21 अक्टूबर 1943 को हुई थी “आज़ाद हिंद सरकार” की स्थापना

0

⚔️ आज़ाद हिंद फ़ौज की स्थापना

सबसे पहले इस विचार को मूर्त रूप दिया कप्तान मोहन सिंह ने। उन्होंने जापान की सहायता से 1942 में मलाया (अब मलेशिया) में भारतीय युद्धबंदियों से मिलकर “इंडियन नेशनल आर्मी (INA)” का गठन किया।
हालाँकि शुरुआती प्रयास में संगठनात्मक समस्याओं के कारण यह सेना बहुत सक्रिय नहीं हो सकी।

1943 में सुभाषचंद्र बोस जापान पहुँचे। वहाँ उन्होंने भारतीयों से आह्वान किया —

“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा!”

उनके नेतृत्व में आज़ाद हिंद फ़ौज को नई दिशा, ऊर्जा और संगठन मिला। उन्होंकी — और उसी दिन को आज हम आज़ाद हिंद फ़ौज स्थापना दिवस के रूप में मनाते हैं।


🇮🇳 सुभाषचंद्र बोस का नेतृत्व

सुभाषचंद्र बोस ने “नेताजी” के रूप में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक सैन्य स्वरूप दिया। उन्होंने अपने भाषणों और कर्मों से यह विश्वास जगाया कि भारत केवल अहिंसा से नहीं, बल्कि सशस्त्र संघर्ष से भी स्वतंत्र हो सकता है।

उनकी प्रेरक पंक्ति —

“जय हिंद”,
“दिल्ली चलो”,
“आजाद हिंद फौज ज़िंदाबाद”

देशभक्ति के अमर नारे बन गए।

सुभाषचंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज को तीन मुख्य उद्देश्यों के साथ पुनर्गठित किया —

  1. भारत को अंग्रेज़ी शासन से मुक्त कराना।
  2. भारतीयों में आत्मसम्मान और एकता की भावना जगाना।
  3. विदेशी भूमि पर भारतीय स्वतंत्र सरकार की स्थापना कर भारत की स्वतंत्रता की घोषणा करना।

🪖 आज़ाद हिंद फ़ौज की संरचना

आज़ाद हिंद फ़ौज में लगभग 45,000 से अधिक सैनिक थे। इनमें बड़ी संख्या में भारतीय युद्धबंदी और दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीय शामिल थे।
सेना का संगठन इस प्रकार था:

ब्रिगेड “गांधी”, “नेहरू”, “अजीत” और “सुभाष” के नाम से बनाए गए।

“रानी झाँसी रेजिमेंट” नाम से महिलाओं की एक स्वतंत्र यूनिट गठित की गई, जिसका नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने किया — यह भारतीय इतिहास में महिलाओं की पहली युद्ध इकाई थी।

सेना का मुख्यालय सिंगापुर और बाद में रंगून (बर्मा) में स्थापित किया गया।


⚡ युद्ध में भागीदारी

1944 में आज़ाद हिंद फ़ौज ने जापान के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ इंफाल और कोहिमा (मणिपुर) की दिशा में अभियान शुरू किया।
यद्यपि यह अभियान सैन्य दृष्टि से सफल नहीं हो सका, पर इसने ब्रिटिश शासन की जड़ों को हिला दिया।

इस युद्ध के दौरान सैनिकों ने असाधारण साहस दिखाया। वे जानते थे कि उनके पास सीमित संसाधन हैं, फिर भी उन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए जान की बाज़ी लगा दी।


🕊️ आज़ाद हिंद सरकार की घोषणा

21 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आज़ाद हिंद सरकार की घोषणा की और स्वयं उसका प्रधानमंत्री तथा सेना प्रमुख बने।
सरकार का ध्येय वाक्य था —

“Ittehad, Itmad aur Qurbani” (एकता, विश्वास और बलिदान)।

इस सरकार को जापान, जर्मनी, इटली, बर्मा, फिलीपींस और कई अन्य देशों ने मान्यता दी।
आज़ाद हिंद फ़ौज ने स्वतंत्र भारत के लिए राष्ट्रीय ध्वज, मुद्रा, और न्याय व्यवस्था की भी स्थापना की — यह स्वतंत्र भारत का पूर्वाभास था।


⚖️ आज़ाद हिंद फ़ौज के मुकदमे और प्रभाव

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों को गिरफ्तार कर दिल्ली के लाल किले में मुकदमे चलाए।
इन मुकदमों ने पूरे देश में जनजागरण की लहर पैदा कर दी।
हिंदू, मुस्लिम और सिख सैनिकों पर एक साथ मुकदमा चलाया गया, जिससे देशभर में राष्ट्रीय एकता की भावना प्रबल हुई।

कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य दलों ने भी इन सैनिकों के समर्थन में प्रदर्शन किए। यह वह समय था जब ब्रिटिश सरकार समझ चुकी थी कि भारत अब अधिक समय तक दास नहीं रह सकता।


🇮🇳 आज़ाद हिंद फ़ौज की विरासत

आज़ाद हिंद फ़ौज का योगदान केवल सैन्य नहीं, बल्कि मानसिक और राष्ट्रीय चेतना का भी था। इसने भारतीयों को यह सिखाया कि वे अपनी आज़ादी स्वयं छीन सकते हैं।
इस फौज ने यह दिखाया कि देशभक्ति, एकता और त्याग के बिना स्वतंत्रता संभव नहीं।

भारत की स्वतंत्रता के बाद भी नेताजी और आज़ाद हिंद फ़ौज की स्मृति राष्ट्र के प्रेरणा स्रोत बनी रही। भारतीय सशस्त्र बलों में आज भी “जय हिंद” का नारा उसी विरासत का प्रतीक है।


🏵️ निष्कर्ष

आज़ाद हिंद फ़ौज का स्थापना दिवस केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं, बल्कि देशभक्ति, त्याग और आत्मसम्मान का पर्व है।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता किसी उपहार से नहीं, बल्कि बलिदान से प्राप्त होती है।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस और उनके साथियों ने जो सपना देखा था — वह भारत आज एक स्वतंत्र, सशक्त और एकजुट राष्ट्र के रूप में जी रहा है।
उनका आदर्श हमें प्रेरित करता है कि हम हमेशा अपने देश, अपनी आज़ादी और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहें।

“जय हिंद! आज़ाद हिंद फ़ौज अमर रहे!”

शम्मी कपूर : हिंदी सिनेमा के याहू स्टार

0

🎬

भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो अपने समय से आगे जीते हैं — जिनका अभिनय, संगीत पर नृत्य, और ऊर्जा दर्शकों के दिलों में स्थायी छाप छोड़ जाते हैं। शम्मी कपूर उन्हीं में से एक हैं। वे 1950 और 1960 के दशक के वह सितारे थे जिन्होंने हिंदी फिल्मों में रोमांस और रॉक-एन-रोल की नई परंपरा शुरू की। उनकी चुलबुली अदाएं, आत्मविश्वास से भरा व्यक्तित्व और अनोखा नृत्य अंदाज़ ने उन्हें बॉलीवुड का “एल्विस प्रेस्ली ऑफ इंडिया” बना दिया।


प्रारंभिक जीवन

शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्टूबर 1931 को मुंबई में हुआ था। वे हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के पुत्र और राज कपूर तथा शशि कपूर के छोटे भाई थे। इस तरह वे कपूर परिवार की तीसरी पीढ़ी के कलाकार थे, जो भारतीय फिल्म जगत में अपनी विरासत के लिए प्रसिद्ध है।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के डॉन बॉस्को स्कूल और रामनारायण रुइया कॉलेज में हुई। लेकिन अभिनय उनके रक्त में था — बचपन से ही वे थिएटर और फिल्मों के माहौल में पले-बढ़े। अपने पिता की “पृथ्वी थिएटर” संस्था से उन्होंने अभिनय की बारीकियाँ सीखीं।


फिल्मी करियर की शुरुआत

शम्मी कपूर ने अपने फिल्मी जीवन की शुरुआत 1953 में फिल्म “जीवन ज्योति” से की। शुरुआती दौर में उन्होंने गंभीर और पारंपरिक भूमिकाएँ निभाईं, लेकिन ये फिल्में ज्यादा नहीं चलीं। वे नायक के रूप में अपनी जगह नहीं बना पा रहे थे।

उनका भाग्य तब बदला जब उन्होंने अपनी छवि को पूरी तरह बदलने का निर्णय लिया। उन्होंने पारंपरिक गंभीर नायक की जगह एक आधुनिक, मस्तीभरे, रोमांटिक और बिंदास हीरो की पहचान बनाई। यह प्रयोग 1957 की फिल्म “तुमसा नहीं देखा” से शुरू हुआ — और दर्शकों ने इस नए शम्मी कपूर को हाथों-हाथ स्वीकार कर लिया।


सफलता का दौर

1957 से 1969 तक का समय शम्मी कपूर के करियर का स्वर्णिम युग रहा। उन्होंने एक के बाद एक सुपरहिट फिल्में दीं —

“दिल देके देखो” (1959)

“जंगली” (1961)

“कश्मीर की कली” (1964)

“राजकुमार” (1964)

“जनवर” (1965)

“तीसरी मंज़िल” (1966)

“ब्रह्मचारी” (1968)

फिल्म “जंगली” के गीत “Yahoo! Chahe koi mujhe junglee kahe” ने उन्हें अमर बना दिया। इस गीत के साथ शम्मी कपूर ने हिंदी फिल्मों के नायक की पारंपरिक छवि को तोड़ दिया। उनका मस्ती भरा नृत्य, खुले बाल, आज़ाद मुस्कान और आत्मविश्वास से भरा अंदाज़ भारतीय दर्शकों के लिए बिल्कुल नया था।


अभिनय शैली और नृत्य

शम्मी कपूर की सबसे बड़ी पहचान उनकी ऊर्जावान अभिनय शैली थी। वे केवल नाचते नहीं थे — हर गाने को नाटकीय भावनाओं और चेहरे की अदाओं से जीवंत कर देते थे।
उनकी हर हरकत में संगीत की लय महसूस होती थी। उस समय जब हिंदी फिल्मों में नृत्य की शैली सीमित थी, शम्मी कपूर ने उसमें रॉक एंड रोल, जैज़ और स्विंग जैसे पाश्चात्य तत्वों को जोड़ा।

