फैशन, पहचान और भ्रम: आज के युवाओं के सामने असली चुनौती

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— डॉ. सत्यवान सौरभ

हर दौर की अपनी पहचान होती है। यह पहचान केवल कपड़ों, हेयर-स्टाइल या चेहरे पर उगे बालों से नहीं बनती, बल्कि उस सोच से बनती है जो व्यक्ति और समाज—दोनों को दिशा देती है। आज के समय में युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे कैसे दिखते हैं यह कम, और क्या सोचते हैं तथा किसका अनुकरण करते हैं—यह अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। बाहरी आकर्षण, सोशल मीडिया की चमक और तात्कालिक लोकप्रियता ने पहचान की परिभाषा को सतही बना दिया है।

बीते कुछ वर्षों में दाढ़ी को लेकर एक तीखी बहस उभरी है। कुछ लोग इसे आधुनिक फैशन का प्रतीक मानते हैं, तो कुछ इसे सांस्कृतिक भ्रम और अंधानुकरण का उदाहरण। यह बहस तब और जटिल हो जाती है जब इसे धर्म, राजनीति या साज़िश से जोड़ दिया जाता है। ऐसे में ज़रूरी है कि हम भावनाओं से ऊपर उठकर, शोर से दूर रहकर, विवेकपूर्ण और तथ्यपरक दृष्टि से इस विषय को देखें। क्योंकि जब मुद्दे विचार के बजाय पहचान की लड़ाई बन जाते हैं, तब समाधान नहीं, विभाजन पैदा होता है।

इतिहास गवाह है कि दाढ़ी और क्लीन शेव—दोनों ही भारतीय समाज का हिस्सा रहे हैं। वैदिक काल के ऋषि-मुनि जटाधारी थे, तो राजदरबारों में सुसज्जित, साफ़-सुथरे व्यक्तित्व भी दिखाई देते थे। मध्यकाल हो या आधुनिक काल—हर युग में दोनों प्रकार के रूप साथ-साथ मौजूद रहे। स्वतंत्रता संग्राम के समय महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, पंडित नेहरू—सभी का रूप अलग था, पर उद्देश्य एक। स्पष्ट है कि दाढ़ी कोई नई या बाहरी चीज़ नहीं है, और न ही क्लीन शेव कोई विदेशी अवधारणा। दोनों ही समय, परिस्थिति और व्यक्तिगत पसंद के अनुसार बदलते रहे हैं।

आज दाढ़ी का चलन केवल भारत तक सीमित नहीं है। यह एक वैश्विक फैशन का हिस्सा बन चुका है। हॉलीवुड, यूरोपीय फैशन, खेल जगत, संगीत उद्योग और डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स—हर जगह दाढ़ी अलग-अलग शैलियों में दिखाई देती है। सोशल मीडिया ने इन रुझानों को और तेज़ कर दिया है। एक तस्वीर, एक वीडियो या एक रील के ज़रिये ट्रेंड पल भर में दुनिया भर में फैल जाते हैं। ऐसे में यह मान लेना कि कोई एक उद्योग, समूह या विचारधारा ही किसी फैशन को “फैला” रही है, वास्तविकता का सरलीकरण होगा।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अंधानुकरण एक गंभीर समस्या बन चुका है। जब युवा किसी भी ट्रेंड को बिना सोचे-समझे केवल इसलिए अपनाते हैं क्योंकि वह लोकप्रिय है या “कूल” माना जा रहा है, तब उनका व्यक्तित्व उधार का हो जाता है। फैशन तब समस्या बनता है जब वह सोच पर हावी हो जाए और पहचान को केवल बाहरी प्रतीकों तक सीमित कर दे। सवाल दाढ़ी रखने या न रखने का नहीं है; सवाल यह है कि क्या हम अपने चुनाव के कारण जानते हैं, या सिर्फ़ भीड़ के साथ चल रहे हैं?

