ईरान पर संभावित हमले में अमेरिका का साथ देने को इजराइल ने शुरू की तैयारी

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– इस्लामिक गणराज्य ने भी अमेरिका और इजराइल को माकूल जवाब देने का किया ऐलान

वाशिंगटन/तेहरान, 11 जनवरी (हि.स.)। इस्लामिक गणराज्य ईरान में अली खामेनेई शासन के खिलाफ शुरू देशव्यापी प्रदर्शन के बीच अमेरिका के सैन्य हमले के संकेत देते ही इजराइल ने भी आक्रमण की तैयारी शुरू कर दी है। इस हलचल के बीच इस्लामिक गणराज्य संसद के अध्यक्ष ने कहा कि अगर उनके देश पर हमला होता है, तो ईरान पीछे नहीं हटेगा। वह अमेरिका और इजराइल को माकूल जवाब देगा।

ईरान इंटरनेशनल ने एक दूसरे संचार सूचना माध्यम के हवाले से प्रसारित अपनी रिपोर्ट में कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के यह कहने के बाद इजराइल हाई अलर्ट पर है कि अमेरिका ईरान के प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए तैयार है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने हाल के दिनों में प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग के खिलाफ बार-बार चेतावनी दी है और शनिवार को कहा कि अमेरिका प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए हर तरह से तैयार है। ट्रंप ने कथित रूप से सैन्य अधिकारियों से आक्रमण के विकल्पों पर चर्चा करनी शुरू कर दी है।

इस बीच इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रुबियो ने शनिवार को फोन बातचीत में ईरान में अमेरिकी दखल की संभावना पर चर्चा की। साथ ही दोनों ने ईरान के अलावा गाजा और सीरिया में विरोध प्रदर्शनों पर चर्चा की। वहीं, ईरान के हालत से दुखी हैरी पॉटर की लेखिका जेके रोलिंग ने रविवार को एक्स पर एक पोस्ट में ईरान में प्रदर्शनकारियों के लिए समर्थन जताया। रोलिंग ने कहा कि यह अपनी आजादी के लिए लड़ रहे ईरानियों के साथ एकजुटता दिखाने का है।

दूसरी ओर इस्लामिक गणराज्य ईरान की संसद के स्पीक मोहम्मद बाघर गालिबफ ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका सैन्य हमला करता है तो इजराइल और अमेरिका की सैन्य और शिपिंग सुविधाएं निशाने पर होंगी। यह चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तेहरान को प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई को लेकर दी गई चेतावनियों के बाद आई है।

गालिबफ ने कहा, ” ईरान आत्मरक्षा के दायरे में हर तरह के कदम उठाएगा। इससे अमेरिका का दंभ चूर-चूर हो जाएगा। ट्रंप ईरान की क्षमता को कमतर आंक रहे हैं। उनका वह भ्रम भी दूर हो जाएगा।”

केरल में यौन उत्पीड़न के आरोपी कांग्रेस से निष्कासित विधायक राहुल ममकूटथिल को पुलिस ने हिरासत में लिया

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तिरुवनंतपुरम (केरल), 11 जनवरी (हि.स.)। कांग्रेस (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) से निष्कासित विधायक राहुल ममकूटथिल को शनिवार देररात केरल पुलिस ने हिरासत में लिया है। पुलिस ने यह कार्रवाई उनके खिलाफ दर्ज यौन उत्पीड़न के एक मामले में की। ममकूटथिल पलक्कड़ से विधायक हैं। पिछले साल चार दिसंबर को केरल कांग्रेस ने राहुल ममकूटथिल को पार्टी से बाहर दिया था।

पुलिस ने आज सुबह बताया कि राहुल ममकूटथिल को शनिवार आधीरात पलक्कड़ से एक यौन उत्पीड़न मामले में हिरासत में लिया गया है। पुलिस के अनुसार, पथानामथिट्टा जिले के एक व्यक्ति की शिकायत के बाद पलक्कड़ विधायक के खिलाफ हाल ही में तीसरा यौन उत्पीड़न मामला दर्ज किया गया था। विशेष जांच दल उनके खिलाफ इसी तरह के दो अन्य मामलों की जांच कर रही है। विशेष जांच दल को नए मामले की जांच भी सौंपी गई है। ममकूटथिल पलक्कड़ में एक होटल में ठहरे हुए थे। उनको आधीरात होटल से हिरासत में लेकर पथानामथिट्टा लाया गया।

पुलिस ने बताया कि उनकी औपचारिक गिरफ्तारी बाद में दर्ज की जाएगी। उल्लेखनीय है कि केरल उच्च न्यायालय ने पहले मामले में ममकूटथिल को गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की थी। यह मामला दुष्कर्म और एक महिला को गर्भपात कराने के लिए मजबूर करने के आरोपों से संबंधित है। दूसरे मामले में तिरुवनंतपुरम की एक सत्र अदालत ने उन्हें अग्रिम जमानत दी थी। इन्हीं आरोपों के बाद केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने ममकूटथिल को पार्टी से निष्कासित कर दिया था।

सोमनाथ: भारत के अमिट स्वाभिमान का गौरवशाली प्रतीक

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-विनय राठौर हिन्दुस्तानी

“सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।

भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये।।”

(अर्थः जो भगवान शंकर अपनी भक्ति प्रदान करने के लिए परम रमणीय व स्वच्छ सौराष्ट्र प्रदेश

गुजरात में कृपा करके अवतीर्ण हुए हैं, मैं उन्हीं ज्योतिर्मयलिंगस्वरूप, चन्द्रकला को आभूषण

बनाये हुए भगवान् श्री सोमनाथ की शरण में जाता हूं।)

सोमनाथ, यह केवल एक तीर्थस्थल नहीं है, यह भारत की गौरवशाली धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अद्वितीय प्रतीक है। यह वह भूमि है, जहां भारत का स्वाभिमान मंदिर के शिखर पर लहराती पताका में प्रतिबिंबित होता है। यह वह स्थान है, जहां कण-कण में भारतीयों की आस्था और जीवटता की महक महसूस होती है। यह वह देवालय है, जो विध्वंस और पुनर्निर्माण की शृंखलाबद्ध घटनाओं की गवाही देता है। यह वह शहर है, जो बताता है कि कैसे शांत, अहिंसक और धर्मानुरागी जनता की समृद्धि और वैभव मतांध लुटेरों की बर्बर मानसिकता का शिकार बनीं। साथ ही, सोमनाथ यह भी बताता है कि सृजन और निर्माण की प्रकृति के आगे विध्वंस सचमुच बहुत बौना है

