इंडिया पोस्ट ने कर्नाटक का पहला जेन जी-थीम वाला नया पोस्ट ऑफिस – अचित नगर पोस्ट ऑफिस, जो बेंगलुरु के आचार्य इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में शुरू किया है। युवाओं की जरूरतों के अनुकूल और तकनीक पर आधारित स्थल के तौर पर डिज़ाइन किए गए इस पहल का उद्देश्य डिजिटल सुविधा, रचनात्मक डिजाइन और समुदाय के साथ जुड़ाव को मिलाना है, जोकि युवा पीढ़ी की पसंद के अनुरूप है।
जेन जी पोस्ट ऑफिस ने एक पारंपरिक पोस्ट ऑफिस को एक जीवंत स्थल में बदल दिया है। इसमें वर्क कैफे, किताबों एवं बोर्ड गेम्स से लैस एक “बुक-बूथ” और इंस्टीट्यूट के विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई कलाकृतियां जैसी बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध हैं और यह बेंगलुरु, इंडिया पोस्ट और आचार्य इंस्टीट्यूट के सार को दर्शाती है। इसकी आंतरिक सज्जा एक वर्क कैफे जैसी है, जिसमें फ्री वाई-फाई की सुविधा, आरामदायक बैठने की जगह, लैपटॉप एवं मोबाइल के लिए चार्जिंग पॉइंट और एक कॉफी वेंडिंग मशीन उपलब्ध है। यह विद्यार्थियों के लिए एक ऐसी जगह है, जो उत्पादकता और सामाजिक संपर्क दोनों को बढ़ावा देती है।
इसमें सेल्फ-बुकिंग कियोस्क और क्यूआर कोड-आधारित तत्काल भुगतान का विकल्प उपलब्ध है। ये सुविधाएं उपयोग में आसानी एवं डिजिटल भुगतान की जरूरत को ध्यान में रखती हैं और जेन जी समूह की डीआईवाई (डू-इट-योरसेल्फ) की भावना को सार्थक करती हैं। जेन जी पोस्ट ऑफिस में आने वाले आगंतुक “मायस्टाम्प” काउंटर पर व्यक्तिगत स्टाम्प प्रिंट करवा सकते हैं, जो इंडिया पोस्ट की स्मारक डाकटिकट संग्रह की विरासत को एक आधुनिक रूप देता है।
इस कार्यालय का आधिकारिक उद्घाटन 17 दिसंबर 2025 को बेंगलुरु के आचार्य इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में कर्नाटक पोस्टल सर्कल के चीफ पोस्टमास्टर जनरल श्री प्रकाश, आईपीओएस ने आचार्य ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस की डायरेक्टर (एकेडमिक्स) डॉ. भागीरथी वी की उपस्थिति में किया। इस कार्यक्रम के दौरान एक विशेष चित्रात्मक पोस्टकार्ड भी जारी किया गया, जो इस मौके की याद दिलाता है।
पिछले 11 वर्षों के दौरान भारतीय रेलवे में गति क्षमता बढ़ाने के लिए रेल पटरियों का उन्नयन और सुधार बड़े पैमाने पर किया गया है। पटरियों के उन्नयन के इन उपायों में 60 किलोग्राम भार वाली रेल, चौड़े आधार वाले कंक्रीट स्लीपर, मोटे वेब स्विच, लंबे रेल पैनल, एच बीम स्लीपर, आधुनिक ट्रैक नवीनीकरण और रखरखाव मशीनें, लेवल क्रॉसिंग गेटों का इंटरलॉकिंग, ट्रैक ज्यामिति की गहन निगरानी आदि शामिल हैं।
उपरोक्त उपायों के परिणामस्वरूप पटरियों की गति क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 110 किमी प्रति घंटे और उससे अधिक की गति क्षमता वाली रेल पटरियों का कुल प्रतिशत मार्च 2014 में 40 प्रतिशत से बढ़कर नवंबर 2025 में 79 प्रतिशत हो गया है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार को मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत 3848 लाभार्थियों के बैंक खातों में 33.22 करोड़ रुपये की धनराशि का मुख्यमंत्री आवास से ऑनलाइन माध्यम से वितरण किया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का संकल्प है कि उत्तराखंड का युवा नौकरी ढूंढने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला बने। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना राज्य की उन प्रमुख योजनाओं में से एक है, जिसने वास्तविक रूप से पलायन को रोकने, रिवर्स माइग्रेशन को बढ़ावा देने और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि कोविड-19 के दौरान लौटे प्रवासी, युवा उद्यमी, कारीगर, हस्तशिल्पी एवं शिक्षित बेरोजगार इस योजना के प्रमुख लाभार्थी हैं। योजना के अंतर्गत राज्य के मूल और स्थायी निवासियों को विनिर्माण, सेवा एवं व्यापार क्षेत्र में राष्ट्रीयकृत, सहकारी एवं क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के माध्यम से ऋण सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। विनिर्माण इकाइयों के लिए ₹25 लाख तक और सेवा एवं व्यापार इकाइयों के लिए ₹10 लाख तक की परियोजना लागत अनुमन्य है। योजना के अंतर्गत परियोजना लागत का 15 से 25 प्रतिशत तक मार्जिन मनी उपादान (सब्सिडी) के रूप में प्रदान किया जा रहा है। योजना के अंतर्गत लगभग 32 हजार लाभार्थियों को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था, इस योजना से अब तक 35 हजार से अधिक लाभार्थी लाभान्वित हो चुके हैं। योजना के तहत अब तक ₹1,389 करोड़ से अधिक का ऋण वितरण किया गया है, जिससे लगभग 64,966 नए रोजगार सृजित हुए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह प्रमाण है कि योजना केवल कागज़ों में नहीं, बल्कि धरातल पर सशक्त रूप से कार्य कर रही है।
मुख्यमंत्री ने इसे छोटे व्यापारियों और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रदेश के लिए एक “गेम चेंजर योजना” बताया। उन्होंने कहा कि योजना की सफलता को देखते हुए वर्ष 2025 से मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना 2.0 (MSY2.0) प्रारंभ की गई है, जिसमें MSY और नैनो योजना का एकीकरण किया गया है। नई व्यवस्था में सब्सिडी की सीमा 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत तक कर दी गई है। साथ ही भौगोलिक, सामाजिक और उत्पाद बूस्टर की अवधारणा के अंतर्गत अतिरिक्त 5 प्रतिशत सब्सिडी का प्रावधान किया गया है, जिससे योजना आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक रूप से भी सशक्त बनेगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि लाभार्थियों को सब्सिडी ऑनलाइन माध्यम से सीधे बैंक खातों में ट्रांसफर की गई है। यह सरकार की पारदर्शिता, टेक्नोलॉजी-आधारित और भ्रष्टाचार-मुक्त कार्यप्रणाली का प्रमाण है। मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना केवल एक योजना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर उत्तराखंड की मजबूत नींव है। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य है कि हर जिले में स्थानीय उद्यम, हर गांव में रोजगार और हर युवा के हाथ में काम हो। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को साकार करते हुए डबल इंजन सरकार उत्तराखंड के युवाओं को स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कार्य कर रही है।
