दुनिया भर में बढ़ती जा रही है यौन हिंसा की वारदातें

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                                                        बाल मुकुन्द ओझा

देश और दुनिया में महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा की घटनाओं में कमी नहीं आ रही है। आए दिन महिलाएं यौन उत्पीड़न और अत्याचारों का शिकार हो रही हैं। घर से लेकर सड़क तक कहीं भी महिला सुरक्षित नहीं है। द लैंसेट जर्नल में छपी एक ताज़ा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि साल 2023 में 100 करोड़ से ज्यादा महिलाओं ने यौन हिंसा झेली है। सबसे हैरान करने वाली बाती ये है कि इन 100 करोड़ में 60.8 करोड़ महिलाओं के साथ यह यौन हिंसा उनके ही इंटीमेट पार्टनर ने की। भारत की बात करे तो 2023 में 15 साल और उससे ज्यादा उम्र की लगभग 23 प्रतिशत महिलाओं को अपने ही पार्टनर से  यौन हिंसा का सामना करना पड़ा, जिसमें मौजूदा या पुराने पार्टनर द्वारा शारीरिक और यौन शोषण शामिल है। अनुमान है कि देश में 15 साल और उससे ज्यादा उम्र की 30 प्रतिशत से अधिक महिलाओं और 13 प्रतिशत पुरुषों ने बचपन में यौन हिंसा का अनुभव किया है। यह आंकड़ा मानवता के सबसे पुराने और व्यापक अन्याय को उजागर करता है, जिस पर अभी भी पर्याप्त कार्रवाई  नहीं हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयेसस ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा मानवता की सबसे पुरानी और सबसे व्यापक ज्यादतियों में से एक है, फिर भी इस पर सबसे कम कार्रवाई की जाती है। कोई भी समाज खुद को निष्पक्ष, सुरक्षित या स्वस्थ नहीं कह सकता जब तक कि उसकी आधी आबादी भय के माहौल में जी रही हो। इस हिंसा को समाप्त करना केवल नीतिगत मामला नहीं है; यह सम्मान, समानता और मानवाधिकारों का मामला है। महिलाओं को जबरन परेशान करना, उनके साथ अश्लील बातें करना और छेड़छाड़ करना, शरीर को छूने का प्रयास करना, गंदे इशारे करना आदि जैसे कृत्य यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आते हैं। यौन उत्पीड़न केवल शारीरिक छेड़छाड़ तक ही सीमित नहीं है। यह मौखिक तौर भी हो सकता है जिसमें सेक्सुअल कॉमेंट्स, सेक्सुअल जोक्स और नारी विरोधी हास्य हो सकता है।  

भारत की बात करें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की हाल ही में आई रिपोर्ट के मुताबिक,  भारत में साल 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4 लाख 48 हजार 211 मामले दर्ज किए गए थे, जो पिछले दो सालों यानी 2022 और 2021 की तुलना में  काफी ज्यादा है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि प्रति 1 लाख महिलाओं पर अपराध की राष्ट्रीय दर 66.2 है. तो वहीं, दूसरी तरफ रिपोर्ट के मुताबिक, बलात्कार के 29 हजार 670 मामले (दर 4.4 प्रतिशत ) और महिलाओं पर शील भंग करने के इरादे से हमले के 83 हजार 891 मामले दर्ज किए गए हैं।  भारत को संस्कार, संस्कृति और मर्यादा की त्रिवेणी कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में नारी अस्मिता को बहुत महत्व दिया गया है। संस्कृत में एक श्लोक है- यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता। अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। मगर आज सब कुछ उल्टा पुल्टा हो रहा है। न नारी की पूजा हो रही है और देवताओं की जगह सर्वत्र राक्षस ही राक्षस दिखाई दे रहे है। समाज के नजरिए में भी महिलाओं के प्रति अब तक कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला है। ऐसा लगता है जैसे हमारा देश भारत धीरे-धीरे बलात्कार की महामारी से पीड़ित होता जा रहा है। यौन अपराध चिंताजनक रफ्तार से बढ़ रहे हैं।

आजकल रोज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर महिलाओं के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ की खबर दिखाई जाती रहती है परंतु इसकी रोकथाम के उपाय पर चर्चा कहीं नहीं होती है। इस तरह के अत्याचार कब रुकेंगें। क्या हम सिर्फ मूक दर्शक बन खुद की बारी का इंतजार करेंगे। लड़कियों पर अत्याचार पहले भी हो रहे थे और आज भी हो रहे हैं अगर इसके रोकने के कोई ठोस उपाय नहीं किये गये। आज भी हमारे समाज में बलात्कारी सीना ताने खुले आम घूमता है और बेकसूर पीड़ित लड़की को बुरी और अपमानित नजरों से देखा जाता है । न तो समाज अपनी जिम्मेदारी का माकूल निर्वहन कर रहा है और न ही सरकार। ऐसे में बालिका कैसे अपने को सुरक्षित महसूस करेगी यह हम सब के लिए बेहद चिंता की बात है।