उनकी खासियत यह थी कि वे स्क्रीन पर पूरी तरह “जीते” थे — चाहे वह पहाड़ों पर गाना गा रहे हों या प्रेमिका से छेड़छाड़ कर रहे हों, उनका हर दृश्य जोश और उत्साह से भरा होता था।


संगीत और शम्मी कपूर का जादू

शम्मी कपूर की सफलता में संगीत का विशेष योगदान रहा। उनके अधिकांश गीत मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में फिल्माए गए — और यह जोड़ी इतिहास बन गई।
“तुमसा नहीं देखा”, “दिल देके देखो”, “आओ तुम्हें चाँद पे ले जाएँ”, “ऐ हुस्न ज़रा जाग”, “आजा आजा मैं हूँ प्यार तेरा”, और “ओ हसीना ज़ुल्फों वाली” जैसे गीत आज भी युवाओं को झूमने पर मजबूर कर देते हैं।

मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में शम्मी कपूर की अदाएं मिलकर सिनेमा को ऐसा संगीतात्मक आकर्षण देती थीं जो आज भी अमर है।


निजी जीवन

शम्मी कपूर का विवाह प्रसिद्ध अभिनेत्री गीता बाली से हुआ था। गीता बाली उनके जीवन की प्रेरणा थीं, लेकिन 1965 में उनकी मृत्यु ने शम्मी कपूर को गहरा आघात दिया।
बाद में उन्होंने नीलू कपूर से विवाह किया, जिन्होंने जीवन के उत्तरार्ध में उनका साथ दिया।

शम्मी कपूर आधुनिक तकनीक के भी शौकीन थे। वे इंटरनेट और नई तकनीक के शुरुआती दौर में भारत में “Internet Users Club of India” के संस्थापक अध्यक्ष बने। इस वजह से उन्हें “Cyber Kapoor” भी कहा गया।


बाद के वर्ष और सम्मान

1970 के दशक के बाद शम्मी कपूर ने चरित्र भूमिकाएँ निभानी शुरू कीं। उन्होंने “परवरिश”, “प्रेम रोग”, “बेताब”, और “रॉकस्टार” (2011) जैसी फिल्मों में पिता या वरिष्ठ किरदार निभाए।
2011 में “रॉकस्टार” उनके जीवन की अंतिम फिल्म साबित हुई।

उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई पुरस्कार मिले —

फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार – ब्रह्मचारी (1968)

फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड (1995)

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (जीवन गौरव सम्मान)

शम्मी कपूर का निधन 14 अगस्त 2011 को हुआ, लेकिन वे अपने चाहने वालों के दिलों में आज भी “याहू” की तरह गूंजते हैं।


निष्कर्ष

शम्मी कपूर केवल एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि आज़ादी, ऊर्जा और रोमांस के प्रतीक थे। उन्होंने 1950 के दशक के गंभीर नायकों की छवि को बदलकर हिंदी फिल्मों को नई ताजगी दी। उनके भीतर का कलाकार हमेशा युवाओं की तरह जीवंत रहा — चाहे वे 30 के हों या 70 के।

उनकी फिल्मों ने यह साबित किया🎬 शम्मी कपूर : हिंदी सिनेमा के याहू स्टार

भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो अपने समय से आगे जीते हैं — जिनका अभिनय, संगीत पर नृत्य, और ऊर्जा दर्शकों के दिलों में स्थायी छाप छोड़ जाते हैं। शम्मी कपूर उन्हीं में से एक हैं। वे 1950 और 1960 के दशक के वह सितारे थे जिन्होंने हिंदी फिल्मों में रोमांस और रॉक-एन-रोल की नई परंपरा शुरू की। उनकी चुलबुली अदाएं, आत्मविश्वास से भरा व्यक्तित्व और अनोखा नृत्य अंदाज़ ने उन्हें बॉलीवुड का “एल्विस प्रेस्ली ऑफ इंडिया” बना दिया।


प्रारंभिक जीवन

शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्टूबर 1931 को मुंबई में हुआ था। वे हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के पुत्र और राज कपूर तथा शशि कपूर के छोटे भाई थे। इस तरह वे कपूर परिवार की तीसरी पीढ़ी के कलाकार थे, जो भारतीय फिल्म जगत में अपनी विरासत के लिए प्रसिद्ध है।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के डॉन बॉस्को स्कूल और रामनारायण रुइया कॉलेज में हुई। लेकिन अभिनय उनके रक्त में था — बचपन से ही वे थिएटर और फिल्मों के माहौल में पले-बढ़े। अपने पिता की “पृथ्वी थिएटर” संस्था से उन्होंने अभिनय की बारीकियाँ सीखीं।


फिल्मी करियर की शुरुआत

शम्मी कपूर ने अपने फिल्मी जीवन की शुरुआत 1953 में फिल्म “जीवन ज्योति” से की। शुरुआती दौर में उन्होंने गंभीर और पारंपरिक भूमिकाएँ निभाईं, लेकिन ये फिल्में ज्यादा नहीं चलीं। वे नायक के रूप में अपनी जगह नहीं बना पा रहे थे।

उनका भाग्य तब बदला जब उन्होंने अपनी छवि को पूरी तरह बदलने का निर्णय लिया। उन्होंने पारंपरिक गंभीर नायक की जगह एक आधुनिक, मस्तीभरे, रोमांटिक और बिंदास हीरो की पहचान बनाई। यह प्रयोग 1957 की फिल्म “तुमसा नहीं देखा” से शुरू हुआ — और दर्शकों ने इस नए शम्मी कपूर को हाथों-हाथ स्वीकार कर लिया।


सफलता का दौर

1957 से 1969 तक का समय शम्मी कपूर के करियर का स्वर्णिम युग रहा। उन्होंने एक के बाद एक सुपरहिट फिल्में दीं —

“दिल देके देखो” (1959)

“जंगली” (1961)

“कश्मीर की कली” (1964)

“राजकुमार” (1964)

“जनवर” (1965)

“तीसरी मंज़िल” (1966)

“ब्रह्मचारी” (1968)

फिल्म “जंगली” के गीत “Yahoo! Chahe koi mujhe junglee kahe” ने उन्हें अमर बना दिया। इस गीत के साथ शम्मी कपूर ने हिंदी फिल्मों के नायक की पारंपरिक छवि को तोड़ दिया। उनका मस्ती भरा नृत्य, खुले बाल, आज़ाद मुस्कान और आत्मविश्वास से भरा अंदाज़ भारतीय दर्शकों के लिए बिल्कुल नया था।


अभिनय शैली और नृत्य

शम्मी कपूर की सबसे बड़ी पहचान उनकी ऊर्जावान अभिनय शैली थी। वे केवल नाचते नहीं थे — हर गाने को नाटकीय भावनाओं और चेहरे की अदाओं से जीवंत कर देते थे।
उनकी हर हरकत में संगीत की लय महसूस होती थी। उस समय जब हिंदी फिल्मों में नृत्य की शैली सीमित थी, शम्मी कपूर ने उसमें रॉक एंड रोल, जैज़ और स्विंग जैसे पाश्चात्य तत्वों को जोड़ा।

उनकी खासियत यह थी कि वे स्क्रीन पर पूरी तरह “जीते” थे — चाहे वह पहाड़ों पर गाना गा रहे हों या प्रेमिका से छेड़छाड़ कर रहे हों, उनका हर दृश्य जोश और उत्साह से भरा होता था।


संगीत और शम्मी कपूर का जादू

शम्मी कपूर की सफलता में संगीत का विशेष योगदान रहा। उनके अधिकांश गीत मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में फिल्माए गए — और यह जोड़ी इतिहास बन गई।
“तुमसा नहीं देखा”, “दिल देके देखो”, “आओ तुम्हें चाँद पे ले जाएँ”, “ऐ हुस्न ज़रा जाग”, “आजा आजा मैं हूँ प्यार तेरा”, और “ओ हसीना ज़ुल्फों वाली” जैसे गीत आज भी युवाओं को झूमने पर मजबूर कर देते हैं।

मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में शम्मी कपूर की अदाएं मिलकर सिनेमा को ऐसा संगीतात्मक आकर्षण देती थीं जो आज भी अमर है।


निजी जीवन

शम्मी कपूर का विवाह प्रसिद्ध अभिनेत्री गीता बाली से हुआ था। गीता बाली उनके जीवन की प्रेरणा थीं, लेकिन 1965 में उनकी मृत्यु ने शम्मी कपूर को गहरा आघात दिया।
बाद में उन्होंने नीलू कपूर से विवाह किया, जिन्होंने जीवन के उत्तरार्ध में उनका साथ दिया।

शम्मी कपूर आधुनिक तकनीक के भी शौकीन थे। वे इंटरनेट और नई तकनीक के शुरुआती दौर में भारत में “Internet Users Club of India” के संस्थापक अध्यक्ष बने। इस वजह से उन्हें “Cyber Kapoor” भी कहा गया।


बाद के वर्ष और सम्मान

1970 के दशक के बाद शम्मी कपूर ने चरित्र भूमिकाएँ निभानी शुरू कीं। उन्होंने “परवरिश”, “प्रेम रोग”, “बेताब”, और “रॉकस्टार” (2011) जैसी फिल्मों में पिता या वरिष्ठ किरदार निभाए।
2011 में “रॉकस्टार” उनके जीवन की अंतिम फिल्म साबित हुई।

उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई पुरस्कार मिले —

फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार – ब्रह्मचारी (1968)

फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड (1995)

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (जीवन गौरव सम्मान)

शम्मी कपूर का निधन 14 अगस्त 2011 को हुआ, लेकिन वे अपने चाहने वालों के दिलों में आज भी “याहू” की तरह गूंजते हैं।


निष्कर्ष

शम्मी कपूर केवल एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि आज़ादी, ऊर्जा और रोमांस के प्रतीक थे। उन्होंने 1950 के दशक के गंभीर नायकों की छवि को बदलकर हिंदी फिल्मों को नई ताजगी दी। उनके भीतर का कलाकार हमेशा युवाओं की तरह जीवंत रहा — चाहे वे 30 के हों या 70 के।

