भावनात्मक निर्भरता की मनोवैज्ञानिक पड़ताल है पुस्तक मीरा और महात्मा

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सुधीर कक्कड़ भारतीय समाज और मनोविज्ञान के विलक्षण अध्येता माने जाते हैं। उनकी पुस्तक “मीरा एंड द महात्मा” महात्मा गांधी और उनकी विदेशी अनुयायी मैडेलीन स्लेड—जो बाद में “मीरा बेन” के नाम से जानी गईं—के जटिल, आत्मिक और गहरे मानव संबंध पर प्रकाश डालती है। यह पुस्तक केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग का विवरण नहीं, बल्कि दो असाधारण व्यक्तित्वों के मध्य विकसित एक आध्यात्मिक मैत्री, विश्वास और भावनात्मक निर्भरता की मनोवैज्ञानिक पड़ताल भी है। कक्कड़ इस संबंध को अत्यंत संवेदनशीलता और विश्लेषणात्मक दृष्टि से समझने का प्रयास करते हैं।

लेखक के अनुसार मीरा का गांधी से प्रथम परिचय उनके लेखन के माध्यम से हुआ। रस्किन और टॉल्स्टॉय के विचारों से प्रेरित मीरा को गांधी के लेखों में वही आध्यात्मिक धारा मिली, जिसकी तलाश उन्हें लंबे समय से थी। गांधी के जीवन की सरलता, सत्य के प्रति अडिगता और आत्मसंयम की साधना मीरा को गहरे तक प्रभावित करती है। कक्कड़ लिखते हैं कि मीरा अपने भीतर एक ऐसे “गुरु” की खोज कर रही थीं, जिनके माध्यम से वह आत्मिक शांति पा सकें। गांधी का व्यक्तित्व उन्हें इस खोज का उत्तर प्रतीत हुआ। 1925 में जब वह गांधी से मिलीं तो पहली ही भेंट में उनका मन दृढ़ हो गया कि वह अपना जीवन गांधी और उनके मिशन को समर्पित करेंगी।

गांधी ने मीरा को अपने आश्रम में स्वीकार किया, पर यह स्वीकार्यता केवल एक अनुयायी की नहीं थी। कक्कड़ बताते हैं कि गांधी मीरा में एक अत्यंत गंभीर, अनुशासित और तपस्विनी आत्मा देखते थे। उनके भीतर की निष्ठा और समर्पण गांधी को प्रभावित करते थे। मीरा ने स्वयं को पूरी तरह से गांधी के मार्ग में लगा दिया—चरखा, स्वच्छता, सेवा, सत्य और ब्रह्मचर्य—उन्होंने आश्रम जीवन की सारी कठिनाइयाँ अत्यंत सहजता से अपनाई।

सुधीर कक्कड़ इस संबंध का विश्लेषण मनोवैज्ञानिक सन्दर्भ में करते हुए बताते हैं कि मीरा के लिए गांधी “मास्टर” से अधिक एक आध्यात्मिक पिता-तुल्य थे। वह अपने जीवन के हर निर्णय, हर भाव, हर उलझन में गांधी से मार्गदर्शन चाहती थीं। उनके लिए गांधी का सान्निध्य किसी भक्ति की चरम अनुभूति जैसा था। गांधी ने भी मीरा के इस विश्वास को स्नेह और सहानुभूति के साथ ग्रहण किया। वह मीरा की आध्यात्मिक खोज को सम्मानित करते थे और उन्हें एक तपस्विनी साधक के रूप में देखते थे।

कक्कड़ यह भी बताते हैं कि मीरा का यह समर्पण अक्सर आश्रमवासियों के लिए उलझन का कारण बना। कई लोगों को ऐसा लगता था कि मीरा की गांधी से अत्यधिक निकटता अनुचित है। परंतु गांधी हमेशा इस संबंध को पूर्ण पारदर्शिता और आत्मिकता के स्तर पर ही देखते थे। उन्होंने मीरा के प्रति अपने स्नेह को कभी भी व्यक्तिगत मोह में बदलने नहीं दिया। गांधी का जीवन ब्रह्मचर्य-व्रत से बँधा हुआ था और वह हर संबंध को आत्मिक शुचिता के दायरे में ही रखते थे।

इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि कक्कड़ गांधी और मीरा के संबंध को किसी भी सनसनीखेज ढंग से प्रस्तुत नहीं करते। वह इसे एक गहरे मानवीय और आध्यात्मिक संबंध के रूप में देखते हैं, जहाँ दो व्यक्तित्व एक-दूसरे के भीतर के प्रकाश को पहचानते हैं। गांधी के लिए मीरा सत्य और तप की साधना में एक विश्वसनीय सहयोगी थीं। वहीं मीरा के लिए गांधी उनकी आध्यात्मिक यात्रा के अंतिम पूर्वज—एक ऐसे व्यक्ति—जिसके माध्यम से वह स्वयं को पहचान पा रही थीं।

कक्कड़ यह भी बताते हैं कि इस संबंध में एक प्रकार का भावनात्मक तनाव भी था। मीरा अक्सर गांधी से बेहद निकट रहने की इच्छा रखती थीं। वह चाहती थीं कि गांधी उनके समर्पण को उसी तीव्रता से समझें। गांधी कई बार उन्हें संयम और दूरी की सीख देते थे। यह दूरी गांधी की आत्मिक साधना का अंग थी। मीरा इस दूरी को कभी-कभी भावनात्मक वेदना के रूप में अनुभव करती थीं। पुस्तक में मीरा के पत्रों और गांधी की प्रतिक्रियाओं के माध्यम से इस भावनात्मक द्वंद्व को संवेदनशीलता से उकेरा गया है।

मीरा का गांधी के जीवन पर प्रभाव भी कम नहीं था। उनकी दृढ़ निष्ठा, शुचिता और कार्य के प्रति समर्पण ने आश्रम के कई कामों को दिशा दी। स्पिनिंग, संगीत, अहिंसा के प्रचार और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों में मीरा का योगदान उल्लेखनीय रहा। वह गांधी की यात्राओं में साथ रहीं और कई कठिन चरणों में उनका समर्थन करती रहीं।

कक्कड़ यह भी दर्शाते हैं कि गांधी के प्रति मीरा की निष्ठा केवल व्यक्ति-पूजा नहीं थी। यह एक विचार के प्रति समर्पण था—एक ऐसे भारत के प्रति, जिसे गांधी सत्य, अहिंसा और स्वावलंबन के आधार पर गढ़ना चाहते थे। मीरा ने न केवल इस विचार को समझा, बल्कि उसे अपने जीवन का ध्येय बना लिया।

अंततः, गांधी और मीरा का संबंध गुरु-शिष्य, पिता-पुत्री, मित्र और साधक-साधिका—इन सभी रूपों का एक अनोखा संगम था। कक्कड़ की व्याख्या यह समझने में सहायता करती है कि यह संबंध मनुष्य के भीतर की गहन आध्यात्मिक आकांक्षाओं और भावनात्मक आवश्यकताओं से कैसे आकार लेता है। यह संबंध इतिहास का हिस्सा भर नहीं, दो आत्माओं का संवाद था—जहाँ मीरा ने गांधी के माध्यम से स्वयं को पहचाना, और गांधी ने मीरा में एक सच्चे साधक का चेहरा देखा।

इस प्रकार सुधीर कक्कड़ की “मीरा एंड द महात्मा” मीरा और गांधी के संबंधों को किसी सरल परिभाषा में सीमित न करके, उसे एक मानवीय, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक गहराई से परिचित कराती है—जो भारतीय इतिहास की सबसे अनूठी और प्रेरक कहानियों में से एक है।

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