सरकार का एकमात्र ध्येय − फॉर्मूला किसानों का कल्याण करना है- शिवराज सिंह

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केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज राज्य सभा में प्रश्न काल के दौरान कहा कि प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में उत्पादन बढ़ाने, लागत घटाने और उत्पादन के ठीक दाम देने के तीन महत्वपूर्ण काम किए गए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार का एक ही ध्येय और फॉर्मूला है और वह है किसानों का कल्याण करना। श्री चौहान ने कहा कि यह गर्व की बात है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में सरकार ने वर्ष 2019 में तय किया कि लागत पर 50% मुनाफा देकर MSP तय की जाएगी, वहीं अब किसानों से तुअर, मसूर व उड़द 100% खरीदी जाएगी, जबकि पिछली सरकार ने कह दिया था कि लागत पर सीधे 50% बढ़ोतरी निर्धारित करने से मंडी में विकृति आ सकती है।

केंद्रीय मंत्री श शिवराज सिंह ने संसद में सवालों के जवाब में कहा कि हम स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह मानते हुए कुल लागत पर 50% मुनाफा देकर एमएसपी पर फसल खरीदी कर रहे हैं और कई फसलों पर तो 50% से ज्यादा दाम भी देने का काम कर रहे हैं। 2014 के पहले इतनी खरीद नहीं होती थी और दलहन-तिलहन की फसल के लिए तो 2014 के पहले नाममात्र की खरीदी होती थी। हमने पीएम आशा योजना भी बनाई है। श्री शिवराज सिंह ने कहा कि कई राज्य सरकार खरीदी में ढिलाई करती है, पूरा नहीं खरीदती है, जिससे किसानों को दिक्कत होती है, वहीं हमने तय किया है कि तुअर, मसूर, उड़द राज्य सरकार अगर कम खरीदेगी या नहीं खरीदेगी तो नैफेड जैसी एजेंसी के माध्यम से सीधे भी हम खरीदने का काम करेंगे, ताकि किसानों को ठीक दाम मिल सके।

श्री शिवराज सिंह ने बताया कि 2004 से 2014 के बीच सभी खरीफ की जो एमएसपी फसलें थी, वो केवल 46 करोड़ 89 लाख मीट्रिक टन खरीदी गई थी, जबकि प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में सरकार ने 81 करोड़ 86 लाख मीट्रिक टन खरीदी की हैं। पिछली सरकार में रबी की फसल 23 करोड़ 2 लाख मीट्रिक टन खरीदी गई थी, वहीं वर्तमान में   सरकार ने 35 करोड़ 40 लाख मीट्रिक टन खरीदी है और अलग-अलग दलहन और तिलहन की खरीदी भी की। पहले तिलहन 47 लाख 75 हजार मीट्रिक टन खरीदी जाती थी पहले, वहीं एनडीए की सरकार ने 1 करोड़ 28 लाख मीट्रिक टन खरीदी है। दलहन 6 लाख मीट्रिक टन 10 साल में खरीदी गई थी, वहीं हमने 1 करोड़ 89 लाख मीट्रिक टन खरीदी है और इस तरह से किसानों को उसके उत्पाद का पूरा दाम देने का हमने प्रयास किया है।

केंद्रीय मंत्री चौहान ने कहा कि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और किसान उसके प्राण, किसानों का कल्याण ही प्रधानमंत्री और सरकार का सर्वोच्च संकल्प है। हमने MSP तय की,  पिछली सरकार के समय 2013-14 में जितनी MSP दी जाती थी, उससे दोगुनी MSP घोषित करने का काम प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में किया गया है। श्री शिवराज सिंह ने उपजवार आंकड़े देते हुए बताया कि पिछली सरकार के समय धान, ज्वार, बाजरा, रागी, तुअर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सूरजमुखी, गेहूं, जौ, चना, सरसों आदि पर बहुत कम दाम दिए जाते थे, जबकि वर्तमान में एमएसपी काफी बढ़ाकर दी जा रही हैं, साथ ही MSP पर खरीद भी बहुत बढ़ाई गई हैं। श्री शिवराज सिंह ने यह भी कहा कि यह श्री नरेंद्र मोदी सरकार है, जो किसान के हितों की चर्चा करती है। MSP फसलें जो पूर्व के 10 साल में खरीदी गई वह थी, 7 लाख 41 हजार करोड़ रुपये की, वहीं हमने 24 लाख 49 हजार करोड़ रु. की खरीद की है।

श्री शिवराज सिंह ने कहा कि पिछले साल कर्नाटक की सरकार ने 2024-25 में तुअर खरीदने की बात की, तो हमने कर्नाटक की सरकार से 100 फीसदी खरीद की बाद कही। उन्होंने 100% नहीं, बल्कि केवल 25% की स्वीकृति की मांग की। तब हमने 25% की स्वीकृति दी, लेकिन उतनी खरीद भी नहीं हो पाई। हमने स्वीकृति दी 3,06,150 MT की और कर्नाटक की सरकार ने खरीदी 2,16,303 MT, जो गारंटी है, उससे भी कम। श्री शिवराज ने कहा कि किसानों का कल्याण करना ही हमारा एकमात्र फॉर्मूला है। किसानों को उत्पाद के ठीक दाम देना हमारा संकल्प है और किसानों के हित में इस संकल्प को हम अवश्य पूरा करेंगे।

योग, डिज़ाइन और डिजिटल लर्निंग के संग केटीएस 4.0 के चौथे दिन बच्चों का उत्साह चरम पर रहा