मुख्यमंत्री ने इस दौरान मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना से लाभार्थियों से संवाद भी किया। लोहाघाट, चंपावत के श्री कमल सिंह पार्थाेली ने कहा कि उन्होंने स्मार्ट लाइब्रेरी के लिए इस योजना के तहत 10 लाख रुपये का लोन लिया। अभी यहां 130 बच्चे पढ़ रहे हैं, वे अब ई-लाइब्रेरी भी बनाएंगे। उधम सिंह नगर के श्री प्रदीप अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने गाड़ी सर्विस के कार्य के लिए 10 लाख रुपये का लोन लिया; वे पहले साइकिल रिपेयरिंग का कार्य करते थे। उत्तरकाशी के श्री जसपाल ने बताया कि उन्होंने फिटनेस क्लब की स्थापना के लिए 10 लाख रुपये का लोन लिया, अब वे इसका और विस्तार कर रहे हैं। पौड़ी गढ़वाल के श्री अयान मंसूरी ने बताया कि उन्होंने रजाई और गद्दा निर्माण के कार्य के लिए 10 लाख रुपये का लोन लिया, उनके साथ इस रोजगार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई लोग जुड़े हैं। इस साल उनका कारोबार तीन करोड़ रुपये होने का अनुमान है। बागेश्वर की श्रीमती चंपा देवी ने कहा कि उन्होंने मोबाइल सेल एंड सर्विस के लिए सात लाख रुपये का लोन लिया था। इस कार्य से उनकी आजीविका बढ़ी है।
इस अवसर पर सचिव उद्योग विनय शंकर पांडेय, महानिदेशक उद्योग एवं एमडी सिडकुल डॉ. सौरभ गहरवार, उप सचिव शिव शंकर मिश्रा, उद्योग विभाग से अपर निदेशक मृत्युंजय सिंह, संयुक्त निदेशक अनुपम द्विवेदी, दीपक मुरारी, उप निदेशक महावीर सजवान, राजेंद्र कुमार, उद्योग मित्र अभिषेक नैनवाल एवं अनुराग गुप्ता मौजूद थे।
मस्कट (ओमान): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी ओमान यात्रा के दौरान मस्कट के सुल्तान काबूस स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में हजारों की संख्या में उमड़े भारतीय प्रवासियों और छात्रों को संबोधित किया। “मोदी-मोदी” के नारों के बीच प्रधानमंत्री ने भारत और ओमान के बीच के ऐतिहासिक संबंधों को एक नई ऊंचाई दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और ओमान के रिश्ते केवल व्यापारिक समझौतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह हजारों साल पुराने साझा विश्वास और संस्कृति की नींव पर टिके हैं। प्रधानमंत्री ने भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि भारत अब एक ‘रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रांसफॉर्म’ के मंत्र के साथ आगे बढ़ रहा है और बहुत जल्द विश्व की शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने जा रहा है।
आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक नेतृत्व
प्रधानमंत्री के संबोधन का सबसे प्रमुख हिस्सा भारत की बदलती वैश्विक छवि पर केंद्रित था। उन्होंने कहा कि आज जब दुनिया संकटों से जूझ रही है, तब भारत एक ‘विश्व मित्र’ के रूप में उभर रहा है। उन्होंने प्रवासियों को बताया कि कैसे भारत ने डिजिटल क्रांति के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व किया है। पीएम ने कहा, “आज भारत का यूपीआई (UPI) केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है और जल्द ही ओमान के साथ हमारे डिजिटल भुगतान के रिश्ते और भी मजबूत होंगे।” उन्होंने भारतीय छात्रों को संबोधित करते हुए उन्हें ‘अमृत पीढ़ी’ बताया और कहा कि भारत में स्टार्टअप्स का इकोसिस्टम जिस तेजी से बढ़ रहा है, वह युवाओं की महत्वाकांक्षाओं का परिणाम है। पीएम ने जोर दिया कि भारत अब रक्षा निर्यात, अंतरिक्ष तकनीक और सेमीकंडक्टर निर्माण में आत्मनिर्भर होने की दिशा में कदम बढ़ा चुका है, जिससे आने वाले समय में दुनिया की निर्भरता भारत पर बढ़ेगी।
प्रवासियों की सुरक्षा और कल्याण सर्वोपरि
संबोधन के दूसरे चरण में, प्रधानमंत्री ने खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीयों के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि प्रवासी भारतीय न केवल भारत के लिए विदेशी मुद्रा भेजते हैं, बल्कि वे भारत की संस्कृति और मूल्यों के सच्चे संवाहक (राजदूत) भी हैं। मोदी ने ओमान के सुल्तान का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय समुदाय को ओमान में जो सम्मान और सुरक्षा मिली है, वह दोनों देशों के प्रगाढ़ होते संबंधों का प्रमाण है। उन्होंने बताया कि भारत सरकार ने ‘ई-माइग्रेट’ पोर्टल और दूतावासों में सुधार करके प्रवासियों की समस्याओं के समाधान की प्रक्रिया को सरल बनाया है। प्रधानमंत्री ने आश्वस्त किया कि चाहे संकट का समय हो या सामान्य स्थिति, भारत सरकार अपने नागरिकों के साथ हर पल खड़ी है। उन्होंने हाल के वर्षों में खाड़ी देशों के साथ हुए समझौतों का जिक्र करते हुए कहा कि अब भारतीय कामगारों और पेशेवरों के लिए यहां अवसर और सुरक्षा दोनों बढ़े हैं।
सांस्कृतिक विरासत और भविष्य की रूपरेखा
