नेपालः रवि-बालेन के बीच 7 बिंदु समझौता, रवि पार्टी अध्यक्ष, बालेन अगले प्रधानमंत्री के उम्मीदवार

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काठमांडू, 28 दिसंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) और काठमांडू महानगरपालिका के मेयर बालेन शाह के बीच रविवार सुबह एकता को लेकर समझौता हुआ है। कुछ देर पहले दोनों पक्षों के बीच 7-बिंदुओं वाला समझौता पत्र तैयार किया गया।

समझौते के अनुसार, रवि लामिछाने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का नेतृत्व करेंगे, जबकि बालेन शाह को आगामी प्रधानमंत्री के रूप में आगे बढ़ाया जाएगा। इस समझौता पत्र पर रास्वपा अध्यक्ष रवि लामिछाने और काठमांडू महानगरपालिका के मेयर बालेन शाह ने हस्ताक्षर किए।

बालेन शाह के राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी में शामिल होने के लिए तैयार होने के बाद पार्टी का नाम, झंडा और चुनाव चिह्न यथावत रखा गया है। समझौता पत्र में रवि लामिछाने और बालेन शाह दोनों ने अपने-अपने पदों का उल्लेख किए बिना केवल नाम लिखकर हस्ताक्षर किए हैं। यद्यपि दस्तावेज में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का विषय वस्तु दर्ज है, लेकिन उसमें रवि लामिछाने का नाम मात्र उल्लेखित है।

रवि लामिछाने ने पार्टी सभापति के रूप में हस्ताक्षर नहीं किए हैं और मेयर बालेन शाह ने भी अपने पद का उल्लेख नहीं किया है। समझौते के बाद संभवतः बालेन शाह मेयर पद से इस्तीफा देकर सक्रिय पार्टी राजनीति में प्रवेश करेंगे।

समझौते के प्रमुख बिंदु

पहले बिंदु में कहा गया है कि भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ नवयुवाओं (जेन-जी) द्वारा चलाए गए आंदोलन को अपनाया जाएगा तथा घायल और शहीद परिवारों की मांगों को संबोधित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है।

दूसरे बिंदु में समृद्धि और सामाजिक न्याय के लिए नीतिगत, संस्थागत और संरचनागत सुधार करने का संकल्प लिया गया है। दोनों पक्षों ने नेपाल को 10 वर्षों के भीतर सम्मानजनक मध्यम-आय वाला देश बनाने के रोडमैप पर ईमानदारी से समर्पित रहने की बात कही है।

रवि और बालेन ने स्वयं को क्रमशः प्रथम और द्वितीय पक्ष के रूप में प्रस्तुत करते हुए व्यापक एकता की घोषणा की है। पार्टी का नाम, झंडा और चुनाव चिह्न पहले की तरह रहेंगे।

समझौतापत्र में स्पष्ट किया गया है कि पार्टी का नेतृत्व रवि करेंगे और आगामी सरकार का नेतृत्व बालेन शाह करेंगे। इसमें कहा गया है, “राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष रवि लामिछाने होंगे और आगामी प्रतिनिधि सभा चुनाव के बाद संसदीय दल के नेता तथा भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बालेन्द्र शाह होंगे।”

दस्तावेज में कहा गया है कि पार्टी की संगठनात्मक संरचना को अधिक सक्षम और व्यापक बनाने के लिए युवा अभियंताओं और अनुभवी विशेषज्ञों को उनकी योग्यता, समावेशिता और सार्वजनिक छवि के आधार पर जिम्मेदारियां सौंपी जाएंगी।

समझौते को तत्काल लागू करने के उद्देश्य से निर्वाचन आयोग में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अभिलेख और दस्तावेज अद्यावधिक करने की घोषणा की गई है। इसके अनुसार, अब बालेन पक्ष के समानुपातिक उम्मीदवार स्वतः रास्वपा के टिकट से चुनाव लड़ेंगे और संभवतः दो दिनों के भीतर दोनों पक्ष आपसी सहमति से समानुपातिक उम्मीदवारों की सूची निर्वाचन आयोग में जमा करेंगे। प्रत्यक्ष तर्फ के नामांकन के लिए अभी लगभग तीन सप्ताह का समय शेष है।

उन्होंने अपने अभियान को “वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति” का नाम देते हुए रास्वपा के सिद्धांत, नेतृत्व और चिह्न के अंतर्गत एकजुट होने का आह्वान किया है।

कोहरे का चौतरफा कोहराम

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   बाल मुकुन्द ओझा

देश के अनेक राज्य इस समय ठंड और कोहरे की चपेट में है। कोहरे से प्रतिदिन होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें बेहद चिंताजनक है। बढ़ते कोहरे के कारण सड़क हादसों की संख्या में इजाफा हो रहा है। आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। सुबह और देर शाम घना कोहरा छाए रहने के कारण दृश्यता कम हो ही है, वहीं ठंडी हवाओं ने लोगों की परेशानियां और बढ़ा दी हैं। ठंड और कोहरे का सबसे अधिक असर गरीब, दिहाड़ी मजदूरों,  रोज कमाने खाने वालों ,बुजुर्गों और स्कूली बच्चों पर देखा जा रहा है। दिहाड़ी मजदूरों को सुबह-सुबह काम पर निकलना कठिन हो गया है, जिससे उनकी रोजी-रोटी पर भी असर पड़ रहा है। वहीं खेतों में काम करने वाले किसानों की गतिविधियां भी सीमित हो गई है। ठंड से अस्पतालों और क्लीनिकों में मौसमी बीमारियों के मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। डॉक्टरों के मुताबिक ठंड, नमी और प्रदूषण के मेल से अस्थमा, ब्रॉन्काइटिस और सांस की अन्य समस्याएं बढ़ रही हैं। भीषण सर्दी और कोहरे का असर रेलवे पर भी दिखने लगा है। ट्रेनें लगातार लेट हो रही हैं, जिसके कारण यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कोहरे के चलते विजिबिलिटी कम होती है, जिससे सड़क हादसे बढ़ जाते हैं। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की रिपोर्ट ‘रोड एक्सीडेंट्स इन इंडिया-2021’ के अनुसार, पिछले सात वर्षों में कोहरे के कारण 7,994 सड़क दुर्घटनाएं हुईं। इन हादसों में 5,740 लोगों की मौत हुई, जबकि 4,322 लोग घायल हुए।

