ट्रंप युग की आक्रामक नीतियां और बदलती वैश्विक व्यवस्था

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प्रहलाद सबनानी

हाल के वर्षों में अमेरिकी नीतियों और निर्णयों पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका एक बार फिर अपनी पुरानी साम्राज्यवादी मानसिकता की ओर लौटता दिखाई दे रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी प्रशासन द्वारा उठाए गए कई कदम अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक मर्यादाओं को चुनौती देते हैं, वहीं वैश्विक शक्ति संतुलन को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को रात्रि में गिरफ्तार कर अमेरिका लाकर उन पर मुकदमा चलाने की धमकी और वेनेजुएला के विशाल तेल भंडारों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास इसी साम्राज्यवादी सोच का प्रत्यक्ष उदाहरण है।

इसी क्रम में अमेरिका की निगाह डेनमार्क द्वारा शासित ग्रीनलैंड द्वीप पर भी टिकी हुई है। ग्रीनलैंड सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, परंतु यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि डेनमार्क नाटो का सदस्य और अमेरिका का मित्र राष्ट्र है। किसी मित्र राष्ट्र की संप्रभुता को चुनौती देकर उसके अधीन क्षेत्र को बलपूर्वक अपने अधिपत्य में लेने का प्रयास अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अस्वीकार्य है। इससे पहले ट्रम्प द्वारा कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की धमकी भी इसी मानसिकता को उजागर करती है। कनाडा भी अमेरिका का घनिष्ठ सहयोगी रहा है, किंतु साम्राज्यवादी सोच के आगे मित्रता और साझेदारी भी गौण हो जाती है।

अमेरिका द्वारा ब्रिक्स देशों भारत, रूस, चीन और ब्राजील पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी को केवल व्यापारिक नीति के रूप में देखना भूल होगी। यह कदम वास्तव में उभरती बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास है। ब्रिक्स देशों द्वारा डीडोलराइजेशन की दिशा में उठाए जा रहे कदम, अर्थात आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का उपयोग, अमेरिकी डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व को सीधी चुनौती देते हैं। डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था अमेरिका की शक्ति का प्रमुख आधार रही है, और जब यह आधार हिलता है, तो अमेरिका असहज हो जाता है।

ब्रिक्स देशों की बढ़ती आर्थिक साझेदारी, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां और साझा वित्तीय संस्थाएं अमेरिका के लिए एक रणनीतिक खतरे के रूप में उभर रही हैं। इसी कारण अमेरिका न केवल छोटे और निर्भर देशों पर, बल्कि भारत, चीन और रूस जैसे बड़े और आत्मनिर्भर देशों पर भी दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है। किंतु अमेरिका यह भूल जाता है कि जिन देशों की अर्थव्यवस्था, जनसंख्या, संसाधन और बाजार विशाल हैं, वे किसी एक शक्ति के दबाव में आने वाले नहीं हैं।

ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति को यदि “हस्तक्षेपवाद 2.0” कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। इतिहास गवाह है कि पिछले ढाई सौ वर्षों में अमेरिका ने विश्व के विभिन्न देशों में लगभग 400 बार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया है। आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य कार्रवाई, सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना अमेरिका की नीति का हिस्सा रहा है। आज भी यही प्रवृत्ति नए रूप में सामने आ रही है। भारत और चीन पर रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण दबाव बनाना इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका अब यह तय करना चाहता है कि कौन सा देश किससे व्यापार करेगा। यह न केवल साम्राज्यवाद, बल्कि अधिनायकवादी मानसिकता की चरम अवस्था है।

अमेरिका द्वारा 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपनी सदस्यता समाप्त करना भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। यह कदम वैश्विक सहयोग और बहुपक्षीय व्यवस्था को कमजोर करता है। अमेरिका अब किसी साझा मंच पर विश्व का नेतृत्व करने के बजाय एकपक्षीय शक्ति मॉडल के माध्यम से विश्व पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को कमजोर कर अमेरिका यह संदेश दे रहा है कि वह केवल उन्हीं नियमों को मानेगा जो उसके हित में हों।

वर्तमान में ट्रंप प्रशासन इस बात से भी चिंतित है कि वैश्विक आर्थिक शक्ति का केंद्र पश्चिम से पूर्व की ओर खिसकता जा रहा है। एशियाई देशों की बढ़ती भूमिका, विशाल बाजार, युवा जनसंख्या और तकनीकी क्षमता अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती दे रही है। चीन, रूस और भारत का एक साथ उभरना अमेरिका को स्वीकार नहीं है। साथ ही, अमेरिका नहीं चाहता कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाए, यूरोपीय यूनियन स्वतंत्र विदेश नीति अपनाए या डीडोलराइजेशन को गति मिले।

यूरोपीय यूनियन के देशों में भी अमेरिका के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि वे अपने रक्षा बजट में अभूतपूर्व वृद्धि कर रहे हैं। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच उत्पन्न तनाव नाटो जैसे सैन्य गठबंधन के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिह्न लगा सकता है। नाटो के कई सदस्य देशों ने स्पष्ट कहा है कि ग्रीनलैंड पर हमला नाटो पर हमला माना जाएगा, जो भविष्य में गंभीर टकराव का संकेत है।

आज की वैश्विक परिस्थितियों को एक “सर्वांगी कूटनीतिक युद्ध” के रूप में देखा जा सकता है। इसमें प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष के बजाय तेल, मुद्रा, तकनीक, समुद्री मार्ग, सप्लाई चेन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे साधनों के माध्यम से दबाव बनाया जा रहा है। अमेरिका चाहता है कि वित्त, व्यापार, सैन्य गठबंधन और तकनीक एक बार फिर उसी की चौखट पर खड़े हों। उसका उद्देश्य तीसरा विश्व युद्ध नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था का अपने पक्ष में पुनर्गठन है।

अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस जैसे मंच से अमेरिका का बाहर निकलना यह दर्शाता है कि वह पर्यावरण और वैश्विक कल्याण जैसे मुद्दों पर भी सहयोग करने के लिए तैयार नहीं है। जबकि जलवायु परिवर्तन जैसे संकट से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग अनिवार्य है। भारत और फ्रांस के नेतृत्व में बना यह मंच विकासशील देशों के लिए आशा की किरण है।

आज विश्व एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां अकेले चलना संभव नहीं है। परस्पर सहयोग, मुक्त व्यापार समझौते और क्षेत्रीय साझेदारियां ही भविष्य का मार्ग हैं। अमेरिका को छोड़कर शेष विश्व नए समीकरण गढ़ रहा है। यह संकेत है कि यदि अमेरिका अपनी साम्राज्यवादी सोच पर अड़ा रहा, तो वह स्वयं को वैश्विक मंच पर अकेला पा सकता है। यही कारण है कि अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों के विरुद्ध आज नए वैश्विक समीकरण आकार ले रहे हैं।

(लेखक, आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)

#ट्रंप _युग

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