य जीवन में ‘‘धर्म’’ का स्थान है, पर ‘‘धर्म-आधारित अवज्ञा’’ का नहीं।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारतीय सेना अपने सैनिकों की व्यक्तिगत आस्था का सम्मान करती है, उनकी धार्मिक पहचान को संरक्षित भी करती है, और जहाँ तक संभव हो ‘‘उचित समायोजन’’ भी प्रदान करती है। परंतु वह किसी भी परिस्थिति में सेवा-नियमों, आदेशों, रेजिमेंटल परंपराओं और सामूहिक कर्तव्य को व्यक्तिगत धार्मिक तर्कों के कारण कमजोर नहीं होने देती। यही कारण है कि जब आस्था और सैन्य अनुशासन के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है, तो न्यायपालिका और सैन्य नेतृत्व दोनों का रुख स्पष्ट होता है—‘‘राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता प्राप्त है; व्यक्तिगत धार्मिक आचरण उन्हीं सीमाओं के भीतर मान्य है जहाँ तक वह सैन्य सेवा की अनिवार्यताओं से टकराव न पैदा करे।’’

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

अब देवभूमि बनेंगी नई परंपराएं

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प्रयागराज में पूर्ण कुंभ को महाकुंभ कहा हरिद्वार में अर्धकुंभ को कहा जाएगा पूर्ण कुंभ
अर्द्धकुंभ परम्परा का शास्त्रीय महत्व कोई नहीं
प्रयागराज और हरिद्वार में मनाया जाता है यह पर्व
नासिक और उज्जैन में अर्द्धकुंभ नहीं पड़ता
राजा हर्षवर्धन के दान से पड़ी अर्धकुंभ की परंपरा

उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है । सनातन जगत को यहभूमि ऋषि मुनियों के तप की ऊर्जा सदा प्रदान करती रही है । कुंभ आदि पर्व जन पर्व हैं । लेकिन नए निजाम में संत पर्व बनकर रह गए हैं । तो कल हरिद्वार में मुख्यमंत्री की उपस्थिति में संतों ने तय कर लिया कि 2027 में पड़ने वाले अर्धकुंभ को कुंभ कहा जाएगा । अर्धकुंभ पर पहली बार अखाड़ों के शाही स्नान भी होंगे ।

सभी जानते हैं बारह वर्ष बाद एक एक कर चारों कुंभ नगरों में पड़ने वाला पूर्ण कुंभ सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा वैदिक पर्व है । सनातन धर्म के पर्वों में कुंभ ही ऐसा एक मात्र पर्व है जिसका वर्णन अथर्ववेद और ऋग्वेद में उपलब्ध है । अन्य पर्वों का विवरण पौराणिक अधिक और वैदिक बहुत कम मिलता है । लेकिन वेद पुराणों में अर्धकुंभ तथा महाकुंभ का कोई विवरण उपलब्ध नहीं । सूर्य , बृहस्पति , चंद्रमा और शनि की युति 12 साल बाद कुंभ महापर्व को जन्म देती है । लेकिन इन ग्रहों की ऐसी एक भी युति नहीं है जो अर्धकुंभ पर पड़कर उसे शास्त्रीय बनाती हो ।

फिर भी प्रयागराज और हरिद्वार में अर्धकुंभ मनाया जाता है । प्रयागराज में नागा संन्यासी भी कुंभ की तरह अर्धकुंभ में भाग लेते हैं , लेकिन हरिद्वार अर्धकुंभ में कोई भी अखाड़ा स्नान या शिविर लगाने नहीं आता । वास्तव में अर्धकुंभ कोई पौराणिक महापर्व नहीं है , अपितु राजा हर्षवर्धन के दान से जुड़ा पर्व है । राजा हर्षवर्धन महादानी थे । वे प्रत्येक 6 वर्ष बाद प्रयागराज जाकर अपना सर्वस्व खजाना दान कर देते थे । उसे ही लेने के लिए हर छह वर्ष बाद देश भर से साधु संत प्रयागराज पहुंचते थे । वे अर्धकुंभ में भी सर्वस्व लुटा देते थे ।

उसी दान से प्रयाग में अर्धकुंभ शुरू हुआ । कालांतर में उसी की देखा देखी हरिद्वार में भी अर्धकुंभ भरने लगा । इसके अलावा एक भी कारण नहीं जो हरिद्वार में अर्धकुंभ की परंपरा को पुष्ट करे । हरिद्वार कुंभ 2021 में पड़ा था और अब 2027 में अर्धकुंभ पड़ेगा । आश्चर्य की बात है अर्धकुंभ को अब कुंभ का नाम देकर आकर्षण पैदा किया जा रहा है । इस सवाल का जवाब भी किसी के पास नहीं कि नासिक और उज्जैन में अर्द्धकुंभ क्यों नहीं भरता ? इस बात का भी कोई उत्तर नहीं कि हरिद्वार अर्धकुंभ में 13 अखाड़ों में से एक भी अखाड़ा अब तक स्नान करने क्यों नहीं आता था ।

कुंभ महापर्व प्रत्येक कुंभ नगर में 12 वर्ष बाद मुख्य रूप से बृहस्पति और सूर्य के कारण पड़ता है । हरिद्वार कुंभ में गुरु कुंभ राशि और सूर्य मेष राशि में आते हैं । सूर्य तो प्रत्येक वर्ष 14 अप्रैल को बैसाखी के अवसर पर एक महीने ले लिए मेषस्थ होते हैं , परंतु बृहस्पति 12 वर्ष के बाद एक वर्ष के लिए कुंभ राशि में आते हैं । सूर्य हर महीने राशि बदलते हैं जबकि बृहस्पति एक वर्ष में । फलस्वरूप कुंभ मेला बारह साल बाद भरता है । अब आश्चर्य की बात यह है कि छठे वर्ष जब बृहस्पति कुंभस्थ होते ही नहीं तो अर्द्धकुंभ कैसा ?

जाहिर है प्रयागराज के अर्धकुंभ का हरिद्वार में अनुसरण किया गया है । बगैर अखाड़ों के आए ही अर्धकुंभ सामान्य बैसाखी मेले की तरह बीत जाता था । यह भी आश्चर्य जनक है कि जिस प्रकार प्रयागराज कुंभ को बिना किसी शास्त्रीय आधार महाकुंभ नाम दे दिया गया , उसी प्रकार 2027 के हरिद्वार अर्धकुंभ को अब बिना किसी ज्योतिषीय अथवा शास्त्रीय आधार कुंभ नाम दिया गया है । प्रयागराज जाकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री। स्वयं यह घोषणा कर आए थे । अब अर्धकुंभ की बजाय कुंभ मनाने और चार शाही स्नान करने का फैसला विगत दिवस ले लिया गया ।
,,,,,कौशल सिखौला

स्वच्छ भूजल पर मंडराया धातु प्रदूषण का खतरा

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                                             बाल मुकुन्द ओझा

पिछले कुछ सालों से अनेक रिपोर्टों में यह स्वीकार किया गया कि भूजल में जहरीली धातुओं की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक पाई गई है, इसके बावजूद शुद्ध पानी के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया जो बेहद चिंताजनक है। यह भी स्वीकार किया है कि रसायनों या धातुओं का मानव शरीर और स्वास्थ्य पर बहुत गंभीर विषाक्त प्रभाव पड़ता है और स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा होता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की ग्राउंड क्वालिटी रिपोर्ट 2025 के मुताबिक देशभर में पंजाब में भूजल में यूरेनियम की मात्रा सर्वाधिक पाई गई है। इस प्रदेश में 62.50 सैम्पल सुरक्षित सीमा से अधिक मिले है, जो मानव जीवन के लिए खतरनाक है। पंजाब के बाद हरियाणा, दिल्ली, कर्नाटक और दिल्ली में भी यूरेनियम प्रदूषण तय मानक से अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार उत्तरपश्चिम भारत में पंजाब, हरियाणा  दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश यूरेनियम के हॉटस्पॉट के रूप में सामने आये है। वहीं फ्लोराइड प्रदूषण के मामलों में राजस्थान  देशभर में अव्वल है।

