किसी भी लोकतांत्रिक समाज में कारागार व्यवस्था केवल अपराध और दंड का प्रतीक नहीं होती, बल्कि वह राज्य की संवेदनशीलता, मानवीय दृष्टि और संवैधानिक प्रतिबद्धता की भी कसौटी होती है। भारतीय संविधान व्यक्ति की गरिमा को सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्वीकार करता है और यह गरिमा अपराधी या कैदी बनने के बाद समाप्त नहीं हो जाती। इसी पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्देश, जिनमें जेलों में दिव्यांग कैदियों के लिए सहायता, सुविधाओं के ऑडिट और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रभावी अनुपालन पर बल दिया गया है, भारतीय कारागार व्यवस्था की एक गंभीर लेकिन लंबे समय से उपेक्षित सच्चाई को सामने लाते हैं। ये निर्देश इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि कारागारों में बंद दिव्यांग व्यक्ति न केवल स्वतंत्रता से वंचित होते हैं, बल्कि अक्सर अपने बुनियादी मानवीय अधिकारों से भी वंचित रह जाते हैं।
भारतीय जेलें ऐतिहासिक रूप से ऐसे ‘सामान्य’ शारीरिक और मानसिक मानकों पर आधारित रही हैं, जिनमें दिव्यांगता को एक अपवाद या प्रशासनिक असुविधा के रूप में देखा गया। परिणामस्वरूप, शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक या मनोसामाजिक दिव्यांगता से ग्रस्त कैदियों की आवश्यकताओं को जेल प्रशासन के ढांचे में समुचित स्थान नहीं मिल पाया। प्रवेश के समय दिव्यांगता की पहचान और पंजीकरण का अभाव, आवश्यकताओं के आकलन की कमी और अलग से किसी नीति का न होना, इन कैदियों को अदृश्य बना देता है। यह अदृश्यता ही आगे चलकर उपेक्षा, असमान व्यवहार और कभी-कभी अमानवीय स्थितियों में बदल जाती है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश इस स्थिति को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 कारागारों पर भी समान रूप से लागू होता है और ‘उचित समायोजन’ तथा ‘सुलभता’ कोई दया या विशेष सुविधा नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार हैं। इसके साथ ही, जेल परिसरों में दिव्यांगता संबंधी सुविधाओं का नियमित ऑडिट, स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुँच और कानूनी सहायता के प्रावधान को अनिवार्य मानते हुए न्यायालय ने प्रशासनिक जवाबदेही की नींव रखी है। यह दृष्टिकोण कारागारों को केवल अनुशासनात्मक संस्थान नहीं, बल्कि अधिकार-आधारित सुधार गृह के रूप में देखने की मांग करता है।
वास्तविकता यह है कि भारतीय जेलों में दिव्यांग कैदियों को अनेक स्तरों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सबसे पहली और बुनियादी समस्या सुलभता की है। अधिकांश जेल परिसरों में रैंप, रेलिंग, सुलभ शौचालय, समतल फर्श, स्पर्शनीय पथ या स्पष्ट संकेतकों का अभाव है। व्हीलचेयर उपयोग करने वाले कैदियों के लिए सीढ़ियाँ रोजमर्रा की गतिविधियों को भी असंभव बना देती हैं, जबकि दृष्टिबाधित कैदियों के लिए असमान फर्श और दिशासूचक संकेतों की कमी दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ाती है। यह स्थिति ‘समान पहुँच’ के संवैधानिक सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।
इसके साथ ही, चिकित्सा उपेक्षा एक गंभीर समस्या के रूप में उभरती है। नियमित स्वास्थ्य जांच, विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता और सहायक उपकरणों की समयबद्ध व्यवस्था का अभाव दिव्यांगता को और अधिक कष्टदायक बना देता है। कई मामलों में श्रवण यंत्र, व्हीलचेयर, छड़ी या अन्य सहायक साधनों की अनुपलब्धता कैदियों को पूरी तरह दूसरों पर निर्भर बना देती है। उपचार में विलंब से न केवल दिव्यांगता की तीव्रता बढ़ती है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
संचार संबंधी बाधाएँ इस समस्या को और गहरा कर देती हैं। श्रवणबाधित कैदियों के लिए सांकेतिक भाषा दुभाषियों का न होना, दृष्टिबाधितों के लिए ब्रेल या ऑडियो सामग्री का अभाव और बौद्धिक या मनोसामाजिक दिव्यांगता वाले कैदियों के लिए सरल भाषा में सूचना की कमी—इन सबका परिणाम यह होता है कि वे जेल नियमों, अनुशासनात्मक कार्यवाहियों, कानूनी प्रक्रियाओं और शिकायत निवारण तंत्र से लगभग कट जाते हैं। यह स्थिति न्याय तक समान पहुँच के अधिकार को कमजोर करती है।
दिव्यांग कैदियों की सामाजिक स्थिति उन्हें और अधिक असुरक्षित बनाती है। भीड़भाड़ वाली बैरकों में वे उपहास, उपेक्षा या हिंसा के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। मनोसामाजिक दिव्यांगता वाले कैदियों को अक्सर अनुचित रूप से एकांतवास या कठोर अनुशासनात्मक उपायों का सामना करना पड़ता है, जबकि उनकी स्थिति विशेष देखभाल और उपचार की मांग करती है। इस प्रकार, कारागार का वातावरण उनके लिए दंड से अधिक पीड़ा का स्रोत बन जाता है।
