यूनानी अर्थशास्त्री ने दुनिया को सुनाई भारत की अनूठी विकास गाथा

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

इक्कीसवीं सदी की वैश्विक राजनीति सैन्य ताकत, खुले टकराव या वैचारिक ध्रुवीकरण तक सीमित नहीं रह गई है। यह सदी उन देशों की भी है, जिनके लिए युद्ध, धमकी और विचारधारात्मक वर्चस्व कोई मायने नहीं रखता है, ये तो अपनी उपयोगिता, विश्वसनीयता और साझीदारी-क्षमता से शक्ति अर्जित कर रहे हैं। दरअसल हाल ही में यूट्यूब पर सामने आए एक वीडियो में प्रसिद्ध यूनानी अर्थशास्त्री और राजनेता यानिस वारुफाकिस का एक तटस्थ विश्लेषण इसी तथ्य को रेखांकित कर रहा है। यह वीडियो 29 दिसंबर 2025 को अपलोड हुआ है और इसमें भारत की एक वैश्विक शक्ति बनने की खामोशी से चल रही यात्रा को बेहद बारीक अवलोकन के साथ प्रस्तुत किया गया है।

इस विश्लेषण का केंद्रीय तर्क यह है कि 21वीं सदी की सबसे परिपक्व और प्रभावी “महाशक्ति रणनीति” किसी अमेरिका या चीन की नहीं है, वह भारत की है। भारत को इन्‍होंने सिर्फ एक उभरती अर्थव्यवस्था होने तक स्‍वीकार भर नहीं किया है, वे इससे आगे की बात करते हैं और एक ऐसे रणनीतिक खिलाड़ी के रूप में देखते हैं जो अनेक देशों के साथ एक साथ कई शक्ति केंद्रों में समानांतर रिश्ते निभाते हुए भी अपनी निर्णय-स्वतंत्रता से समझौता नहीं करता है। यही वह बिंदु है, जहाँ भारत पारंपरिक महाशक्ति मॉडल से अलग दिखाई देता है।

वीडियो में भारत की विदेश नीति को “स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी” यानी रणनीतिक स्वायत्तता का आदर्श उदाहरण बताया गया है। भारत एक ओर क्वाड का सदस्य है, जहाँ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सुरक्षा सहयोग करता है तो दूसरी ओर ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य होकर चीन और रूस के साथ आर्थिक-राजनीतिक मंच साझा करता है। सामान्यतः यह स्थिति ‘असंभव’ मानी जाती है, क्योंकि ये दोनों गुट वैश्विक राजनीति में प्रतिद्वंद्वी समझे जाते हैं। किंतु भारत ने दिखा दिया है कि स्पष्ट प्राथमिकताओं और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ यह संतुलन संभव है और लाभकारी भी।

यहाँ एक महत्वपूर्ण तुलना सामने आती है। अमेरिका अपने साझीदारों से वफादारी की अपेक्षा करता है और चीन अपने सहयोगियों से अधीनता। भारत इसके उलट संप्रभु समानता और आपसी हितों पर आधारित साझीदारी की बात करता है। यही कारण है कि वह सहयोग करता है पर न किसी के अधीन होता है न किसी को अधीन करता है। यह शैली भारत को दबाव-मुक्त बनाती है और वैश्विक राजनीति में उसे एक अलग पहचान देती है।

ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और निर्माण का नया केंद्र

ऊर्जा नीति इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। 2024 में पश्चिमी प्रतिबंधों और दबावों के बावजूद भारत ने रूस से रिकॉर्ड स्तर पर सस्ता कच्चा तेल खरीदा, जिससे उसकी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 40 प्रतिशत पूरा हुआ। इससे भारतीय उपभोक्ताओं को अरबों डॉलर की बचत मिली। पश्चिमी देशों ने इसे “सैंक्शन बस्टिंग” कहा। वहीं भारत ने इसे व्यावहारिक और जनहितकारी “स्मार्ट इकोनॉमिक्स” के रूप में प्रस्तुत किया। इसी दौरान अमेरिका और यूरोप के साथ रक्षा, सेमीकंडक्टर और हाई-टेक सहयोग भी जारी रहा। यानिस वारुफाकिस की भाषा में कहें तो यही संतुलित बहुपक्षवाद है।

