शिवाजी ने‌ मुगल और बीजापुर सल्तनत की नींव को खोखला कर दिया था

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शिवाजी महाराज की जयंती (19 फरवरी) पर विशेष -डॉ. लोकेश‌ कुमार

छत्रपति शिवाजी महाराज एक साहसी, कुशल रणनीतिकार और दूरदर्शी शासक के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने मराठा पहचान दी। वे मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे, जिन्होंने मुगलों और बीजापुर सल्तनत की नींव को खोखला कर दिया। उन्होंने गोरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) नीति का उपयोग कर मराठा साम्राज्य की स्थापना की। माना‌ जाता है‌‌ कि‌ गोरिल्ला युद्ध महाराणा प्रताप की खोज थी, उन्होंने मुगल शासक अकबर के खिलाफ छापामार युद्ध अपना कर उनको घुटनों के बल ला दिया था।‌

शिवाजी को उनकी मां जीजाबाई ने न्याय, धर्म और रामायण-महाभारत की कहानियां सुनाकर एक धर्मपरायण योद्धा के‌ रुप में तैयार किया था। समर्थ गुरु रामदास और दादाजी कोणदेव ने भी उनके व्यक्तित्व को निखारने में हरसम्भव कोशिश की। 16 साल की आयु में उन्होंने बीजापुर सल्तनत के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजाकर तोरण दुर्ग पर अधिकार जमा लिया। सन 1659 में बीजापुर के सेनापति अफजल खान को कूटनीति से मार गिराया, जो उनकी पहली बड़ी सैन्य सफलता मानी गई। उनका जन्म 19 फरवरी, 1630 को हुआ था। इस कारण उनकी जयंती 19 फरवरी को मनाई जाती है।

उन्होंने गुरिल्ला युद्ध, मजबूत नौसेना और कुशल प्रशासन के साथ तोरना, प्रतापगढ़ और रायगढ़ जैसे किले जीतकर एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की‌ थी। 1674 में रायगढ़ में छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक के बाद धर्म, न्याय और प्रगतिशील शासन के प्रतीक बन गए, जिन्होंने भारत के इतिहास में वीरता और स्वतंत्रता की मिसाल कायम की। वे एक उत्कृष्ट प्रशासक थे। एक सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था की नींव रखीं। शिवाजी का मराठा साम्राज्य महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु तक फैला हुआ था। प्रशासन को सुदृढ़ करने के लिए, शिवाजी ने जागीर प्रथा को समाप्त कर दिया और अपने अधिकारियों को नकद वेतन देना प्रारंभ किया। जागीरदारी व्यवस्था समाप्त करने के बावजूद उन्होंने विद्यालयों और मंदिरों के लिए भूमि अनुदान देना प्रारंभ किया। उनका प्रशासन एक केंद्रीकृत, सुव्यवस्थित और जनकल्याणकारी माना जाता है, जिसका मुख्य केंद्र ‘अष्टप्रधान’ (आठ मंत्री) नामक मंत्रिपरिषद थी। उनके शासन की मुख्य विशेषताओं में मलिक अंबर पर आधारित भू-राजस्व प्रणाली (33-40 प्रतिशत कर), चौथ (1/4 रक्षा कर) और सरदेशमुखी (1/10 कर) वसूली, अनुशासित स्थायी सेना, किलों का विशेष महत्व, नागरिक अधिकारियों की सर्वोच्चता और धार्मिक सहिष्णुता का गुण शामिल था।