संवैधानिक दृष्टि से यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय है। अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन की गारंटी देता है और अनुच्छेद 39A न्याय तक समान पहुँच को राज्य का दायित्व बनाता है। ये सभी अधिकार जेल की दीवारों के भीतर भी उतने ही प्रभावी हैं। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ‘उचित समायोजन’ और ‘सुलभता’ को कानूनी अधिकार के रूप में स्थापित करता है, जबकि संयुक्त राष्ट्र का दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय हिरासत में दिव्यांग व्यक्तियों के संरक्षण और समावेशन की स्पष्ट रूपरेखा प्रदान करता है। इन मानकों की अनदेखी भारत की संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं दोनों को कमजोर करती है।
इस पृष्ठभूमि में, भारतीय कारागारों को दिव्यांगता-समावेशी बनाने के लिए व्यापक और संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। बुनियादी ढाँचे को सार्वभौमिक डिज़ाइन के सिद्धांतों के अनुरूप ढालना अनिवार्य है, जिसमें रैंप, सुलभ शौचालय, रेलिंग, स्पर्शनीय फर्श और स्पष्ट संकेतक शामिल हों। यह सुधार चरणबद्ध रूप से, मौजूदा जेलों में ‘रेट्रोफिटिंग’ के माध्यम से किया जा सकता है। इसके साथ ही, प्रवेश के समय दिव्यांगता की अनिवार्य स्क्रीनिंग, आवश्यकताओं का आकलन और डिजिटल पंजीकरण व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, ताकि किसी भी कैदी की आवश्यकता अनदेखी न रह जाए।
स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। नियमित चिकित्सीय जांच, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ, सहायक उपकरणों की उपलब्धता और विशेषज्ञों के नियमित दौरे सुनिश्चित किए जाने चाहिए। दूरस्थ जेलों में टेलीमेडिसिन एक प्रभावी समाधान हो सकता है। संचार और कानूनी पहुँच के लिए सांकेतिक भाषा दुभाषिए, ब्रेल और ऑडियो सामग्री, सरल भाषा में नियमावली और ई-मुलाकात व ई-कोर्ट जैसी डिजिटल सुविधाओं में दिव्यांग कैदियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
मानव संसाधन विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जेल कर्मियों के लिए अनिवार्य दिव्यांगता-संवेदनशीलता प्रशिक्षण, व्यवहारिक दिशानिर्देश और जवाबदेही तंत्र विकसित किए जाने चाहिए। यह प्रशिक्षण केवल औपचारिक न होकर व्यवहार में संवेदनशीलता और सहानुभूति को बढ़ावा देने वाला होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, जहाँ संभव हो, दिव्यांग कैदियों के लिए वैकल्पिक दंड, चिकित्सीय आधार पर रिहाई या सुधारात्मक उपायों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
अंततः, दिव्यांगता-समावेशी कारागार केवल प्रशासनिक सुधार का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह मानवीय गरिमा, संवैधानिक नैतिकता और न्यायपूर्ण शासन की कसौटी है। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्देश इस दिशा में एक अवसर प्रदान करते हैं—एक ऐसा अवसर, जिसमें भारतीय कारागार व्यवस्था को दंड-केंद्रित दृष्टिकोण से निकालकर अधिकार-आधारित और सुधारोन्मुख संस्था के रूप में पुनर्परिभाषित किया जा सकता है। यदि इन निर्देशों को ईमानदारी से लागू किया जाए, तो कारागार न केवल कानून के पालन का स्थल होंगे, बल्कि वे उस संवैधानिक आदर्श के सच्चे प्रतिनिधि बन सकेंगे, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति—चाहे वह स्वतंत्र हो या हिरासत में—गरिमा और न्याय का अधिकारी है।
– डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर प्रदेश में 17 दिसम्बर 2025 से 45 दिनों तक ‘‘जन जन की सरकार-जन जन के द्वार’’ अभियान संचालित किया जाएगा। इस अभियान के दौरान विभिन्न न्याय पंचायतों एवं ग्राम पंचायतों में कैम्प लगाकर आम आदमी से जुड़ी योजनाओं का लाभ जन सामान्य तक उपलब्ध कराया जाना सुनिश्चित किया जाएगा। इस अभियान में राजस्व, ग्राम्य विकास, पंचायती राज, कृषि, समाज कल्याण सहित 23 विभाग शामिल रहेंगे। इस संबंध में सभी संबंधित विभागों को स्पष्ट दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं।
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देशों के अनुपालन में सचिव सामान्य प्रशासन श्री विनोद कुमार सुमन ने इस संबंध में प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को पत्र प्रेषित किया है। पत्र में प्रदेश में केन्द्र तथा राज्य सरकार की योेजनाओं का व्यापक प्रचार प्रसार करने और जरूरतमंद लोगों को विभिन्न योजनाओं का लाभ पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।
सचिव के अनुसार इस अभियान के तहत विभिन्न न्याय पंचायतों में कैम्प लगाने तथा न्याय पंचायत/ग्राम पंचायतों में विभिन्न योजनाओं का लाभ प्रदान किए जाने हेतु ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण करते हुए जन सामान्य से आवेदन पत्र प्राप्त किए जाएंगे और उस पर कार्यवाही की जाएगी।
सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारतीय सैन्य अकादमी में 157वीं पासिंग आउट परेड का अवलोकन किया।देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी आज अपने ऐतिहासिक ड्रिल स्क्वायर में आयोजित 157वीं पासिंग आउट परेड के अवसर पर गौरव, परंपरा और सैन्य वैभव से ओतप्रोत दिखाई दी। इस गरिमामय समारोह में अधिकारी कैडेटों को भारतीय सेना में विधिवत कमीशन प्रदान किया गया। यह अवसर अकादमी के चिरस्थायी आदर्श वाक्य “वीरता एवं बुद्धिमत्ता” की जीवंत अभिव्यक्ति था, जो कैडेटों के कठोर प्रशिक्षण, अनुशासन, समर्पण और अदम्य साहस का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है।
सेना प्रमुख (सीओएएस) जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने परेड का अवलोकन किया और नव नियुक्त अधिकारियों को उनके प्रशिक्षण को सफलतापूर्वक पूर्ण करने पर हार्दिक बधाई दी। इस अवसर पर अधिकारी कैडेटों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सैन्य पेशा मात्र एक आजीविका नहीं, बल्कि एक पवित्र आह्वान है, जो अटूट समर्पण, निस्वार्थ सेवा और आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान की अपेक्षा करता है। जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारतीय सैन्य अकादमी की गौरवशाली विरासत की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस प्रतिष्ठित संस्थान ने सदैव दूरदर्शी नेतृत्व और साहसी अधिकारियों को गढ़ा है, जिन्होंने बार-बार शौर्य, कर्तव्य एवं सम्मान की सर्वोच्च परंपराओं को अक्षुण्ण रखा है।
सेना प्रमुख ने आधुनिक सुरक्षा परिवेश की गतिशील, जटिल व बहुआयामी प्रकृति का उल्लेख किया, जो तीव्र गति से सैन्य, तकनीकी तथा सामाजिक क्षेत्रों में विस्तार कर रहा है। ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि समकालीन संघर्षों में कूटनीति और निर्णायक सैन्य कार्रवाई के बीच निर्बाध एवं प्रभावी समन्वय अत्यंत आवश्यक है। सेना प्रमुख ने यह भी कहा कि भारतीय सेना आधुनिकीकरण व नवाचार के मार्ग पर निरंतर अग्रसर है और नवनियुक्त अधिकारी इस परिवर्तनशील यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अनिश्चित और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में नेतृत्व के महत्व पर बल देते हुए कहा कि भविष्य की चुनौतियां हमेशा स्पष्ट समाधान प्रस्तुत नहीं करेंगी, बल्कि वे अधिकारियों की अनुकूलन क्षमता, विवेकशील निर्णय-क्षमता तथा नैतिक ईमानदारी की सच्ची परीक्षा लेंगी।
सेना प्रमुख ने नवनियुक्त युवा अधिकारियों से उदाहरण प्रस्तुत करते हुए नेतृत्व करने, उच्चतम नैतिक आचरण बनाए रखने और अपने अधीनस्थ जवानों के लिए मार्गदर्शक एवं प्रेरणास्रोत बनने का आग्रह किया। उन्होंने अधिकारियों से नैतिक साहस, रचनात्मक सोच और संकट के समय में संयम व संतुलन का प्रदर्शन करने का आह्वान किया। सेना प्रमुख ने 14 मित्र देशों के 34 विदेशी अधिकारी कैडेटों द्वारा प्रशिक्षण को सफलतापूर्वक पूर्ण करने पर उनकी सराहना की। उन्होंने कहा कि भारतीय सैन्य अकादमी से ये मित्रवत संबंध देशों के बीच रक्षा सहयोग और आपसी विश्वास को सुदृढ़ करने वाले स्थायी बंधनों का प्रतीक हैं। जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने प्रशिक्षकों एवं अकादमी कर्मियों की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने चरित्रवान, सक्षम और दृढ़ निश्चयी अधिकारियों के निर्माण में उत्कृष्टता के प्रति उनके सतत समर्पण की प्रशंसा की। इस अवसर पर सेना प्रमुख ने गर्वित माता-पिता के त्याग, विश्वास और समर्थन के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए एक कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से उन्हें धन्यवाद दिया कि उन्होंने अपने पुत्रों को देश की रक्षा के पवित्र दायित्व के लिए समर्पित किया।
जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने चाणक्य के शाश्वत ज्ञान का स्मरण कराते हुए उत्तीर्ण होने वाले अधिकारी कैडेटों को यह संदेश दिया कि भौतिक संपदा और स्वयं जीवन क्षणभंगुर हैं, किंतु धर्म—अर्थात् कर्तव्य, नैतिकता तथा सत्यनिष्ठा—शाश्वत हैं। उन्होंने प्रत्येक अधिकारी से राष्ट्रसेवा में सम्मान, निष्ठा और साहस की उच्चतम परंपराओं को अक्षुण्ण रखने का आह्वान किया। मुख्य अतिथि ने अपने संबोधन के समापन में युवा अधिकारियों से सदैव सजग, तैयार व समय से आगे रहने का आग्रह किया। उन्होंने अधिकारियों को भारत की संप्रभुता और भविष्य की सुरक्षा के सच्चे संरक्षक के रूप में गर्व, आत्मविश्वास एवं अटूट संकल्प के साथ सेवा करने के लिए प्रेरित किया।