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काशी तमिल संगमम् 4.0 के चौथे दिन कार्यक्रम की थीम तमिल करकलाम (तमिल सीखें) के अनुरूप नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी), इंडिया द्वारा बच्चों के लिए कई शिक्षाप्रद और रचनात्मक गतिविधियाँ आयोजित की गईं। दिनभर चले इन सत्रों ने बच्चों में स्वास्थ्य जागरूकता, रचनात्मक सोच और डिजिटल सीख को प्रोत्साहित किया।

दिन की शुरुआत प्रशिक्षक आशीष द्वारा आयोजित योग सत्र “चलो, योग करें” से हुई, जिसमें बच्चों ने ऊर्जा, संतुलन और एकाग्रता बढ़ाने वाले विभिन्न योगासन सीखे। इसके बाद “आओ, पुस्तक का कवर डिजाइन करें” प्रतियोगिता ने बच्चों की कल्पनाशक्ति और कला कौशल को मंच दिया। बच्चों ने रंगों और रचनात्मक विचारों से अनोखे पुस्तक कवर बनाकर सबका ध्यान आकर्षित किया।

इसके साथ ही  राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय  का परिचय सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें बच्चों को ई-बुक्स, डिजिटल पठन संसाधन और ऑनलाइन पुस्तकालय के उपयोग की जानकारी दी गई। एनबीटी द्वारा संचालित इन गतिविधियों ने काशी तमिल संगमम् के चौथे दिन को बच्चों के लिए शिक्षाप्रद, मनोरंजक और प्रेरणादायक बना दिया।

भारत-मलेशिया राजस्थान में संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण अभ्यास में भाग लेंगे

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संयुक्त सैन्य अभ्यास “अभ्यास हरिमौ शक्ति-2025” का पांचवां संस्करण आज राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में शुरू हुआ। यह अभ्यास 5 से 18 दिसंबर 2025 तक चलेगा।

भारतीय दल का प्रतिनिधित्व मुख्यतः डोगरा रेजिमेंट की टुकडि़यां कर रही हैं। मलेशियाई पक्ष का प्रतिनिधित्व रॉयल मलेशियाई सेना की 25 वीं बटालियन की टुकडि़यां कर रही हैं।

इस अभ्यास का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र अधिदेश के अध्याय VII के अंतर्गत उप-पारंपरिक अभियानों का संयुक्त रूप से पूर्वाभ्यास करना है। इस अभ्यास का उद्देश्य आतंकवाद-रोधी अभियानों के दौरान संयुक्त प्रतिक्रियाओं का समन्वय करना है। दोनों पक्ष घेराबंदी, खोज और विध्‍वंस अभियानों, हेलीबोर्न अभियानों आदि जैसी सामरिक कार्रवाइयों का अभ्यास करेंगे। इसके अतिरिक्त, आर्मी मार्शल आर्ट्स रूटीन (एमएआप), कॉम्बैट रिफ्लेक्स शूटिंग और योग भी अभ्यास पाठ्यक्रम का हिस्सा होंगे।

हरिमौ शक्ति – 2025 अभ्यास में, दोनों पक्ष आतंकवाद-रोधी अभियानों के दौरान हेलीपैड सुरक्षित करने और हताहतों को निकालने के लिए अभ्यास करेंगे। सामूहिक प्रयासों का उद्देश्य सैनिकों के बीच बेहतर अंतर-संचालन क्षमता प्राप्त करना और शांति वाहक प्रचालनों के दौरान संयुक्त राष्ट्र के हितों और कार्यसूची को सर्वोपरि रखते हुए जान-माल के जोखिम को कम करना है।

दोनों पक्ष युद्ध कौशल के व्यापक क्षेत्र पर विचारों और संयुक्त अभ्यासों के अभ्यासों का आदान-प्रदान करेंगे जिससे प्रतिभागियों को एक-दूसरे से सीखने का अवसर मिलेगा। सर्वोत्तम अभ्यासों को साझा करने से भारतीय सेना और रॉयल मलेशियाई सेना के बीच रक्षा सहयोग का स्तर और बढ़ेगा। यह अभ्यास दोनों देशों के बीच मज़बूत द्विपक्षीय संबंधों को भी बढ़ावा देगा।

भारत और रूस द्विपक्षीय कृषि व्यापार को बढ़ाने, खाद्यान्न और बागवानी निर्यात में नए अवसरों की खोज करने पर सहमत

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केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान नdh 4 दिसंबर, 2 को कृषि भवन में रूसी संघ की कृषि मंत्री सुश्री ओक्साना लुट के साथ द्विपक्षीय बैठक में दोनों पक्षों ने मौजूदा सहयोग पर चर्चा की और भविष्य के सहयोग के क्षेत्रों की रूपरेखा तैयार की।

भारत और रूस द्विपक्षीय कृषि व्यापार को बढ़ाने, खाद्यान्न और बागवानी निर्यात में नए अवसरों की खोज करने पर सहमत

कृषि वस्तुओं का व्यापार बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों ने भारत से खाद्यान्न और बागवानी उत्पादों के निर्यात की संभावनाओं का पता लगाया।

बैठक के दौरान, कृषि अनुसंधान, नवाचार और क्षमता निर्माण में सहयोग को मजबूत करने के लिए आईसीएआर और फेडरल सेंटर फॉर एनिमल हेल्‍थ, रूस के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

श्री चौहान ने रूसी पक्ष को अगले वर्ष भारत द्वारा आयोजित ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के लिए भी आमंत्रित किया।

दोनों देशों ने कृषि व्यापार, उर्वरकों, बीजों, बाज़ार पहुंच और संयुक्त अनुसंधान में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई और नवाचार को बढ़ावा देने तथा दोनों देशों के किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। सुश्री लुट ने कृषि क्षेत्र में व्यापार बढ़ाने और सहयोग मजबूत करने में गहरी रुचि दिखाई।