सच तो यह है कि एक छोटे से गांव से देश की राजधानी तक महिला सुरक्षित नहीं है। अंधेरा होते-होते महिला प्रगति और विकास की बातें छू-मंतर हो जाती हैं। रात में विचरण करना बेहद डरावना लगता है। कामकाजी महिलाओं को सुरक्षित घर पहुँचने की चिंता सताने लगती है। देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में कमी नहीं आरही है। भारत में आए दिन महिलाएं हिंसा और अत्याचारों का शिकार हो रही हैं। घर से लेकर सड़क तक कहीं भी महिला सुरक्षित नहीं है। देश में महिला सुरक्षा को लेकर किये जा रहे तमाम दावे खोखले साबित हुए है। महिला सुरक्षा को लेकर देशभर से रोजाना अलग-अलग खबरें सामने आती रहती हैं। देश में महिलाओं की स्थिति पर हमेशा ही सवाल खड़े होते रहे हैं। महिलाओं की सुरक्षा के तमाम दावों और वादों के बाद भी उनकी हालत जस की तस है। महिलाएं रोज ही दुष्कर्म, छेड़छाड़, घरेलू हिंसा और अत्याचार से रूबरू होती है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

भारत–रूस संबंध और बदलता वैश्विक समीकरण

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यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंध और भारतीय सामरिक स्वायत्तता की नई परीक्षा

— डॉ प्रियंका सौरभ

रूस के साथ भारत के संबंध दशकों से सामरिक साझेदारी, रक्षा सहयोग और राजनीतिक विश्वास की मजबूत नींव पर टिका रहा है। शीत युद्ध के दौर से लेकर वर्तमान तक रूस उन कुछ देशों में रहा, जिसने कठिन समय में भी भारत के हितों का समर्थन किया। परंतु 2022 में शुरू हुए रूस–यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक राजनीति, ऊर्जा बाज़ार, वित्तीय ढांचे और सामरिक गठबंधनों को जिस तरह बदल दिया है, उसने भारत–रूस संबंधों को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने न केवल रूस की अर्थव्यवस्था और उसकी रक्षा-उत्पादन क्षमता को प्रभावित किया है, बल्कि भारत जैसे साझेदार देशों के लिए भी अभूतपूर्व कूटनीतिक चुनौतियाँ पैदा की हैं। एक ओर अमेरिका, यूरोप और इंडो-पैसिफिक साझेदार भारत से पश्चिमी मानदंडों का पालन करने की उम्मीद करते हैं, वहीं दूसरी ओर भारत रूस से ऊर्जा, रक्षा और अंतरराष्ट्रीय संतुलन की ज़रूरतों को अनदेखा नहीं कर सकता। इस दोराहे पर भारत की सबसे बड़ी परीक्षा है—कैसे रूस के साथ संबंधों को बनाए रखते हुए अपनी सामरिक स्वायत्तता को मजबूती से स्थापित किया जाए।

आज की सबसे बड़ी जटिलता यह है कि रूस धीरे-धीरे चीन के करीब जाता दिख रहा है, और यह समीकरण भारत के हितों की दृष्टि से पूरी तरह अनुकूल नहीं कहा जा सकता। चीन के साथ रूस का बढ़ता आर्थिक, तकनीकी और सैन्य सहयोग उस क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर रहा है, जिसमें भारत अपनी सुरक्षा रणनीति का निर्माण करता है। भारत जानता है कि चीन की मंशा केवल एशिया प्रभुत्व तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन को बदलने की है। ऐसे में रूस–चीन निकटता भारत की सामरिक गणना को कठिन बनाती है।

पश्चिम द्वारा लगाए गए प्रतिबंध भी भारत के लिए कम चुनौतीपूर्ण नहीं हैं। रूस से होने वाले रक्षा आयात और महत्वपूर्ण स्पेयर पार्ट्स पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण धीमे पड़ रहे हैं। भारत की वायुसेना और थलसेना जिन कई प्रमुख प्रणालियों पर निर्भर हैं, वे रूस द्वारा निर्मित या रूस के सह-उत्पादन वाले हैं। यूक्रेन युद्ध के चलते रूसी रक्षा उद्योग पर जो दबाव बढ़ा है, उसने भारत को कई सैन्य परियोजनाओं की समय-सीमा को लेकर चिंतित कर दिया है। कुछ हथियार प्रणालियों और मिसाइल डिलीवरी में देरी भी इसे दर्शाती है। यह स्थिति भारत को मजबूर करती है कि वह दीर्घकालिक रूप से अपने रक्षा स्रोतों को विविध बनाए और घरेलू उत्पादन पर अधिक ध्यान दे।

इसी बीच व्यापारिक असंतुलन भी भारत–रूस संबंधों का एक गंभीर पहलू बनकर उभरा है। कच्चे तेल के आयात में भारी वृद्धि ने रूस के साथ भारत के व्यापार को एकतरफा बना दिया है। रूस को भारत से निर्यात बेहद कम है और भुगतान प्रणाली भी स्पष्ट ढंग से स्थिर नहीं हो पाई है। रुपया–रूबल व्यापार व्यवस्था पश्चिमी प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग नियमों के कारण अपेक्षित दक्षता हासिल नहीं कर पाई है। इससे दोनों देशों के व्यापारिक ढांचों में अनिश्चितता और जोखिम बढ़ा है।

दूसरी ओर पश्चिमी देश भी चाहते हैं कि भारत रूस को समर्थन कम करे, और यूक्रेन मुद्दे पर एक “नैतिक” रुख अपनाए। लेकिन भारत की विदेश नीति का आधार साझा नैतिकता से अधिक राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कई बार मतदान से दूरी बनाकर यह स्पष्ट किया है कि वह किसी भी पक्ष का सीधा समर्थन नहीं करेगा। भारत का यह संतुलित रुख उसकी सामरिक स्वायत्तता का प्रतीक है। परन्तु पश्चिमी देशों में इसे लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं। कुछ इसे भारत की ‘प्रैगमैटिक डिप्लोमेसी’ कहते हैं, तो कुछ इसे रूस के प्रति ‘अतिरिक्त सहानुभूति’ की तरह देखते हैं। भारत को इन दबावों के बीच अपनी विदेश नीति को चतुराई से साधना होगा।