उनकी फिल्मों ने यह साबित किया कि सिनेमा केवल अभिनय नहीं, बल्कि जीवन की लय का उत्सव है।
आज जब भी “Yahoo!” की आवाज़ गूंजती है, तो दर्शकों के दिल में वही पुराना जोश लौट आता है — क्योंकि शम्मी कपूर सिर्फ अभिनेता नहीं, भारतीय सिनेमा की आत्मा का मस्तीभरा चेहरा हैं। कि सिनेमा केवल अभिनय नहीं, बल्कि जीवन की लय का उत्सव है।
आज जब भी “Yahoo!” की आवाज़ गूंजती है, तो दर्शकों के दिल में वही पुराना जोश लौट आता है — क्योंकि शम्मी कपूर सिर्फ अभिनेता नहीं, भारतीय सिनेमा की आत्मा का मस्तीभरा चेहरा हैं।

बॉलीवुड की नृत्य सम्राज्ञी : हेलन

0

भारतीय सिनेमा के सुनहरे इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल अपनी कला से नहीं, बल्कि अपनी शख्सियत से भी अमर हो गए। हेलन ऐसा ही एक नाम है — जिन्होंने नृत्य को अभिनय की आत्मा बना दिया। उनकी अदा, नृत्य की लय, और मंच पर उनकी ऊर्जा ने उन्हें “बॉलीवुड की कैबरे क्वीन” का दर्जा दिलाया। हेलन केवल एक नर्तकी नहीं थीं, वे भारतीय फिल्म संगीत और नृत्य के बदलते स्वरूप की प्रतीक बन गईं।


प्रारंभिक जीवन

हेलन का पूरा नाम हेलन ऐन रिचर्डसन खान है। उनका जन्म 21 नवंबर 1938 को बर्मा (अब म्यांमार) में हुआ था। उनके पिता एंग्लो-इंडियन थे और माँ बर्मीज़ थीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब जापानी सेना ने बर्मा पर हमला किया, तब हेलन का परिवार वहां से भारत भाग आया। लंबी कठिन यात्रा के बाद वे कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुंचे।

कठिन परिस्थितियों में पली-बढ़ी हेलन को पढ़ाई पूरी करने का अवसर नहीं मिला, लेकिन नृत्य के प्रति उनका रुझान बचपन से ही था। घर की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उन्होंने बहुत कम उम्र में नृत्य करना शुरू किया।


फिल्मी करियर की शुरुआत

हेलन का फिल्मी सफर 1951 में शुरू हुआ, जब वे मात्र 13 वर्ष की थीं। उन्होंने सबसे पहले समूह नर्तकी (group dancer) के रूप में फिल्मों में काम किया।
उनकी पहली बड़ी सफलता मिली फिल्म “आवारा” (1951) के गीत “गाने वाले से होशियार” में बैकग्राउंड डांसर के रूप में।

लेकिन 1958 की फिल्म “हावड़ा ब्रिज” में गीत “मेरा नाम चिन चिन चू” ने उन्हें रातोंरात प्रसिद्धि दिला दी। इस गीत में हेलन की ऊर्जा, नृत्य की लचक और उनकी अनोखी अदाएं दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गईं। तभी से वे हिंदी सिनेमा की पहली ग्लैमरस डांसर के रूप में स्थापित हो गईं।


1960–70 का स्वर्णिम दौर

1960 और 1970 के दशक को हेलन के करियर का स्वर्णिम युग कहा जा सकता है। उन्होंने एक के बाद एक सुपरहिट फिल्मों में नृत्य और अभिनय किया। उनके प्रसिद्ध गीतों में शामिल हैं —

“पिया तू अब तो आ जा” (कारवां, 1971)

“ये मेरा दिल” (डॉन, 1978)

“महबूबा महबूबा” (शोले, 1975)

“आज जाने की ज़िद न करो” (कैमियो प्रस्तुति)

“मोनिका, ओ माय डार्लिंग” (कारवां)

इन गीतों में हेलन की नृत्य शैली भारतीय शास्त्रीय नृत्य और पश्चिमी नृत्य दोनों का अनोखा मिश्रण थी। उनके नृत्य में लय, सौंदर्य, और आत्मविश्वास का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।


अभिनय में विविधता

हेलन को केवल कैबरे डांसर कहना उचित नहीं होगा। उन्होंने कई फिल्मों में महत्वपूर्ण अभिनय भूमिकाएँ भी निभाईं।
जैसे —

“लैला मजनू”,

“इम्तिहान”,

“शोले”,

“डॉन”,

“हम किसी से कम नहीं”,

“अमर अकबर एंथनी”।

इन फिल्मों में हेलन ने सशक्त और प्रभावशाली सह भूमिकाएँ निभाईं। उनके संवादों की अदायगी में भी वही निखार था जो उनके नृत्य में दिखाई देता था।


संघर्ष और आत्मसम्मान

हेलन का जीवन केवल शोहरत से नहीं, बल्कि संघर्ष से भी भरा रहा। शुरुआती वर्षों में उन्हें सामाजिक आलोचना का सामना करना पड़ा क्योंकि उस दौर में “कैबरे डांसर” को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था।
लेकिन हेलन ने अपनी मेहनत, प्रतिभा और शालीनता से समाज की उस सोच को बदल दिया।

वे कभी किसी विवाद में नहीं रहीं और अपनी मर्यादा के भीतर रहकर काम करती रहीं। यही कारण है कि आज उन्हें केवल एक नर्तकी नहीं, बल्कि एक कला-साधिका के रूप में सम्मान दिया जाता है।


सलमान खान परिवार से जुड़ाव

हेलन ने प्रसिद्ध पटकथा लेखक और गीतकार सलीम खान से विवाह किया, जो सलमान खान के पिता हैं। विवाह के बाद भी हेलन का फिल्मी सफर कुछ वर्षों तक जारी रहा। सलीम खान के परिवार ने हमेशा उन्हें सम्मान और अपनापन दिया।

आज वे सलमान खान, अलविरा, अर्पिता, और अर्बाज़ खान के परिवार का अभिन्न हिस्सा हैं।


पुरस्कार और सम्मान

हेलन को उनके अद्वितीय योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए।

फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड (1999)

पद्मश्री (2009) – भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए

लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड (IIFA, Zee Cine Awards)

इन सम्मानों ने हेलन को भारतीय सिनेमा की “लिविंग लीजेंड” का दर्जा दिलाया।


बाद के वर्ष और पुनः आगमन

फिल्मों से धीरे-धीरे दूरी बनाने के बाद भी हेलन ने अभिनय से पूरी तरह नाता नहीं तोड़ा।
उन्होंने 2000 के दशक में “हम दिल दे चुके सनम”, “मोहब्बतें”, “क्वीन” और कुछ वेब सीरीज़ में भी छोटी भूमिकाएँ निभाईं।

उनकी उपस्थिति चाहे कुछ ही मिनटों की क्यों न हो, पर हर बार दर्शकों को उनकी विनम्रता और गरिमा ने प्रभावित किया।


निष्कर्ष

हेलन भारतीय सिनेमा की वह शख्सियत हैं जिन्होंने नृत्य को ग्लैमर से आगे बढ़ाकर एक कला का रूप दिया। उन्होंने उस समय महिलाओं को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी होने की प्रेरणा दी जब समाज में यह आसान नहीं था।

उनकी जिंदगी यह संदेश देती है कि “प्रतिभा और परिश्रम किसी भी सीमित परिभाषा को तोड़ सकते हैं।”

आज भी जब “पिया तू अब तो आ जा” या “ये मेरा दिल” जैसे गीत बजते हैं, तो दर्शकों के मन में हेलन की वही चमकती हुई मुस्कान और नृत्य की छवि ताज़ा हो उठती है।

हेलन सिर्फ एक नर्तकी नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की नृत्य आत्मा हैं — जिन्होंने अपने लयबद्ध कदमों से पीढ़ियों को मोहित कर दिया।

84 वर्षीय मशहूर कॉमेडियन और एक्टर असरानी का निधन

0

आज दोपहर तीन बजे जुहू स्थित आरोग्यानिधि अस्पताल में 84 वर्षीय मशहूर कॉमेडियन और एक्टर असरानी का निधन हो गया। वह पिछले चार दिनों से अस्वस्थ थे और अस्पताल में भर्ती थे। असरानी का अंतिम संस्कार आज सांताक्रूज पश्चिम स्थित शास्त्री नगर श्मशान घाट पर हुआ। वहां कोई भी फिल्मी हस्ती मौजूद नहीं थी।

फिल्म ‘शोले’ में जेलर का किरदार निभाकर मशहूर हुए कॉमेडियन और एक्टर असरानी ने आज सुबह ही अपने फैंस को दीवाली की शुभकामनाएं दी थीं। इसके चंद घंटों बाद उनका निधन हो गया।दरअसल, असरानी ने आज सुबह ही अपनी पत्नी मंजू से कहा था कि वे अपने अंतिम समय में कोई भीड़ नहीं चाहते, न ही लोगों को परेशान नहीं करना चाहते। वे शांतिपूर्वक जाना चाहते हैं। ऐसे में एक्टर के निधन के बाद पत्नी मंजू ने असरानी के सचिव से अनुरोध किया था कि वह किसी को भी इसकी जानकारी न दें।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी हास्य कलाकारों की चर्चा होती है, तो असरानी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। लगभग छह दशकों से अधिक लंबे अपने अभिनय सफर में असरानी ने गंभीर, हास्य और चरित्र भूमिकाओं में ऐसी विविधता दिखाई है कि वे दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ गए। उनकी मुस्कान, संवाद-अदायगी और अभिव्यक्ति का अपना अलग अंदाज़ है, जो उन्हें अन्य हास्य कलाकारों से अलग पहचान देता है।


प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

असरानी का पूरा नाम गोवर्धन असरानी है। उनका जन्म एक जनवरी 1941 को राजस्थान के जयपुर में एक सिंधी परिवार में हुआ। बचपन से ही असरानी को अभिनय और नकल करने का शौक था। वे अपने स्कूल में शिक्षकों और दोस्तों की नकल उतारकर सबका मनोरंजन किया करते थे। प्रारंभिक शिक्षा जयपुर में पूरी करने के बाद उन्होंने मुंबई का रुख किया।

