भारत टैक्सी का भविष्य

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– गौरव अवस्थी

दिल्ली एनसीआर और गुजरात में दो महीने के सफल ट्रायल के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने सहकारिता क्षेत्र की 8 बड़ी संस्थाओं के संयुक्त उपक्रम के रूप में सहकारिता आधारित टैक्सी सर्विस ‘भारत टैक्सी’ को आधिकारिक रूप से कल नई दिल्ली में लॉन्च कर दिया। दो साल में इस सेवा को पूरे देश में लागू करने का भी ऐलान हुआ है।

भारत टैक्सी बहु-राज्य सहकारी समितियां अधिनियम, 2002 के अंतर्गत पंजीकृत भारत का पहला सहकारिता-नेतृत्व वाला राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म है। इसकी स्थापना 6 जून 2025 को की गई। दावा है कि अपनी स्थापना के बाद से भारत टैक्सी दुनिया का पहला और सबसे बड़ा सहकारिता-आधारित राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म तथा विश्व का सबसे बड़ा ड्राइवर-स्वामित्व वाला मोबिलिटी प्लेटफॉर्म बनकर उभरा है। अब तक लगभग चार लाख ड्राइवर भारत टैक्सी प्लेटफॉर्म से जुड़ चुके हैं और दस लाख से अधिक उपयोगकर्ता पंजीकृत हो चुके हैं। लगभग 10 करोड़ की राशि अब तक सीधे ड्राइवरों में वितरित की जा चुकी है।

सहकारिता क्षेत्र की संस्थाओं का सर्विस सेक्टर में उतरना स्वागत योग्य कदम माना जाना चाहिए लेकिन ‘सरकारी दखल’ और ‘सरकारी बैसाखी’ सहकारिता आधारित इस सेवा को भी कहीं अन्य सेवाओं की तरह प्रभावित न करे, इसके पुख्ता प्रबंध शुरुआती चरण से ही सुनिश्चित किए जाने जरूरी हैं। यह बात इसलिए कि भारत टैक्सी सेवा को ओला, उबर एवं रैपीडो जैसी प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों टक्कर लेनी है और बेहतर सेवा देते हुए उपभोक्ता का भरोसा भी अर्जित करना है।

निजी क्षेत्र की कंपनियां जब सेवा या किसी भी क्षेत्र में अपनी सेवा या उत्पाद लेकर उतरती हैं तो मजबूत नेटवर्क का निर्माण अपनी लुभावनी योजनाओं के माध्यम से करती हैं। जैसे, राइड सर्विस को ही लें तो (जैसा-एक कैब ओनर ने बताया) ओला ने भारत में अपनी लॉन्चिंग के प्रारंभिक चरण में कैब मालिकों को 1 दिन में पांच राइड पर 1500 रुपये का अतिरिक्त बोनस देना शुरू किया। इस लालच में कैब मालिक ऑनलाइन राइड सर्विस से जुड़ते चले गए और भारत भर में इस सेवा का विस्तार होता गया। आज छोटे शहरों में भी बाइक राइड सर्विस मिलने लगी हैं। हालांकि अब बोनस बंद और कमीशन भी 15-20 फीसदी है लेकिन राइड बढ़ीं हैं। रेट कंपटीशन का असर कैबवालों की इनकम पर पड़ा है।

निजी क्षेत्र की कंपनियों की बढ़ती उपलब्धियों को देखते हुए ही प्रधानमंत्री मोदी के ‘सहकार से समृद्धि’ मंत्र को आत्मसात करते हुए सहकारिता मंत्री अमित शाह ने इस क्षेत्र में ‘सहकारी सेवा’ शुरू कराई है। इसे एक अच्छा कदम माना जाना चाहिए लेकिन सरकार को ‘बैसाखी’ के बजाय सहकारी संस्थाओं को अपने दम पर इस सेवा को स्थापित करने का अवसर देना चाहिए। यह बात इसलिए कि बैसाखी चलने की हिम्मत तो देती है लेकिन ‘सहारे’ की गलत आदत भी डेवलप कर सकती है। ट्रायल पीरियड में ही भारत टैक्सी को बैसाखी थमा देने को किस रूप में देखा जाए, आप ही तय करें।

उदाहरण के लिए यहां एक ‘ग्राहक’ के रूप में अपनी आपबीती बताना जरूरी है। इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा देश का सबसे व्यस्ततम हवाई अड्डा है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों से हजारों लोगों की रोज आवाजाही होती है। भारत टैक्सी सर्विस को सफल बनाने के लिए सरकार ने जानबूझकर आईजीआई एयरपोर्ट पर ओला-उबर-रैपीडो के पिकअप पॉइंट कुछ दूर बनवा दिए ताकि ग्राहक भारत टैक्सी राइड लेने को मजबूर हो। ट्रायल के दौरान ही भारत के इस सबसे व्यस्ततम हवाई अड्डे पर सरकार की तरफ से बैसाखी के रूप में एयरपोर्ट के बाहर टैक्सी की सुविधा दिल्ली पुलिस से लेकर भारत टैक्सी को दे दी गई। इसके पीछे शायद सोच यही होगी कि पिकअप पॉइंट दूर होगा तो मजबूर होकर लोग भारत टैक्सी का सहारा लेंगे और ऐसा हो भी रहा। आमतौर पर ऑनलाइन राइड बुक करने के अधिकतम पांच मिनट में टैक्सी पिकअप पॉइंट पर पहुंच जाती थी लेकिन भारत टैक्सी सर्विस लॉन्च होने के बाद ऐसा नहीं है। एयरपोर्ट के बाहर अब ओला, उबर और रैपीडो की बुकिंग पर टैक्सी में औसत 20 से 25 मिनट लग रहे हैं। कभी-कभी तो जाम की समस्या बता कर निजी कंपनियां ग्राहक को तीन-चार सौ मीटर आगे धौलाकुआं चौराहे तक सामान लेकर आने को कहती हैं। अब आप समझ सकते हैं कि लगेज के साथ इतनी दूर कौन पैदल जाएगा?

