
-डॉ. सत्यवान सौरभ
राजस्थान का थार मरुस्थल केवल रेत का विस्तार नहीं है, बल्कि यह एक जटिल और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसकी जीवनरेखा खेजड़ी (Prosopis cineraria) जैसे देशज वृक्षों से जुड़ी है। हाल के वर्षों में पश्चिमी राजस्थान—विशेषकर जोधपुर, बाड़मेर, नागौर और बीकानेर—में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के तीव्र विस्तार ने इस पारिस्थितिकी को गंभीर संकट में डाल दिया है। इसी पृष्ठभूमि में उभरा खेजड़ी बचाओ आंदोलन केवल एक स्थानीय विरोध नहीं रह गया, बल्कि यह विकास के मौजूदा मॉडल, पर्यावरणीय न्याय और लोकतांत्रिक भागीदारी पर एक व्यापक और गहन बहस को जन्म देता है।
खेजड़ी को राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया जाना केवल प्रतीकात्मक नहीं था। यह वृक्ष थार की शुष्क और कठोर जलवायु में जल संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता, पशुपालन आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जैव विविधता का आधार रहा है। इसकी फलियाँ पशुओं के लिए पोषक चारे का कार्य करती हैं, पत्तियाँ हरित आहार प्रदान करती हैं और इसकी गहरी जड़ें भूजल को थामे रखती हैं। मरुस्थलीय समाज की लोकसंस्कृति में खेजड़ी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और सम्मान का प्रतीक है, जिसे लोकवाणी में कहा गया—“सिर साटै रूख रहे, तो भी सस्तो जाण।” ऐसे वृक्षों का बड़े पैमाने पर कटना केवल पर्यावरणीय क्षति नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे मानव और प्रकृति के सहजीवन को तोड़ने जैसा है।
भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की महत्वाकांक्षा के साथ सौर ऊर्जा को विकास की धुरी बनाया है। राजस्थान को उसकी भौगोलिक स्थिति के कारण सोलर हब के रूप में विकसित किया जा रहा है और राज्य सरकार लगभग 90 गीगावाट सौर ऊर्जा लक्ष्य का पीछा कर रही है। किंतु यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या हरित ऊर्जा का विस्तार हरियाली के विनाश की कीमत पर किया जा सकता है। पश्चिमी राजस्थान में स्थापित सोलर पार्क्स के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ है, जिसमें खेजड़ी जैसे संरक्षित वृक्षों की रातोंरात कटाई की गई। अनेक मामलों में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन या तो किया ही नहीं गया, या उसे महज़ औपचारिक प्रक्रिया बनाकर छोड़ दिया गया। इसके परिणामस्वरूप पारंपरिक चरागाह भूमि नष्ट हुई, पशुपालकों की आजीविका प्रभावित हुई और मरुस्थलीय क्षेत्र में मिट्टी क्षरण की प्रक्रिया और तेज़ हो गई।
यह स्थिति सतत विकास की उस अवधारणा से सीधा टकराव है, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय को समान रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। खेजड़ी बचाओ आंदोलन इसी विरोधाभास को उजागर करता है। यह आंदोलन 2024 में स्थानीय स्तर पर उभरा, किंतु 2026 तक आते-आते एक संगठित जनांदोलन का स्वरूप ले चुका है। 2 फरवरी 2026 को बीकानेर के पॉलिटेक्निकल कॉलेज में आयोजित महापड़ाव इस संघर्ष का निर्णायक क्षण सिद्ध हुआ। बाज़ार बंद रहे, शैक्षणिक संस्थानों में अवकाश घोषित हुआ और हज़ारों की संख्या में लोग—संत, साधु, महिलाएँ और युवा—एक साझा मंच पर एकत्र हुए। यह दृश्य स्पष्ट करता है कि यह संघर्ष केवल किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक सरोकार का विषय बन चुका है।
आंदोलन के संयोजकों ने सरकार के समक्ष यह स्पष्ट चेतावनी रखी कि यदि राज्य स्तर पर सख्त वृक्ष संरक्षण कानून नहीं लाया गया, तो आंदोलन और तीव्र होगा। क्रमिक अनशन, कैंडल मार्च और कलेक्ट्रेट घेराव जैसे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक उपायों के माध्यम से सरकार पर दबाव बनाया गया। 4 फरवरी तक सैकड़ों अनशनकारी दर्ज किए गए, जिनमें महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी इस आंदोलन को नैतिक और सामाजिक शक्ति प्रदान करती है। मातृशक्ति की यह भागीदारी केवल विरोध का प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीण आजीविका, लोकसंस्कृति और भविष्य की पीढ़ियों की चिंता को भी व्यक्त करती है।