रिपोर्ट में बताया गया है यूरेनियम प्रदूषण के फलस्वरूप लोग पेयजल  सेवन से  बीमारियों के शिकार होते है जो बेहद चिंताजनक है। इससे पूर्व गत वर्ष  भारत सरकार ने संसद में स्वीकार किया था कि आज हम जो पानी पी रहे हैं वह जहर बन गया है। सरकार ने राज्यसभा में जो आंकड़े दिए थे वो न सिर्फ चौकाने वाले हैं बल्कि डराने वाले भी हैं। जहां भूजल में जहरीली धातुओं की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक पाई गई है। पानी में हानिकारक वस्तुओं के मिश्रण से ही जल प्रदूषित होता है। प्रदूषित जल का सबसे भयंकर प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सम्पूर्ण विश्व में प्रतिवर्ष एक करोड़ पचास लाख व्यक्ति प्रदूषित जल के कारण मृत्यु के शिकार हो जाते हैं तथा पांच लाख बच्चे मर जाते हैं। भारत में प्रति लाख लगभग 360 व्यक्तिओं की मृत्यु हो जाती है और अस्पतालों में भर्ती होने वाले रागियों में से 50 फसदी रोगी ऐसे होते है जिनके रोग का करण प्रदूषित जल होता है। अविकसित देशों की स्थिति और भी बुरी है। यहां 80 प्रतिशत रोगों की जड़ प्रदूषित जल है। 

हमारे देश के भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाईट्रेट, लोहा, कैडमियम, क्रोमियम, तांबा, निकल, सीसा, जस्ता व पारा जैसी भारी धातु का मिश्रण तेजी के साथ घुलता जा रहा है। जिससे जलजनित बीमारियां हमारे जीवन के लिए खतरा बन गई हैं। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की माने तो विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों और जल गुणवत्ता की निगरानी के दौरान केंद्रीय भूमि जल बोर्ड द्वारा तैयार भूमि जल गुणवत्ता के आंकड़े देश के विभिन्न राज्यों के भागों के अलग-अलग हिस्सों में भूमि जल संदूषण की पुष्टि कर रहे हैं। हालत यह हो गई है की लोग धीमे जहर वाले पानी को पीने के लिए विवश हैं। मंत्रालय का दावा है कि केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर इस चुनौती से निपटने के लिए संदूषित भूजल की समस्या और विशुद्ध जल के सेवन से प्रभावित नागरिकों के उपचार के लिए जागरूकता और जलजनित बीमारियों की रोकथाम के लिए योजनाएं भी चलाई जा रही हैं।

जल शक्ति मंत्रालय के एक दस्तावेज के अनुसार देश की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी को इसका पानी भूजल से मिलता है। दुनिया में उपलब्ध कुल जल में मात्र 0.6 फीसदी जल ही पीने योग्य है। यह पानी समुद्रों नदियों, तालाबों, झीलों और अन्य जल निकायों में मौजूद है। मानव सभ्यता के विकास के साथ हमारे जलस्रोत जबरदस्त प्रदूषण के शिकार हो रहे हैं। इनमें जल प्रदूषण मुख्य कारक है। जल प्रदूषण के कारण विभिन्न जलस्रोतों में जीवन के लिए जहर रूपी खतरनाक रसायनों के मिश्रण का घोल बन रहा है। हमारे देश में शुद्ध जल की प्राप्ति दूभर होती जा रही है। प्रदूषित के बाद संदूषित जल ने हमारे स्वास्थ्य और पाचन तंत्र को बिगाड़ कर रख दिया है। पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय की एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली द्वारा दिये आँकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 4 करोड़ ग्रामीण पीने के लिये धातु-संदूषित जल  का उपयोग करते हैं। जल में पाए जाने वाले प्रमुख भारी धातु फ्लोराइड, आर्सेनिक और नाइट्रेट हैं। आर्सेनिक संदूषण में बंगाल और राजस्थान शीर्ष पर हैं। जल जीवन का आवश्यक तत्व है। वनस्पति से लेकर जीव जन्तु अपने पोषक तत्वों की प्राप्ति जल के माध्यम से करते हैं। जीवन पानी पर निर्भर करता है। मनुष्य एवं प्राणियों के लिए पीने के पानी के स्त्रोत नदियाँ, सरिताएँ, झीलें, नलकूप आदि हैं। मानव पानी का उपयोग स्नान, धुलाई, उद्योग, सिंचाई, नेविगेशन, निर्माण कार्य आदि के लिए करता है यह हम सब जानते है। जल का दूषित होना मनुष्य के स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को  प्रभावित करता है ।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