मुंबई आने के बाद असरानी ने फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया (FTII), पुणे में दाखिला लिया। यह वही संस्थान था, जिसने बाद में बॉलीवुड को शबाना आज़मी, जया भादुरी, शत्रुघ्न सिन्हा और मिथुन चक्रवर्ती जैसे बड़े कलाकार दिए। एफटीआईआई में असरानी को अभिनय की बारीकियाँ सीखने का अवसर मिला और यहीं से उन्होंने अभिनय को अपने जीवन का ध्येय बना लिया।


फिल्मी करियर की शुरुआत

असरानी ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1960 के दशक में की। उनकी पहली प्रमुख फिल्म थी “हरे कांच की चुड़ियाँ” (1967), जिसमें उन्होंने छोटी लेकिन प्रभावशाली भूमिका निभाई। शुरुआती दिनों में असरानी को संघर्ष करना पड़ा क्योंकि वे किसी पारंपरिक नायक की तरह नहीं दिखते थे। लेकिन उन्होंने अपनी कॉमिक टाइमिंग और सादगी भरे अभिनय से धीरे-धीरे फिल्म निर्माताओं का ध्यान खींच लिया।

1970 के दशक में असरानी का करियर तेजी से आगे बढ़ा। इस दशक में उन्होंने कई हिट फिल्मों में काम किया, जिनमें “छोटी बहू” (1971), “अभिमान” (1973), “शोले” (1975), “चुपके चुपके” (1975), “अमदानी अठन्नी खर्चा रूपैया”, “बावर्ची”, और “गोलमाल” (1979) जैसी फिल्में उल्लेखनीय हैं।


“शोले” का जेलर : असरानी की अमर भूमिका

यदि असरानी के करियर की सबसे यादगार भूमिका की बात की जाए, तो वह निस्संदेह फिल्म “शोले” का जेलर वाला किरदार है। यह भूमिका कुछ ही मिनटों की थी, पर असरानी ने इसे इतने जीवंत ढंग से निभाया कि वह हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर हो गई।

उनका प्रसिद्ध संवाद —
“हम अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हैं…”
आज भी दर्शकों की ज़ुबान पर है। इस किरदार ने असरानी को हास्य अभिनय की परंपरा में एक स्थायी स्थान दिला दिया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि अभिनय की ताकत समय की सीमा से परे होती है — छोटी भूमिका भी अमर हो सकती है अगर कलाकार उसे पूरी ईमानदारी और ऊर्जा से निभाए।


बहुमुखी कलाकार

असरानी को केवल हास्य अभिनेता कहना उनके साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने कई गंभीर और भावनात्मक भूमिकाएँ भी निभाई हैं। जैसे कि “अभिमान” में जया भादुरी के भाई की भूमिका, और “जिद्दी”, “नामक हराम” तथा “खिलौना” जैसी फिल्मों में उनके अभिनय ने दिखाया कि वे हर प्रकार की भूमिका निभाने में सक्षम हैं।

उनकी खासियत यह रही कि वे मुख्य नायक के साए में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रहते थे। चाहे अमिताभ बच्चन के साथ सीन हो या राजेश खन्ना के साथ, असरानी का अभिनय हमेशा सहज और स्वाभाविक रहा।


निर्देशक और लेखक के रूप में असरानी

असरानी ने सिर्फ अभिनय तक अपने को सीमित नहीं रखा। उन्होंने निर्देशन और पटकथा लेखन में भी हाथ आज़माया।
1977 में उन्होंने फिल्म “ओम शांति ओम” (1977, राजेश खन्ना के साथ) का निर्देशन किया।
इसके अलावा उन्होंने गुजराती फिल्मों में भी निर्देशक के रूप में काम किया और कुछ धारावाहिकों का भी निर्माण किया।


टेलीविज़न और नई पीढ़ी के साथ जुड़ाव

1990 के दशक में जब हिंदी टेलीविज़न तेजी से उभर रहा था, असरानी ने भी इस माध्यम को अपनाया। उन्होंने लोकप्रिय सीरियल “हम सब एक हैं” और “फनी फैमिली डॉट कॉम” में अपनी शानदार हास्य उपस्थिति दर्ज कराई।

नए सदी में भी असरानी सक्रिय रहे। उन्होंने “हेरा फेरी”, “मालामाल वीकली”, “धूम”, “भूल भुलैया” और “वेलकम” जैसी फिल्मों में महत्वपूर्ण सह भूमिकाएँ निभाईं।


निजी जीवन

असरानी ने अभिनेत्री मनोहरा असरानी (मेनका) से विवाह किया। वे भी एक अभिनेत्री थीं और कई गुजराती तथा हिंदी फिल्मों में काम कर चुकी हैं। असरानी और मेनका का एक बेटा है, जो फिल्म निर्माण के क्षेत्र में सक्रिय है। असरानी का पारिवारिक जीवन हमेशा अनुशासन और सरलता से भरा रहा।


पुरस्कार और सम्मान

असरानी को उनके उत्कृष्ट अभिनय के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

फिल्मफेयर पुरस्कार (1974) – सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (“आ अब लौट चलें”)

गुजरात राज्य पुरस्कार – गुजराती फिल्मों में योगदान के लिए

लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड – हिंदी सिनेमा में दीर्घकालीन योगदान के लिए

उनका नाम हिंदी सिनेमा के उन चंद कलाकारों में लिया जाता है जिन्होंने हंसी के माध्यम से सामाजिक संदेश देने का काम भी किया।


असरानी की अभिनय शैली

असरानी के अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता है उनकी संयमित हास्य शैली। वे हंसी को कभी फूहड़ता में नहीं बदलते। उनकी कॉमिक टाइमिंग, संवाद की गति और चेहरों के हावभाव इतने सटीक होते हैं कि दर्शक अनायास ही मुस्कुरा उठते हैं।

उनकी अदायगी में अक्सर चार्ली चैपलिन की झलक दिखाई देती है—मूक अभिनय, सहजता और मानवीय संवेदना। असरानी ने हमेशा कहा है कि “हास्य सबसे कठिन अभिनय है क्योंकि इसमें दर्शक को वास्तविक आनंद महसूस कराना पड़ता है।”


निष्कर्ष

असरानी भारतीय सिनेमा के उन दुर्लभ कलाकारों में से हैं जिन्होंने हास्य को कला का दर्जा दिया। उन्होंने यह साबित किया कि हँसाना उतना ही कठिन है जितना रुलाना। उनकी हर भूमिका में ईमानदारी, सादगी और मौलिकता झलकती है।

आज भी असरानी फिल्म जगत में सक्रिय हैं और नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने हिंदी सिनेमा में जो योगदान दिया है, वह आने वाले वर्षों तक याद किया जाएगा।

उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि अभिनय केवल प्रसिद्धि का साधन नहीं, बल्कि यह समाज को खुशी देने का माध्यम भी हो सकता है।


असरानी — हंसी के सम्राट, सादगी के प्रतीक और भारतीय सिनेमा की जीवित धरोहर हैं।

राजेश खन्ना के साथ की 25 फिल्में
पहली फिल्म में अपने अभिनय से सबका दिल जीतने वाले असरानी ने साल 1967 में गुजराती फिल्म में मुख्य किरदार निभाया। उन्होंने चार और गुजराती फिल्मों में अभिनय किया। साल 1971 के बाद से असरानी को फिल्मों में कॉमेडियन का किरदार या अभिनेता के दोस्त का किरदार मिलने लगा।  उन्होंने 1970 से लेकर 1979 तक 101 फिल्मों में काम किया। फिल्म ‘नमक हराम’ में काम करने के बाद असरानी और राजेश खन्ना दोस्त बन गए। इसके बाद राजेश खन्ना जिस फिल्म में काम करते, वह निर्माताओं से कहते कि असरानी को भी काम दें। असरानी ने राजेश खन्ना के साथ 25 फिल्मों में काम किया।

असरानी की हिट फिल्में
असरानी ने 1970 के दशक में कई फिल्मों में कॉमेडियन का किरदार निभाया। इन फिल्मों में ‘शोले’, ‘चुपके चुपके’, ‘छोटी सी बात’, ‘रफू चक्कर’, ‘फकीरा’, ‘हीरा लाल पन्नालाल’ और ‘पति पत्नी और वो’ शामिल हैं। कई फिल्मों में कॉमेडियन का किरदार निभाने वाले असरानी ने ‘खून पसीना’ में सीरियस रोल भी निभाया है।
2000 के दशक में असरानी ने कई कॉमेडी फिल्मों में यादगार अभिनय किया। इसमें ‘चुप चुप के’, ‘हेरा फेरी’, ‘हलचल’, ‘दीवाने हुए पागल’, ‘गरम मसाला’, ‘भागम भाग’ और ‘मालामाल वीकली’ शामिल हैं।

फिल्मी खलनायक जीवन की विरासत को बढ़ाता उनका बेटा

0

बॉलीवुड में अगर उन चेहरों की बात की जाए जिन्होंने बुरे किरदार निभाकर भी दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी, तो जीवन (Jeevan) का नाम सबसे ऊपर आता है। वही जीवन, जिन्होंने 1935 से लेकर 1990 तक सिनेमा में खलनायक की परिभाषा ही बदल दी थी। मगर कहानी यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि उनके बेटे किरण कुमार (Kiran Kumar) ने इस विरासत को न सिर्फ आगे बढ़ाया, बल्कि उसे नए आयाम भी दिए।

खलनायक का बेटा, जिसने अपने नाम से बनाई अलग पहचान

कश्मीरी पंडित परिवार से ताल्लुक रखने वाले किरण कुमार बचपन से ही बेहद शरारती थे। पिता जीवन कुमार, जो उस दौर के सबसे चर्चित विलेन थे, अक्सर बेटे की हरकतों से परेशान रहते थे। एक दिन उन्होंने तय किया कि अब बेटे को अनुशासन सिखाना ही होगा। किरण को बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया। वहां उन्होंने पढ़ाई से ज्यादा क्रिकेट और ड्रामा में नाम कमाया। पिता ने स्कूल के बाहर लगे बोर्ड की ओर इशारा कर कहा था — “एक दिन तुम्हारा नाम यहां लिखा होना चाहिए।” शायद तभी से किरण के भीतर कुछ बड़ा करने की जिद पलने लगी।

