गणतंत्र का संधान : संकल्प और चुनौतियाँ

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गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर विशेष

गिरीश्वर मिश्र

भारत को अंग्रेज़ों के लंबे औपनिवेशिक आधिपत्य से स्वतंत्र कराने की लड़ाई के बीच भारत के तत्कालीन नेताओं ने देश के भविष्य का स्वप्न देखते हुए पूर्ण स्वराज्य की माँग की। इसके लिए संघर्ष हुआ अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध जन आक्रोश और आंदोलन चला। अनेक वीर शहीद हुए। विभाजन की विभीषिका में लाखों लोग मारे गए और जान-माल की अपरिमित हानि हुई। इन सबके बीच गणतंत्र का स्वप्न केवल राजनैतिक सत्ता-परिवर्तन तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि इसमें आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय सभी दृष्टियों से देश में स्वराज की ओर अग्रसर होने की तीव्र आकांक्षा भी हिलोरें ले रही थी।

सन 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद यह आकांक्षा 26 जनवरी 1950 को मूर्त आकार पाई जब देश ने संविधान को अपनाया था। राष्ट्र नायकों के मन में एक ऐसे गणतंत्र की छवि थी जो समाज में व्याप्त असमानताओं, ग़रीबी और अशिक्षा को दूर कर हाशिये पर स्थित उपेक्षितों को आगे ले चलने के साथ समग्र उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर सके। इसकी पृष्ठभूमि में सर्वोदय की गूंज थी और संविधान उसका उपकरण समझा गया था। महान जननायक महात्मा गांधी के सपनों के अनुरूप देश में समरसता, समावेशिता, समानता, बंधुत्व और समता ले आने के प्रति जागरूक प्रतिबद्धता संविधान का मुख्य स्वर बना था। इस उद्देश्य से व्यवस्था के खाके को लेकर संविधान सभा में देश के प्रतिनिधियों के बीच लंबा और गहन विचार-विमर्श हुआ था। अंत में लोकतंत्र में सबका विश्वास और भी दृढ़ हुआ। फलत: अंग्रेज़ों के जाने के बाद स्वतंत्र देश ने शासन के लिए गणतंत्र की पद्धति को चुना गया। इसके तहत एक संघीय ढाँचा सोचा गया और उसके संचालन के लिए एक अत्यन्त विस्तृत लिखित संविधान भी रचा गया और उसे विधिवत अपनाया गया। यह सब बड़े अनुशासन के साथ हुआ। निश्चय ही ये नेता दूरदर्शी थे और उन्होंने बहुत हद तक भविष्य की चुनौतियों का भी अनुमान लगाया था और उसे ध्यान में रखते हुए जरूरी प्रावधान भी किए थे।

शासन की दृष्टि से संविधान की गरिमा स्थापित करते हुए क़ानूनी रूप से उसे निर्णायक दर्जा दिया गया। आज भी सरकार चलाने वाले मंत्री और अधिकारी गण अपना दायित्व संभालने के पहले इस संविधान के लिए अपनी पूरी प्रतिबद्धता की शपथ लेते हैं। भारतीय संविधान ही सब तरह से सर्वोपरि स्वीकार किया गया। यह गौरव का विषय है कि तमाम विघ्न बाधाओं के बीच आधुनिक गणतंत्र के रूप में देश पचहत्तर वर्षों की यात्रा पूरा कर आगे बढ़ रहा है। भारत विश्व में सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश बन चुका है। आज पश्चिमी देशों (और चीन भी) के सामाजिक ढांचे में लोग जहाँ तेज़ी से बूढ़े हो रहे हैं, भारत एक युवा देश है और आगे भी काफ़ी समय तक युवा बना रहेगा। यह एक बड़ा अवसर हो सकता है, बशर्ते युवा वर्ग को सुशिक्षित, सच्चरित्र और सुयोग्य बनाया जाय। इसके लिए शिक्षा में बड़े निवेश और पर्याप्त सुधार की जरूरत है।

इस अवधि में देश के भीतर और बाहर अनेक परिवर्तन आए हैं और कई मोर्चों पर चुनौतियां भी मिली हैं जिन्होंने इस क्षेत्र के इतिहास और भूगोल दोनों पर असर डाला है। इस बीच देश की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति में भी बड़े परिवर्तन हुए। लोकतंत्र में जन भागीदारी बढ़ी है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा स्थापित हुई। दूसरी ओर वैश्विक परिदृश्य में भी बड़े उतार-चढ़ाव आए। पड़ोसी देशों में बहुत समय से अस्थिरता बनी हुई है। आज विश्व के अनेक क्षेत्रों में अशांति है और कई जगह लंबे समय से युद्ध की स्थितियाँ बनी हुई हैं। पश्चिम के देश अपने दबदबे को बनाये रखने के लिए नए-नए हथकंडे अपना रहे हैं और उनके समीकरण बन बिगड़ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका भी प्रश्नांकित हो रही है। प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ ही सत्ता और शक्ति के संतुलन जटिल, अस्थायी और बहु आयामी होते जा रहे हैं। साथ ही दूसरे देशों के साथ आपसी रिश्ता किसी देश के लिए पहले से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता जा रहा है। अब किसी देश के लिए अलग-थलग रहना कठिन है।