विशेषज्ञों का कहना है कि घने कोहरे में सावधानी ही सबसे बड़ी सुरक्षा है। तेज रफ्तार, गलत रोशनी और अनियंत्रित ड्राइविंग हादसों का कारण बनती हैं। इसलिए ड्राइवरों को सर्दियों में एक्सप्रेसवे पर यात्रा करते समय सही लाइट, नियंत्रित गति और पर्याप्त दूरी का पालन करना चाहिए।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार कोहरा वास्तव में हवा में तैरती पानी या फिर बर्फ की बहुत ही महीन बूंदें हैं। नम ठंडी हवा का संपर्क जब ऊष्णता से होता है तो कोहरा बन जाता है। कोहरा धरती के बिलकुल करीब आ चुके बादल हैं। जब आर्द्र हवा ऊपर उठकर ठंडी होती है तब जलवाष्प संघनित होकर जल की सूक्ष्म बूंदें बनाती है। कभी-कभी अनुकूल परिस्थितियों में हवा के बिना ऊपर उठे ही जलवाष्प जल की नन्हीं बूंदों में बदल जाती है तब हम इसे कोहरा कहते हैं। तकनीकी रूप से बूंदों के रूप में संघनित जलवाष्प के बादल को कोहरा कहा जाता है। सर्दियों में कैसे बनता है कोहरा?  सर्दियों के मौसम में उत्तर भारत के कई राज्य कोहरे की मोटी चादर में ढक जाते हैं । इसकी वजह से न केवल राहगीरों को बल्कि ट्रेन ड्राइवरों और एयरोप्लेंस के पायलटों तक को रास्ता ठीक से नहीं दिखाई देता। घने कोहरे के चलते लोगों को सुबह के वक्त गाड़ियों की लाइट जलानी पड़ती है । कोहरे के कहर ने सडकों पर दौड़ते वाहनों की न सिर्फ रफ्तार थम गयी बल्कि वाहनों में यात्रा करने बाले यात्रियों को दुर्घटनाओं का डर सताने लगा | वैसे तो इस मौसम में कोहरा पड़ना आम बात है लेकिन आखिर सर्दियों में इतना कोहरा आता कहाँ से है? देश के  महानगरों में सर्दियों में ऊषाकाल एवं प्रातःकाल मे नमी वाले दिनों मे ऐसा कोहरा प्रायः छा जाता है। क्योंकि वायुमण्डल में धुआँ धूल एवं अन्य कण जल कणों को स्थिर रखने के लिए उपस्थित रहते है। इससे साइकिल या मोटर साइकिल चालक के कपडे़ नम हो जाते हैं। गांवों के मुकाबले शहरों में कोहरा अध‍िक घना होता है क्योंकि शहरों की हवा में धूल और धुएं के कण अध‍िक होते हैं। ये कोहरे में मौजूद पानी की बूंदों के साथ मिलकर इसे गहरा बना देते हैं।

कोहरा के बारे में बताया जाता है यह अच्छा और बुरा दोनों है। कोहरा अधिक समय तक न रहे और सूर्योदय के बाद जल्द खत्म हो जाए तो फसल तथा पौधों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इससे फसलों में नमी बनी रहती है। पानी में ऊष्माधारण क्षमता अधिक होती है और कोहरे में पानी की बूंदें होती हैं, इसलिए कोहरा होने पर टेम्प्रेचर माइल्ड रहता है, जो फसलों को लाभ पहुंचाता है। जमीन पर रेंगने वाले कई जीव खासकर रेगिस्तानी इलाकों में रहने वाले कोहरे से मिलने वाली पानी की बूंदों पर ही जीवित रहते हैं। तटीय इलाकों में रहने वाले कई लोग खेतों में फॉग नेट लगाते हैं, ताकि कोहरे से पानी की बूंदें टूटकर फसलों पर गिरें।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

                                                        

बांग्लादेश में छात्रों की अगुवाई वाले संगठन में गहरा अंतर्विरोध, जमात से गठबंधन के सवाल पर इस्तीफे

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ढाका, 28 दिसंबर (हि.स.)। बांग्लादेश में फरवरी में होने वाले चुनाव के लिए नामांकन पत्र जमा करने की अंतिम तिथि से ठीक एक दिन पहले, छात्रों की अगुवाई वाली नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) में भारी अंतर्विरोध उभरकर सामने आया है। जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन और सीटों के बंटवारे के विरोध में संगठन के दो प्रमुख नेताओं ने इस्तीफा दे दिया है।कई अन्य असंतुष्ट नेताओं के संगठन से जल्द ही अलग होने की चर्चाएं हैंं।इन नेताओं ने संगठन के संयोजक नाहिद इस्लाम को पत्र लिख कर जमात के साथ गठबंधन को विश्वासघात और विचारधारा को कमजोर करने जैसा करार दिया है।

बांग्लादेश के प्रमुख अखबार डेली स्टार के मुताबिक छात्र आंदोलन से उपजी छात्रों की अगुवाई वालीएनसीपी के वरिष्ठ संयुक्त सचिव तसनीम जरा ने शनिवार को अपने इस्तीफे की घोषणा की। जबकि संयुक्त सचिव अरशदुल हक ने गुरुवार को पद छोड़ दिया। रिपोर्ट के मुताबिक जमात-ए-इस्लामी से गठबंधन को लेकर नाराज कई अन्य असंतुष्ट नेता जल्द इस्तीफा दे सकते हैं।

इन असंतुष्ट नेताओं ने संगठन के संयोजक नाहिद इस्लाम को पत्र लिखकर जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन को जमीनी स्तर के नेताओं के साथ विश्वासघात करार देते हुए कहा कि यह पार्टी की विचारधारा को कमजोर करेगा। पत्र में कहा गया है कि , “हमारा आधार हमारी पार्टी की घोषित विचारधारा, जुलाई विद्रोह से जुड़ी ऐतिहासिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक नैतिकता के मूलभूत प्रश्न हैं।”

