एक ही परिवार को श्रेय देने की परम्परा से देश को बाहर निकाला: नरेन्द्र मोदी

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-अटलजी की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र प्रेरणा स्थल का किया लोकार्पण- 65 एकड़ में बने प्रेरणा स्थल में श्यामा प्रसाद, दीनदयाल व अटल बिहारी की प्रतिमाएं हैं स्थापित

लखनऊ, 25 दिसंबर (हि.स.)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने देश के विकास में योगान देने वाली महान विभूतियों का कद छोटा करने का कार्य किया। भाजपा की सरकार ने आंबेडकर, नरसिम्हा राव, प्रणब मुखर्जी, भगवान विरसा मुंडा से लेकर अटलजी तक के योगदान को समान रूप से सम्मान दिया और उनके योगदान को याद किया है। देश में दूसरों की लकीर छोटी कर एक ही परिवार को सारा श्रेय देने का प्रयास हुआ, भाजपा ने उसे भी बदला है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुरुवार को यहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म शताब्दी महोत्सव के अवसर पर नवनिर्मित राष्ट्र प्रेरणा स्थल का लोकार्पण करने के बाद एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने क्रिसमस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि आज लखनऊ की यह धरती नयी प्रेरणा का साक्षी बन रही है। 25 दिसंबर का यह दिन दो महान विभूतियों के जन्म का सुयोग लेकर आता है। अटलजी और महामना मदन मोहन मालवीयजी की जयंती है। आज के ही दिन महाराजा बिजली पासी की भी जन्म जयंती है। महाराजा बिजली पासी ने जो विरासत छोड़ी, उसे हमारे पासी समाज ने आगे बढ़ाया। यह संयोग ही था कि अटलजी ने ही वर्ष 2000 में महाराजा बिजली पासी के नाम पर डाक टिकट जारी किया। इन महान विभूतियों काे नमन करता हूं।

नरेन्द्र मोदी ने कहा कि यह राष्ट्र प्रेरणा स्थल उस सोच का प्रतीक है जिसने भारत को आत्म सम्मान और एकता का मार्ग दिखाया। मुखर्जी, उपाध्याय और अटलजी की यह प्रतिमाएं जितनी ऊंची हैं, उससे अधिक ऊंची उनके विचार हैं। अटलजी कविता कदम मिलाकर…पढ़ते हुए माेदी ने कहा कि यह राष्ट्र प्रेरणा स्थल हमे संदेश देता है कि हमारा हर कदम राष्ट्र के लिए है। सबका प्रयास ही विकसित भारत के संकल्प का सिद्ध करेगा। इस भूमि पर पिछले कई दशकों से कूड़ा जमा था। प्रेरणा स्थल के निर्माण में लगे श्रमिकों और योगीजी की टीम को शुभकामनाएं देता हूं।

माेदी ने कहा कि डॉ. मुखर्जी ही थे, जिन्होंने भारत के दो प्रधान दो विधान को खारिज किया था। भाजपा सरकार को आर्टिकल 370 को गिराने का अवसर मिला। स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग मंत्री के रूप में देश को पहली औद्योगिक नीति दी। आज आत्मनिर्भरता के उसी मंत्र को हम बुलंदी दे रहे हैं। आज भारत में निर्मित सामान पूरी दुनिया में पहुंच रहा है। यूपी में एक जनपद एक उत्पाद सफलता से आगे बढ़ रहा है। दूसरी ओर डिफेंस कॉरिडोर बन रहा है। दुनिया ने ब्रह्मोस को देखा। वह दिन दूर नहीं जब यूपी डिफेंस उत्पादक के रूप में देखा जाएगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दीनदयालजी ने एकात्म मानव वाद का दर्शन दिया। जहां शरीर, मन, बुद्धि, सबका विकास हो। हर जरूरतमंद को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के दायरे में लाने का प्रयास हो। यही सुशासन है। यह सच्चा सेक्युलरिज्म है। आज भारत में पहली बार बिना भेद भाव पक्का घर, बिजली, शौचालय, मुफ्त इलाज और अनाज मिल रहा है। पंडित दीनदयाल के विचारों क साथ न्याय हो रहा है। देश ने गरीबी को हराया है। यह इसलिए संभव हो सका क्योंकि भाजपा सरकार ने अंतिम व्यक्ति को प्राथमिकता दी।

मोदी ने कहा कि 2014 से पहले 25 करोड़ लोग ऐसे थे जो सरकार की सामाजिक सुरक्षा के दायरे में थे। आज 95 करोड़ उस दायरे में है। उप्र में भी बड़ी संख्या में लोगों को इसका लाभ मिला है। बैंक खाते कम ही लोगों के पास थे। बीमा भी नहीं मिल पाता था। बीमा के लिए योजनाएं बनाई गयीं। पहले यही गरीब लोग बीमा के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। इन्हीं योजनाओं के जरिय हमारे गरीब परिवारों को लगभग 25 हजार करोड़ रुपये का लाभ मिला है।

माेदी ने कहा कि अटलजी ने सही मायने में सुशासन को जमीन पर उतारा। डिजिटल कार्य को आगे बढ़ाने के लिए अटलजी की सरकार में ही नींव रखी गयी थी। अटल सरकार की टेलीकॉम नीति की वजह से घर-घर में मोबाइल और इंटरनेट पहुंचा। आज अटलजी जहां भी होंगे, प्रसन्न होंगे, आज भारत मोबाइल निर्माता बन गया है। भारत में यूपी सबसे आगे है। प्रधानमंत्री मोदी ने अटल सरकार की सड़कों को लेकर हुए प्रयास का भी जिक्र किया।