कृषि मंत्री के अलावा, रूसी प्रतिनिधिमंडल में डिप्‍टी मिनिस्‍टर श्री मैक्सिम मार्कोविच, डिप्‍टी मिनिस्‍टर सुश्री मरीना अफोनिना, एफएसवीपीएस के प्रमुख श्री सर्गेई डंकवर्ट और एशिया प्रभाग की निदेशक श्रीमती डारिया कोरोलेवा शामिल थे।

भारत का प्रतिनिधित्व कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव श्री देवेश चतुर्वेदी, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव श्री एम.एल. जाट और उर्वरक विभाग के सचिव श्री रजत कुमार मिश्र, विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि , कृषि एवं किसान कल्‍याण विभाग के संयुक्त सचिव तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारी कर रहे थे।

बोतलबंद पानी कितना खरा  कितना खोटा

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बाल मुकुन्द ओझा

आजकल बोतल का पानी पीने का रिवाज व्यापक रूप से प्रचलन में है। घर हो या बाहर हर जगह बोतल का पानी सर्व सुलभ है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में हर मिनट बोतल बंद पानी की 10 लाख बोतलें खरीदी जाती हैं। इस पर अनेकों शोध होकर बोतल बंद पानी को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया गया है। प्लास्टिक की पानी की बोतलों के उपयोग पर लगातार चेतावनियों के बावजूद यह कम होने का नाम नहीं ले रही है। Royal Society of Chemistry की एक ताज़ा रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है कि लोग रोज़ पानी, जूस और सॉफ्ट ड्रिंक जैसे चीजें प्लास्टिक बोतलों में पीते हैं। इन बोतलों में किसी भी ड्रिंक को पीना शरीर को नुकसान कर रहा है। लंबे समय तक नैनोप्लास्टिक के संपर्क में रहने पर पेट की सेल्स और आंतों की बाहरी दीवार कमजोर हो रही है, ये कण शरीर के रेड ब्लड सेल्स पर भी अटैक कर रहे हैं। लंबे समय तक संपर्क में रहने से शरीर में सूजन भी हो रही है। इससे पूर्व नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान मोहाली की टीम ने अपने शोध में पाया है कि एक बार इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक की बोतलों से बनें अति-सूक्ष्म प्लास्टिक कण व्यक्ति के शरीर के लिए फायदेमंद सूक्ष्म जीवों और कोशिकाओं को गंभीर हानि पहुंचा सकते है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने पैक्ड मिनरल वाटर को हाई रिस्क फूड की कैटेगरी में शामिल कर दिया है। आजकल यात्रा सहित अन्य मौकों पर प्लास्टिक बोतल का उपयोग आम बात हो गई है। दिसंबर 2024 में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने प्लास्टिक वाटर बोतल और मिनरल वॉटर बोतल को ‘हाई-रिस्क फूड’ की कैटेगरी में शामिल कर दिया है। इसका मतलब यह है कि अब इन इन प्रोडक्ट्स के निर्माण और बिक्री पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी।

हाई-रिस्क फूड श्रेणी में वे खाद्य पदार्थ आते हैं जो आसानी से प्रदूषित हो सकते हैं और स्वास्थ्य के लिए खतरे का कारण बन सकते हैं। इसमें डेयरी उत्पाद, मांस, सीफूड, शिशु आहार, रेडी-टू-ईट फूड्स और अब पैक्ड पानी भी शामिल हैं। एक हालिया अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि पैक्ड पानी में अत्यधिक मात्रा में नैनो-प्लास्टिक पार्टिकल्स पाए जाते हैं। 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार एक लीटर बॉटल्ड पानी में औसतन 2,40,000 प्लास्टिक कण होते हैं, जिनमें से 90 प्रतिशत नैनो-प्लास्टिक होते हैं। यह नैनो-प्लास्टिक इतने छोटे होते हैं कि उन्हें माइक्रोस्कोप से भी नहीं देखा जा सकता। ऐसे में जब आप इस पानी को पीते हैं तो शरीर में प्लास्टिक पहुंचता है और खून में मिलकर गंभीर परिणाम को पैदा कर सकते हैं।

विशेषज्ञों ने को चेतावनी दी है कि प्लास्टिक की बोतलों में पानी पीने से बचें और यदि संभव हो तो ग्लास या स्टेनलेस स्टील की बोतलों का इस्तेमाल करें। लेकिन यदि प्लास्टिक की बोतल का ही चुनाव करना पड़े, तो सुनिश्चित करें कि वह बीपीए-मुक्त हो. इसके अलावा, प्लास्टिक की बोतल को उच्च तापमान से दूर रखें, क्योंकि गर्मी के संपर्क में आने पर बीपीए नामक रसायन पानी में घुल सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए खतरे का कारण बन सकता है।