सोमनाथ के गौरव को पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिए देश के प्रथम उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल और स्वतंत्रता सेनानी एवं प्रसिद्ध साहित्यकार कन्हैयालाल मुंशी ने उल्लेखनीय योगदान दिया। सरदार पटेल ने गुलामी से मुक्ति के बाद स्वतंत्र भारत के स्वाभिमान और जन आस्था को मजबूत करने के लिए सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का भगीरथ कार्य किया। बाद में, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘विकास भी, विरासत भी’ मंत्र के साथ सोमनाथ तीर्थस्थल को पूरी भव्यता के साथ विकसित करने का बीड़ा उठाया।

भारत के पश्चिमी छोर पर स्थित गुजरात के तटीय शहर सोमनाथ का वैभवशाली अतीत इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अंकित है।

सनातन धर्म में वर्णित 12 ज्योतिर्लिंगों में से प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में सोमनाथ दुनिया भर में फैले करोड़ों हिन्दुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार स्वयं चंद्रदेव ने सोमनाथ मंदिर की स्थापना की थी। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की महिमा ऋग्वेद, महाभारत, श्रीमद्भावत और स्कन्द पुराण में भी वर्णित है।

वह साल था 1026, जब एक विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी ने पहली बार सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। आज साल 2026 में उस घटना को एक हजार वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। सोमनाथ मंदिर का हजार वर्षों का इतिहास विध्वंस, लूट और रक्तपात की अनेक घटनाओं के साथ-साथ स्वाभिमान और गौरव से भरे सृजन और पुनर्निर्माण की गौरवशाली गाथा कहता है।

यह समझना जरूरी है कि सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण का मकसद केवल बेशुमार धन-दौलत को लूटना नहीं था। गजनवी का उद्देश्य भारत के एक महान धार्मिक और सभ्यागत प्रतीक को नष्ट करना था। यही वजह है कि उसने मंदिर को ध्वस्त करने और पवित्र ज्योतिर्लिंग को खंडित करने के साथ-साथ पूरे नगर को तबाह कर दिया था। यह प्रयास था लोगों को भयभीत करने का, यह इरादा था लोगों की आस्था को डांवाडोल करने का, यह कट्टरता से भरा ऐसा कृत्य था, जो दूसरों की आस्था को नीचा दिखाकर स्वयं के श्रेष्ठ होने का दंभ भरता था। मंदिर को लूटना तो बस बहाना भर था, असल मकसद था काफिरों (हिन्दुओं) और उनके प्रतीकों को नष्ट करना। काफिरों की हत्या करने और सोमनाथ मंदिर एवं मूर्तियों को ध्वस्त करने के लिए गजनवी को ‘गाजी’ और ‘मूर्तिभंजक’ जैसी उपाधियां दी गईं।

लेकिन, गजनवी शायद भारत को जानता ही नहीं था। वह भारतीयों की आस्था, स्वाभिमान, जीवटता, मिजाज और गर्वित प्रकृति से अनजान था। उसने मंदिर को तोड़ कर सनातन को अपमानित करने की कोशिश की, तो हम भारतीयों ने उसी स्थान पर फिर से नया मंदिर खड़ा कर दिया। यह हमें जीवन का एक मूल्यवान सबक सिखाता है कि कैसे गिरकर दोबारा खड़ा हुआ जाए, कैसे सबकुछ गंवाने के बाद बजाय हिम्मत हारने के फिर से सृजन किया जाए।

यह सिलसिला केवल गजनवी तक ही सीमित नहीं रहा। उसके बाद और भी कई आक्रांता आए। उन सभी ने सोमनाथ तीर्थ का विध्वंस कर भारतीयता को चोट पहुंचाने की कोशिश की। भारत की आत्मा पर घाव देने का प्रयास किया। भारत के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने का अधम कृत्य किया। इन सभी के मंसूबे हमारे गौरवशाली प्रतीकों को नष्ट करना था, ताकि हम भारतीय स्वयं को लाचार और अपमानित महसूस कर सकें।

लेकिन, यह भारत भूमि है। यहां समय-समय पर ऐसी विभूतियों ने जन्म लिया है, जिन्होंने भारत माता के गौरव को शिखर पर प्रस्थापित करने का कार्य किया है।

गुजरात के लिए यह गर्व की बात है कि उसके दो-दो सपूतों ने मातृभूमि के गौरव और सनातन के पुनर्जागरण के भगीरथ कार्य में सर्वोच्च योगदान दिया है। लौह पुरुष सरदार पटेल ने जहां सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का ऐतिहासिक कार्य कर अपने मजबूत मनोबल और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राम मंदिर के निर्माण और सोमनाथ के आधुनिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया। भारत के आत्म गौरव और स्वाभिमान के प्रतीकों को नष्ट करने की कट्टवादी सोच के जवाब में सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। वहीं, प्रधानमंत्री मोदी ने इस मंदिर को और भी भव्यता प्रदान करने के साथ इसके दायरे को पूजा-अर्चना से बढ़ाकर सामाजिक दायित्व, रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास से जोड़ दिया।

सोमनाथ का मंदिर हो या अयोध्या का श्री राम मंदिर, दोनों यह संदेश देते हैं कि सत्य को दबाया नहीं जा सकता, विश्वास का विध्वंस नहीं हो सकता, आस्था कभी मर नहीं सकती और सांस्कृतिक चेतना एवं राष्ट्रीय स्वाभिमान खंडित तो हो सकता है, लेकिन खत्म कभी नहीं हो सकता। यह भारत का अपना विचार है। यह हम भारतीयों की सोच है।

वास्तव में सोमनाथ जैसे प्रतीकों को केवल मंदिर कहना पर्याप्त नहीं होगा। ये भारत की आध्यात्मिक शक्ति के शक्तिशाली केंद्र हैं। ये हमारी आत्मा से जुड़े हुए वे प्रतीक हैं, जिनसे हमारी पहचान है। हम अपने जीवन को बेहतर बनाने, अपने ज्ञान को समृद्ध करने, जीवन की ऊर्जा प्राप्त करने, नैतिकता की शिक्षा ग्रहण करने, धन-धान्य से लेकर उत्तम मानव जीवन का आशीष पाने के लिए इन्हीं प्रतीकों की शरण में जाते हैं, और प्रार्थना करते हैं।

भारत के इसी सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान को पुनर्स्थापित करने के लिए सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की पहल की।

सरदार पटेल के नेतृत्व में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर 1951 में अपनी पूरी भव्यता के साथ आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। आज यह मंदिर भारत के अडिग स्वाभिमान के साथ ही सरदार पटेल के दृढ़ संकल्प का प्रतीक बनकर करोड़ों लोगों को प्रेरणा दे रहा है। मंदिर के उद्घाटन समारोह में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मौजूद रहे।