रिपोर्ट के अंतिम भाग में, प्रधानमंत्री ने भारत और ओमान के बीच के सांस्कृतिक सेतु का उल्लेख किया। उन्होंने मस्कट में स्थित ऐतिहासिक शिव मंदिर और द्विपक्षीय सांस्कृतिक संबंधों की चर्चा करते हुए कहा कि यह विविधता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि भारत अपनी जड़ों को भूले बिना आधुनिकता को गले लगा रहा है। प्रधानमंत्री ने मस्कट में मौजूद छात्रों से अपील की कि वे शिक्षा के साथ-साथ नवाचार (Innovation) पर ध्यान दें और भारत की विकास यात्रा में सक्रिय भागीदार बनें। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण का समापन करते हुए कहा कि 21वीं सदी भारत की सदी है और इसमें विदेशों में रहने वाले भारतीयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के संकल्प को दोहराते हुए लोगों से आह्वान किया कि वे अपनी मेहनत से भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन करते रहें। इस संबोधन ने न केवल ओमान में रहने वाले भारतीयों में नई ऊर्जा का संचार किया, बल्कि खाड़ी क्षेत्र के साथ भारत के सामरिक संबंधों को एक नई दिशा भी प्रदान क
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ओमान दौरे का आज दूसरा दिन है। आज पीएम मोदी की मौजूदगी में भारत-ओमान के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। इसे लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस समझौते से 21वीं सदी में भारत-ओमान की साझेदारी में नया विश्वास और उत्साह का संचार होगा।
पीएम मोदी ने भारत-ओमान बिजनेस फोरम के कार्यक्रम के दौरान कहा, भारत-ओमान साझेदारी को ये सम्मेलन नई दिशा, नई गति देगा और दोनों देशों के संबंध नई बुलंदियों पर पहुंचेंगे। प्रधानमंत्री ने कहा, सभ्यता के आरंभ से ही हमारे पूर्वज एक दूसरे के साथ समुद्र के जरिए व्यापार करते रहे हैं। मांडवी और मस्कट के बीच अरब सागर एक मजबूत पुल बना। इस पुल ने हमारे रिश्तों को मजबूत किया और संस्कृति और अर्थव्यवस्था को ताकत दी। आज हम कह सकते हैं कि समुद्र की लहरें बदलती हैं, मौसम बदलते हैं, लेकिन भारत और ओमान की दोस्ती हर मौसम में मजबूत होती है।
प्रधानमंत्री ने कहा हमारा रिश्ता विश्वास की नींव पर बना है और समय के साथ गहराता चला गया है। हमारे कूटनीतिक संबंधों को 70 साल हो गए हैं। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘आज हम ऐतिहासिक फैसला ले रहे हैं, जिसकी गूंज आने वाले कई दशकों तक सुनाई देगी। व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता 21वीं सदी में हमारी साझेदारी को नया विश्वास और नई ऊर्जा देगा। इससे व्यापार को नई गति मिलेगी और निवेश का भरोसा बनेगा।’
पीएम मोदी ने कहा बीते 11 वर्षों में भारत ने न सिर्फ नीतियां ही नहीं बदली हैं बल्कि भारत ने अपना आर्थिक डीएन ही बदल दिया है। जीएसटी ने भारत को एकीकृत बाजार में बदल दिया है और दिवालिया संहिता से पारदर्शिता को बढ़ावा मिला है और निवेशकों का भरोसा भी बढ़ा है।
अदम गोंडवी भारतीय कवि थे। घुटनों तक मटमैली धोती, सिकुड़ा मटमैला कुरता और गले में सफेद गमछा। मंच पर मुशायरों के दौरान जब अदम गोंडवी ठेठ गंवई अंदाज़में हुंकारते थे तो सुनने वालों का कलेजा चीर कर रख देते थे। अदम गोंडवी की पहचान जीवन भर आम आदमी के शायर के रूप में ही रही। उन्होंने हिंदी ग़ज़ल के क्षेत्र में हिंदुस्तान के कोने-कोने में अपनी पहचान बनाई थी। अदम गोंडवी कवि थे और उन्हें कविता में गंवई जिंदगी की बजबजाहट, लिजलिजाहट और शोषण के नग्न रूपों को उधेड़ने में महारत हासिल थी। वह अपने गांव के यथार्थ के बारे में कहा करते थे- “फटे कपड़ों में तन ढ़ाके गुजरता है जहां कोई/समझ लेना वो पगडंडी ‘अदम’ के गांव जाती है।”
भारतीय जनकवि अदम गोंडवी हिंदी साहित्य के उन विरल कवियों में से हैं जिन्होंने कविता को सत्ता या अकादमिक गलियारों से निकालकर सीधे जनता के बीच पहुंचाया। उन्होंने शब्दों को शस्त्र बनाया और अपने समय की सामाजिक असमानता, राजनीतिक भ्रष्टाचार और जातीय भेदभाव पर गहरी चोट की। एदम गोंडवी का नाम आते ही वह लोकभाषा में लिखी गई कविताएं याद आती हैं जो आम आदमी की पीड़ा और संघर्ष को स्वर देती हैं।
जीवन परिचय
अदम गोंडवी का असली नाम रामनाथ सिंह था। उनका जन्म 22 दिसंबर 1947 को उत्तर प्रदेश के गोण्डा जिले के परसपुर ब्लॉक के आटा ग्राम में हुआ था। वे एक साधारण किसान परिवार से थे और बचपन से ही ग्रामीण जीवन की विषमताओं, गरीबी और जातिगत असमानताओं से परिचित थे। यही अनुभव बाद में उनकी कविताओं की आत्मा बने।
दम गोंडवी की औपचारिक शिक्षा बहुत आगे तक नहीं जा सकी, लेकिन उन्होंने जीवन के कठोर अनुभवों से सीखा। साहित्य और राजनीति दोनों में उनकी रुचि थी। वे समाजवादी विचारधारा से प्रभावित रहे और डॉ. राममनोहर लोहिया तथा बाबा नागार्जुन जैसे कवियों से प्रेरणा ली। उनका जीवन भले सादगी से भरा रहा, परंतु उनकी कविता ने सत्ता के गलियारों तक आवाज़ पहुँचाई।
1998 में मध्यप्रदेश सरकार ने उन्हें दुष्यंत कुमार पुरस्कार से सम्मानित किया। 2007 में उन्हें अवधी/हिंदी में उनके योगदान के लिए शहीद शोध संस्थान द्वारा माटी रतन सम्मान से सम्मानित किया गया था। 18 दिसंबर 2011 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके समय में थीं।
कविता का स्वरूप और विषयवस्तु
अदम गोंडवी की कविताएँ जनजीवन की वास्तविकता का दस्तावेज़ हैं। उन्होंने शहरी चमक-दमक से दूर गांवों के भूले-बिसरे लोगों, दलितों, किसानों, मजदूरों और वंचित वर्ग की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी।
उनकी भाषा खड़ीबोली और अवधी का मिश्रण है — सहज, बोलचाल की और जनता से जुड़ी हुई। यही कारण है कि उनकी कविताएं पाठशालाओं की चारदीवारी से निकलकर जनसभाओं और आंदोलनों का हिस्सा बन गईं।
वे ‘कविता को जन के पक्ष में हस्तक्षेप का माध्यम’ मानते थे। उनके अनुसार,
> “कविता अगर अन्याय के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाती, तो वह कविता नहीं, शृंगार मात्र है।”
सामाजिक चेतना और राजनीतिक व्यंग्य
एदम गोंडवी की रचनाओं में समाज की सच्चाई का नंगा चेहरा दिखाई देता है। उन्होंने गरीबी, भूख, साम्प्रदायिकता और भ्रष्टाचार को खुलकर चुनौती दी। उनकी कविताओं में गुस्सा भी है, व्यंग्य भी, और गहरी करुणा भी।