इस अवसर पर 157वें नियमित पाठ्यक्रम, 46वें तकनीकी प्रवेश योजना पाठ्यक्रम, 140वें तकनीकी स्नातक पाठ्यक्रम, 55वें विशेष कमीशंड अधिकारी पाठ्यक्रम और प्रादेशिक सेना ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा 2023 पाठ्यक्रम से कुल 525 अधिकारी कैडेटों के साथ-साथ 14 मित्र देशों के 34 अधिकारी कैडेटों को कमीशन दिया गया। उनकी सेवा में नियुक्ति भारत के रक्षा नेतृत्व को मजबूत करने और मित्र देशों के साथ स्थायी सैन्य साझेदारी की निरंतरता दोनों का प्रतीक है।
इस गरिमामय समारोह में गर्वित माता-पिता, परिवारजन, वरिष्ठ सैन्य अधिकारी तथा अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे। परेड का समापन पारंपरिक ‘अंतिम पग’ के भावपूर्ण क्षण के साथ हुआ, जब युवा अधिकारी राष्ट्र की संप्रभुता, सम्मान एवं आदर्शों की रक्षा का संकल्प लेकर आत्मविश्वास के साथ अपने दायित्व पथ पर अग्रसर हुए।
समीक्षा अधिकारी द्वारा प्रदान किए गए पुरस्कार: –
• स्वॉर्ड ऑफ ऑनर – अकादमी कैडेट एडजुटेंट निशकल द्विवेदी
• रजत पदक (योग्यता क्रम में द्वितीय स्थान) – बटालियन अंडर ऑफिसर बादल यादव
• कांस्य पदक (योग्यता क्रम में तीसरा स्थान) – वरिष्ठ अवर अधिकारी कमलजीत सिंह
• रजत पदक (योग्यता क्रम में प्रथम – तकनीकी स्नातक पाठ्यक्रम) – अधिकारी कैडेट जाधव सुजीत संपत
• रजत पदक (योग्यता क्रम में प्रथम – तकनीकी प्रवेश योजना – 46) – विंग कैडेट कैप्टन अभिनव मेहरोत्रा
रजत पदक (विशेष कमीशन अधिकारी) – अधिकारी कैडेट सुनील कुमार छेत्री
• पदक (योग्यता क्रम में प्रथम – विदेशी कैडेट) – बांग्लादेश के जूनियर अंडर ऑफिसर मोहम्मद सफिन अशरफ को दिया गया।
• चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ बैनर – इम्फाल कंपनी (शरदकालीन सत्र 2025 के लिए 12 कंपनियों में से समग्र रूप से प्रथम स्थान)
इस 157वें बैच द्वारा नेतृत्व और सेवा की अपनी यात्रा का शुभारंभ करने के साथ ही भारतीय सैन्य अकादमी एक अग्रणी संस्थान के रूप में अपनी गौरवशाली विरासत की पुनः पुष्टि करती है। यह ऐसे अधिकारियों को तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है, जो साहस, व्यावसायिकता और राष्ट्र के लिए अटूट समर्पण के साथ नेतृत्व करेंगे।
असम सरकार के सहकारिता विभाग द्वारा, भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय के मार्गदर्शन में आयोजित तीन दिवसीय चौथे सहकारिता मेला 2025 का आज चांदमारी स्थित एईआई ग्राउंड में उद्घाटन किया गया। यह तीन दिवसीय मेला 13 से 15 दिसंबर 2025 तक आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य असम में सहकारिता आंदोलन की शक्ति, विविधता और संभावनाओं को प्रदर्शित करना है।
इस मेले का औपचारिक उद्घाटन भारत सरकार के केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री कृष्ण पाल गुर्जर ने असम सरकार के सहकारिता मंत्री जोगेन मोहन की गरिमामयी उपस्थिति में किया।
गुवाहाटी में आयोजित सहकारिता मेले को संबोधित करते हुए केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री ने कहा कि असम में सहकारिता आंदोलन राज्य की गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं का स्वाभाविक विस्तार है। उन्होंने क्षेत्र के महान संत विभूतियों महापुरुषश्रीमंतशंकरदेव और महापुरुषमाधवदेव को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि एकता, समानता और समाज सेवा पर आधारित उनकी शिक्षाएं ही सहकारिता की भावना की मूल आधारशिला हैं।
केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के निर्णायक नेतृत्व और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में “सहकार से समृद्धि” की राष्ट्रीय परिकल्पना, सशक्त वास्तविकता में परिवर्तित हो रही है। उन्होंने वर्ष 2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना को एक ऐतिहासिक कदम बताया, जिसने भारत में वर्ष 2047 तक एक सर्वांगीण, विश्वस्तरीय सहकारिता प्रणाली के निर्माण के लिए आवश्यक संस्थागत प्रोत्साहन और स्पष्ट रोडमैप प्रदान किया है।
श्री गुर्जर ने विशेष रूप से असम में सहकारिता क्षेत्र में हो रहे तेज़ सुधारों की सराहना करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. हिमंतबिस्वासरमा के गतिशील नेतृत्व और राज्य के सहकारिता मंत्री श्रीजोगेनमोहन के समर्पित प्रयासों को इसका श्रेय दिया। उन्होंने कहा कि राज्य स्तर पर सक्रिय और प्रभावी क्रियान्वयन के चलते असम प्रमुख राष्ट्रीय पहलों में अग्रणी बनकर उभरा है।
उन्होंने बताया कि प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स) के 100 प्रतिशतकंप्यूटरीकरण की दिशा में असम ने उल्लेखनीय प्रगति की है, जहां 800 सेअधिकपैक्सने नएमॉडलउपविधियों को अपनाया है। इस प्रगति से युवाओं और महिलाओं को सशक्त किया जा रहा है, विभिन्न क्षेत्रों में उद्यमिता को बढ़ावा मिल रहा है और 32 लाखसेअधिकसदस्यों को वित्तीय समावेशन का लाभ मिल रहा है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि असम अब राष्ट्रीयसहकारितानीति 2025 के उस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के अनुरूप पूरी तरह अग्रसर है, जिसके अंतर्गत वर्ष 2026 तक प्रत्येक गांव में एक सहकारी संस्था की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने राज्य के लिए एक समृद्ध, आत्मनिर्भर और सहकारिता-आधारित भविष्य के निर्माण हेतु सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया।