आज सोमनाथ मंदिर शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतरीन यात्री सुविधाओं के साथ अपनी अलौकिक छटा बिखेर रहा है। बीते वर्षों में हुए विकास कार्यों ने मंदिर परिसर का कायापलट कर दिया है। इस बदलाव का श्रेय जाता है प्रधानमंत्री मोदी को, जो श्री सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं। मोदी ने भारत के ‘अमृत काल’ के लिए जो पंच प्रण दिए, उनमें से एक अपनी ‘विरासत पर गर्व’ करना भी है। उन्होंने सोमनाथ तीर्थस्थल में श्रद्धालुओं के लिए सर्वोत्तम सुविधाएं और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का विजन दिया। आज सोमनाथ भारत के सबसे बेहतरीन सुविधा वाले तीर्थ स्थलों में से एक के रूप में उभरा है। यह विकास और विरासत का अद्वितीय दृष्टांत बन गया है।

जब आस्था के साथ-साथ सुविधाएं और सहूलियतें भी जुड़ जाएं, तो यह भक्तों के लिए सबसे बड़ा उपहार बन जाता है। सोमनाथ के अलौकिक दर्शन और आधुनिक विकास का अनुभव करने के लिए साल 2020 में लगभग 98 लाख श्रद्धालु यहां पहुंचे, बाद में साल 2024 तक हर वर्ष यह संख्या 92 से 97 लाख तक बनी रही। परिवहन और कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए 828 करोड़ रुपए की लागत से जेतपुर-सोमनाथ हाईवे बनाया गया। अहमदाबाद से सोमनाथ के लिए साबरमती-वेरावल वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन शुरू की गई और पुराने केशोद एयरपोर्ट का नवीनीकरण उसे फिर से शुरू कर दिया गया है।

प्रधानमंत्री के ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान से प्रेरणा लेकर ट्रस्ट ने ऑनलाइन बुकिंग और पोस्टल प्रसाद जैसी अभिनव पहल शुरू की हैं, जिससे श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना से लेकर सोमनाथ दादा के प्रसाद का लाभ घर बैठे मिल रहा है।

प्रधानमंत्री के ‘मिशन लाइफ’ के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखकर अब सोमनाथ मंदिर के फूलों को वर्मीकम्पोस्ट में बदल दिया जाता है, जो 1700 बिल्व पेड़ों के पालन-पोषण में योगदान देता है। प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल अब पेवर ब्लॉक बनाने में किया जा रहा है। यही नहीं, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के जरिए करोड़ों लीटर पानी का फिल्ट्रेशन, समुद्र तट पर मियावाकी जंगल का निर्माण और गिर-सोमनाथ जिले में 5 लाख से अधिक पौधरोपण भी ट्रस्ट की पर्यावरण-उन्मुख गतिविधियों को रेखांकित करता है।

सोमनाथ अब नेट जीरो मंदिर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

सोमनाथ ट्रस्ट के चेयरमैन के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भक्ति की धारा में सामाजिक समरसता और विकास को जोड़कर सोमनाथ की त्रिवेणी को मूर्त स्वरूप दिया है। उन्होंने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच पैदा की गई दिलों की दूरी को पाटने के लिए ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ पहल के अंतर्गत सोमनाथ में ‘सौराष्ट्र-तमिल संगमम’ कार्यक्रम के आयोजन का मार्गदर्शन दिया। इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए सात स्पेशल ट्रेनों में 2002 तमिल भक्त सोमनाथ के दरबार में पहुंचे।

इतना ही नहीं, ट्रस्ट की ओर से 62 लाख रुपए की लागत से छह वर्षा जल संचयन कुएं और एक जलाशय को बहाल किया है।

2019-20 में 160 लाख रुपए के निवेश के साथ, सोमनाथ के 8 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ने 20.53 करोड़ लीटर पानी को फिल्टर किया है। सोमनाथ में हरित और बेहतर पर्यावरण के लिए समुद्र तट पर 72,000 वर्ग फुट क्षेत्र में 7200 पेड़ों के साथ मियावाकी जंगल तैयार किया गया है। यह भक्ति और पर्यावरण विज्ञान का एक बेजोड़ मेल है। ट्रस्ट आपदा की स्थिति में पीड़ितों के साथ खड़े रहने और उनका दुःख बांटने का मानवीय कर्तव्य भी निभाता है। चक्रवात ‘तौकते’ के बाद ट्रस्ट ने किसानों को फलों के पेड़ बांटे। गिर सोमनाथ जिले की सभी तहसीलों में 5 करोड़ रुपए से अधिक के खर्च से 5 लाख से अधिक पौधे लगाए।

दरअसल, अब सोमनाथ केवल तीर्थयात्रियों के लिए सजाया-संवारा गया एक मंदिर ही नहीं है, बल्कि यह इस बात की प्रयोगशाला भी है कि अपनी विरासत को भविष्य के लिए कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है, कैसे हमारे रीति-रिवाज रोजगार पैदा कर सकते हैं और कैसे पर्यावरण को धर्मशास्त्र में शामिल किया जा सकता है। अब सोमनाथ सोलर पैनल, संस्कृत सीखने के केंद्रों, तटीय ग्रीन बेल्ट और डिजिटल रसीदों के माध्यम से परंपरा और तकनीक के संमिश्रण की राह दिखा रहा है।

दूरदृष्टा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में सोमनाथ गत दो दशकों में, इस बात का शानदार उदाहरण बन गया है कि कैसे भक्ति और विकास एक ही मार्ग पर साथ-साथ चलते हैं। एक आदर्श तीर्थस्थल के रूप में आज सोमनाथ भारत ही नहीं दुनिया को दिशा दिखा रहा है। एक ऐसा तीर्थस्थल जहां पूजा-पाठ के साथ-साथ पर्यावरण और रोजगार की भी चिंता की जाती है, जहां विकास और विरासत दोनों का मिलन होता है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

पंचांग : 12 जनवरी, 2026

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12 जनवरी 2026 को सूर्योदय के समय की ग्रह स्थिति

