सहजन के फूलों में नवजीवन का उजास

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परिचय दास

वसंत की प्रथम आहट के साथ ही सहजन के पेड़ ने अपनी शाखाओं को नवजीवन के उजास से भर लिया। हल्की ठंडी हवा, धूप की धीमी परछाइयां और कोयल की आवाज के बीच सहजन के फूल अपनी नाज़ुक पंखुड़ियों को खोलने लगे। इन फूलों में एक अलौकिक सादगी थी, जैसे किसी गजल का पहला मिसरा-अनायास, लेकिन भीतर तक स्पंदित कर देने वाला। इन छोटे-छोटे सफेद फूलों की सुगंध में स्मृतियों का एक संसार बसता था। गांव की वह पगडंडी, जहां दुपहरिया की उनींदी हवा में सहजन की डालियां झूलती थीं। उनकी छांव में खेलते बच्चे, दोपहर की थकान से आंखें मूंदकर सुस्ताते किसान और किसी कोने में बैठी कोई स्त्री, जो फूलों को बटोर कर उनकी सब्ज़ी बनाने की सोच रही थी। सहजन का फूल केवल फूल नहीं था, यह किसी विरासत की तरह अगली पीढ़ी को सौंपा जाने वाला एक गीत था-मौन में गाया हुआ लेकिन दिल की गहराइयों तक गूंजता हुआ।

सहजन के फूलों को जब पानी में डुबोया जाता तो वे अपनी कोमलता को त्यागकर पकने के लिए तैयार हो जाते। जैसे जीवन भी तपने पर ही अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है। उनकी हल्की कड़वाहट, उनकी मिट्टी की गंध और उनके भीतर बसी हुई मृदुता एक संपूर्ण कविता थी-जिसे सिर्फ स्वाद से ही नहीं, हृदय से भी समझा जा सकता था। सहजन के फूलों की एक अलग ही दुनिया थी-न धूमधाम, न रंगों का जादू, बस सफेदी में लिपटी हुई एक गहरी अनुभूति। वे उन शब्दों की तरह थे, जो बिना किसी शोर के भी भीतर तक असर कर जाते हैं। उनके गिरने का ढंग भी अनूठा था-धीरे-धीरे, बूंद-बूंद की तरह, मानो समय के हाथों में अपनी अंतिम आहुति दे रहे हों।

जब हवा सहजन के फूलों को स्पर्श करती तो वे एक अनकही भाषा में झूम उठते। यह भाषा किसी एक की नहीं थी, यह उन सभी की थी, जिन्होंने प्रतीक्षा की पीड़ा को समझा था। एक विरहिणी नायिका की तरह ये फूल अपनी डालियों से अलग होकर भी किसी अदृश्य प्रेम के साथ जुड़े रहते थे। सहजन के फूलों में प्रेम था-एक ऐसा प्रेम, जो सब कुछ सहकर भी विनम्र बना रहता है। कभी-कभी, जब संध्या उतरती तो सहजन के फूलों से भरी डालियां चुपचाप अपने अस्तित्व को देखती रहतीं। जैसे किसी बूढ़े साधु की आंखों में ठहरा हुआ संतोष। वे फूल, जो दिनभर हवा के साथ हंसे थे, अब निशब्द खड़े रहते- स्वीकृति और समर्पण के साथ। वे जानते थे कि उनकी यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती, वे मिट्टी में मिलकर फिर से जन्म लेंगे, किसी और शाखा पर, किसी और ऋतु में।

सहजन के फूलों की यही विशेषता थी- वे जीवन के सबसे सरल, सबसे अल्पकालिक, लेकिन सबसे अर्थपूर्ण हिस्से थे। वे बिना बोले हमें सिखा जाते थे कि सौंदर्य केवल भव्यता में नहीं, सादगी में भी होता है। वे हमें यह भी सिखाते थे कि जो गिरने में भी आनंद पा सके, वही सच्चे अर्थों में खिला हुआ है।

जब भी कोई सहजन के फूलों को देखता, उसे अपने भीतर कोई भूला-बिसरा गीत याद आ जाता। कोई पुरानी चिट्ठी, कोई अनकहा वादा, कोई अधूरा सपना। वे फूल नहीं थे, वे स्मृतियों की छोटी-छोटी नावें थीं, जो समय की नदी में बहती रहती थीं – शांत, निश्चल, लेकिन हर किसी तक पहुंचने वाली। कई बार, मैं सहजन के उन फूलों को देखता और सोचता – क्या जीवन भी ऐसा ही नहीं है? क्या हम सब किसी शाखा पर लगे हुए फूल ही तो नहीं, जिन्हें एक दिन जमीन पर गिर जाना है? और अगर गिरना ही नियति है तो क्यों न गिरते समय भी अपनी सुगंध को बचाए रखें? क्यों न इस यात्रा को भी सुंदर बना दें?