जब एफटीआईआई में हुई लड़ाई और पुलिस बुलानी पड़ी

स्कूल के बाद किरण की मुलाकात शत्रुघ्न सिन्हा से हुई, जो उस समय फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से नए-नए निकले थे। सिन्हा ने उन्हें अभिनय सीखने की सलाह दी और किरण वहां दाखिल हो गए। मगर एक दिन वहां ऐसी घटना हुई जिसने उनकी जिंदगी का रास्ता ही बदल दिया। एक्टिंग डिपार्टमेंट और डायरेक्शन डिपार्टमेंट के छात्रों में जोरदार झगड़ा हुआ। बात इतनी बढ़ी कि पुलिस बुलानी पड़ी और किरण सहित चार छात्रों को कॉलेज से निकाल दिया गया। यही वह मोड़ था, जहां उनकी किस्मत ने करवट ली।

ख्वाजा अहमद अब्बास ने डांट लगाई, और बना दिया हीरो

किरण और उनके साथियों ने कॉलेज प्रशासन के फैसले के खिलाफ धरना शुरू कर दिया। 45 दिन तक कॉलेज बंद रहा। मामला सुलझाने आई कमेटी में मशहूर फिल्ममेकर ख्वाजा अहमद अब्बास शामिल थे। उन्होंने किरण को देखते ही कहा – “तुम्हारे पिता शरीफ इंसान हैं और तुम गुंडागर्दी कर रहे हो!” लेकिन डांट के अगले दिन ही जब किरण उनके गेस्ट हाउस पहुंचे, तो अब्बास साहब बोले – “मैं एक फिल्म बना रहा हूं, दो बूंद पानी, उसमें लंबू इंजीनियर का रोल करोगे?” डांट खाने के बाद फिल्म मिलना, यही तो बॉलीवुड की कहानी होती है।

पर्दे पर खलनायक, असल जिंदगी में सज्जन इंसान

1971 में रिलीज़ हुई दो बूंद पानी से किरण कुमार ने अपना करियर शुरू किया। इसके बाद खुदगर्ज, तेजाब, थानेदार, पत्थर के फूल, आज का अर्जुन जैसी फिल्मों में उन्होंने जबरदस्त अभिनय किया। दर्शकों ने उन्हें विलेन के रूप में खूब सराहा, लेकिन उनके भीतर का अभिनेता किसी एक छवि में बंधा नहीं। टीवी की दुनिया में भी वे उतने ही चर्चित हुए — आर्यमान, मर्यादा, विरासत जैसे शो ने उन्हें घर-घर तक पहुंचा दिया।

पिता जीवन की छाया, बेटे किरण की रोशनी

किरण अक्सर कहते हैं, “मेरे पिता ने 61 फिल्मों में नारद मुनि का किरदार निभाया। यह लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज है।” वे बताते हैं कि जब भी जीवन ‘नारद’ बनते थे, वे नॉनवेज छोड़ देते थे, शराब तक नहीं छूते थे। किरदार के प्रति इतनी श्रद्धा आज भी कम ही देखने को मिलती है। शायद यही समर्पण किरण के खून में उतर गया। उन्होंने भी अपने हर रोल को उसी समर्पण से जिया, चाहे वो खलनायक हो या पिता का रोल।

पिता-पुत्र का रिश्ता: दोस्ती, अनुशासन और सम्मान का संगम

किरण बताते हैं कि उनके पिता केवल सख्त नहीं थे, बल्कि एक बेहतरीन दोस्त भी थे। रविवार को वे परिवार के साथ क्रिकेट खेलते, मंदिर और दरगाह जाते। “उन्होंने हमें सिखाया कि चाहे पर्दे पर विलेन बनो, पर असल जिंदगी में इंसानियत सबसे बड़ी चीज है।” किरण मानते हैं कि पिता की इमेज ने उन्हें एक अनुशासित कलाकार बनाया।

रेखा और किरण का रिश्ता: जब प्यार ने भी बनाई हेडलाइन

सत्तर के दशक में रेखा और किरण कुमार का रिश्ता सुर्खियों में रहा। दोनों के अफेयर की खबरें फिल्म मैगज़ीनों के पन्नों पर छपीं। रेखा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि किरण की “मम्माज बॉय” वाली आदतें उन्हें परेशान करती थीं। वहीं किरण ने बताया कि रेखा की मिमिक्री करने की आदत उन्हें खीझाती थी। यह रिश्ता ज्यादा नहीं चला, लेकिन उस दौर में इसने खूब हलचल मचाई।

पिता की तरह बेटे ने भी बनाई खुद की दुनिया

आज किरण कुमार के बेटे शौर्य भी सिनेमा की दुनिया में कदम रख चुके हैं। बेटी श्रृष्टि फैशन इंडस्ट्री में नाम कमा रही हैं। किरण का परिवार भले ही कैमरे के सामने या पीछे हो, लेकिन अभिनय उनकी रगों में दौड़ता है।

विरासत से आगे बढ़ता एक कलाकार

जीवन ने जो विरासत छोड़ी थी, उसे किरण ने न सिर्फ संभाला बल्कि उसे और चमकाया। उन्होंने साबित किया कि एक अभिनेता की पहचान उसके किरदार से नहीं, बल्कि उसके जुनून और सच्चाई से होती है।
किरण कुमार सिर्फ जीवन के बेटे नहीं, बल्कि उस युग के प्रतिनिधि हैं जहां सिनेमा दिल से किया जाता था, न कि कैलकुलेशन से।

सोशल मीडिया

शक्तिदायक औषधियों का बाप है पुनर्नवा

0

नर्नवा :- ऑटो इम्यून डिज़ीज़ क्रोनिक किडनी डिज़ीज़ लीवर फेलियर , कैंसर , त्वचा रोग, जोड़ों के दर्द और हृदय रोगों की शक्तिशाली उम्मीद

जो आपके शरीर को नवयौवन दे सकता है जो नया कर देता है जीवन अंगों को जो स्त्रोत है अनेकों मेडिसिनल प्रोपर्टीज माइक्रो मिनरल्स फाइटोकेमिकल्स एंटीऑक्सिडेंट और प्रोटेक्टिव गुणों का

किसी भी धातु भस्म कीड़ा जड़ी और अन्य तथाकथित शक्तिदायक औषधियों का बाप है पुनर्नवा

एक अति लाभकारी औषधीय पौधा है , जिसका वैज्ञानिक नाम बोएरहविया डिफ्यूसा है । यह आपके औषधीय गुणों के कारण , कई स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज में उपयोग होता है ।

पुनर्नवा एक प्राकृतिक औषधीय पौधा है जो भारत , श्रीलंका और दक्षिण अमेरिका में पाया जाता है । इसका नाम संस्कृत के दो शब्दों से बना है – ” पुनः और ” नवा ” । इस शब्द का अर्थ होता है ” फिर से नया या युवा होने वाला ” । इसकी पत्तियां आगे से थोड़ी नोकदार गोल होती हैं तना लाल रंग का फूल लालिमा युक्त गुलाबी होता है तथा पुष्टि जड़े होती हैं

पुनर्नवा के अन्य नाम शोथघ्नी, विशाख, श्वेतमूला, दीर्घपत्रिका, कठिल्लक, शशिवाटिका, क्षुद्रवर्षाभू, दीर्घपत्र, चिराटिका, वर्षाङ्गी, वर्षाही, धनपत्र; हिन्दी-लाल पुनर्नवा, सांठ, गदहपुर्ना; उर्दू-बाषखीरा कन्नड़-सनाडिका गुजराती-राती साटोडी वसेडो तमिल-मुकत्तै

पुनर्नवा में इम्यूनो मॉड्यूलेशन एंटी – इन्फ्लेमेट्री , डिटॉक्सिफाइंग , डाययूरेटिक और एंटी – डायबिटिक हेपेटो प्रोटेक्टिव एंटी कार्सिनोजेनिक गुण होते हैं

इसमें मैग्नीशियम, सोडियम, कैल्शियम, पोटैशियम सहित मैक्रो खनिजों का एक मूल्यवान स्रोत होता है.

सम्पूर्ण पौधे में ही कमाल के फाइटोकेमिकल घटक होते हैं; ये हैं पुनर्नवाइन (एल्कलॉइड), बीटा सिटोस्टेरोल (फाइटोस्टेरोल), लिरियोडेंड्रिन (लिग्नांस), पुनर्नवासाइड (रोटेनोइड्स), बोअरहाविन (ज़ैंथोन्स) और पोटेशियम नाइट्रेट (लवण)। जड़ों में रोटेनोइड्सबोएरविनोन एआई, बीआई, सी2, डी, ई और एफ के अलावा नए डायहाइड्रोइसोफ्यूरेनोक्सैंथिन, एलानिन, एराकिडिक एसिड, एस्पार्टिक एसिड, बेहेनिक एसिड, बोअरहाविक एसिड, बोअरहावोन, कैम्पेस्टरोल, डौकोस्टेरोल, बीटा-एक्डीसोन, फ्लेवोन, 5-7-डायहाइड्रोक्सी-3′-4′-डाइमेथो, एक्सवाई-6-8-डाइमिथाइल, गैलेक्टोज, ग्लूटामिक एसिड, ग्लूटामाइन, ग्लिसरॉल, ग्लाइसिन, हेंट्रियाकॉन्टेन एन, हेप्टाडेसाइक्लिक एसिड, हिस्टिडीन, हाइपोक्सैंथिन-9-एल-अरबिनोफ्यूरानोसाइड, ल्यूसीन, लिरियोडेंड्रिन, मेथियोनीन, ओलिक एसिड, ऑक्सालिक एसिड, पामिटिक एसिड, प्रोलाइन, हाइड्रॉक्सिल सेरीन, सिटोस्टेरोल ओलिएट, सिटोस्टेरोल पामिटेट होते हैं।

गुर्दे हमारे शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने का कार्य करते हैं। लेकिन जब उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है, तब कई स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न होती हैं। पुनर्नवा में मूत्रवर्धक (डाययूरेटिक) और नेफ्रो प्रोटेक्टिव गुण होते हैं, जिससे यह मूत्र विसर्जन को बढ़ावा देता है और गुर्दे की सफाई में सहायता करता है तथा नेफ्रोन्स का बचाव कर उन्हें रिपेयर करता है । इसके नियमित सेवन से किडनी फेल्योर और क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) जैसी समस्याओं का समाधान हो जाता है

