श्री वी सोमन्ना ने तिरुपति-साईनगर शिरडी एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई

0

रेल और जल शक्ति राज्यमंत्री वी सोमन्ना ने तिरुपति-साईनगर शिरडी एक्सप्रेस का आज नई दिल्ली स्थित रेल भवन से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हरी झंडी दिखा कर शुभारंभ किया।

तिरुपति-साईनगर शिरडी एक्सप्रेस शुरू किए जाने से कई दूरगामी लाभ होंगे। इससे आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच रेल संपर्क को काफी मजबूती मिलेगी। यह श्रद्धालुओं के लिए आंध्र प्रदेश की दक्षिण तटीय पट्टी से शिरडी के लिए पहली सीधी ट्रेन सेवा है। यह ट्रेन भारत के दो प्रमुख तीर्थ स्थलों, तिरुपति और शिरडी को सीधे जोड़ कर तीर्थयात्रियों की सुविधा बढ़ाएगी। 

इस नई ट्रेन से इसके मार्ग में तीर्थ पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा तथा यह क्षेत्रीय विकास में सहायक होगी। यह यात्रियों को सुरक्षित, आरामदेह और निर्बाध अंतरराज्यीय यात्रा का विकल्प मुहैया कराएगी। इससे तीर्थयात्रियों के समग्र रेल यात्रा अनुभव में वृद्धि होगी। इस साप्ताहिक ट्रेन से तीर्थयात्री निर्बाध यात्रा कर सकेंगे। ट्रेन को एक तरफ की यात्रा पूरी करने में लगभग 30 घंटों का समय लगेगा।

श्री वी सोमन्ना ने तिरुपति-साईनगर शिरडी एक्सप्रेस के शुभारंभ को चार राज्यों के श्रद्धालुओं के लिए एक ऐतिहासिक दिन बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय रेल सिर्फ परिवहन का माध्यम नहीं है। यह देश की जीवन रेखा के रूप में क्षेत्रों और संस्कृतियों को जोड़ती भी है।

रेल और जल शक्ति राज्यमंत्री ने कहा कि अब तिरुपति और शिरडी सीधी ट्रेन सेवा से जुड़ गए हैं। यह ट्रेन नेल्लोर, गुंटूर, सिकंदराबाद, बीदर और मनमाड़ समेत 31 महत्वपूर्ण स्थानों पर रुकेगी। उन्होंने कहा कि इस ट्रेन से तीर्थ पर्यटन और कनेक्टिविटी को बढ़ावा मिलने के साथ ही इसके मार्ग और आसपास के क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिलेगा। उन्होंने बताया कि यह ट्रेन महाराष्ट्र, उत्तर कर्नाटक और सिकंदराबाद से सीधी कनेक्टिविटी मुहैया कराएगी। अपने मार्ग में यह एक महत्वपूर्ण शैव मंदिर परली वैजनाथ को भी जोड़ेगी। 

श्री वी सोमन्ना ने कहा कि आंध्र प्रदेश में 2014 से रेल अवसंरचना में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि 2009 से 2014 तक आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का साझा औसत रेल बजट 886 करोड़ रुपए का था। यह 11 गुना बढ़ कर 2025-26 में 9417 करोड़ रुपए का हो गया। राज्य में 93000 करोड़ रुपए से ज्यादा की परियोजनाओं पर काम जारी है। आंध्र प्रदेश में 2014 से अब तक 1580 किलोमीटर नई रेल पटरियां बिछाई गईं और 100 प्रतिशत विद्युतीकरण पूरा किया गया। राज्य में वर्तमान में 73 अमृत स्टेशन हैं। श्री सोमन्ना ने 800 फ्लाईओवरों और पुलों के निर्माण, 110 लिफ्ट और 40 एस्केलेटर लगाए जाने तथा 16 वंदे भारत (8 जोड़ी) और 6 अमृत भारत (3 जोड़ी) ट्रेन सेवाओं की शुरुआत का भी जिक्र किया।

उन्होंने बताया कि भारतीय रेलवे तिरुपति में तिरुपति अमृत स्टेशन समेत 312 करोड़ रुपए की परियोजनाओं का क्रियान्वयन कर रही है। प्रमुख जारी परियोजनाओं में तिरुपति-पकाला-कटपड़ी मार्ग पर 105 किलोमीटर का दोहरीकरण 1215 करोड़ रुपए के खर्च से किया जा रहा है। कुल 83 किलोमीटर की गुडूर-रेनिगुंटा तीसरी लाइन पर 875 करोड़ रुपए खर्च होंगे। नादिकुड़ी-श्रीकालाहस्ती 310 किलोमीटर नई लाइन पर 5900 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। इसके अलावा, 287 किलोमीटर की विजयवाड़ा-गुडूर तीसरी लाइन पर 6235 करोड़ रुपए और 25 किलोमीटर की येरपेडु-पुडी बाईपास लाइन पर 490 करोड़ रुपए खर्च होंगे। 

आंध्र प्रदेश के सड़क और भवन तथा अवसंरचना और निवेश मंत्री श्री बीसी जनार्दन रेड्डी ने मुख्य अतिथि के तौर पर समारोह में हिस्सा लिया। इसमें उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में तिरुपति के सांसद डॉ मदिला गुरुमूर्ति, विधान परिषद सदस्य श्री बी कल्याण चक्रवर्ती, तिरुपति से विधानसभा सदस्य श्री ए श्रीनिवासुलु तथा तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) बोर्ड के सदस्य श्री भानु प्रकाश रेड्डी भी शामिल थे।

1857 के महानायक: राव तुला राम

0

राव तुला राम (9 दिसम्बर 1825 – 23 सितम्बर 1863) 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख और साहसी नायक थे। हरियाणा के रेवाड़ी जिले के अहीरवाल क्षेत्र के इस राजा ने अंग्रेजों के खिलाफ़ ज़ोरदार विद्रोह का नेतृत्व किया, और उन्हें हरियाणा के एक ‘राज नायक’ के रूप में जाना जाता है। उनका संघर्ष न केवल वीरतापूर्ण था बल्कि उन्होंने स्वतंत्रता की लौ को जलाए रखने के लिए विदेशों से भी मदद लेने का असाधारण प्रयास किया।


