
दिग्गज मसाला कंपनी एमडीएच (MDH) के मालिक पद्मश्री भारतीय उद्यम, संघर्ष और सामाजिक जिम्मेदारी का एक अद्भुत प्रतीक माने जाते हैं। उनका जीवन बताता है कि कठिन परिस्थितियाँ भी इंसान को रोक नहीं सकतीं, यदि मन में लगन, ईमानदारी और आगे बढ़ने का साहस हो। धर्मपाल गुलाटी न केवल मसाला उद्योग के सफल व्यवसायी थे, बल्कि समाज सेवा में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। नीचे उनका जीवन परिचय और समाज के प्रति उनकी भूमिका सरल (ऑर्थो) शब्दों में प्रस्तुत है।
धर्मपाल गुलाटी का जन्म 27 मार्च 1923 को पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ। उनके पिता का एक छोटा सा मसालों का कारोबार था, जिसका नाम “महाशियां दी हट्टी” था। बचपन से ही धर्मपाल जी पढ़ाई में अधिक मन नहीं लगाते थे। वे कुछ कक्षाओं तक पढ़कर ही व्यापार के प्रति आकर्षित होने लगे थे। अपने पिता की दुकान पर बैठकर लोगों के बीच मसाले बेचते हुए उन्होंने व्यापार की बारीकियाँ सीखीं। उनका स्वभाव सरल था और ईमानदारी उनकी पूँजी थी।
सन् 1947 में बंटवारे के समय उनका परिवार पाकिस्तान छोड़कर भारत आया। शुरू के दिन बहुत मुश्किलों से भरे थे। उन्होंने दिल्ली में पहले तांगा चलाया, क्योंकि आजीविका चलाने के लिए तुरंत कोई काम जरूरी था। कुछ समय बाद उन्होंने अपने पुराने काम की पहचान को फिर से जी उठाने का निश्चय किया और करोल बाग में मसाले बेचने की छोटी सी दुकान खोल दी। यही दुकान आगे चलकर प्रसिद्ध “एमडीएच मसाले” के रूप में दुनिया भर में मशहूर हुई। मेहनत, गुणवत्ता और ग्राहक भरोसे को अपनी नींव बनाकर धर्मपाल जी ने अपने कारोबार को देश-विदेश तक फैलाया।
एमडीएच मसाले की सफलता में उनका व्यक्तिगत समर्पण बहुत बड़ा कारण था। वे मसालों की साफ-सफाई, शुद्धता और स्वाद को सर्वोच्च महत्व देते थे। उनका मानना था कि मसाले केवल व्यापार नहीं, बल्कि लोगों के भोजन और स्वास्थ्य से जुड़े होते हैं। यही वजह थी कि एमडीएच आज भी शुद्धता और विश्वसनीयता के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। धर्मपाल गुलाटी ने खुद को कंपनी का चेहरा भी बनाया। टीवी विज्ञापनों में उनकी मुस्कान और पारंपरिक पगड़ी लोगों को बेहद पसंद आई, जिससे उनकी पहचान ‘एमडीएच वाले दादाजी’ के रूप में घर-घर में बनी।
व्यवसाय की ऊँचाइयों पर पहुँचने के बाद भी धर्मपाल गुलाटी का मन समाज सेवा की ओर ही लगा रहा। वे मानते थे कि कमाई का असली आनंद तब है जब उसे समाज के हित में लगाया जाए। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीब बच्चों की सहायता के लिए कई संस्थाएँ चलाईं। वे दिल्ली में अनेक स्कूलों, धर्मशालाओं और अस्पतालों को आर्थिक सहयोग देते थे। एमडीएच परिवार द्वारा चलाए जा रहे कई स्कूलों और चैरिटेबल अस्पतालों की स्थापना में उनका सबसे बड़ा योगदान रहा। वे हजारों बच्चों की फीस, किताबें और शिक्षा की जिम्मेदारी उठाते थे।
धर्मपाल गुलाटी बेहद सरल, विनम्र और अनुशासित व्यक्ति थे। कंपनी के मालिक होने के बावजूद वे रोज सुबह दफ्तर जाते और अपने कर्मचारियों को परिवार की तरह मानते थे। उनका कहना था कि “व्यापार ईमानदारी से चलो, ग्राहकों को अच्छे उत्पाद दो, कर्मचारियों का सम्मान करो — यही सफलता का रास्ता है।” उनकी उम्र 90 से पार होने पर भी वे रोज ऑफिस जाते थे। काम के प्रति उनका समर्पण युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा।
उनके सामाजिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके काम, उनके चरित्र और देश के प्रति उनकी भावना की पहचान था। 3 दिसंबर 2020 को दिल्ली में उनका निधन हुआ। उनके जाने से मसाला उद्योग ही नहीं, बल्कि समाज सेवा की एक रोशनी भी मंद पड़ गई। परंतु उनके द्वारा किया गया काम आज भी जीवित है और लोगों को प्रेरित करता है।
धर्मपाल गुलाटी का जीवन बताता है कि इंसान यदि मेहनत, ईमानदारी और समाज के प्रति जिम्मेदारी को अपना आधार बना ले, तो वे सामान्य परिस्थितियों से उठकर भी अद्भुत ऊँचाइयाँ छू सकता है। उन्होंने साबित किया कि सफलता केवल पैसों में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में सम्मान पाने में है। उनका जीवन और योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उज्ज्वल उदाहरण है