कम हो जाती है।

पुनर्नवा मूत्र संक्रमण के इलाज में उपयोगी है। इसमें प्राकृतिक जीवाणुरोधी और सूजनरोधी गुण होते हैं जो मूत्र में हानिकारक बैक्टीरिया को मारने में मदद करते हैं। यह पेशाब करते समय जलन को कम करता है और संक्रमण को तेजी से दूर करने में मदद करता है। नियमित रूप से देखरेख में इसका सेवन करने से बार-बार होने वाले मूत्र संक्रमण को रोकने में भी मदद मिलती है, खासकर महिलाओं और बुजुर्गों में।

पुनर्नवा का प्रयोग तनाव को दूर करने के लिए लाभप्रद माना जाता है। इसमें मौजूद पोषक तत्व मस्तिष्क स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए जाने जाते हैं। इसके अलावा पुनर्नवा में एंटी स्ट्रेस एवं एंटी डिप्रेसेंट गुण पाए जाती हैं, जो तनाव, अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं से निपटने में सहायता करती है। इसके लिए इस पौधे की पत्तियों का काढ़ा या इसके जड़ की चूर्ण का सेवन करें। ऐसा करने से यह तनाव से छुटकारा दिलाने और अच्‍छी नीद लेने में मदद करती है।

पुनर्नवा हृदय को मजबूत बनाता है और इसकी पंपिंग क्षमता में सुधार करता है। यह द्रव अधिभार को कम करने में मदद करता है, जिससे हृदय पर दबाव कम हो सकता है। परिसंचरण में सुधार और रक्तचाप को कम करके, यह हृदय को सुचारू रूप से काम करने में सहायता करता है। शुरुआती हृदय की कमजोरी या हल्के हृदय संबंधी समस्याओं वाले लोगों को इसके उपयोग से लाभ हो सकता है।

पुनर्नवा के औषधीय पाचक गुण पाचन अग्नि को प्रज्वलित करते हैं और सुस्त पाचन तंत्र को उत्तेजित करने में मदद करते हैं यह पाचन तंत्र को खोलता और साफ करता है, अतिरिक्त पित्त और कफ को हटाने में सहायता करता है आंतों के सूक्ष्म छिद्रों को खोलता है और पोषण को ऊतकों तक पहुँचाने में बेहतरीन भूमिका निभाता है।

पुनर्नवा शरीर की वसा को तोड़ने और पचाने में मदद करता है, साथ ही पाचन तंत्र में उपस्थित अतिरिक्त तरल पदार्थों को अवशोषित करता है। यह इसे वजन घटाने में एक प्रभावी सहयोगी बनाता है, खासकर उन लोगों के लिए जो स्वाभाविक रूप से वजन बढ़ने से दुखी हैं

पुनर्नवा में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी यौगिक त्वचा के लिए फायदेमंद होते हैं। यह मुंहासे, एक्जिमा और सूजन जैसी कई त्वचा संबंधी समस्याओं के इलाज में मदद करता है। पुनर्नवा के पेस्ट का नियमित इस्तेमाल या इसके जूस का सेवन करने से त्वचा साफ और स्वस्थ रहती है।

पुनर्नवा की जड़ों से प्राप्त एथिल एसीटेट अर्क में मजबूत एंटीफंगल गुण होते हैं। इसने माइक्रोस्पोरम जिप्सम, एम. फुलवम और एम. कैनिस जैसी फंगल प्रजातियों के विकास को रोकने की क्षमता दिखाई है । अर्क इन फंगस के विकास और प्रजनन में बाधा डालता है, जिससे यह एक प्रभावी एंटीफंगल के रूप में हो सकता है

पुनर्नवा की पत्तियों से प्राप्त अर्क में एंटीप्रोलिफेरेटिव और एंटीएस्ट्रोजेनिक गुण होते है जो स्तन कैंसर कोशिकाओं पर कार्य करके उन्हें नियंत्रित करते हैं तथा स्तन कैंसर को फैलने से रोकने तथा नष्ट करने में भूमिका निभाते हैं

पुनर्नवा की पत्ती और तने का अर्क एडिमा में मदद कर सकता है क्योंकि वे सूजन और जलन को शांत करने में मदद करते हैं

पुनर्नवा में प्राकृतिक आयरन होता है और यह शरीर को पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से अवशोषित करने में मदद करता है। यह लाल रक्त कोशिका निर्माण में सहायता करता है और हल्के आयरन की कमी वाले एनीमिया वाले लोगों के लिए मददगार हो सकता है। यह थकान को कम करता है और ऊर्जा के स्तर को बढ़ाता है। जब आयरन युक्त भोजन या सप्लीमेंट के साथ इसका उपयोग किया जाता है, तो यह शरीर को स्वस्थ रक्त बनाने में मदद करता है।

यह शरीर की सूजन को कम करने में सहायक होता है, जिससे जोड़ों के दर्द और गठिया जैसी समस्याओं में आराम मिलता है।

अपने एंटीऑक्सिडेंट एंटी इंफलामेटरी गुणों के कारण यह दर्द और सूजन को कम करता है। इसलिए, यह गठिया और रुमेटीइड गठिया जैसी जोड़ों की स्थितियों के लिए सबसे उपयुक्त औषधि है। यह जोड़ों से अतिरिक्त तरल पदार्थ को निकालता है और उनकी गतिशीलता को बढ़ाता है। घुटनों जोड़ों में अकड़न सूजन या जोड़ों के दर्द से पीड़ित रोगियों दैनिक गतिविधियों में बेहतर लचीलेपन और आराम लाने के लिए इसका उपयोग निरंतर करना चाहिए

यह अतिरिक्त तरल पदार्थ को खत्म करके यूरिक एसिड के स्तर को कम करता है। यह मुख्य रूप से गठिया, जोड़ों के दर्द या यूरिक एसिड से संबंधित गुर्दे की पथरी से पीड़ित लोगों के लिए मददगार है। यह प्राकृतिक राहत प्रदान करता है और यूरिक एसिड के निर्माण को रोकता है।

पुनर्नवा अग्न्याशय को सहारा देकर और इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार करके स्वस्थ रक्त शर्करा के स्तर को बनाए रखने में मदद करता है। यह भोजन के बाद शर्करा के स्तर को कम करता है और मधुमेह वाले लोगों के लिए एक उपयोगी सहायता होती है। नियमित उपयोग से थकान और बार-बार पेशाब आने से भी बचा जा सकता है, जो मधुमेह के रोगियों में आम है।

पुनर्नवा अनियमित मासिक धर्म को नियंत्रित करने और मासिक धर्म के दर्द को कम करने में मदद करता है। गर्भाशय और रक्त प्रवाह पर इसकी प्राकृतिक क्रिया हार्मोन को संतुलित करने और स्वस्थ चक्र का समर्थन करने में मदद करती है। यह उन महिलाओं के लिए विशेष रूप से सहायक है जिन्हें मासिक धर्म के दौरान भारी रक्तस्राव या सूजन का सामना करना पड़ता है। हार्मोनल समस्याओं के लिए हमेशा विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार इसका उपयोग करें।

डॉ० जयवीर सिंह

कर्नल गद्दाफी , एक तानाशाह का पतन

0

जब ब्रिटेन की महारानी 50 साल तक शासन कर सकती हैं और थाइलैंड के राजा 68 सालों तक राज सकते हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकता’… ये लीबिया के तानाशाह गद्दाफी के शब्द थे जिसने 27 साल की उम्र में तख्तापलट किया और 42 सालों तक राज किया। लीबिया में विद्रोह हुआ तो उसने अपने भाषण में यह बात कही।

उसका पूरा नाम था मुअम्मर अल गद्दाफी, लेकिन कर्नल गद्दाफी के नाम से जाना गया. 7 जून 1942 को लीबिया के सिर्ते शहर में जन्मा गद्दाफी हमेशा से अरब राष्ट्रवाद प्रभावित रहा और मिस्र के नेता गमाल अब्देल नासिर का प्रशंसक रहा।

1961 में बेनगाजी के सैन्य कॉलेज में प्रवेश लिया. सैन्य प्रशिक्षण पूरा होने के बाद लीबिया की फौज में कई बड़े पदों पर काम किया. सेना में रहते हुए कई उपलब्धियां हासिल कीं. हालांकि इस दौरान उसका तत्कालीन प्रशासक इदरीस के साथ मतभेद रहा. इसके बाद गद्दाफी ने सेना छोड़ कर उस गुट के लिए काम करना शुरू किया जो सरकार के विरुद्ध काम करता था।

गद्दाफी ने विरोधी गुट के साथ देश में तख्तापलट करने की योजना बनाई. इसके लिए वो समय चुना जब प्रशासक इदरीस तुर्की में इलाज करवा रहे थे. 1 सितंबर 1969 को विद्रोहियों के साथ मिलकर राजा इदरीस की सत्ता पर कब्जा कर किया और सेना प्रमुख की शपथ ली. पूरे देश की सेना को नियंत्रित करने का अधिकार पा लिया. इतना ही नहीं, लीबिया से मदद पा रहे अमेरिकी और ब्रिटिश सैन्य ठिकानों को बंद करने का हुक्म दिया।

उसने आदेश जारी किया कि लीबिया में काम करने वाली विदेशी कंपनियों को राजस्व का बड़ा हिस्सा देना होगा. इतना ही उसने ग्रेगोरियन कैलेंडर को बदलकर इस्लामी कैलेंडर लागू किया. शराब की ब्रिकी पर पाबंदी लगा दी।

चौंकाने वाली बात यह भी थी कि लीबिया के लोगों को यही नहीं मालूम था कि कौन पूरे तख्तापलट का मुखिया है. घटना के सातवें दिन उन्हें उस बात की जानकारी तब मिली जब गद्दाफी ने राष्ट्र के नाम अपना पहला सम्बोधन दिया. अपने भाषण में कहा, मैंने सत्ता बदल कर बदलाव और शुद्धिकरण करके आपकी मांग का जवाब दिया है. हालांकि उस दौर में ज्यादातर लोगों ने तख्तापलट का स्वागत किया।

दिसंबर 1969, यह वो साल था जब राजनीतिक विरोधियों ने गद्दाफी की सत्ता को हथियाने की कोशिश की तो उसने एक-एक करके उन सभी की हत्या करवा दी. लीबिया से पहले इटली के नागरिकों को निकाला फिर यहूदी समुदाय के लोगों को. फिर उनका विरोध करने वालों को सरेआम फांसी देना शुरू कर दिया. यहीं से विरोध की नींव पड़ी।

