क्यों गायब हो रहे बच्चे?

0
9

(हरियाणा में हर दिन औसतन 12 बच्चे लापता—क्या यह सिर्फ गुमशुदगी है या संगठित मानव तस्करी का खामोश जाल?)

घर से निकले बच्चे जब वापस नहीं लौटते, तो सवाल सिर्फ “कहां गए” का नहीं रहता—सवाल यह भी होता है कि किसने उन्हें गायब किया। आंकड़े बता रहे हैं कि गुमशुदगी अब व्यक्तिगत हादसा नहीं, बल्कि एक गहराता सामाजिक और आपराधिक संकट बन चुकी है।

-डॉ. प्रियंका सौरभ

हरियाणा में गुमशुदगी के बढ़ते मामले अब केवल पुलिस रजिस्टरों या अख़बारों की सुर्खियों तक सीमित नहीं रहे हैं। ये मामले उन हजारों परिवारों की अनकही पीड़ा हैं, जिनके घरों से कोई सदस्य काम, पढ़ाई या रोज़मर्रा के काम के लिए निकला और फिर कभी वापस नहीं लौटा। हर दिन औसतन 12 बच्चों का लापता होना और वर्ष 2025 में 17,500 से अधिक गुमशुदगी के मुकदमों का दर्ज होना, किसी भी संवेदनशील समाज के लिए गहरी चिंता का विषय होना चाहिए। यह स्थिति न सिर्फ कानून-व्यवस्था की चुनौती है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

गुमशुदगी का सबसे भयावह पहलू यह है कि इसके पीछे अब केवल व्यक्तिगत विवाद, घरेलू कारण या आकस्मिक घटनाएं नहीं रहीं। जांच में बार-बार यह संकेत मिल रहे हैं कि कई मामलों की जड़ें मानव तस्करी जैसे संगठित अपराधों से जुड़ी हुई हैं। पुलिस के अनुसार करीब 75 प्रतिशत मामलों को ट्रेस कर लिया गया है, लेकिन शेष 25 प्रतिशत अधूरे मामले ही असली चिंता का कारण हैं। यही वे मामले हैं जिनमें लापता व्यक्ति का कोई सुराग नहीं मिलता और जिनके पीछे अंतरराज्यीय गिरोह, अवैध प्लेसमेंट एजेंसियां और आर्थिक शोषण के नेटवर्क काम कर रहे होते हैं।

विशेष चिंता इस बात की है कि महिलाएं और नाबालिग बच्चे इस संकट का सबसे बड़ा शिकार बन रहे हैं। बेहतर रोजगार, उज्ज्वल भविष्य या शिक्षा का सपना दिखाकर बच्चों और युवाओं को उनके घरों से दूर ले जाया जाता है। कई बार माता-पिता खुद मजबूरी में बच्चों को ऐसे एजेंटों के हवाले कर देते हैं, जिन्हें वे भरोसेमंद समझते हैं। बाद में वही भरोसा परिवारों के लिए जीवनभर का पछतावा बन जाता है। बिहार, झारखंड और उड़ीसा जैसे राज्यों से जुड़े नेटवर्क इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह समस्या स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर फैले संगठित अपराध का हिस्सा है।

हरियाणा में भिक्षावृत्ति और बालश्रम से मुक्त कराए गए 350 से अधिक बच्चों के मामले इस सच्चाई को और उजागर करते हैं। चौक-चौराहों, बस अड्डों और धार्मिक स्थलों पर दिखाई देने वाले ये बच्चे किसी संयोग का परिणाम नहीं हैं। ये एक सुनियोजित तंत्र के तहत यहां लाए जाते हैं, जहां उनसे काम कराया जाता है या उन्हें भिक्षावृत्ति में धकेला जाता है। इनसे होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा गिरोह या प्लेसमेंट एजेंसियों के पास चला जाता है, जबकि बच्चों को अमानवीय परिस्थितियों में जीने को मजबूर किया जाता है।

