
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
अब यह भ्रम टूट जाना चाहिए कि भारतीय सिनेमा और ओटीटी मनोरंजन कर रहे हैं। सच यह है कि ये प्लेटफॉर्म आज यह तय कर रहे हैं कि समाज में अपराधी कौन है। हालांकि फिल्म “घूसखोर पंडित” पर देशभर में न सिर्फ ब्राह्मण समाज बल्कि बीएसपी प्रमुख मायावती से लेकर अन्य जाति-बिरादरियों के प्रमुखों की आई आपत्तियों और एफआईआर दर्ज होने के बाद फिल्म मेकर्स ने प्रमोशनल मटेरियल को हटाने का फैसला लिया है, किंतु इस दिशा में हो रहे नकारात्मक प्रयासों ने फिर ये बताया है कि हिन्दू समाज को तोड़ने के लिए उसमें जाति के आधार पर वैमनस्य पैदा करने तथा किसी की पहचान को आरोपित करने के लिए कैसे कला के नाम पर वैचारिक हमला किया जा सकता है।
नीरज पांडे और मनोज बाजपेयी की फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ को आप महज एक फिल्म के शीर्षक तक सीमित मत रखिए, कहना होगा कि यह उस दीर्घकालिक और सुनियोजित नैरेटिव का विस्तार है, जिसके तहत भारतीय समाज के भीतर एक वर्ग और एक पहचान को अपराध, पतन और नैतिक गिरावट के प्रतीक के रूप में स्थापित किया जा रहा है। पिछले कई दशकों से भारतीय दर्शक एक अजीब दोहरे मानदंड का साक्षी है। जब आतंकवाद या हिंसा दिखाई जाती है, तब यह तर्क बार-बार दोहराया जाता है कि “आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता।” फिल्मों और वेब सीरीज में आतंकवादी की धार्मिक पहचान को जानबूझकर धुंधला किया जाता है, नाम बदले जाते हैं, पृष्ठभूमि छिपा दी जाती है, ताकि किसी विशेष समुदाय की भावनाएं आहत न हों किंतु जैसे ही विषय भ्रष्टाचार, शोषण या सत्ता का दुरुपयोग होता है, कैमरा अचानक जनेऊ, तिलक, पूजा-पाठ और उपनाम पर टिक जाता है। यह चयनात्मक संवेदनशीलता अपने आप में एक गंभीर सवाल खड़ा करती है।
‘घूसखोर पंडित’ शीर्षक यह स्पष्ट करता है कि यहाँ घूसखोरी किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत विकृति न मानकर एक पहचान की विशेषता के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। यही वह बिंदु है जहाँ कला की स्वतंत्रता का तर्क कमजोर पड़ जाता है। क्या कोई फिल्मकार “घूसखोर मौलाना” या “घोटालेबाज पादरी” जैसे शीर्षक रखने का साहस कर सकता है? यदि उत्तर नहीं है तो इसका अर्थ यह है कि यह स्वतंत्रता नहीं, सुरक्षित लक्ष्य चुनने की रणनीति है।
देखा जाए तो भारतीय सिनेमा में यह प्रवृत्ति अचानक नहीं आई। दशकों से पात्रों का निर्माण उनके उपनाम और जातीय पहचान के आधार पर किया जाता रहा है। ब्राह्मण या पंडित को अक्सर लालची, चालाक, षड्यंत्रकारी या सत्ता से चिपका हुआ दिखाया गया। राजपूत या ठाकुर को अत्याचारी जमींदार के रूप में सीमित कर दिया गया, जबकि उनके ऐतिहासिक योगदान, बलिदान और राष्ट्ररक्षा की भूमिका को हाशिये पर डाल दिया गया। बनिया पात्र को सूदखोर और अमानवीय दिखाने की परंपरा भी किसी से छिपी नहीं है। आज यह लगातार दोहराया गया पैटर्न बन चुका है, जिसे धीरे-धीरे समाज के अवचेतन में बैठाने का प्रयास हो रहा है।
धार्मिक प्रतीकों का चित्रण भी इसी असंतुलन को दर्शाता है। मंदिरों को अक्सर अंधविश्वास, पाखंड और षड्यंत्र के केंद्र के रूप में दिखाया जाता है, जबकि मस्जिद या दरगाह को शांति, करुणा और आध्यात्मिकता का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। यह तुलना स्वतः ही दर्शक के मन में एक वैचारिक झुकाव पैदा करती है। यह कहना कठिन नहीं कि यह कला का स्वाभाविक विकास न होकर एक खास मानसिक दिशा में सोच को मोड़ने का प्रयास है। कई वेब सीरीज में सवर्ण पात्रों को मानसिक रूप से विकृत, जन्मजात अपराधी या नैतिक रूप से दिवालिया दिखाया जाना इसी दिशा की ओर संकेत करता है। यह सिविल कॉन्फ्लिक्ट नैरेटिव का निर्माण है।
यह नैरेटिव केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं है। विश्वविद्यालय परिसरों में, खासकर जेएनयू, जादवपुर जैसे संस्थानों में, ‘ब्राह्मण’ या ‘पंडित’ शब्द को गाली और अपराध के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाना इसी मानसिकता का विस्तार है। यह एक ऐसा प्रयोग है, जिसमें हिंदू समाज को बाहरी शत्रु से नहीं, आंतरिक विभाजन के माध्यम से कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। चिंताजनक पहलू यह है कि इस प्रक्रिया में बड़ी भूमिका उन्हीं लोगों की है, जो स्वयं इसी समाज से आते हैं। वैश्विक स्वीकृति, पुरस्कार और वैचारिक प्रमाणपत्र पाने की होड़ में अपनी ही जड़ों को कटघरे में खड़ा करना एक खतरनाक प्रवृत्ति बन चुकी है।
यदि वैश्विक सिनेमा से इस सोच की तुलना की जाए तो अंतर और स्पष्ट हो जाता है। हॉलीवुड या यूरोप में अपराध को व्यक्ति की कमजोरी माना जाता है, उसकी नस्ल या धार्मिक पहचान को शीर्षक का हिस्सा नहीं बनाया जाता। भारत में यह इसलिए संभव है क्योंकि यहाँ का बहुसंख्यक समाज सहिष्णु है और प्रतिक्रिया में संयम बरतता है। अब इस स्थिति से निपटने के लिए सिर्फ भावनात्मक प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं है। जागरूकता के साथ-साथ ठोस नीतिगत कदम उठाने की आवश्यकता है। जैसे सिनेमा के लिए सेंसर बोर्ड है, वैसे ही ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए भी स्पष्ट और प्रभावी नीति बनाई जानी चाहिए, जो नाम, जाति और आस्था के आधार पर सामूहिक अपराधीकरण को रोके। जानबूझकर नफरत फैलाने और सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
(लेखक, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्य एवं हिन्दुस्थान समाचार के क्षेत्रीय संपादक हैं।)