चौथेसहकारितामेले में अपने संबोधन में असम सरकार के सहकारिता मंत्री श्रीजोगेनमोहन ने इस मेले को जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण का एक जीवंत मंच बताया। उन्होंने प्रतिभागियों की विशेष रूप से सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर अपशिष्ट को उपयोगी संसाधनों में बदलते हुए आत्मनिर्भरता और अद्भुत नवाचार क्षमता का परिचय दिया है।
उन्होंने बताया कि ये सहकारी संस्थाएं आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन से लेकर महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और युवाओं की सफलता तक, विभिन्न क्षेत्रों में लोगों को व्यापक लाभ पहुंचा रही हैं।
इस सहकारिता मेले में 160 सहकारीसंस्थाओं की भागीदारी है, जो हथकरघा, मत्स्य पालन, डेयरी, कृषि तथा युवा एवं महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों जैसे प्रमुख क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। यह मेला स्थानीय उत्पादों, नवाचारों और सहकारिता की सफलता की कहानियों को प्रदर्शित करने के लिए एक सशक्त मंच प्रदान कर रहा है।
मेला आगामी दो दिनों तक जारी रहेगा, जिसमें प्रदर्शनियां, संवाद और ज्ञान-साझा सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिनका उद्देश्य राज्य में सहकारिता आधारित विकास को और अधिक प्रोत्साहित करना है।
स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) ने नवंबर 2025 में बिक्री में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, जिसमें पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 27% वृद्धि हासिल की। नवंबर 2025 में रिटेल बिक्री में उल्लेखनीय 69% की वृद्धि दर्ज हुई और यह 0.14 मिलियन टन (एमटी) रही, जबकि पिछले वर्ष इसी माह में यह 0.084 एमटी थी। यह वृद्धि विभिन्न उत्पाद श्रेणियों और वितरण चैनलों में उल्लेखनीय प्रदर्शन से संभव हुई, जिनमें घरेलू सेलएबल स्टील, रोड डिस्पैच और वेयरहाउस से डोर डिलीवरी शामिल हैं। इस माह सेल देश में टीएमटी बार्स की सबसे बड़ी विक्रेता के रूप में भी उभरी।
इस मासिक गति पर आगे बढ़ते हुए, सेल ने अप्रैल–नवंबर 2025 की अवधि में मजबूत समग्र प्रदर्शन दर्ज किया, जिसमें कुल 12.7 एमटी बिक्री हुई, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि के 11.1 एमटी की तुलना में 14% की वृद्धि है।
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यह सुदृढ़ प्रदर्शन एक मजबूत बिक्री रणनीति और बाज़ार में सेल टीम के निरंतर प्रयासों से संभव हुआ, जबकि कंपनी को वैश्विक मूल्य दबावों और वैश्विक व्यापार नीति की अनिश्चितताओं तथा भू-राजनीतिक तनावों से उत्पन्न मांग अस्थिरता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
अप्रैल–नवंबर 2025 के दौरान रिटेल चैनल बिक्री भी काफी मजबूत रही, जो 0.97 एमटी रही और पिछले वर्ष की इसी अवधि के 0.86 एमटी की तुलना में 13% वृद्धि दर्ज की। कंपनी ने यह भी जोड़ा कि यह वृद्धि चल रहे राष्ट्रव्यापी ब्रांड प्रचार अभियानों से समर्थित है।
ये परिणाम चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों में सेल की ग्राहक-केंद्रित प्रयासों, बाजार नेतृत्व और परिचालन उत्कृष्टता को प्रदर्शित करते हैं, जो विभिन्न खंडों में निरंतर वृद्धि सुनिश्चित करते हैं। सेल भविष्य में और अधिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए प्रयासरत है।
वंदे भारत ट्रेनों में स्थानीय व्यंजन परोसे जाएंगे इसे धीरे-धीरे सभी ट्रेनों में लागू किया जाएगा
केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णमंत्री ने अधिकारियों को वंदे भारत ट्रेनों में संबंधित क्षेत्र के स्थानीय व्यंजन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। स्थानीय व्यंजन शुरू करने से यात्रियों का अनुभव काफी बेहतर होगा क्योंकि इससे यात्रा के दौरान मिलने वाले भोजन में उस क्षेत्र की संस्कृति और स्वाद की झलक मिलेगी। यह सुविधा भविष्य में धीरे-धीरे सभी ट्रेनों में लागू की जाएगी।केंद्रीय रेल मंत्री, सूचना एवं प्रसारण मंत्री और इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने आज रेल भवन में अधिकारियों की समीक्षा बैठक ली। इस बैठक में रेल एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री श्री रवनीत सिंह बिट्टू भी उपस्थित थे।
