उत्सव आमार जाति, आनंद आमार गोत्र

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– हृदयनारायण दीक्षित

सीमा लघुता है और असीम विराट। हमारा होना एक सीमा में है लेकिन विराट हो जाने की संभावनाएं खुली हुई हैं। शरीर हमारी पहली सीमा है, इसके बाद परिवार दूसरी सीमा। इसका आनंद निजी सीमा के अतिक्रमण में है। इसके बाद समाज है। समाज की सीमा के अतिक्रमण के बाद राष्ट्र की सीमा है। इनके पार ब्रह्माण्ड। तब संकीर्णता विस्तीर्ण होकर अनन्त हो जाती है। जाति वर्ण संकीर्णताएं हैं। मैं अपना संकीर्ण परिचय देता हूँ-मैं जाति वर्ण से ब्राह्मण हूं। संकीर्णता तोड़ें तो मैं मनुष्य जाति का हूं। अब मैं विश्व मानवता का हिस्सा हो गया। इसे और बढ़ाएं तो मैं प्रकृति का हिस्सा हूं। अन्ततः मैं ब्रह्म या सम्पूर्णता का विनम्र हिस्सा हूं।

संप्रति ब्राह्मण जाति हैं। पहले वे समूहवाची वर्ण-वर्ग थे। वे जन्मना नहीं थे। ब्राह्मण पिता के पुत्र भी ब्राह्मण नहीं थे फिर ब्राह्मण होने लगे। ब्राह्मण शब्द पीछे सौ वर्ष से विवाद का विषय है। वेदों के बाद लिखे गए उपासना और विनियोग सम्बंधी साहित्य को ही सबसे पहले ब्राह्मण कहा गया। यह उत्तर वैदिक काल की बात है। इसी समय ब्रह्म शब्द सृष्टि सम्पूर्णता का पर्यायवाची बना। ऋग्वैदिक काल में ब्रह्म या ब्रह्मन का अर्थ स्तोत्र का जानकार द्रष्टा था। अथर्ववेद में आत्मदर्शन के साधक को ब्रह्मचारी बताया गया है। अथर्वेद के समय तक ब्राह्मण होना एक श्रमसाध्य उपलब्धि था। छान्दोग्य उपनिषद् की कथा के अनुसार ब्राहमण उद्दालक ने अपने विद्वान पुत्र श्वेतकेतु को भी पहले ब्राह्मण नहीं माना, कठोर तप साधना के बाद ही वह ब्राह्मण हो पाया।

ब्राह्मण होने के लिए प्रकृति के रस छन्द ऋत में ढलना होता था। अथर्ववेद के (11वें अध्याय सूक्त 7) में ब्राह्मण होने की रोचक विधि है-“ब्रह्मचारी अर्थात् ब्रह्म के अनुसार चलने वाला व्यक्ति द्युलोक और भूलोक को अनुकूल बनाता है। प्रकृति की दिव्य शक्तियाँ-देवगण अंतःकरण में स्थित हो जाती हैं। (मन्त्र 1) प्रबोधन आचार्य के मार्गदर्शन में सम्पन्न होता है। बताते हैं, “आचार्य उसे तीन रात तक अपने ज्ञानगर्भ में धारण करते हैं। जब वह बाहर आता है, तो दिव्यशक्तियाँ-(देवगण) उसका अभिनन्दन करती हैं।” (मन्त्र 2) यहां ‘तीन रात्रि’ का उल्लेख ध्यान देने योग्य है। आखिरकार तीन दिन क्यों नहीं कहा गया?