जुलाई विद्रोह का उल्लेख कर आरोप लगाया गया है कि जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठन, इस्लामी छात्र शिबिर ने विभाजनकारी राजनीति, घुसपैठ, तोड़फोड़, एनसीपी के खिलाफ झूठे आरोप, छात्र संघ चुनावों के दौरान प्रचार और महिला सदस्यों पर ऑनलाइन चरित्र हनन में लिप्त रहे हैं। पत्र में जमात की 1971 में स्वतंत्रता-विरोधी भूमिका, नरसंहार में उसकी मिलीभगत और युद्धकालीन अपराधों पर उसके रुख का हवाला देते हुए कहा गया कि ये बांग्लादेश की लोकतांत्रिक चेतना और पार्टी के मूल्यों के साथ मौलिक रूप से असंगत हैं।

इनका कहना है कि जमात-ए-इस्लामी के साथ कोई भी गठबंधन पार्टी की नैतिक स्थिति को कमजोर करेगा और पार्टी की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाएगा। पत्र में नेताओं को याद दिलाया गया कि उन्होंने पहले भी सुधार के मुद्दों पर जमात के दोहरे रवैये की आलोचना की थी।

पार्टी संयोजक को लिखे पत्र में 30 एनसीपी नेताओं ने लिखा कि, “यदि उदारवादी समर्थक साथ छोड़ देते हैं तो पार्टी अपना मध्यमार्गी आधार खो देगी। इससे एनसीपी की स्वतंत्र राजनीतिक क्षमता को नुकसान पहुंचेगा।” पत्र में जमात के साथ किसी भी गठबंधन के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाने का आग्रह किया गया।

शुरुआत में छात्रों की अगुवाई वाली एनसीपी पिछले दो महीनों से अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही थी, लेकिन ढाका-8 से स्वतंत्र उम्मीदवार और इंकलाब मंचो के प्रवक्ता शरीफ उस्मान बिन हादी की हत्या के बाद उसने अपना रुख बदल लिया। तब से, एनसीपी नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं, जबकि पार्टी का दूसरा मजबूत धड़ा यह महसूस होने लगा है कि राष्ट्रीय राजनीति में एनसीपी की स्थिति को मजबूत करने के लिए किसी प्रमुख राजनीतिक शक्ति के साथ गठबंधन करना आवश्यक है। इसी लिहाज से जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन की तरफ बढ़ा है।

हालांकि पार्टी में जमात के साथ गठबंधन की कोशिशों पर गहरी आपत्ति है। संगठन से जुड़ी कई महिला नेता भी धार्मिक दलों से गठबंधन के खिलाफ खुलकर असहमति जता चुकी हैं। एनसीपी ने अभी तक गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है लेकिन चर्चा है कि जमात के साथ सीट बंटवारे पर बातचीत अंतिम चरण में है इसलिए पार्टी नेताओं की तरफ से इस्तीफे की घोषणा शुरू हो चुकी है। —————

भारतीय टेलीविजन के इतिहास में स्वर्णाक्षर रामानन्द सागर

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रामानंद सागर भारतीय टेलीविजन और सिनेमा जगत के एक ऐसे नाम हैं जिन्होंने भारतीय मनोरंजन उद्योग में अमिट छाप छोड़ी। उनका जन्म 29 दिसंबर 1917 को लाहौर, ब्रिटिश भारत (अब पाकिस्तान) में चंद्रमौली चोपड़ा के रूप में हुआ था। उनके पिता एक व्यवसायी थे और परिवार का माहौल धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों से परिपूर्ण था। बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया था, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनके नाना-नानी ने किया। इस कठिन समय ने उनके व्यक्तित्व को गहराई प्रदान की और जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण को आकार दिया।
रामानंद सागर की शिक्षा लाहौर में हुई। उनकी कला और साहित्य में गहरी रुचि विकसित की। युवावस्था में ही उन्हें लेखन का शौक था और वे कविताएं तथा कहानियां लिखा करते थे। विभाजन के दौरान वे अपने परिवार के साथ भारत आ गए और मुंबई में बस गए। इस दौर की त्रासदी और संघर्ष ने उनके जीवन दर्शन को प्रभावित किया और बाद में उनकी रचनाओं में इसकी झलक देखने को मिली। मुंबई आने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखना शुरू किया।
फिल्म निर्माण और निर्देशन में रामानंद सागर का प्रवेश 1950 के दशक में हुआ। उनकी पहली फिल्म “बरसात की रात” (1960) एक बड़ी व्यावसायिक सफलता साबित हुई। इस फिल्म के गीत-संगीत ने दर्शकों का दिल जीत लिया और रामानंद सागर एक सफल निर्देशक के रूप में स्थापित हो गए। उन्होंने “आरज़ू” (1965), “आंखें” (1968), “ललकार” (1972), “चरस” (1976) और “बाग़ी” (1990) जैसी कई सफल फिल्मों का निर्देशन किया। उनकी फिल्मों में सामाजिक संदेश, पारिवारिक मूल्य और मनोरंजन का अद्भुत मिश्रण होता था।
हालांकि रामानंद सागर को सबसे अधिक प्रसिद्धि उनकी टेलीविजन श्रृंखला “रामायण” से मिली। 1987 में दूरदर्शन पर प्रसारित यह धारावाहिक भारतीय टेलीविजन इतिहास का एक मील का पत्थर साबित हुआ। हर रविवार सुबह जब यह कार्यक्रम प्रसारित होता था, तो पूरा देश थम जाता था। सड़कें सूनी हो जाती थीं और लोग अपने टेलीविजन सेटों के सामने एकत्रित हो जाते थे। इस धारावाहिक ने धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को एक नया आयाम दिया और करोड़ों लोगों को रामायण की कथा से जोड़ा।
“रामायण” की सफलता अभूतपूर्व थी। यह कार्यक्रम विश्व का सबसे अधिक देखा जाने वाला धारावाहिक बन गया और गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ। रामानंद सागर ने इस महाकाव्य को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत किया जिससे हर वर्ग के दर्शक इससे जुड़ सके। उन्होंने पात्रों के चयन, संवाद, संगीत और दृश्यों के निर्माण में विशेष ध्यान दिया। अरुण गोविल (राम), दीपिका चिखलिया (सीता) और सुनील लहरी (लक्ष्मण) जैसे कलाकार घर-घर में पूजनीय हो गए।
“रामायण” की सफलता के बाद रामानंद सागर ने “श्री कृष्णा” (1993) नामक एक और धार्मिक धारावाहिक का निर्माण किया जो श्रीमद् भागवत पुराण पर आधारित था। यह धारावाहिक भी बेहद लोकप्रिय रहा और इसने भारतीय टेलीविजन पर धार्मिक और पौराणिक कथाओं के प्रसारण की परंपरा को मजबूत किया। उनकी निर्माण शैली में प्रामाणिकता, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और दृश्य सौंदर्य की अद्भुत त्रिवेणी होती थी।
रामानंद सागर केवल एक निर्देशक ही नहीं बल्कि एक दूरदर्शी कलाकार थे। उन्होंने भारतीय मूल्यों और संस्कृति को टेलीविजन के माध्यम से करोड़ों लोगों तक पहुंचाया। उनका मानना था कि मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा और संस्कार भी जरूरी हैं। उनके कार्यों में नैतिक मूल्यों की प्रधानता होती थी और वे अपनी कृतियों के माध्यम से समाज को एक सकारात्मक संदेश देना चाहते थे।
उनका व्यक्तिगत जीवन भी अनुशासन और सादगी से भरा था। वे एक समर्पित पारिवारिक व्यक्ति थे और अपने परिवार को बहुत महत्व देते थे। उनके बेटों ने भी फिल्म और टेलीविजन उद्योग में काम किया और पिता की विरासत को आगे बढ़ाया। रामानंद सागर ने अपने जीवनकाल में कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त किए जो उनकी प्रतिभा और योगदान की पहचान थे।
12 दिसंबर 2005 को मुंबई में 87 वर्ष की आयु में रामानंद सागर का निधन हो गया। उनकी मृत्यु भारतीय मनोरंजन जगत के लिए एक बड़ी क्षति थी। हालांकि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कृतियां आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जीवित हैं। “रामायण” और “श्री कृष्णा” आज भी विभिन्न चैनलों पर प्रसारित होते हैं और नई पीढ़ियों को भारतीय संस्कृति और मूल्यों से परिचित कराते हैं।
रामानंद सागर का योगदान भारतीय टेलीविजन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। उन्होंने साबित किया कि सार्थक और मूल्यपरक मनोरंजन भी व्यावसायिक रूप से सफल हो सकता है। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी और भारतीय कला और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा

यूनानी चिकित्सा के महान चिकित्सक हकीम अजमल खान

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हकीम अजमल खान भारतीय यूनानी चिकित्सा पद्धति के सबसे महान चिकित्सकों में से एक थे। इन्होंने न केवल चिकित्सा के क्षेत्र में बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन और शिक्षा के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दिया। उनका जन्म 11 फरवरी 1868 को दिल्ली में एक प्रतिष्ठित हकीमों के परिवार में हुआ था। उनके परिवार में पीढ़ियों से यूनानी चिकित्सा की परंपरा चली आ रही थी और उनके पूर्वज मुगल दरबार में शाही हकीम के रूप में सेवारत रहे थे। उनके पिता हकीम अजीज उल्ला खान भी एक प्रसिद्ध यूनानी चिकित्सक थे ।इनसे हकीम अजमल खान को चिकित्सा विज्ञान की प्रारंभिक शिक्षा मिली।

हकीम अजमल खान की शिक्षा पारंपरिक और आधुनिक दोनों पद्धतियों में हुई। उन्होंने अपने पिता और अन्य विद्वान हकीमों से यूनानी चिकित्सा का गहन अध्ययन किया। साथ ही उन्होंने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का भी अध्ययन किया और अंग्रेजी भाषा में भी प्रवीणता प्राप्त की। उनकी विशेषता यह थी कि उन्होंने पारंपरिक यूनानी चिकित्सा पद्धति को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ा। उन्होंने यूनानी औषधियों के गुणों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया और उन्हें और अधिक प्रभावी बनाने के लिए शोध किया।

चिकित्सक के रूप में हकीम अजमल खान की ख्याति देश भर में फैली हुई थी। वे विशेष रूप से हृदय रोग, मधुमेह और श्वसन तंत्र की बीमारियों के उपचार में माहिर थे। उनकी चिकित्सा पद्धति में रोगी के संपूर्ण स्वास्थ्य और जीवनशैली पर ध्यान दिया जाता था। वे केवल लक्षणों का उपचार नहीं करते थे बल्कि रोग के मूल कारण को समझकर उसका उपचार करते थे। उनके पास देश के विभिन्न हिस्सों से मरीज आते थे और उन्होंने हजारों लोगों को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाया। उनकी चिकित्सा सेवाओं की प्रसिद्धि इतनी थी कि अंग्रेज अधिकारी और यहां तक कि वायसराय भी उनसे परामर्श लेते थे।

हकीम अजमल खान केवल एक चिकित्सक ही नहीं थे बल्कि एक महान शिक्षाविद् और संस्थापक भी थे। उन्होंने यूनानी चिकित्सा पद्धति को संरक्षित करने और आगे बढ़ाने के लिए 1902 में दिल्ली में शरीफिया स्कूल की स्थापना की। बाद में 1916 में उन्होंने हिंदुस्तानी दवाखाना की स्थापना की जो यूनानी औषधियों के निर्माण और वितरण का एक प्रमुख केंद्र बन गया। 1921 में उन्होंने आयुर्वेद और यूनानी तिब्बिया कॉलेज की स्थापना की जो आज भी दिल्ली में कार्यरत है और हजारों छात्रों को यूनानी चिकित्सा की शिक्षा प्रदान कर रहा है।