28 नवंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएं:-

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आज का इतिहास


फर्डिनान्द मैगलन ने 1520 में प्रशांत महासागर को पार करने की शुरुआत की।
लंदन में द रॉयल सोसायटी का 1660 में गठन हुआ।
द टाइम्स ऑफ लंदन को 1814 में पहली बार स्वचालित प्रिंट मशीन से छापा गया।
पनामा ने 1821 में स्पेन से आजाद होने की घोषणा की।
डच सेना ने 1854 में बोर्नियो में चीनी विद्रोह को दबाया।
ब्रिटेन का खोजी वर्ने कैमरून 1875 में पश्चिमी अफ्रीका पहुँचा।
न्यूजीलैंड में राष्ट्रीय चुनाव में 1893 में पहली बार महिलाओं ने मतदान किया।
इस्माइल कादरी ने 1912 में तुर्की से अल्बानिया के आजाद होने की घोषणा की।
अमेरिका में जन्मी लेडी ऐस्टोर 1919 में हाउस ऑफ कऑमर्स की प्रथम महिला सदस्य चुनी गई।
फ्रांस और सोवियत संघ ने 1932 में अनाक्रमण समझौते पर हस्ताक्षर किया।
चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन-लाई 1956 में भारत दौरे पर आये।
मोरीटानिया ने 1960 में औपचारिक रुप से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की।
डोमनिकन रिपब्लिक ने 1966 में संविधान अपनाया।
वेस्टइंडीज के महान गेंदबाज माइकल होल्डिंग ने 1975 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट करियर का आगाज किया। इन्होंने 60 टेस्ट में 249 और 102 वनडे में 142 विकेट झटके।
कैप्टन इन्द्राणी सिंह 1996 में एयरबस ए-300 विमान को कमांड करने वाली पहली महिला बनीं।
28 नवंबर को जन्मे व्यक्ति:—-
प्रसिद्ध भारतीय चिकित्सक प्रमोद करण सेठी का जन्म 1927 में हुआ।
भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार व उपन्यासकार अमर गोस्वामी का जन्म 1945 में हुआ।
28 नवंबर को हुए निधन:—-
भारत के महान् विचारक, समाज सेवी तथा क्रान्तिकारी ज्योतिबा फुले का निधन 1890 में हुआ।
बास्केटबॉल के जनक जेम्स नैस्मिथ का निधन 1939 में हुआ।
महान भैतिकशास्त्री एनरिको फर्मी का निधन 1954 में हुआ।
बंगाल के प्रसिद्ध दृष्टिहीन गायक सी डे का निधन 1962 में हुआ।
हिन्दी के प्रसिद्ध नाटककार तथा सिनेमा कथा लेखक शंकर शेष का निधन 1981 में हुआ।
हिन्दी के प्रमुख उपन्यासकारों में से एक देवनारायण द्विवेदी का निधन 1989 में हुआ।
प्रसिद्ध मराठी फ़िल्म निर्माता-निर्देशक भालजी पेंढारकर का निधन 1994 में हुआ

निशान बचा है, नाम गायब है

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निशान बचा है, नाम गायब है
आलोक पुराणिक
वक्त क्या क्या दिखाता है साहब, एक वक्त के वीआईपी किसी दौर में इस कदर गुमनाम हो जाते हैं कि कोई नाम तक ना जानता।

हुमायूं टोंब के ठीक सामने एक मकबरानुमा भवन है, कोई दफन होंगे इसमें। कौन, नहीं पता।

निजामुद्दीन औलिया के आसपास जो भी दफन है, वह एक लेवल का वीआईपी ही रहा होगा, निजामुद्दीन की दरगाह के पास की जगह अपने अपने वक्तों के वीआईपी लोगों के लिए ही सुरक्षित थी। यूं यह वक्त का हिसाब रहा कि वीआईपी हज्जाम भी जगह पा गये इस इलाके में।

इस इलाके में कई छोटे बड़े मकबरे हैं, जिनमें दफन बंदों का कोई पता नहीं मिलता।

हुजूर आइये कभी घूम लीजिये इस इलाके में, बड़े बड़ों के नाम गायब हैं, काम में अगर दम है, तो वह जरुर आगे चला जाता है। शायरी बहुत लंबे वक्त तक आगे जाती है, शायर के नाम के साथ।

वाक ए दिल्ली की हेरिटेज-लिटरेचर वाक में सिर्फ इतिहास-लिटरेचर नहीं है, कुछ अध्यात्म है, कुछ उदासी है, कुछ बहुत कुछ है।

खैर नाम-निशां पर उस्ताद दाग का एक शेर सुनिये-

कोई नाम-ओ-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना
तख़ल्लुस ‘दाग़’ है वो आशिक़ों के दिल में रहते हैं