प्रारंभिक जीवन और रेवाड़ी का शासन

राव तुला राम का जन्म 9 दिसंबर 1825 को रेवाड़ी के रामपुरा उपनगर में एक प्रतिष्ठित राव परिवार में हुआ था। उनके पिता राव पूरन सिंह थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद, उन्होंने फ़ारसी, उर्दू, हिंदी और थोड़ी अंग्रेजी भी सीखी। युवावस्था में ही, 1839 में अपने पिता के निधन के बाद, उन्होंने रेवाड़ी की जागीर का कार्यभार संभाला। राव तुला राम ने अपनी प्रशासनिक क्षमता का परिचय देते हुए राजस्व विभाग को सुव्यवस्थित किया और रामपुरा को अपना मुख्यालय बनाया। उनका चचेरा भाई राव गोपाल देव उनका प्रमुख सेनापति और विश्वासपात्र था।


🇮🇳 1857 के विद्रोह में भूमिका

मेरठ और अन्य स्थानों पर विद्रोह की खबर सुनते ही, राव तुला राम ने ब्रिटिश विरोधी भावनाओं के साथ तुरंत कार्रवाई की।

  • सत्ता पर कब्ज़ा: 17 मई 1857 को, राव तुला राम ने अपने लगभग 400 से 500 अनुयायियों और राव गोपाल देव के साथ रेवाड़ी की तहसील (सरकारी मुख्यालय) पर धावा बोल दिया और सभी सरकारी इमारतों पर कब्ज़ा कर लिया। उन्होंने ब्रिटिश शासन को हटाकर, स्वयं को रेवाड़ी का राजा घोषित कर दिया।
  • सेना का गठन और संसाधन: राजा बनने के बाद, उन्होंने रेवाड़ी के महाजनों से दान और कर्ज लेकर लगभग 5,000 सैनिकों की एक विशाल सेना तैयार की। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी सेना को मजबूत बनाने के लिए रामपुरा के किले में बंदूकें, हथियार और गोला-बारूद बनाने के लिए एक कार्यशाला भी स्थापित की। यह कदम उनकी दूरदर्शिता और संगठनात्मक कौशल को दर्शाता है।
  • दिल्ली को सहयोग: विद्रोह के दौरान, उन्होंने दिल्ली में अंग्रेजों से लड़ रहे विद्रोही सिपाहियों और अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र को सैन्य बल, धन (लगभग 45,000 रुपये) और युद्ध सामग्री, जिसमें दो हज़ार बोरे गेहूँ भी शामिल थे, भेजकर महत्वपूर्ण सहयोग दिया।

💥 नसीबपुर का भीषण युद्ध

20 सितंबर 1857 को दिल्ली के पतन के बाद, अंग्रेजों ने राव तुला राम के नियंत्रण वाले क्षेत्र को खत्म करने का फैसला किया।

  • रणनीतिक पीछे हटना: ब्रिगेडियर जनरल शोवर्स के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना को राव तुला राम को कुचलने के लिए भेजा गया। राव तुला राम ने यह भांपते हुए कि रामपुरा के मिट्टी के किले में ब्रिटिश तोपखाने का सामना करना मुश्किल होगा, एक रणनीतिक पीछे हटने का फैसला किया और अपनी सेना तथा हथियारों के साथ रामपुरा छोड़ दिया।
  • नारनौल का युद्ध (16 नवंबर 1857): शोवर्स ने आत्मसमर्पण का प्रस्ताव भेजा, जिसे राव तुला राम ने आज़ादी की शर्त के साथ ठुकरा दिया। इसके बाद, कर्नल जेरार्ड के नेतृत्व में एक बड़ी ब्रिटिश सेना भेजी गई। 16 नवंबर 1857 को, नारनौल के पास नसीबपुर के मैदान में, राव तुला राम की सेना और अंग्रेजों के बीच एक भीषण और निर्णायक युद्ध हुआ।
  • वीरता और पराजय: राव तुला राम की सेना ने अतुलनीय वीरता दिखाई और शुरुआती हमले में ब्रिटिश सेना को तितर-बितर कर दिया। इस युद्ध में अंग्रेजी सेनापति कर्नल जेरार्ड मारे गए। हालांकि, अंग्रेजों के पास भारी तोपखाना था। भारतीय सैनिकों ने बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन बेहतर हथियारों और तोपों के सामने उनकी हार हुई। राव तुला राम इस भीषण युद्ध से निकलने में सफल रहे, लेकिन उनके कई श्रेष्ठ सेनापति और सैनिक शहीद हो गए।

🌍 निर्वासित जीवन और अंतिम प्रयास

नसीबपुर की हार के बाद, राव तुला राम निराश नहीं हुए। वह राजस्थान चले गए और लगभग एक साल तक तात्या टोपे की सेना में शामिल होकर अंग्रेजों से लड़ते रहे।

जब 1857 का विद्रोह लगभग कुचला जा चुका था, तो राव तुला राम ने एक असाधारण और साहसी कदम उठाया—उन्होंने भारत को आज़ाद कराने के लिए विदेशी सहायता लेने का निश्चय किया।

  • विदेशी मिशन: वह एक संत या हकीम के भेष में भारत छोड़कर ईरान और अफगानिस्तान पहुँचे। उन्होंने ईरान के शाह और अफगानिस्तान के शासक दोस्त मोहम्मद खान से मुलाकात की। उनकी योजना रूस के ज़ार (ज़ार अलेक्जेंडर द्वितीय) के साथ भी संपर्क स्थापित करने की थी, ताकि भारत से ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य को उखाड़ फेंका जा सके।
  • काबुल में निधन: एक बड़े मिशन की तैयारी के बीच ही, 23 सितंबर 1863 को मात्र 37 वर्ष की आयु में काबुल, अफगानिस्तान में पेचिश (Dysentery) की बीमारी से उनका निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार शाही सम्मान के साथ किया गया।

✨ विरासत

राव तुला राम का जीवन और संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उन्होंने न केवल अपने क्षेत्र को अंग्रेजों से मुक्त कराया बल्कि देश के लिए अंतिम साँस तक बहादुरी से लड़े।

