बंगाल में राष्ट्रपति शासन की आहट

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बाल मुकुन्द ओझा

बंगाल की सियासत तीन लोक से न्यारी है। यहाँ चुनाव से पहले नित नये रहस्योद्घाटन होने लगे है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ईडी की आई-पैक पर छापेमारी के बाद देश के गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए कहा यदि उन्होंने पेन ड्राइव सार्वजनिक कर दी तो देश में भूकंप आ जायेगा। ममता ने अमित शाह पर कोयला घोटाले के पैसे का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया और भाजपा के खिलाफ “पेन ड्राइव” सबूत उजागर करने की धमकी दी।  दूसरी तरफ नेता विपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने ममता के आरोपों को झूट का पुलिंदा बताते हुए मानहानि के मुक़दमे की चेतावनी दी है। आरोप प्रत्यारोपों के बाद पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की गरमागरम चर्चा के साथ ही राष्ट्रपति शासन की आहट भी सुनाई देने लगी है। पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भी राष्ट्रपति शासन की बात जोर शोर से सुनाई देने लगी थी। राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश भी कर दी थी मगर केंद्र ने स्वीकार नहीं की। इस बार एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की आहट सुनावी देने लगी है। मौका है ईडी की छापामारी का। I-PAC कंपनी पर ईडी की रेड के बाद बीजेपी ही नहीं CPI(M) और कांग्रेस ने भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की गिरफ्तारी की मांग की है। इसी के साथ राष्ट्रपति शासन की चर्चा तेज हो गई है। छापामारी के बाद तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच जंग छिड़ गई है। अब यहां यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बंगाल राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है? और क्या यह केंद्र की मोदी सरकार के लिए राष्ट्रपति शासन लगाने का माकूल मौका है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बंगाल में वो हुआ जो देश के इतिहास में कभी, कहीं नहीं हुआ। एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट के छापे को रोकने लिए खुद मुख्यमंत्री पहुंच गई। ममता बनर्जी ईडी की टीम से जब्त किए गए कागजात, फोन और हार्ड डिस्क छीन कर अपने साथ ले गईं।

घटना के बाद विपक्ष ने ममता पर हमला तेज कर दिया। CPI(M) के मोहम्मद सलीम ने कहा कि ममता ने कंपनी के कर्ताधर्ता प्रतीक जैन को बचाया, क्योंकि भ्रष्टाचार के सभी दस्तावेज उनके पास हैं।  कांग्रेस ने आरोप लगाया कि IPAC ने TMC के लिए धन उगाही की और चुनाव जीतने में मदद की।  दोनों दलों ने ममता की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की है । राज्य में कानून व्यवथा को लेकर राष्ट्रपति शासन की मांग भी जोर पकड़ रही है।

विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं वैसे वैसे भाजपा और टीएमसी के बीच सियासी टकराव बढ़ता ही जा रहा हैं। भाजपा ने विधानसभा चुनाव की सियासी जंग फतह करने के लिए अपना एजेंडा सेट करना शुरू दिया है तो टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी अपनी सत्ता को बचाए रखनी की कवायद में है। देश की सत्ता पर भाजपा तीसरी बार काबिज है, लेकिन बंगाल में अभी तक कमल नहीं खिल सका है। नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को बंगाल में उम्मीद की किरण दिखाई दी है, जिसके चलते 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी के सियासी दुर्ग में भाजपा अपनी सियासी बेस को बनाने की एक्सरसाइज शुरू कर दी है। बंगाल में एनडीए का मतलब भाजपा और इंडिया गठबंधन का अर्थ टीएमसी है। लोकसभा और विधान सभा में कांग्रेस और कम्युनिष्टों का सूपड़ा साफ़ हो चुका है।

प. बंगाल में 34 साल तक एक छत्र शासन करने वाले कम्युनिष्टों को सत्ताच्युत कर ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी तृणमूल का झंडा फहराया। ममता की टीएमसी 2011 से पश्चिम बंगाल में सत्ता में है। इससे पूर्व 1977  से 2011 तक पहले दिग्गज नेता ज्योति बासु और फिर बुद्धदेब भट्टाचार्य ने राज सत्ता की कमान संभाली थी। 2011 के चुनाव में ममता ने कम्युनिष्टों का शासन ऐसा उखाड़ा की आज उनका नाम लेवा भी वहां नहीं बचा है। देश की सियासत में दीदी के नाम से मशहूर हुई ममता बनर्जी।  ममता को बंगाल की शेरनी भी कहा जाता है। सूती धोती और मामूली चप्पल ममता की पहचान है।  वे विधिवत निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं। पार्टी हाई कमान भी वे स्वयं हैं और अपने सभी प्रकार के निर्णय खुद ही लेती हैं।  इसमें किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करतीं।  ममता धरातलीय नेता हैं। ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना 1 जनवरी, 1998 को की थी। उस दौरान  ममता को लगा था की कांग्रेस में रहकर कम्युनिष्टों को नहीं हटाया जा सकता। तभी वो कांग्रेस से अलग हो गयी और अपनी क्षेत्रीय पार्टी बना ली।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी  32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

                                                            

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