मानक पर खरा नहीं उतरने वाली दवाओं से तबाह होती जिंदगी

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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

भले ही यह दावा किया जाता है कि दवाओं की जांच के लिए जो सैंपल लिए जाते हैं उनमें से केवल 3 प्रतिशत दवाएं निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरती पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दवा के एक भी नमूने में निर्धारित मात्रा व संयोजन में कंपोनेंट नहीं है तो यह स्वीकार नहीं होनी चाहिए। पिछले कुछ माह के समाचारों का ही विष्लेषण किये जाये तो मध्यप्रदेश, राजसथान सहित देश के कई हिस्सोें में खांसी की दवा के चलते बच्चों की जान ना केवल सांसत में आई बल्कि कुछ बच्चों को तो जिंदगी से हाथ धोना पड़ा। हालांकि सफाई दी गई कि दवा डाक्टर ने नहीं लिखी थी या चिकित्सालय से दवा नहीं दी गई थी।

मानक पर खरा न उतरने वाली दवा तैयार कर जीवन से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई नहीं होना उनके हौसले को ही बढ़ाती है। माना जाता है कि नकली पेस्टीसाइड बनाने व बेचने वालों के लिए सख्त सजा का प्रावधान है तो फिर दवाओंं के सैंपल फेल हो जाने पर उन बेची गई दवाओं को बाजार से हटाने की बात तो कर दी जाती है पर किसी दवा निर्माता को दवाओं के सैंपल विफल होने पर सजा मिलने के समाचार दिखाई नहीं देते। गत पांच सालों में 14 हजार से अधिक दवाओं के सैंपल विफल हुए हैं। इनमें से अधिकांश बुखार, खांसी के साथ ब्लड प्रेशर, शुगर जैसी गंभीर बीमारियों की दवा भी है। अब कल्पना की जा सकती है कि बीपी या शुगर के बीमार पर ऐसी दवाओं का क्या असर होता होगा या हो सकता है।

सामान्य से गंभीर बीमारी की दवाओं के सैंपल विफल होना इस बात का साफ संकेत है कि दवा निर्माताओं में ना तो मरीजों के प्रति गंभीरता है और ना ही किसी कानूनी कार्रवाई का डर। यह तो वह आंकड़े हैं जो सामने आ जाते हैं नहीं तो बाजार में आने वाली दवाओं के सभी के सभी बैच के सैंपल जांच के लिए लेना या जांच करना संभव भी नहीं तो व्यावहारिक भी नहीं लगता। ऐसे में अमानक पाये जाने पर कठोर कार्रवाई लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वालों में भय व सबक सिखा सकती है।

दवाओं के निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरने के साथ जीवनदायिनी दवाओं के तेजी से बेअसर होना भी एक समस्या होती जा रही है। इसका एक बड़ा कारण जहां एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक सेवन है तो दूसरा कारण दवाएं लेने के तौर-तरीके से अनविज्ञ होना या फिर जानबूझकर लापरवाही बरतने के साथ ही खानपान से जुड़ी गलतियां भी हैं। डॉक्टरों की भाषा में बात करें तो एएमआर यानी कि एंटी माइक्रोबाइल रेजिस्टेंस का चिंतनीय खतरा हो गया है। देश-विदेश के चिकित्सक एएमआर को वैश्विक महामारी का नाम देने लगे हैं। देखा जाए तो आज सबसे अधिक मौत का कारण दवाओं का बेअसर होना है। कोरोना के बाद तो एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग बहुत अधिक बढ़ा है।

दरअसल कोरोना के बाद जहां एक और आम व्यक्ति स्वास्थ्य के प्रति अत्यधिक सजग हुआ है तो एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग भी बढ़ा है। सर्दी, जुकाम, खांसी आदि वायरल बीमारियों में यदि भारत की बात की जाए तो 95 प्रतिशत तक एंटीबायोटिक दवाओं को इलाज में शामिल किया जा रहा है। यह 95 प्रतिशत का आंकड़ा अतिशयोक्ति पूर्ण भले ही हो सकता है पर इसमें कोई दो राय नहीं कि चिकित्सकों द्वारा एंटीबायोटिक दवाएं धड़ल्ले से लिखी जा रहा है। यह तो तब है जब मेडिकल से जुड़े विभिन्न मंचों व शोध निष्कर्षों में यह खुलासा हो चुका है कि एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग स्वास्थ्य को नुकसान ही पहुंचाने लगा है तो दूसरी और बैक्टिरिया में प्रतिरोधी क्षमता विकसित होने से दवाओं का असर कम होने लगा है।

दवाओं के तेजी से बेअसर होने को लेकर देेश-दुनिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञ अत्यधिक चिंता में हैं। मेउिकल से जुड़े जर्नल द लैसेंट में इस संबंध में एक के बाद एक चेतावनी भरे लेख सामने आ रहे हैं। यहां तक कि एएमआर को मेडिकल इंमरजेंसी के रुप में देखा जाने लगा है। दरअसल कोरोना के बाद लोग थोड़ा सा स्वास्थ्य खराब होते ही डॉक्टर की शरण में जाने को वरियता देने लगे है। यह अच्छी बात भी है पर जिस तरह से कोरोना के दौरान और उसके बाद एंटीबायोटिक का उपयोग अधिक बढ़ा है वह चिंतनीय हो गया है। हालात यहां तक हो गए हैं कि प्रति व्यक्ति 30 प्रतिशत अधिक मात्रा में एंटीबायोटिक का उपयोग होने लगा है। दवाओं का बेअसर होने का सीधा असर किडनी, लीवर, ब्रैन, हार्ट आदि प्रभावित होने लगे हैं। इन गंभीर बीमारियों में एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम होने लगा है।

इसे सकारात्मक ही माना जाएगा कि आज लोग स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग हुए हैं। जरा सा स्वास्थ्य गड़बड़ाने लगते ही लोग दवाओं का सहारा लेना आरंभ कर देते हैं। ऐसे में दवाओं की गुणवत्ता और मानकों पर खरा होना अधिक आवश्यक हो जाता है। दूसरी और अत्यधिक एंटिबायोटिक लिखने और सेवन को भी नियंत्रित किया जाना जरुरी हो जाता है। ऐसा नहीं है कि सरकार इन हालातों से अनजान है बल्कि सरकार गंभीर प्रयास करने के साथ ही सख्त कानूनी प्रावधानों की दिशा में बढ़ रही है। दवाओं के पैकिंग पर असली नकली की पहचान के लिए क्यूआर कोड लगाने जैसी कदम उठा रही हैं पर निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरने वाले बैच की दवाओं को उपयोग से बाहर करने के सीमित कदम के स्थान पर निर्माता पर सख्त से सख्त कार्रवाई के प्रावधान होने ही चाहिए।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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