ऐसे में आर्थिक समृद्धि और उन्नति के लिए किसी भी देश के लिए आत्मनिर्भरता अत्यंत महत्वपूर्ण हो रही है। आर्थिक रूप से भी भारत ने बड़ी छलांग लगाई है। अब वह विश्व की चार विशालतम अर्थ व्यवस्थाओं में शुमार है। पर जहाँ जीवन के कई क्षेत्रों में कामयाबी मिल रही है वहीं मुश्किलें भी बढ़ी हैं। आज हम सब एक ऐसे मुकाम पर पहुंच रहे हैं जो राष्ट्रीय जीवन के लिए बड़ी चुनौती सिद्ध हो रहा है। यहाँ के समाज में पवित्रता, स्वच्छता और शुद्धता पर बड़ा ज़ोर दिया जाता रहा है। ऐसे ही परदुखकातरता और लोक-संग्रह भी महत्वपूर्ण रहा है। इसके विपरीत आज मिलावट, प्रदूषण और जिस तरह से बढ़ रहा है वह उन्नति की गति को थाम सकता है। दायित्वहीनता के चलते आए दिन दुर्घटना, अकाल मृत्यु, धन-जन हानि, पर्यावरण और प्रकृति के संसाधनों का क्षरण जैसे ऐसे परिणाम होते हैं जिनकी भरपाई नहीं की जा सकती। यह अलग बात है कि आम जनों की स्मृति अल्पकालिक होती है और लोग हादसों को आसानी से भुला देते हैं। इसी तरह प्रेस और मीडिया की चर्चाओं को लेकर आम जन स्तब्ध हो रहा है। राजनीति में देश की जगह जाति और क्षेत्र की अस्मिता को महत्व मिल रहा है।

देश के विकास के लिए कार्य संस्कृति महत्वपूर्ण होती है। और यह एक दुखती रग है। आज किसी भी अवसर को लोग इसी दृष्टि से देखते हैं कि जो अपेक्षित योगदान है वह कितना कम हो सकता है यानी लागत कम से कम हो और उससे मिलने वाला लाभ अधिक से अधिक हो। इस जमाने में सिर्फ़ कमाने की होड़ मची हुई है। नफा-नुकसान वाला बाज़ारू तर्क आज के जीवन का नियामक बनता जा रहा है। ऐसे में गरीब-अमीर की खाई चौड़ी होती जा रही है। प्रकृति (धरती-जल, जंगल-वायु, अन्न-मिष्ठान्न, शाक-भाजी), संस्थाएं (मीडिया, सरकारी दफ्तर, न्यायालय, वृद्धाश्रम, अस्पताल, विद्यालय, विश्वविद्यालय) के साथ-साथ दवा-दारू, आचार-विचार, नाते-रिश्ते, हर कहीं भ्रष्टाचार, बेईमानी और मिलावट की घटनाएँ बढ़ रही हैं।

यह दुखद है कि दुराचरण की हद सिर्फ नेता, व्यापारी, बैंकर, न्यायाधीश, मंत्री, राज्यपाल, सचिव, अन्य अधिकारी, डाक्टर, प्राध्यापक, कुलपति सभी संलिप्त होते पाए जा रहे हैं। आर्थिक अपराधों और रिश्ते में हैवानियत के संगीन मामले दुर्भाग्य से दिन पर दिन बढ़ रहे हैं। कहाँ तो विशिष्ट जन दूसरों के लिए मानदंड बनते ताकि लोग उनका अनुसरण करते। ईमानदारी और सच्चरित्रता उनका स्वाभाविक गुण होना था और अपेक्षा थी कि वे दूसरों के लिए राह बनायेंगे: महाजनो येन गत: स पंथा:। पर यह हो नहीं पा रहा है। तमाम सरकारी प्रयासों और आम जनों के लिए हितकारी योजनाओं के बावजूद बाहुबल और धनबल के चलते सामान्य आदमी और सीमांत जनों की मुश्किलें बनी हुई हैं। संसाधनों और सुविधाओं की पहुँच को लेकर गंभीर समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं।

यह भी उल्लेखनीय है कि आज की जीवन शैली बाजार और मीडिया से संचालित होती जा रही है। भौतिक समृद्धि की लालसा के साथ सभी इसी आपाधापी में हैं कि कितना कुछ कितना जल्दी हासिल कर लें। पाने की अँधियाली हवस को कुछ भी तृप्त नहीं कर पा रहा है। अब यह विचार कि हमें सचमुच उस वस्तु की आवश्यकता है कि नहीं खरीददारी का आधार नहीं रहा। नया माडल, दूसरों से तुलना और प्रतिस्पर्धा में दूसरों को मात देना खरीददारी का मुख्य आधार बन रहा है। मीडिया का फरेब आग में घी का काम करता है। पुराना छोड़ने और नया पाकर ही आदमी को गतिशीलता, प्रगति या उन्नति का अहसास होता है नहीं तो ठहरने और ऊब के बीच जीवन नीरस लगने लगता है। समाज के स्तर पर अतिशय भोग का असर अनियंत्रित रूप से फैलता जा रहा है। सामाजिक–सांस्कृतिक परिवर्तन की लहर असंतोष को जन्म दे रही है।

भारत एक धर्मप्रधान देश रहा है जिसमें कर्तव्य, सत्य, त्याग, अहिंसा और तप जैसे मूल्य जीवन को दिशा देते आए हैं। उन्नति और नवाचार के साथ विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए इन मूल्यों को आत्मसात करना होगा। लोकतंत्र स्वच्छंदता से नहीं चल सकता। उसके लिए अनुशासन जरूरी है। समय के साथ स्वतः ही समस्याओं का समाधान हो जाएगा, यह सोचना दुराशा है। लोकतंत्र की सतत और कड़ी परीक्षा होती रहती है। कर्मठता और ईमानदारी के साथ अपना कर्तव्य का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए सतत चौकसी आवश्यक होती है।

(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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