15−16 को प्रधानमंत्री का जॉर्डन, इथियोपिया और ओमान का दौरा

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जॉर्डन के महामहिम शाह अब्दुल्ला द्वितीय बिन अल हुसैन के निमंत्रण पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी 15–16 दिसंबर को जॉर्डन का दौरा करेंगे। इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री भारत और जॉर्डन के बीच सभी प्रकार के संबंधों की समीक्षा करने और क्षेत्रीय मुद्दों पर वैचारिक आदान-प्रदान करने के लिए शाह अब्दुल्ला द्वितीय बिन अल हुसैन से मुलाकात करेंगे। दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रधानमंत्री की यह यात्रा भारत-जॉर्डन द्विपक्षीय सहयोग को और मजबूत करने, साझा विकास और समृद्धि के नए अवसर तलाशने तथा क्षेत्रीय शांति, समृद्धि, सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता दोहराने का अवसर प्रस्तुत करती है।

यात्रा के दूसरे चरण में प्रधानमंत्री श नरेन्द्र मोदी इथियोपिया के प्रधानमंत्री महामहिम डॉ. अबीय अहमद अली के निमंत्रण पर 16–17 दिसंबर, 2025 को इथियोपिया का दौरा करेंगे। यह प्रधानमंत्री मोदी की प्रथम इथियोपिया यात्रा होगी। प्रधानमंत्री मोदी, प्रधानमंत्री डॉ. अबीय अहमद अली के साथ भारत–इथियोपिया द्विपक्षीय संबंधों के सभी पहलुओं पर व्यापक चर्चा करेंगे। ग्लोबल साउथ के साझेदारों के रूप में, यह यात्रा  दोनों देशों की मित्रता एवं द्विपक्षीय सहयोग को और प्रगाढ़ बनाने की साझा प्रतिबद्धता को दोहराएगी।

यात्रा के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक के निमंत्रण पर 17–18 दिसंबर, 2025 को ओमान का दौरा करेंगे। यह प्रधानमंत्री मोदी की ओमान की दूसरी यात्रा होगी । भारत और ओमान के बीच व्यापक सामरिक भागीदारी है, जो सदियों पुरानी मित्रता, व्यापारिक संबंधों और जनता के बीच मजबूत संबंधों पर आधारित है। प्रधानमंत्री की यह यात्रा दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना के 70 वर्ष पूरे होने पर तथा ओमान के महामहिम सुल्तान के दिसंबर 2023 में भारत के राजकीय दौरे के बाद हो रही है। यह यात्रा दोनों पक्षों के लिए व्यापार, निवेश, ऊर्जा, रक्षा, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि और संस्कृति के क्षेत्रों सहित द्विपक्षीय साझेदारी की व्यापक समीक्षा करने के साथ ही साथ क्षेत्रीय और वैश्विक हितों के मुद्दों पर वैचारिक आदान-प्रदान करने का अवसर प्रस्तुत करेगी।

प्रधानमंत्री ने एफआईएच हॉकी पुरुष जूनियर विश्व कप 2025 में भारत की पुरुष जूनियर हॉकी टीम को कांस्य पदक जीतने पर बधाई दी

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प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने आज एफआईएच हॉकी पुरुष जूनियर विश्व कप 2025 में इतिहास रचने पर भारत की पुरुष जूनियर हॉकी टीम को बधाई दी।

प्रधानमंत्री ने इस प्रतिष्ठित वैश्विक टूर्नामेंट में भारत का अब तक का पहला कांस्य पदक हासिल करने वाली युवा और ऊर्जावान टीम की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह उल्लेखनीय उपलब्धि भारत के युवाओं की प्रतिभा, संकल्प और दृढ़ता को प्रतिबिंबित करती है।

एक्स पर एक पोस्ट में, श्री मोदी ने लिखा:
“एफआईएच हॉकी पुरुष जूनियर विश्व कप 2025 में इतिहास रचने पर हमारी पुरुष जूनियर हॉकी टीम को बधाई! हमारी युवा और ऊर्जावान टीम ने इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में भारत का अब तक का पहला कांस्य पदक हासिल किया है। यह अद्भुत उपलब्धि देशभर के अनगिनत युवा खिलाड़ियों को प्रेरित करती है।”

भारत ने बुधवार को चेन्नई में हुए एफआईएच पुरुष जूनियर विश्व कप में अर्जेंटीना को 4-2 से हराकर कांस्य पदक अपने नाम किया।

प्रतिबंधित ई-सिगरेट की संसद में गूंज

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                                     बाल मुकुन्द ओझा

