रुपये की गिरावट को इतना हल्‍के में मत लीजिए

0
12

-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत और यूरोपीय संघ के बीच हाल में संपन्न मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को सरकार एक ऐतिहासिक आर्थिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है। यह समझौता निःस्संदेह भारत के निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा करता है और दीर्घकाल में व्यापारिक संबंधों को मजबूती देने की क्षमता रखता है, किंतु इसी उत्सवधर्मी माहौल के बीच एक गंभीर आर्थिक संकेत डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का निरंतर कमजोर होने को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है।

देखा जाए तो वर्ष 2013 में जहां एक डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 68 के स्तर पर था, वहीं जनवरी 2026 तक यह 92 (91.95 रुपये प्रति डॉलर) के करीब पहुंच चुका है। लगभग 35 प्रतिशत का यह अवमूल्यन विदेशी मुद्रा बाजार का आंकड़ा आज भारत की एक हकीकत है, जो साफ तौर पर कहता है कि ये स्‍थ‍िति हमारी अर्थव्यवस्था की गहरी और संरचनात्मक कमजोरियों का दर्पण है। अब इस सच्चाई को न तो वैश्विक परिस्थितियों के बहाने ढंका जा सकता है और न ही मजबूत बुनियादी कारकों के दावों से खारिज किया जा सकता है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने रुपये की गिरावट को उभरते बाजारों की मुद्राओं की सामूहिक कमजोरी का हिस्सा बताया। बेशक; इसमें आंशिक सच्चाई है, वैश्विक स्तर पर डॉलर इंडेक्स 110 के आसपास बना हुआ है और अमेरिका की सख्त मौद्रिक नीति ने डॉलर को मजबूत किया है। किंतु सवाल यह है कि जब वैश्विक दबाव लगभग सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर समान है तब भारत का रुपया अपेक्षाकृत अधिक दबाव में क्यों है? यहीं से घरेलू आर्थिक चूकों की ओर ध्‍यान जाता है और इनकी जांच अनिवार्य हो जाती है।

विदेशी मुद्रा भंडार: ताकत भी, चेतावनी भी

पिछले डेढ़ वर्षों में भारत की विदेशी मुद्रा स्थिति कमजोर हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 के पहले आठ महीनों में विदेशी मुद्रा भंडार करीब 40 अरब डॉलर घटकर लगभग 650 अरब डॉलर रह गया। इसी दौरान विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की निकासी तेज रही। अकेले जनवरी 2026 में लगभग 5 अरब डॉलर का पूंजी बहिर्गमन दर्ज किया गया, जिसका सीधा असर रुपये पर पड़ा। हालांकि यह भी सच है कि 16 जनवरी तक विदेशी मुद्रा भंडार 701.4 अरब डॉलर के स्तर को छू गया था, जिससे भारत लगभग 11 महीनों के आयात को कवर कर सकता है।

यह भंडार देश के कुल बकाया विदेशी कर्ज के करीब 94 प्रतिशत के बराबर है और वैश्विक झटकों से निपटने के लिए एक मजबूत लिक्विडिटी बफर प्रदान करता है। पर साथ में यही भंडार भारत की आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था की कमजोर नस को भी उजागर करता है। क्‍योंकि ये विदेशी मुद्रा जिस तेजी से आती हुई दिखती है, उतनी ही तेजी से अचानक निकासी करती हुई भी दिखी है। यानी कि इस पर भारत की अर्थव्‍यवस्‍था को अधि‍क भरोसा नहीं करना चाहिए।

ऐसे ही यह भी एक तथ्‍य है कि वर्ष 2025 में भारत ने लगभग 800 टन सोने का आयात किया, जिस पर 60 अरब डॉलर से अधिक खर्च हुआ। कोयला, कच्चा तेल और उर्वरकों का आयात बिल भी लगातार बढ़ता गया। परिणामस्वरूप चालू खाते का घाटा (सीएडी) जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक पहुंच गया, जिसे किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए खतरे का संकेत माना जाता है।

निर्यात की मजबूती पर अधूरा संतुलन

सरकार निर्यात वृद्धि को रुपये की मजबूती का आधार बताती रही है। इसमें संदेह नहीं कि सेवा क्षेत्र का निर्यात प्रभावशाली रहा है। 2005 से 2024 के बीच भारत का सेवा निर्यात ढाई गुना बढ़ा और वैश्विक सेवाओं के निर्यात में उसकी हिस्सेदारी 4.3 प्रतिशत तक पहुंच गई। वित्त वर्ष 2025-26 में कुल निर्यात 825.3 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर रहा, जिसमें सेवाओं का योगदान 387.6 अरब डॉलर था।

दूरसंचार उपकरणों, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयों और ऑटोमोबाइल्स के निर्यात में भी वृद्धि हुई है। लेकिन इसके बावजूद वस्तु व्यापार में भारत भारी घाटे में बना हुआ है। मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट आज भी लगभग 200 अरब डॉलर के आसपास है। यही असंतुलन रुपये पर लगातार दबाव बनाए रखता है और सेवा निर्यात की सफलता इस सच्चाई को छिपा नहीं पाती।