गद्दाफी को ताकतवर महिलाओं से विशेष लगाव था. एक बार अपना इंटरव्यू देते हुए उसने पत्रकार से कहा था कि क्या आप मेरा एक संदेश अमरीकी विदेश मंत्री मेडलीन अलब्राइट को दे सकती हैं. उसने अपने संदेश में लिखा कि मैं आपसे बहुत प्यार करता हूं, अगर आप भी मेरे लिए ऐसा ही सोचती हैं तो जब भी टीवी पर आएं हरे रंग की पोशाक पहनें. इतना ही नहीं पूर्व राष्ट्रपति बुश के दौर में विदेश मंत्री रहीं कोंडेलीसा राइस से भी उसे खास लगाव था।

गद्दाफी की नीतियां विरोधियों का दमन करने वाली थीं. यही वजह थी कि उसे कई लोग सनकी भी कहते थे. धीरे-धीरे उसने कई देशों की सरकार को प्रतिबंधित कर दिया. नतीजा लीबिया की अर्थव्यवस्था बिगड़ने लगी. कई आतंकी हमलों में लीबिया का नाम सामने आया. 1986 में वेस्ट बर्लिन डांस क्लब की बमबारी में लीबिया का नाम आने पर अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने कार्रवाई की और त्रिपोली स्थित गद्दाफी के निवास पर हमला किया.

इस तरह अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने गद्दाफी के विद्रोहियों का समर्थन किया। नाटो गठबंधन ने हवाई हमले करने शुरू किए. हमले में गद्दाफी का बेटा मारा गया. विद्रोहियों ने राजधानी त्रिपोली पर कब्जा कर लिया. जून 2011 में मामला अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय पहुंचा. यहां अत्याचार करने के लिए गद्दाफी, उसके बेटे सैफ अल इस्लाम और उसके बहनोई के खिलाफ वारंट जारी किया गया. जुलाई में दुनिया के 30 देशों ने लीबिया में विद्रोहियों की सरकार को मान्यता दे दी।

20 अक्टूबर 2011 को गद्दाफी को उसके गृहनगर सिर्ते में मार गिराया गया। हालांकि मौत कैसे हुई इस पर संशय रहा. कुछ का कहना था कि मौत नाटो के हवाई हमले में हुई है। कुछ का कहना था कि विद्रोही लड़ाकों ने मार गिराया हालांकि आज भी इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाया है।
रजनीकांत शुक्ला

0

तालिबान से सम्बन्ध अर्थात घोर अतिवादी विचारधारा से समझौता        

                                                     

     −तनवीर जाफ़री

 अफ़ग़ानिस्तान की तालिबानी सरकार के विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्तक़ी ने पिछले दिनों भारत का एक सप्ताह का दौरा किया। अगस्त 2021 में तालिबान के जबरन सत्ता में आने के बाद किसी शीर्ष तालिबानी नेता की पहली आधिकारिक यात्रा थी। मुत्तक़ी संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंधित सूची में शामिल थे, इसलिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तालिबान प्रतिबंध समिति ने उन्हें केवल भारत यात्रा के लिए विशेष छूट दी थी। ग़ौरतलब है कि 2021 में भारत ने तालिबान शासन के बाद काबुल में अपना दूतावास बंद कर दिया था। परंतु पिछले गत जनवरी 2025 में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की दुबई में मुत्तकी से हुई मुलाक़ात और फिर मई 2025 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मुत्तकी से फोन पर हुई बातचीत के बाद ही उनके भारत दौरे का रास्ता साफ़ हो गया था। 2021 में अफ़ग़ानिस्तान की लोकतान्त्रिक सरकार से जबरन सत्ता हथियाने वाले तालिबानों को अब तक केवल रूस ने ही मान्यता दी है। वर्तमान तालिबानी शासन को भारत ने भी अभी तक मान्यता नहीं दी है। इसके बावजूद तालिबान से व्यापार, विकास,सहायता, और सुरक्षा जैसे विषयों को लेकर दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध मज़बूत करने की बात करना और कल तक मानवता विरोधी कुकृत्य करने वाले कुख्यात आतंकी संगठन के रहनुमाओं से हाथ मिलाना ‘दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त ‘ की नीति के अंतर्गत भले ही ठीक नज़र आता हो परन्तु तालिबानों के ज़ुल्म व अत्याचार की सूची इतनी लंबी है कि इन वैचारिक आतंकियों को न तो कभी मुआफ़ किया जा सकता है न ही इनपर विश्वास किया जा सकता है। यही वजह है कि भले ही भारत सरकार ने तालिबानी नेता व उसके साथ आये प्रतिनिधिमंडल का स्वागत क्यों न किया हो परन्तु देश का एक बड़ा वर्ग भारत तालिबान रिश्तों को लेकर ख़ुश नहीं बल्कि नाख़ुश नज़र आया।  

                  दरअसल पूर्व में ओसामा बिन लादेन व मुल्ला उमर के संरक्षण में इन्हीं तालिबानों ने आतंक तथा अपनी घोर कट्टरपंथी विचारधारा का वह घिनौना इतिहास लिखा है जिसे दुनिया कभी भुला नहीं सकती। याद कीजिये फ़रवरी 2001 में तालिबान के सर्वोच्च नेता मुल्ला मोहम्मद उमर द्वारा जारी किया गया वह फ़रमान जिसमें उसने अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद सभी मूर्तियों को नष्ट  किये जाने जैसा वैमन्सयपूर्ण आदेश जारी किया था। इसी आदेश के बाद तालिबानी लड़ाकों द्वारा अफ़ग़ानिस्तान की बामियान घाटी में छठी शताब्दी ईस्वी में चट्टानों में तराशी गई दो विशालकाय बुद्ध मूर्तियों को तोपों और एंटी-एयरक्राफ़्ट गनों से ध्वस्त कर दिया गया था ? यह दुनिया की सबसे ऊँची खड़ी बुद्ध प्रतिमाओं में से एक थीं जिनकी ऊँचाई क्रमशः 180 व 125 फ़ीट थी। तालिबान के इस दुस्साहस ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। क्योंकि ये मूर्तियाँ 1,500 वर्ष पुरानी थीं और मानव इतिहास का एक अहम हिस्सा थीं। तालिबान ने इस दौरान अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी अन्य बौद्ध कलाकृतियों को भी नष्ट किया था । तालिबान के इस क़दम से पूरे विश्व में आक्रोश पैदा हो गया था। संयुक्त राष्ट्र, यूनेस्को, भारत, जापान, श्रीलंका और अन्य कई देशों द्वारा इस तालिबानी कुकृत्य की घोर निंदा की गयी थी । यूनेस्को ने इसे तालिबान द्वारा किया गया “सांस्कृतिक अपराध” बताया था। क्या इस घटना को भुलाया जा सकता है जोकि इन्हीं तालिबानों की नफ़रती सोच व विचारधारा के तहत अंजाम दी गयी थी ?           

                       क्या देश 24 दिसंबर 1999 को अंजाम दिये गये उस कंधार विमान अपहरण कांड को भूल सकता है जिसमें काठमांडू से नई दिल्ली आने वाली  इंडियन एयरलाइंस की फ़्लाइट IC-814 का अपहरण पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन द्वारा किया गया था। इस विमान में 176 यात्री और 15 चालक दल के सदस्य सहित  कुल 191 लोग सवार थे। अपहरणकर्ताओं द्वारा यह विमान अमृतसर,लाहौर व दुबई के बाद अंत में अफ़ग़ानिस्तान के कंधार ले जाया गया था जो उस समय तालिबान के नियंत्रण में था। कंधार विमान अपहरण कांड एक ऐसी घटना थी जिसने भारत की सुरक्षा नीतियों, आतंकवाद से निपटने की रणनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर गहरा प्रभाव डाला था । यह घटना आज भी आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में देखी जाती है। इसी विमान अपहरण के बाद भारत सरकार को भारतीय जेलों में बंद मसूद अज़हर,अहमद उमर सईद शेख़ व मुश्ताक़ अहमद ज़रगर जैसे दुर्दांत आतंकियों की रिहाई करनी पड़ी थी। इस पूरे प्रकरण को अंजाम तक पहुँचाने में तालिबानों ने ही अपहरणकर्ताओं के पक्ष में अहम किरदार निभाया था। इसीलिए अपहरणकर्ता विमान को अंत में कंधार ले गए थे। क्या देश इस हादसे को कभी भुला सकता है ?

                            महिलाओं को लेकर तालिबानों की विकृत व अमानवीय सोच से भी दुनिया भलीभांति वाक़िफ़ है। यह तालिबान ही तो थे जिन्होंने 9 अक्टूबर 2012 को, पश्तून परिवार से संबंध रखने वाली 15 वर्षीय मलाला यूसुफ़ज़ई को उस समय उसका नाम पूछकर गोली मारी थी जबकि वह स्वात ज़िले में परीक्षा देकर स्कूल बस से अपने घर लौट रही थीं। याद कीजिये उस समय एक नक़ाबपोश तालिबानी बंदूक़धारी उस बस में चढ़ा और चिल्लाया, “तुम में से कौन मलाला है? बोलो, वरना मैं सबको गोली मार दूँगा।” मलाला की पहचान होने पर उसने मलाला को बाएँ आँख के पास से गोली मारी, जो उनके गर्दन से होकर कंधे में जा लगी। इसी हमले में कायनात रियाज़ व शाज़िया रमज़ान नाम की दो अन्य स्कूली लड़कियां भी घायल हुईं थीं। यह हमला तालिबान द्वारा मलाला की शिक्षा संबंधी सक्रियता के विरुद्ध था। उस समय तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के प्रवक्ता ने इस घटना की ज़िम्मेदारी लेते हुये यह कहा था कि मलाला “काफ़िरों की प्रतीक” हैं और इस्लाम विरोधी विचार फैला रही है। यह तालिबान ही हैं जिन्होंने लड़कियों के सैकड़ों स्कूल्स या तो उड़ा दिया या उनमें आग लगा दी। 