ग्रह स्थिति

सूर्य धनु में

चंद्र तुला में

मंगल धनु में

बुध धनु में

गुरु मिथुन में

शुक्र धनु में

शनि मीन में

राहु कुंभ में

केतु सिंह में

लग्नारंभ समय

मकर 06.57 बजे से

कुंभ 08.43 बजे से

मीन 10.16 बजेे से

मेष 11.46 बजे से

वृष 13.27 बजे से

मिथुन 15.25 बजे से

कर्क 17.38 बजे से

सिंह 19.54 बजे से

कन्या 22.06 बजे से

तुला 00.17 बजे से

वृश्चिक 02.32 ब.से

धनु 04.48 बजे से

सोमवार 2026 वर्ष का 12वां दिन

दिशाशूल पूर्व ऋतु हेमन्त।

विक्रम संवत् 2082 शक संवत् 1947

मास माघ (दक्षिण भारत में पौष)

पक्ष कृष्ण

तिथि नवमी 12.43 बजे को समाप्त।

नक्षत्र स्वाती 21.06 बजे को समाप्त।

योग धृति 18.12 बजे को समाप्त।

करण गर 12.43 बजेे तदनन्तर वणिज 02.00 बजे रात्र को समाप्त।

चन्द्रायु 22.9 घण्टे

रवि क्रान्ति दक्षिण 210 41Ó

सूर्य दक्षिणायन

कलि अहर्गण 1872587

जूलियन दिन 2461052.5

कलियुग संवत् 5126

कल्पारंभ संवत् 1972949123

सृष्टि ग्रहारंभ संवत् 1955885123

वीरनिर्वाण संवत् 2552

हिजरी सन् 1447 महीना रज्जब

तारीख 12 विशेष स्वामी विवेकानंद जयंती, राष्ट्रीय युवा दिवस।

भद्रकाली मंदिर के शिलालेख में सोमनाथ का अमर इतिहास

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सोमनाथ (गुजरात), 11 जनवरी (हि.स.)। प्रभास पाटन की पवित्र धरती अनेक ऐतिहासिक धरोहरों को संजोए हुए है। यहां मिले ताम्रपत्र, अभिलेख और शिलालेख इस क्षेत्र के गौरवशाली और स्वर्णिम अतीत की गवाही देते हैं। आज भी वीरता की कहानियां सुनाने वाले पाळिया इस भूमि के पराक्रम के प्रमाण हैं। प्रभास पाटन और सोमनाथ मंदिर के इतिहास से जुड़े कई प्रमाण यहां अलग-अलग स्थानों पर मिलते हैं। सोमनाथ और प्रभास क्षेत्र के शिलालेख और ताम्रपत्र प्रभास पाटन संग्रहालय में सुरक्षित रखे गए हैं। अनेक आक्रमणों में नष्ट हुए मंदिरों के अवशेष भी वहां सुरक्षित हैं। यह संग्रहालय वर्तमान में प्राचीन सूर्य मंदिर में संचालित हो रहा है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक शिलालेख संग्रहालय के पास, पुराने राम मंदिर के निकट भद्रकाली फळिया में स्थित है।

यह शिलालेख सोमपुरा ब्राह्मण दीपकभाई दवे के घर के आंगन में बने भद्रकाली मंदिर की दीवार पर आज भी लगा हुआ है। संग्रहालय की क्यूरेटर तेजल परमार के अनुसार यह शिलालेख ई.स. 1169 में खुदवाया गया था। इसे राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है। यह शिलालेख अणहिलवाड़ पाटन के राजा कुमारपाल के गुरु श्रीमद भावबृहस्पति की प्रशंसा में लिखा गया है।

इस शिलालेख में सोमनाथ मंदिर के पौराणिक और मध्यकालीन इतिहास का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि सतयुग में चंद्रदेव ने सोने का मंदिर बनवाया, त्रेतायुग में रावण ने चांदी का मंदिर, द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने लकड़ी का मंदिर, और कलियुग में राजा भीमदेव सोलंकी ने पत्थर का भव्य मंदिर बनवाया।

इतिहास से पता चलता है कि भीमदेव सोलंकी ने पुराने मंदिर के अवशेषों पर चौथा मंदिर बनवाया था। बाद में कुमारपाल ने उसी स्थान पर पांचवां मंदिर बनवाया। सोलंकी शासनकाल में प्रभास पाटन धार्मिक के साथ-साथ कला, स्थापत्य और साहित्य का भी केंद्र बना। सिद्धराज जयसिंह की न्यायप्रियता और कुमारपाल की धर्मनिष्ठा ने सोमनाथ मंदिर को विशेष गौरव दिलाया। यह आज भी गुजरात के स्वर्णकाल की याद दिलाता है।

प्रभास पाटन की धरती केवल अवशेष ही नहीं, बल्कि सनातन धर्म का गौरव भी अपने भीतर समेटे हुए है। भद्रकाली फळिया का यह शिलालेख आज भी सोलंकी शासकों और विद्वान भावबृहस्पति के समर्पण की याद दिलाता है। यह भूमि अपनी ऐतिहासिक विरासत के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को हमारे स्वर्णिम अतीत की झलक दिखाती रहेगी। सोमनाथ का अडिग शिखर इस बात का प्रमाण है कि समय चाहे कितना भी बदल जाए, भक्ति और स्वाभिमान हमेशा अमर रहते हैं।

मकर संक्रांति: पतंगबाज़ी, आनंद, संस्कृति और चेतना

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— डॉ. सत्यवान सौरभ

मकर संक्रांति का पर्व भारतीय संस्कृति में केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन, सामाजिक सहभागिता और लोकजीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह वह समय है जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर अग्रसर होता है और प्रकृति के साथ-साथ मानव जीवन में भी नई ऊर्जा का संचार होता है। इस पर्व से जुड़ी पतंगबाज़ी की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसने समय के साथ स्वयं को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य संबंधी आयामों को भी अपने भीतर समाहित किया है। आज पतंग उड़ाना सिर्फ़ छतों पर खड़े होकर डोर खींचने का खेल नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव, मानसिक प्रसन्नता और शारीरिक सक्रियता का प्रतीक बन चुका है।

पतंग उड़ाने की परंपरा भारत में अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों और लोककथाओं में इसके उल्लेख मिलते हैं। कभी यह राजदरबारों में कौशल और रणनीति का प्रतीक रही, तो समय के साथ आम जनजीवन में रच-बस गई। मकर संक्रांति, बसंत पंचमी और अन्य पर्वों पर आसमान का रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाना, भारतीय समाज की सामूहिक चेतना और उत्सवधर्मिता को दर्शाता है। हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में यह पर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक आयोजन का रूप ले लेता है।