 ई-सिगरेट एक बार फिर चर्चा में है। भारत सरकार ने साल 2019 में ई-सिगरेट को देश में पूरी तरह से बैन कर दिया था और ई-सिगरेट से जुड़ी सभी गतिविधियों को गैर कानूनी घोषित माना गया। इसके बावजूद देश में ई-सिगरेट का प्रयोग करने वालों की कमी नहीं है। पुलिस ने कई बार छापेमारी कर ई-सिगरेट को जब्त भी किया है। अब तो ई-सिगरेट देश की संसद में भी पहुँच गई है। बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने लोकसभा में यह कहकर सनसनी फैला दी की सदन में एक सांसद ई-सिगरेट पी रहा है। उन्होंने कहा सदन की कार्यवाही के दौरान तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद को ई-सिगरेट पीते हुए देखा गया है।. बीजेपी नेता ने पूछा कि क्या संसद के भीतर ऐसे उपकरणों के इस्तेमाल की इजाजत है? जैसे ही यह आरोप लगा, सदन में शोर मच गया। ठाकुर ने सीधे लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला से पूछा कि क्या ई-सिगरेट के इस्तेमाल की अनुमति उन्होंने दी है। स्पीकर ने स्पष्ट करते हुए कहा, नहीं, किसी को भी इसकी अनुमति नहीं है। इस बयान के बाद माहौल और गंभीर हो गया। ठाकुर ने मांग की कि जो भी सांसद इस प्रतिबंधित डिवाइस का इस्तेमाल कर रहा है, उसके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। बाद में तृणमूल के एक वरिष्ठ सांसद सौगात राय को संसद परिसर में ई- सिगरेट के कश लेते हुए देखा गया। बीजेपी नेताओं द्वारा टोके जाने पर सौगत रॉय दिल्ली प्रदूषण की आड़ में अपने किए को जायज ठहराते सुने गए। उन्होंने कहा, आप लोगों ने दिल्ली को क्या बना दिया है। यहां तो सांस लेना 25 सिगरेट पीने के बराबर है। केंद्रीय मंत्रियों ने सार्वजनिक स्थल का हवाला देते हुए सिगरेट पीने पर टोका तो वे इसे नकारते हुए चले गए। यह उल्लेखनीय है देश में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर रोक है।

ऐसे में सवाल उठता है कि ई-सिगरेट आखिर है क्या? ये आम सिगरेट से कितना खतरनाक होता है। भारत में इसे कब बैन किया गया और इसे पीने और बेचे जाने पर किस तरह की सजा का प्रावधान है? ई-सिगरेट से कई प्रकार के विषैले पदार्थ निकलते हैं जिससे कई बीमारियां होती हैं और इसका जहर अचानक शरीर के किसी भी हिस्सों को प्रभावित करता है। ई-सिगरेट में निकोटिन पाया जाता है और अगर निकोटिन का सेवन शुद्ध रूप में किया जाय तो कैंसर जैसी घातक बीमारी भी हो सकती है। ई सिगरेट स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत हानिकारक है. इसमें फार्मेल्डिहाइड, भारी धातुएं, बेंजीन जैसे तत्व होते हैं जो कैंसरकारी होते हैं। इसमें मौजूद ई तरल पदार्थ में ग्लाइकोजेन और निकोटिन पाया है जो जहरीला होता है। लगभग 37 देशों में ई-सिगरेट पर बैन है। भारत भी इन्हीं देशों में से एक है। भारत सरकार ने साल 2019 में ई-सिगरेट को देश में पूरी तरह से बैन कर दिया था और ई-सिगरेट से जुड़ी सभी गतिविधियों को गैर कानूनी घोषित माना गया है। बात की जाए सजा की तो इस कानून में पहली बार अपराध करने पर 1 साल तक की जेल या 1 लाख रुपए तक का जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है । इसी के साथ दूसरी बार अपराध करने पर 3 साल तक की जेल के साथ 5 लाख रुपए तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है ।

भारत सरकार ने देश में ई-सिगरेट पर प्रतिबन्ध लगा दिया मगर सिगरेट पर नहीं। यह विवेचना का विषय हो सकता है की ई-सिगरेट ज्यादा खतरनाक है या सिगरेट। मगर यह बिलकुल सही है की हमारी सेहत के लिए दोनों ही खतरनाक है। एक सांपनाथ है तो दूसरा नागनाथ। महानगरों में ई-सिगरेट का प्रचलन बढ़ गया था। धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक होता हैं। ये बात टीवी, न्यूज पेपर, होर्डिंग में दिखने वाले विज्ञापनों में कई बार देखने को मिलती हैं. यहाँ तक कि सिगरेट के पैकेट पर भी लिखा होता हैं कि सिगरेट पीना हानिकारक हैं और  इससे कर्करोग होता है। लेकिन इसके बावजूद लड़के और लड़किया धड़ले  सिगरेट फूंकते जाते हैं। अब जबकि देश में ई-सिगरेट पर रोक लग चुकी है तो सिगरेट से होने वाले नुक्सान से भी लोगों को सावचेत करने की जरूरत है क्योंकि  ई-सिगरेट पीने वालो ने अब सिगरेट पीना शुरू कर दिया है।

विभिन्न शोधों से जो परिणाम सामने आये हैं वे इस बात की पुष्टि करते हैं कि धूम्रपान, रक्त संचार की व्यवस्था पर हानिकारक प्रभाव डालता है। धूम्रपान का सेवन और न चाहते हुए भी उसके धूएं का सामना, हृदय और मस्तिष्क की बीमारियों का महत्वपूर्ण कारण है। इन अध्ययनों में पेश किये गये आंकड़े इस बात के सूचक हैं कि कम से कम सिगरेट का प्रयोग भी जैसे एक दिन में पांच सिगरेट या कभी कभी सिगरेट का सेवन अथवा धूम्रपान के धूएं से सीधे रूप से सामना न होना भी हृदय की बीमारियों से ग्रस्त होने के लिए पर्याप्त है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी .32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

           