यह भी गौर करने योग्य है कि मानव तस्करी अब अकेला अपराध नहीं रहा। पुलिस और जांच एजेंसियों का मानना है कि नशा तस्करी, साइबर अपराध, एक्सटॉर्शन और मानव तस्करी जैसे अपराध अब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक ही नेटवर्क कई तरह के अवैध कामों को अंजाम दे रहा है। यही कारण है कि गुमशुदगी के मामलों की जांच अब संगठित अपराध के नजरिये से की जा रही है। यह बदलाव सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन इसके लिए संसाधनों, तकनीक और राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी उतनी ही जरूरत है।

हरियाणा पुलिस द्वारा वर्ष 2026 के लिए तैयार किया गया अपराध नियंत्रण रोडमैप उम्मीद की एक किरण जरूर दिखाता है। संगठित अपराधियों पर कड़ी निगरानी, तकनीक के माध्यम से पहचान और ट्रैकिंग, अंतरराज्यीय समन्वय और समयबद्ध जांच जैसे कदम निस्संदेह आवश्यक हैं। पुलिस महानिदेशक का यह स्पष्ट संदेश कि बच्चों और महिलाओं से जुड़े मामलों में किसी भी स्तर पर देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी, भरोसा पैदा करता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल प्रशासनिक सख्ती से इस गहरी समस्या को पूरी तरह सुलझाया जा सकता है?

सच्चाई यह है कि गुमशुदगी और मानव तस्करी जैसी समस्याएं केवल कानून-व्यवस्था के दायरे में सुलझने वाली नहीं हैं। इनके पीछे गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता जैसे कारण भी काम करते हैं। जब परिवारों के पास रोजगार के सीमित अवसर होते हैं और बेहतर जीवन का सपना उन्हें हर दिन बेचैन करता है, तब वे अक्सर गलत हाथों में फंस जाते हैं। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी केवल अपराधियों को पकड़ने तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि उन परिस्थितियों को बदलने की भी होनी चाहिए, जो लोगों को असुरक्षित बनाती हैं।

समाज की भूमिका यहां सबसे अहम हो जाती है। अक्सर लोग लापता बच्चों या संदिग्ध गतिविधियों को देखकर भी चुप रह जाते हैं। “यह किसी और का मामला है” जैसी सोच अपराधियों के हौसले बढ़ाती है। यदि समय रहते संदिग्ध प्लेसमेंट एजेंसियों की सूचना दी जाए, भिक्षावृत्ति में लगे बच्चों को नजरअंदाज न किया जाए और लापता होने की सूचना तुरंत पुलिस तक पहुंचाई जाए, तो कई मामलों को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता है। जागरूक समाज ही किसी भी अपराध के खिलाफ सबसे मजबूत दीवार बन सकता है।

बाल अधिकार विशेषज्ञों का यह कहना बिल्कुल सही है कि बच्चों को तस्करी से मुक्त कराना केवल पहला कदम है। असली चुनौती उनके पुनर्वास, शिक्षा और मानसिक काउंसलिंग की है। तस्करी का शिकार हुए बच्चे गहरे मानसिक आघात से गुजरते हैं। यदि उन्हें समय पर सही देखभाल और अवसर नहीं मिले, तो वे दोबारा उसी अंधेरे चक्र में फंस सकते हैं। सरकार और समाज दोनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे बच्चों का भविष्य सुरक्षित और सम्मानजनक हो।

हरियाणा में गुमशुदगी के मामले हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि विकास और आर्थिक प्रगति के दावों के बीच कहीं हम मानवीय मूल्यों को तो नहीं खोते जा रहे। यह समस्या केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि हर उस परिवार की कहानी है, जो आज भी किसी दरवाजे की आहट पर उम्मीद लगाए बैठा है। यदि अब भी इसे केवल एक खबर या एक प्रशासनिक चुनौती समझकर नजरअंदाज किया गया, तो आने वाले वर्षों में इसकी कीमत कहीं ज्यादा भारी होगी।

समय की मांग है कि गुमशुदगी को अपराध के साथ-साथ मानवीय संकट के रूप में देखा जाए। सरकार, पुलिस, समाज और नागरिक—सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। तभी यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि कोई बच्चा, कोई महिला या कोई नागरिक यूं ही गुम न हो जाए और उसका परिवार जिंदगी भर इंतजार करने को मजबूर न रहे।

  (डॉ. प्रियंका सौरभ, , कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here