शायद यही कारण था कि जब भी सहजन के फूल जमीन पर बिखरते, वे किसी उदासी में नहीं बल्कि एक नृत्य में होते थे। जैसे किसी विदा होती आत्मा की अंतिम प्रार्थना। जैसे किसी प्रेमी की वह चुप्पी, जिसमें कोई शिकायत नहीं, सिर्फ समर्पण होता है।

सहजन के फूल सिर्फ पेड़ पर नहीं खिलते, वे स्मृतियों में भी खिलते हैं। वे बचपन की कच्ची धूप में खिलते हैं, वे मां के हाथों की गर्माहट में खिलते हैं, वे किसी पुरानी धुन में खिलते हैं। वे हवा में बहते हैं, मिट्टी में घुलते हैं और फिर किसी नए वृक्ष की शाख पर उग आते हैं। और इस तरह, सहजन के फूल कभी मरते नहीं। वे हर बार नए स्वरूप में लौटते हैं -उसी सादगी, उसी नमी और उसी अव्यक्त सौंदर्य के साथ। सहजन के फूल चुपचाप खिलते हैं- जैसे किसी कविता की सबसे मृदु पंक्ति जो अर्थों के भार से झुकी हुई नहीं बल्कि हल्की होकर हवा में बहती है। वे किसी भी ऋतु के प्रखर नायक नहीं होते, न वसंत के रंगों में खोए रहते हैं, न पतझड़ की उदासी को ओढ़ते हैं। वे बस आते हैं—धीरे से, संकोच के साथ, जैसे किसी पुरानी धुन का पहला सुर, जिसे केवल वही सुन सकता है, जिसकी स्मृतियों में कोई शांत धूप बची हो।

सहजन के फूलों की सादगी में एक अजीब-सी जटिलता है। वे जितने सीधे दिखते हैं, उतने ही गहरे होते हैं। सफेद, नर्म और हल्की गंध से भरे हुए ये फूल किसी मौन गीत की तरह खिलते हैं -शब्दों से अधिक अनुभव में बहते हुए। हवा उन्हें छूती है और वे बिना किसी प्रतिरोध के बहने लगते हैं। जैसे प्रेम में समर्पण का पहला क्षण, जब सब कुछ स्पष्ट नहीं होता लेकिन महसूसना ही पर्याप्त होता है। सहजन के फूल गिरते नहीं—वे उतरते हैं। धीरे-धीरे, जैसे समय के स्पर्श से पिघलकर धरती की गोद में समा रहे हों। उनकी यात्रा किसी संत की प्रार्थना जैसी है -शांत, कोमल, और गहरी। वे न अपने खिलने का उत्सव मनाते हैं, न गिरने की पीड़ा में विलीन होते हैं। वे बस प्रवाह में रहते हैं, उस नदी की तरह जो कभी ठहरती नहीं, लेकिन अपने भीतर सैकड़ों स्मृतियों को संजोए रखती है।

शाम की धूप जब सहजन के पेड़ों से छनकर गिरती है, तो फूलों के छोटे-छोटे चेहरे चमकने लगते हैं। यह कोई चमत्कार नहीं, बस प्रकृति का एक कोमल संकेत है कि सौंदर्य उन्हीं चीज़ों में बसता है, जिन्हें हम अनदेखा कर देते हैं। कभी-कभी, मैं सहजन के फूलों को देखता हूं और सोचता हूं – क्या हम भी ऐसे ही नहीं हैं? अपनी शाखाओं पर किसी अदृश्य वचन में बंधे हुए, एक दिन मिट्टी में लौट जाने के लिए? और अगर लौटना ही है तो क्यों न इन फूलों की तरह उतरें -सुगंध से भरे हुए, हल्के, और स्मृतियों में बसे रहने वाले?

शायद इसीलिए सहजन के फूल केवल फूल नहीं होते, वे जीवन की सबसे सुंदर परिभाषा होते हैं-सरल, क्षणिक लेकिन शाश्वत। कभी-कभी हवा सहजन के फूलों से बातें करती है। वे उसके कानों में धीमे से कुछ कहते हैं, कोई भूली-बिसरी कथा, कोई बीता हुआ वादा, कोई अनसुना गीत। हवा उन्हें छूते ही हल्के हो जाती है, जैसे उन फूलों ने उसे कोई गुप्त मंत्र दे दिया हो-एक ऐसा मंत्र, जो थके हुए पत्तों को सुकून देता है, जो किसी उखड़े हुए जड़ को भी यह भरोसा दिलाता है कि मिट्टी में लौटना भी एक यात्रा ही है, कोई अंत नहीं। जब सहजन के फूल झरते हैं तो धरती को अपने स्पर्श से भर देते हैं। उनका गिरना किसी विरहिणी नायिका के अश्रु जैसा नहीं होता, न ही किसी अधूरे स्वप्न के टूटने जैसा। वे गिरते हैं, जैसे जल में कोई दीप उतारा जाता है—एक धीमी आहुति की तरह, जो बुझने के बजाय और भी गहराई में समा जाती है।