  • राज्य नायक: हरियाणा राज्य में उन्हें एक ‘राज नायक’ का दर्जा प्राप्त है।
  • सम्मान: उनकी स्मृति में, भारत सरकार ने 23 सितंबर 2001 को एक डाक टिकट जारी किया। दिल्ली में एक प्रमुख सड़क मार्ग (राव तुला राम मार्ग) और कई शैक्षणिक व स्वास्थ्य संस्थान उनके नाम पर हैं।
  • शहीदी दिवस: 23 सितंबर को राव तुला राम का शहीदी दिवस हरियाणा में बड़े सम्मान के साथ मनाया जाता है।

राव तुला राम ने अपने साहस, नेतृत्व और देशप्रेम से यह साबित किया कि स्वतंत्रता की इच्छा किसी भी शक्ति से बड़ी होती है। उनका बलिदान आज भी हमें प्रेरणा देता है। (जैमिनी)

रक्षा सहयोग पर भारत-ब्रुनेई संयुक्त कार्य समूह की उद्घाटन बैठक नई दिल्ली में आयोजित

0

रक्षा सहयोग पर भारत-ब्रुनेई संयुक्त कार्य समूह (जेडब्ल्यूजी) की उद्घाटन बैठक 9 दिसंबर, 2025 को नई दिल्ली में हुई। यह बैठक दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय साझेदारी को आगे बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी। जिन प्रमुख क्षेत्रों पर चर्चा हुई उनमें सैन्य आदान-प्रदान और संयुक्त प्रशिक्षण का विस्तार, समुद्री सुरक्षा सहयोग, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत पर विशेष ध्यान, क्षमता निर्माण, रक्षा उद्योग सहयोग और प्रौद्योगिकी सहयोग के अवसर शामिल हैं।

बैठक की सह-अध्यक्षता रक्षा मंत्रालय के संयुक्त सचिव अमिताभ प्रसाद और ब्रुनेई के रक्षा मंत्रालय की उप-स्थायी सचिव सुश्री पोह कुई चून ने की। बैठक से पहले, सह-अध्यक्षों ने रक्षा सहयोग पर संयुक्त कार्य समूह की स्थापना हेतु विचारार्थ विषयों (टीओआर) पर हस्ताक्षर किए।

विचारार्थ-विषयों पर हस्ताक्षर से द्विपक्षीय रक्षा सहयोग के एक नए युग की शुरुआत हुई। संयुक्त कार्य समूह (जेडब्‍ल्‍यूजी) मौजूदा रक्षा संबंधों की समीक्षा और सहयोग के नए रास्ते तलाशने के लिए एक रचनात्मक मंच के रूप में कार्य करता है।

दोनों पक्षों ने रक्षा साझेदारी में बढ़ती गति का स्वागत किया। संयुक्त कार्य समूह व्‍यवस्‍था के अंतर्गत सहयोग के लिए एक सुनियोजित रूपरेखा लागू करने पर सहमति व्यक्त की। उन्होंने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी साझा प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि की।अपने दो-दिवसीय दौरे के दौरान, उप-स्थायी सचिव ने नई दिल्ली में रक्षा सचिव श राजेश कुमार सिंह से भी मुलाकात की।

सुश्री पोह कुई चून ने डीपीएसयू भवन का भी दौरा किया। यह एक नई, अत्याधुनिक सुविधा है जिसका हाल ही में रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में उद्घाटन किया था। यह सभी 16 रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के लिए एक महत्‍वपूर्ण केंद्र है, जिसका उद्देश्य सहयोग, नवाचार को बढ़ावा देना तथा विश्व के समक्ष देश की रक्षा विनिर्माण क्षमताओं को प्रदर्शित करना है।

आज़ाद हिन्द फ़ौज के जनरल शाहनवाज़ खान : जिन्हें भूल गया वतन

0

आज़ादी के इतिहास में अनेक वीरों ने अपने साहस, समर्पण और त्याग से देश को पराधीनता की जंजीरों से मुक्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं में एक नाम है शाहनवाज़ ख़ान, जो नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में गठित आज़ाद हिंद फ़ौज के अग्रणी अधिकारियों में से थे। उनका संघर्ष केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्वतंत्र भारत के निर्माण में भी उन्होंने अपना योगदान दिया। शाहनवाज़ ख़ान का जीवन देशभक्ति, राष्ट्रनिष्ठा और अनुशासन का प्रेरणादायक उदाहरण है।

शाहनवाज़ ख़ान का जन्म 24 जनवरी 1914इरोहतक ज़िले के मटिंढु नगर में एक साधारण परिवार में हुआ। बचपन से ही उनमें साहस और नेतृत्व क्षमता के गुण देखे गए। युवावस्था में उन्होंने सेना में भर्ती होकर अपना जीवन राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित किया। सेना में रहते हुए उनकी प्रतिभा और लगन ने उन्हें उच्च पदों तक पहुँचाया, परंतु उनके जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण मोड़ वह था जब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान वे जापानी सेना के हाथों बंदी बनाए गए।

जापानी सेना के बंदी शिविर में रहकर शाहनवाज़ ख़ान के जीवन में एक बड़ा परिवर्तन आया। वहीं से उनका परिचय नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विचारों से हुआ। नेताजी के ओजस्वी व्यक्तित्व और राष्ट्र के प्रति उनकी दृष्टि ने शाहनवाज़ ख़ान को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करने का संकल्प लिया और नेताजी द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हो गए। यह निर्णय उनके जीवन की सबसे निर्णायक और गौरवपूर्ण घटना थी।

आज़ाद हिंद फ़ौज में शाहनवाज़ ख़ान को एक महत्वपूर्ण पद दिया गया। वे उन चुनिंदा अधिकारियों में थे जिन्हें नेताजी का विशेष विश्वास प्राप्त था। फ़ौज के गठन, प्रशिक्षण और रणयोजना के संचालन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। वे न केवल एक दक्ष सैनिक थे, बल्कि अनुशासनप्रिय और प्रेरणादायी सेनानी भी थे। उनके नेतृत्व में सैनिकों में उत्साह और धैर्य बना रहता था।

इम्फ़ाल और कोहिमा की लड़ाइयों में शाहनवाज़ ख़ान ने गहरी वीरता का परिचय दिया। इन मोर्चों पर आज़ाद हिंद फ़ौज ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी अंग्रेज़ी हुकूमत के दाँत खट्टे कर दिए। शाहनवाज़ ख़ान और उनके साथी सैनिकों ने अपना सर्वस्व राष्ट्र पर न्यौछावर कर दिया। हालांकि अंततः संसाधनों की कमी और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण फ़ौज को पीछे हटना पड़ा, लेकिन इन लड़ाइयों ने देश में आज़ादी की लहर को मजबूत किया।