पतंगबाज़ी का सबसे सुंदर पक्ष उसका सामाजिक स्वरूप है। यह लोगों को घरों से बाहर निकालकर एक-दूसरे से जोड़ती है। छतों के बीच संवाद, बच्चों की खिलखिलाहट, युवाओं की प्रतिस्पर्धा और बुज़ुर्गों की स्मृतियों से उपजी मुस्कान—ये सभी दृश्य इस पर्व को जीवंत बनाते हैं। “वो काटा… वो मारा” की गूंज केवल खेल का उत्साह नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता की आवाज़ होती है। आज के समय में, जब सामाजिक संवाद सिमटता जा रहा है, ऐसे पर्व मानवीय रिश्तों को सहेजने का अवसर प्रदान करते हैं।

मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित पतंग महोत्सवों और सामूहिक आयोजनों ने इस परंपरा को नए आयाम दिए हैं। कई स्थानों पर स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संगठन और स्वयंसेवी संस्थाएँ मिलकर ऐसे कार्यक्रम आयोजित करती हैं, जिनका उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना भी होता है। इन आयोजनों में महिलाएँ, बच्चे और बुज़ुर्ग समान रूप से भाग लेते हैं, जिससे यह पर्व किसी एक वर्ग तक सीमित न रहकर समाज के हर हिस्से का उत्सव बन जाता है।

अक्सर पतंगबाज़ी को केवल मौसमी खेल समझ लिया जाता है, लेकिन इसके स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी कम नहीं हैं। पतंग उड़ाते समय शरीर के कई अंग सक्रिय रहते हैं। हाथों, कंधों और आँखों का समन्वय होता है, जिससे शारीरिक सक्रियता बनी रहती है। खुले वातावरण में समय बिताने से शरीर को सूर्य की ऊर्जा मिलती है और मानसिक थकान कम होती है। चिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे सामूहिक और आनंददायक आयोजन तनाव को कम करने में सहायक होते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी पतंग उड़ाना अत्यंत उपयोगी है। खुले आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को उड़ते देखना मन को प्रसन्नता और शांति देता है। यह व्यक्ति को वर्तमान क्षण से जोड़ता है और एक प्रकार के सहज ध्यान का अनुभव कराता है। आज के तेज़ रफ्तार और तनावपूर्ण जीवन में ऐसे अनुभव मानसिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

बच्चों के लिए पतंगबाज़ी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया भी है। इससे उनमें धैर्य, संतुलन, समन्वय और प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित होती है। हवा की दिशा को समझना, डोर का सही तनाव बनाए रखना और सही समय पर निर्णय लेना—ये सभी कौशल बच्चों की निर्णय क्षमता को मजबूत करते हैं। साथ ही, जब यह गतिविधि परिवार के साथ मिलकर की जाती है, तो बच्चों में सामाजिक मूल्य और सांस्कृतिक जुड़ाव भी गहराता है।

हालाँकि, जहाँ पतंगबाज़ी आनंद और उत्साह का पर्व है, वहीं इससे जुड़ी सुरक्षा चुनौतियाँ भी सामने आती हैं। बीते वर्षों में चाइनीज़ मांझा और नायलॉन डोर के प्रयोग से कई गंभीर दुर्घटनाएँ हुई हैं। यह न केवल मनुष्यों के लिए, बल्कि पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी घातक सिद्ध हुआ है। सड़क दुर्घटनाएँ, गले में कट लगने की घटनाएँ और पक्षियों की मौत—ये सभी इस परंपरा के विकृत स्वरूप की ओर संकेत करते हैं।

सरकार और प्रशासन द्वारा इस दिशा में नियम बनाए गए हैं, लेकिन केवल नियम पर्याप्त नहीं हैं। समाज में जागरूकता फैलाना और जिम्मेदारी का भाव विकसित करना अत्यंत आवश्यक है। सूती डोर का उपयोग, खुले और सुरक्षित स्थानों का चयन, बच्चों की निगरानी और समय-सीमा का ध्यान—ये सभी कदम पतंगबाज़ी को सुरक्षित बना सकते हैं। यह ज़रूरी है कि उत्सव की खुशी किसी के लिए दुख का कारण न बने।

पर्यावरणीय दृष्टि से भी पतंगबाज़ी पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। पतंगों के अवशेष पेड़ों, बिजली के तारों और सड़कों पर फँसकर पर्यावरण के लिए समस्या बन जाते हैं। प्लास्टिक और नायलॉन से बनी पतंगें लंबे समय तक नष्ट नहीं होतीं और जीव-जंतुओं के लिए खतरा पैदा करती हैं। ऐसे में पर्यावरण-अनुकूल पतंगों और प्राकृतिक रंगों के उपयोग को बढ़ावा देना समय की माँग है।

कई सामाजिक संगठन और स्वयंसेवी समूह इस दिशा में सकारात्मक प्रयास कर रहे हैं। वे बच्चों और युवाओं को सुरक्षित और पर्यावरण-संवेदनशील पतंगबाज़ी के लिए प्रेरित कर रहे हैं। स्कूलों और सामाजिक मंचों पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि परंपरा और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे।

बदलते समय के साथ पतंगबाज़ी का स्वरूप भी बदल रहा है। अब यह केवल छतों तक सीमित नहीं रही। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसे एक वैश्विक पहचान दी है। पतंग महोत्सवों की तस्वीरें और वीडियो दुनिया भर में साझा किए जा रहे हैं। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय भी मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग उत्सव आयोजित कर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हैं।

यह परिवर्तन दर्शाता है कि परंपराएँ स्थिर नहीं होतीं, वे समय के साथ स्वयं को ढालती हैं। पतंगबाज़ी भी इसी परिवर्तन का उदाहरण है, जहाँ परंपरा, मनोरंजन, स्वास्थ्य और आधुनिकता एक साथ उड़ान भरते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि आनंद और जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

अंततः, मकर संक्रांति और उससे जुड़ी पतंगबाज़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन को उत्सव की तरह देखने का दृष्टिकोण है। यह हमें सामूहिकता, संतुलन और आनंद का महत्व समझाती है। जब हम परंपरा को समझदारी और जिम्मेदारी के साथ अपनाते हैं, तो वह अतीत की स्मृति भर नहीं रहती, बल्कि वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा बन जाती है। आसमान में उड़ती पतंगें हमें यही संदेश देती हैं कि सीमाएँ केवल ज़मीन पर होती हैं, सपनों के लिए आकाश हमेशा खुला रहता है—बस डोर थामने का हुनर और संतुलन बनाए रखने की समझ होनी चाहिए।

  (डॉ. सत्यवान सौरभ,

(कवि एवं सामाजिक चिंतक हैं)

निजी शिक्षण संस्थानों में पारदर्शी प्रवेश पर ही मिलेगा छात्रवृत्ति का लाभ

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– दशमोत्तर छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति योजना की नियमावली 2023 में हुआ संशोधन