तमिलनाडु राजभवन में राज्यपाल आरएन रवि ने किया सम्मानित

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हरियाणा के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामनिवास ‘मानव’ को, भाषा, साहित्य और अनुवाद के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के दृष्टिगत, आज चेन्नई में विशिष्ट साहित्य-सेवा सम्मान प्रदान किया गया। तमिलनाडु राजभवन और सीआईसीटी, भारत सरकार, चेन्नई द्वारा महाकवि सुब्रमण्यम भारती की 144वीं जन्म-जयंती और भारतीय भाषा दिवस-2025 के उपलक्ष्य में, राजभवन में आयोजित एक भव्य समारोह में तमिलनाडु के राज्यपाल महामहिम आरएन रवि ने शाॅल और प्रतीक-चिह्न भेंट कर उन्हें सम्मानित किया। इस अवसर पर राजभवन के प्रधान सचिव और भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी आर. किर्लोश कुमार, सीआईसीटी की उपाध्यक्ष डॉ. सुधा शेषैया और निदेशक प्रो. आर. चंद्रशेखरन सहित देश-भर से आये विभिन्न भाषाओं के शताधिक विद्वान, साहित्यकार और अनुवादक उपस्थित रहे। बता दें, डॉ. ‘मानव’ ने इसी वर्ष महान तमिल संत-कवि तिरुवल्लुवर द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ का हरियाणवी भाषा में काव्यानुवाद किया था, जिसके लिए उन्हें डेढ़ लाख का मानदेय प्राप्त हुआ है। ‘तिरुक्कुरल’ का हरियाणवी अनुवाद शीघ्र पुस्तक-रूप में प्रकाशनाधीन है।

        उल्लेखनीय है कि हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, पंचकूला की परामर्श समिति के सदस्य तथा सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) में बतौर आचार्य एवं अधिष्ठाता, सांस्कृतिक संकाय के रूप में प्रतिष्ठित डॉ. ‘मानव’ की विभिन्न विधाओं की चौंसठ महत्त्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा उनके साहित्य पर एमफिल् हेतु इक्यावन बार, पीएचडी हेतु तेईस बार और डीलिट् हेतु एक बार शोधकार्य सम्पन्न हो चुका है। देश-विदेश की सत्तर प्रमुख बोलियों और भाषाओं में उनकी विविध रचनाओं का अनुवाद हो चुका है, वहीं अनेक बोर्डों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी उनकी रचनाएँ सम्मिलित हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी, चंडीगढ़ के ‘सर्वश्रेष्ठ कृति-पुरस्कार’ और मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल के ‘अटलबिहारी वाजपेयी राष्ट्रीय कविता-पुरस्कार’ सहित देश-विदेश के अनेकानेक पुरस्कार, सम्मान और मानद उपाधियाँ भी डॉ. ‘मानव’ को प्राप्त हो चुकी हैं।

– डॉo सत्यवान सौरभ

जब इलाज भी बाज़ार बन जाए: भारत में स्वास्थ्य अधिकार की लड़ाई

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भारत में बढ़ती निजीकरण प्रवृत्ति और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय की कमी: क्या ‘स्वास्थ्य का अधिकार’ सच में न्यायालयों में लागू किया जा सकता है? जब उपचार एक सेवा नहीं, बल्कि बाज़ार की वस्तु बन जाए, तब अधिकारों की भाषा कमजोर पड़ जाती है। 

– डॉ सत्यवान सौरभ

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा और ढांचा तेजी से बदल रहा है। चिकित्सा उपचार, जो कभी सार्वजनिक दायित्व और कल्याणकारी राज्य की बुनियादी जिम्मेदारी माना जाता था, अब अधिकाधिक निजी क्षेत्र के हाथों में जाता दिख रहा है। एक ओर, सरकारी स्वास्थ्य ढांचा सीमित बजट, कम मानव संसाधन और कमजोर बुनियादी ढांचे से जूझता रहता है; दूसरी ओर, निजी अस्पतालों और कॉर्पोरेट मेडिकल चेन की पहुंच और प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इन दोनों के बीच आम नागरिक, विशेषकर गरीब, ग्रामीण, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और हाशिए पर रहने वाले समुदाय, स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत और असमान पहुंच के बोझ तले दबते जा रहे हैं।

इसी बदलते परिदृश्य में, भारत में यह बहस और तेज़ हो गई है कि क्या स्वास्थ्य को एक न्यायसंगत और लागू करने योग्य मौलिक अधिकार बनाया जाए। क्या न्यायपालिका इस अधिकार को enforce करा सकेगी, जब व्यवस्था ही बुनियादी रूप से असमान, महंगी और निजीकरण-प्रधान हो चुकी हो? यह प्रश्न केवल कानूनी नहीं है; यह गहराई से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक है। क्योंकि अधिकार तभी सार्थक होता है जब राज्य उसे प्रदान करने की सामर्थ्य और इच्छा दोनों रखता हो।