अमेरिका में हुए नए अध्ययन में सामने आया है कि दुकानों में बिकने वाले बोतलबंद पानी में लाखों छोटे-छोटे प्लास्टिक के कण होते हैं, जो शरीर की कोशिकाओं को प्रभावित कर सकते हैं। शोध में स्पष्ट रूप से  इस पानी को जहरीला बताया। रिपोर्ट में बताया गया है पानी की बोतल में मिलियन की संख्या में छोटे प्लास्टिक के टुकड़े होते हैं जो शरीर के विभिन्न अंगों को हानि पहुंचा सकते हैं। वैज्ञानिकों ने पहली बार दोहरे लेजर का उपयोग करके माइक्रोस्कोप द्वारा पता लगाया है कि बोतलबंद पानी के औसत लीटर में दो मिलियन से अधिक छोटे नैनोप्लास्टिक के अदृश्य टुकड़े होते हैं। कोलंबिया एंड रटगर्स यूनिवर्सिटीज के शोधकर्ताओं पता लगाया है कि तीन कॉमन बोतलबंद वाटर ब्रांड के प्रत्येक के पांच नमूनों को देखते हुए पाया एक लीटर पानी में 110,000 से 400,000 प्लास्टिक के टुकड़े थे, जो औसतन लगभग 240,000 हैं। ऐसे कण हैं जिनका आकार एक माइक्रोन से भी कम है। एक इंच में 25,400 माइक्रोन होते हैं – जिन्हें माइक्रोमीटर भी कहा जाता है क्योंकि यह एक मीटर का दस लाखवां हिस्सा होता है। एक इंसान का बाल लगभग 83 माइक्रोन चौड़ा होता है। अध्ययनों में थोड़े बड़े माइक्रोप्लास्टिक्स पाए गए थे जिनकी रेंज 5 मिलीमीटर से लेकर एक चौथाई इंच से भी कम, एक माइक्रोन तक है। अध्ययन में पाया गया कि बोतलबंद पानी में माइक्रोप्लास्टिक की तुलना में लगभग 10 से 100 गुना अधिक नैनोप्लास्टिक पाए गए।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

जवाबदेही की नई राह : मंत्रियों की कार्य-रिपोर्ट और सदन अध्यक्ष द्वारा समीक्षा 

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लोकतांत्रिक शासन में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और संस्थागत समीक्षा की नई पहल

(मंत्रियों के कार्य-काज की नियमित रिपोर्ट तैयार की जाए।रिपोर्टों की समीक्षा सदन के अध्यक्ष द्वारा की जाए। प्रक्रिया से पारदर्शिता, कार्यक्षमता और जवाबदेही बढ़ेगी। लोकतांत्रिक नियंत्रण और तटस्थ मूल्यांकन को संस्थागत रूप मिलेगा।) 

– डॉ सत्यवान सौरभ

लोकतंत्र की सफलता केवल जनता की भागीदारी पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इससे भी अधिक इस बात पर आधारित होती है कि शासन-तंत्र कितना जवाबदेह, पारदर्शी और परिणामोन्मुख है। भारत जैसे विशाल और बहुस्तरीय लोकतंत्र में यह प्रश्न कई गुना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या मंत्री—जो विभिन्न मंत्रालयों के शीर्ष प्रशासक हैं—अपने विभाग के कार्य, नीतियों और दैनिक प्रशासनिक निर्णयों के प्रति पर्याप्त रूप से उत्तरदायी हैं? समय-समय पर यह चिंता व्यक्त की जाती रही है कि शासन में पारदर्शिता की कमी, जवाबदेही का अभाव और नीतिगत अस्पष्टता जैसी समस्याएँ निर्णय-प्रक्रिया को कमजोर करती हैं।

इन्हीं परिस्थितियों में यह विचार उभरता है कि मंत्रियों के कार्य-काज की नियमित रिपोर्ट तैयार की जाए और उसकी समीक्षा सदन के अध्यक्ष द्वारा की जाए। यह प्रस्ताव मात्र प्रशासनिक सुधार नहीं है; यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में शक्ति-संतुलन, नैतिक जिम्मेदारी और जन-विश्वास को सुदृढ़ करने की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है।

भारत की संवैधानिक संरचना में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण है। कार्यपालिका के रूप में मंत्री शासन-व्यवस्था की धुरी होते हैं, परंतु उनकी जवाबदेही अक्सर केवल चुनावी परिणामों या राजनीतिक आलोचनाओं तक सीमित रह जाती है। यदि इनके दायित्वों और निर्णयों का नियमित आकलन एक संस्थागत प्रक्रिया के अंतर्गत हो, तो शासन न केवल अधिक पारदर्शी होगा बल्कि जनता के प्रति अधिक उत्तरदायी भी बन सकेगा।

मंत्रियों की कार्य-रिपोर्ट तैयार करने का विचार शासन के उस बुनियादी सिद्धांत को मजबूत करता है, जिसमें कार्यपालिका को अपनी प्रत्येक गतिविधि का तर्कसंगत विवरण देना होता है। एक व्यवस्थित रिपोर्ट मंत्री को बाध्य करती है कि वह अपने विभाग की वास्तविक स्थिति, योजनाओं की प्रगति, वित्तीय उपयोग, चुनौतियों और भविष्य के लक्ष्यों को सत्य और स्पष्ट रूप में वर्णित करे। यह दस्तावेज़ किसी राजनीतिक भाषण या प्रचार की तरह नहीं, बल्कि शासन का एक प्रामाणिक रिकॉर्ड बनता है।

यदि इस रिपोर्ट की समीक्षा सदन अध्यक्ष द्वारा की जाती है, तो इसकी विश्वसनीयता और गंभीरता दोनों ही बढ़ जाती हैं। सदन अध्यक्ष भारतीय लोकतंत्र में तटस्थता के सर्वोच्च प्रतीक माने जाते हैं। उनकी भूमिका केवल सदन की कार्यवाही का संचालन करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे विधायी नैतिकता और संसदीय मर्यादाओं के संरक्षक भी होते हैं। उनकी समीक्षा एक निष्पक्ष, संतुलित और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

यह तर्क दिया जा सकता है कि ऐसी प्रणाली मंत्री की स्वतंत्रता को सीमित कर देगी। परंतु यह समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र में किसी भी पद की स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ जुड़ी होती है, उससे अलग नहीं होती। जब एक मंत्री जानता है कि उसके प्रत्येक निर्णय का औपचारिक दस्तावेज़ बनकर समीक्षा के लिए जाएगा, तो वह नीतिगत गंभीरता और प्रशासनिक अनुशासन को और मजबूत रूप से अपनाता है।