हकीम अजमल खान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रूप से शामिल थे। वे महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी थे और असहयोग आंदोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कई अधिवेशनों में भाग लिया और 1921 में अहमदाबाद अधिवेशन की अध्यक्षता भी की। वे मुस्लिम समुदाय में राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए प्रयासरत रहे और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया जो आज भी भारत का एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान है।

हकीम अजमल खान का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे एक महान चिकित्सक होने के साथ-साथ एक दूरदर्शी शिक्षाविद्, एक समर्पित स्वतंत्रता सेनानी और एक सच्चे मानवतावादी थे। उनका मानना था कि चिकित्सा केवल एक पेशा नहीं बल्कि मानव सेवा का माध्यम है। वे गरीब और जरूरतमंद लोगों का निशुल्क इलाज करते थे और कभी भी धन संग्रह को अपना लक्ष्य नहीं बनाया। उनकी सादगी, विनम्रता और परोपकार की भावना ने उन्हें समाज में अत्यधिक सम्मानित बना दिया।

हकीम अजमल खान ने यूनानी चिकित्सा पद्धति को वैज्ञानिक आधार पर स्थापित करने के लिए अनेक शोध कार्य किए। उन्होंने कई दुर्लभ औषधीय पौधों की पहचान की और उनके गुणों का विश्लेषण किया। उनके द्वारा तैयार की गई कई औषधियां आज भी प्रचलित हैं और प्रभावी मानी जाती हैं। उन्होंने यूनानी चिकित्सा पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें और लेख भी लिखे जो आज भी यूनानी चिकित्सा के छात्रों के लिए मार्गदर्शक हैं।

29 दिसंबर 1927 को दिल्ली में हकीम अजमल खान का निधन हो गया। उनकी मृत्यु पर पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई और हजारों लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनकी विरासत आज भी जीवित है और उनके द्वारा स्थापित संस्थान आज भी यूनानी चिकित्सा के प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं। भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया और उनकी स्मृति में कई पुरस्कार और छात्रवृत्तियां स्थापित की गई हैं। हकीम अजमल खान का नाम भारतीय चिकित्सा इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है और वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे।(सोनेट)

भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे राजेश खन्ना

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राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा के सबसे चमकीले सितारों में से एक थे जिन्होंने हिंदी फिल्म जगत में एक अलग ही इतिहास रचा। उनका जन्म 29 दिसंबर 1942 को अमृतसर, पंजाब में जतिन खन्ना के रूप में हुआ था। उनके जैविक माता-पिता छुन्नीलाल खन्ना और चंद्रानी खन्ना थे, लेकिन बचपन में ही उन्हें उनके चाचा और चाची चुन्नीलाल खन्ना और लीलावती खन्ना ने गोद ले लिया था। उनका पालन-पोषण मुंबई में हुआ जहां उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। बचपन से ही उनमें अभिनय के प्रति विशेष रुचि थी और वे नाटकों में भाग लेते थे।
राजेश खन्ना की शिक्षा मुंबई के प्रतिष्ठित संस्थानों में हुई। उन्होंने सेंट सेबेस्टियन गोन गिरगांव हाई स्कूल से अपनी शिक्षा पूरी की और बाद में किशोरीमल कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। कॉलेज के दिनों में ही वे नाटकों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे थे और उनकी अभिनय प्रतिभा को पहचाना जाने लगा था। 1965 में उन्होंने फिल्मफेयर और यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स की प्रतियोगिता में भाग लिया और विजेता बने, जिसने उन्हें फिल्म जगत में प्रवेश का अवसर प्रदान किया।
उनकी पहली फिल्म 1966 में आई थी लेकिन असली सफलता उन्हें 1969 में आचार्य के निर्देशन में बनी फिल्म आराधना से मिली। इस फिल्म ने राजेश खन्ना को रातोंरात सुपरस्टार बना दिया। किशोर कुमार के गाए गीत और राजेश खन्ना की अदाकारी का अद्भुत संयोजन दर्शकों के दिलों में बस गया। फिल्म के गीत आज मेरे यार की शादी है और रूप तेरा मस्ताना बेहद लोकप्रिय हुए और राजेश खन्ना की छवि एक रोमांटिक नायक के रूप में स्थापित हो गई।
आराधना की सफलता के बाद राजेश खन्ना की लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। 1969 से 1971 के बीच उनकी लगातार पंद्रह फिल्में सुपरहिट रहीं जो भारतीय सिनेमा में एक अद्वितीय रिकॉर्ड है। बंदन, इत्तेफाक, दो रास्ते, खामोशी, सफर, आनंद, हाथी मेरे साथी, आप की कसम, अमर प्रेम और जैसी उनकी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया। उनकी हर फिल्म की रिलीज एक उत्सव बन जाती थी और सिनेमाघरों के बाहर दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ती थी।
राजेश खन्ना की अभिनय शैली अनूठी और स्वाभाविक थी। उनके अभिनय में एक खास तरह की सहजता थी जो दर्शकों को सीधे उनसे जोड़ती थी। उनके संवाद अदायगी, आंखों के हाव-भाव और मुस्कान में एक जादू था जिसने लाखों दिलों को जीत लिया। वे अपने किरदारों में इतनी गहराई से उतर जाते थे कि दर्शकों को राजेश खन्ना नहीं बल्कि वह किरदार नजर आता था। आनंद में उनके द्वारा निभाया गया आनंद का किरदार आज भी सिने प्रेमियों के दिलों में जीवित है।
उनकी लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि महिलाएं उनकी कार पर लिपस्टिक से संदेश लिखती थीं, उन्हें खून से लिखे पत्र भेजती थीं और कुछ तो उनसे शादी करने की इच्छा में अपनी शादी तक टाल देती थीं। सिनेमाघरों में उनकी फिल्में देखने के लिए लोग रात भर लाइन में खड़े रहते थे। राजेश खन्ना की दीवानगी एक सामाजिक परिघटना बन गई थी जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गई थी और संभवतः उसके बाद भी दोबारा नहीं देखी गई।
राजेश खन्ना ने अपने करियर में अनेक यादगार फिल्में दीं। आनंद में एक मरणासन्न व्यक्ति की भूमिका, अमर प्रेम में एक दुखी व्यक्ति की भूमिका, नमक हराम में मजदूर की भूमिका और अवतार में एक संघर्षशील पिता की भूमिका ने उनकी अभिनय क्षमता का विस्तार दिखाया। उन्होंने हीरो मोहिनी, रोटी, अमर प्रेम, दुश्मन, अपना देश, मेरे जीवन साथी, सौतन जैसी अनेक सफल फिल्मों में काम किया और हर बार दर्शकों का दिल जीता।
1973 में राजेश खन्ना ने अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया से विवाह किया जो उस समय एक उभरती हुई अभिनेत्री थीं। उनकी दो बेटियां ट्विंकल खन्ना और रिंकी खन्ना हुईं। ट्विंकल खन्ना ने भी कुछ समय के लिए अभिनय किया और बाद में एक सफल लेखिका बन गईं। हालांकि राजेश खन्ना और डिंपल कपाड़िया का वैवाहिक जीवन कुछ चुनौतियों से भरा रहा और वे अलग हो गए, लेकिन उनके बीच सम्मान और स्नेह बना रहा।
सत्तर के दशक के मध्य में अमिताभ बच्चन के उदय के साथ राजेश खन्ना की लोकप्रियता में कुछ कमी आई। हिंदी सिनेमा में एक्शन फिल्मों का दौर शुरू हुआ और रोमांटिक नायक की छवि धीरे-धीरे कम होती गई। फिर भी राजेश खन्ना ने अपना काम जारी रखा और अस्सी और नब्बे के दशक में भी कई फिल्मों में काम किया। उन्होंने सौतन, अवतार, आलाप जैसी फिल्मों में यादगार प्रदर्शन दिया और साबित किया कि प्रतिभा कभी खत्म नहीं होती।
राजेश खन्ना ने अपने जीवन में अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त किए। उन्हें तीन बार फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला। 2005 में उन्हें भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने कुछ समय के लिए राजनीति में भी प्रवेश किया और नई दिल्ली से सांसद चुने गए।
18 जुलाई 2012 को मुंबई में 69 वर्ष की आयु में राजेश खन्ना का निधन हो गया। उनके निधन पर पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई और लाखों प्रशंसकों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। उनकी अंतिम यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए और यह देखकर स्पष्ट हो गया कि राजेश खन्ना केवल एक अभिनेता नहीं बल्कि एक युग थे। आज भी जब कभी उनकी फिल्में टेलीविजन पर प्रसारित होती हैं तो दर्शक उन्हें उसी प्रेम से देखते हैं। राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे और उनकी विरासत सदैव अमर रहेगी।(सोनेट)

