देश के मुस्लिम समाज ने खुद को कुछ राजनैतिक दलों का वोट बैंक बना दिया

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इसमें कोई शक नहीं कि देश के मुस्लिम समाज ने खुद को कुछ राजनैतिक दलों का वोटबैंक बना दिया है । उन्हें आरएसएस का ऐसा खौफ दिखाया गया कि मुस्लिमों ने पहले कांग्रेस और अब विपक्षी दलों का वोटबैंक बनने में ही भलाई समझी । नतीजा सामने है । वे आज तक भी राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ नहीं पाए । बिहार में मुस्लिम बिरादरी ने तेजस्वी से उप मुख्यमंत्री का पद मांगा था । लेकिन तेजस्वी ने यह पद नवरात्र में अपने साथ मछली खाकर वीडियो पोस्ट करने वाले मुकेश सहनी को दे दिया ।

तेजस्वी को पता है कि मुस्लिम वोटर कहां जाएगा , कुछ दो न दो वोट तो लाइन लगाकर हमें ही देने को मजबूर है । उन्होंने मुकेश सहनी को जोड़ लिया ताकि अति पिछड़ों के वोट तो मिल जाएं । दरअसल भारत के मुस्लिम समाज ने आजादी के 78 सालों में बीजेपी , आरएसएस विरोध के चलते खुद को एक दायरे में कैद कर लिया है । इसका फायदा कांग्रेस , लालू , अखिलेश , ममता आदि खूब उठा रहे हैं । आश्चर्य की बात है कि इन सभी दलों के अध्यक्ष हिन्दू हैं । मुस्लिम समाज स्वेच्छा से वोटबैंक बन गया और इसी में अपनी जीत समझता है ।

उन्हें फिक्र नहीं कि इस हाल में मुस्लिम कभी भी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे , बस विरोधी हिन्दू नेताओं के पिछलग्गू बनकर रह जाएंगे । कोई पार्टी मुसलमान को पीएम या सीएम छोड़िए , प्रदेश अध्यक्ष तक नहीं बनाती । फिर भी पिछली कतार में खड़ा होकर मुस्लिम समाज खुश है कि वह भाजपा को रोक देगा । हालांकि ऐसा कुछ होता नहीं । आज 20 राज्यों में बीजेपी की सरकार है और 11 वर्षों से केन्द्र पर बीजेपी का कब्जा है । मुस्लिमों के पास एक मात्र राष्ट्रीय नेता हैं असाउद्दीन ओवैसी । वे मुस्लिमों के हितों के साथ साथ राष्ट्रीय विचारधारा का भी समन्वय करते हैं । लेकिन हैदराबाद के अलावा कहीं भी मुस्लिम उन्हें वोट नहीं देते ।

है न अजीबोगरीब विडंबना ? मुस्लिमों को कांग्रेस ने तो 1947 से वोटबैंक बनाया ही , उन पार्टियों ने भी बना लिया जिनका जन्म कांग्रेसवाद के खिलाफ हुआ । मुस्लिम समाज बिना कुछ सोचे समझे विपक्षी बैंक बनता चला गया । बीजेपी हो या संघ ; किसी के भी मंच से मुस्लिमों के खिलाफ कभी कुछ नहीं कहा गया । मोहन भागवत तो मदरसों और मस्जिदों में भी चले जाते हैं । बीजेपी सरकारों ने मुसलमानों को वे सभी सुविधाएं यथावत प्रदान की जो अन्य को प्राप्त है ।

लेकिन 5/6% से अधिक मुस्लिम वोट बीजेपी को कभी नहीं मिले । ठीक है जिसे जो भाए वह करने की सुविधा इस देश में है । लेकिन देश की मुख्यधारा में आना है तो मुसलमानों को वोटबैंक बनने से बचना होगा । समझ लीजिए , देश में लोकतंत्र है और कोई पार्टी चाहकर भी किसी समाज का अहित नहीं कर सकती । मुसलमानों को खुद को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ना होगा । किसी का वोटबैंक बने रहने की मजबूरी मत पालिए । यकीन मानिए देश के मुस्लिम समाज ने जिस दिन से वोटबैंक बनाने की जंजीरों को तोड़ फेंका उसी दिन से देश की राजनीति पूरी तरह बदल जाएगी । आखिर 78 साल बाद भी नई सुबह नहीं हुई तो फिर कब होगी ?

……कौशल सिखौला

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