भारत के सामने एक चुनौती यह भी है कि रूस और अमेरिका दोनों उसके महत्वपूर्ण साझेदार हैं। अमेरिका आज भारत का सबसे बड़ा तकनीकी और आर्थिक भागीदार है, साथ ही क्वाड के माध्यम से एशिया–प्रशांत सुरक्षा ढांचे का अभिन्न हिस्सा भी। वहीं रूस पारंपरिक सहयोगी है और दशकों से भारत के रक्षा ढांचे का मुख्य स्तंभ बना हुआ है। इन दोनों स्तंभों के बीच संतुलन बनाए रखना भारत की कूटनीति के लिए अत्यंत जटिल किंतु आवश्यक कार्य है। भारत को यह दिखाना होगा कि दोनों साझेदारियों में विरोधाभास नहीं बल्कि परस्पर पूरक लाभ हैं।

भारत इस मुश्किल संतुलन को बनाए रखने के लिए कई कूटनीतिक रणनीतियाँ अपना सकता है। सबसे पहले, उसे रक्षा आयात पर निर्भरता कम करके “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” को तेज़ी से आगे ले जाना होगा। रूस के साथ संयुक्त उत्पादन और तकनीकी सहयोग को भारतीय भूमि पर बढ़ाया जा सकता है, जिससे सीधे आयात पर निर्भरता घटेगी और प्रतिबंधों का प्रभाव न्यूनतम होगा। इसके साथ ही भारत को यूरोप, अमेरिका, फ्रांस और इज़राइल जैसे देशों के साथ नई रक्षा साझेदारियों को मजबूत करना होगा।

दूसरा महत्वपूर्ण कदम यह होगा कि भारत रूस के साथ ऊर्जा, कृषि, फार्मा, आईटी और अन्य गैर-रक्षात्मक क्षेत्रों में व्यापारिक विविधता को बढ़ाए। इससे व्यापारिक असंतुलन कम होगा और दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं में स्थिरता आएगी। तीसरा उपाय यह है कि भारत को एक विश्वसनीय और प्रतिबंध-सुरक्षित भुगतान व्यवस्था विकसित करनी होगी। इसके लिए ब्रिक्स, एससीओ और वैकल्पिक वित्तीय प्रणालियों का उपयोग कारगर हो सकता है।

कूटनीतिक स्तर पर भारत को रूस के साथ भरोसेमंद संवाद बनाए रखना होगा, और साथ ही पश्चिमी देशों को यह संदेश भी देना होगा कि भारत की तटस्थता उसकी जिम्मेदार सामरिक सोच का परिणाम है। भारत ने पहले भी यह सिद्ध किया है कि वह किसी ब्लॉक में शामिल हुए बिना भी अपने हितों की रक्षा कर सकता है। आज की वैश्विक परिस्थितियाँ भारत से और भी परिपक्व एवं बहुआयामी दृष्टिकोण की मांग करती हैं।

इन सभी परिवर्तनों के बीच यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए किसी भी महाशक्ति का अनुसरण न करे। भारत ने हमेशा एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थन किया है, जिसमें किसी एक शक्ति का वर्चस्व न हो। रूस के साथ संबंध बनाए रखते हुए भी भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की दिशा को स्पष्ट रखना होगा—एक ऐसी नीति जो न तो दबाव में निर्णय ले और न ही किसी संघर्ष में अनावश्यक पक्षधरता दिखाए।

अंततः भारत–रूस संबंध आज ऐतिहासिक मोड़ पर खड़े हैं। यूक्रेन युद्ध, प्रतिबंधों की राजनीति और बदलते गठबंधन ढांचे ने इस संबंध को चुनौतीपूर्ण बना दिया है, परंतु इसमें अवसर भी छिपे हैं। भारत को यह समझना होगा कि रूस उसके लिए सिर्फ रक्षा सहयोगी नहीं, बल्कि एक ऐसा साझेदार है जिसके साथ ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय संतुलन और एशियाई राजनीति के कई पहलू जुड़े हुए हैं। इसी तरह पश्चिम भी भारत के उदय का अनिवार्य साझेदार है। इसलिए भारत का लक्ष्य किसी भी एक ध्रुव की ओर झुकना नहीं, बल्कि संतुलन का वह मार्ग चुनना होना चाहिए जो उसकी सामरिक स्वायत्तता, आर्थिक स्थिरता और वैश्विक भूमिका को अधिक सशक्त बनाता है।

भारत के लिए यही वह समय है जब उसे अपने कूटनीतिक कौशल, शांत तर्क और दृढ़ संकल्प का उपयोग करते हुए दुनिया को यह दिखाना होगा कि सामरिक स्वायत्तता केवल एक नीति नहीं बल्कि भारत की वैश्विक पहचान है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

इजराइल के प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से फोन पर बात की

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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को आज इजराइल के प्रधानमंत्री महामहिम श्री बेंजामिन नेतन्याहू ने फोन किया।