इतिहास के पन्नों में 29 दिसंबर : 1975 में ब्रिटेन में महिला और पुरुषों के समान अधिकारों से जुड़ा कानून लागू

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1975 में ब्रिटेन ने लैंगिक समानता की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया। इसी वर्ष सेक्स डिस्क्रिमिनेशन एक्ट लागू किया गया, जिसके तहत महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार प्रदान करना कानूनी रूप से अनिवार्य बना दिया गया। इस कानून का उद्देश्य शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना था।

कानून के लागू होने के बाद नौकरी, वेतन, पदोन्नति और कार्यस्थल की शर्तों में महिलाओं को पुरुषों के समान अवसर और अधिकार मिलने लगे। साथ ही, इसने समाज में महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने और उनके खिलाफ भेदभावपूर्ण व्यवहार को चुनौती देने का रास्ता खोला।

यह कानून न केवल ब्रिटेन में महिला सशक्तिकरण की नींव बना, बल्कि दुनिया भर के कई देशों के लिए लैंगिक समानता से जुड़े कानूनों की प्रेरणा साबित हुआ।

महत्वपूर्ण घटनाचक्र

1530 – मुगल शासक बाबर का बेटा हुमायूं उसका उत्तराधिकारी बना।

1778 – ब्रिटेन की सेना ने अमेरिकी राज्य जॉर्जिया पर क़ब्ज़ा किया।

1845 – टेक्सास अमेरिका का 28वां राज्य बना।

1911 – सुन यात सेन को नए चीन गणतंत्र का राष्ट्रपति घोषित किया गया।

1911 – मंगोलिया किंग वंश के शासन से आजाद हुआ।

1922 – नीदरलैंड ने संविधान अंगीकार किया।

1949 – यूरोपीय देश हंगरी में उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया गया।

1951 – अमेरिका के आणविक ऊर्जा आयोग के अधिकारियों ने आणविक ऊर्जा से बिजली उत्पादन के संबंध में पहली बार खुलासा किया।

1972 – अमेरिका में फ्लोरिडा राज्य के एवरग्लैड्स के समीप इस्टर्न त्रिस्टार जम्बो जेट विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने से 101 लोगों की मौत हुई।

1975 – ब्रिटेन में महिलाओं और पुरुषों के समान अधिकारों से जुड़ा कानून लागू।

1977 – विश्व का सबसे बड़ा ओपन एयर थियेटर ‘ड्राइव’ बंबई (अब मुम्बई) में खुला।

1978 – स्पेन में संविधान प्रभाव में आया।

1980 – सोवियत संघ के पूर्व प्रधानमंत्री कोसिगिन का देहान्त।

1983 – भारतीय क्रिकेटर सुनील गावास्कर ने टेस्ट क्रिकेट में अधिकतम 236 रन वेस्टइंडीज के खिलाफ बनाये।

1984 – कांग्रेस ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे भारी बहुमत से संसदीय चुनाव जीता था। इस चुनाव में 28 सीटें जीतकर तेलुगु देश में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के तौर पर उभरी।

1985 – श्रीलंका ने 43,000 भारतीयों को नागरिकता प्रदान की।

1988 – ऑस्ट्रेलिया में विक्टोरियाई पोस्ट ऑफिस संग्रहालय बंद हुआ।

1988 – सिद्धार्थनगर जिला का निर्माण बस्ती जिले में किया गया था। नए जिले में बस्ती का उत्तरी भाग शामिल है।