लखनऊ, 11 जनवरी (हि.स.)। दशमोत्तर छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति योजना का लाभ केवल वास्तविक और पात्र विद्यार्थियों तक पहुंचाने के लिए समाज कल्याण विभाग निरंतर प्रयासरत है। इसी क्रम में शासन द्वारा योजना की नियमावली 2023 में जरूरी संशोधन किए गए हैं। यह संशोधन अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति और सामान्य वर्ग दोनों श्रेणियों के विद्यार्थियों पर लागू होगा।

समाज कल्याण उपनिदेशक आनंद कुमार सिंह ने बताया कि इस संशोधन का उद्देश्य निजी शिक्षण संस्थानों को रूप से तकनीकी पारदर्शी और स्पष्ट बनाना है, जिससे पात्र विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति का लाभ सुनिश्चित किया जा सके। साथ ही मैनेजमेंट कोटा, स्पॉट एडमिशन और अन्य गैर-पारदर्शी प्रवेश प्रक्रियाओं के माध्यम से छात्रवृत्ति के दुरुपयोग पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।

अनुसूचित जाति-जनजाति के छात्रों के लिए व्यवस्था

संशोधित नियमों के अनुसार, अब निजी शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक या तकनीकी पाठ्यक्रम में अध्ययनरत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति का लाभ तभी दिया जाएगा, जब उनका प्रवेश पूरी तरह पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से हुआ हो। इसके अंतर्गत संस्थान द्वारा सार्वजनिक विज्ञापन जारी कर आवेदन आमंत्रित करना, रैंक सूची तैयार करना और चयन सूची प्रकाशित करना अनिवार्य किया गया है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया है कि छात्रों से केवल सक्षम प्राधिकारी अथवा शुल्क नियामक समिति द्वारा अनुमोदित शुल्क ही लिया जाए।

सामान्य वर्ग के छात्रों को भी समान लाभ

संशोधित नियमों के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों को भी समान रूप से शुल्क प्रतिपूर्ति का लाभ मिलेगा, बशर्ते उनका प्रवेश पारदर्शी प्रक्रिया के अंतर्गत हुआ हो और उनसे अनुमोदित शुल्क ही लिया गया हो।

उपनिदेशक आनंद कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि मैनेजमेंट कोटा, स्पॉट एडमिशन के अलावा किसी भी प्रकार की गैर-पारदर्शी प्रवेश प्रक्रिया के माध्यम से प्रवेश लेने वाले छात्रों को योजना का लाभ नहीं दिया जाएगा। साथ ही संस्था द्वारा निर्धारित से अधिक फीस वसूले जाने की स्थिति में भी लाभ देय नहीं होगा।

हर कर्मचारी का डॉक्यूमेंट्स-पुलिस वेरिफिकेशन किया जाएगा :असीम अरुण

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लखनऊ, 11 जनवरी (हि.स.)। मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के अंतर्गत कुछ कोर्स कोऑर्डिनेटरों द्वारा फर्जी अभिलेखों के आधार पर नियुक्ति प्राप्त किए जाने के मामले सामने आने के बाद समाज कल्याण विभाग के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण ने सख्त रुख अपनाया है।

भविष्य में ऐसी किसी भी अनियमितता को रोकने के उद्देश्य से समाज कल्याण विभाग में आउटसोर्सिंग से जुड़े मामलों में स्पष्ट शासनादेश जारी करने के निर्देश दिए हैं। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि आउटसोर्सिंग के जरिए की जाने वाली सभी नियुक्तियां पूरी तरह निर्धारित नियमों, मानकों और प्रक्रिया के अनुरूप हों।

शासनादेश में यह साफ किया जाएगा कि आउटसोर्सिंग के माध्यम से नियुक्त सभी कार्मिकों के शैक्षिक और अन्य जरूरी डॉक्यूमेंट्स की पूरी जांच अनिवार्य होगी। इसके साथ ही सभी कर्मचारियों का पुलिस वेरिफिकेशन भी कराया जाएगा।

राज्यमंत्री ने वर्तमान में विभाग में कार्यरत आउटसोर्सिंग कर्मियों के डॉक्यूमेंट्स की भी अगले तीन महीने के अंदर जांच पूरी करने के निर्देश दिए, जिससे किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की संभावना न रहे।

राज्यमंत्री असीम अरुण ने रविवार को कहा कि समाज कल्याण विभाग में किसी भी तरह की गड़बड़ी स्वीकार नहीं की जाएगी। आउटसोर्सिंग के माध्यम से की जाने वाली सभी नियुक्तियां पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुसार होंगी। जहां भी अनियमितता मिलेगी, वहां सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

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युवा में है बदलाव की असीम शक्ति

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बाल मुकुन्द ओझा

देश में हर साल 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। राष्ट्रीय युवा दिवस 2026  की थीम  उठो, जागो और अपनी शक्ति को पहचानो  है, जो युवाओं को देश के विकास में सक्रिय भूमिका निभाने की तरफ प्रेरित करती है। यह दिन पहली बार 1984 में मनाया गया था, जब भारत सरकार ने स्वामी विवेकानंद की जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया था। स्वामी विवेकानंद ने अपने विचारों से दुनियाभर में पहचान बनाई। उनका मानना था कि शिक्षा का मतलब सिर्फ जानकारी करना नहीं बल्कि व्यक्तिगत विकास और सामाजिक प्रगति है। स्वामी विवेकानंद सही अर्थों में युवाओं के प्रेरणास्रोत और आदर्श व्यक्तित्व थे। विवेकानंद कहा करते थे कि उनकी आशाएं देश के युवा वर्ग पर ही टिकी हुई हैं। विवेकानंद ने देशवासियों से कहा था कि इस बात पर तुम गर्व करो कि तुम एक भारतीय हो और अभिमान के साथ यह घोषणा करो कि हम भारतीय हैं और हर भारतीय हमारा भाई है। उनके विचार आज भी लोगों को प्रभावित करते हैं। वे आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि थे और खासकर भारतीय युवाओं के लिए उनसे बढ़कर भारतीय नवजागरण का अग्रदूत अन्य कोई नेता नहीं हो सकता।  स्वामी जी के ओजस्वी विचार आज भी देश के करोड़ों युवाओं के लिए मार्गदर्शन का काम करते हैं और यह दिवस उसी चेतना को जगाने का एक सशक्त माध्यम है।