छत्रपति के प्रशासन की विशेषताएं

शिवाजी का शासन केन्द्रीयकृत शासन था। उनके पास ही सारी शक्तियाँ निहित थी। उन पर किसी प्रकार का प्रतिबंध अथवा नियंत्रण नहीं था। उनके आदेशों का पालन सभी को करना पड़ता था। उनके पास पदाधिकारियों की नियुक्ति एवं पदच्युति करने का पूर्ण अधिकार था। व्यवहारिक दृष्टिकोण से देखें तो पता चलता है कि अपनी समकालीन तानाशाहों से बिल्कुल भिन्न थे। उन्होंने कभी भी अपने स्वार्थ के लिए आम जनता की उपेक्षा नहीं की और न जनता के अधिकारों का हनन किया। कभी भी सत्ता का दुरूपयोग नहीं किया। हरसंभव तरीके से जनता की उत्थान की चेष्टा की। प्रजा के लिए कत्याण किया और प्रजाहित, प्रजा‌ सुरक्षा, न्याय, नैतिकता और धर्म के लिए उदार भावना थी। प्रशासनिक कार्यों में सलाह के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद का गठन किया, जिसमें पेशवा (प्रधानमंत्री) सर्वोच्च माना जाता था। अन्य मंत्री अमात्य, वकनीस, सचिव, सुमंत, सेनापति, पंडितराव और न्यायाधीश थे।

आमात्यः- शिवाजी के अष्टप्रधान में दूसरा मंत्री आमात्य कहलाता था। आमात्य अर्थ विभाग का प्रधान होता था इसे मजूमदार भी कहा जाता था इसका कार्य राज्य के आय-व्यय का ब्योरा और विभिन्न प्रांतों के हिसाब-किताब की जांच पड़ताल करना था।

पैदल सेनाः- पैदल सैनिकों में नवपायिकों की सबसे छोटी इकाई होती थी इसका मुख्य नायक कहलाता था। इसका वेतन साधारण होता था पांच नायकों पर एक हवलदार होता था। दो या तीन हवलदार पर एक जुमलदार होता था।

जल सेनाः- शिवाजी ने अपने राज्य की रक्षा एवं जंजीरा के विरुद्ध युद्ध करने के लिए एक जल सेना का भी गठन किया था। शिवाजी के पास 400 जहाज थे, इनमें पांच प्रकार के युद्धपोत और कुछ बड़ी-बड़ी नावें भी थीं।

अंगरक्षक की सेनाः उनके पास दो हजार चुने हुए अंगरक्षक थे, जो बड़े साहसी एवं वीर होते थे। अंगरक्षक की सेना पर पूरा व्यय राज्य वहन करता था।

भू-राजस्व और कृषक कल्याणः-भूमि की पैमाइश (माप) के लिए ‘काठी’ का उपयोग किया जाता था। उपज का 33 प्रतिशत (बाद में 40 प्रतिशत ) कर लिया जाता था। अकाल के समय किसानों को बीज और पशु खरीदने के लिए ‘तकावी’ (ऋण) देने की व्यवस्था कर रखी थी।

सैन्य व्यवस्थाः- उन्होंने एक मजबूत, अनुशासित और स्थायी सेना बनाई। सैनिकों को जागीर के बदले नकद वेतन देना प्रारंभ किया। सेना में ‘पागा’ (नियमित) और ‘सिलहदार’ (अस्थायी) दो प्रकार के घुड़सवार थे। शिवाजी ने किलों को सामरिक महत्व का केंद्र मानते हुए प्रत्येक किले में हवलदार, सबनीस और कारखानिस नामक तीन समान रैंक के अधिकारी बनाए, ताकि एक व्यक्ति निरंकुश नहीं हो सकें। प्रशासन का केंद्र बिंदु स्वयं शिवाजी थे। वे सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु भी थे और उनकी सेना व प्रशासन में मुस्लिम अधिकारी भी महत्वपूर्ण पदों आसीन थे। न्याय व्यवस्था सरल थी, जिसमें ग्राम पंचायतें स्थानीय विवादों का निपटारा करती थीं और उच्च स्तर पर न्यायधीश व पंडितराव न्याय करते थे।

सैनिक अनुशासनः – शिवाजी के शासनकाल में मराठा सैनिक को एकत्रित करते हुए राष्ट्रीय सेना की स्थापना की थी, सैनिक राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत थे। वे अपने देश की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। बहरहाल, हम यही कह सकते हैं कि छत्रपति शिवाजी महाराज दूरदर्शी थे। शक्तिशाली होने के साथ उन्होंने जनकल्याण के कार्य किए। उनका विचार अंतिम व्यक्ति के कल्याण पर टिका था।

(लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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