विनिर्माण के क्षेत्र में भी भारत किसी से टकराव नहीं करता है, आकर्षण की नीति पर चल रहा है। Apple का चीन के बाहर सबसे बड़ा iPhone उत्पादन भारत में होना, Samsung का भारत को वैश्विक निर्माण केंद्र बनाना और Tesla की प्रस्तावित फैक्ट्री वस्‍तुत: ये सभी संकेत हैं कि भारत “वर्ल्ड फैक्ट्री” बनने की दिशा में चुपचाप आगे बढ़ रहा है। महत्वपूर्ण यह है कि भारत अब केवल असेंबली नहीं, बल्कि डिजाइन, शोध और नवाचार का केंद्र भी बन रहा है। Google की AI रिसर्च, Microsoft की क्लाउड डेवलपमेंट और Amazon की लॉजिस्टिक इनोवेशन का भारत की ओर आना इसी “इंटेलेक्चुअल कैपिटल माइग्रेशन” का प्रमाण है।

जनसांख्यिकी और बाजार की निर्णायक ताकत

भारत की दीर्घकालिक शक्ति उसकी जनसांख्यिकी में निहित है। 60 करोड़ से अधिक युवा जनसंख्‍या के साथ आज भारत आगे बढ़ रहा है, जबकि चीन, जापान और यूरोप वृद्धावस्था और श्रम-कमी से जूझ रहे हैं। हर वर्ष भारत से निकलने वाले इंजीनियर, डॉक्टर और प्रोग्रामर संख्या में अधिक होने के साथ ही वैश्विक मानकों पर गुणवत्ता में भी प्रतिस्पर्धी हैं। यही कारण है कि Microsoft, Google, Adobe और IBM जैसी कंपनियों के शीर्ष नेतृत्व में भारतीय मूल के सीईओ दिखाई देते हैं। यह संयोग नहीं माना जाना चाहिए, यह तो उस शैक्षिक-सांस्कृतिक वातावरण का परिणाम है जोकि पूर्व और पश्चिम दोनों को समझने की क्षमता देता है।

साथ ही, यह युवा जनसंख्‍या भविष्य का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार भी है। जब ये करोड़ों युवा मध्यवर्गीय क्रय-शक्ति तक पहुँचेंगे, तब भारत का आंतरिक बाजार “मानव इतिहास का सबसे बड़ा बाजार” बन सकता है। उस समय वैश्विक कंपनियों के लिए भारतीय शर्तों को स्वीकार करना विकल्प नहीं, आवश्यकता होगी।

विविधीकृत निवेश और रक्षा संतुलन

भारत की आर्थिक और रक्षा रणनीति भी इसी बहुध्रुवीय सोच को दर्शाती है। विदेशी निवेश में भारत किसी एक देश पर निर्भर नहीं है। अमेरिकी टेक, यूरोपीय विनिर्माण, जापानी ऑटोमोबाइल और कोरियाई इलेक्ट्रॉनिक्स सब भारत के विकास-पोर्टफोलियो का हिस्सा हैं। कई अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश इसी रणनीतिक विविधीकरण का परिणाम है। रक्षा क्षेत्र में भी भारत अमेरिकी विमान, रूसी मिसाइल, फ्रांसीसी पनडुब्बी और इजरायली तकनीक एक साथ इस्तेमाल करता है। यह जटिलता भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सामरिक स्वतंत्रता का आधार और एक अनूठी सैन्य शक्ति की मजबूत बुनियाद है।

डिजिटल फाइनेंस और आकर्षण आधारित शक्ति

वीडियो में यानिस वारुफाकिस का कहना है कि भारत डिजिटल भुगतान, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक वित्तीय ढांचे विकसित कर रहा है, बिना डॉलर से टकराव किए। UPI इसका जीवंत उदाहरण है, जो वित्तीय लेन-देन में आज Visa और Mastercard से कहीं आगे निकल गया है और अब विकासशील देशों में इसे अपनाने की होड़ लग रही है। स्‍वभाविक तौर पर यह शक्ति दबाव से नहीं, आकर्षण से बनती है।

यानिस वारुफाकिस के निष्कर्ष को मानें तो यही कहना होगा कि पिछले 75 वर्षों की “या तो पूर्व या पश्चिम” वाली राजनीति के बीच भारत आज यह दिखा रहा है कि बहुध्रुवीय, बहु-भागीदारी वाला मॉडल वास्‍तविकता में संभव होने के साथ अधिक स्थायी भी है। बिना आक्रमण, बिना धमकी और बिना पक्ष चुनने की मजबूरी के भारत ने खुद को इतना मूल्यवान बना लिया है कि उस पर दबाव डालना बहुत कठिन हो गया है। यही भारत की असली शक्ति है और शायद यही 21वीं सदी की सबसे परिपक्व महाशक्ति रणनीति भी, जिसे लेकर भारत आज विश्‍व भर के देशों के साथ सीधा संवाद करता हुआ नजर आ रहा है।

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