रात्रि अंधकार है, अंधकार अज्ञान है, दिवस प्रकाश हैं, प्रकाश ज्ञान है। साधक ब्रह्मचारी के लिए ज्ञान गर्भ का प्रतीक रात्रि है। दिव्यता की प्राप्ति के बाद देव शक्तियां स्वाभाविक ही अभिनंदन करती हैं। फिर कहते हैं, “ब्राह्मण होने से पूर्व साधक-विद्यार्थी ब्राह्मी-अनुशासन का अभ्यास करता है। वह ऊर्जा प्राप्त करता है, ऊर्ध्वमुखी होता है फिर ब्राह्मण बनता है। ज्येष्ठ ब्रह्म के निकट हो जाता है।” (वही मन्त्र 5) ऊर्जा प्राप्त करना और ऊर्ध्वमुखी होना आसान नहीं है। ब्राह्मण होने के लिए आंतरिक ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी बनाना होता है।

ऋषि बताते हैं “आचार्य ज्ञानगर्भ में ब्रह्मचारी के लिए पृथ्वी और द्युलोक का सृजन करते हैं।” (वही मंत्र 8) पृथ्वी और द्युलोक पहले से ही है। तब ज्ञान गर्भ में क्या नये पृथ्वी और द्युलोक की बात कही गयी है? ज्ञान गर्भ में ब्रह्मचारी का पृथ्वी अंश सामान्य पृथ्वी अंश से परिष्कृत होता है। चेतन अंश निर्मल होता है। अथर्व0 का ऋषि इसे ज्ञानगर्भ की घटना बता रहा है। आगे कहते हैं “ब्रह्मचारी अपनी तपसाधना से उनकी (नये पृथ्वी व द्युलोक) रक्षा करता है।” (वही) ब्रह्मचारी अपनी काया और चेतना का नया रूप विकसित करता है और इसी नये रूप की रक्षा करता है। फिर ब्राह्मण की सम्पत्ति बताते हैं, “ब्राह्मण की सम्पदा निकटवत्त गुफा (गुहा-अनुभूति) में रहती है और द्यु लोक के आधार से परे होती है।” (वही मन्त्र 10) ब्राह्मण हो गया व्यक्ति आंतरिक रूप में समृद्ध हो जाता है। भौतिक सम्पदा का आधार पृथ्वी है। इससे भी परे द्युलोक आधार है लेकिन इस मन्त्र में ब्राह्मण की सम्पदा “द्युलोक से भी परे” है।

ब्रह्मचर्या में बड़ी शक्ति है। कहते हैं “ब्रह्मचारी ही आचार्य बनता है। शासक भी इसी तप से राष्ट्र की रक्षा करते है-ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति।” (वही मन्त्र 16-17) आंतरिक अनुभूति से मनुष्य ब्रह्मविद् हो जाता। ब्रह्मविद् ब्रह्म हो जाते हैं। उत्तरवैदिक काल के बाद धारणा बनी कि जन्म से सब सामान्य होते हैं। संस्कार से ब्राह्मण बनते हैं लेकिन अथर्ववेद के अनुसार जन्म से कोई भी प्राणी गैर ब्राह्मण नहीं होता। जन्म से सम्पूर्ण प्राणिजगत् ब्रह्मचारी ही होता है। कहते हैं “वनस्पतियां भूत भविष्य, संतव्सर सभी प्राणी, वन्य जीव, पशु, पक्षी जन्मजात ब्रह्मचारी होते हैं।” (वही मन्त्र 20, 21) ब्राह्मण होते हैं।

अथर्ववेद की दृष्टि में कीट पतिंग, पशु पक्षी और सभी मनुष्य ब्रह्मचारी हैं। ब्राह्मण होने की संभावना सबमें है। यह बात स्मृतिकाल से बिल्कुल अलग है। स्मृतियों के अनुसार जन्म से सभी शूद्र है, ज्ञानार्जन/संस्कार से ब्राह्मण हो जाते हैं। अथर्ववेद का मत सही है कि जन्म से सभी ब्रह्मचारी हैं, कर्म क्षेत्र में जाकर श्रम विभाजन के फलस्वरूप वर्ण, वर्ग बनते हैं। फिर अपनी प्राण ऊर्जा को ऊर्ध्वमुखी बनाते हैं। आत्मबोध को प्राप्त होते हैं और ब्राह्मण बनते हैं। कुछेक विद्वान विराट पुरूष के मुख से ब्राह्मण की उत्पत्ति बताते हैं। वे ऋग्वेद के पुरूष सूक्त का उल्लेख करते हैं।