कांग्रेस पर हमला बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमें यह नहीं भूलना है कि भारत के प्रत्येक उपलब्धि को एक ही परिवार से जोड़ने की प्रवृत्ति पनपी। एक ही परिवार का नाम, उनकी ही प्रतिमाएं लगाई गयीं, योजनाएं चलाई गयीं। भाजपा ने इस प्रवृत्ति से भी देश को बाहर निकाला है। हमारी सरकार हर किसी के योगदान को सम्मान दे रही है। आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस के योगदान को याद किया जा रहा है। भाजपा ने आंबेडकर के पंचतीर्थ को विकसित किया। कांग्रेस ने सरदार पटेल के कद को छोटा करने का प्रयास किया गया। आज उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित की गयी। उनके योगदान का याद किया जा रहा है। भगवान विरसा मुंडा के नाम पर स्मारक बना है। उप्र में ही महाराजा सुहेलदेव से लेकर निषाद राज तक का स्मारक बना है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि परिवारवाद के लोग असुरक्षा के शिकार होते हैं। इन्हें दूसरों की लकीर छोटी करने की आदत रही है। दिल्ली के म्यूजियम में अनेक प्रधानमंत्रियों को नजरअंदाज किया गया। भाजपा सरकार ने उसे भी बदला है। प्रधानमंत्री का कार्यकाल कितना भी छोटा रहा हो, उन्हें प्रधानमंत्री संग्रहालय में बराबर का सम्मान दिया गया है। नरसिम्हा राव और प्रणब दादा को भारत रत्न से नवाजा गया। तरुण गोगोई और मुलायम सिंह समेत अन्य नेताओं को भाजपा सरकार में सम्मान मिला।

मोदी ने कहा कि मुझे गर्व है कि मै उप्र से सांसद हूं। आज उप्र के मेहनतकश लोग विकास की नयी गाथा लिख रहे हैं। कभी यूपी खराब कानून व्यवस्था के लिए जाना जाता था। आज अयोध्या, काशी समेत अन्य स्थानों को विकसित करते हुए विकास की नई गाथा लिख रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने तीनों महान विभूतियों के नाम के जयकारे लगवाकर अपने भाषण का समापन किया। इस अवसर पर रक्षा मंत्री व लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह, राज्यपाल आनंदी बेन पटेल, उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री व यूपी भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक समेत उप्र सरकार के अन्य मंत्री व नेता मौजूद रहे।

ऐसा है राष्ट्र प्रेरणा स्थलप्रदेश की राजधानी लखनऊ की बसंत कुंज योजना के सेक्टर-जे में 65 एकड़ में विकसित राष्ट्र प्रेरणा स्थल में डॉ. श्याम प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीन दयाल उपाध्याय और अटलजी की विशालकाय कांस्य प्रतिमाएं स्थापित की गयी हैं। सभी प्रतिमाएं 65 फुट ऊंची हैं। राष्ट्र प्रेरणा स्थल लखनऊ में गोमती नदी के किनारे हरदोई मार्ग पर बनाया गया है। यहां पर कैफेटेरिया, ध्यान केन्द्र, रैली के लिए मैदान और सभागार जैसी सुविधाएं हैं। इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने इन महान विभूतियों के जीवन पर आधारित म्यूजियम का भी लोकार्पण किया। कमल के आकार के बने इस म्यूजियम का प्रधानमंत्री मोदी समेत अन्य नेताओं ने अवलोकन किया। भारत माता की प्रतिमा को स्थान दिया गया है। यहां आने वाले को भारत के 100 वर्ष की यात्रा की झलक दिख जाएगी।

राष्ट्र प्रेरणा स्थल का उद्घाटन) प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की छवि दुनिया में हुई बेहतर: राजनाथ सिंह

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आज राष्ट्र प्रेरणा स्थल के लोकार्पण समारोह में रक्षा मंत्री व क्षेत्रीय सांसद राजनाथ सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज पूरी दुनिया में भारत को गौरव दिलाने का काम कर रहे हैं। दुनिया के 29 देशों के सर्वोच्च पुरस्कार प्रधानमंत्री मोदी को अब तक मिले हैें। प्रधानमंत्री माेदी के नेतृत्व में भारत की पूरे विश्व में छवि बेहतर हुई है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई विशिष्टजनों की उपस्थिति में लखनऊ में बने राष्ट्र प्रेरणा स्थल का लोकार्पण किया। इस भव्य समाराेह में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि पिछले 11 साल प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों की वजह से महंगाई दर कम हो रही है। इसी के साथ-साथ विकास दर आठ फीसदी हुई है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज मजबूत हुई है। अब भारत कुछ बोलता है तो पूरा विश्व ध्यान से सुनता है कि भारत कह क्या रहा है। माेदी के नेतृत्व में भारत की पूरे विश्व में छवि बेहतर हुई है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि आज यह बेहद महत्वपूर्ण अवसर है, जब लखनऊ में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पंडित दीन दयाल उपाध्याय और पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा वाले राष्ट्र प्रेरणा स्थल का लोकार्पण हो रहा है। मोदी सरकार एक भारत श्रेष्ठ भारत के साथ महापुरुषों के सम्मान और विरासत को संजोने का अभियान चला रही है और यह उसी अभियान का एक हिस्सा है। इन महापुरुषों की वैचारिक प्रतिबद्धताओं को उल्लेख करते हुए केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय एकता और अखंडता के लिए अपना जीवन ब​लिदान दिया। कश्मीर में धारा 370 को हटाने के लिए संघर्ष किया और उसे आगे बढ़ाते हुए यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटा कर पूरा किया। पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद और अंत्योदय का मंत्र दिया और बताया कि व्यक्ति धन से ही सुखी नहीं होता है बल्कि उसके मन, आत्मा और विचार से भी सुखी होना चाहिए। व्यक्ति की आत्मा का परमात्मा से भी मिलन होना चाहिए।