दोनों नेताओं ने भारत-इजराइल रणनीतिक साझेदारी में निरंतर प्रगति पर संतोष व्यक्त किया और आपसी लाभ के लिए इन संबंधों को और मजबूत करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

दोनों नेताओं ने आतंकवाद की घोर भर्त्सना की और आतंकवाद के हर रूप और अभिव्यक्ति के प्रति किसी भी तरह की नरमी न बरतने की अपनी नीति को दोहराया।

उन्होंने पश्चिम एशिया की स्थिति पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने क्षेत्र में निष्पक्ष और स्थायी शांति के प्रयासों, जिसमें गाजा शांति योजना का शीघ्र कार्यान्वयन शामिल है, के लिए भारत के समर्थन की पुष्टि की।

दोनों नेताओं ने लगातार एक-दूसरे के संपर्क में बने रहने पर सहमति व्यक्त की।

ग्रामीण क्षेत्रों में डाक सेवाओं  के सुधार को मोबाइल एप्लिकेशन शुरू 

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ग्रामीण क्षेत्रों में डाक सेवाओं की दक्षता और गुणवत्ता में सुधार के लिए, डाक विभाग ने सभी शाखा डाक घर कार्यालयों में मोबाइल एप्लिकेशन शुरू किया है। इसका नाम डिजिटल रूरल एंटरप्राइज एप्लीकेशन फॉर मोबाइल्स (डीआरईएएम) है। यह एप्लिकेशन हैंडहेल्ड डिवाइस के माध्यम से डाक वस्तुओं की बुकिंग और डिलीवरी को आसान बनाता है, रियल टाइम ट्रैकिंग को सक्षम बनाता है, सेवा डिलीवरी को तेज करता है, और विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में जवाबदेही बढ़ाता है।

इसके अलावा, देश भर में ग्रामीण क्षेत्रों सहित डाक वस्तुओं के प्रदर्शन को ट्रैक करने और मूल्यांकन करने के लिए मुख्य प्रदर्शन संकेतक (केपीआई) पेश किए गए हैं। इनकी निगरानी की जाती है, जिससे बेहतर निगरानी, ​​समय पर डिलीवरी और सेवा की गुणवत्ता में लगातार सुधार सुनिश्चित होता है।

मेल नेटवर्क ऑप्टिमाइज़ेशन प्रोजेक्ट (एमएनओपी) और पार्सल नेटवर्क ऑप्टिमाइज़ेशन प्रोजेक्ट (पीएनओपी) ने ग्रामीण क्षेत्रों सहित डाक प्रदर्शन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एमएनओपी के अंतर्गत, मेल नेटवर्क को तर्कसंगत बनाया गया है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों सहित पूरे देश में डिलीवरी की गति में सुधार हुआ है।इस पहल ने ग्राहकों के लिए डाक वस्तुओं की दृश्यता को भी मजबूत किया है।

इसी तरह, पार्सल नेटवर्क ऑप्टिमाइज़ेशन प्रोजेक्ट (पीएनओपी) ने इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेडेशन, पार्सल प्रोसेसिंग को आसान बनाने और ऑपरेशनल कमियों को कम करके ग्रामीण इलाकों में सेवा वितरण को बेहतर बनाने में योगदान दिया है। स्टैंडर्डाइज़्ड इक्विपमेंट, नेटवर्क रैशनलाइज़ेशन और बेहतर ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम ने पार्सल सेवाओं की विश्वसनीयता और पहुंच को बढ़ाया है। विकास के इन घटनाक्रमों ने ई-कॉमर्स में ग्रामीण भागीदारी को बढ़ावा दिया है। इन्होंने ग्रामीण ग्राहकों को समय पर, कुशल और किफायती पार्सल सेवाएं सुनिश्चित की हैं, जिससे कुल मिलाकर ग्रामीण विकास और आर्थिक विकास में योगदान मिला है।

देश में 1.39 लाख से ज़्यादा सभी शाखा डाक कार्यालयों को घर-घर सेवा वितरण को संभव बनाने के लिए डिजिटल डिवाइस से लैस किया गया है। ये डिवाइस ग्राहकों के घर पर वित्तीय, नागरिक-केंद्रित और डाक सेवाएं प्रदान करने में मदद करते हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में पहुंच और सेवा का दायरा बढ़ता है।

डाक विभाग पोस्ट ऑफिस बचत खाता धारकों को ई-बैंकिंग सुविधाएं प्रदान करता है। इनमें छोटी बचत योजना के खातों को डिजिटल रूप से खोलना, ऑनलाइन फंड ट्रांसफर, ब्याज प्रमाण पत्र बनाना और संबंधित सेवाएं शामिल हैं। ई-पासबुक सुविधा चुनिंदा पीओएसबी योजनाओं के लिए ऑनलाइन बैलेंस पूछताछ और मिनी स्टेटमेंट को सक्षम बनाती है। इसके अलावा, विभागीय डाक कार्यालयों में पीओएसबी खातों को खोलने, जमा, निकासी और अन्य संबंधित लेनदेन के लिए बायोमेट्रिक-आधारित eKYC शुरू किया गया है।

नोडल डिलीवरी सेंटर (एनडीसी) की स्थापना से पार्सल डिलीवरी की स्पीड में काफी सुधार हुआ है, ऑपरेशन की लागत कम हुई है और कस्टमर संतुष्टि बढ़ी है। एनडीसी में ज़रूरत पड़ने पर ग्रामीण इलाकों का वितरण क्षेत्र भी शामिल है। इससे इंडिया पोस्ट की सेवाओं पर, विशेष रूप से ग्रामीण समुदायों में भरोसा काफी बढ़ा है।