इस संदर्भ में सिनेमा और डिजिटल मीडिया की भूमिका पर चर्चा ज़रूरी है। मनोरंजन उद्योग न केवल कहानियाँ सुनाता है, बल्कि जीवन-शैली के मानक भी गढ़ता है। बार-बार एक ही तरह के “लुक”, “स्टाइल” और “हीरोइज़्म” को आदर्श बनाकर प्रस्तुत करने से युवाओं के सामने विकल्प सीमित हो जाते हैं। इससे विविधता कम होती है और एकरूपता बढ़ती है। जिम्मेदार मीडिया वही है जो समाज की बहुलता को दिखाए—जहाँ सादगी भी आकर्षक हो, और अलग-अलग व्यक्तित्व भी स्वीकार्य हों। लेकिन दर्शक के रूप में हमारी भी जिम्मेदारी है कि हम दिखावे और मूल्य में अंतर करना सीखें।

ईश्वर, संस्कृति और सौंदर्य की चर्चा में भी संतुलन आवश्यक है। हमारी परंपराएँ अत्यंत विविध रही हैं। कहीं जटाधारी तपस्वी हैं, तो कहीं सुसज्जित देव-प्रतिमाएँ; कहीं वैराग्य है, तो कहीं श्रृंगार। सौंदर्य का अर्थ केवल बाहरी रूप नहीं, बल्कि आचरण, करुणा, संयम और विवेक है। यदि हम सौंदर्य को केवल चेहरे, दाढ़ी या फैशन तक सीमित कर दें, तो हम अपनी ही सांस्कृतिक गहराई को कम कर देते हैं।

आज के युवाओं के सामने असली खतरा किसी एक फैशन से नहीं, बल्कि आत्मबोध की कमी से है। जब युवा अपने इतिहास, मूल्यों और सांस्कृतिक बहुलता को समझते हैं, तब वे किसी भी ट्रेंड को अपनाएँ—या न अपनाएँ—वह उनका सजग और स्वतंत्र निर्णय होता है। लेकिन जब पहचान केवल बाहरी प्रतीकों पर टिक जाती है, तब भ्रम पैदा होता है और व्यक्ति आसानी से प्रभावित हो जाता है।

समाधान डर, आरोप या साज़िश की भाषा में नहीं है। समाधान शिक्षा, संवाद और आत्मविश्वास में है। युवाओं को यह समझाना ज़रूरी है कि फैशन क्षणिक होता है, लेकिन चरित्र स्थायी। आज जो ट्रेंड है, कल बदल जाएगा; पर जो मूल्य आप अपनाते हैं, वही जीवन भर साथ रहते हैं। इसलिए चयन सोच-समझकर होना चाहिए—न दबाव में, न डर में, और न ही अंधानुकरण में।

समाज को विभाजन की भाषा से भी सावधान रहना चाहिए। जब हम किसी चलन को डर या साज़िश के चश्मे से देखते हैं, तो संवाद बंद हो जाता है और ध्रुवीकरण बढ़ता है। इसके विपरीत, जब हम प्रश्न पूछते हैं—“क्यों?”, “कैसे?” और “किस हद तक?”—तब समझ विकसित होती है। स्वस्थ समाज वही है जो असहमति को जगह देता है, लेकिन सम्मान और तथ्य के साथ।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम युवाओं को आलोचनात्मक सोच सिखाएँ—ताकि वे हर ट्रेंड को आँख बंद करके न अपनाएँ। उन्हें अपने शरीर, समय और पहचान पर अधिकार का बोध हो। फैशन अपनाना गलत नहीं; गलत है फैशन के पीछे खुद को खो देना। व्यक्तित्व की असली सुंदरता बाहरी सजावट में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और विवेक में होती है।

अंततः, यह बहस दाढ़ी की नहीं, दिशा की है। हम अपनी पहचान किस पर बना रहे हैं—दिखावे पर या विचार पर? यदि हम युवाओं को शिक्षा, अवसर और आत्मसम्मान देंगे, तो वे किसी भी फैशन में सुरक्षित रहेंगे—क्योंकि उनकी जड़ें मज़बूत होंगी। समाज का भविष्य बाहरी रूपों से नहीं, सोच की मजबूती से तय होता है। और वही सोच हमें यह सिखाती है कि ट्रेंड आते-जाते रहते हैं, लेकिन मूल्य वही होते हैं जो समय की कसौटी पर टिकते हैं।

(डॉ. सत्यवान सौरभ,

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