भारत में स्वास्थ्य का अधिकार अप्रत्यक्ष रूप से अनुच्छेद 21 के अंतर्गत न्यायालयों द्वारा मान्यता प्राप्त है, पर इसे अभी तक स्पष्ट रूप से एक स्वतंत्र मौलिक अधिकार नहीं बनाया गया है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि राज्य अभी तक ऐसी बाध्यकारी जिम्मेदारी स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है जिसमें हर नागरिक को समान, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण उपचार मिल सके। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि जब तक इसे एक इंफोर्सेअब्ले राइट नहीं बनाया जाएगा, तब तक असमानता, शोषण और मनमानी शुल्क वसूली जैसे मुद्दे निरंतर बढ़ते रहेंगे।

भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि देश विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है, परंतु स्वास्थ्य पर होने वाला सार्वजनिक व्यय आज भी दुनिया के सबसे कम आंकड़ों में शामिल है। जब राज्य स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पर्याप्त बजट नहीं देता, तब स्वाभाविक रूप से रिक्त स्थान निजी क्षेत्र भरता है—और यही से उत्पन्न होती है असमानता, अनियंत्रित शुल्क, अनावश्यक चिकित्सा प्रक्रियाएँ, और आम व्यक्ति की आर्थिक तबाही।

निजीकरण के विस्तार का दूसरा पहलू यह है कि यह केवल स्वास्थ्य सुविधाओं के संचालन तक सीमित नहीं है; यह स्वास्थ्य नीति, दवाओं की कीमतों, बीमा योजनाओं और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) की दिशा को भी प्रभावित कर रहा है। जब स्वास्थ्य एक लाभ आधारित उद्योग बन जाता है, तब उपचार की प्रकृति, लागत, पहुंच और गुणवत्ता सभी बाज़ार के नियमों के अधीन हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य का अधिकार कागज़ पर तो हो सकता है, पर धरातल पर वह व्यापक रूप से लागू नहीं हो पाता।

एक और गंभीर समस्या है क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट, 2010 का कमजोर क्रियान्वयन। जिन राज्यों में यह लागू भी है, वहाँ भी नियमन और पारदर्शिता बेहद कमजोर हैं। मरीज़ों से मनमाना शुल्क, अनावश्यक जाँचों की सलाह, महंगे पैकेज, और अत्यधिक दरों पर सर्जरी जैसे मुद्दे आम बात हो चुके हैं। यह स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब मरीज़ की ओर से शिकायत या न्याय पाने की व्यवस्था बेहद कमजोर और अप्रभावी हो।

इसके साथ ही, भारत में आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर अभी भी कुल स्वास्थ्य व्यय का 40% के आसपास है। यानी मरीज़ों को अपनी जेब से भारी राशि खर्च करनी पड़ती है। सरकारी बीमा योजनाओं—जैसे आयुष्मान—का उद्देश्य भले ही आर्थिक सुरक्षा देना हो, पर इनके दायरे में आने वाली प्रक्रियाएँ सीमित हैं, और निजी अस्पतालों द्वारा इनका उपयोग कई बार मनमाने ढंग से किया जाता है। बीमा आधारित मॉडल ने स्वास्थ्य खर्च की जड़ समस्या को हल नहीं किया है; बल्कि कई बार यह निजी क्षेत्र के लिए नया ग्राहक-स्रोत बन गया है।

असमानता का एक और स्तर सामाजिक बहिष्कार है। दलित, आदिवासी, मुस्लिम, महिलाएँ, ट्रांसजेंडर व्यक्ति, दिव्यांग नागरिक—इनके लिए स्वास्थ्य सेवाएँ पाने की राह और भी कठिन है। कई बार सरकारी अस्पतालों में संवेदनशीलता की कमी, भेदभाव, संचार अंतर, या संरचनात्मक बाधाएँ उन्हें गुणवत्तापूर्ण सेवा से वंचित रखती हैं। ऐसे में स्वास्थ्य का अधिकार केवल क़ानूनी भाषा भर नहीं रहना चाहिए; इसे सामाजिक न्याय की दृष्टि से समझना होगा।

स्वास्थ्य अधिकार को न्यायिक रूप से लागू करना तभी संभव है जब स्वास्थ्य प्रणाली मजबूत हो। इसके लिए सबसे पहले आवश्यक है कि सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को बढ़ाए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य पर GDP का कम से कम 5% खर्च होना चाहिए; जबकि भारत अभी 2% से भी कम खर्च करता है। प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत किए बिना, विशेषज्ञ डॉक्टरों, नर्सों और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ाए बिना, दवाओं और जांचों को सस्ता किए बिना, और स्वास्थ्य संस्थानों में जवाबदेही मजबूत किए बिना—किसी भी अधिकार का लागू होना केवल सैद्धांतिक रहेगा।

दवाओं की ऊँची कीमतें और दवा कंपनियों का प्रभाव भारत की स्वास्थ्य असमानता का एक अन्य कारण है। लगभग 80% दवाएँ अभी भी मूल्य नियंत्रण से बाहर हैं। जब तक आवश्यक दवाओं पर सख्त मूल्य नियंत्रण नहीं होगा तथा जनऔषधि प्रणाली का विस्तार नहीं होगा, गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार महंगी दवाओं के भार तले दबते रहेंगे।

साथ ही, स्वास्थ्य कर्मियों की स्थितियाँ भी इस संकट का एक महत्वपूर्ण पक्ष हैं। अस्थायी नियुक्तियाँ, कम वेतन, कार्यभार का दबाव और असुरक्षित कार्य वातावरण—ये सभी कारक चिकित्सा सेवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा तभी संभव है जब सरकार मानव संसाधनों में उचित निवेश करे।