यह जानकारी संचार और ग्रामीण विकास राज्य मंत्री डॉ. पेम्मासानी चंद्र शेखर ने आज लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में दी।

‘ऋषि अगस्त्य वाहन अभियान’ काशी पहुंचा, नमो घाट पर हुआ भव्य स्वागत

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तमिल और भारतीय परंपरा की प्राचीन सभ्यागत यात्रा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से निकला सेज अगस्त्य व्हीकल एक्सपीडिशन (SAVE) काशी तमिल संगमम् 4.0 का प्रमुख आकर्षण—अपनी नौ दिवसीय यात्रा पूर्ण करते हुए 10 दिसंबर को वाराणसी स्थित नमो घाट पहुंचा। यह ऐतिहासिक कार रैली 2 दिसंबर को ‘दक्षिण काशी’ तिरुनेलवेली (तेनकासी) से प्रारंभ हुई थी और लगभग 2,460 किलोमीटर की दूरी तय कर तमिलनाडु से उत्तर भारत तक सांस्कृतिक, भाषाई और आध्यात्मिक एकात्म की अविच्छिन्न धारा की स्मृति को पुनर्जीवित करती आगे बढ़ी।

रैली में शामिल 15–20 वाहनों और लगभग 100 प्रतिभागियों का भव्य स्वागत मोहन सराय काशी द्वार पर किया गया, जहां एमएलसी हंसराज विश्वकर्मा सहित सैकड़ों कार्यकर्ताओं एवं नागरिकों ने पुष्पवर्षा और माल्यार्पण कर अगवानी की। इसके बाद नमो घाट पर पहुँचने पर मंडलायुक्त, वाराणसी मण्डल, श्री एस. राजलिंगम (आईएएस) और जिलाधिकारी श्री सत्येन्द्र कुमार (आईएएस) ने दल का औपचारिक स्वागत किया।

मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने सेव टीम को संबोधित करते हुए कहा कि यह यात्रा न केवल तमिल और काशी की सांस्कृतिक निकटता का उत्सव है, बल्कि भारत की उस आध्यात्मिक एकता की जीवंत अनुभूति भी है। जिसने सदियों से उत्तर और दक्षिण को एक सूत्र में बांध रखा है। SAVE अभियान युवा पीढ़ी को हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का अद्भुत प्रयास है, और काशी इस ऐतिहासिक संगम की साक्षी बनकर गौरवान्वित है।

यात्रा के दौरान प्रतिभागियों ने चेरा, चोल, पांड्य, पल्लव, चालुक्य और विजयनगर जैसे महान राजवंशों की संस्कृति, वास्तुकला और ज्ञान–परंपराओं की विरासत से जुड़े स्थलों का अध्ययन करते हुए स्थानीय समुदायों से संवाद स्थापित किया। कारवां ने तमिल प्रदेश से लेकर उत्तर भारत तक फैली हुई सभ्यागत निरंतरता, कलात्मक परंपराओं, शिल्प, साहित्य एवं सिद्ध चिकित्सा परंपराओं के जीवंत सूत्रों को खोजने और दस्तावेजीकृत करने का कार्य किया। 

मोहन सराय काशी द्वार पर एम. एल. सी.  हंसराज विश्वकर्मा रैली का स्वागत के बाद कहा कि
 यात्रा का एक महत्वपूर्ण आयाम पांड्य राजा ‘आदि वीर पराक्रम पांडियन’ की उस ऐतिहासिक परंपरा को भी स्मरण करना था, जिन्होंने उत्तर भारत की यात्रा कर सांस्कृतिक एकता का संदेश फैलाया और शिव मंदिर की स्थापना की—इसी प्रसंग से तेनकासी को “दक्षिण काशी” नाम की व्युत्पत्ति जुड़ी मानी जाती है।

इस अवसर पर अधिकारियों एवं विशिष्ट अतिथियों ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की उस दृष्टि को रेखांकित किया, जिसमें भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय विभेदों के नाम पर उत्पन्न भ्रांतियों को दूर करते हुए भारत की सांस्कृतिक एकता को पुनः जागृत करने का आह्वान किया गया है।

इंडिया पोस्ट नेटवर्क के महत्वपूर्ण विस्तार और आधुनिकीकरण पर प्रकाश डाला

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संचार एवं उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्री श्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया ने आज शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा को संबोधित करते हुए विश्व के सबसे बड़े डाक नेटवर्क, इंडिया पोस्ट को मजबूत और आधुनिक बनाने में हुई महत्वपूर्ण प्रगति की रूपरेखा प्रस्तुत की।

श्री सिंधिया ने बताया कि भारतीय डाक वर्तमान में देशभर में 1.64 लाख डाकघरों का संचालन कर रही है, जिन्हें 2.78 लाख समर्पित ग्रामीण डाक सेवकों (जीडीएस) का सहयोग प्राप्त है। उनकी अमूल्य सेवा को स्वीकार करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि ग्रामीण डाक सेवक दिन-रात न केवल कामकाज के लिए, बल्कि एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक भावनाओं को पहुंचाने के लिए भी अथक परिश्रम करते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हासिल किए गए परिवर्तन पर प्रकाश डालते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार ने पिछले 11 वर्षों में इंडिया पोस्ट को मजबूत करने पर व्यापक रूप से ध्यान केंद्रित किया है। प्रमुख उपलब्धियों में शामिल हैं:

  • पिछले साढ़े तीन वर्षों में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों में 4,903 नए डाकघरों का निर्माण किया गया है।
  • बैंकिंग सुविधाओं से वंचित गांवों में 5,746 डाकघरों को मंजूरी दी गई है, जिनमें से 5,657 (97 प्रतिशत) पहले ही खोले जा चुके हैं।
  • पिछले 11 वर्षों में राष्ट्रीय नेटवर्क में कुल 10,170 डाकघरों का विस्तार किया गया है।
  • डाकघर भवनों के निर्माण और नवीनीकरण के लिए 405 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है, जिसमें 49 विरासत डाकघर भी शामिल हैं, जिन्हें भारतीय डाक के संस्थागत रत्न माना जाता है।

सिंधिया ने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि पर्याप्त प्रगति हासिल की गई है, लेकिन इंडिया पोस्ट के स्वामित्व वाले शेष 25,000 डाकघरों के नवीनीकरण के लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता होगी।

भविष्य की ओर बढ़ते हुए, केंद्रीय मंत्री ने घोषणा की कि इंडिया पोस्ट संचालन को आधुनिक बनाने और सुव्यवस्थित करने के लिए एक व्यापक बिजनेस प्रोसेस री-इंजीनियरिंग (बीपीआर) पहल शुरू कर रहा है। इससे प्रथम-मील, मध्य-मील और अंतिम-मील वितरण प्रणालियों में सुधार होगा , जिससे करोड़ों नागरिकों के लिए ये प्रणालियाँ तेज़, अधिक सेवा-उन्मुख और डिजिटल रूप से सक्षम बनेंगी।

उन्होंने यह भी कहा कि इंडिया पोस्ट स्वचालन को अपना रहा है और दुनिया के अग्रणी लॉजिस्टिक्स वाहकों में से एक के रूप में उभरने के लिए वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं का अध्ययन कर रहा है।

सरकार डाक नेटवर्क को मजबूत करने, सेवा वितरण को बेहतर बनाने और इंडिया पोस्ट को देश के लिए एक आधुनिक, प्रौद्योगिकी-संचालित लॉजिस्टिक्स पावरहाउस में परिवर्तित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

वायु सेना स्टेशन मोहनबाड़ी में 1971 युद्ध विजय दिवस समारोह का आयोजन

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भारतीय वायु सेना ने असम के मोहनबाड़ी वायु सेना स्टेशन में 1971 के युद्ध में भारत की जीत की स्मृति में एक कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम में भारतीय सशस्त्र बलों की वीरता और शौर्य को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह, वरिष्ठ सैन्य और असैन्य गणमान्य व्यक्ति, पूर्व सैनिक और असम के बड़ी संख्या में युवा इस कार्यक्रम में शामिल हुए।

एसयू-30 एमकेआई, सी-130, डोर्नियर, एएन-32, चिनूक, एमआई-17, एएलएच और चीता विमानों द्वारा हवाई प्रदर्शन में 1971 के युद्ध के प्रमुख मिशनों पुनर्मंचन किया गया, जिसमें तंगेल एयरड्रॉप, मेघना नदी पार करना और ढाका में सरकारी भवन पर हमला शामिल था। इस प्रदर्शन ने भारतीय वायु सेना की परिचालन क्षमता और मिशन तत्परता को प्रदर्शित किया।

इस अवसर पर ‘1971 के युद्ध के दौरान वायु अभियान’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें वायु सेना के पूर्व सैनिकों ने युद्ध में अपनी भागीदारी से संबंधित किस्से और अनुभव साझा किए। ‘ट्रायम्फ फ्रॉम द स्काई-71’ नामक एक प्रदर्शनी में युद्ध के समय की तस्वीरों का एक दुर्लभ संग्रह प्रदर्शित और इसमें भारत की निर्णायक जीत का प्रतीक औपचारिक लौ ‘स्वर्णिम विजय मशाल’ की एक प्रतिकृति भी शामिल थी।

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वायु अधिकारी कमान प्रमुख, एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा ने फरीदाबाद वायुसेना स्टेशन का दौरा किया

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भारतीय वायु सेना (आईएएफ) के पश्चिमी वायु कमान (डब्ल्यूएसी) के वायु अधिकारी कमान प्रमुख (एओसी-इन-सी) एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा ने 10 दिसंबर 2025 को वायु सेना स्टेशन फरीदाबाद का दौरा किया। कमान प्रमुख का स्वागत स्टेशन कमांडर, ग्रुप कैप्टन वी विश्वनाथन ने किया और उन्हें स्टेशन द्वारा की गई परिचालन तैयारियों और कल्याणकारी पहलों के बारे में जानकारी दी गई।

एयर फ़ोर्स के 9 स्कूल में आयोजित 80वें विस्फोटक पहचान (ईडी) डॉग कोर्स की पासिंग आउट परेड का निरीक्षण कमान प्रमुख ने किया। ये नव उत्तीर्ण कुत्ते अब विभिन्न परिचालन इकाइयों में सुरक्षा अभियानों के लिए तैनात किए जाएंगे। कमान प्रमुख ने विस्फोटक पहचान के लिए इन कुत्तों को प्रशिक्षित करने हेतु अनुकरणीय मानकों और नवीन विधियों को अपनाने के लिए स्कूल की सराहना की।