युवा में है बदलाव की असीम शक्ति युवा वर्ग अपने अधिकारों व लक्ष्य से परिचित होता है तो वह देश की दशा बदल सकता है। युवा देश का वर्तमान हैं, तो भूतकाल और भविष्य के सेतु भी हैं। राष्ट्र के निर्माण में युवाओं का अमूल्य योगदान है। युवा देश और समाज को नए शिखर पर ले जाते हैं। युवा देश का वर्तमान हैं, तो भूतकाल और भविष्य के सेतु भी हैं। युवा देश और समाज के जीवन मूल्यों के प्रतीक हैं।

युवा नेतृत्व को लेकर आज व्यापक बहस छिड़ी है। युवा किसी भी देश और समाज में बदलाव के मुख्य वाहक होते हैं। युवा आबादी ही देश की तरक्की को रफ्तार प्रदान कर सकती है। भारत विश्व में सब से अधिक युवा आबादी वाला देश है। हमारे यहां 135 करोड़ की जनसंख्या में 65 प्रतिशत युवा हैं। लेकिन देश के सियासी नेतृत्व की बागडोर 60 साल से ऊपर के नेताओं के हाथों में है। युवाओं की क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल करने से ही समाज में बदलाव आएगा। युवा भी खुद की ताकत को पहचाने और उसी के अनुरूप अपना रास्ता चुनें। युवा अपनी काबिलियत और नई सोच के बूते पर रोजगार सृजनकर्ता बन सकते हैं। युवा नई बुनियाद रखकर सामाजिक बदलाव के प्रणेता बन सकते हैं। विश्व के कई अन्य देशों की तुलना में भारत की जनसंख्या की औसत आयु 29 वर्ष है। भारत दुनिया के युवा जनसांख्यिकीय के पांचवें हिस्से का घर है।

देश में बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ी है। इस साल उच्च मुद्रास्फीति पर काबू पाना और लाखों लोगों के लिए रोजगार सृजित करना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। आज सबसे बड़ी चुनौती युवाओं को रोजगार देने व आत्मनिर्भर बनाने की है। आज का युवा अपने हक की लड़ाई लड़ रहा है। शिक्षा, रोज़गार और बेहतर भविष्य के लिए आज का युवा जागरूक है और लड़ रहा है। युवा वर्ग महंगी फीस, कोचिंग और फॉर्म पर फॉर्म भरता है। भर्तियों के दौरान  पेपर लीक होना आम बात हो गई है। माँ-बाप  अपनी ज़मीन जायदाद गिरवी रखकर अपने बच्चों को पढ़ाते हैं लेकिन अंत में उन्हें मिलती है बेरोज़गारी। ऐसे में युवा अवसाद की तरफ जाता है, जो एक बहुत बड़ी चुनौती है। युवा वर्ग करप्शन फ्री इंडिया चाहता है। आज देश भ्रष्टाचार से आहत है। युवा ही देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति की राह दिखा सकता है। ऐसे में देश में युवा नेतृत्व की मांग बढ़ी है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी .32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

     

 क्या ईरान के लिये अब परमाणु परीक्षण ज़रूरी हो गया है ?                                                                    

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 तनवीर जाफ़री

 पिछले दिनों सनकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के निर्देश पर जिस तरह वेनेज़ुएला पर सैन्य कार्रवाई करते हुये अमेरिकी सेना ने वेनेज़ुएला की राजधानी कराकस से वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो व उनकी पत्नी का बलात अपहरण कर उन्हें न्यूयार्क ले जाया गया उसने पूरी दुनिया को न केवल अचंभे में डाल दिया है बल्कि इस घटना ने एक नई विश्व व्यवस्था व नये वैश्विक शक्ति संतुलन के गठन की संभावना को भी प्रबल कर दिया है। कितना आश्चर्य है कि नोबल शांति पुरस्कार की चाहत रखने वाले राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिकी शक्तियों का दुरुपयोग कर इस दुनिया को जंगल राज की तरह चलाना चाह रहे हैं ? वेनेज़ुएला पर की गयी ग़ैर क़ानूनी अमेरिकी कार्रवाई कई संकेतों की ओर इशारा कर रही है। एक तो यह कि क्या यह विश्व की उदारवादी सोच रखने वाली ताक़तों को विश्व की पूंजीवादी व अतिवादी व्यवस्था की ओर से दी जाने वाली यह एक सीधी चुनौती है ? ग़ौरतलब है कि ट्रंप परिवार की गिनती भी अमेरिका के बड़े  पूंजीवादी घरानों में की जाती है। या फिर यह चीन व रूस जैसे देशों एक साथ ललकारने की ट्रंप की नीति का हिस्सा है ? और अब कोलंबिया, क्यूबा, मैक्सिको और ईरान जैसे देशों पर अमेरिकी सैन्य या आर्थिक दबाव की आशंका व्यक्त की जा रही है।साथ ही अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर भी अधिग्रहण की धमकी दी जा चुकी है।

                 ऐसे में दुनिया के सामने दो ही विकल्प बचे हैं एक तो यह कि दूसरे देशों की स्वतंत्रता व संप्रभुता का सम्मान करने वाले सभी देश वेनेज़ुएला पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का विरोध करते हुये हर स्तर पर एकजुट होकर अमेरिका का मुक़ाबला करें। दूसरा यह कि ‘जिसकी लाठी उसी की भैंस’ वाली अमेरिकी नीति का ही अनुसरण करते हुये पूरी दुनिया ही जंगल राज में बदल जाये। हर ताक़तवर देश अपनी पड़ोसी कमज़ोर देश को निगलने की मानवता व न्याय विरोधी रक्तरंजित योजना पर काम करे। उदाहरण के तौर पर चीन ताइवान को हड़प ले और रूस यूक्रेन पर अपना आधिपत्य स्थापित कर ले ? इस्राईल, फ़िलिस्तीन लेबनान सीरिया पर नियंत्रण कर अपने वृहत्तर इस्राईल के नापाक मंसूबे पर आगे बढ़े ? और इन्हीं ख़तरनाक संभावनाओं के बीच एक उपाय यह भी है कि ईरान परमाणु परीक्षण के द्वारा उत्तर कोरिया की तरह एक ऐसी आत्म रक्षक व “निवारक” रणनीति पर काम करे जो अमेरिका को भी युद्ध से पीछे हटने पर मजबूर कर दे ? तो क्या लंबे समय से चले आ रहे तमाम ईरान विरोधी प्रतिबंधों के बावजूद उस के सामने इस समय वैसी ही स्थिति पैदा हो चुकी है कि आत्मरक्षा के लिये अब उसे परमाणु संपन्न देशों के क्लब में शामिल होना ज़रूरी हो गया है ? 