इन सभी परिस्थितियों में, स्वास्थ्य का अधिकार तभी वास्तविक रूप से लागू हो सकता है, जब शासन संरचना अधिक पारदर्शी, विकेंद्रीकृत और जवाबदेह बने। समुदाय आधारित निगरानी तंत्र, जिला स्वास्थ्य समितियों की मजबूती, डिजिटल पारदर्शिता, और शिकायत निवारण के प्रभावी तंत्र यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि नागरिक अपने अधिकारों का दावा कर सकें और शासन उन्हें जवाब देने के लिए बाध्य रहे।

नीतिगत परिवर्तन के साथ-साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति भी आवश्यक है। स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार लंबी अवधि का कार्य है; परंतु इसकी शुरुआत तत्काल बजट बढ़ाने, निजी अस्पतालों को सख्त नियामक दायरे में लाने, दवाओं की कीमतें नियंत्रित करने, तथा प्राथमिक स्वास्थ्य ढाँचे को मजबूत करने से हो सकती है। यह न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र को अधिक न्यायसंगत बनाएगा बल्कि भविष्य के लिए स्वस्थ और उत्पादक समाज की नींव भी रखेगा।

अंततः, स्वास्थ्य को न्यायिक रूप से लागू करने योग्य बनाना भारत के संवैधानिक दर्शन—विशेषकर सामाजिक न्याय—की पुनर्पुष्टि होगा। लेकिन यह तभी सम्भव है जब सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी मजबूत हो कि वह इस अधिकार को प्रत्येक नागरिक तक पहुँचाने में सक्षम हो। यदि राज्य की प्राथमिकताएँ स्वास्थ्य सुरक्षा की बजाय बाज़ार आधारित मॉडल को बढ़ावा देने में लगी रहेंगी, तो ‘अधिकार’ शब्द अपनी प्रासंगिकता खो देगा और नागरिकों की पीड़ा बढ़ती जाएगी।

भारत को आज यह स्वीकार करना चाहिए कि स्वास्थ्य केवल आर्थिक विकास का फल नहीं, बल्कि मानव गरिमा की बुनियाद है। और जब तक इस बुनियाद को समान रूप से मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक स्वास्थ्य का अधिकार कागज़ पर तो रहेगा, पर जनता के जीवन में नहीं।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

अमित शाह ने अभिनेता धर्मेंद्र की दिल्ली में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में उनकी स्मृतियों को नमन किया

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न्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने प्रसिद्ध अभिनेता धर्मेंद्र जी की स्मृति में दिल्ली में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में उनका स्मरण कर उनकी स्मृतियों को नमन किया।

X प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि “धर्मेंद्र जी ने अपनी अभिनय कला से देशवासियों के दिलों में स्थान बनाया और उनकी अदाकारी भाषा व क्षेत्र की सीमाओं को पार कर जन-जन के मन में बस गई। भारतीय सिनेमा जगत को इस अद्वितीय अभिनेता की कमी हमेशा खलती रहेगी। आज दिल्ली में आयोजित उनकी श्रद्धांजलि सभा में उनका स्मरण कर उनकी स्मृतियों को नमन किया

राष्ट्रपति ने इम्फाल में विभिन्न विकास परियोजनाओं की आधारशिला रखी और उद्घाटन किया

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राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज शाम (11 दिसंबर, 2025) इम्फाल के सिटी कन्वेंशन सेंटर में मणिपुर सरकार द्वारा उनके सम्मान में आयोजित नागरिक अभिनंदन समारोह में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने विभिन्न विकास परियोजनाओं की आधारशिला रखी और उद्घाटन किया।पने संबोधित में राष्ट्रपति ने कहा कि मणिपुर लचीलेपन, साहस और असाधारण सांस्कृतिक समृद्धि की भूमि है। पीढ़ियों से, यहां के लोगों ने खेल, सशस्त्र बलों, कला और संस्कृति तथा सार्वजनिक सेवा सहित विभिन्न क्षेत्रों में अमूल्य योगदान देकर राष्ट्र को समृद्ध किया है।

राष्ट्रपति ने कहा कि वे मणिपुर में हुई दुर्भाग्यपूर्ण हिंसा के बाद जनता द्वारा झेले गए दर्द से अवगत हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि मणिपुर की जनता की चिंताओं का ध्यान रखना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार सद्भाव को मजबूत करने, सुरक्षा सुनिश्चित करने और स्थिरता एवं समृद्धि की राह पर मणिपुर का समर्थन करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सरकार राज्य भर में समान विकास को बढ़ावा देने के लिए भी प्रतिबद्ध है और यह सुनिश्चित करेगी कि विकास और प्रगति के लाभ राज्य के प्रत्‍येक कोने तक पहुंचें।

मणिपुर दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत के जीवंत सम्बंधों का प्रवेश द्वार है। यहां की युवा पीढ़ी, संस्कृति और प्राकृतिक सुंदरता इसे असीमित संभावनाओं वाला राज्य बनाती है। सशक्त महिलाएं मणिपुर की पहचान है। 20वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में मणिपुर की बहादुर महिलाओं द्वारा दो बार ऐतिहासिक नुपी लाल या महिला युद्ध लड़े गए। उन्‍होंने अपनी उचित मांगों को स्वीकार करने के लिए औपनिवेशिक और सामंती शक्तियों को बाध्य करने में सफलता प्राप्‍त की। वे प्रत्‍येक भारतीय के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि मणिपुर के लोग प्रतिभाशाली और मेहनती हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों के लोग नए सिरे से सद्भाव बनाए रखेंगे और राज्य को समृद्धि और सुख की नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे।