लखनऊ से सांसद रह चुके भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की चर्चा करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अटलजी के बारे में लखनऊ के लोग अच्छी तरह से जानते हैं। उनके विनोदी स्वभाव को भी जानते हैं। केंद्रीय रक्षामंत्री ने अपने संबोधन में अटलजी की पाकिस्तान की एक यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि अटलजी से एक महिला पत्रकार ने शादी करने का प्रस्ताव देते हुए कि कश्मीर देना पड़ेगा तो अटलजी ने अपने विनोदी स्वभाव के अनुसार बोले हां स्वीकार है, लेकिन दहेज में पूरा पाकिस्तान मिलना चाहिए। अपने संबाेधन में केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने माेदी सरकार के मनरेगा का नाम बदलने का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले के कानून में कई तरह की विसंगतियां थीं, लेकिन अब दुरुस्त किया गया है और लोगों को 125 दिन के काम की गारंटी दी गई है। गांवों में बुनियादी ढांचे का निर्माण होगा।

राजनाथ ने की याेगी की प्रशंसा

लखनऊ से सांसद राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी देखरेख में इतना भव्य और शानदार राष्ट्र प्रेरणा स्थल बनकर तैयार हुआ है। उन्हाेंने कहा कि राज्य और केंद्र सरकारें लगातार देश की आम जनता की बेहतरी के काम कर रही हैं। इसी के साथ-साथ वह अतीत में हुए अपने राष्ट्र नायकों को सम्मान भी दे रही हैं। इस अवसर पर उन्होंने पंडित मदन मोहन मालवीय की जयंती पर याद किया। केंद्रीय मंत्री ने महापुरुषों की प्रतिमाओं के शिल्पकार राम सुतार को भी नमन किया।

अटलजी के सुशासन के मंत्र को अब आगे बढ़ा रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी: याेगी आदित्यनाथ

राष्ट्र प्रेरणा स्थल के उद्घाटन के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपना भाषण सिया वर रामचंद्र के जयकारे के साथ शुरू किया। मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि आज हम सबके लिए गौरव का पल है। इस राष्ट्र प्रेरणा स्थल में प्रधानमंत्री मोदी के विजन के ही अनुरूप भारत को नई दिशा देने वाले तीन महापुरुषों की प्रतिमाएं स्थापित की गयी हैं। डाॅ. मुखर्जी ने एक भारत श्रेष्ठ भारत का मंत्र दिया था। उनका वह सपना आज साकार हो रहा है। पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने अंत्योदय का मूल मंत्र दिया। अंत्योदय के मूल मंत्र और अटलजी के सुशासन के मंत्र को साकार रूप देने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज इस राष्ट्र प्रेरणा स्थल का लोकार्पण कर रहे हैं। यह हमारा सौभाग्य है कि यह साल अटलजी का जन्मशताब्दी वर्ष है। मुख्यमंत्री याेगी ने कहा कि अटलजी ने कहा था कि अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा। आज वह दिख रहा है। अटलजी ने भारत को जो सुशासन दिया था, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज उसे आगे बढ़ा रहे हैं।

भारत एक जनवरी से किम्बरली प्रक्रिया की अध्यक्षता ग्रहण करेगा

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किम्बरली प्रक्रिया (केपी) की पूर्ण बैठक में भारत को 1 जनवरी 2026 से किम्बरली प्रक्रिया की अध्यक्षता संभालने के लिए चुना गया है। किम्बरली प्रक्रिया एक त्रिपक्षीय पहल है जिसमें सरकारें, अंतरराष्ट्रीय हीरा उद्योग और नागरिक समाज शामिल हैं, जिसका उद्देश्य ” कच्चे हीरे” के व्यापार को रोकना है । ये वे कच्चे हीरे हैं जिनका उपयोग विद्रोही समूह या उनके सहयोगी उन संघर्षों को वित्तपोषित करने के लिए करते हैं जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों में परिभाषित वैध सरकारों को कमजोर करते हैं।

भारत 25 दिसंबर 2025 से केपी उपाध्यक्ष का पदभार ग्रहण करेगा और नव वर्ष में अध्यक्ष का पदभार संभालेगा। यह तीसरी बार होगा जब भारत को किम्बरली प्रक्रिया की अध्यक्षता सौंपी जाएगी।

इस फैसले का स्वागत करते हुए वाणिज्य और उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत का चयन अंतरराष्ट्रीय व्यापार में ईमानदारी और पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए मोदी सरकार की प्रतिबद्धता में वैश्विक विश्वास को दर्शाता है।

संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव के अंतर्गत स्थापित किम्बरली प्रक्रिया प्रमाणन योजना (केपीसीएस) 1 जनवरी 2003 को लागू हुई और तब से कच्चे हीरों के व्यापार पर अंकुश लगाने के लिए एक प्रभावी तंत्र के रूप में विकसित हुई है। किम्बरली प्रक्रिया में वर्तमान में 60 भागीदार हैं, जिनमें यूरोपीय संघ और उसके सदस्य देशों को एक ही भागीदार माना जाता है। केपी के भागीदार मिलकर वैश्विक कच्चे हीरों के व्यापार के 99 प्रतिशत से अधिक हिस्से पर कब्जा करते हैं, जिससे यह इस क्षेत्र को नियंत्रित करने वाला सबसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय तंत्र बन जाता है।

हीरा निर्माण और व्यापार के एक प्रमुख वैश्विक केंद्र के रूप में, भारत का नेतृत्व ऐसे समय में सामने आया है जब भू-राजनीति में बदलाव हो रहे हैं और टिकाऊ एवं जिम्मेदार स्रोतों पर जोर बढ़ रहा है। अपने कार्यकाल के दौरान, भारत शासन और अनुपालन को मजबूत करने, डिजिटल प्रमाणीकरण और पता लगाने की क्षमता को बढ़ावा देने, डेटा-आधारित निगरानी के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाने और संघर्ष-मुक्त हीरों में उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करेगा।