                    ग़ौर तलब है कि गत 13 जून – 24 जून 2025 के मध्य चला बारह दिवसीय ईरान-इज़राइल युद्ध उस समय शुरू हुआ था जब इज़राइल ने ईरान के कई सैन्य और परमाणु ठिकानों पर बमबारी की थी और ईरान के कई प्रमुख सैन्य अधिकारियों , परमाणु वैज्ञानिकों व प्रमुख राजनेताओं की हत्या कर दी थी साथ ही अनेक नागरिकों को भी मार दिया था। इज़राइल ने उस समय ईरान की वायु सुरक्षा को भी नुक़्सान पहुँचाया था और कई जगह तो इसे पूरी तरह नष्ट भी कर दिया था। इतना ही नहीं बल्कि अमेरिका ने भी इस्राईल के समर्थन में 22 जून को तीन ईरानी परमाणु स्थलों पर बमबारी की। परन्तु बाद में मुंहतोड़ जवाबी कार्रवाई करते हुये ईरान ने 550 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलों और 1,000 से अधिक आत्मघाती ड्रोनों के साथ  बड़े पैमाने पर इस्राईल में राजधानी तेल अवीव सहित कई शहरों पर भीषण हमले किये। कम से कम बारह सैन्य, ऊर्जा और सरकारी स्थलों को निशाना बनाया। यहाँ तक कि कई अमेरिकी सैन्य लक्ष्यों को भी निशाना बनाया। उस दौरान भी पश्चिमी मीडिया ईरानी सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामनेई को लेकर बार बार तरह तरह की अफ़वाह उड़ा रहा था। कभी उन्हें भूमिगत बता देता था तो कभी उनके ईरान छोड़कर भाग जाने की ख़बर फैला देता था। उस समय भी आयतुल्लाह ख़ामनेई जनता को संबोधित करने के लिये सार्वजनिक रूप से दिखाई देते थे और पिछले दिनों भी बिल्कुल वैसा ही दृश्य देखने को मिला। इस बार भी ‘भूमिगत’ होने व ‘मास्को भागने की तैयारी’ जैसी अफ़वाहों के बीच गत शुक्रवार को पुनः आयतुल्लाह ख़ामनेई जनता के सामने आये तथा बेख़ौफ़ होकर ख़ुद अमेरिका को ही हिदायत व नसीहत करते सुने गए। 

                    परन्तु ट्रंप के नेतृत्व वाला वर्तमान अमेरिका वेनेज़ुएला की घटना के बाद तो पूरी तरह बेनक़ाब हो चुका है। दुनिया में सबसे अधिक तेल भण्डार रखने वाले अमेरिका को विश्व के अन्य तेल उत्पादक देशों से अपनी शर्तों पर तेल चाहिये। चाहे इसके लिये कोई भी बहाना बनाकर किसी राष्ट्रपति का अपहरण तक क्यों न करना पड़े। ज़ाहिर है ईरान भी वेनेज़ुएला की ही तरह दुनिया के उन गिने चुने तेल उत्पादक देशों में एक है जो अमेरिका को ‘सर्वशक्तिमान ‘ भी नहीं मानता और न ही उसकी ‘वैश्विक थानेदारी ‘ को स्वीकार करता है। जबकि 1979 की ईरानी इस्लामिक क्रांति से पहले का रज़ा शाह पहलवी का ईरानी शासन अमेरिका का पिट्ठू शासन था। उसी समय से ईरान न केवल अमेरिकी बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा लगाये गयी अनेक प्रतिबंध भी झेलता आ रहा है जोकि निश्चित रूप से ईरान की अर्थव्यवस्था को बेहद कमज़ोर कर रहा है। इन प्रतिबंधों के बावजूद अपने अत्यंत सीमित संसाधनों के बल पर ईरान ने शिक्षा,विज्ञान यहाँ तक कि अंतरिक्ष विज्ञान तक के क्षेत्र में जो तरक़्क़ी की है उसी की झलक गत वर्ष के बारह दिवसीय ईरान-इज़राइल युद्ध में भी देखने को मिली।

                   परन्तु  अब बात इस्राईल की नहीं बल्कि ईरान को सीधे अमेरिका चुनौती दे रहा है। ईरान में चल रहे सरकार विरोधी व अमेरिका -इस्राईल समर्थित प्रदर्शनों को लेकर अमेरिका ने ईरान को चेतावनी दी है कि यदि प्रदर्शनकारियों को मारा गया तो अमेरिका ईरान पर बड़े हमले करेगा। ऐसे में ईरान,अमेरिकी हमलों से बचने के लिये आख़िर कौन सी रणनीति अपना सकता है ? क्या ईरान द्वारा परमाणु परीक्षण किया जाना भी इन्हीं संभावनाओं में एक सबसे प्रमुख है ? क्या निकट भविष्य में ईरान भी परमाणु परीक्षण कर  “परमाणु क्लब” में शामिल हो जाएगा ताकि अमेरिका व इज़राइल जैसे देशों को सैन्य हमले से रोका जा सके ? यदि ईरान में उपजे सत्ता विरोधी प्रदर्शनों के बीच ईरान रूस और चीन जैसे सहयोगी देशों की मदद से परमाणु परीक्षण करता है तो इससे ईरान की जनता में सुरक्षा,स्वाभिमान तथा राष्ट्रवाद बढ़ेगा तो बढ़ेगा ही साथ ही वहां आंतरिक राष्ट्रीय एकता भी बढ़ेगी। इसके अलावा ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव भी बढ़ेगा साथ ही अमेरिकी एकध्रुवीयता का विरोध करने वाले देशों को भी मज़बूती मिलेगी। इसके अलावा दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण दबाव का सामना करती आ रही ईरान की अर्थव्यवस्था में इस परीक्षण से JCPOA के रूप में कई नई संभावनाएँ भी खुल सकती हैं। वैसे भी उत्तर कोरिया द्वारा किये गये परमाणु परीक्षण के बाद ही ट्रंप – की उत्तर कोरिया राष्ट्रपति किम जोंग के साथ 27 -28 फ़रवरी 2019 को वेतनाम के हनोई में मुलाक़ात हुई थी। गोया आज की दुनिया में ख़ासकर अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया में यदि किसी देश को अपना अस्तित्व बचाकर रखना है तो उसका परमाणु संपन्न देश होना ज़रूरी हो चुका है। अन्यथा कभी भी इराक़-वेनेज़ुएला-ग़ज़ा-सीरिया-लेबनान यानी कहीं भी कुछ भी हो सकता है ?

         − तनवीर जाफ़री  

वरिष्ठ पत्रकार