ऋग्वेद के पहले भी एक विकासमान संस्कृति थी। पूर्वकालीन संस्कृति में वर्ण विभाजन होते, तो ऋग्वेद में उनका उल्लेख होता। ऋग्वेद में जन्मना जाति या वर्ण नहीं है। ब्राह्मण का अर्थ स्तुति, या स्तोत्र ही आया है। ऋग्वेद का ‘पुरूष’ सम्पूर्णता का पर्याय है। पुरूष सूक्त (10वाँ मण्डल) में ब्राह्मण राजन्य, वैश्य, शूद्र के उल्लेख हैं लेकिन वर्णो के नहीं। इस सूक्त में भी ‘ब्राह्मण’ का अर्थ स्तोत्र/स्तोता ही है। ऋग्वेद का पुरूष सूक्त दार्शनिक है। ऋषि कहते हैं “पुरूष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भत्यं-यह पुरूष ही सब कुछ है, जो हो गया, जो होगा सब पुरूष है।” (ऋ0 10.90.2) बात पूरी हो गयी। ऋषि आगे कहते हैं, “पुरूष का विभाजन होने लगा। प्राणियों की उत्पत्ति हुई।” (वही: 5) आगे इसी पुरूष को यज्ञ प्रतीक देते हैं। कहते हैं, “देवताओं ने उस विराट पुरूष को ह्वि बनाया। वसन्तु ऋतु को घी बनाया, ग्रीष्म ऋतु को ईधन (लकड़ी) और शरद् को ह्विष्य। इससे नभचर, थलचर आदि प्राणी उत्पन्न हुए। ऋक और यजुर्वेद की ऋचाएं आई। आदि। मंत्र 11 ज्यादा ध्यान देने योग्य हैं “यत्पुरूषं व्यदधु कतिधा व्यकल्पयन-ज्ञानी जन इस पुरूष की कितने प्रकार से कल्पना करते हैं? कि उसका मुख क्या है? बाहु और पाद क्या है?”

पुरूष विराट है तो कल्पनाएं भी तमाम होंगी। ब्राह्मण राजन्य वैश्य शूद्र वाला मंत्र (12) इसी कल्पना का विस्तार है। यहां पुरूष का मुख ब्राह्मण है। सबका मुख ब्राह्मण ही होता है। मुख से ही वाणी निकलती है। सभी परवत वर्णो का मुख ब्राह्मण ही है। फिर बताते हैं, “बाहू राजन्य हैं।” पुरूष, एक विराट ‘पुर’ (नगर) है। पुर की रक्षा का काम बाहु-हाथ करते हैं। जन्मना ब्राह्मण के हाथ भी राजन्य हैं। पुरूष का पेट वैश्य है। वैश्य संग्रही वृत्ति का प्रतीक है। सभी वर्णो का पेट वैश्य है, संग्रही है। पैर आधार हैं। शूद्र भी आधार हैं। आधार पर ही संग्रह, सुरक्षा और शीर्ष का ढांचा खड़ा होता है।

ऋग्वेद में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र का अर्थ वर्ण नहीं है। इस सूक्त के उदय तक संभव है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्गो का विकास हो रहा हो लेकिन वैदिक समाज में वर्ण जाति नहीं है। भारत के सुदूर अतीत में एक वर्णहीन, जातिविहीन आनंदपूर्ण समाज था। वैसा ही समाज बनाना राष्ट्र की अपरिहार्यता है। जाति-वर्ग से अलग हँसता, नाचता, गीत गाता, उत्सव मनाता समाज। रविन्द्रनाथ टैगोर ने गाया था, ”उत्सव आमार गोत्र, आनंद आमार जाति।”

(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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