2025 में उपाध्यक्ष और 2026 में अध्यक्ष के रूप में, भारत किम्बरली प्रक्रिया में विश्वास को मजबूत करने, नियम-आधारित अनुपालन सुनिश्चित करने और इसके मूल उद्देश्यों और विकसित हो रही वैश्विक अपेक्षाओं के अनुरूप इसकी विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए सभी प्रतिभागियों और पर्यवेक्षकों के साथ मिलकर काम करेगा, साथ ही किम्बरली प्रक्रिया को अधिक समावेशी और प्रभावी बहुपक्षीय ढांचा बनाने की दिशा में भी काम करेगा।

नेपाली युवती के सीने में धड़क रहा है एक भारतीय का ‘दिल’

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काठमांडू, 25 दिसंबर (हि.स.)। कभी-कभी एक दिल दो देशों को जोड़ देता है। न नक्शे की जरूरत होती है, न कूटनीति की, बस इंसानियत काफी होती है। इसी इंसानियत की मिसाल बनी हैं एक अनाथ नेपाली युवती, जिनके सीने में इस समय एक भारतीय नागरिक का दिल धड़क रहा है।

केरल के एर्नाकुलम जिले के सरकारी अस्पताल ने पहली बार सफलतापूर्वक हृदय प्रत्यारोपण किया है। यह घटना न केवल भारत के लिए एक बड़ी चिकित्सकीय उपलब्धि है, बल्कि नेपाल-भारत के भावनात्मक रिश्तों का भी दुर्लभ उदाहरण है।

इस हृदय प्रत्यारोपण के माध्यम से नेपाल के सुर्खेत जिले की निवासी 21 वर्षीय नेपाली युवती दुर्गा कामी को नया जीवन मिला। वह पिछले अगस्त महीने के अंतिम सप्ताह इलाज के लिए केरल पहुंची थीं।

47 वर्षीय ए. शिवु केरल के ही निवासी थे। बीते नवंबर में एक सड़क दुर्घटना में वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। कुछ दिनों के इलाज के बाद डॉक्टरों ने उन्हें ‘ब्रेन डेड’ घोषित कर दिया। यह क्षण उनके परिवार के लिए गहरे शोक का था लेकिन उसी दुख की घड़ी में उन्होंने एक बड़ा मानवीय निर्णय लिया- शिवु का हृदय दान करने का।

उधर, केरल के ही एक अन्य हिस्से में दुर्गा जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही थीं। अनाथालय में पली-बढ़ी दुर्गा ‘कार्डियक सार्कोइडोसिस’ नामक दुर्लभ और गंभीर हृदय रोग से पीड़ित थीं। उनकी मां और बहन की भी इसी बीमारी से मृत्यु हो चुकी थी और पिता पहले ही गुजर चुके थे। हृदय प्रत्यारोपण ही उनकी आखिरी उम्मीद थी। इलाज के लिए वह पहले लखनऊ और फिर काठमांडू गईं, लेकिन एक मलयाली मित्र की सलाह पर वह अंततः कोच्चि पहुंचीं।

केरल राज्य स्वास्थ्य विभाग ने उन्हें ‘हार्ट डोनर लिस्ट’ में प्राथमिकता दी। अदालत के आदेश, स्वास्थ्य मंत्रालय की सक्रियता और डॉक्टरों के समर्पण से कुछ ही घंटों में शिवु का दिल दुर्गा को प्रत्यारोपित करने का फैसला संभव हो सका। कोच्चि से करीब 11 किलोमीटर दूर हेलीकॉप्टर के जरिए शिवु का दिल सुरक्षित रूप से एर्नाकुलम जिला अस्पताल पहुंचाया गया, जहां अनुभवी चिकित्सक टीम ने सफल ऑपरेशन कर दुर्गा को नया जीवन दिया।

दुर्गा के भाई तिलक ने अस्पताल, डॉक्टरों और केरल सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया। भावुक होते हुए उन्होंने कहा, “दाता परिवार और केरल सरकार का मैं दिल से धन्यवाद करता हूं।” केरल की स्वास्थ्य मंत्री वीणा जॉर्ज ने भी सोशल मीडिया पर चिकित्सकों की प्रशंसा की और दावा किया कि भारत में पहली बार किसी जिला अस्पताल स्तर पर हृदय प्रत्यारोपण किया गया है।

नमामि गंगे ने गंगा आरती कर मनाया भारत रत्न महामना – अटल का जन्म दिन

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—श्री काशी विश्वनाथ धाम के गंगा द्वार पर तस्वीरों पर श्रद्धांजलि अर्पित

वाराणसी,25 दिसंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू)के संस्थापक भारत रत्न महामना पं मदन मोहन मालवीय और राजनीति के अटल सूर्य पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती गुरूवार को मनाई गई। दोनों महापुरूषों की जयंती पर नमामि गंगे ने श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के गंगा द्वार पर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किया। मां गंगा की आरती उतारकर भारत रत्न महामना और अटल जी की जयंती मनाई। राष्ट्रीय ध्वज के साथ महामना – अटल जी की तस्वीर लेकर गंगा निर्मलीकरण के संकल्प को साकार करने के लिए सभी को शपथ दिलाई गई । महामना द्वारा दी गयी प्रेरणा ” गंगा बहे और बहती रहे ” को आत्मसात कर उन्हें स्मरण किया गया । नमामि गंगे काशी क्षेत्र के संयोजक राजेश शुक्ला ने इस मौके पर कहा कि महामना की यह कामना थी कि भारत की समृद्धि , प्रगति और जीवन की गतिशीलता का प्रमाण माँ गंगा प्रदूषण मुक्त हों , शुद्ध रहें, बाधाओं से मुक्त होकर अविरल बहें और बहती रहें इसी में भारत का हित है । उन्होंने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में देश भर की नदियों को जोड़कर सिंचाई से लेकर बाढ़ तक की समस्या से निपटने का सपना देखा गया । नदी जोड़ो योजना में गंगा सहित 60 नदियों को जोड़ने की योजना थी । अटल जी का मकसद यह था कि इससे कृषि योग्य लाखों हेक्टेयर भूमि की मानसून पर निर्भरता कम हो जाएगी । हम सभी को इन दोनों महापुरुषों का जन्मदिन गंगा निर्मलीकरण एवं अविरलता के लक्ष्य को निर्धारित करके मनाना चाहिए । आयोजन में अर्जुन सिंह , शुभम उपाध्याय, नवनीत कुमार, शिवाली कुमारी, हर्ष आर्या आदि ने भी भागीदारी की।