राष्ट्रपति ने मणिपुर की जनता से सद्भाव और विकास के उपायों का समर्थन जारी रखने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि हमें मिलकर मणिपुर को एक ऐसे राज्य के रूप में मजबूत करना चाहिए जहां प्रत्‍येक बच्चा सुरक्षित महसूस करे, प्रत्‍येक महिला सशक्त महसूस करे, प्रत्‍येक समुदाय अपने को मुख्‍य धारा में माने और प्रत्‍येक नागरिक उज्ज्वल भविष्य की ओर आगे बढ़े।

इससे पहले, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ऐतिहासिक मापाल कांगजेइबुंग में पोलो प्रदर्शनी मैच देखने भी पहुंची।

भारत के पहले स्वदेशी हाइड्रोजन फ्यूल सेल यात्री पोत की वाराणसी में वाणिज्यिक सेवा शुरू

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केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सरबानंदा सोनोवाल ने वाराणसी के नमो घाट पर देश के पहले पूरी तरह से स्वदेशी हाइड्रोजन ईंधन सेल यात्री पोत के वाणिज्यिक संचालन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह भारत ने अपने हरित समुद्री प्रयासों में एक बड़ा कदम उठाया है।

यह पोत भारत में समुद्री परिवेश में हाइड्रोजन ईंधन सेल प्रणोदन का प्रदर्शन करने वाला पहला पोत है। इसमें पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक का उपयोग किया गया है। यह एक निम्न तापमान प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन ईंधन सेल प्रणाली पर संचालित होता है जो संग्रहित हाइड्रोजन को बिजली में परिवर्तित करता है और उप-उत्पाद के रूप में केवल पानी उत्सर्जित करता है।

इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री सरबानंदा सोनोवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के गतिशील और दूरदर्शी नेतृत्व में भारत स्वच्छ, सतत और आत्मनिर्भर परिवहन प्रणालियों की ओर एक परिवर्तनकारी बदलाव देख रहा है। हमारे पहले स्वदेशी हाइड्रोजन ईंधन सेल पोत का शुभारंभ प्रधानमंत्री की ‘मेक इन इंडिया’ की प्रतिबद्धता और सभी क्षेत्रों में हरित गतिशीलता की ओर प्रगति का एक शानदार उदाहरण है। यह उपलब्धि हमारी पवित्र गंगा के पुनरुद्धार और संरक्षण के व्यापक मिशन को भी मजबूत करती है। जैसे-जैसे हम अपने जलमार्गों पर स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को आगे बढ़ा रहे हैं, हम न केवल नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि विकास पारिस्थितिक जिम्मेदारी के साथ-साथ चले। आज की उपलब्धि हमारे राष्ट्र के लिए एक हरित और अधिक समृद्ध समुद्री भविष्य के निर्माण के लिए प्रधानमंत्री के अटूट संकल्प को दर्शाती है ।

भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण  के स्वामित्व वाला यह पोत कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा निर्मित किया गया था। परीक्षण संचालन पूरा होने के बाद पोत सेवा में सम्मलित हुआ। यह कदम वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने की सरकार की प्रतिबद्धता के अनुरूप है और भारत के अंतर्देशीय जलमार्गों में स्वच्छ, सतत ईंधन को बढ़ावा देने के लिए मंत्रालय के प्रयासों का समर्थन करता है।

हाइड्रोजन फ्यूल सेल पोत की वाणिज्यिक सेवा की शुरुआत भारत के स्वच्छ और अधिक टिकाऊ समुद्री इकोसिस्टम के निर्माण के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्री सोनोवाल के नेतृत्व में, भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण समुद्री भारत विजन 2030 और समुद्री अमृत काल विजन 2047 के अंतर्गत उन्नत हरित प्रौद्योगिकियों और वैकल्पिक ईंधनों को अपनाने को बढ़ावा दे रहा है।

सरबानंदा सोनोवाल ने कहा कि इस हाइड्रोजन फ्यूल सेल पोत की सफल तैनाती स्वच्छ और सतत जलमार्गों की ओर भारत के परिवर्तन को गति देने के लिए हमारे मंत्रालय की गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाती है । मैं इस अग्रणी पोत की डिलीवरी के लिए कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड और कठोर परीक्षणों के बाद इसे वाणिज्यिक सेवा में शामिल करने के लिए भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण को बधाई देता हूं। यह उपलब्धि वर्ष 2070 तक भारत के नेट-जीरो लक्ष्यों को पूरा करने और अंतर्देशीय जल परिवहन क्षेत्र में अत्याधुनिक हरित प्रौद्योगिकियों को एकीकृत करने के हमारे संकल्प का प्रमाण है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के परिवर्तनकारी समुद्री भारत विजन (एमआईवी) 2030 और समुद्री अमृत काल विजन (एमएकेवी) 2047 के दीर्घकालिक रोडमैप के मार्गदर्शन में , हम देश के लिए एक आधुनिक, ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार समुद्री इकोसिस्‍टम को निरंतर आकार दे रहे हैं।