1998 – कंबोडिया पर 1975 से 1979 के बीच नियंत्रण करने वाले कट्टरपंथी कम्युनिस्ट संगठन ख्मेर रूज के नेताओं ने उनके शासन के दौरान तकरीबन 15 लाख लोगों के मारे जाने पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगी।

1989 – वाक्लाव हाबेल 1948 के बाद पहली बार चेकोस्लोवाकिया के ग़ैर-साम्यवादी राष्ट्रपति चुने गये।

1996 – नाटो के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए एकत्र होकर कार्य करने के मुद्दे पर रूस एवं चीन में सहमति।

1998 – विश्व के पहले परमाणु बम बनाने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक रेगर सक्रेबर का निधन।

2001 – अमेरिका में न्यूयार्क के शहर बफेलो में 24 सितंबर को शुरू हुआ बर्फीला तूफान पांच दिन बाद थम गया और तकरीबन 82 इंच मोटी बर्फ की चादर के नीचे दबे शहर की खुदाई का काम शुरू हुआ।

2002 – पाकिस्तान पर्यटकों को भारत के तीन शहरों में घूमने की अनुमति।

2004 – सुनामी लहरों के कारण इंडोनेशिया में मरने वालों की संख्या 60,000 पहुँची।

2006 – चीन ने वर्ष 2006 में राष्ट्रीय रक्षा पर श्वेत पत्र जारी किया।

2008 – इजराइल द्वारा गाजा पट्टी पर हमास के ठिकानों को निशाना बनाने के बीच हमास के राकेट हमले में तीन इजराइलियों की मौत के बाद इजराइल ने हमास के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

2012 – पाकिस्तान में पेशावर के समीप आतंकवादियों के हमले में 21 सुरक्षाकर्मी मारे गये।

2015 – पश्चिम अफ्रीकी देश गिनी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इबोला से मुक्त घोषित किया। दो बरस पहले देश में इस घातक बीमारी का प्रकोप फैला था।

जन्म

1844 – वोमेश चन्‍द्र बनर्जी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष।

1881 – गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी – प्रसिद्ध साहित्यकार थे।

1884 – डब्ल्यू सी बनर्जी – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष, कलकत्ता(अब कोलकाता) उच्च न्यायालय के प्रमुख वक़ील।

1900 – दीनानाथ मंगेशकर – मराठी रंगमंच के प्रसिद्ध अभिनेता, गायक, शास्त्रीय संगीतज्ञ तथा नाट्य संगीतकार थे।

1904 – कुप्पाली वेंकटप्पा पुटप्पा – कन्नड़ भाषा के कवि व लेखक थे।

1917 – रामानन्द सागर – प्रसिद्ध भारतीय फ़िल्म निर्देशक तथा ख्यातिप्राप्त धारावाहिक ‘रामायण’ के निर्माता।

1942- राजेश खन्ना- हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता।

1944 – वीरेन्द्र वीर विक्रम शाह – नेपाल के राजा और दक्षिण एशियाई नेता थे।

1948 – सुधीश पचौरी – प्रसिद्ध आलोचक, प्रमुख मीडिया विश्लेषक, साहित्यकार, स्तंभकार और वरिष्ठ मीडिया समीक्षक।

निधन

1927 – हकीम अजमल खां – राष्ट्रीय विचारधारा के समर्थक और यूनानी पद्धति के प्रसिद्ध चिकित्सक

1967 – ओंकारनाथ ठाकुर- प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री, संगीतज्ञ एवं हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक

2003 – शिवराज रामशरण – भारतीय वैज्ञानिक थे।

2008 – मंजीत बावा- प्रसिद्ध चित्रकार।

2019 – स्वामी विश्वेशतीर्थ – हिन्दू संत और पेजावर मठ के प्रमुख थे।

अब्दुल ! धीरे धीरे कर वह मर जाएगी ….. ?

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प्रख्यात बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की जान पर खतरा बन आया तो दुनियां में किसी ने उन्हें शरण नहीं दी । इस्लामिक देश तो क्या देते यूरोप ने भी हाथ खड़े कर दिए ? शेख हसीना जब अपदस्थ हुई तब सभी इस्लामिक देशों ने दरवाजे बंद कर लिए । शरण दी तो दोनों को ही भारत ने शरण दी । तस्लीमा और हसीना दोनों अकेले पड़ गए , चौराहे पर आ खड़े हुए थे । भारत ने दोस्त बनाया था । जिसे भी बनाया उससे कभी दगा न किया । भारत साथ न देता तो आज न तस्लीमा होतीं और न हसीना । अफसोस कि जिस पूर्वी पाकिस्तान को पाल पोसकर बांग्लादेश खड़ा किया था वही आज हिन्दुओं की पीठ में छुरा घोंप रहा है ?

यह कोई नई बात नहीं । बांग्लादेश के कट्टरपंथियों ने पहले भी हिंदुओं का कत्लेआम कम नहीं किया था । तस्लीमा नसरीन का विश्वप्रसिद्ध उपन्यास ” लज्जा” याद है आपको ? मिलता नहीं , पर हमने यह पीड़ान्तक उपन्यास पढ़ा है । सच्ची घटना का बेहद मार्मिक चित्रण किया था तसलीमा ने । उपन्यास की सबसे दर्दनाक पंक्ति थी – अब्दुल एक एक कर ‘करो’ वह मर जाएगी । ये पंक्तियां वह बेबस हिन्दू मां कहती है जिसे उसकी 18 वर्षीय बेटी के साथ अब्दुल और उसके बीस दरिंदे उठा लाए थे । दर्द से भरी मां कहती हे – आधे मेरे साथ कर लो उसे छोड़ दो । वहशी दरिंदे नहीं माने , मासूम बेटी मर गई , मां ने एक गुंडे का खंजर निकालकर अपने कलेजे में घोंप लिया । यही थी लज्जा की सत्यकथा । कट्टरपंथी मौलानाओं ने सर तन से जुदा के फरमान सुनाए , तस्लीमा किसी तरह भारत आई और हसीना की तरह जिंदा है , निर्वासित जीवन जी रही है ।