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शीर्ष नक्सली गणेश उइके के मारे जाने पर अमित शाह ने कहा-नक्सलवाद से मुक्ति की दहलीज पर ओडिशा

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नई दिल्ली, 25 दिसंबर (हि.स.)। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को कहा कि ओडिशा के कंधमाल जिले में हुए बड़े नक्सल विरोधी ऑपरेशन में शीर्ष माओवादी नेता और केंद्रीय समिति सदस्य गणेश उइके सहित छह नक्सलियों का मारा जाना नक्सल-मुक्त भारत की दिशा में मील का पत्थर है। उन्होंने भरोसा जताया कि इस बड़ी सफलता के बाद ओडिशा नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त होने की दहलीज पर खड़ा है।

गृह मंत्री कार्यालय के आधिकारिक एक्स हैंडल पर पोस्ट किया गया है कि, “नक्सल-मुक्त भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम। ओडिशा के कंधमाल में एक बड़े ऑपरेशन में सेंट्रल कमेटी मेंबर गणेश उइके सहित 6 नक्सलियों को अब तक खत्म कर दिया गया है। इस बड़ी सफलता के साथ ओडिशा पूरी तरह से नक्सलवाद से मुक्त होने की कगार पर है। हम 31 मार्च 2026 से पहले नक्सलवाद को खत्म करने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं।”

पुलिस सूत्रों के अनुसार, मारे गए नक्सलियों में माओवादी संगठन का शीर्ष कमांडर गणेश उइके भी शामिल है, जिस पर 1 करोड़ 10 लाख रुपये का इनाम घोषित है। वह ओडिशा और आसपास के राज्यों में माओवादी गतिविधियों का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता था।

ओडिशा के पुलिस महानिदेशक योगेश बहादुर खुरानिया ने बताया कि खुफिया सूचनाओं के आधार पर कंधमाल-गंजाम सीमा क्षेत्र में संयुक्त सुरक्षा बलों द्वारा यह ऑपरेशन चलाया गया। मुठभेड़ के दौरान छह नक्सली मारे गए।

सुरक्षा बलों द्वारा इलाके में तलाशी अभियान जारी है और अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई ओडिशा में नक्सल समस्या के खात्मे की दिशा में निर्णायक साबित होगी।

शाह ने ग्वालियर में 2 लाख करोड़ की परियोजनाओं का किया भूमिपूजन-लोकार्पण

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ग्वालियर, 25 दिसंबर (हि.स.)। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘अभ्युदय एमपी ग्रोथ समिट‘ के तहत गुरुवार को ग्वालियर में 2 लाख करोड़ की परियोजनाओं का भूमिपूजन-लोकार्पण किया।

पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जयंती के अवसर पर मध्य प्रदेश के ग्वालियर में मेला ग्राउंड में आयोजित ‘अभ्युदय मध्य प्रदेश ग्रोथ समिट का गुरुवार को केंद्रीय गृह अमित शाह और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अटलजी की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने करीब दो लाख करोड़ रुपये की औद्योगिक परियोजनाओं का लोकार्पण और भूमिपूजन से राज्य में लगभग 1.93 लाख रोजगार अवसर सृजित होने की संभावना है।

केन्द्रीय गृह मंत्री शाह और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एमपी ग्रोथ समिट में लगी प्रदर्शनी का अवलोकन किया। समिट के दौरान केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ग्वालियर मेले का उद्घाटन किया और अटल संग्रहालय के नवीनीकरण कार्य को भी जनता को समर्पित किया। इस समिट में करीब 25 हजार लाभार्थी तथा हजारों उद्यमी और निवेशक भाग ले रहे हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य राज्य में निवेश को बढ़ावा देना और औद्योगिक विकास को नई दिशा देना है। कार्यक्रम में केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल सहित कई वरिष्ठ मंत्री और जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।

इस अवसर पर अमित शाह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजा साहब कहकर संबोधित किया। मंच से यह सुनकर जनता ने खूब तालियां बजाई। उन्होंने आगे कहा कि ग्वालियर की धरती साधारण नहीं है। यही वह भूमि है जहां तानसेन का जन्म हुआ और ग्वालियर घराने के अनेक महान संगीतकारों ने अपनी साधना की। उन्होंने कहा कि इसी भूमि ने अटल बिहारी वाजपेयी जैसे महान नेता को देश को दिया। यहीं से निकलकर अटल जी ने संघर्ष किया और आज पूरा देश उन्हें लाड़ करता है।

उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में देश की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी है। अटल जी से पहले आदिवासियों के लिए न तो कोई ठोस योजना थी और न ही कोई अलग विभाग, जिससे उनके विकास और उत्थान का कार्य हो सके। अटल बिहारी वाजपेयी ने आदिवासियों के कल्याण के लिए अलग आदिवासी विभाग का गठन किया और उनके अधिकारों को मजबूती दी।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में मध्यप्रदेश सरकार विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने और देश को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। राज्य सरकार के अनुसार यह ग्रोथ समिट केवल निवेश प्रस्तावों और औद्योगिक घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उद्योग, शहरी विकास, पर्यटन, एमएसएमई, स्टार्टअप और रोजगार को एक साथ आगे बढ़ाने का समग्र विजन प्रस्तुत किया गया है। समिट के माध्यम से मध्यप्रदेश के विकास मॉडल को एक नए और व्यापक दृष्टिकोण के साथ देश और दुनिया के सामने रखा जा रहा है।