शहरी परिवहन के लिए डिज़ाइन की गई 24 मीटर लंबी कैटामरान नाव, वातानुकूलित केबिन में 50 यात्रियों को ले जा सकती है और 6.5 समुद्री मील की गति से चलती है। इसकी हाइब्रिड ऊर्जा प्रणाली में हाइड्रोजन ईंधन सेल, बैटरी और सौर ऊर्जा का संयोजन है, जिससे एक बार हाइड्रोजन भरने पर यह आठ घंटे तक चल सकती है। यह पोत भारतीय जहाजरानी रजिस्टर द्वारा प्रमाणित है।

पायलट पोत एफसीवी पायलट-01 को चालू करने के लिए, भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण, कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड और इनलैंड एंड कोस्टल शिपिंग लिमिटेड ने तकनीकी सहायता, संचालन और निगरानी को रेखांकित करते हुए एक त्रिपक्षीय समझौता किया है। इस समझौते में वित्तीय शर्तें, सुरक्षा प्रक्रियाएं, निगरानी तंत्र और पायलट चरण के दौरान आवधिक निरीक्षण के प्रावधान शामिल हैं।

वाराणसी में शुरू की गई हाइड्रोजन ईंधन सेल वाली नौका शहरी जल परिवहन को कई महत्वपूर्ण लाभ पहुंचाती है, जिनमें यात्रियों और तीर्थयात्रियों के लिए शोर-मुक्त यात्रा, केवल जल उत्सर्जन के साथ शून्य धुआं और शून्य प्रदूषण, और जलमार्गों के माध्यम से तेज आवागमन से सड़क पर भीड़भाड़ में कमी शामिल है। इससे स्थानीय पर्यटन और रोजगार के अवसरों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, साथ ही वाराणसी हाइड्रोजन-संचालित यात्री परिवहन को अपनाने वाले विश्व के पहले शहरों में से एक बन जाएगा । तकनीकी रूप से, पूरी तरह से वातानुकूलित 50 सीटों वाली यह नौका संग्रहित हाइड्रोजन पर आठ घंटे तक चल सकती है, 7 से 9 समुद्री मील की गति से चलती है, और पूरी तरह से स्वदेशी, पर्यावरण के अनुकूल तकनीक द्वारा संचालित है जो सुरक्षित और कुशल संचालन सुनिश्चित करती है।

पहली नौका यात्रा – नमो घाट से ललिता घाट तक पांच किलोमीटर की यात्रा – में मंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों और अन्य लोगों का एक दल सवार था, जो गंगा नदी पर हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाले यात्री पोत के वाणिज्यिक संचालन का संकेत था (राष्ट्रीय जलमार्ग 1)।

केंद्रीय मंत्री सरबानंदा सोनोवाल के साथ, उत्तर प्रदेश सरकार के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रविंद्र जायसवाल, परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह और राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. दया शंकर मिश्रा ‘दयालु’ सहित कई प्रतिष्ठित नेता उपस्थित थे। कई विधायक – अवधेश सिंह, नीलकंठ तिवारी, डॉ. सुनील पटेल, सौरभ श्रीवास्तव, अनिल राजभर, नील रतन सिंह और त्रिभुवन राम – के अलावा वाराणसी नगर निगम के महापौर अशोक कुमार तिवारी भी मौजूद थे। मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, जिनमें आईएएस सचिव विजय कुमार, भारतीय परिवहन मंत्रालय के अध्यक्ष सुनील पालीवाल (आईएएस) और अन्य उपस्थित थे।

हाइब्रिड इलेक्ट्रिक कैटामारन की शुरुआत के बाद, हाइड्रोजन ईंधन सेल पोत की तैनाती देश के अंतर्देशीय जल परिवहन नेटवर्क के आधुनिकीकरण और कार्बन उत्सर्जन को कम करने की भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण की दीर्घकालिक योजना को और मजबूत करती है।

भारत की खनन क्षमता को वैश्विक स्तर तक ले जाने में प्रवासी भारतीयों की अहम भूमिका

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केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी किशन रेड्डी ने बुधवार को जयपुर में आयोजित प्रवासी राजस्थानी दिवस समारोह में सभी प्रवासी भारतीयों को हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कहा कि घर से दूर रहते हुए भी भारतीय प्रवासी भारत की आत्मा से गहराई से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय प्रवासी केवल धन प्रेषण तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे निवेश, नवाचार और नए अवसर भी लाते हैं। प्रवासी भारतीयों को ‘राष्ट्रदूत’ कहे जाने की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बात का उल्लेख करते हुए श्री रेड्डी ने कहा कि वे भारत की छवि, मूल्यों और क्षमता को विश्व के हर कोने तक पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश की खनन क्षमता को अंतरराष्ट्रीय मानकों तक पहुंचाने में प्रवासी भारतीयों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