भारत-यूरोपीय संघ एफटीए में अवसर और सीमाएं

अब बात भारत और यूरोपीय संघ के बीच एफटीए की गहराई से करते हैं, जिसके तहत 97 प्रतिशत भारतीय उत्पादों को यूरोपीय बाजार में प्राथमिकता मिलेगी और 70 प्रतिशत से अधिक वस्तुओं पर शून्य सीमा शुल्क लागू होगा। कपड़ा, चमड़ा, मसाले, गहने, समुद्री उत्पाद और श्रम-साध्य उद्योगों के लिए इसे एक बड़ा अवसर माना जा रहा है। सैद्धांतिक रूप से यह समझौता रुपये को मजबूती दे सकता है, किंतु वर्तमान हकीकत यह है कि यूरोपीय संघ के बाजार में भारतीय उत्पादों की हिस्सेदारी आज भी लगभग दो प्रतिशत के आसपास अटकी हुई है। इसका मुख्य कारण भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की सीमित क्षमता और गुणवत्ता मानकों में कमजोरी है। जब तक यह समझौता पूरी तरह जमीनी स्तर पर प्रभावी होगा, तब तक रुपये के सामने नए संकट खड़े हो सकते हैं।

यह भी समझने की जरूरत है कि आज भारत में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान जीडीपी में लगभग 17 प्रतिशत है, जबकि चीन में यह 28 प्रतिशत और वियतनाम में लगभग 25 प्रतिशत है। स्पष्ट है कि बिना मजबूत विनिर्माण आधार के एफटीए जैसे समझौते भी रुपये को स्थायी मजबूती नहीं दे सकते। हालांकि भारत ने डॉलर पर निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ाने के प्रयास किए हैं। रूस के साथ रुपये-रूबल में तेल व्यापार इसका उदाहरण है, लेकिन यह प्रयोग 10 अरब डॉलर के स्तर से आगे नहीं बढ़ सका। समस्या यह रही कि रूस के पास जमा हुए रुपयों के उपयोग का व्यावहारिक रास्ता नहीं निकल पाया।

आज भी भारत का लगभग 80 प्रतिशत विदेशी व्यापार डॉलर आधारित है और पेट्रोलियम व्यापार का 90 प्रतिशत हिस्सा डॉलर में होता है। SWIFT प्रणाली और अमेरिकी बॉन्ड बाजार डॉलर की बादशाहत को और मजबूत करते हैं। ऐसे में सवाल यह नहीं कि डॉलर को चुनौती देना कितना कठिन है, बल्कि यह है कि जब ब्राजील या इंडोनेशिया अपनी मुद्रा को अपेक्षाकृत स्थिर रख सकते हैं तो भारत क्यों नहीं? कहना होगा कि इसका उत्तर उत्पादकता, निर्यात संरचना और आयात निर्भरता में छिपा है।

आम आदमी पर पड़ता सीधा असर

रुपये की कमजोरी का सीधा असर आम आदमी की जिंदगी पर पड़ता है। आयात महंगा होने से पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, खाद्य तेल और उर्वरकों की कीमतें बढ़ती हैं। कई राज्यों में पेट्रोल की कीमतें 110 रुपये प्रति लीटर के पार जा चुकी हैं। उर्वरक सब्सिडी का बोझ बढ़ता है और अंततः इसका भार करदाताओं पर पड़ता है। साथ ही छोटे और मंझोले उद्योगों के लिए डॉलर में लिया गया कर्ज महंगा हो जाता है। ऐसे में यहां समझने वाली बात यह है कि किसी भी मुद्रा की मजबूती चालू खाते के संतुलन, उच्च उत्पादकता, विविधीकृत निर्यात और नियंत्रित आयात निर्भरता पर निर्भर करती है। भारत इन सभी मोर्चों पर अब भी अधूरा दिखता है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन के कहे अनुसार रुपये की कमजोरी को सिर्फ वैश्विक परिस्थितियों का परिणाम मान लेना आत्मसंतोष होगा।

मैन्युफैक्चरिंग को जीडीपी के 25 प्रतिशत तक ले जाना, पीएलआई योजनाओं को वास्तविक उत्पादन में बदलना, गैर-डॉलर व्यापार को बढ़ावा देना, सोने और ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाना सही मायनों में ये सभी कदम भारत के लिए अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता हैं। अंतः हमें बिना किसी संकोच के यह स्वीकार करना चाहिए कि रुपया भारतवासियों के लिए सिर्फ एक मुद्रा नहीं है, यह भारत के आर्थिक आत्मविश्वास की कसौटी है।

कहना होगा कि यदि नीतिगत फोकस नहीं बदला, तो 95 रुपये प्रति डॉलर की आशंका भविष्य की वास्तविकता बन सकती है और तब यह कहना कठिन होगा कि यह गिरावट अचानक हुई क्योंकि इसके संकेत आज साफ दिखाई दे रहे हैं इसलिए इसे हम हल्‍के में न लें और न ही इन परिस्‍थ‍ितियों को वी. अनंत नागेश्वरन के कहे से वैश्विक मानें। वास्‍तव में हम अपनी कमजोरी स्‍वीकारें और उन्‍हें दूर करने के लिए सही दिशा में प्रयास करें, यही सही उत्‍तर है आज की इस समस्‍या का न कि इससे भागना कोई स्‍थायी हल है।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें