राजस्थान में साहित्य अकादमियों का नहीं है कोई धणी धोरी

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बाल मुकुन्द ओझा

लगता है सरकारों ने साहित्य, संस्कृति और कला से अपना मुंह मोड़ लाया है। इसका एक ताज़ा उदाहरण राजस्थान है। पिछली गहलोत सरकार का अनुसरण करते हुए वर्तमान भजन लाल सरकार ने भी इस दिशा में अपनी कोई रूचि प्रदर्शित नहीं की है। राज्य में भजन लाल शर्मा सरकार के गठन के दो साल बाद भी प्रदेश की साहित्य कला, भाषा और संस्कृति के उन्नयन के लिए गठित एक दर्ज़न से अधिक अकादमियों में सन्नाटा पसरा है। अकादमियों में व्याप्त इस सन्नाटे को अगर जल्द नहीं तोड़ा गया तो इसका असर बहुत गहरा होगा। राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. दुलाराम सहारण ने गत वर्ष मुख्यमंत्री भजनलाल को एक खुला पत्र लिखकर राज्य की साहित्यिक और सांस्कृतिक अकादमियों की बदहाल स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने अकादमियों को पुनः सक्रिय करने और साहित्यकारों-कलाकारों के सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए 20 महत्वपूर्ण सुझाव पेश किए हैं। इस पत्र पर आज तक कोई संज्ञान नहीं लिया गया।

स्वस्थ, रचनात्मक और सुसंस्कृत समाज की स्थापना के लिए शिक्षा, साहित्य, कला संगीत और भाषा की बेहतरी बहुत ज़रूरी है। देश और प्रदेश में सर्वांगीण विकास के साथ साहित्य – संस्कृति का उन्नयन मानव की बेहतर जिंदगी के लिए आवश्यक है। इसे ध्यान में रखते हुए साहित्य, कला, भाषा और संगीत अकादमियों का गठन किया गया था। मगर धीरे धीरे ये संस्थाएं सरकारी बेरुखी का शिकार होती गई। सरकारें बदलती गई मगर इस दिशा में कोई अपेक्षित सुधार परिलक्षित नहीं हुआ। हम बात कर रहे है राजस्थान की जहां सरकारी बेरुखी साहित्य, कला, भाषा और संगीत अकादमियों पर भारी पड़ रही है। गहलोत सरकार के दौरान गठित अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारी नई सरकार के गठन के बाद अपना इस्तीफ़ा दे चुके है मगर भजन लाल सरकार एक लम्बे अर्से बाद भी अब तक इन अकादमियों को पुनर्गठित नहीं कर पायी है जिससे सम्बंधित सभी प्रकार की गतिविधियां ठप्प पड़ी है। कला,संस्कृति और साहित्य के बिना जीवन अधूरा है। इसीलिए किसी भी देश, प्रदेश, सरकार और समाज को वहां की संस्कृति, कला साहित्य को बढ़ावा देने के लिए समुचित प्रयास करने होंगे। राज्य सरकार की अकादमियों के प्रति इस बेरुखी से प्रदेश भर के साहित्य और संस्कृति कर्मियों में भारी रोष व्याप्त है। एक जानकारी के मुताबिक राजस्थान संगीत नाटक अकादमी ,राजस्थान ललित कला अकादमी, राजस्थान साहित्य अकादमी, राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी, राजस्थान उर्दू अकादमी, राजस्थान सिंधी अकादमी, राजस्थान संस्कृत अकादमी, राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी एवं राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी, बाल साहित्य अकादमी, पंजाबी अकादमी, आदि प्रशासनिक अधिकारियों के हवाले है। अध्यक्ष, सचिव और सदस्यों की नियुक्तियां नहीं होने से प्रशासनिक अधिकारियों के भरोसे चल रही अकादमियां कलाकारों और विद्वानों के लिए पुरस्कार समारोह के आयोजन, ग्रंथों के प्रकाशन के साथ ही नीतिगत निर्णय नहीं ले पा रही हैं। पिछली गहलोत सरकार के दौरान भी कई वर्षों तक अकादमियों में नियुक्तियां नहीं हुई थी। इन स्वायत्तशाषी संस्थाओं का प्रमुख उद्देश्य, क्षेत्रीय भाषाओं और लोक साहित्य का संरक्षण, कलाकारों, लेखकों और साहित्यकारों को प्रोत्साहन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, संगोष्ठियों, नाट्य महोत्सवों का आयोजन, पारंपरिक लोककलाओं को आधुनिक मंच देना,  युवा पीढ़ी में रुचि और चेतना पैदा करना हैं। राज्य सरकार की उपेक्षा के कारण कलाकारों, शोधार्थियों और संस्कृति क्षेत्र से जुड़े लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इससे कला, साहित्य,  भाषा, संगीत  और संस्‍कृत‍ि से जुड़ी अकादम‍ियों के कार्य प्रभाव‍ित हो रहे हैं। इन संस्थाओं के लेखकों और कला प्रेम‍ियों के जुड़े होने से न‍िराशा का सामना करना पड़ रहा है।

राजस्थान अपनी आन, बान,शान, शौर्य, साहस, कुर्बानी, त्याग, बलिदान तथा वीरता के लिए सम्पूर्ण विश्व में ख्यात है। कला, साहित्य और सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि विश्व में अपनी अलग पहचान रखती है। राजस्थान को भारतीय संस्कृति का गौरव कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहाँ की स्थापत्य कला, संगीत, नृत्य, लोकगीत, वेशभूषा, हस्तशिल्प, वीर-प्रथाएँ, लोक कथाएँ और बोलियाँ — ये सभी भारत की विविधता में एकता का भव्य उदाहरण हैं। यहाँ ढोला-मारू की प्रेमगाथा है, तेजाजी महाराज की लोक आस्था है, मांड और पिंगल जैसी काव्य विधाएँ हैं। मेवाड़, मारवाड़, हाड़ौती, शेखावाटी आदि क्षेत्रों की अपनी-अपनी सांस्कृतिक पहचान है। राजस्थान की कला और संस्कृति विश्वभर में प्रसिद्ध है। हमारी समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं से पूरी दुनिया प्रभावित है। राजस्थान साहित्य और संस्कृति के साथ त्योहारों और मेलों के लिए विश्व विख्यात है जो आमजन को कोई न कोई सन्देश देते है। इस सांस्कृतिक सम्पदा को संरक्षित करने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य अकादमियों, संस्कृति विभागों और साहित्य संस्थानों का होता है। लेकिन जब वही संस्थान निष्क्रिय हो जाएँ या खाली पड़े हों, तो यह सम्पदा दम तोड़ने लगती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि अकादमियों में बिना भेदभाव के योग्य साहित्यकार, लेखक,  संस्कृतकर्मी और कलाकारों की नियुक्ति की जाये ताकि नए प्रतिभाशाली लोगों को उनका समुचित सम्मान और प्रत्साहन मिले।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी .32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

        

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