केंद्रीय मंत्री ने यह भी बताया कि फर्जी पहचान के जरिए ट्रेन टिकट बुकिंग पर भारतीय रेलवे की कार्रवाई से सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। उपयोगकर्ता की पहचान स्थापित करने और फर्जी आईडी का पता लगाने के लिए एक सख्त प्रणाली लागू होने के बाद, आईआरसीटीसी वेबसाइट पर प्रतिदिन लगभग 5,000 नई यूजर आईडी बनाई जा रही हैं। नवीनतम सुधारों से पहले, यह संख्या प्रतिदिन लगभग एक लाख नई यूजर आईडी तक पहुंच गई थी।
इन प्रयासों से भारतीय रेलवे को 3.03 करोड़ फर्जी खातों को निष्क्रिय करने में मदद मिली है। इसके अलावा, 2.7 करोड़ यूजर आईडी को या तो अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है या उनकी संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर बंद करने के लिए चिह्नित किया गया है।
केंद्रीय मंत्री और राज्य मंत्री ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि टिकट प्रणाली में इस स्तर तक सुधार किया जाए जहां सभी यात्री एक वास्तविक और प्रामाणिक यूजर आईडी के माध्यम से आसानी से टिकट बुक कर सकें।
नमामि गंगा कार्यक्रम के तहत जुलाई 2021 में 8.25 करोड़ रुपये की लागत से बिहार के गोपालगंज जिले में नारायणी नदी पर दो घाटों का निर्माण पूरा किया गया और उन्हें संबंधित शहरी स्थानीय निकायों को सौंप दिया गया।
अंतर्देशीय जलमार्ग परिवहन को सुगम बनाने के लिए मंगलपुर (नौतन) के पास एनडब्ल्यू-37 (गंडक नदी) और बेतिया में इसके सामने के तट पर 3 करोड़ रुपये की लागत से दो घाट पहले ही बनाए जा चुके हैं।
वित्त वर्ष 2017-18, 2018-19 और 2019-20 में एनडब्ल्यू-37 (गंडक नदी) पर हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण सहित जलमार्ग विकास कार्य क्रमशः 5.32 करोड़ रुपये, 7.59 करोड़ रुपये और 8.49 करोड़ रुपये की कुल लागत से संपन्न किए गए थे।
केन्द्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री श्री सर्बानंद सोनोवाल जी ने लोकसभा में लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।
ग्रामीण विकास और संचार राज्य मंत्री डॉ. पेम्मासानी चंद्र शेखर ने लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए सामूहिक कार्रवाई का आह्वान किया और सभी हितधारकों से “एक आवाज, एक संकल्प, समानता के लिए एक नई शुरुआत” के संकल्प के साथ आगे बढ़ने का आग्रह किया।
राज्य स्तरीय ‘नयी चेतना 4.0’ के शुभारंभ के अवसर पर जनसभा को संबोधित करते हुए . डॉ पेम्मासानी ने इस पहल को लिंग आधारित हिंसा के विरुद्ध एक शक्तिशाली जन आंदोलन कहा और हिंसा के सभी रूपों को समाप्त करने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी का आह्वान किया।
इस कार्यक्रम के अंतर्गत, डॉ पेम्मासानी ने गुंटूर में लैंगिक संसाधन केंद्र (जीआरसी) का उद्घाटन किया। जीआरसी महिलाओं के लिए एक सर्व-समावेशी सहायता प्रणाली के रूप में कार्य करेगा जो जमीनी स्तर पर समय पर सहायता, सुरक्षा और न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए परामर्श, कानूनी सहायता, विशेषज्ञ सलाह और आजीविका संपर्क प्रदान करेगा।
गुंटूर में आंध्र प्रदेश की नारी शक्ति को संबोधित करते हुए, उन्होंने एक ऐसे बदलते ग्रामीण भारत के निर्माण के लक्ष्य का उल्लेख किया जहां प्रत्येक महिला सुरक्षित हो, गरिमापूर्ण जीवन जी सके और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो। उन्होंने महिला सशक्तिकरण को समावेशी और टिकाऊ विकास की आधारशिला बताया।
डॉ पेम्मासानी ने इस बात पर बल दिया कि महिलाओं को सशक्त बनाना सामाजिक प्रगति को गति देता है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना राष्ट्र को मजबूत बनाता है। उन्होंने दोहराया कि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान भारत के विकास और लचीलेपन के लिए मूलभूत हैं।
2021 में शुरू हुआ ‘नई चेतना’ अभियान अब एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन बन चुका है जिसे लगभग 1 करोड़ स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) की महिलाएं चला रही हैं। देशभर में 13 लाख से अधिक बैठकों और कार्यक्रमों के माध्यम से 4 करोड़ से अधिक ग्रामीण नागरिकों ने जागरूकता कार्यक्रमों में भाग लिया है। यह पहल 12 केंद्रीय मंत्रालयों के समन्वय से कार्यान्वित की जा रही है, जिसमें महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और आर्थिक सशक्तिकरण पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित किया गया है, जिसमें भूमि, बैंकिंग और प्रौद्योगिकी तक बेहतर पहुंच शामिल है।
इस कार्यक्रम में राज्य की गृह मंत्री वंगलपुडी अनीता और राज्य के एमएसएमई, एसईआरपी और एनआरआई सशक्तिकरण एवं संबंध मंत्री कोंडापल्ली श्रीनिवास भी उपस्थित थे। इसमें 3000 से अधिक महिलाएं शामिल थीं।
केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरीराज सिंह ने आज नई दिल्ली के राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय में “क्राफ्टेड फॉर द फ्यूचर” प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।वस्त्र मंत्रालय के हस्तकला विभाग के विकास आयुक्त कार्यालय द्वारा आयोजित इस प्रदर्शनी में भारत की समृद्ध शिल्प परंपराओं और उनके सतत, समकालीन जीवन से प्रासंगिकता को