इस दौरे के दौरान, कमान प्रमुख ने प्रमुख परिचालन लॉजिस्टिक्स स्थलों का दौरा कर उनकी कार्यक्षमता और परिचालन इकाइयों को कुशल लॉजिस्टिक्स सहायता प्रदान करने की तत्परता का आकलन किया। उन्होंने भंडारण और भंडारण की प्रभावशीलता की समीक्षा की और अल्प सूचना पर परिचालन सहायता प्रदान करने के लिए हमेशा तत्पर रहने की आवश्यकता पर बल दिया।

जैसे-जैसे भारतीय वायु सेना अपनी हवाई युद्ध और निगरानी क्षमताओं का आधुनिकीकरण और उन्नयन जारी रखती है, इस तरह की दौरे रसद संबंधी तैयारियों का मूल्यांकन करने, परिचालन संबंधी चुनौतियों का समाधान करने और बल की तत्परता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

राष्ट्रपति का 11 से 12 दिसंबर का मणिपुर का दौरा

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राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु 11 और 12 दिसंबर, 2025 को मणिपुर का दौरा करेंगी।

11 दिसंबर को मणिपुर की राजधानी इम्फाल पहुंचने पर राष्ट्रपति को गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाएगा। इसके बाद वे ऐतिहासिक मापल कांगजेइबुंग में पोलो प्रदर्शनी मैच देखने जाएंगी। उसी शाम, मणिपुर सरकार की ओर से इम्फाल के सिटी कन्वेंशन सेंटर में उनके सम्मान में आयोजित एक नागरिक स्वागत समारोह में राष्ट्रपति शामिल होंगी। इस अवसर पर वे विभिन्न विकास परियोजनाओं की आधारशिला भी रखेंगी और उनका उद्घाटन करेंगी।

12 दिसंबर को राष्ट्रपति इम्फाल स्थित नुपी लाल स्मारक परिसर का दौरा करेंगी और मणिपुर की वीर महिला योद्धाओं को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगी। बाद में, वे सेनापति में एक जनसभा को संबोधित करेंगी, जिसमें वे जिले के लिए विभिन्न परियोजनाओं की आधारशिला रखेंगी और उनका उद्घाटन करेंगी।

आज भारतीय संसद के शीतकालीन सत्र में फिर से हंगामा और तीव्र बहस का माहौल रहा

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आज भारतीय संसद के शीतकालीन सत्र में फिर से हंगामा और तीव्र बहस का माहौल रहा। दोनों सदनों — लोकसभा और राज्यसभा — में राजनीतिक तेज़ी दिखी, विशेष रूप से चुनाव सुधार और मतदाता-सूची (वोटर लिस्ट) से जुड़े मसलों पर। विपक्षी दलों ने पुरानी पार्टियों और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए, वहीं सरकार की ओर से बड़े सुधार व विकास संबंधी दावों के साथ जवाब दिए गए। कुल मिलाकर, आज की कार्यवाही ने यह दिखा दिया कि संसद का शीतकालीन सत्र सिर्फ औपचारिक प्रक्रियाओं का मंच नहीं, बल्कि राजनीतिक गतिशीलता और विवादों का मैदान भी है।


आज राज्यसभा में सत्र की शुरुआत के साथ ही एक औपचारिक, प्रतीकात्मक पहलू रहा — सदन ने 1948 में अपनाई गई Universal Declaration of Human Rights (सर्व-मानव अधिकार घोषणापत्र) की 77वीं वर्षगांठ पर संक्षिप्त श्रद्धांजलि दी।

इसके बाद सदन ने धीरे-धीरे अपनी मुख्य गतिविधियों की ओर बढ़ना शुरू किया। इस दौरान, राजनीतिक गर्माहट तब बढ़ी जब एक सांसद (कहा जा रहा है कि आदित्य प्रसाद नामक सांसद) ने बिना पर्याप्त कारण अपने स्टार्ड प्रश्‍न (starred question) को वापस ले लिया। इस फैसले पर विपक्ष ने तीखी आपत्ति जताई — और तब तक संतोषजनक स्पष्टीकरण न मिलने पर उन्होंने वॉकआउट कर दिया।

वॉकआउट और विरोध-प्रदर्शनों की वजह से सदन की गरिमा और उसकी प्रक्रियात्मक शुद्धता पर सवाल उठे। विपक्ष का कहना था कि प्रश्न वापस लेने का यह फैसला पारदर्शिता के खिलाफ है, और इससे जनता के सामने जवाबदेही की प्रक्रिया कमजोर होती है। वहीं सरकार या समर्थक सांसदों की ओर से इस बारे में कोई स्पष्ट सार्वजनिक बयान आज देखने को नहीं मिला — जिससे सदन में असमंजस और असंतोष की स्थिति बनी।

इस विवाद के बीच, अन्य प्रस्तावों, निजी सदस्यों के बिल, या अन्य पैकेज्ड एजेंडा पर चर्चा न हो पाई — कम से कम आज नहीं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस कारण राज्यसभा की वास्तविक विधायी कार्यवाही बाधित रही।

राज्यसभा की कार्यवाही दोपहर के बाद कुछ समय के लिए स्थगित भी रही — ताकि परिस्थितियों पर दोबारा विचार किया जा सके।