अच्छा हुआ तस्लीमा और हसीना भारत आ गईं । वरना दीपूचंद्र दास की तरह उन्हें भी पेड़ पर बांधकर जला दिया गया होता । फिर भी इस सत्य किन्तु नृशंस हत्याकांड पर “लज्जा 2” लिखा जा सकता है , कोई न कोई लिख भी देगा । लिखेगा भी वही लिखते हुए जिसके हाथ न कांपते हों , जिसके होंठ न थरथराते हों , जिसकी रूह न कांप उठती हो । यूँ तो इतिहास ने खुद को रच ही दिया है । जिगर पर पत्थर रखकर काल के कपाल पर लिख भी दिया है । क्षमा करें अटलजी , आज के जमाने का यही नया गीत है । इसीलिए आपकी लिखी पंक्तियों का उपयोग किया है । क्षमा करें । बांग्लादेश में आज जो हो रहा है , इस देश के निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान की कब्र भी भीग गई होगी । पाकिस्तानी सेना से सरेंडर करने वाले जनरल अरोड़ा और फील्ड मार्शल जनरल मानेकशॉ की भुजाएं भी स्वर्ग में फड़फड़ा रही होंगी ।

बांग्लादेश में हिंदुओं के हत्यारे मोहम्मद युनुस की शक्ल देखकर उसे मिले नोबल पुरस्कार ने तो दम तोड़ दिया है । अब देखना है 17 साल बाद वापस आया भगोड़ा तारिक रहमान क्या करेगा , देखना बाकी है । अभी तक दिमाग पाकिस्तान के ल्यारी वाले रहमान डकैत के किरदार में खोया हुआ था , यह एक और रहमान लंदन से आ गया । तो तारिक रहमान एक बात गांठ बांध लो , पाकिस्तान के नक्शेकदम पर मत चलना । दोस्त भारत है , मोदी है ; आसिम मुनीर और से शाहबाज से दोस्ती मत करो , फिर खंजर उतार देंगे । याद करो 1971 । भारत का अहसान मानों , कौन अपना है , दोस्त कौन है पहचानो । वरना हर कोई तस्लीमा या हसीना नहीं होता जो भारत गले लगाता फिरेगा ?

,,,,,कौशल सिखौला

धामी सरकार ने अब तक 571 अवैध मजारों को हटाया

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-देहरादून में एक और अवैध मजार हटाई गई, प्रशासन की कार्रवाई जारी

देहरादून, 28 दिसंबर (हि.स.)। अब तक धामी सरकार ने सरकारी भूमि पर बनी कुल 571 अवैध मजारों को हटाया है। देर रात उत्तराखंड की राजधानी में देहरादून में प्रशासन ने शास्त्री नगर, अजबपुर कलां क्षेत्र में सड़क किनारे बनी एक अवैध मजार को बुलडोजर से हटाया। नोटिस के बावजूद दस्तावेज न मिलने पर यह कार्रवाई की गई।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर बनाई गई अवैध संरचनाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है। लोगों से स्वयं ऐसे निर्माण हटाने की अपील की गई है।

प्रशासन की ओर से इस कार्रवाई से लगभग दो सप्ताह पूर्व संबंधित स्थल पर नोटिस चस्पा किया गया था, जिसमें संरचना के निर्माण से जुड़े वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे। निर्धारित समयावधि में कोई जवाब प्राप्त न होने पर यह कार्रवाई की गई।

जिलाधिकारी के निर्देश पर नगर मजिस्ट्रेट प्रत्यूष सिंह और एसडीएम हरि गिरी के नेतृत्व में नगर निगम की टीम ने अवैध मजार को हटाया। कार्रवाई के दौरान संरचना के नीचे किसी भी प्रकार के अवशेष नहीं पाए गए। हटाए गए मलबे को मौके से साफ कर दिया गया।

एसएसपी अजय सिंह ने बताया कि सुरक्षा की दृष्टि से कार्रवाई से पहले क्षेत्र को सील कर दिया गया था। करीब एक घंटे तक चली इस कार्रवाई के दौरान किसी प्रकार का विरोध या अप्रिय स्थिति सामने नहीं आई। प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा अब तक सरकारी भूमि पर बनी कुल 571 अवैध मजारों को हटाया जा चुका है।

ग्वाटेमाला में भीषण बस हादसा, खाई में गिरने से 15 लोगों की मौत, 19 घायल

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ग्वाटेमाला सिटी, 28 दिसंबर (हि.स.)। ग्वाटेमाला के पश्चिमी हिस्से में इंटर-अमेरिकन हाईवे पर शनिवार को एक दर्दनाक सड़क हादसे में कम से कम 15 लोगों की मौत हो गई, जबकि 19 अन्य घायल हो गए। अधिकारियों के अनुसार, एक यात्री बस अनियंत्रित होकर गहरी खाई में जा गिरी, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई।

स्थानीय अग्निशमन विभाग के प्रवक्ता लिआंड्रो अमाडो ने बताया कि मृतकों में 11 पुरुष, तीन महिलाएं और एक नाबालिग शामिल है। हादसे के बाद राहत एवं बचाव दल ने घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया, जहां कई की हालत गंभीर बताई जा रही है।

यह दुर्घटना सोलोला विभाग में किलोमीटर 172 से 174 के बीच हुई। यह इलाका घने कोहरे के लिए जाना जाता है, जिससे दृश्यता बेहद कम हो जाती है और हादसों का खतरा बढ़ जाता है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, खराब दृश्यता और सड़क की परिस्थितियां दुर्घटना का कारण हो सकती हैं।

फायर ब्रिगेड द्वारा साझा की गई तस्वीरों में बस को खाई में क्षतिग्रस्त अवस्था में देखा जा सकता है, जबकि राहतकर्मी यात्रियों को बाहर निकालने में जुटे नजर आए। प्रशासन ने घटना की जांच शुरू कर दी है और हादसे के सटीक कारणों का पता लगाया जा रहा है।