रेखांकित किया गया है। उद्घाटन करते हुए श्री गिरीराज सिंह ने कहा कि आज का युवा पारंपरिक शिल्प को समझ रहा है और वैश्विक दर्शकों के लिए प्रासंगिक समकालीन उत्पाद प्रस्तुत कर रहा है।श्री गिरीराज सिंह ने कहा कि कारीगरों को सुगमता प्रदान करने और भारत के विभिन्न शिल्पों को विश्व तक पहुंचाने के लिए सभी उपाय किए जा रहे हैं।
‘क्राफ्टेड फॉर द फ्यूचर’, की यह 10 दिवसीय प्रदर्शनी राष्ट्रीय हस्तशिल्प सप्ताह का हिस्सा है। 21 दिसंबर 2025 तक यह जनता के लिए खुली रहेगी, जिसमें सभी आगंतुकों के लिए निःशुल्क प्रवेश होगा। ‘क्राफ्टेड फॉर द फ्यूचर’, व्यापक ‘वीव द फ्यूचर’ श्रृंखला का तीसरा संस्करण है, जो दैनिक भौतिक संस्कृति पर जोर देता है—खासकर समुदायों और उनके पर्यावरण और दैनिक जीवन को आकार देने वाली सामग्रियों के बीच अंतर्निहित संबंध पर। पूरे भारत से कारीगरों और सामग्री नवप्रवर्तकों पर प्रकाश डालकर, यह पहल पारिस्थितिक संतुलन, क्षेत्रीय पहचान और गहन सामग्री बुद्धिमत्ता पर आधारित प्रथाओं को भी प्रदर्शित करती है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वस्त्र मंत्रालय की हस्तकला विभाग की विकास आयुक्त सुश्री अमृत राज ने कहा कि भारत की शिल्प बुद्धिमत्ता को जीवित रखना स्मृति को संरक्षित करने के बारे में नहीं है, बल्कि शिल्प को एक जीवंत, सांस लेने वाली शक्ति के रूप में पहचानना है जो हमारे कल को आकार दे रही है।
‘क्राफ्टेड फॉर द फ्यूचर’ प्रदर्शनी के दर्शक भारत की भौतिक संस्कृतियों की उत्पत्ति, प्रक्रियाओं और समकालीन संभावनाओं में डुबोने के लिए डिज़ाइन किए गए विभिन्न कार्यक्रमों का अनुभव कर सकते हैं।
इस प्रदर्शनी में शामिल हैं—
ऐसे मोहक संस्थापन जिसमे रोज रोज की भौतिक सामग्रियों की झलक दिखाई पड़ती है।
विशेष रूप से निर्मित हस्तशिल्प की वस्तुओं का बाजार जहाँ स्थानीय, शिल्पी कारीगर अपनी स्थानीय पुनर्चक्रीय सामग्रियों के साथ अपनी कलाकृति निर्मित की हुई हो ।
सामग्री की उत्पत्ति और शिल्प प्रक्रियाओं पर दैनिक फिल्म स्क्रीनिंग, प्रदर्शन तथा संवाद।
मिट्टी के बर्तन, कढ़ाई, ऊन, बांस, प्राकृतिक रंग, खाद्य परंपराओं आदि में कारीगरों, डिजाइनरों तथा अभ्यासकर्ताओं द्वारा संचालित हैंड्स-ऑन वर्कशॉप (वर्कशॉप के लिए पंजीकरण आवश्यक)।
यह आयोजन कला निर्माण सामग्री की उत्पत्ति और शिल्प-नेतृत्व वाले पारिस्थितिक ज्ञान तंत्रों के साथ जनता की भागीदारी बढे इस बात को प्रोत्साहित करता है। साथ ही कलाकृति की पारिस्थितिकी तंत्र जनित ज्ञान प्रणाली को पूरी गहराई से यह लोगो को अवगत कराता है की कैसे निर्माण सामग्री और कारीगरों से एक चेतनशील और सतत संबंधों के माध्यम से सतत भविष्य को आकार देने की गहरी समझ विकसित हो उद्घाटन समारोह में वस्त्र मंत्रालय की डीसी हैंडीक्राफ्ट्स सुश्री अमृत राज, संयुक्त राष्ट्र रेसिडेंट कोऑर्डिनेटर कार्यालय, भारत की चीफ ऑफ स्टाफ सुश्री राधिका कौल बत्रा, पर्यावरणीय पुनर्स्थापक सुश्री पद्मावती द्विवेदी तथा गिव मी ट्रीज ट्रस्ट के संस्थापक स्वामी प्रेम परिवर्तन (पीपल बाबा) उपस्थित थे
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने आज होटल एमरॉल्ड ग्रैण्ड, सहस्त्रधारा रोड, देहरादून में आयोजित 47वीं ऑल इंडिया पब्लिक रिलेशन कॉन्फ्रेंस–2025 का दीप प्रज्वलन कर शुभारंभ किया । कॉन्फ्रेंस स्थल पर आयोजित फोटो प्रदर्शनी का अवलोकन करने के साथ ही विभिन्न हस्तशिल्प उत्पादों के स्टॉल का निरीक्षण कर स्थानीय कला एवं शिल्प को प्रोत्साहन दिया।
देहरादून 13 से 15 दिसंबर तक 47वीं ऑल इंडिया पब्लिक रिलेशंस कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी कर रहा है, जिसमें देशभर के जनसंपर्क एवं कम्युनिकेशन प्रोफेशनल्स भाग ले रहे हैं। पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ इंडिया (PRSI) द्वारा आयोजित यह सम्मेलन “विकसित भारत @2047: विकास भी, विरासत भी” थीम पर केंद्रित है।
सम्मेलन का उद्घाटन आज 13 दिसंबर को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने किया। तीन दिवसीय आयोजन में उत्तराखण्ड की 25 वर्ष की विकास यात्रा, मीडिया व जनसंपर्क की भूमिका, तकनीक, GST, AI, साइबर क्राइम, मिसइन्फॉर्मेशन और अंतरराष्ट्रीय जनसंपर्क जैसे विषयों पर विशेषज्ञ सत्र आयोजित होंगे। रूस से आए प्रतिनिधियों की सहभागिता सम्मेलन को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देगी। 15 दिसंबर को सम्मेलन का समापन होगा।