उनकी प्रसिद्ध कविता ‘चमारों की गली’ में भारतीय समाज की जातिवादी संरचना पर तीखा प्रहार किया गया है —
“तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।
उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो,
इधर परधान साहब बेटियों को बेच देते हैं।”
यह कविता केवल एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र का कटु यथार्थ बयान करती है।
एदम गोंडवी की कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। उनकी प्रसिद्ध काव्य-संग्रहों में प्रमुख हैं —
1. धरती की सतह पर
2. समर शेष है
3. संपूर्ण कविताएँ (संकलन)
उनकी कुछ प्रसिद्ध कविताएँ हैं —
चमारों की गली,धरती की सतह पर,जाति पर व्यंग्य करती कविता ‘मुसलमान’, सामाजिक असमानता पर ‘जनता की भाषा में’, ‘संविधान क्या तुम्हें बचा पाएगा’,‘तुम्हारी सभ्यता’ ‘सवाल पूँछता है जनता
अदम गोंडवी की पंक्तियाँ सीधे हृदय को छूती हैं —
> “जो चुप रहेगी भाषा, वो कायर कहलाएगी,
जो सच कहेगी भाषा, वो बागी कहलाएगी।”
> “सच बोलना अगर गुनाह है तो मैं गुनहगार हूँ,
झूठ की मंडी में सच्चाई का कारोबार हूँ।”
> “मुसलमान और हिन्दू दो हैं ऐसे दर्द के साथी,
एक का जख्म राम कहे, दूजा खुदा पुकारे।”
—कविता में लोकधारा का प्रभाव
अदम गोंडवी की कविता में अवधी लोकधारा और भक्ति परंपरा का गहरा प्रभाव है। उनकी कविता में तुलसीदास की करुणा, कबीर की सच्चाई और नागार्जुन की जनपक्षधरता दिखाई देती है। वे ‘लोककवि’ इस अर्थ में हैं कि उनकी कविता जनता की ज़ुबान में बोलती है और जनता के पक्ष में खड़ी होती है।
–साहित्यिक योगदान और प्रभाव
अदम गोंडवी ने हिंदी कविता को वह आवाज़ दी जो जन आंदोलनों और सामाजिक बदलाव की मांग करती है। उनकी कविताएँ विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं और नई पीढ़ी के कवियों को जनपक्षधरता का मार्ग दिखाती हैं।
वे न पुरस्कार के भूखे थे, न प्रसिद्धि के। उन्होंने कहा था —
> “मुझे अपने शब्दों पर भरोसा है,
ये किसी पुरस्कार से ज़्यादा कीमती हैं।”
उनकी कविताएँ आज भी सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं। वे हमें यह सिखाती हैं कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संघर्ष का दस्तावेज़ भी है।
उपसंहार
अदम गोंडवी की कविताएँ भारतीय लोकतंत्र की अंतःकथाएँ हैं — वह लोकतंत्र जो आज भी गांवों, झोपड़ियों और खेतों में अधूरा है। उन्होंने जनता के पक्ष में खड़े होकर कविता को हथियार बनाया और साबित किया कि एक सच्चा कवि वही है जो जनता की पीड़ा को अपनी आवाज़ बनाए।
आज जब समाज में असमानता, जातिवाद और सत्ता का दुरुपयोग फिर उभर रहा है, तो एदम गोंडवी की कविताएँ और भी ज़्यादा प्रासंगिक हो उठती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि कविता केवल शब्द नहीं, बल्कि परिवर्तन की चिंगारी है।
—निष्कर्ष में
अदम गोंडवी भारतीय जनकविता की वह मशाल हैं, जो अंधकार में भी रोशनी देती है। उनकी पंक्तियाँ आज भी चेतावनी की तरह गूंजती हैं —
गोवा मुक्ति दिवस हर साल 19 दिसंबर को मनाया जाता है। आज ही के दिन डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में गोवा मुक्ति संग्राम का आगाज हुआ था। यह दिन गोवा की आज़ादी और पुर्तगाली शासन से मुक्ति की स्मृति में मनाया जाता है। देश की आजादी के बाद भी गोवा पुर्तगालियों के कब्जे में रहा। देश की आजादी के 14 वर्ष बाद भारत के द्वारा चलाये गए ऑपरेशन विजय के द्वारा गोवा को पुर्तगालियों के चंगुल से आजाद करवाया गया। गोवा को 19 दिसंबर 1961 को आजादी कैसे मिली, इसकी कहानी बहुत मार्मिक है। गोवा मुक्ति आंदोलन में समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया और उनके समाजवादी साथियों के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। गोवा के कण कण में डॉ. राम मनोहर लोहिया मिलेंगे। विशेषकर लोकगीतों में लोहिया आपको मिलेंगे। एक गीत यहाँ काफी प्रसिद्ध है, पहिली माझी ओवी, पहिले माझी फूल, भक्ती ने अर्पिन लोहिया ना। धन्य लोहिया, धन्य भूमि यह धन्य उसके पुत्र । गोवा की आजादी का सिंहनाद डॉ. लोहिया ने किया था। वहां के लोकगीतों में डॉ. लोहिया का वर्णन पौराणिक नायकों की तरह होता है। यदि गोवा की आजादी का श्रेय किसी एक व्यक्ति को देना हो तो वे डॉ. राममनोहर लोहिया हैं, जिन्होंने पहली बार गोवा के आजादी के मुद्दे को राष्ट्रीय अस्मिता का मुद्दा बनाया और बीमारी के बावजूद गोवा मुक्ति संग्राम की अगुवाई करते हुए अपनी गिरफ्तारी दी।
गोवा मुक्ति आंदोलन के जनक समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया थे। गोवा के आजादी के आंदोलन में उनका योगदान भुलाया नहीं जा सकता। यह वह समय था जब पंडित नेहरू गोवा को भुला बैठे थे। लोहिया कहते थे बिना आंदोलन के पुर्तगाली गोवा को छोड़कर नहीं जायेंगे। वही हुआ भारत की आजादी के काफी साल बाद भी पुर्तगाली गोवा को छोड़ने को तैयार नहीं हुए तो लोहिया ने आंदोलन की अलख जगाई और अपने साथियों के साथ गोवा कूच किया । 18 जून 1946 को डॉ. राम मनोहर लोहिया ने गोवा जाकर स्थानीय निवासियों को पुर्तगालियों के खिलाफ आंदोलन करने के लिए प्रेरित किया था। लंबे अरसे तक चले आंदोलन के बाद 19 दिसम्बर 1961 को गोवा को पुर्तगाली आधिपत्य से मुक्त कराकर भारत में शामिल कर लिया गया था। 1946 में आज ही के दिन डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने पुर्तगालियों के खिलाफ आंदोलन का नारा दिया था। तब अंग्रेजी साम्राज्य डूब रहा था, कई बड़े राष्ट्रीय नेताओं का मानना था कि अंग्रेजों के जाते ही पुर्तगाली भी गोवा से कूच कर जाएंगे। पर स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया सहमत नहीं थे कि बिना आंदोलन छेड़े ऐसा संभव हो पाएगा।