इसके साथ ही, एक ऐसी रिपोर्टिंग व्यवस्था शासन में निरंतरता भी सुनिश्चित करती है। मंत्रालयों में मंत्रियों का परिवर्तन सामान्य प्रक्रिया है, परंतु अक्सर नीतियाँ इसी संक्रमण में कमजोर पड़ जाती हैं क्योंकि नई नेतृत्व टीम को पिछली प्रगति की सटीक जानकारी नहीं मिल पाती। नियमित रिपोर्टें इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करती हैं। इससे शासन में न केवल पारदर्शिता बढ़ती है बल्कि नीतिगत निरंतरता और प्रशासनिक स्थिरता भी सुनिश्चित होती है।

दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में ऐसी व्यवस्थाएँ पहले से मौजूद हैं। ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में मंत्रियों की नियमित रिपोर्ट संसद या उसकी समितियों के समक्ष प्रस्तुत की जाती है। यह प्रक्रिया दिखाती है कि जवाबदेही केवल राजनीतिक आलोचना का विषय नहीं है, बल्कि शासन का एक अनिवार्य अंग है। भारत में यदि यह प्रणाली लागू होती है, तो यह वैश्विक मानकों के अनुरूप एक आधुनिक और पारदर्शी प्रशासनिक ढाँचा स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम होगा।

ऐसी रिपोर्टिंग प्रणाली का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष जनता का अधिकार है। भारत में नागरिक बार-बार यह भावना व्यक्त करते हैं कि शासन-तंत्र उनके प्रति पर्याप्त रूप से पारदर्शी नहीं है। योजनाओं की प्रगति, बजट का वास्तविक उपयोग और समय-सीमाएँ अक्सर अस्पष्ट रहती हैं। इस प्रस्ताव के लागू होने से जनता को भी मंत्रालयों के कार्य-काज का प्रामाणिक सार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जा सकता है, जिससे एक स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद स्थापित होगा।

सदन अध्यक्ष द्वारा की गई समीक्षा आलोचना का रूप नहीं होगी; यह सुधारात्मक प्रक्रिया का एक हिस्सा बनेगी। समीक्षा से मिली टिप्पणियाँ मंत्री के लिए दिशानिर्देश बन सकती हैं, जो विभाग की कार्यक्षमता और नीतियों की गुणवत्ता को और ऊँचा उठाने में मदद करेंगी। जब तंत्र निष्पक्ष निगरानी के साथ चलता है, तो लापरवाही और विलंब जैसी समस्याएँ स्वतः ही कम हो जाती हैं।

यह प्रस्ताव शासन की उस बुनियादी धारणा को फिर से स्थापित करता है कि सत्ता का उद्देश्य केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य भी है। मंत्री जब अपने दायित्वों का नियमित लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं, तो वे न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता में योगदान देते हैं, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता को भी मजबूत करते हैं।

निष्कर्षतः, मंत्रियों की कार्य-रिपोर्ट और सदन अध्यक्ष द्वारा उसकी समीक्षा एक ऐसी पहल है जो भारत के लोकतंत्र को अधिक जीवंत, अधिक पारदर्शी और अधिक विश्वसनीय बना सकती है। यह प्रस्ताव शासन के प्रत्येक स्तर को उत्तरदायित्व के नए मानदंडों के तहत लाने की क्षमता रखता है। यह केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति के उन्नयन की दिशा में ऐतिहासिक कदम है।

यदि भारत इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह लोकतंत्र की वास्तविक भावना—जन-उत्तरदायित्व, सच्ची सेवा और पारदर्शी शासन—को और मज़बूत करेगा। ऐसी प्रत्येक पहल लोकतंत्र को सिर्फ़ एक शासन-व्यवस्था नहीं, बल्कि एक जीवंत और मूल्य-आधारित परंपरा बनाती है, जो समय के साथ और भी परिष्कृत होती जाती है।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

भारत के प्रधान मंत्री का राजकीय अतिथि गृह है हैदराबाद हाउस

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रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान जिस ऐतिहासिक भवन में उनका स्वागत और प्रमुख मुलाकातें हो रही हैं, वह है हैदराबाद हाउस-दिल्ली का सबसे भव्य और प्रतिष्ठित राजकीय गेस्ट हाउस। करीब 170 करोड़ रुपये मूल्य आंके जाने वाले इस शाही परिसर का इतिहास उतना ही पुराना है, जितनी इसकी दीवारों पर उकेरी गई वास्तु विरासत। 8.2 एकड़ में फैले इस भवन में कुल 36 विशाल कमरे हैं, जिनमें आज भी शाही ठाठ और भारतीय कूटनीति का अनोखा संगम देखने को मिलता है।

हैदराबाद हाउस एक आधिकारिक निवास है। यह भारत के प्रधान मंत्री का राजकीय अतिथि गृह है। इसका उपयोग भारत सरकार द्वारा भोज के लिए और विदेशी गणमान्य व्यक्तियों के साथ बैठकों के लिए एक स्थल के रूप में किया जाता है। इसे ब्रिटिश वास्तुकार सर एडविन लुटियंस ने हैदराबाद के अंतिम निज़ाम, मीर उस्मान अली खान के निवास के रूप में डिज़ाइन किया था ।

हैदराबाद हाउस का निर्माण हैदराबाद के अंतिम शासक निज़ाम, मीर उस्मान अली खान के लिए किया गया था । यह बड़ौदा हाउस के बगल में स्थित है, जो पूर्व में बड़ौदा के महाराजा का शाही निवास था और वर्तमान में उत्तर रेलवे का क्षेत्रीय मुख्यालय है।