राष्ट्रपति ने संथाली भाषा में भारत का संविधान जारी किया

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राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (25 दिसंबर, 2025) राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में संथाली भाषा में भारत का संविधान जारी किया।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि यह सभी संथाली लोगों के लिए गर्व और खुशी की बात है कि भारत का संविधान अब संथाली भाषा में, ओल चिकी लिपि में उपलब्ध है। इससे वे संविधान को अपनी भाषा में पढ़ और समझ सकेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि इस वर्ष हम ओल चिकी लिपि की शताब्दी मना रहे हैं। उन्होंने विधि एवं न्याय मंत्री और उनकी टीम की प्रशंसा की, जिन्होंने शताब्दी वर्ष में भारत के संविधान को ओल चिकी लिपि में प्रकाशित करवाया।

इस अवसर पर उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में उपराष्ट्रपति श्री सीपी राधाकृष्णन और केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल शामिल थे।

संथाली भाषा, जिसे 2003 के 92वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, भारत की सबसे प्राचीन जीवित भाषाओं में से एक है। यह झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार में बड़ी संख्या में आदिवासी लोगों द्वारा बोली जाती है।

सीएम योगी ने पूर्व पीएम अटल जी को श्रद्धांजलि दीं

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लखनऊ – सीएम योगी ने पूर्व पीएम अटल जी की 101वीं जयंती पर लोक भवन स्थित प्रतिमा पर अटल बिहारी को नमन कर श्रद्धांजलि दीं। डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने भी श्रद्धांजलि दी।

इस अवसर पर योगी ने कहा – अटल जी की पैतृक भूमि यूपी में होना सौभाग्य की बात है। अटल जी का विराट व्यक्तित्व प्रेरणास्रोत है। लखनऊ में राष्ट्र प्रेरणा स्थल का निर्माण किया गया है। अटल जी का जीवन राष्ट्र को समर्पित रहा है। राष्ट्र के विकास में जीवन समर्पित किया।अटल जी की स्मृतियां जीवंत रखनी हैं। लखनऊ से अटल जी का रिश्ता खास है। प्रदेशवासियों को सुशासन दिवस की बधाई।अटल जी हम सभी के लिए प्रेरणा है।अटल जी ने लोकसभा में यूपी का प्रतिनिधित्व किया।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में तीन जनवरी तक स्पर्श दर्शन पर रोक, श्रद्धालुओं को मिलेगा झांकी दर्शन

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—वर्ष के अन्त में हो रही अत्यधिक भीड़ के चलते लिया गया निर्णय

वाराणसी, 25 दिसंबर (हि.स.)। समापन की ओर बढ़ रहे वर्ष 2025 में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन के लिए उमड़ रही भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर में तीन जनवरी 2026 तक स्पर्श दर्शन पर रोक लगाई गई है। मंदिर में प्रोटोकॉल और सुगम दर्शन चलता रहेगा। मंदिर न्यास की ओर से यह जानकारी बुधवार देर शाम दी गई। बताया गया कि मंदिर में वर्ष 2025 के अंत और नए साल में उमड़ने वाली संभावित भीड़ की सुरक्षा और सुगम दर्शन के लिए स्पर्श दर्शन रोका गया है।

मंदिर न्यास के अनुसार तीन जनवरी को भीड़ का आकलन और समीक्षा की जाएगी। यदि भीड़ कम हुई तो स्पर्श दर्शन की व्यवस्था शुरू होगी । समय के अनुरूप आवश्यक निर्णय लिया जाएगा। इस अवधि में कतारबद्ध श्रद्धालुओं को झांकी दर्शन मिलेगा। मंदिर न्यास ने श्रद्धालुओं से नियम में सहयोग करने की अपील की है और कहा है कि मंदिर में दर्शन पूजन आस्था का विषय है, सुविधा एवं प्रतिष्ठा का नहीं। उधर भीड़ को देखते हुए मंदिर के नंदू फारिया मार्ग पर भी स्थायी चेकिंग पॉइंट बनाया जा रहा है।

मंदिर प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ और सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए यहां प्रवेश द्वार पर लगेज चेकिंग मशीन भी लगायी जाएगी। वाराणसी में बढ़ती ठंड के बीच पर्यटन सीजन भी चल रहा है। लोग वाराणसी में घूमने के साथ बाबा व‍िश्‍वनाथ मंद‍िर में दर्शन पूजन के लिए बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं।

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स्कूल के बाहर खड़ी आधी आबादी : जब बेटियाँ बीच रास्ते लौट आती हैं

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छूटी हुई पाठशाला, छिनते सपने : भारत की बेटियों की अधूरी शिक्षा; अधिकार से वास्तविकता तक : लड़कियों की स्कूली ड्रॉपआउट की क्रूर सच्चाई; स्कूल के बाहर खड़ी आधी आबादी : जब बेटियाँ बीच रास्ते लौट आती हैं; किताब, काँच और क़ैद : पितृसत्ता के साये में लड़कियों की शिक्षा; ड्रॉपआउट की दीवार के पार : भारत की बेटियाँ और शिक्षा का संघर्ष; अनुच्छेद 21A से आगे की लड़ाई : क्यों छूट जाती हैं बेटियाँ स्कूल से?; संविधान ने हक़ दिया, समाज ने रोका : लड़कियों की अधूरी स्कूली यात्रा; सायकिल, शौचालय और सुरक्षा : तीन कुंजियाँ, जो बेटियों को स्कूल में रोक सकती हैं; बाल विवाह, घरेलू बोझ और डर : लड़कियों की शिक्षा के अदृश्य दुश्मन; जब स्कूल नहीं, घर बनता है किस्मत : बेटियों की शिक्षा और भारतीय समाज।

– – डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत में लड़कियों की स्कूली शिक्षा की कहानी आज़ादी के बाद के विकास‑वृत्तांत की सबसे जटिल और मार्मिक कड़ी है। संविधान का अनुच्छेद 21A हर बच्चे को 6 से 14 वर्ष तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है, पर ज़मीनी तस्वीर बताती है कि जैसे‑जैसे कक्षा बढ़ती है, लड़कियों की संख्या कम होती जाती है और माध्यमिक‑उच्च माध्यमिक स्तर पर पहुँचते‑पहुँचते बड़ी संख्या में बेटियाँ स्कूल से बाहर हो चुकी होती हैं। यह केवल शैक्षणिक ढाँचे की विफलता नहीं, बल्कि गहरे बैठे सामाजिक पूर्वाग्रह, पितृसत्ता, आर्थिक अभाव और राज्य की अधूरी प्रतिबद्धताओं की संयुक्त देन है।  

सबसे पहले बात स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं की, जो लड़कियों के लिए शिक्षा के अधिकार और शिक्षा की वास्तविक उपलब्धता के बीच की सबसे कठोर दीवार बनकर खड़ी हैं। आज भी अनेक सरकारी स्कूलों में अलग, सुरक्षित और कार्यशील शौचालयों की कमी है; जहाँ शौचालय बने भी हैं, वहाँ साफ‑सफाई, पानी और रखरखाव की स्थिति अक्सर बेहद खराब रहती है। किशोरावस्था में प्रवेश करने वाली बालिकाओं के लिए मासिक धर्म के दौरान स्वच्छ और सम्मानजनक व्यवस्था जीवन की बुनियादी ज़रूरत है; लेकिन जब स्कूल इस ज़रूरत को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो परिवार के लिए सबसे आसान विकल्प लड़की को घर बैठा देना होता है। स्वच्छ पेयजल, सेनेटरी नैपकिन की उपलब्धता, कचरा निस्तारण जैसी बातें कागज़ी योजना‑दस्तावेज़ों में चाहे जितनी आकर्षक दिखें, ज़मीन पर उनकी कमी लड़कियों के हौसले को बार‑बार तोड़ती है। यह वही उम्र है जहाँ शिक्षा आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण का रास्ता खोल सकती है, लेकिन अवसंरचना की कमी उसे ‘ड्रॉपआउट’ के आँकड़ों में बदल देती है।  

दूसरा बड़ा कारक स्कूल तक पहुँच का है, जिसमें दूरी और सुरक्षा दोनों शामिल हैं। ग्रामीण इलाकों में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय अक्सर गाँव से कई किलोमीटर दूर स्थित होते हैं। लड़के किसी तरह साइकिल या पैदल यह दूरी तय कर लेते हैं, लेकिन लड़कियों के मामले में हर किमी के साथ असुरक्षा, झिझक और जोखिम भी बढ़ जाता है। रास्ते में छेड़खानी, उत्पीड़न, सुनसान सड़कें, अपर्याप्त सार्वजनिक परिवहन और देर से घर लौटने का डर, माता‑पिता के मन में यह धारणा गहरी कर देते हैं कि “इतनी दूर भेजना सुरक्षित नहीं।” जहाँ‑जहाँ साइकिल वितरण, छात्राओं के लिए सुरक्षित बस‑सेवा, या क्लस्टर‑स्कूल जैसा मॉडल ईमानदारी से लागू हुआ, वहाँ यह साफ़ दिखा कि परिवहन‑सुरक्षा की समस्या हल होते ही लड़कियों की उपस्थिति, ट्रांज़िशन रेट और बोर्ड तक बने रहने के आँकड़े बेहतर हो जाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि सही नीतिगत हस्तक्षेप से “दूरी” नाम की बाधा को शिक्षा का रास्ता रोके बिना भी संभाला जा सकता है।  

तीसरी वजह घर की चारदीवारी के भीतर छिपी है—घरेलू काम और देखभाल की ज़िम्मेदारियाँ। भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक संरचना में बेटा अक्सर “भविष्य का कमाने वाला” और बेटी “परिवार की ज़िम्मेदारी” मानी जाती है। गरीब और निम्न‑मध्यवर्गीय परिवारों में माँ के साथ खाना बनाना, बर्तन‑कपड़े धोना, छोटे भाई‑बहनों की देखभाल करना, पानी लाना, खेत या दुकान में मदद करना—इन सभी कामों का सबसे आसान विकल्प लड़की ही बनती है। उसके स्कूल‑समय को “लचीला” समझा जाता है; जैसे ही घर का बोझ बढ़ता है, सबसे पहले उसकी पढ़ाई कटती है। सर्वेक्षण बार‑बार दिखाते हैं कि बहुत‑सी लड़कियाँ “पढ़ाई में रुचि नहीं” की वजह से नहीं, बल्कि “घर के काम” और “परिवारिक ज़िम्मेदारी” के कारण स्कूल छोड़ती हैं, लेकिन डेटा में इसे अक्सर गलत ढंग से दर्ज कर दिया जाता है। यह अदृश्य श्रम, जो घर और समाज के पहियों को चलाता है, लड़की के अधिकारों और भविष्य के रास्ते में सबसे बड़े रोड‑ब्लॉक में बदल जाता है।  

चौथा निर्णायक तत्व है बाल विवाह और विवाह‑केंद्रित सामाजिक मानसिकता। आज भी अनेक समुदायों में यह मान्यता जीवित है कि लड़की की “इज़्ज़त” और “भविष्य” का असली उपाय उसे जल्दी ब्याह देना है, न कि लंबी शिक्षा देना। ज़्यादा पढ़ाई को कई बार “बिगड़ने”, “पति न मानने” या “शादी देर से होने” के ख़तरे के रूप में देखा जाता है। राष्ट्रीय स्तर के सर्वे साफ़ दिखाते हैं कि अशिक्षित या कम पढ़ी‑लिखी लड़कियों में 18 वर्ष से पहले विवाह की संभावना कहीं अधिक होती है, जबकि उच्च शिक्षा पाने वाली लड़कियों में यह अनुपात बहुत कम है। यह दुष्चक्र बेहद क्रूर है—कम शिक्षा बाल विवाह को जन्म देती है और बाल विवाह आगे की शिक्षा की संभावना लगभग समाप्त कर देता है। शादी के बाद ससुराल की ज़िम्मेदारियाँ, जल्दी गर्भधारण का सामाजिक दबाव और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम, लड़की को स्कूल से स्थायी रूप से बाहर कर देते हैं।  

