भाजपा राज में सावरकर को भारत रत्न क्यों नहीं मिला

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                                                   बाल मुकुन्द ओझा

हिंदुत्व के प्रबल पैरोकार वीर सावरकर एक बार फिर चर्चा में है। इस बार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संघ चालक मोहन भागवत के एक बयान के बाद सावरकार को भारत रत्न से सम्मानित करने की जोरदार मांग की जा रही है। सावरकर कभी संघ के स्वयंसेवक नहीं रहे है। वे हिंदू महासभा के नेता थे। बकौल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सावरकर संघ की आलोचना भी करते रहते थे। इसके बावजूद संघ स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान और हिंदुत्व के प्रबल पैरोकार के रूप में उनका जोरदार समर्थन करती रही है। भाजपा शासन और संघ की मांग के बावजूद सावरकर को भारत रत्न नहीं मिलना विचारणीय है। यहाँ तक की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार ने भी सावरकर पर डाक टिकट जारी कर उनके स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान पर मुहर लगाई थी। मगर उनके पोते राहुल गाँधी सावरकर के माफ़ी वाले बयान पर उद्वेलित रहते है। देश की कई अदालतों में इस पर उनके खिलाफ मुक़दमे भी चल रहे है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि सावरकर को किसी पुरस्कार की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे पहले ही देशवासियों के दिलों में स्थान बना चुके हैं। हालांकि यदि उन्हें भारत रत्न दिया जाता है तो यह सम्मान खुद इस पुरस्कार की गरिमा बढ़ाएगा। मुंबई में आयोजित ‘संघ यात्रा के 100 साल : नए क्षितिज’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने भारत रत्न दिए जाने में हो रही देरी पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “मैं उस समिति का हिस्सा नहीं हूं जो इस पर फैसला करती है, लेकिन अगर किसी से मुलाकात होगी तो जरूर पूछूंगा कि इसमें देरी क्यों हो रही है।  अगर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है तो यह पुरस्कार के लिए ही सम्मान होगा और उसकी प्रतिष्ठा और बढ़ेगी। बिना किसी सम्मान के भी सावरकर जनता के दिलों पर राज करते हैं। देश में पिछले ग्यारह वर्षों से भाजपा का शासन है, इसके बावजूद सावरकर को अब तक भारत रत्न नहीं देना भी चर्चा का विषय बना है।

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे सावरकर । हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा को विकसित करने का बहुत बडा श्रेय सावरकर को जाता है। 1924 से 1937 का समय इनके जीवन का समाज सुधार को समर्पित काल रहा। वीर-विनायक दामोदर सावरकर, ऐसे महान क्रांतिकारी जिनकी पुस्तकें मुद्रित और प्रकाशित होने से पहले ही जब्त घोषित कर दीं, सावरकर वे पहले कवि थे, जिसने कलम-कागज के बिना जेल की दीवारों पर पत्थर के टुकड़ों से कवितायें लिखीं वो विश्व के एकमात्र ऐसे शक्स थे, जिन्हें दो जन्मो की काले पानी की सजा एक साथ दी गयी थी। तब उन्होंने जज को बधाई देते हुए कहा की चलो अच्छा है की आपने हिंदुत्व के पुनर्जन्म को माना फिर जज ने जब कहा की मिस्टर सावरकर अब आप मरते दम तक अंदमान की बदनाम सेलुलर जेल में बंद रहेंगे तब पुरे आत्मविश्वास से सावरकर के कहा की मै तब तक नही मरूँगा जब तक मेरी मातृभूमि गुलाम है । मै आजादी का सूरज देखे बिना नही मर सकता ..और उनकी ये बात सत्य हुई।

आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व त्यागने वाले महान देशभक्त विनायक दामोदर सावरकर देश में व्याप्त गन्दी सियासत के शिकार हुए है, ऐसा मानने वालों की देश में कमी नहीं है। सावरकर ने अपनी पूरी जवानी अंग्रेजों की जेल में जुल्म ज्यादती में गंवा दी। सावरकर को दो जन्मों की काले पानी की सजा एक साथ दी गयी थी। यहाँ सावरकर ने लगभग बीस साल बिताये थे। यही उनकी त्याग और तपस्या का उजला पक्ष कहा जायेगा। दादी ने जिसको सम्मानित किया पोता उसे अपमानित करने पर तुला है। इंदिरा गाँधी ने वीर सावरकर को स्वतंत्रता आंदोलन का आधारस्तंभ और भारत का सदा याद रहने वाला सपूत कहती है। वहीँ राहुल गाँधी सावरकर को अंग्रेजों से माफ़ी मांगने वाला और सर्वेंट के रूप में प्रस्तुत करने वाला बताते है। इंदिराजी ने सावरकर पर डाक टिकट जारी कर उनके स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान पर मुहर लगाई थी। यह भी अकाट्य सत्य है की सावरकर को काले पानी की सजा हुई थी। सावरकर सेल्युलर जेल या अंग्रेजों की सख्त नजरबंदी में रहे। ऐसी सजा बहुत कम सेनानियों को मिली थी। गांधीजी भी ऐसा मानते थे। गाँधी जी ने कभी उनकी देश भक्ति पर सवाल नहीं उठाए। मगर जब से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने सावरकर का गुणगान शुरू किया तब से कांग्रेस ने सावरकर के खिलाफ अपनी मुहीम तेज़ कर दी जिसके परिणाम स्वरुप राहुल सावरकर की मौत के 57 साल बाद  भी उन पर हमला करते रहते है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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