राजस्थान के विशाल प्राकृतिक संसाधनों पर प्रकाश डालते हुए श्री जी. किशन रेड्डी ने कहा कि यह राज्य न केवल देश की सांस्कृतिक विरासत का रत्न है, बल्कि खनन विरासत का भी खजाना है। उन्होंने बताया कि राजस्थान प्राचीन काल से ही खनिज निष्कर्षण और खनन प्रौद्योगिकी में अग्रणी रहा है। उन्होंने कहा कि आज भी राजस्थान भारत की खनिज सुरक्षा की रीढ़ है। यह राज्य संगमरमर, ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर और स्लेट का प्रमुख उत्पादक और निर्यातक है।

श्री रेड्डी ने कहा कि भारत का खनन क्षेत्र आज सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद के सिद्धांतों पर आधारित है, जो इसकी विकास क्षमता और देश की खनिज सुरक्षा का आधार हैं। उन्होंने कहा कि इसी ढांचे के कारण देश प्रत्येक राज्य की वास्तविक क्षमता का दोहन कर पाता है। श्री रेड्डी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में खनन क्षेत्र में ऐतिहासिक सुधार हुए हैं, जिनमें पारदर्शी नीलामी प्रणाली की शुरुआत, निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी, अन्वेषण में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष निवेश की अनुमति और व्यापार करने में सुगमता (ईज ऑफ डूइंग) में महत्वपूर्ण सुधार शामिल हैं।

श्री जी. किशन रेड्डी ने कहा कि नए निवेश और आधुनिक तकनीकों को अपनाने से देश के खनन क्षेत्र में महत्वपूर्ण अवसर खुल रहे हैं। उन्होंने 34,300 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज परियोजना पर प्रकाश डाला, जिसका उद्देश्य देश को महत्वपूर्ण खनिजों में आत्मनिर्भर बनाना है। पहली बार अन्वेषण लाइसेंसों की नीलामी की गई है। उन्होंने कहा कि सात ब्लॉकों की सफल नीलामी के साथ, इस पहल से निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने और देश में अन्वेषण प्रयासों में तेजी आने की उम्मीद है। उन्होंने बताया कि सरकार की शुरू की गई 1,500 करोड़ रुपये की पुनर्चक्रण योजना का उद्देश्य 2030 तक लगभग 3 लाख टन की वार्षिक क्षमता का सृजन करना और प्रतिवर्ष लगभग 40,000 टन महत्वपूर्ण खनिजों की पुनर्प्राप्ति सुनिश्चित करना है।

श्री जी. किशन रेड्डी ने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में भारत के कोयला क्षेत्र में पूर्ण परिवर्तन आया है। उन्होंने बताया कि वाणिज्यिक कोयला खनन में निजी क्षेत्र की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे उत्पादन में वृद्धि, कड़ी प्रतिस्पर्धा और परिचालन दक्षता में सुधार हुआ है। श्री रेड्डी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कोयला गैसीकरण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिससे निवेश के व्यापक अवसर खुल रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि देश में पहली बार भूमिगत कोयला गैसीकरण ब्लॉकों की नीलामी की गई है।

प्रधानमंत्री ने अरुणाचल प्रदेश में दुर्घटना में जान गंवाने वाले लोगों के प्रति शोक व्यक्त किया

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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ जिले में दुर्घटना में जान गंवाने वाले लोगों के प्रति शोक व्यक्त किया। उन्होंने मृतकों के परिजनों को पीएमएनआरएफ की ओर से 2 लाख रुपये और घायलों को 50,000 रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की।इस दुघर्टना में 18 व्यक्तियों केक शव अब तक बरामद हो गए हैं।

एक्स पर पोस्ट में पीएमओ इंडिया हैंडल ने कहा:

अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ जिले में दुर्घटना में हुई जानमाल की हानि से मैं व्यथित हूं। मेरी संवेदनाएं उन सभी के साथ हैं जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है। मैं घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना करता हूं।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, “मृतकों के परिजनों को पीएमएनआरएफ से 2 लाख रुपये की अनुग्रह राशि दी जाएगी। घायलों को 50,000 रुपये दिए जाएंगे।

अरुणाचल प्रदेश के चगलागाम क्षेत्र में हां 22 मजदूरों को लेकर जा रहा ट्रक गहरी खाई में गिर गया। घटना बेहद दुर्गम इलाके में होने के कारण इसकी जानकारी देर से मिल पाई। भारतीय सेना, स्थानीय पुलिस, एनडीआरएफ और प्रशासन के संयुक्त अभियान में अब तक 18 शव मिल चुके हैं, जिनमें से अधिकांश तिनसुकिया जिले के एक ही गांव के मजदूर थे जो निर्माण कार्य के लिए गए थे।

भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश के चगलागाम क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खोज और बचाव अभियान शुरू किया है। बता दें कि बुधवार को हायुलियांग-चगलागाम सड़क पर किलोमीटर 40 के पास एक वाहन दुर्घटना की जानकारी मिली थी। एकमात्र जीवित बचे व्यक्ति, जो किसी तरह चिप्रा जीआरईएफ कैंप तक पहुंच पाया, ने बताया कि 8 दिसंबर की रात 22 मजदूरों को लेकर जा रहा ट्रक खाई में गिर गया था। दुर्घटना स्थल चगलागाम से लगभग 12 किलोमीटर पहले अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में है, जहां सीमित संपर्क होने के कारण स्थानीय एजेंसियों, ठेकेदारों या किसी नागरिक प्रतिनिधि द्वारा घटना की सूचना नहीं दी जा सकी।