किसी शाम जब हल्की नमी भरी हवा चलती है, सहजन के फूल मद्धिम धूप में झिलमिलाने लगते हैं। उनकी सफेदी में एक गूंज होती है—एक मौन पुकार, जिसे वही सुन सकता है, जिसने कभी किसी चीज को बिना छुए महसूस किया हो। वे कोमल हैं लेकिन उनके भीतर जो स्थिरता है, वह उन्हें कभी पूरी तरह विलीन नहीं होने देती। वे धरती पर गिरकर भी मिट्टी में नहीं खोते, वे अपनी छाप छोड़ जाते हैं – किसी बच्चे की हथेली पर पड़े हल्के स्पर्श की तरह, किसी मां की चुप्पी में छुपी हुई चिंता की तरह।

जब रात गहराने लगती है, सहजन के फूलों का सौंदर्य और भी स्पष्ट हो जाता है। वे अंधेरे के विरुद्ध कोई रोशनी नहीं जलाते, न ही अपनी उपस्थिति का शोर मचाते हैं। वे बस रहते हैं—शांत, प्रतीक्षा में, किसी नए सवेरे की उम्मीद में। शायद इसीलिए सहजन के फूलों का सौंदर्य देखने के लिए आँखों से अधिक हृदय की आवश्यकता होती है।

और मैं सोचता हूं—क्या सौंदर्य का यही अर्थ नहीं? बिना दिखावे के खिलना, बिना किसी शिकायत के झर जाना और फिर भी स्मृतियों में बने रहना? सहजन के फूल हमें यही सिखाते हैं—कि हर अंत के भीतर एक नयी शुरुआत छुपी होती है और हर गिरावट में एक नई उड़ान की संभावना।

सहजन के फूलों में कोई आग्रह नहीं। वे झरने से पहले भी उतने ही निश्चल रहते हैं, जितने शाख पर खिलते समय। कोई आकर्षण नहीं, कोई स्वप्निल रंग नहीं, फिर भी उनका अस्तित्व मिट्टी की सबसे गहरी परत तक अपनी पहचान छोड़ जाता है। वे जैसे किसी आत्मलीन कवि की पंक्तियां हों—नित्य, मौन लेकिन भीतर से उद्दीप्त।

कभी-कभी मैं उन्हें देखता हूँ और सोचता हूँ—क्या प्रेम भी ऐसा ही नहीं होना चाहिए? न कोई आडंबर, न कोई स्वर, बस एक अव्यक्त उपस्थिति। सहजन के फूल प्रेम की तरह गिरते हैं—बिना कोई भार छोड़े लेकिन जिनके होने की अनुभूति देर तक बनी रहती है। जैसे किसी ने जाते-जाते हल्के से माथे पर हाथ रख दिया हो, जैसे किसी ने बिना कुछ कहे कोई वचन दे दिया हो।

रात के अंतिम प्रहर में, जब ओस की बूंदें पत्तों से टपकती हैं, सहजन के फूलों की सफेदी चांदनी से मिलकर और भी उजली हो जाती है। वे ठहरे हुए समय की तरह लगते हैं—न पूरी तरह बीते हुए, न आने वाले समय का हिस्सा। वे उस क्षण में होते हैं, जहां स्मृति और भविष्य के बीच का अंतर मिट जाता है। कोई उन्हें देखकर नहीं ठहरता, कोई उनकी खुशबू को उधार नहीं लेता। फिर भी वे निरंतर खिलते हैं, गिरते हैं और किसी और वसंत में लौट आने के लिए मिट्टी में घुल जाते हैं। यह एक अनिवार्य चक्र है—एक चुपचाप बहती हुई धारा, जो जानती है कि लौटना ही उसका धर्म है। और शायद, यही सहजन के फूलों की अंतिम सीख है—सौंदर्य केवल दिखने में नहीं, बल्कि खो जाने में भी है। गिरकर भी महकने में है और मिट्टी में मिलकर भी किसी नए स्वरूप में लौटने में।

(लेखक, नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं। वास्तविक नाम रवींद्र नाथ श्रीवास्तव है।)

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