लोहिया ने पहली बार गोवा के आजादी के मुद्दे को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाया और लोगों का ध्यान आकर्षित करने में सफल हुए। 15 जून 1946 को पंजिम में डा0 लोहिया की सभा हुई जिसमें तय हुआ 18 जून से सविनय अवज्ञा प्रारम्भ होगा। पुलिस ने टैक्सी वालों को मना कर दिया था। डा0 लोहिया मड़गाँव सभा स्थल घोड़ागाड़ी से पहुँचे। घनघोर बारिश, 20 हजार की जनता और मशीनगन लिए हुए पुर्तगाली फौज। गगनचुम्बी नारों के बीच डा0 लोहिया के ऊपर प्रशासक मिराण्डा ने पिस्तौल तान दिया, लेकिन लोहिया के आत्मबल और आभामण्डल के आगे उसे झुकना पड़ा। पाँच सौ वर्ष के इतिहास में गोवा में पहली बार आजादी का सिंहनाद हुआ। लोहिया गिरफ्तार कर लिए गए। पूरा गोवा युद्ध-स्थल बन गया। पंजिम थाने पर जनता ने धावा बोल कर लोहिया को छुड़ाने का प्रयास किया । एक छोटी लड़की को जयहिन्द कहने पर पुलिस ने काफी पीटा। 21 जून को गवर्नर का आदेश हुआ कि आम-सभा व भाषण के लिए सरकारी आदेश लेने की आवश्यकता नहीं। लोहिया चौक पर झण्डा फहराया गया। गोवा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा पुर्तगाल को तीन माह की नोटिस देकर लोहिया लौट आए। महात्मा गांधी लोहिया की गिरफ्तारी का पुरजोर विरोध किया। तीन महीने पश्चात डा0 लोहिया दोबारा गोवा के मड़गाँव के लिए चले। उन्हें कोलेम में ही गिरफ्तार कर लिया गया। 29 सितम्बर से 8 अक्टूबर तक उन्हें आग्वाद के किले में कैदी बनाकर रखा गया, बाद में अनमाड़ के पास लाकर छोड़ा गया। 2 अक्टूबर को अपने जन्मदिन के दिन बापू ने लार्ड बेवेल से लोहिया की रिहाई के लिए बात की। लोहिया पर गोवा-प्रवेश के लिए मनाही हो गई।
गोवा मुक्ति आंदोलन के इतिहास में जिन लोगों ने अपना खून पसीना बहाया और जेल की यंत्रणा सही इस दिन उनका समरण देशवासियों के लिए जरुरी है। गोवा आंदोलन में समाजवादी नेता डॉ लोहिया और उनके साथियों की भूमिका अविसमरणीय है जिन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं करते हुए गोवा को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोहिया के लम्बे जनजागरण के बाद गोवा को आजादी मिली थी।
भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली में श्री गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहीदी दिवस की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित एक अंतरधार्मिक सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि सम्मेलन में भाग लेना अत्यंत सम्मान की बात है और इसे शांति, मानवाधिकार और धार्मिक सद्भाव के लिए एक वैश्विक आह्वान बताया।
सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने श्री गुरु तेग बहादुर जी को सर्वोच्च बलिदान और नैतिक साहस का सार्वभौमिक प्रतीक बताया, जिन्होंने न्याय के लिए संघर्ष किया और उत्पीड़ितों की रक्षा की। भारत की विविधता में एकता और ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के दृष्टिकोण पर जोर देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत जटिल वैश्विक चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करके विश्व का नेतृत्व कर रहा है। उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री ने उपनिषद के आदर्श ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को वैश्विक स्तर पर प्रसारित किया है, और भारत की जी20 थीम ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ देश की सभ्यतागत बुद्धिमत्ता को प्रतिबिंबित करती है। डॉ. विक्रमजीत सिंह साहनी, राज्यसभा सांसद; परम पूज्य जैन आचार्य लोकेश मुनि; नामधारी सतगुरु उदय सिंह; श्री मोहन रूपा दास, अध्यक्ष, इस्कॉन मंदिर, दिल्ली; अजमेर दरगाह शरीफ के हाजी सैयद सलमान चिश्ती; दिल्ली धर्मप्रांत के उपाध्यक्ष रेव. फादर मोनोदीप डेनियल; और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष सरदार तरलोचन सिंह सहित अन्य प्रख्यात धार्मिक और आध्यात्मिक नेता सम्मेलन में उपस्थित थे।
केंद्रीय संचार एवं उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्री श्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया ने आज लोकसभा में बताया कि पिछले पांच वर्षों में भारत के दूरसंचार निर्यात में 72% की वृद्धि हुई है, जबकि आयात पहले के स्तर पर स्थिर रहा है। ये आंकड़े दूरसंचार क्षेत्र में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता की कहानी बयां करते हैं।
एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय मंत्री श्री सिंधिया ने कहा कि भारत का दूरसंचार निर्यात 2020-21 में 10,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 18,406 करोड़ रुपये हो गया है, जो 72% की वृद्धि दर्शाता है, जबकि आयात लगभग 51,000 करोड़ रुपये पर स्थिर बना हुआ है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत न केवल दूरसंचार क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है, बल्कि वैश्विक नेतृत्व के लिए भी खुद को तैयार कर रहा है।
पूरक प्रश्न के उत्तर में, श्री सिंधिया ने 5जी तैनाती में भारत की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि देश के 778 जिलों में से 767 जिले पहले ही 5जी नेटवर्क से जुड़ चुके हैं। उन्होंने आगे कहा कि भारत में वर्तमान में 36 करोड़ 5जी ग्राहक हैं, यह संख्या 2026 तक बढ़कर 42 करोड़ और 2030 तक 100 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है।
सैटेलाइट संचार (SATCOM) के बारे में बात करते हुए केंद्रीय मंत्री श्री सिंधिया ने कहा कि विश्वव्यापी अनुभव से पता चलता है कि जिन क्षेत्रों में पारंपरिक बीटीएस या बैकहॉल या ऑप्टिकल फाइबर केबल के माध्यम से ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी संभव नहीं है, वहां केवल सैटेलाइट संचार के माध्यम से ही सेवाएं पहुंचाई जा सकती हैं। इस संदर्भ में, भारत ने यह सुनिश्चित करने के लिए निर्णायक कदम उठाया है कि SATCOM सेवाएं देश के कोने-कोने में ग्राहकों को उपलब्ध कराई जाएं।
उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य प्रत्येक ग्राहक को दूरसंचार सेवाओं का संपूर्ण पैकेज उपलब्ध कराना है, जिससे व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और पसंदीदा मूल्य के आधार पर सोच-समझकर निर्णय ले सकें।
केंद्रीय मंत्री ने इस बात पर प्रकाश डाला कि सैटेलाइट संचार (SATCOM) नीति का ढांचा पूरी तरह से तैयार है और स्पेक्ट्रम का प्रशासनिक आवंटन किया जाना है। स्टारलिंक, वनवेब और रिलायंस को पहले ही तीन लाइसेंस जारी किए जा चुके हैं।
उन्होंने आगे बताया कि ऑपरेटरों की ओर से वाणिज्यिक सेवाएं शुरू करने से पहले दो प्रमुख पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है। पहला पहलू स्पेक्ट्रम आवंटन से संबंधित है, जिसमें प्रशासनिक स्पेक्ट्रम शुल्क का निर्धारण भी शामिल है, जो भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (टीआरएआई) के अधिकार क्षेत्र में आता है। टीआरएआई वर्तमान में मूल्य निर्धारण ढांचे को अंतिम रूप देने में लगा हुआ है।
दूसरा पहलू प्रवर्तन एजेंसियों से सुरक्षा मंजूरी से संबंधित है। इस प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए, ऑपरेटरों को प्रदर्शन करने हेतु नमूना स्पेक्ट्रम उपलब्ध कराया गया है, और तीनों लाइसेंसधारी वर्तमान में आवश्यक अनुपालन गतिविधियों को पूरा कर रहे हैं।
एक बार जब ऑपरेटर निर्धारित सुरक्षा मानदंडों का पालन करने का प्रदर्शन कर देते हैं – जिसमें भारत के भीतर अंतरराष्ट्रीय गेटवे स्थापित करने की आवश्यकता भी शामिल है – तो आवश्यक अनुमोदन प्रदान कर दिए जाएंगे, जिससे ग्राहकों को सैटकॉम सेवाएं शुरू करने में मदद मिलेगी।
ऑस्ट्रेलिया को लंबे समय तक एक ऐसे बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र के रूप में देखा गया है, जहाँ विविध धार्मिक, नस्ली और सांस्कृतिक समुदायों ने अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का अनुभव किया। यहूदी समुदाय भी इस सामाजिक संरचना का एक सशक्त और सम्मानित हिस्सा रहा है। किंतु हाल के वर्षों में, विशेषकर 2023 के बाद, यहूदी संस्थानों, सभास्थलों और व्यक्तियों के विरुद्ध लक्षित हिंसा की घटनाओं में वृद्धि ने इस धारणा को गंभीर चुनौती दी है। आगज़नी, नफ़रत भरी ग्रैफिटी, धमकियाँ और हमलों की घटनाएँ केवल आपराधिक कृत्य नहीं हैं, बल्कि वे ऑस्ट्रेलियाई समाज में बढ़ते ध्रुवीकरण, असहिष्णुता और असुरक्षा की गहरी परतों को उजागर करती हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यहूदी-विरोधी हिंसा क्यों बढ़ रही है और राज्य आंतरिक सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए नागरिक स्वतंत्रताओं का संतुलन कैसे बनाए।
यहूदी-विरोधी हिंसा के उभार को समझने के लिए सबसे पहले वैश्विक भूराजनीतिक संदर्भ पर ध्यान देना आवश्यक है। इज़राइल-ग़ाज़ा संघर्ष जैसे अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम अब केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रह गए हैं। डिजिटल मीडिया और वैश्विक सूचना प्रवाह के कारण इनका प्रभाव दूरस्थ समाजों तक तत्काल पहुँचता है। ऑस्ट्रेलिया में भी इस संघर्ष ने भावनात्मक ध्रुवीकरण को जन्म दिया है, जहाँ विदेश नीति या सैन्य कार्रवाइयों की आलोचना कई बार यहूदी समुदाय के सामूहिक दोषारोपण में बदल जाती है। राजनीतिक असहमति और धार्मिक-जातीय पहचान के बीच की यह रेखा धुंधली पड़ना यहूदी-विरोधी हिंसा को वैचारिक वैधता प्रदान करता है।
इसके साथ ही चरमपंथी विचारधाराओं का विस्तार एक गंभीर कारक बनकर उभरा है। दक्षिणपंथी अतिवाद, श्वेत वर्चस्ववादी सोच और कुछ कट्टरपंथी नेटवर्क लंबे समय से यहूदियों को षड्यंत्र सिद्धांतों से जोड़ते रहे हैं। डिजिटल युग में इन विचारों का प्रसार तेज़ और व्यापक हो गया है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और ऑनलाइन फ़ोरम ऐसे ‘इको-चैम्बर्स’ बनाते हैं, जहाँ नफ़रत को सामान्य व्यवहार की तरह प्रस्तुत किया जाता है। जब व्यक्ति लगातार एक ही प्रकार की भड़काऊ सामग्री देखता है, तो हिंसा धीरे-धीरे वैध और आवश्यक प्रतिक्रिया के रूप में चित्रित होने लगती है।
दुष्प्रचार और साजिश कथाएँ भी यहूदी-विरोधी हिंसा को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐतिहासिक रूप से यहूदियों को आर्थिक संकटों, महामारी और राजनीतिक अस्थिरता के लिए दोषी ठहराने की प्रवृत्ति रही है। आधुनिक समय में यही प्रवृत्ति सोशल मीडिया के माध्यम से नए रूप में सामने आती है। कोविड-19 महामारी, वैश्विक आर्थिक मंदी या अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से जुड़ी जटिलताओं को यहूदी समुदाय से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है। बार-बार दोहराए जाने पर ये झूठे आख्यान सामाजिक चेतना में स्थान बना लेते हैं और हिंसा के लिए मानसिक आधार तैयार करते हैं।
आंतरिक सुरक्षा ढांचे की कुछ संरचनात्मक कमजोरियाँ भी इस समस्या को गहराती हैं। हाल की घटनाओं ने यह सवाल उठाया है कि हथियार लाइसेंसिंग प्रणाली, मानसिक स्वास्थ्य आकलन और खुफिया निगरानी कितनी प्रभावी है। यदि संभावित हिंसक प्रवृत्तियों के संकेत समय रहते पहचान में न आएँ, तो तथाकथित ‘लोन वुल्फ’ हमले गंभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं। यह केवल पुलिस की विफलता नहीं, बल्कि निवारक शासन की चुनौती है, जहाँ जोखिमों का पूर्वानुमान और समय पर हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक होता है।
