ईसाई रीति से संपन्न विवाहों का रजिस्ट्रेशन से नहीं किया जा सकता इनकार

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जयपुर, 05 फ़रवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि ईसाई विवाह अधिनियम के तहत जारी विवाह प्रमाण पत्रों को सिविल रजिस्टर में दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता। यह राज्य का वैधानिक दायित्व है और इसे किसी अधिकारी के विवेकाधीन निर्णय के अधीन नहीं रखा जा सकता। जस्टिस पीएस भाटी और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश सिरो-मालाबार रोमन कैथोलिक चर्च के प्रीस्ट इंचार्ज फादर पॉल पी की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने कहा कि विवाह केवल निजी संबंध नहीं, बल्कि एक वैधानिक स्थिति है। इससे उत्तराधिकार, सामाजिक सुरक्षा और भरण पोषण सहित अन्य परिणाम उत्पन्न होते हैं।

जनहित याचिका में अधिवक्ता सुसेन मैथ्यू ने अदालत को बताया कि प्रदेश में ईसाई समुदाय के युगल ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 के तहत विवाह करते हैं। इस अधिनियम में प्रावधान है कि विवाह कराने वाले पादरी की ओर से जारी विवाह प्रमाण पत्र को पंजीकृत किया जाएगा। इसके बावजूद विधिवत रूप से संपन्न इन विवाहों को नगर निगम के रजिस्ट्रार अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2009 की गलत तरीके से व्याख्या कर पंजीकृत करने में आनाकानी करते हैं। याचिका में कहा गया कि विवाह पंजीकरण नहीं होने से ईसाई दंपत्तियों को पासपोर्ट और वीजा सहित अन्य सरकारी सेवाओं के लिए कठिनाई का सामना करना पडता है। ऐसे में राज्य सरकार को निर्देश दिए जाए कि वह पादरी की ओर से जारी विवाह प्रमाण पत्रों का पंजीकरण करें। जिसके जवाब में राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम के प्रावधान ईसाई विवाहों पर लागू नहीं होता है। इस पर अदालत ने कहा कि ईसाई विवाह अधिनियम के तहत पंजीकरण प्रक्रिया पहले से मौजूद है। ऐसे में राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इन प्रमाण पत्रों को पंजीकृत करे।

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