                         शिक्षा को लेकर तालिबानी सोच जगज़ाहिर है। इनके शासन में छठी कक्षा के बाद लड़कियां माध्यमिक या उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकतीं। विश्वविद्यालयों में भी महिलाओं का प्रवेश बंद है, और अब महिलाओं द्वारा लिखी किताबों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है।आज अफ़ग़ानिस्तान में लगभग 11 लाख लड़कियां स्कूल से बाहर हैं। आज अफ़ग़ानिस्तान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां लड़कियों की शिक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध है। इससे न केवल बाल विवाह बढ़े हैं बल्कि महिलाओं का साक्षरता स्तर घटकर 30% से नीचे आ गया है। इतना ही नहीं बल्कि महिलाओं को अधिकांश नौकरियों से निकाल दिया गया है। सिविल सेवा, ग़ैर सरकारी संगठनों, मीडिया और सैलून आदि क्षेत्रों में महिलाओं का काम पूरी तरह बंद है। महिलाओं को चिकित्सा शिक्षा से भी वंचित रखा गया है, जिससे स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुई हैं। अफ़ग़ानिस्तान में पहले से ही मातृ मृत्यु दर दुनिया में सबसे अधिक थी और अब यह और बढ़ गई है।

                       तालिबान का महिला विरोधी चरित्र दिल्ली में भी पिछले दिनों उस समय देखने को मिला जबकि तालिबान के विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्तक़ी की पहली प्रेस कॉंफ्रेंस में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं दी गयी। परन्तु विश्वव्यापी आलोचना के बाद दूसरे दिन महिला पत्रकारों को प्रवेश की अनुमति देनी पड़ी। आतंकवादी व अतिवादी विचार के लोग चाहे वे अफ़ग़ानिस्तान में हों पाकिस्तान में या दुनिया के किसी भी देश में हों यह सभी मानवता के दुश्मन हैं। आश्चर्य इस बात का भी है कि वर्तमान भारत सरकार जिसके नेता स्वयं कभी तालिबानों को पानी पी कर कोसा करते थे वही आज इनका स्वागत करते व इनसे रिश्ते सुधारते नज़र आ रहे हैं ? और गोदी मीडिया इन नापाक रिश्तों के फ़ायदे गिनाता फिर रहा है ? जबकि वास्तव में तालिबान से सम्बन्ध बनाने का दूसरा अर्थ है घोर अतिवादी विचारधारा से समझौता। 

   −तनवीर जाफ़री  

वरिष्ठ पत्रकार

संस्कार और चरित्र निर्माण का पर्व है दीपावली

0

बाल मुकुन्द ओझा

बुराई पर अच्छाई, अंधकार पर प्रकाश तथा अज्ञान पर ज्ञान की विजय का त्योहार हैं दीपावली। दीपावली संस्कार और चरित्र निर्माण का पर्व है। तन-मन को प्रफुल्लित करने वाला यह पर्व हमारे जीवन में हजारों खुशियाँ प्रदान करता है। त्योहार जीवन को प्रेम, बन्धुत्व और शुद्धता से जीने की सीख देता है। मन और चित को शांति प्रदान करता है और हमारे अन्दर की बुराइयों को अन्तर्मन से बाहर निकाल कर अच्छाइयों को ग्रहण करने की ताकत प्रदान करता है। चौदह साल का बनवास काटकर भगवान राम जब अयोध्या लौटे तब वहाँ के निवासियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर उनका स्वागत किया। इस वर्ष दीपावली का पर्व 20 अक्तूबर को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। दीपावली का त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस पंच दिवसीय पर्व को सभी वर्गों के लोग अत्यंत हर्ष व उत्साह के साथ मनाते हैं। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक चलने वाला दीपावली का त्योहार सुख समृद्धि की वृद्धि, व्यापार वृद्धि तथा समस्त सुखों की प्राप्ति कराने वाला होता है। दीपावली को पंच पर्वो का त्योहार कहा जाता है जो धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज पर समाप्त होते हैं।

त्योहार देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय एकता के जीवन्त प्रतीक होते हैं। इसमें देश के इतिहास का समावेश होता है। त्योहार बिना जाति, धर्म ओर भेदभाव के सभी लोग मिलजुल कर मनाते हैं और एक दूसरे के सुख दुख में भागीदारी देते हैं। एक दूसरे से मिलन का यह सुनहरा अवसर प्रदान करते हैं। त्योहार आपसी कटुता, शत्रुता और बैर भाव को दूर भगाते हैं। दीपावली भी एक ऐसा ही त्योहर है जो हमें समता, समानता और भाईचारे का सन्देश देता है। त्योहार जीवन को प्रेम, बन्धुत्व और शुद्धता से जीने की सीख देता है। मन और चित को शांति प्रदान करता है और हमारे अन्दर की बुराइयों को अन्तर्मन से बाहर निकाल कर अच्छाइयों को ग्रहण करने की ताकत प्रदान करता है। चौदह साल का बनवास काटकर भगवान राम जब अयोध्या लौटे तब वहाँ के निवासियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर उनका स्वागत किया।

भारत में सभी धर्मों और वर्गों के लोग यह त्योहार मिलजुल कर मानते है। दीपावली का शाब्दिक अर्थ है ’’दीपों की पंक्ति’’ या ‘‘दीपों की माला’’। यह पर्व सामाजिक सांस्कृतिक धार्मिक व्यापारिक और ऐतिहासिक महत्व का है। दीपावली का त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इसी दिन समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी ने अवतार लिया था। मां लक्ष्मी को धन और वैभव की देवी माना जाता है। इसी वजह से दिवाली वाले दिन हम लोग लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं और वरदान में खूब सारा धन और वैभव मांगते हैं। लक्ष्मी के समुद्र मंथन में निकलने से दो दिन पहले सोने का कलश लेकर भगवान धनवंतरी भी अवतरित हुए थे, इसी वजह से दिवाली के पहले धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

दीपावली के साथ कई ऐतिहासिक और धार्मिक घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। यह दिन केवल भगवान राम के अयोध्या वापसी का पावन दिन नहीं है अपितु इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने राक्षस राज नरकासुर का वध किया था। इसी दिन भगवान विष्णु ने नरसिंह का अवतार लेकर हिरणकश्यप को मारा था। इसी दिन समुद्र मंथन के बाद लक्ष्मी व धन्वन्तरि प्रकट हुए थे। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी इसी दिन है। सिक्खों के लिए भी दीपावली के त्यौहार का बहुत महत्त्व है। इसी दिन अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ। इसके अलावा 1619 में दीपावली के दिन सिक्खों के छठे गुरू हर गोविन्द सिंह को जेल से रिहा किया गया। नेपालियों के लिए भी दीपावली का दिन बहुत महत्व का है। इस दिन नेपाल में नया वर्ष शुरू होता है। पंजाब में स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन हुआ। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद ने दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया था। इस दिन लक्ष्मी पूजन का विशेष प्रावधान है। दीपावली सच्चे अर्थों में चौतरफा हर्षाेल्लास का दिन है।

बुराई पर अच्छाई का प्रतीक यह पर्व अब रश्मि बनता जा रहा है। अच्छी बातें अब केवल वेद वाक्यों, ग्रन्थों, महापुरूषों के आदर्शों और नेताओं के भाषण तक सीमित होकर रह गई है। भारत ऋषि मुनियों, संतों और महापुरूषों की जन्मस्थली है जिन्होंने सदा सर्वदा सद्मार्ग पर चलने की सीख और प्रेरणा देशवासियों को दी। हम धीरे-धीरे इन आदर्शों को आत्मसात करने की बजाय बैर-भाव और शत्रुता को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं। देश में इस समय जो वातावरण बना हुआ है, उससे बन्धुत्व, प्रेम और समता के स्थान पर अविश्वास, घृणा और बुराई को अधिक बल मिल रहा है। इसके लिए किसी एक को दोषी ठहराना ठीक नहीं होगा। हम सबको अपनी अन्तर आत्मा में झांक कर विवेचना करनी होगी। जब तक हम अपने अंदर की बुराइयों का त्याग नहीं करेंगे तब तक दीपावली की सीख, प्रेरणा और आदर्शों को आत्मसात करने की बातें थोथी और कागजी होगी।

– बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

फिलिस्तीन और इजरायल पीस डील अभी कुछ लोचे बाकी हैं

0

फिलिस्तीन और इजरायल के बीच एक पीस डील सी कुछ हो गई है. ट्रम्प ने बीच बचाव करके सीजफायर करवा दी है. इजरायल के कोई बीस बचे खुचे जिंदा बंधक छुड़वाए जा रहे हैं. बदले में इजरायल लगभग 2000 कैदियों को छोड़ेगा और अपनी फौजें वापस लेगा.

और कुछ लोचे सुलझने बाकी हैं…गाजा में हमास हथियार डाल देगा और जॉर्डन, सऊदी अरब और अन्य अरब देशों की सेनाएं इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स बनकर तैनात होंगी.

इस पीस डील का क्या होना है?

क्या यह पहली पीस डील है? इसके पहले 1990s में ओस्लो एकॉर्ड के अनुसार भी समझौते हुए थे, उनमें क्या हुआ? पीएलओ ने लड़ाई बंद कर दी, बदले में उन्हें गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक पर नियंत्रण मिल गया. फिर वे नाम बदल कर हमास बन कर लड़ने लगे.

जब काफ़िर ताकतवर होता है तो वह मोमिन से समझौता कर लेता है. मोमिन जो किसी भी शर्त पर समझौता करने को तैयार नहीं था, वह अन्त में अपनी ही शर्तों पर समझौता कर लेता है. यह उसे लिए साँस लेने का स्पेस दे देता है. जब उसकी सांस वापस आ जाती है तो वह फिर तरोताजा होकर लड़ने लगता है. उसकी एक एक सांस लड़ाई के लिए है.

काफ़िर को शांति की गरज होती है… मोमिन को लड़ाई की खुजली होती है. काफ़िर शान्ति को अपना उद्देश्य समझता है और लड़ाई उसका माध्यम. मोमिन के लिए लड़ाई ही उद्देश्य है और शान्ति उसके लिए सिर्फ दो लड़ाइयों के बीच तैयारी का समय होता है. मोमिन कभी नहीं थकता और काफ़िर कभी सीखता नहीं…

राजीव मिश्रा