दाग़ देहलवी

-कासिद यानी पत्रवाहक

बात और भी हैं, वाक और भी हैं

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भुवनेश्वर में ओडिशा विधान सभा के सदस्यों को संबोधित किया

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उड़ीसा विधान सभा के सदस्यों के बीच राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ( फोटो पीबीआई)

भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने गुरूवार को भुवनेश्वर में ओडिशा विधान सभा के सदस्यों को संबोधित किया।राष्ट्रपति ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि ओडिशा तेज़ी से प्रगति कर रहा है। उन्होंने कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, जनजातीय और अन्य वंचित समूहों के विकास, आवास, आपदा प्रबंधन आदि क्षेत्रों में कई नई पहल करने के लिए ओडिशा सरकार की सराहना की। उन्हें यह जानकर खुशी हुई कि केंद्र और राज्य सरकारों के समन्वित प्रयासों से ओडिशा में औद्योगीकरण की प्रक्रिया एक नया आकार ले रही है।

ओडिशा विधानसभा के सदस्यों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति को पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। उन्होंने कहा कि कई वर्षों के बाद, इस जगह की पुरानी यादें ताज़ा हो गई हैं। एक विधायक के रूप में उन्होंने इस सदन में प्रश्न पूछे थे और एक मंत्री के रूप में उन्होंने विधायकों के प्रश्नों के उत्तर दिए थे।

राष्ट्रपति ने कहा कि ओडिशा ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस भूमि ने चंद्रशोक से धर्मशोक के रूप में परिवर्तन देखा है। उन्होंने आगे कहा कि ओडिशा के आदिवासी समुदायों ने विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष करके देश के लिए एक मिसाल कायम की है।

राष्ट्रपति ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ओडिशा में महिला सशक्तिकरण की एक प्राचीन परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि यह गर्व की बात है कि ओडिशा विधानसभा में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का एक लंबा इतिहास रहा है। आज़ादी से पहले और बाद में, ओडिशा में ऐसी कोई विधानसभा नहीं रही जहाँ महिलाओं का प्रतिनिधित्व न रहा हो। उन्होंने कहा कि ओडिशा की महिलाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करके देश को गौरवान्वित किया है।

राष्ट्रपति ने कहा कि ओडिशा के गठन की शताब्दी 2036 में मनाई जाएगी। यदि सभी हितधारक 2036 तक समृद्ध ओडिशा के निर्माण के लिए मिलकर काम कर सकें, तो यह 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने में ओडिशा का सबसे बड़ा योगदान होगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सभी लोग ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना के साथ काम करेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि विधायक जनता के प्रतिनिधि होते हैं। ओडिशा की जनता को उनसे अपार आशा और विश्वास है और उन्होंने उन्हें एक बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी है। सभी विधायकों का कर्तव्य है कि वे नागरिकों की उम्मीदों पर खरा उतरें, उनके सपनों को साकार करें और उनके चेहरों पर मुस्कान लाएँ।

राष्ट्रपति ने कहा कि प्रकृति ने ओडिशा को हर प्रकार की सम्पदा से नवाज़ा है। यहाँ प्रचुर मात्रा में खनिज भंडार, वन और जल संसाधन के साथ-साथ मानव संसाधन भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। ओडिशा का पर्यावरण कृषि, उद्योग और वाणिज्य के विकास के लिए अत्यंत अनुकूल है। इन सभी लाभों का लाभ उठाकर, ओडिशा को देश का अग्रणी राज्य बनाया जा सकता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि यह तकनीक का युग है। जनप्रतिनिधि होने के नाते, विधायकों के अनेक प्रशंसक और अनुयायी होते हैं। वे यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि वे क्या कहते हैं और क्या करते हैं। उनके शब्द और आचरण, दोनों ही अमूल्य हैं। विधायक सदन के अंदर और बाहर क्या कहते हैं और कैसे कहते हैं, यह सभी जानते हैं। उन्होंने कहा कि उनका आचरण और वचन ऐसे होने चाहिए कि उनका अनुसरण करके उनके प्रशंसक और अनुयायी समाज और राज्य के निर्माण में योगदान दे सकें।इस अवसर पर उन्होंने भुवनेश्वर परिसर स्थित राजभवन परिसर में नवनिर्मिर्त अथिति गृह कलंग अतिथि निवास का भी उदघाटन किया।