1947 में भारतीय स्वतंत्रता के बाद, महल का उपयोग कभी-कभी निज़ाम द्वारा किया जाता था । 1974 से, हैदराबाद हाउस विदेश मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में है , और इसका उपयोग राजकीय यात्राओं , भोज और विदेशी गणमान्य व्यक्तियों की बैठकों के लिए किया जाता है। यह संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस और प्रमुख सरकारी कार्यक्रमों का स्थल भी रहा है।

हैदराबाद हाउस 8.2 एकड़ में फैला है और तितली के आकार में बना है । महल का प्रवेश द्वार, एक गुंबद जिसके नीचे पचपन डिग्री के कोण पर सममित पंखों वाला एक प्रवेश द्वार है , इसकी विशेषताओं में से एक है। इमारत में 36 कमरे हैं, जिनमें से चार ज़नाना के लिए हैं । हैदराबाद हाउस इंडिया गेट के पास स्थित है।

वायसराय हाउस के अपवाद के साथ , यह 1921-1931 के दौरान एडविन लुटियंस द्वारा दिल्ली में निर्मित सभी शाही महलों में सबसे बड़ा और भव्य था। निज़ाम के बेटों को यह इमारत नापसंद थी, उन्हें यह अपनी पसंद के हिसाब से बहुत पश्चिमी शैली की लगती थी और वे इसका इस्तेमाल शायद ही कभी करते थे।

रजनीकांत शुक्ला

मोदी नेे पुतिन का दिल्ली आने पर किया स्वागत

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रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आज शाम कड़ी सुरक्षा के बीच दो दिवसीय भारत यात्रा पर पहुँचे। चार वर्षों बाद भारत आये रूसी राष्ट्रपति का विशेष विमान जैसे ही हवाई अड्डे पर उतरा वैसे ही यह देखकर पुतिन चौंक गये कि वहां अपने दोस्त का स्वागत करने के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मौजूद थे। दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी भरा आलिंगन इस बात का संकेत था कि वैश्विक राजनीति की तमाम जटिलताओं के बावजूद दिल्ली और मॉस्को के बीच व्यक्तिगत और रणनीतिक भरोसा कायम है।

पुतिन की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब वैश्विक व्यवस्था तेज़ी से बदल रही है, रूस–यूक्रेन संघर्ष अपने महत्वपूर्ण मोड़ पर है और भारत–अमेरिका संबंध नए तनावों से गुजर रहे हैं। ऐसे माहौल में पुतिन का दिल्ली पहुँचना न केवल कूटनीतिक दृष्टि से अहम है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच दशकों पुराने ‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ के नए अध्याय की शुरुआत का संकेत भी देता है।

हम आपको यह भी बता दें कि रूसी राष्ट्रपति के आगमन से पहले ही राष्ट्रीय राजधानी को अभूतपूर्व सुरक्षा घेरों में बदल दिया गया। दिल्ली पुलिस, केंद्रीय एजेंसियों और पुतिन की निजी सुरक्षा टीम ने मिलकर एक बहु-स्तरीय सुरक्षा कवच तैयार किया है। संवेदनशील मार्गों पर स्नाइपर्स, स्वैट टीमें, आतंकवाद रोधी इकाइयाँ और त्वरित प्रतिक्रिया दल तैनात किए गए हैं। 5,000 से अधिक पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है, जबकि ड्रोन-रोधी प्रणाली और उन्नत तकनीकी निगरानी तंत्र भी सक्रिय कर दिए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि “मिनट-टू-मिनट कोऑर्डिनेशन” के साथ पूरी यात्रा पर बारीकी से नज़र रखी जा रही है।

पुतिन 4–5 दिसंबर 2025 को भारत के दो दिवसीय दौरे पर हैं। यह visit विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह भारत‑रूस रणनीतिक साझेदारी की 25वीं वर्षगाँठ के अवसर पर हो रहा है।पिछले चार साल के अंतराल के बाद यह उनका भारत का पहला दौरा है — 2022 में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध और उसके बाद की वैश्विक राजनीतिक चुनौतियों के मद्देनज़र यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है!दौरे का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच परंपरागत रक्षा-ऊर्जा सहयोग के साथ-साथ आर्थिक, व्यापारिक, तकनीकी और मानव संसाधन — यानी कई आयामों में रिश्तों को “अद्यतन” करना है।

जब पुतिन दिल्ली पहुँचे, तो उनका स्वागत निजी और औपचारिक दोनों तरह से किया गया। नरेंद्र मोदी ने खुद हवाई अड्डे पर जाकर पुतिन का अभिवादन किया — हाथ मिलाकर, फिर गले लगाकर, और उसके बाद दोनों एक ही कार में प्रधानमंत्री आवास के लिए चले।यह gesture — पारंपरिक प्रोटोकॉल से हटकर — दर्शाता है कि भारत रूस के साथ रिश्तों को केवल कूटनीतिक या औपचारिक स्तर पर नहीं, बल्कि विश्वास और “दोस्ती” के स्तर पर देख रहा है। इस स्वागत ने इस दौरे को सिर्फ एक औपचारिक छुट्टी-भेट से कहीं ज्यादा बना दिया है — यह संकेत है कि भारत-रूस साझेदारी में “गहराई” चाहता है। साथ ही, इस स्वागत और पब्लिक Optics से यह स्पष्ट होता है कि भारत इस दौरे को पश्चिमी देशों — विशेष रूप से उन देशों से आने वाले दबावों के बीच — अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता और संतुलन दिखाने के अवसर के रूप में देख रहा है।

एजेंडा — क्या विषय चर्चित

दौरे के दौरान जो मुख्य विषय चर्चा के लिए तय हैं, वे काफी व्यापक हैं:

