किशोरियों में बढ़ता फ्रेंड विद बेनिफिट कल्चर

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-कैलाश चन्‍द्र

भारत के सामाजिक परिदृश्य में एक बेचैन कर देने वाला बदलाव तेजी से उभर रहा है और उसकी सबसे मार्मिक झलक उस घटना में दिखाई देती है जिसमें 15 वर्ष की एक छात्रा गर्भवती पाई गई। डॉक्टर ने जब उससे पूछा कि बच्चा किससे हुआ है, तो उसका उत्तर था, “पता नहीं… कई थे।” यह घटना कोई सनसनीखेज अपवाद नहीं, बल्कि हमारे समय की एक गहरी और अनदेखी सामाजिक सच्चाई का संकेत है। उस किशोरी ने स्वीकार किया कि महंगे फोन, रिचार्ज, आउटिंग और कूल लाइफस्टाइल की चाह में वह कई लड़कों के साथ फ्रेंड विद बेनिफिट जैसे संबंधों में रही। उसके शब्द सिर्फ एक लड़की की व्यक्तिगत त्रासदी न होकर उस परिघटना का रूपक हैं जो भारत के 13 से 18 वर्ष आयु वर्ग में तेजी से आकार ले रही है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2023 के आंकड़ों के अनुसार नाबालिगों पर होने वाले यौन अपराधों में अधिकांश अपराधी परिचित होते हैं। इनमें मित्र, पड़ोसी, रिश्तेदार, ऑनलाइन साथी और स्कूल-कॉलेज के परिचित शामिल रहते हैं। यह एक असहज सत्य की ओर संकेत करता है कि खतरा किसी बाहरी व्यक्ति से नहीं, बल्कि बच्चों की उसी दुनिया से आता है जिसे हम सुरक्षित मानते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के निष्कर्षों में भी यह संकेत मिलता है कि शहरी भारत में किशोरियों के शारीरिक संबंधों की प्रथम आयु 13 से 15 वर्ष के बीच खिसक रही है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण एशिया अध्ययन के अनुसार 13 से 17 वर्ष आयु वर्ग की बड़ी संख्या में लड़कियां इंटरनेट आधारित यौन सामग्री देखती हैं और वेब सीरीज तथा सोशल मीडिया के प्रभाव में आकर संबंध बनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ये तथ्य बताते हैं कि यह समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संरचनात्मक और बहुस्तरीय है। आज का किशोर भौतिक संसार से कम और वर्चुअल संसार से अधिक प्रभावित है। इंस्टाग्राम, रील्स, ओटीटी और डेटिंग एप्स अब मनोरंजन के साधन नहीं रहे, बल्कि किशोर मन की संरचना को प्रभावित करने वाले प्रमुख माध्यम बन चुके हैं।

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के अध्ययन बताते हैं कि 13 से 17 वर्ष की आयु में मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पूरी तरह विकसित नहीं होता। इसी कारण आवेग नियंत्रण कम रहता है और जोखिम लेने की प्रवृत्ति अधिक होती है। जब ऐसे मस्तिष्क पर रोज़ डिजिटल उत्तेजना की बाढ़ पड़ती है, तो परिणाम सीमाओं के टूटने, नैतिकता के धुंधलाने और जोखिमपूर्ण संबंधों के सामान्यीकरण के रूप में सामने आते हैं। लगातार मिल रहे लाइक्स, व्यूज और मैसेज किशोरों के मन में त्वरित संतुष्टि की आदत पैदा करते हैं और धीरे-धीरे रिश्ते अनुभव, शरीर वस्तु और सीमाएँ पुरानी अवधारणाएँ बनती जाती हैं। यही वह डिजिटल सबवर्शन है जो पहले मन को प्रभावित करता है और फिर व्यवहार को अपने वश में कर लेता है।

परिवार की भूमिका भी इस बदलाव में महत्वपूर्ण हो गई है। शहरों में कई माता-पिता यह मान बैठे हैं कि बच्चों को महंगी सुविधाएँ देना ही पालन-पोषण का अंतिम रूप है, जबकि सुविधा देना और उपस्थित रहना दोनों अलग बातें हैं। जब संवाद कम हो जाता है तो उसके स्थान पर पीयर ग्रुप, इन्फ्लुएंसर संस्कृति, ओटीटी की कहानियां और सोशल मीडिया की छवियां बच्चों के मूल्य तय करने लगती हैं। जब 15 वर्ष का बच्चा महंगा फोन लिए घूमता है और माता-पिता उसकी पृष्ठभूमि या स्रोत पर सवाल नहीं करते, तो यह अनदेखी आगे चलकर गंभीर परिणामों का कारण बन सकती है। आज का परिवार प्रोवाइडिंग पेरेंटिंग की ओर झुक गया है, जहाँ धन उपलब्ध है लेकिन भावनात्मक उपस्थिति, मार्गदर्शन और मूल्य निर्माण का अभाव है। यही अनुपस्थिति बच्चों को डिजिटल जंगल में अकेला छोड़ देती है।