इन सबके ऊपर आर्थिक बाधाएँ एक तरह से “सील” का काम करती हैं। भले ही सरकारी स्कूलों में फीस नाममात्र की हो या न हो, लेकिन यूनिफॉर्म, जूते‑चप्पल, किताबें, कॉपियाँ, परीक्षा शुल्क, ट्यूशन, परिवहन—इन अप्रत्यक्ष खर्चों का बोझ गरीब परिवारों के लिए बहुत भारी होता है। ऐसे परिवारों की आर्थिक गणित अक्सर बेटे के पक्ष में झुक जाती है; उन्हें लगता है कि लड़के की शिक्षा पर निवेश का प्रतिफल नौकरी या कमाई के रूप में मिलेगा, जबकि लड़की की पढ़ाई “निवेश से अधिक दान” जैसी समझी जाती है। यह सोच कई बार लड़कियों को बिल्कुल शुरुआती कक्षाओं से बाहर धकेल देती है, तो कई बार आठवीं, दसवीं या बारहवीं के मोड़ पर उनकी शिक्षा का धागा टूट जाता है।  

इन कारणों का असर भारत के सार्वभौमिक विद्यालयीकरण के लक्ष्य पर गहरा और दूरगामी है। सबसे पहले तो यह संकट सतत विकास लक्ष्य 4 (सभी के लिए समावेशी और समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा) और लक्ष्य 5 (लैंगिक समानता) की दिशा में भारत की प्रगति को बाधित करता है। जब माध्यमिक स्तर पर ही लड़कियों की बड़ी संख्या स्कूल से बाहर हो जाती है, तो साक्षरता, नामांकन और परीक्षा‑उत्तीर्णता के आँकड़ों में स्थायी लैंगिक खाई बन जाती है। “सार्वभौमिक” शब्द केवल प्रवेश‑सूची में दिखता है, लेकिन क्लासरूम और परीक्षा‑परिणाम में नहीं।  

दूसरा असर अंतरपीढ़ी गरीबी पर पड़ता है। शोध लगातार दिखाते हैं कि शिक्षित माँ अपने बच्चों की सेहत, पोषण, टीकाकरण और शिक्षा में अधिक सजग और निवेशकारी होती है। जब लड़की स्वयं शिक्षा से वंचित रह जाती है, तो उसके लिए अगली पीढ़ी को शिक्षा‑केंद्रित जीवन देना बहुत कठिन हो जाता है। इस तरह एक पीढ़ी का ड्रॉपआउट, अगली पीढ़ी के अवसरों को भी सीमित कर देता है और गरीबी की जंजीरें टूटने के बजाय और मजबूत हो जाती हैं।  

तीसरा बड़ा असर आर्थिक विकास और उत्पादकता पर दिखता है। यदि महिलाओं की श्रम‑बल भागीदारी, शिक्षा और कौशल के सहारे, पुरुषों के बराबर या उसके करीब पहुँच सके तो भारत की GDP में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है; लेकिन जब लाखों लड़कियाँ माध्यमिक स्तर से बाहर हो जाती हैं, तो यह संभावित मानव‑पूँजी कभी विकसित ही नहीं हो पाती। देश की आधी आबादी “हाफ‑टाइम” से पहले ही खेल से बाहर कर दी जाती है, और आर्थिक विकास अपनी प्राकृतिक ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाता।  

चौथा असर सामाजिक‑राजनीतिक सशक्तिकरण पर पड़ता है। शिक्षा सिर्फ रोज़गार का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नागरिकता का सबसे बुनियादी औज़ार है। पढ़ी‑लिखी लड़की स्वास्थ्य, प्रजनन, रोज़गार, बैंकिंग, डिजिटल तकनीक और मतदान जैसे निर्णयों में अधिक आत्मविश्वास से भाग लेती है। जब वह स्कूल छोड़ने पर मजबूर होती है, तो उसकी आवाज़ कमज़ोर हो जाती है, वह फैसलों की निर्माता की बजाय केवल प्रभावित होने वाली बनकर रह जाती है। स्थानीय निकायों में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को वास्तविक शक्ति में बदलने के लिए जरूरी है कि गांव‑मोहल्ले की सामान्य लड़कियाँ भी कम से कम माध्यमिक स्तर तक की ठोस शिक्षा प्राप्त कर सकें।  

इन नकारात्मक प्रभावों को संतुलित करने के लिए नीतियों को केवल कानूनों तक सीमित नहीं, बल्कि ज़मीन पर संवेदनशील बनाना होगा। सशर्त नकद अंतरण, छात्रवृत्ति, साइकिल और परिवहन योजनाएँ, सुरक्षित और लैंगिक‑समान स्कूल अवसंरचना, बाल विवाह के खिलाफ सख्त और ईमानदार अमल, समुदाय‑आधारित जागरूकता अभियान, और ओपन‑स्कूलिंग व डिजिटल शिक्षा के जरिए “दूसरा मौका”—ये सभी कदम तभी असरदार होंगे जब उनकी योजना और क्रियान्वयन के केंद्र में “लड़की” हो, न कि केवल “छात्र” का कोई लिंग‑निरपेक्ष, अमूर्त चित्र। लड़कियों का स्कूल से बाहर होना भारत की कहानी में एक अधूरा अध्याय नहीं, बल्कि एक ऐसी चेतावनी है जो बताती है कि जब तक हर बेटी बिना डर और बाधा के कम से कम माध्यमिक शिक्षा पूरी न कर सके, तब तक “शिक्षित भारत” का सपना आधा ही रहेगा।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,