युद्ध समाप्त होने के बाद शाहनवाज़ ख़ान और अन्य अधिकारियों को अंग्रेज़ी सरकार ने बंदी बनाकर देशद्रोह के आरोप में दिल्ली के लालकिले में मुक़दमे का सामना करना पड़ा। यह मुक़दमा स्वतंत्रता आंदोलन का नया मोड़ था। लालकिला मुक़दमे ने पूरे देश में जबर्दस्त जनविरोध खड़ा कर दिया। शाहनवाज़ ख़ान के पक्ष में देशभर के नेताओं और जनता ने आवाज़ उठाई। यह मुक़दमा अंग्रेज़ी शासन की नैतिक हार साबित हुआ और अंततः सरकार को सभी आरोप वापस लेने पड़े।

मुक़दमे से मुक्त होने के बाद शाहनवाज़ ख़ान ने स्वतंत्र भारत में सक्रिय भूमिका निभाई। वे लोकसभा सदस्य चुने गए और देश की विकास यात्रा में सहभागी बने। उन्होंने रेल मंत्रालय में जिम्मेदार दायित्व संभाले और राष्ट्रहित से जुड़े अनेक कार्यों को आगे बढ़ाया। राष्ट्र के प्रति उनकी निष्ठा, ईमानदारी और अनुभव ने उन्हें सम्मानित स्थान दिलाया।

शाहनवाज़ ख़ान के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी उनकी उदारता और मानवता। वे सभी धर्मों और वर्गों को साथ लेकर चलने के पक्षधर थे। नेताजी के मार्गदर्शन से उन्होंने यह सिद्धांत आत्मसात कर लिया था कि भारत की शक्ति उसकी विविधता और एकता में निहित है। वे हमेशा कहते थे कि आज़ादी केवल विदेशी शासन से मुक्ति का नाम नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक के सम्मान और अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

आज़ाद हिंद फ़ौज के अन्य अधिकारियों की तरह शाहनवाज़ ख़ान को भी जीवनभर नेताजी बोस के प्रति गहरा सम्मान और श्रद्धा रही। वे अक्सर कहा करते थे कि नेताजी की दूरदृष्टि और देशप्रेम ही वह शक्ति थी जिसने लाखों भारतीयों को अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध खड़ा कर दिया। शाहनवाज़ ख़ान ने नेताजी के सपनों के भारत को बनाने में योगदान देते हुए अपनी ज़िंदगी का हर पल राष्ट्रसेवा के नाम कर दिया।

उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चे सेनानी न केवल युद्धभूमि में लड़ते हैं, बल्कि समाज के निर्माण में भी योगदान देते हैं। शाहनवाज़ ख़ान ने स्वतंत्रता आंदोलन की अग्निपरीक्षा के बाद लोकतांत्रिक भारत में विकास और प्रगति की राह चुनी। यह उनके व्यक्तित्व की व्यापकता और जिम्मेदारी का प्रतीक है।

स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में शाहनवाज़ ख़ान का नाम सदैव सम्मान से लिया जाएगा। आज़ाद हिंद फ़ौज में उनका योगदान, लालकिला मुक़दमे में उनकी भूमिका और स्वतंत्र भारत में उनकी सक्रियता उन्हें एक अद्वितीय स्थान प्रदान करती है। वे उन सेनानियों में से थे जिन्होंने अपने कर्म, त्याग और चरित्र से राष्ट्र का गौरव बढ़ाया। आज के दिन 9 दिसंबर 1983
को नई दिल्ली में उनका निधन हुआ।शाहनवाज़ ख़ान की जीवन यात्रा हमें यह संदेश देती है कि सच्चा राष्ट्रभक्त वही है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो। उन्होंने हर परिस्थिति में देश को सर्वोपरि रखा और अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वाह किया। आज़ादी की लड़ाई में उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा।

स्वाधीनता के इतिहास में कुछ रिश्ते केवल नेता और सैनिक के नहीं होते, बल्कि वे विश्वास, आदर्शों और राष्ट्रभक्ति के अद्भुत संगम बन जाते हैं। ऐसा ही दिव्य संबंध था करनल शाहनवाज़ खान और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के बीच। एक ओर नेताजी का अदम्य साहस और भारत को मुक्त देखने की दृढ़ इच्छा, वहीं दूसरी ओर शाहनवाज़ राणा का सैन्य कौशल, अनुशासन और समर्पण—दोनों ने मिलकर आज़ाद हिंद फ़ौज के ऐतिहासिक अध्याय को स्वर्णिम बना दिया।

बंदी शिविर में नेताजी के विचारों से प्रभावित होकर शाहनवाज़ खान ने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का निश्चय किया। जब नेताजी ने आज़ाद हिंद फ़ौज की पुनर्स्थापना की, शाहनवाज़ राणा उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल हुए जिन्हें नेताजी ने अपना अत्यंत विश्वस्त साथी माना। नेताजी उन्हें न केवल एक कुशल सेनाधिकारी मानते थे, बल्कि एक ऐसे नेतृत्वकर्ता के रूप में देखते थे जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मनोबल बनाए रख सके।

नेताजी और शाहनवाज़ खान के संबंध का आधार केवल सैन्य संबंध नहीं था; वह एक दूसरे के चरित्र, निष्ठा और देशप्रेम का गहरा सम्मान था। नेताजी अक्सर कहा करते थे कि सच्ची फ़ौज वही है जिसमें सैनिक अपने सेनापति के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए जान देता हो। शाहनवाज़ राणा इस आदर्श का जीता-जागता उदाहरण थे। नेताजी को जब किसी विशेष अभियान या संवेदनशील मोर्चे पर भरोसेमंद अधिकारी भेजना होता, तो वे प्रायः शाहनवाज़ राणा को चुनते थे।