कुल मिलाकर, आज राज्यसभा में ना तो कोई महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुआ, ना कोई नई बड़ी शुरुआत देखने को मिली — बल्कि पुरानी प्रक्रियाओं, प्रश्न-उत्तर और पारदर्शिता के मुद्दों ने सदन की छवि को कुछ धुमिल किया। यदि विपक्ष ने अपना वॉकआउट जारी रखा, और सरकार ने उचित स्पष्टीकरण नहीं दिया, तो यह उस लोकतांत्रिक संस्था के लिए चिंताजनक संकेत है जो जवाबदेही, पारदर्शिता और जन-हित के फैसलों की प्रतिनिधि होती है।

आज की यह स्थिति दर्शाती है कि राज्यसभा — जो कि theoretically विचार-विमर्श, समीक्षा और संतुलन का घर है — राजनीतिक कलह और आरोप-प्रत्यारोप की चपेट में आने पर अपना मूल उद्देश्य खो सकती है। प्रतिनिधि-जनतंत्र के इस महत्त्वपूर्ण अंग को सिर्फ राजनीतिक नाटकों के लिए इस्तेमाल करना लोकतंत्र के लिए आत्मघात जैसा हो सकता है।


आज लोकसभा में सत्र की मुख्य शुरुआत हुई चुनाव सुधार (electoral reforms) और मतदाता-सूची (voter list / मतदाता सूची) से जुड़ी बहस के साथ। यह बहस पिछले दिनों से जारी थी, और आज उसके दूसरे दिन कई नेताओं ने अपनी बात रखी — जिसमें प्रमुख वकील, विपक्षी व समर्थक सांसद दोनों शामिल थे।

सुबह की शुरूआत में ही, कुछ सांसदों ने भूपेश बघेल के हवाले से आरोप लगाए कि चुनाव आयोग की कार्यशैली निष्पक्ष नहीं रही — और कई उदाहरणों से यह साबित हो चुका है। वहीं, सरकार समर्थक सांसदों ने यह तर्क दिया कि पिछले 10 वर्षों में पुरानी, ब्रिटिश कालीन कई कानूनी व्यवस्थाओं को हटाया गया है, और नई व्यवस्था जनता के हित में लाई गई है।

दोपहर होते-होते, चर्चा का मुख्य मोड़ आया जब अमित शाह — देश के गृह मंत्री — सदन में अपनी बात रखने के लिए खड़े हुए। उन्हें शाम करीब 5 बजे के आस-पास बोलना तय था।

उनकी ओर से सरकार की ओर से प्रस्तावित चुनाव सुधारों की रूप-रेखा, मतदाता-पंजीकरण, मतदाता-तालिका की पारदर्शिता, और भविष्य के लिए चुनाव प्रक्रिया में सुधार संबंधित दावे पेश किए जाने की उम्मीद थी। यह बहस न सिर्फ कानूनी सुधारों तक सीमित थी, बल्कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, अतीत के दावों और वर्तमान परिस्थितियों का मिश्रण थी।

विपक्ष,के नेताओं ने भ्रष्टाचार, मतदाता-चोरी, और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर जोरदार आरोप लगाये। इनमें से कुछ आरोपों को लेकर सदन में माहौल तनावपूर्ण रहा।

साथ ही आज लोकसभा में पहले हुई चर्चा — जिसमें गिनती, मतदाता-सूची, मतदाता अधिकार, और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता शामिल थे — उसे आगे बढ़ाने की कोशिश की गई। किन्तु, बहस के दौरान कई बार व्यवधान भी हुआ, विरोध-प्रदर्शन हुए, और सदन की गरिमा भी सवालों के घेरे में रही।

आखिर में, शाम करीब सात बजे, सदन अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही अगले दिन के लिए स्थगित कर दी।

आज लोकसभा की कार्यवाही का सार यह था कि चुनाव सुधार — एक संवेदनशील, महत्वपूर्ण और भविष्य तय करने वाला मसला — एक बार फिर केन्द्र में आ गया। लेकिन जिस तरह से आरोप-प्रत्यारोप, आरोपों की राजनीति और विरोध-विग्रह चले, उससे राजनीतिक दलीय स्वार्थ, रंगभेद, और संदेह की हवा महसूस हुई।

यदि सरकार और विपक्ष पारदर्शिता, तथ्य-आधारित बहस और लोकतंत्र की मर्यादा का ध्यान रखे, तो सुधार संभव है। लेकिन आज की कार्यवाही ने यह दिखाया कि जब राजनीति और सत्ता का मसला जुड़ जाए, तो लोकतंत्र के उन स्तंभों — जैसे सम्मान, जवाबदेही, जनहित — की नींव हिल सकती है।


निष्कर्ष

आज का दिन — राज्यसभा और लोकसभा दोनों के लिए — संकेत देता है कि भारत की संसद सिर्फ विधायी संस्था नहीं रही, बल्कि राजनीति, संदेह, संघर्ष और संवेदनशील बहस का मैदान भी है।

राज्यसभा में सवालों के वापस लिए जाने और वॉकआउट ने उस सदन की समीक्षा-प्रधान भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए।

लोकसभा में चुनाव सुधार बहस ने देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया, मतदाता-पंजीकरण, और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर तीखी बहस को जन्म दिया।

यदि लोकतंत्र की नींव मजबूत करनी है — जवाबदेही, पारदर्शिता, और जनता की आवाज़ को प्राथमिकता देनी है — तो सिर्फ बहस ही नहीं, बल्कि सही नियत, जिम्मेदारी और मर्यादा की भी ज़रूरत है। (जैमिनी)