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने देशभर से आए जनसंपर्क विशेषज्ञों, प्रतिनिधियों एवं युवा प्रतिभाओं का स्वागत करते हुए कहा कि इस वर्ष की थीम “पीआर विजन फॉर–2047” विकसित भारत के संकल्प को साकार करने की दिशा में अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि आज के समय में पब्लिक रिलेशन केवल सूचना संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण और प्रभावी अंग बन चुका है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में, जहाँ एक ओर सूचना की प्रचुरता है, वहीं दूसरी ओर गलत सूचना की चुनौती भी गंभीर है। ऐसे में सरकार और जनता के बीच सही, समयबद्ध और भरोसेमंद संवाद स्थापित करना जनसंपर्क की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड जैसे प्राकृतिक आपदाओं एवं सामरिक दृष्टि से संवेदनशील राज्य में संवाद केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि विश्वास की बुनियाद है।
उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन, सुशासन, धार्मिक एवं पर्यटन प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भविष्य की पीआर प्रणाली को तेज, तकनीकी रूप से सक्षम और जनभावनाओं के प्रति संवेदनशील बनाना होगा, ताकि सरकार और जनता के बीच आदेश का नहीं बल्कि साझेदारी और विश्वास का संबंध स्थापित हो सके।
श्री धामी ने विश्वास व्यक्त किया कि पब्लिक रिलेशन संकट के समय एक सक्षम कमांड सेंटर की भूमिका निभाने के साथ-साथ, देश के लिए सकारात्मक नैरेटिव गढ़ने में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि देवभूमि उत्तराखण्ड से निकला यह विजन विकसित भारत–2047 के निर्माण में सहायक सिद्ध होगा।
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में राज्य की विकास यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में उत्तराखण्ड निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। उन्होंने बताया कि राज्य की अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 3.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने जा रहा है तथा प्रति व्यक्ति आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इसके साथ ही राज्य में बजट में अभूतपूर्व बढ़ोतरी और बेरोजगारी दर में ऐतिहासिक कमी आई है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, खेल, पेयजल, हवाई एवं रेल कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में आधुनिक अवसंरचना का विकास तेज़ी से किया जा रहा है। धार्मिक पर्यटन, वेलनेस, एडवेंचर टूरिज्म, फिल्म शूटिंग एवं वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में उत्तराखण्ड को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में भी सरकार निरंतर प्रयासरत है।
उन्होंने बताया कि ऋषिकेश–कर्णप्रयाग रेल परियोजना, दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेस-वे, रोपवे परियोजनाएं तथा हवाई अड्डों के विस्तार जैसे कार्य राज्य के विकास को नई गति दे रहे हैं। साथ ही शीतकालीन यात्रा की पहल के माध्यम से वर्ष भर पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
उन्होंने निवेश, उद्योग और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त करने के लिए किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के माध्यम से प्राप्त निवेश प्रस्तावों को धरातल पर उतारने में राज्य को उल्लेखनीय सफलता मिली है। सिंगल विंडो सिस्टम, नई औद्योगिक एवं स्टार्टअप नीतियों से उत्तराखण्ड निवेश के लिए एक उभरता हुआ केंद्र बनकर सामने आया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि “एक जनपद–दो उत्पाद”, हाउस ऑफ हिमालयाज, मिलेट मिशन, नई पर्यटन एवं फिल्म नीति जैसी योजनाएं स्थानीय आजीविका को मजबूती प्रदान कर रही हैं। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग्स में उत्तराखण्ड की उपलब्धियां राज्य के पारदर्शी, प्रभावी और जनभागीदारी आधारित शासन का प्रमाण हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक मूल्यों, जनसंख्या संतुलन और सामाजिक संरचना के संरक्षण के लिए भी पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड की नीतियां और नवाचार आज देश के अन्य राज्यों के लिए आदर्श बन रहे हैं और विकसित भारत–2047 की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं ।
इस अवसर पर अपर सचिव और सूचना महानिदेशक बंशीधर तिवारी को पीआरएसआई द्वारा सुशासन में उत्कृष्टता हेतु राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया गया |
कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद नरेश बंसल, कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी, परमार्थ निकेतन से स्वामी चिदानंद मुनि, अपर सचिव बंशीधर तिवारी, पीआरएसआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अजीत पाठक, देहरादून चैप्टर के अध्यक्ष श्री रवि बिजारनिया, रूसी प्रतिनिधि श्री माइकल मस्लोव, सुश्री दाव्यदेंको यूलिया, सुश्री अन्ना तलानीना सहित देशभर से आए जनसंपर्क कार्मिक एवं कम्युनिकेशन प्रोफेशनल्स उपस्थित रहे।