इस प्रवृत्ति का सबसे गहरा असर किशोरियों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। अनेक अध्ययनों में यह सामने आया है कि इस प्रकार की संबंध संस्कृति आत्मसम्मान में गिरावट, अवसाद, चिंता, इमोशनल नंबनेस, सेल्फ वर्थ के टूटने और आइडेंटिटी क्राइसिस जैसी स्थितियाँ पैदा करती है। धीरे-धीरे संबंधों का एक लेन-देन मॉडल विकसित होने लगता है, जहाँ किशोरियां स्वयं को वस्तु की तरह देखने लगती हैं। किसी किशोरी का यह न जान पाना कि गर्भ किससे है, ये सिर्फ असावधानी नहीं बल्कि भावनात्मक विखंडन की चरम अवस्था को दर्शाता है, जहाँ शरीर, भावनाएँ और पहचान एक-दूसरे से कटने लगते हैं।

उपभोक्तावाद ने भी इस स्थिति को गहराई दी है। बाजार ने किशोरों को अपना सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग बना लिया है। उनकी असुरक्षाओं को लक्ष्य बनाकर उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनकी कीमत महंगे फोन, फैशनेबल कपड़ों और सोशल मीडिया लाइक्स में छिपी है। जब पहचान वस्तुओं के सहारे बनने लगती है, तब शरीर, संबंध और नैतिकता भी बाज़ार की मुद्रा में बदल जाते हैं। यह उपभोक्तावाद का वह चेहरा है जो आधुनिक किशोरावस्था को भीतर तक प्रभावित कर रहा है।

फ्रेंड विद बेनिफिट जैसी अवधारणाएँ पश्चिमी समाज में भी विवादित रही हैं और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानी गई हैं, लेकिन भारत में यह प्रवृत्ति बिना किसी सांस्कृतिक फिल्टर, पारिवारिक संवाद या स्कूल आधारित मार्गदर्शन के प्रवेश कर गई। इसका टकराव भारतीय सामाजिक संरचना से होकर रिश्तों के विघटन, सामूहिकता के क्षरण और मूल्य संक्रमण के रूप में सामने आ रहा है।

यदि 13 से 18 वर्ष आयु वर्ग में भावनात्मक टूटन, डिजिटल लत, यौनिक प्रयोगशीलता और नैतिक भ्रम इसी तरह बढ़ते रहे, तो इसका असर भविष्य के कार्यबल, सामाजिक स्थिरता, मानव संसाधन और सामूहिक मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ेगा। यह तो सभी स्‍वीकारेंगे ही कि राष्ट्र की शक्ति उसकी संख्या में न होकर उसकी युवा पीढ़ी की मानसिकता, अनुशासन और मूल्य संरचना में निहित होती है। यदि वही पीढ़ी दिशाहीन हो जाए, तब राष्ट्र की ऊर्जा भी दिशाहीन हो जाती है।

समाधान किसी एक संस्था के पास नहीं है, बल्कि यह चार स्तंभों के संयुक्त प्रयास से ही संभव है। परिवार में डिजिटल पेरेंटिंग को आवश्यक बनाना होगा, जहाँ फोन देना और निगरानी दोनों साथ हों। संवाद की पुनर्स्थापना हो और प्रतिदिन कुछ समय परिवार एक साथ बैठकर बातचीत करे। किशोरियों को सेल्फ वर्थ, सीमाएँ और स्वस्थ संबंधों के मूल्य सिखाए जाएँ। विद्यालयों में डिजिटल नैतिक शिक्षा और आयु-उपयुक्त सुरक्षा संबंधी वार्ता हो, साथ ही प्रशिक्षित काउंसलर्स की नियुक्ति भी की जाए। सरकार को एडल्ट प्लेटफॉर्म्स और डेटिंग एप्स पर कड़े आयु सत्यापन लागू करने चाहिए और ओटीटी पर किशोर संवेदनशील रेटिंग को प्रभावी बनाना चाहिए।

इसके साथ ही समाज स्तर पर जागरूकता अभियान, संवाद मंच और माता-पिता–किशोर कार्यशालाएँ आयोजित की जानी चाहिए, ताकि मूल्य निर्माण की प्रक्रिया फिर से मजबूत हो सके। आज यह स्थिति एक चेतावनी है। बच्चे भारत की वर्तमान नींव हैं। उन्हें सुरक्षित रखना, मानसिक रूप से सशक्त बनाना और मूल्य संपन्न बनाना ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति है।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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