इम्फ़ाल और कोहिमा की लड़ाइयों में शाहनवाज़ राणा ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। नेताजी स्वयं उनके साहस और रणनीति से प्रभावित थे। कई ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि नेताजी उन्हें अपने शीर्ष तीन अधिकारियों में गिनते थे। इस भरोसे का ही परिणाम था कि महत्वपूर्ण सैन्य योजनाओं की ज़िम्मेदारी शाहनवाज़ राणा को दी जाती। वे सैनिकों को कठिन समय में धैर्य, अनुशासन और उद्देश्य की याद दिलाते—जिससे आज़ाद हिंद फ़ौज की लड़ाई केवल लड़ाई नहीं, बल्कि भारतीय आत्मसम्मान का प्रतीक बन गई।

युद्ध के बाद जब अंग्रेज़ी शासन ने आज़ाद हिंद फ़ौज के अधिकारियों पर मुक़दमा चलाया, उस समय भी नेताजी की अनुपस्थिति में शाहनवाज़ खान फ़ौज की प्रतिष्ठा के प्रतीक बन गए। लालकिला मुक़दमे में उनकी निष्ठा और बोलने का अंदाज़ ऐसा था कि पूरे देश में उनके प्रति सम्मान और नेताजी के प्रति श्रद्धा और बढ़ गई। यह मुक़दमा अंग्रेज़ी शासन की नैतिक पराजय का कारण बना और शाहनवाज़ राणा इस संघर्ष के केंद्रीय चेहरे बनकर उभरे।

स्वतंत्रता के बाद भी शाहनवाज़ खान ने नेताजी के आदर्शों को अपने जीवन में जीवित रखा। लोकतांत्रिक भारत में उन्होंने देश की सेवा राजनीतिक और सामाजिक दोनों क्षेत्रों में जारी रखी। वे हमेशा कहा करते थे कि नेताजी ने हमें सिखाया कि भारत की असली शक्ति उसकी एकता, विविधता और परस्पर सम्मान में छिपी है। यही कारण है कि वे समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने के समर्थक रहे।

नेताजी और शाहनवाज़ राणा का संबंध भारतीय इतिहास में अनोखा स्थान रखता है। यह संबंध सैनिक और सेनापति का तो था ही, साथ ही दो राष्ट्रभक्तों का भी था, जो भारत को स्वतंत्र देखने के लिए समान रूप से समर्पित थे। नेताजी का नेतृत्व जहां प्रेरणादायक था, वहीं शाहनवाज़ राणा की प्रतिबद्धता उस नेतृत्व को शक्ति प्रदान करती थी। दोनों का यह समन्वय आज़ाद हिंद फ़ौज की रीढ़ था।

शाहनवाज़ राणा ने अपनी संपूर्ण जीवनयात्रा में यह सिद्ध किया कि सच्चे सेनानी युद्ध की समाप्ति के बाद भी देश की सेवा से नहीं रुकते। वे नेताजी के सपनों के भारत को साकार करने में अंतिम सांस तक जुटे रहे। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि त्याग और अनुशासन से जुड़ी राष्ट्रसेवा किसी युग या परिस्थिति पर निर्भर नहीं करती।

भारत नई दिल्ली में पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरे विश्व स्वास्थ्य संगठन वैश्विक शिखर सम्मेलन की सह-मेजबानी करेगा

0

भारत, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्‍ल्‍यूएचओ) के सहयोग से, 17 से 19 दिसंबर 2025 तक नई दिल्ली में पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरे विश्व स्वास्थ्य संगठन वैश्विक शिखर सम्मेलन की सह-मेजबानी करेगा । चिकित्‍सा क्षेत्र के वैश्विक दिग्‍गज, नीति निर्माता, शोधकर्ता और विशेषज्ञ पारंपरिक चिकित्सा में नवाचार, साक्ष्य-आधारित अभ्यास और भविष्य की रणनीतियों पर विचार-विमर्श के लिए इस शिखर सम्‍मेलन में एक साथ भाग लेंगे।

आयुष मंत्रालय ने 8 दिसंबर 2025 को केंद्रीय आयुष मंत्री प्रतापराव जाधव की अध्‍यक्षता में एक पूर्वावलोकन कार्यक्रम का आयोजन किया था। श्री प्रतापराव जाधव ने अपने संबोधन में पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में भारत के बढ़ते नेतृत्व और वैज्ञानिक विश्वसनीयता तथा वैश्विक सहयोग को बढ़ाने में राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों की बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डाला।

दिल्‍ली में सीसीआरएएस का केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्‍थान आयुर्वेदिक अनुसंधान और नैदानिक ​​प्रगति का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है। संस्थान के प्रभारी निदेशक डॉ. हेमंत पाणिग्रही ने बताया कि सीएआरआई के एकीकृत नैदानिक, मौलिक और नीतिगत अनुसंधान ने जीवनशैली से जुडे और गैर-संचारी रोगों के समाधान में उल्लेखनीय वृद्धि की है। उन्होंने कहा कि संस्थान के विशेष क्लीनिक, चल रहे शोध अध्ययन और व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम, साक्ष्य-आधारित पारंपरिक स्वास्थ्य सेवा की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन वैश्विक शिखर सम्मेलन में मंत्रिस्तरीय चर्चाएं, वैज्ञानिक पैनल, प्रदर्शनियां और वैश्विक ज्ञान-साझाकरण सत्र शामिल होंगे, जिनका उद्देश्य विश्‍व भर में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों को पारंपरिक चिकित्सा के साथ एकीकृत करना है।

नौसेना प्रमुख ब्राज़ील की यात्रा पर रवाना

0

भारतीय नौसेना प्रमुख (सीएनएस) एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी आज से 12 दिसंबर तक ब्राजील की आधिकारिक यात्रा पर रवाना हो गए हैं।

इस यात्रा का उद्देश्य भारतीय नौसेना और ब्राजील की नौसेना के बीच मजबूत और बढ़ती समुद्री साझेदारी को सुदृढ़ करना है। यह भारत-ब्राजील व्यापक सामरिक साझेदारी का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

नौसेना प्रमुख इस यात्रा के दौरान, ब्राज़ील के वरिष्ठ नेतृत्व ब्राज़ील के रक्षा मंत्री जोस मुसियो, ब्राज़ील सशस्त्र बलों के संयुक्त स्टाफ प्रमुख एडमिरल रेनाटो रोड्रिग्स डी अगुइर फ़्रेयर और ब्राज़ील के नौसेना कमांडर एडमिरल मार्कोस सम्पायो ओलसेन के साथ विचार-विमर्श करेंगे। विचार-विमर्श वर्तमान द्विपक्षीय समुद्री सहयोग की समीक्षा करने, परिचालन-स्तरीय सम्‍बंधों को बढ़ाने और दोनों नौसेनाओं के बीच सहयोग के नए रास्ते तलाशने का अवसर प्रदान करेगा।इस यात्रा में परिचालन कमांडों के साथ बैठकें, नौसैनिक अड्डों और ब्राजील की नौसेना के शिपयार्डों का दौरा शामिल है।