रक्षा-सहयोग: भारत के रक्षा क्षेत्र में रूस पहले से ही मुख्य साझेदार रहा है। इस दौरे में संभव है कि आधुनिक हथियार, वायु रक्षा प्रणाली (जैसे कि S-400), और अन्य रक्षा उपकरणों की खरीद या डिलीवरी-सम्बंधित बातचीत हो।

ऊर्जा और तेल-गैस: रूस और भारत दोनों ऊर्जा जरूरतों, ऊर्जा सुरक्षा, तेल आपूर्ति जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे, खासकर ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार और पश्चिमी प्रतिबंधों (sanctions) के बीच रूस की स्थिति बदल रही है।

आर्थिक और व्यापारिक विस्तार: भारत इस दौरे के माध्यम से रूस के बाजार में अपनी निर्यात (मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि, फार्मा, कंज़्यूमर गुड्स आदि) बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही, रूस में निवेश, उत्पादन-साझेदारी, खाद्य व उर्वरक (fertilizer) क्षेत्र में समझौते हो सकते हैं।

मानव संसाधन एवं श्रम-मार्केट: रूस और भारत के बीच skilled labour mobility, यानी भारतीय कामगारों के रूस में जाने-आने पर संभावनाएँ चर्चा में हैं। यह उन सेक्टर्स को समाहित करता है जहाँ रूस को श्रम की आवश्यकता है, और भारत के युवाओं के लिए अवसर मिल सकते हैं।

तकनीक, ऊर्जा-परमाणु, अंतरिक्ष व अन्य क्षेत्र: दोनों देश — परंपरागत रक्षा-ऊर्जा से आगे — टेक्नोलॉजी, विज्ञान, परमाणु ऊर्जा, space cooperation जैसे नए क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ाना चाहते हैं। यह दीर्घकालीन रणनीति का हिस्सा है।

संभावित नतीजे: अवसर और चुनौतियाँ

इस दौरे से भारत-रूस साझेदारी को कई अवसर मिल सकते हैं:

रक्षा-क्षमता में मजबूती: S-400 जैसे वायु रक्षा सिस्टम, हथियार और तकनीकी सहयोग भारत की रक्षा तैयारियों को सुदृढ़ कर सकते हैं।

ऊर्जा सुरक्षा: discounted Russian oil व गैस की आपूर्ति से भारत अपनी ऊर्जा-जरूरतों का संतुलन बना सकता है, खासतौर से जब वैश्विक तेल-गैस बाजार अस्थिर हो।

व्यापार व निर्यात विस्तार: रूस में भारतीय उत्पादों के लिए बढती मांग, जिससे भारत के export sector में वृद्धि हो सकती है — फार्मा, कृषि, मशीनरी, कंज़्यूमर गुड्स आदि।

रोजगार व श्रमिक अवसर: रूस में भारतीय skilled labour के लिए अवसर, जिससे बाहरी रोज़गार व immigration के रास्ते खुल सकते हैं।

रणनीतिक स्वतंत्रता: भारत पश्चिमी देशों, विशेष रूप से अमेरिका और यूरोप की आलोचनाओं व दबावों के बीच अपनी विदेश नीति को संतुलित रख सकता है — “बहुदलीय (multipolar) दुनिया” की दिशा में यह एक मजबूत संकेत होगा।

लेकिन साथ में चुनौतियाँ और जोखिम भी कम नहीं हैं:

आर्थिक व बाजार अस्थिरता: रूस पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों (sanctions) की वजह से व व्यापार-करण की बाधाओं के कारण कुछ समझौते सफल न हो सकें।

रक्षा-उपकरणों व डिलीवरी में देरी: S-400 या अन्य हथियार प्रणाली की आपूर्ति में बाधाएं आ सकती हैं — जो भारत की रक्षा योजना पर असर डालेंगी।

वैश्विक समीकरणों में जटिलता: स्पेशल रिलेशनशिप के कारण भारत को पश्चिमी देशों से आने वाली आलोचना या दबावों से निपटना पड़ सकता है।

एकतरफ़ा निर्भरता का जोखिम: अगर भारत अपने रक्षा, ऊर्जा या अन्य मामलों में रूस पर अत्याधिक आश्रित हो गया — तो भविष्य में विकल्प सीमित हो सकते हैं।

व्यवहारिक व ground-level follow-through: सिर्फ बड़े घोषणाओं या समझौतों से बात नहीं बनेगी; असली सफलता उनकी समय पर क्रियान्वयन (implementation) में होगी।

पुतिन का दौरा एक अवसर है — पर साथ में चुनौती और जिम्मेदारी भी। इस दौरे में दिखाया गया स्वागत, सार्वजनिक gestures, और high-level बातचीत यह संकेत देते हैं कि भारत रूस के साथ सिर्फ पुराने रिश्तों को जीवित रखना नहीं चाहता, बल्कि उन्हें आधुनिक युग के अनुरूप, विभिन्न क्षेत्रों में विस्तारित करना चाहता है।

मेरी राय में, अगर इस दौरे के दौरान किए जा रहे प्रस्तावों को सही ढंग से लागू किया गया — रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, श्रम व तकनीकी सहयोग में — तो यह भारत-रूस रिश्तों का एक नया अध्याय हो सकता है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि भारत संतुलन बनाए रखे — किसी एक देश या क्षेत्र पर पूरी निर्भरता न हो, और वैश्विक परिस्थितियों व अपने अपने हितों का ध्यान रखते हुए रणनीति चली जाए।

भारतीय नौसेना का तिरुवनंतपुरम के शंगुमुघम समुद्र तट पर नौसेना दिवस 2025 के अवसर पर समुद्री शक्ति का परिचालन प्रदर्शन