मेरी समझ में ऐसा सिर्फ इसलिए कि उपभोक्ता मजबूर होकर भारत टैक्सी बुक कराए। उपभोक्ता को ट्रायल पीरियड में ही मजबूर करना कहीं से भी सही नहीं माना जा सकता। यह इसका एक पहलू है। दूसरा पहलू भी काबिलेगौर है। अभी हाल में ही एयरपोर्ट से गुरुग्राम के लिए उबर ऐप पर टैक्सी बुक करने के दौरान 650 रुपए किराया शो कर रहा था लेकिन भारत टैक्सी ने उसी डेस्टिनेशन का 900 रुपये चार्ज किया। खेल इसी बढ़े हुए किराए का है। मौज सहकारिता की और भरण उपभोक्ता-सारथी दोनों का। नई दिल्ली में लांचिंग के दौरान यह दावा किया गया कि सारथी से मालिक से कमीशन नहीं कटेगा लेकिन हकीकत यह नहीं है। एयरपोर्ट से होने वाली हर बुकिंग पर कैब मलिक को 10% कमीशन काटकर ही भुगतान मिलना है और एयरपोर्ट का पार्किंग शुल्क उपभोक्ता की जेब से जाना है। यह बात भारत टैक्सी सर्विस देने वाले ड्राइवर ने हमसे खुद साझा की। एमसीडी का प्रवेश शुल्क भी सारथी के हिस्से।

हमें गंतव्य तक ले जाने वाले ड्राइवर का यह दर्द सरकार को जरूर सुनना चाहिए। ड्राइवर के कथनानुसार, एयरपोर्ट पर टैक्सी बुकिंग राशि काउंटर पर कैश जमा कराई जाती है और कैब मालिक को 10-15 दिन बाद भुगतान की व्यवस्था। यह मेरी नहीं, कैब मलिक की ही आशंका है कि सहकारी संस्थाएं भुगतान में जानबूझकर विलंब कर रहीं होंगी ताकि इतने दिनों के ब्याज की रकम भी उनकी ‘आय’ बने। इस आशंका को निर्मूल करना भी ‘अच्छी सर्विस’ के लिए जरूरी है। इसके अलावा कैब ओनर के सामने अपने दिन-प्रतिदिन के खर्चे पूरे करने में दिक्कतें भी हैं। जबकि दावा यह है कि सहकारिता आधारित मोबिलिटी इकोसिस्टम में उत्कृष्ट में ‘सारथी ही मालिक’ के मूल सिद्धांत को और अधिक मजबूती मिलेगी। कैब मालिक पहले ही घटती आय और बढ़ते खर्च को लेकर चिंतित हैं। उनकी इस चिंता पर भी गौर किया जाना चाहिए।

प्राइवेट सेक्टर को चुनौती देने उतरी भारत टैक्सी सर्विस का ऐप भी अभी पूरी तरह डेवलप नहीं है। गुरुग्राम से दिल्ली तक की राइड लेने के दौरान एक बात और सामने आई कि भारत टैक्सी की ऑनलाइन बुकिंग में एमसीडी का प्रवेश शुल्क जुड़ा नहीं होता। कैब मालिक ग्राहक से उसकी अलग से डिमांड करता है। यह स्थिति कैब ओनर और ग्राहक दोनों को असहज करती है। कोई भी ग्राहक यात्रा में असहज नहीं होना चाहता। हां, भारत टैक्सी के ऐप में ओला-उबर से एक अलग फीचर है। वह है, ग्राहक को स्टाॅप की सुविधा- जो गुरुग्राम में तो है पर दिल्ली के लिए नहीं। इसका विस्तार ग्राहकों को आकर्षित करेगा। जबकि निजी कंपनियां अपने ऐप में यह सुविधा नहीं दे रहीं।

जरूरी है कि भारत टैक्सी एप भी समय-समय पर अपडेट कर ‘ट्रैवलर फ्रेंडली’ बनाया जाए। आज जब ऐसे भी ऐप हैं जो राइड सर्विस के प्राइस कंपेयर करके तुरंत उपभोक्ता को सजग कर देते हैं। ऐसे में भारत टैक्सी सर्विस को सफल बनाने के लिए बैसाखी के बजाय ग्राहक की उम्मीद के अनुरूप तैयार किया जाए। अगर सरकारी क्षेत्र की शीर्ष संस्थाएं ऐसा कर पाईं तो भारत टैक्सी का भविष्य वास्तव में उज्ज्वल होगा। नहीं तो दूसरी अन्य सेवाओं और उत्पादों की तरह सरकार के सहारे पर निर्भर रहकर बस नाम की रह जाएगी।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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