बातचीत के दौरान साझा समुद्री प्राथमिकताओंनौसैनिक अंतर-संचालन, क्षमता निर्माण और व्यापक दक्षिण-दक्षिण सहयोग सहित बहुपक्षीय ढांचे के भीतर सहयोग पर ध्‍यान केंद्रित किया जाएगा।

नौसेना प्रमुख की यह यात्रा, समुद्री सुरक्षा, व्यावसायिक आदान-प्रदान और क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में ब्राजील की नौसेना के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए भारतीय नौसेना की प्रतिबद्धता की पुष्टि करती है। इससे वैश्विक समुद्री क्षेत्र में स्थिरता लाने में योगदान मिलेगा।

एक उपेक्षित उपन्यासकार कुशवाह कांत

0

के. विक्रम राव

पिछली सदी में एक साहित्यसेवी हुये थे। नाम था ”कान्त”। कुशवाहा कान्त। पाठक उनके असंख्य थे। सभी उम्र के। आज 9 दिसम्बर को उनकी 107वीं जयंती पड़ी है। विस्मृत रही। 29 फरवरी 2025 को उनकी जघन्य हत्या की 73वीं बरसी थी। भरी जवानी में वे चन्द प्रतिद्वंदियों की इर्ष्या के शिकार हुये थें, वाराणसी के कबीर चौरा में। इतने सालों बाद भी उनके तक हत्यारे दंडित नहीं हुये।

मगर कुशवाहा कान्त ने शोहरत और दौलत खूब अर्जित की। चौंतीस वर्षों तक लिखा। खूब धारधार, धाराप्रवाह, अद्भुत लायकियत से भरी। रसास्वाद करते पाठक की लार टपकती थी। शब्द चयन की स्टाइल ही ऐसी थी। उस काल में बीए क्लास से ही शब्दकोश का इस्तेमाल शुरु किया जाता था। कुशवाहा कान्त के आने के बाद इन्टरमीडिएट छात्र भी डिक्शनरी तलाशने लगे थे। मसलन रान, जंघा, स्तन आदि शब्द तो आम थे, बोलचाल के थे। मगर उरोज, नितम्ब को व्यापक बनाया कान्त ने ही। संस्कृतनिष्ट भाषा थीं। अत: छात्र स्वत: द्विभाषी हो गये। उस दौर की आचार संहिता उदार और विशाल—हृदय की नहीं होती थी। युवावर्ग संयम, मर्यादा और आचरण को मानता था।

कुशवाहा कान्त की किताब हाथ में ”कोई देख लेगा” के खौफ से छात्र अतंकित रहता था। कान्त का भाषा-भंडार, भावभरी उक्तियां पिरोने की शैली, खासकर गुदगुदाने वाले रसिया प्रसंग। मानो हाथों को उंगलियों के पोर पर कोई सुखद खुजली, मीठी चुभन सर्जा रहा हो। आयु का दौर से तादाम्य होता है। अत: कुशवाहा कान्त के युग की उस अनुभूति को तरल तारुण्य तक संदेशित करने में लेखक की अगाध अर्हता दिखती थी।
कान्त की समानान्तरता का जिक्र हो तो उपन्यासकार ओस्कर वाइल्ड से की जा सकती है, जो समलैंगिकता के जुर्म (उन्नीसवीं सदी के कठोर कानून के तहत) में कई बार लंदन जेल में रहे। कुशवाहा कान्त का अपराध ऐसा हेय नहीं रहा। कान्त की अपनी शब्दशक्ति रही। व्यंजना, अभिधा तथा लक्षणा वाली। रसमर्मज्ञ की। इन्द्रियासक्त भी। उनकी अभिव्यक्ति नाट्यसम्राट पृथ्वीराज के पुत्र शम्मी कपूर के अभिनय जैसा उभारने वाला, डुलानेवाला रहता था। पच्चीस (गधेपन के) के गबरू युवा उनकी रचना का लक्ष्य रहता था। याद आया। तब हम लोग हिचक कर डीडीके कहते थे। फिल्म का शीर्षक था। ”दिल देके देखो।” इतने सतर्क रहते थे।
गमनीय बिन्दु था कि उनका उपन्यास छपते ही ”आउट आफ स्टाक” हो जाता था। फिर छपता ही रहता था। रेलवे बुक स्टाल पर। फुटपाथ पर बिछी दुकानों में, कालेजों के पास खासकर।

कुशवाहा कान्त की हर नूतन रचना की प्रतीक्षा रहती थी। बेताबी से, आतुरता से, बेकरारी से, उत्कण्ठा और अधीरता से। ये सारे उच्चरित भाव उनके चाहने वालों द्वारा प्रयुक्त होते रहे।

एक विशिष्टता दिखती थी उनकी किताब के खरीददारों में। सभी लुके, छिपे, ढककर ले जाते थे। साझा करके पढ़ते थे। क्योंकि अनुशीलन की परिभाषा तब ऐसी ही थी। ”तेरा मुण्डा बिगड़ा जाये” वाला अभियोग लगने का भय था। कान्त के प्रकाशन संस्थान का नाम था ”चिनगारी”। मगर पाठक उसे ज्वाला मानते थे। उनकी कृतियों के शीर्षक भी अर्थपूर्ण होते थे। लाल रेखा, जलन, आहुति, परदेसी, पपीहरा, नागिन, मदभरे नैयना, अकेला, लवंग, निर्मोही वगैरह।

हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी पढ़ने की ललक बढ़ी थी जिसका कारण भी काफी हद तक कुशवाहा कान्त ही रहें। उनकी चन्द अनुवादित रचनाओं के खालीपन से प्यासे रहकर, लोग मूल रचना पढ़ना चाह रहे थे। नागरी लिपि सीख ली। उद्दीपन और रोमांच की झूठन रुचिकर नहीं हो सकती। अनुवाद मतलब टेलिफोन पर बोसा! ईसाई किताबों में निषेध की ऐसी भावना सर्जी होगी जब आदम और हव्वा ने बाइबिल में वर्णित (ज्ञान का) फल चख लिया था। दोनों की अबोधता तब नष्ट हो गई। मगर रैक्व ऋषि की भांति हम सभी युवा अनभिज्ञ ही रहते थे। छकड़ा गाड़ी के तले।