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भारतीय नौसेना ने 3 दिसंबर 2025 को तिरुवनंतपुरम के शंगुमुघम समुद्र तट पर एक शानदार ‘परिचालन प्रदर्शन’ के माध्यम से अपनी परिचालन क्षमता और समुद्री क्षमताओं का प्रदर्शन किया। इस विशाल आयोजन ने नौसेना की दुर्जेय युद्ध क्षमताओं, प्रौद्योगिकी उत्कृष्टता और परिचालन तत्परता को जीवंत किया, साथ ही देश की बढ़ती समुद्री शक्ति और आत्मनिर्भरता को भी दर्शाया। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का स्वागत नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने किया। आगमन पर मुख्य अतिथि को 150 जवानों द्वारा औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।

केरल के राज्यपाल श्री राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर तथा केरल के मुख्यमंत्री श्री पिनाराई विजयन सहित अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों, वरिष्ठ केंद्रीय एवं राज्य के सरकारीअधिकाररियों, सैन्य अधिकारियों और बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिकों ने इस कार्यक्रम को देखा।

इस ऑपरेशन डेमो में अग्रिम पंक्ति के प्लेटफार्मों द्वारा समन्वित युद्धाभ्यास का एक रोमांचक प्रदर्शन किया गया, जो नौसेना की समुद्री क्षेत्र में शक्ति और सटीकता प्रदान करने की क्षमता का प्रतीक था। स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत सहित बीस से अधिक नौसैनिक जहाजों और पनडुब्बियों ने एयर असेट्स और इलीट मरीन कमांडो (एमएआरसीओएस) के साथ नौसेना की ताकत और परिचालन उत्कृष्टता का शानदार प्रदर्शन किया।

इसके अतिरिक्त, सी कैडेट कोर द्वारा हॉर्नपाइप नृत्य, सांस्कृतिक कार्यक्रम और नौसैनिक कर्मियों द्वारा तेजी से किए गए क्रमबद्ध ड्रिल ‘कंटीन्यूटी ड्रिल्स’ ने भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस कार्यक्रम का समापन भारतीय नौसेना बैंड द्वारा बीटिंग रिट्रीट और नौसेना के जहाजों की रोशनी के साथ पारंपरिक सूर्यास्त समारोह के साथ हुआ।

नौसेना दिवस भारतीय इतिहास के पन्नों में एक महत्वपूर्ण दिन है, जो 1971 के युद्ध के दौरान ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ में भारतीय नौसेना की निर्णायक भूमिका का स्मरण कराता है । दशकों से भारतीय नौसेना लगातार मजबूत हुई है और देश के समुद्री हितों के लिए उभरती चुनौतियों का सामना करने के लिए निरंतर विकसित होते हुए दृढ़ और मजबूत बनी हुई है। इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए आत्मनिर्भर भारत के मार्गदर्शक विजन के तहत भारतीय नौसेना अपने तेज आधुनिकीकरण की दिशा में बढ़ रही है और एक ‘खरीददार नौसेना’ से एक ‘निर्माता नौसेना’ में पूरी तरह परिवर्तित हो गई है।

ऑप डेमो 2025 ने नौसेना की समुद्री उत्कृष्टता और एक विश्वसनीय बल के रूप में इसकी अटल भूमिका को रेखांकित किया, जो महासागरों में विश्वास प्रेरित करता है, साझेदारी बनाता है और सामूहिक सुरक्षा को बरकरार रखता है। यह एक ऐसी भूमिका है, जो एमएएचएसएजीएआर (क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए आपसी और समग्र उन्नति) के विजन पर आधारित एक स्वतंत्र, खुली और नियम आधारित समुद्री व्यवस्था के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के अनुरूप है।

एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ मेंटेनेंस कमांड ने बेस रिपेयर डिपो तुगलकाबाद का दौरा किया

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एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, मेंटेनेंस कमांड, एयर मार्शल यल्ला उमेश, ने आज 04 दिसंबर 2025 को बेस रिपेयर डिपो, तुगलकाबाद का दौरा किया। उनके साथ क्षेत्रीय वायु सेना परिवार कल्याण संघ की अध्यक्ष श्रीमती श्रीवल्ली भी थीं। वायु सेना स्टेशन तुगलकाबाद के एयर ऑफिसर कमांडिंग, एयर कमोडोर डीएन साहू और एएफएफडब्ल्यूए की स्थानीय अध्यक्ष श्रीमती प्रीति साहू ने उनका स्वागत किया।

एयर मार्शल को गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया। इसके उपरांत उन्हें डिपो के कामकाज, नवोन्मेष, उपलब्धियों और जारी पहल से अवगत कराया गया। एयर मार्शल यल्ला उमेश ने विभिन्न अनुभागों में पहुंचकर परियोजनाओं की समीक्षा की और परिचालन आवश्यकता अनुरूप स्वदेशीकरण और नवीन समाधानों के डिपो के प्रयासों की सराहना की।

स्टेशन कर्मियों के साथ संवाद में एयर मार्शल ने आयात पर निर्भरता कम करने और स्वदेशी क्षमता सुदृढ़ कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने क्षेत्रीय इकाइयों को उन्नत तकनीकी और परिचालन सहायता सुनिश्चित करने में सभी कर्मियों की भागीदारी, समर्पण और पेशेवर रुख की सराहना की।

एयर मार्शल यल्ला उमेश ने तकनीकी कौशल और बेहतर बनाने, सभी भूमिकाओं में दक्षता और उत्कृष्टता के लिए प्रयास जारी रखने की आवश्यकता भी रेखांकित की। एयर मार्शल ने सभी वायु योद्धाओं से शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और चुस्त रहने का आह्वान किया ताकि परिचालन तत्परता और उभरती सुरक्षा चुनौतियों के प्रति सजगता बनी रहे।