यह आंदोलन बिश्नोई समाज की उस ऐतिहासिक चेतना से गहराई से जुड़ा है, जिसकी जड़ें 1730 के खेजड़ली कांड में मिलती हैं। अमृता देवी बिश्नोई और उनके साथ 363 लोगों द्वारा खेजड़ी के संरक्षण के लिए दिया गया बलिदान विश्व इतिहास में पर्यावरण रक्षा का प्रथम संगठित उदाहरण माना जाता है। लगभग तीन सौ वर्ष बाद उसी भूमि पर खड़ा यह आंदोलन ऐतिहासिक स्मृति और वर्तमान संघर्ष को जोड़ता है। यह निरंतरता आंदोलन को केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि नैतिक वैधता भी प्रदान करती है, जो इसे सामान्य पर्यावरणीय विरोध से अलग बनाती है।
राजस्थान सरकार ने खेजड़ी को राज्य वृक्ष घोषित किया है, किंतु इसके संरक्षण के लिए प्रभावी और बाध्यकारी कानूनी ढांचे का अभाव लंबे समय से महसूस किया जा रहा है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वृक्ष संरक्षण को लेकर दिए गए निर्देशों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर उनका अनुपालन कमजोर रहा है। आंदोलनकारियों की मुख्य मांग है कि पूरे राज्य के लिए एक सशक्त राजस्थान वृक्ष संरक्षण अधिनियम लागू किया जाए, जो विकास परियोजनाओं में वृक्षों की कटाई को अंतिम विकल्प बनाए, न कि पहली शर्त। कुछ जिलों में अस्थायी रोक या आंशिक आदेश इस संरचनात्मक समस्या का समाधान नहीं कर सकते।
यद्यपि आंदोलन स्वयं को अराजनीतिक बताता है, किंतु इसका प्रभाव राजनीति पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। “नो ट्री, नो वोट” जैसे नारों ने पर्यावरण को एक निर्णायक चुनावी मुद्दे के रूप में सामने ला दिया है। स्थानीय विधायक और सांसदों की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं और सामाजिक बहिष्कार जैसी चेतावनियाँ लोकतांत्रिक दबाव के नए रूप को दर्शाती हैं। यह संकेत करता है कि भारत में पर्यावरण अब केवल नीति का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का प्रश्न बनता जा रहा है, जिसका प्रभाव आने वाले चुनावों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
यह आंदोलन सौर ऊर्जा या विकास के विरोध में नहीं है। आंदोलनकारियों का तर्क स्पष्ट है कि ऊर्जा संक्रमण आवश्यक है, किंतु वह वन विनाश का पर्याय नहीं बन सकता। समाधान के रूप में राज्य स्तर पर सख्त वृक्ष संरक्षण कानून, सोलर परियोजनाओं में अनिवार्य हरित पट्टी, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, बंजर भूमि और रूफटॉप सोलर को प्राथमिकता तथा पुनर्वनीकरण अभियानों की मांग रखी गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन और अमेरिका जैसे देशों में अपनाए जा रहे ऐसे मॉडल, जहाँ सोलर पार्क्स के साथ जैव विविधता संरक्षण को जोड़ा गया है, भारत के लिए भी अनुकरणीय हो सकते हैं।
अंततः खेजड़ी बचाओ आंदोलन यह स्मरण कराता है कि विकास का अर्थ केवल ऊर्जा उत्पादन, निवेश और आंकड़ों तक सीमित नहीं हो सकता। यह आंदोलन लोकतंत्र की उस शक्ति को रेखांकित करता है, जिसमें साधारण नागरिक संगठित होकर नीतियों की दिशा बदलने की क्षमता रखते हैं। एक शोधार्थी के दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि खेजड़ी बचाओ आंदोलन भारतीय पर्यावरण आंदोलनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बनने की क्षमता रखता है। यदि सरकार संवाद, संतुलन और संवेदनशील नीति का मार्ग अपनाती है, तो यह संघर्ष टकराव के बजाय सतत विकास का उदाहरण बन सकता है। खेजड़ी को बचाना केवल एक वृक्ष को बचाना नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की पहचान, थार की पारिस्थितिकी और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा का प्रश्न है।
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−डॉ. सत्यवान सौरभ