उस कालावधि के छात्र भी अल्पज्ञानी होते थे। सैक्स इतना मुखरित नहीं था। वर्जनायें बहुत थी। मुझे स्मरण है कि लखनऊ विश्वविद्यालय के बीए प्रथम वर्ष का क्लासरुम। संस्कृत साहित्य विषय था। पण्डित (डाक्टर) आरसी शुक्ल महाकवि कालीदास की अभिज्ञान शाकुंतल पढ़ाते थे। कवि की कल्पना तो वल्लाह वाह थी। श्रृंगार में तो यूं भी कालीदास बेजोड़ हैं। एकदा क्लास में एक संदर्भ आया। कण्व के आश्रम में विश्वामित्रपुत्री शकुंतला अपनी सखा प्रियंवदा से शिकायत करती है कि उसकी कंचुकि संकुचित हो (स्रिंक) हो गयी है। तो सखा बताती है कि : ”तुम बड़ी हो रही हो। उरोज फूल रहे है।”

इन पंक्तियों पर डा. शुक्ल कहते थे कि ”घर पर पढ़ लेना”। छात्रायें अगली पंक्ति पर विराजे भावार्थ समझ लेती थीं। तो ऐसा युग था हमारा। लज्जा ही पुरुषों का गुण होता था। युवती के नखशिख का क्लास में वर्णन अश्लील समझा जाता था। इतना कठोर, कटु संयम होता था। सब छात्र ”भइया” (राखी के लायक) और छात्रायें ”बहने” (स्नेहिल) होतीं थीं।

उस दौर में कुशवाहा कान्त एक आगेदेखू (लोहिया के शब्दों में) क्रान्तिकारी, अग्रगामी, प्रगतिवादी, उपन्यासकार माने जाते थे। हमारे समय जेनयू नहीं बना था। मगर सुनने में आया है कि जेनयू में प्रगतिवादिता का पहला सोपान होता है कि छात्र सिखाते है छात्राओं को कि ”ब्रा” पहनना नारी दासता का प्रतीक है। यह बेड़ी है। तोड़ो इसे, हटाओं। आज भारत कितना विकास कर चुका है?

फिर भी कुशवाहा कान्त को हिन्दी साहित्य में उनका छीना गया स्थान मिलना चाहिये। हिन्दी विश्वभाषा है। दकियानूसीपन की जंजीरों में जकड़ी नहीं रह सकती। अब और अवरुद्ध नहीं की जा सकती है।

के विक्रम राव

देश− दुनिया के बड़े पत्रकार आदरणीय स्वर्गीय के विक्रम राव साहब ने कभी बहुत पहले ये लेख लिखा था।आज उनके जन्मदिन पर ये लेख याद आ गया।

राष्ट्रपति ने वर्ष 2023 और 2024 के लिए राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार प्रदान किए

0

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने नई दिल्ली में वर्ष 2023 और 2024 के लिए राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार प्रदान किए।राष्ट्रपति ने इस अवसर पर कहा कि कला हमारे अतीत की स्मृतियों, वर्तमान के अनुभवों और भविष्य की आकांक्षाओं को प्रतिबिम्बित करती है। प्राचीन काल से ही मनुष्य चित्रकला या मूर्तिकला के माध्यम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करता रहा है। कला लोगों को संस्कृति से जोड़ती है। कला लोगों को एक-दूसरे से भी जोड़ती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि हमारी सदियों पुरानी हस्तशिल्प परंपरा के जीवंत और संरक्षित रहने का श्रेय, पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे कारीगरों की प्रतिबद्धता को जाता है। हमारे कारीगरों ने अपनी कला और परंपरा को समय के साथ ढाला है और साथ ही मूल भावना को भी जीवित रखा है। उन्होंने अपनी प्रत्येक कलात्मक रचना में देश की मिट्टी की खुशबू को संजोकर रखा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि हस्तशिल्प न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं, बल्कि आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं। यह क्षेत्र देश में 32 लाख से ज़्यादा लोगों को रोज़गार देता है। उल्लेखनीय है कि हस्तशिल्प से रोज़गार और आय प्राप्त करने वाले ज़्यादातर लोग ग्रामीण या दूरदराज के इलाकों में रहते हैं। यह क्षेत्र रोज़गार और आय का विकेंद्रीकरण करके समावेशी विकास को बढ़ावा देता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि सामाजिक सशक्तिकरण के लिए हस्तशिल्प को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र पारंपरिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लोगों को सहायता प्रदान करता रहा है। हस्तशिल्प न केवल कारीगरों को आजीविका का साधन प्रदान करता है, बल्कि उनकी कला उन्हें समाज में पहचान और सम्मान भी दिलाती है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में कार्यरत कार्यबल में 68 प्रतिशत महिलाओं की हिस्‍सेदारी है और इस क्षेत्र के विकास से महिला सशक्तिकरण को भी बल मिलेगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि हस्तशिल्प उद्योग की सबसे बड़ी ताकत प्राकृतिक और स्थानीय संसाधनों पर इसकी निर्भरता है। यह उद्योग पर्यावरण के अनुकूल है और इसमें कार्बन उत्सर्जन कम होता है। आज, दुनिया भर में पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ जीवनशैली की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है। ऐसे में, यह क्षेत्र स्थायित्व में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

राष्ट्रपति ने जीआई टैग द्वारा दुनिया भर में भारतीय हस्तशिल्प उत्पादों की पहचान को मज़बूत करने की उपलब्धियों पर खुशी व्‍यक्‍त की। उन्होंने सभी हितधारकों से अपने अनूठे उत्पादों के लिए जीआई टैग प्राप्त करने की दिशा में काम करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि जीआई टैग उनके उत्पादों को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करेगा और राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी विश्वसनीयता को बढ़ाएगा। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि एक ज़िला एक उत्पाद (ओडीओपी) पहल हमारे क्षेत्रीय हस्तशिल्प उत्पादों की अंतर्राष्ट्रीय पहचान को भी मज़बूत कर रही है।

राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे कारीगरों के पीढ़ी दर पीढ़ी संचित ज्ञान, समर्पण और कड़ी मेहनत के बल पर, भारतीय हस्तशिल्प उत्पादों की दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बनी है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारतीय हस्तशिल्प की मांग में वृद्धि की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र युवा उद्यमियों और डिज़ाइनरों को उद्यम स्थापित करने के बेहतरीन अवसर प्रदान करता है।

इंडिगो पर सरकार का हंटर, विंटर शेड्यूल में हुई दस प्रतिशत फ्लाइट्स की कटौती

0

नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) द्वारा जारी आदेश के बाद कारण बताओ नोटिस का जवाब देने के बाद सरकार ने इंडिगो की पांच प्रतिशत उड़ानें कम कर दी हैं। नोटिस में कहा गया है यह देखा गया कि डीजीसीए द्वारा जारी शीतकालीन अनुसूची (डब्ल्यूएस) 2025 के अनुसार, मेसर्स इंडिगो के लिए प्रति सप्ताह 15,014 प्रस्थान स्वीकृत किए गए थे, जो नवंबर 2025 के महीने के लिए अनुमोदित 64,346 उड़ानों के बराबर है। जबकि, इंडिगो द्वारा प्रस्तुत परिचालन आंकड़ों के अनुसार, यह देखा गया है कि नवंबर 2025 के दौरान वास्तव में 59,438 उड़ानें संचालित की गईं, और महीने के दौरान 951 उड़ान रद्द दर्ज की गईं। नोटिस में इंडिगो के ग्रीष्मकालीन कार्यक्रम में वृद्धि पर भी प्रकाश डाला गया।

नोटिस में कहा गया कि ग्रीष्मकालीन अनुसूची (SS25) की तुलना में, इंडिगो को SS25 में 351 विमानों की तुलना में 403 विमानों के साथ अनुसूची में 6% की वृद्धि की अनुमति दी गई थी। यह देखा गया है कि एयरलाइन अक्टूबर 2025 में केवल 339 विमान और नवंबर 2025 में 344 विमान ही संचालित कर सकती है। उपरोक्त से, यह अनुमान लगाया जाता है कि इंडिगो ने शीतकालीन अनुसूची 24 (WS 24) की तुलना में अपने प्रस्थान में 9.66% और ग्रीष्मकालीन अनुसूची 25 (SS 25) के संबंध में 6.05% की वृद्धि की है। नोटिस में कहा गया है कि एयरलाइन इन शेड्यूल को कुशलतापूर्वक संचालित नहीं कर पा रही है और उनसे बुधवार शाम तक संशोधित शेड्यूल जमा करने की अपेक्षा की गई है।

भारतीय डाक ने कोट्टायम के सीएमएस कॉलेज में केरल के प्रथम आधुनिक जेन-जेड डाकघर विस्तार काउंटर का अनावरण किया

0

भारतीय डाक और सीएमएस कॉलेज के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा जेन जेड डाकघर विस्‍तार काउंटर का उद्घाटन

भारतीय डाक ने केरल के कोट्टायम स्थित सीएमएस कॉलेज में अपनी तरह के पहले जेन-जेड डाकघर विस्‍तार काउंटर का उद्घाटन किया। ‘छात्रों का, छात्रों द्वारा, छात्रों के लिए’ के ​​मूल दर्शन के साथ परिकल्पित इस पूरे स्थान की कल्पना, योजना और सह-निर्माण सीएमएस कॉलेज के छात्रों द्वारा भारतीय डाक अधिकारियों के सहयोग से किया गया, जो रचनात्मकता, स्थिरता और सेवा का एक आदर्श मिश्रण प्रस्तुत करता है।

यह डाक विस्तार काउंटर एक जीवंत, युवा, प्रकृति से ओतप्रोत स्थान है जो आंतरिक और बाहरी क्षेत्रों का सहज मिश्रण है। इसका परिणाम एक आधुनिक डाक विस्तार काउंटर है जो एक कार्य कैफ़े, एक हरित कोना और एक सामुदायिक केंद्र के रूप में कार्य करता है—और साथ ही प्रकृति के साथ सामंजस्य के कॉलेज के सिद्धांतों के प्रति भी समर्पित है।

न जेड डाकघर विस्‍तार काउंटर की मुख्य विशेषताएं

  • पिकनिक-टेबल शैली की व्यवस्था और एक ऊर्ध्वाधर उद्यान के साथ प्रकृति-थीम वाला बैठने का क्षेत्र, एक ताज़ा और शांत वातावरण प्रदान करता है। नवीनीकृत टायरों से बनी अतिरिक्त बैठने की व्यवस्था, स्थिरता और पर्यावरण-अनुकूल प्रथाओं के प्रति छात्रों कीप्रतिबद्धता को दर्शाती है।
  • लैपटॉप और मोबाइल उपकरणों के लिए चार्जिंग पॉइंट से सुसज्जित कार्यअनुकूल काउंटर हैं।
  • मनोरंजन और विश्राम का कोना, जिसमें पुस्तकों और बोर्ड गेम्स से युक्त एक बुकशेल्फ़ है, तथा शांत चिंतन के लिए एक इनडोर रीडिंग नुक्कड़ भी है।
  • पैकेजिंग सामग्री और माईस्टाम्प प्रिंटर के साथ पूर्णतः सुसज्जित एमपीसीएम बुकिंग काउंटर, सेवा की सुगमता को बढ़ाता है।
  • कला से सुसज्जित आंतरिक भाग, जिसमें छात्रों और कर्मचारियों द्वारा निर्मित कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं, जो भारतीय डाक, कोट्टायम की सांस्कृतिक विरासत – साहित्य की भूमि, केरल की विरासत, सीएमएस कॉलेज के लोकाचार और प्रकृति से प्रेरित रूपांकनों को दर्शाती है।

यह जेन जेड शैली का विस्‍तार काउंटर सिर्फ एक कार्यात्मक सेवा केंद्र नहीं है – यह एक कार्यस्थल, बैठक स्थल, रचनात्मक केंद्र, विश्राम क्षेत्र और सामुदायिक कोना है, जो भारतीय डाक की विरासत को भविष्य में गर्व से आगे ले जा रहा है।