इन परिस्थितियों में राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की है। लोकतांत्रिक समाज में सुरक्षा का अर्थ केवल कठोर कानून और निगरानी नहीं हो सकता। राज्य की पहली जिम्मेदारी कानून के शासन को बनाए रखना है, जिसमें घृणा अपराधों पर त्वरित और प्रभावी कार्रवाई शामिल है। यहूदी-विरोधी हिंसा के मामलों में सख़्त अभियोजन और दंड का स्पष्ट संदेश देना आवश्यक है कि समाज में नफ़रत और हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। साथ ही, पीड़ितों को न्याय और सहायता उपलब्ध कराना विश्वास बहाली के लिए अनिवार्य है।
खुफिया तंत्र का समन्वय आंतरिक सुरक्षा की रीढ़ है। संघीय और राज्य स्तर की एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने में देरी या असंगति संभावित खतरों को अनदेखा कर सकती है। ऑनलाइन कट्टरपंथ की निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों का विश्लेषण और समय रहते हस्तक्षेप—ये सभी उपाय आवश्यक हैं। किंतु यह निगरानी लक्षित और अनुपातिक होनी चाहिए। अंधाधुंध निगरानी न केवल नागरिकों की गोपनीयता का उल्लंघन करती है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अविश्वास भी पैदा कर सकती है।
डिजिटल स्पेस का शासन आज आंतरिक सुरक्षा का अनिवार्य घटक बन चुका है। ऑनलाइन घृणा भाषण और दुष्प्रचार को नियंत्रित किए बिना यहूदी-विरोधी हिंसा पर अंकुश लगाना कठिन है। इसके लिए प्लेटफ़ॉर्म जवाबदेही, पारदर्शी नियम और त्वरित कार्रवाई तंत्र आवश्यक हैं। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वैध राजनीतिक असहमति और शांतिपूर्ण विरोध को दबाया न जाए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का मूल है और सुरक्षा उपायों को इसे कमजोर नहीं करना चाहिए।
आंतरिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण, किंतु अक्सर उपेक्षित पक्ष समुदाय सहभागिता है। यहूदी समुदाय और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ विश्वास-आधारित संवाद सुरक्षा प्रयासों को अधिक प्रभावी बनाता है। जब समुदाय स्वयं को राज्य का साझेदार महसूस करता है, तो वह संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देने और कट्टरपंथी प्रभावों का प्रतिरोध करने में सक्रिय भूमिका निभाता है। सामुदायिक नेताओं की भागीदारी, शिकायत निवारण तंत्र और पीड़ित सहायता सेवाएँ सामाजिक एकजुटता को मजबूत करती हैं।
शिक्षा और सार्वजनिक विमर्श दीर्घकालिक समाधान की कुंजी हैं। यहूदी-विरोधी हिंसा की जड़ें केवल वर्तमान राजनीतिक घटनाओं में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों में भी निहित हैं। होलोकॉस्ट शिक्षा, बहुसांस्कृतिक पाठ्यक्रम और अंतर-धार्मिक संवाद नफ़रत के विरुद्ध सामाजिक प्रतिरक्षा विकसित कर सकते हैं। मीडिया की भूमिका भी निर्णायक है। जिम्मेदार रिपोर्टिंग, तथ्यों की जाँच और भड़काऊ भाषा से परहेज़ सामाजिक तनाव को कम कर सकता है।
यहूदी-विरोधी हिंसा के प्रति राज्य की प्रतिक्रिया ऑस्ट्रेलिया के लोकतांत्रिक मूल्यों की भी परीक्षा है। यदि सुरक्षा उपाय किसी विशेष समुदाय को संदिग्ध ठहराने लगें या असहमति को कुचलने का माध्यम बन जाएँ, तो वे स्वयं समस्या का हिस्सा बन सकते हैं। इसलिए अधिकार-आधारित सुरक्षा दृष्टिकोण आवश्यक है, जिसमें सुरक्षा और स्वतंत्रता को परस्पर पूरक माना जाए। विदेश नीति की आलोचना और यहूदी-विरोधी नफ़रत के बीच स्पष्ट अंतर करना इस संतुलन का केंद्रीय तत्व है।
अंततः, ऑस्ट्रेलिया में बढ़ती यहूदी-विरोधी हिंसा केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह सामाजिक चेतावनी भी है। यह दिखाती है कि वैश्विक ध्रुवीकरण, डिजिटल दुष्प्रचार और आंतरिक कमजोरियाँ मिलकर किस प्रकार लोकतांत्रिक समाजों को अस्थिर कर सकती हैं। इसका समाधान न तो केवल सख़्त कानूनों में है और न ही पूर्ण उदारता में, बल्कि संतुलित, अधिकार-सम्मत और समुदाय-केंद्रित रणनीति में निहित है। लक्षित पुलिसिंग, एकीकृत खुफिया तंत्र, जिम्मेदार डिजिटल नियमन और सामाजिक संवाद—इन सभी के माध्यम से ही नफ़रत अपराधों का प्रभावी मुकाबला किया जा सकता है। जब अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएँ एक-दूसरे को सुदृढ़ करती हैं, तभी बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र वास्तव में सुरक्षित और टिकाऊ बन पाता है।
(अगस्त 2016 से जन-जन तक: सिवानी मंडी की आवाज़ और जिला पुनर्गठन का प्रश्न, एक नारा, एक विचार और सिवानी के भविष्य का सवाल।)
– डॉ. प्रियंका सौरभ
लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक सीमाएँ पत्थर की लकीर नहीं होतीं। वे जनता की सुविधा, सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं और क्षेत्रीय संतुलन के अनुरूप समय-समय पर पुनः परिभाषित की जाती हैं। जब कोई प्रशासनिक ढांचा लगातार जनता के लिए असुविधा का कारण बने, तब उसका पुनर्विचार न केवल आवश्यक, बल्कि शासन की संवेदनशीलता की कसौटी भी बन जाता है। सिवानी मंडी उपमंडल को लेकर जिला भिवानी से अलग होकर जिला हिसार में शामिल किए जाने की मांग इसी लोकतांत्रिक विवेक और जनहित की भावना से उपजी है। यह मांग न तो अचानक उठी है और न ही किसी राजनीतिक मौसम की उपज है। यह एक दशक से अधिक समय से चल रहा शांत, संगठित और तर्कपूर्ण जन-आंदोलन है, जिसकी जड़ें सिवानी क्षेत्र की भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक वास्तविकताओं में गहराई से धंसी हुई हैं।
आंदोलन की शुरुआत : अगस्त 2016
इस आंदोलन की औपचारिक शुरुआत अगस्त 2016 में हुई, जब छह जागरूक नागरिकों— बड़वा के प्रमुख समाज सेवी महेंद्र लखेरा, सुनील सिंहमार (एडवोकेट), लाल सिंह ‘लालू’, डॉ. सत्यवान सौरभ, सुरेंद्र भुक्कल और मुकेश भुक्कल—ने मिलकर इस प्रश्न को व्यक्तिगत असुविधा से ऊपर उठाकर जनहित के मुद्दे के रूप में सामने रखा। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह पहल आने वाले वर्षों में सिवानी की सामूहिक चेतना का स्वर बन जाएगी। शुरुआत में यह संघर्ष कुछ बैठकों, ज्ञापनों और चर्चाओं तक सीमित रहा, लेकिन जैसे-जैसे आम लोगों ने अपनी रोजमर्रा की समस्याओं को इस मांग से जुड़ा पाया, वैसे-वैसे आंदोलन का दायरा बढ़ता गया। आज, लगभग दस वर्षों बाद, यह अभियान किसी समिति या व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि पूरे सिवानी उपमंडल की साझा आवाज़ बन चुका है।
भौगोलिक सच्चाई : नक्शे और जमीन के बीच का अंतर
किसी भी जिले या उपमंडल की प्रशासनिक संबद्धता का पहला और सबसे ठोस आधार उसकी भौगोलिक स्थिति होती है। इस कसौटी पर सिवानी का भिवानी से जुड़ाव कमजोर और हिसार से संबंध अत्यंत स्वाभाविक प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए, बडवा से हिसार की दूरी लगभग 25 किलोमीटर है, जबकि भिवानी की दूरी करीब 70 किलोमीटर पड़ती है। यह अंतर केवल किलोमीटर का नहीं, बल्कि समय, श्रम और संसाधनों का भी है। भिवानी जाने के लिए सिवानी क्षेत्र के अनेक गांवों के लोगों को दो से तीन बसें बदलनी पड़ती हैं, जबकि हिसार के लिए प्रायः सीधी एक बस उपलब्ध होती है। यह अंतर उस आम नागरिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जो किसी सरकारी दफ्तर, अस्पताल या अदालत के चक्कर में पहले ही मानसिक दबाव से गुजर रहा होता है।
परिवहन व्यवस्था : सुविधा बनाम विवशता
परिवहन किसी भी क्षेत्र की जीवनरेखा होता है। सिवानी उपमंडल के संदर्भ में देखें तो यह जीवनरेखा साफ तौर पर हिसार की ओर बहती है। हिसार के लिए हर 10–15 मिनट में बस या अन्य परिवहन साधन उपलब्ध हैं। इसके विपरीत, भिवानी के लिए कई बार एक घंटे या उससे अधिक समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इसका परिणाम यह होता है कि भिवानी जाकर किसी कार्यालयीन कार्य को निपटाकर उसी दिन घर लौट पाना आम आदमी के लिए लगभग असंभव हो जाता है। एक दिन का काम दो दिन में बदल जाता है, जिससे न केवल समय और धन की हानि होती है, बल्कि कामकाजी वर्ग, किसानों और व्यापारियों पर अतिरिक्त बोझ भी पड़ता है।
प्रशासनिक और व्यावहारिक निर्भरता
व्यवहारिक जीवन में सिवानी क्षेत्र की निर्भरता भिवानी पर नहीं, बल्कि हिसार पर है। उच्च शिक्षा संस्थान, बड़े अस्पताल, विशेष चिकित्सा सुविधाएं, प्रमुख मंडियां, रोजगार के अवसर और न्यायिक संस्थान—इन सबके लिए सिवानी का नागरिक स्वाभाविक रूप से हिसार की ओर देखता है। यह स्थिति एक विडंबना को जन्म देती है, जहां प्रशासनिक आदेश भिवानी से संचालित होते हैं, लेकिन जीवन की जरूरतें हिसार से पूरी होती हैं। यही असंतुलन वर्षों से जनता की असुविधा का कारण बना हुआ है।
सामाजिक और सांस्कृतिक साम्य
सिवानी का सामाजिक और सांस्कृतिक ताना-बाना भी हिसार से अधिक मेल खाता है। पारिवारिक रिश्ते, व्यापारिक संबंध, शैक्षिक आवाजाही और सामाजिक सहभागिता—इन सभी क्षेत्रों में सिवानी का जुड़ाव हिसार से अधिक गहरा है। लोकजीवन, भाषा-शैली और सामाजिक व्यवहार में भी यह साम्य स्पष्ट दिखाई देता है। प्रशासनिक सीमाएं यदि सामाजिक वास्तविकताओं के विपरीत खींची जाएं, तो वे जनता के लिए सुविधा की बजाय बाधा बन जाती हैं। सिवानी के मामले में यही स्थिति वर्षों से बनी हुई है।
नारे की भूमिका : विचार को पहचान
हर बड़े जन-आंदोलन को एक ऐसा वाक्य चाहिए होता है, जो उसकी पूरी भावना को कुछ शब्दों में समेट दे। सिवानी आंदोलन को यह पहचान मिली नारे के रूप में—
“भिवानी से है इंकार, हमको चाहिए जिला हिसार।”
यह नारा डॉ. सत्यवान सौरभ की कलम से निकला, और धीरे-धीरे आंदोलन की वैचारिक पहचान बन गया। यह केवल भावनात्मक उद्घोष नहीं, बल्कि सिवानी क्षेत्र की भौगोलिक सच्चाई, प्रशासनिक तर्क और जन-आकांक्षा का संक्षिप्त लेकिन सटीक बयान है। यही नारा गांव-गांव, ढाणी-ढाणी और चौपाल-चौपाल तक पहुंचा और आम लोगों की जुबान पर चढ़ गया।
शांत, लोकतांत्रिक और निरंतर संघर्ष
इस आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही है कि यह कभी उग्र या विभाजनकारी नहीं हुआ। ज्ञापन, बैठकों, संवाद, रैलियों और शांतिपूर्ण तरीकों से अपनी बात सरकार तक पहुंचाई गई। यही कारण है कि यह आंदोलन किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसानों, व्यापारियों, युवाओं, महिलाओं, कर्मचारियों और सामाजिक संगठनों—सभी की साझा मांग बन गया। दस वर्षों की निरंतरता यह सिद्ध करती है कि यह मुद्दा क्षणिक नहीं, बल्कि स्थायी समाधान की मांग करता है।
विधानसभा क्षेत्र पर संतुलित दृष्टिकोण
जहां तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न है, आंदोलन की मांग वहां भी संतुलित और व्यावहारिक है। स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उपमंडल सिवानी यथावत रहे, और विधानसभा हल्का भी सिवानी के नाम से ही गठित किया जाए। इससे न तो क्षेत्रीय पहचान को नुकसान पहुंचेगा और न ही प्रशासनिक संतुलन बिगड़ेगा।
सरकार के लिए कसौटी
आज जब शासन “ईज ऑफ लिविंग” और “ईज ऑफ गवर्नेंस” जैसे सिद्धांतों की बात करता है, तो सिवानी का प्रश्न एक वास्तविक परीक्षा बन जाता है। यदि प्रशासनिक निर्णय जनता की रोजमर्रा की कठिनाइयों को कम नहीं कर पा रहे, तो उन्हें बदलने का साहस दिखाना ही सुशासन की पहचान है।
एक क्षेत्र की सामूहिक आकांक्षा
लगभग दस वर्षों का यह शांत, संगठित और जन-आधारित संघर्ष स्पष्ट संकेत देता है कि सिवानी की यह मांग किसी व्यक्ति, समिति या संगठन की नहीं, बल्कि एक पूरे क्षेत्र की सामूहिक आकांक्षा है। अब यह प्रश्न केवल भिवानी या हिसार का नहीं, बल्कि प्रशासनिक विवेक और जन-संवेदनशीलता का है। सरकार के लिए यह अवसर है कि वह सिवानी को उसकी भौगोलिक और सामाजिक सच्चाई के अनुरूप प्रशासनिक संबद्धता देकर यह संदेश दे कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ सुनी जाती है।
भिवानी से इंकार, हमको चाहिए जिला हिसार—आज यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि सिवानी के भविष्य की घोषणा है।