रक्त की कमी बन रही चुनौती, आयुर्वेद में 7 दिन में दिखता है असर

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भोपाल, 24 जनवरी (हि.स.)। भोजन में पौष्टिकता की कमी आज देश में एक गंभीर, लेकिन अनदेखा करने वाली स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। खासतौर पर बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और कामकाजी महिलाओं में रक्त की कमी यानी एनीमिया आम बात हो गई है। चिकित्‍सकों ने भागदौड़ भरी जिंदगी, फास्ट फूड पर बढ़ती निर्भरता, समय पर भोजन न करना और पोषक तत्वों से भरपूर आहार का अभाव इसके मुख्य कारण बताए गए हैं।

आमतौर पर ऐसे लक्षण दिखने पर डॉक्टर आयरन की गोलियां या सिरप लेने की सलाह देते हैं, ताकि शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ाया जा सके। पर इस बीच कई मामलों में देखा गया है कि लंबे समय तक दवा लेने के बावजूद भी शरीर एनीमिया की समस्या से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाता। इसकी वजह आयुर्वेद में साफ बताई गई है, कमजोर पाचन शक्ति और गलत जीवनशैली।

इस विषय पर आयुर्वेद चिकित्सा अधिकार डॉ. दीपक रघुवंशी ने शनिवार को जानकारी दी, “एनीमिया में आयरन की कमी मानकर दवा देना अधूरा इलाज है। जब तक शरीर की पाचन अग्नि ठीक नहीं होगी और खानपान संतुलित नहीं होगा, तब तक आयरन शरीर में सही तरीके से अवशोषित नहीं हो पाएगा।” वहीं आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. रितिका सिंह का कहना है, “आयुर्वेद शरीर को संपूर्ण रूप से देखता है। यहां रक्त की कमी दूर करने के उपाय प्राकृतिक, सुरक्षित और लंबे समय तक असर करने वाले होते हैं। यदि व्यक्ति सात दिन भी सही तरीके से आयुर्वेदिक नियमों का पालन करता है तो शरीर में सकारात्मक बदलाव दिखने लगते हैं।”

इस संबंध में डॉ. दीपक रघुवंशी का कहना यह भी है कि आयुर्वेद में रक्त की कमी दूर करने के लिए घरेलू चीजों को अपने नित्‍य आहार में शामिल करने के लिए कहा गया है, जो आसानी से हर रसोई में उपलब्ध होती हैं, लेकिन उनके गुणों के बारे में कम लोग जानते हैं। रक्त की कमी होने पर रात में दो से चार मुनक्का और दो अंजीर पानी में भिगोकर सुबह खाली पेट सेवन करना चाहिए। इससे शरीर को प्राकृतिक आयरन, फाइबर और ऊर्जा दिनभर के लिए पर्याप्‍त मात्रा में मिलती है। इसके अलावा लौह भस्म को शुद्ध शहद में मिलाकर चाटने से आयरन का अवशोषण तेजी से होता है। सुबह खाली पेट सफेद पेठे और आंवला का रस पीना भी बेहद लाभकारी माना गया है, क्योंकि आंवला विटामिन-सी का अच्छा स्रोत है, जो आयरन को शरीर में घुलने में मदद करता है।

इसके साथ ही उन्‍होंने सावधानी को लेकर साफ कहा है कि एक बार जरूर आयुर्वेद चिकित्‍सा प्रयोग करने के पूर्व अपने आसपास मौजूद अथवा जहां आसानी से संपर्क हो सके, जिलों में बने आयुर्वेद शासकीय चिकित्‍सालय में जाना चाहिए, वहां चिकित्‍सक को स्‍वास्‍थ्‍य परीक्षण करने के बाद अपने लिए औषधी की मात्रा निर्धारित करवालेना चाहिए। वहीं, डॉ. रितिका सिंह का कहना है कि “तिल और गुड़ का नियमित सेवन आयुर्वेद में रक्तवर्धक माना गया है। सर्दियों में इसका सेवन विशेष रूप से लाभ देता है।” वहीं रात के समय गुनगुने पानी के साथ त्रिफला चूर्ण लेने से आंतों की सफाई होती है, कब्ज दूर होती है और शरीर पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से ग्रहण कर पाता है।

उन्‍होंने बताया कि हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, मेथी, सरसों, चौलाई और सहजन की पत्ती व डंडी रक्त निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। चुकंदर को कच्चा, उबालकर या सलाद के रूप में शामिल किया जा सकता है। फलों में अनार, अंगूर, सेब और खजूर का सेवन हीमोग्लोबिन बढ़ाने में सहायक है। इसके साथ ही अंकुरित अनाज, दालें और देसी चना भी आहार में शामिल करना चाहिए। वहीं, दिन के समय छाछ का सेवन पाचन को मजबूत करता है और शरीर को ठंडक देता है।

डॉ. दीपक रघुवंशी बताते हैं, “जब पाचन ठीक रहता है, तभी शरीर आयरन और अन्य खनिजों को सही मात्रा में ग्रहण कर पाता है।” साथ ही भोजन करते समय जल्दबाजी से बचना और शांत मन से खाना भी उतना ही जरूरी है। अत्यधिक हरी मिर्च, बैंगन, बहुत ज्यादा खट्टे फल, तली-भुनी चीजें और पैक्ड खाद्य पदार्थ या कोल्ड ड्रिंक शरीर में रक्त की कमी को बढ़ा सकते हैं। ये चीजें न सिर्फ पाचन तंत्र को कमजोर करती हैं, बल्कि आयरन के अवशोषण में भी बाधा डालती हैं, इसलिए इनका उपयोग दैनन्‍दिन जीवन में कम से कम होना चाहिए।

इसके अलावा नियमित पर्याप्त नींद, हल्का योग और प्राणायाम को दिनचर्या में शामिल करना चाहिए। अनुलोम-विलोम और भस्त्रिका जैसे प्राणायाम रक्त संचार को बेहतर बनाते हैं और शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाते हैं। उन्‍होंने कहा है कि जीवन में कुछ नियमों का पालन किया जाए तो न सिर्फ एनीमिया की समस्या से राहत मिलती है, बल्कि शरीर में ऊर्जा, स्फूर्ति और रोगों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ती है। यह उपाय दवाओं पर निर्भरता कम करते हुए शरीर को प्राकृतिक रूप से स्वस्थ बनाने में मदद करते हैं।

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