भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल : जीवन, दर्शन और विरासत

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भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल भारतीय राजनीति के उन सधे, शांत, चिंतनशील और दूरदर्शी नेताओं में से एक थे जिन्होंने न सिर्फ भारत की विदेश नीति को नई दिशा दी, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की मर्यादा को भी सर्वोच्च स्थान दिया। उनका जीवन संघर्ष, आदर्शवाद, विद्वत्ता और कूटनीतिक कौशल का ऐसा संगम था जिसने उन्हें विश्व समुदाय में सम्मान दिलाया। गुजराल की सबसे महत्वपूर्ण पहचान उनकी ‘गुजराल सिद्धांत’ के रूप में है, जिसने दक्षिण एशिया में भारत की पड़ोसी नीति को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। 1919 में अविभाजित पंजाब के झेलम (अब पाकिस्तान) में जन्मे इंद्र कुमार गुजराल आज़ादी के आंदोलन से प्रभावित रहे और युवावस्था में ही राजनीतिक चेतना से ओत-प्रोत हो गए थे।

गुजराल का आरंभिक राजनीतिक जीवन कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ाव और स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान जेल यात्राओं से होकर गुजरा। विभाजन के बाद वे परिवार सहित भारत आ गए और भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने लगे। उनकी शिक्षा, विद्वत्ता, शालीन व्यवहार और गहरी वैचारिक समझ उन्हें अन्य नेताओं से अलग पहचान दिलाती थी। वे उन विरले नेताओं में शामिल थे जिन्हें पढ़ने-लिखने का गहरा शौक था और जिनकी राजनीति विचारों पर आधारित थी, न कि शोर-शराबे पर। यही कारण था कि वे राजनीति में एक ‘जेंटलमैन स्टेट्समैन’ के रूप में जाने जाते थे।

स्वतंत्र भारत में इंद्र कुमार गुजराल ने अनेक महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे सांसद, सूचना एवं प्रसारण मंत्री, विदेश मंत्री और अंततः 1997 में भारत के 12वें प्रधानमंत्री बने। सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में उन्होंने सेंसरशिप की जगह रचनात्मक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहन दिया और दूरदर्शन-आकाशवाणी के आधुनिकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। परंतु उनकी सबसे बड़ी पहचान कूटनीति में उनके महत्वपूर्ण योगदान से बनी। वे स्वाभाविक रूप से एक विचारवान और सधे हुए राजनयिक थे।

1997 में गठबंधन सरकार के दौर में गुजराल को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी मिली। यह वह समय था जब देश में गठबंधन राजनीति अपने शुरुआती दौर में थी और स्थिरता एक चुनौती थी। बावजूद इसके, गुजराल ने अपने कार्यकाल में किसी भी तरह की राजनीतिक तकरार से दूर, संयमित और सकारात्मक नेतृत्व दिया। उनका कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा, परंतु प्रभाव अत्यंत गहरा रहा। एक ओर उन्होंने आंतरिक राजनीति में संतुलन बनाए रखने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर विदेश नीति के मोर्चे पर भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया।

इंद्र कुमार गुजराल को सबसे अधिक याद किया जाता है ‘गुजराल डॉक्ट्रिन’ के लिए। यह सिद्धांत पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंधों को विश्वास, सद्भावना और बिना शर्त सहयोग पर आधारित करने की परिकल्पना था। इस सिद्धांत के अनुसार भारत को अपने छोटे पड़ोसी देशों—नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव—के साथ संबंधों में बड़े-भाई वाली भूमिका निभाने के बजाय एक सहयोगी की तरह आगे आना चाहिए। गुजराल का मानना था कि दक्षिण एशिया में स्थिरता और विकास तभी संभव है जब भारत अपने पड़ोसियों के साथ संवाद, विश्वास और सहयोग को बढ़ावा दे। उनके इस दृष्टिकोण ने क्षेत्रीय राजनीति में सकारात्मक संदेश भेजा और भारत की छवि को मजबूत बनाया।

गुजराल की विदेश नीति में पाकिस्तान के साथ संवाद भी महत्वपूर्ण पहलू था। विभाजन की पीड़ा को व्यक्तिगत रूप से महसूस करने वाले गुजराल दोनों देशों के बीच बेहतर संबंधों के प्रबल समर्थक थे। वे मानते थे कि स्थायी शांति के लिए संवाद ही विकल्प है। उनके प्रयासों से कुछ समय के लिए विश्वास का माहौल बना, हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों ने इसे अधिक समय तक टिकने नहीं दिया। फिर भी, उनका दृष्टिकोण आज भी भारत-पाकिस्तान संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु माना जाता है।

इंद्र कुमार गुजराल न सिर्फ राजनेता थे, बल्कि साहित्य, कला और संस्कृति में भी उनकी गहरी रुचि थी। वे उर्दू साहित्य के प्रेमी थे और कई कवियों के साथ उनकी घनिष्ठता थी। उनकी वाणी में शालीनता, तर्क और विनम्रता का अद्भुत मेल था। वे उन नेताओं में शामिल थे जो राजनीति को जनसेवा और बौद्धिक दायित्व के रूप में देखते थे। सार्वजनिक जीवन में उनका व्यवहार सौम्य, विवादहीन और आदर्शवादी रहा।

प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद भी गुजराल सक्रिय रहे और उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘मैटर्स ऑफ डिस्क्रेशन’ लिखी, जिसमें उन्होंने राजनीति, कूटनीति और अपने अनुभवों का विस्तृत विश्लेषण किया। 30 नवंबर 2012 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी नीतियाँ और विचार आज भी प्रासंगिक हैं।

इंद्र कुमार गुजराल की विरासत उनके बड़े-बड़े राजनीतिक भाषणों में नहीं, बल्कि उनकी सरलता, विचारधारा और शांत कूटनीति में निहित है। वे ऐसे नेता थे जिन्होंने सत्ता को कभी लक्ष्य नहीं बनाया, बल्कि साधन के रूप में देखा। उनकी विदेश नीति का दृष्टिकोण भारत की कूटनीति में आज भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। गुजराल ने दिखाया कि कभी-कभी नरम शब्द, संयम और सद्भावना भी वही काम कर सकते हैं जो कठोर कूटनीति नहीं कर पाती। उनका जीवन आधुनिक भारतीय राजनीति में एक ऐसी मिसाल है जो आदर्शवाद, शालीनता और विवेकशील नेतृत्व का प्रतीक बनकर हमेशा याद किया जाएगा।

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