साधु संतों के भगवा पहनने पर नहीं भगवे रंग पर एतराज है

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बिहार में योगी आदित्यनाथ चुनावी सभाएं कर रहे हैं तो कुछ नेता भगवा पर ही बरस पड़े ? एक महाशय ने तो 90 के दशक की याद दिला दी जब लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से राम रथ यात्रा लेकर अयोध्या जा रहे थे । चूंकि आडवाणी के साथ सैकड़ों भगवाधारी भी थे तो आगबबूला लालू एंड कम्पनी ने यूपीए बैनर तले रथ यात्रा रोक दी थी । कल यदि तेजस्वी की सरकार आई तो एक भी भगवाधारी बिहार में नहीं आ पाएगा । अजीब बात है कि जिन लोगों ने बिहार में कल तक जंगलराज फैलाया हुआ था वे उन बुलडोजर्स से डर गए जो संकेतक के रूप में योगी के पंडाल के बाहर लगाए गए थे ।

उन्हें भगवा से इतनी चिढ़ क्यूं है ?

बात केवल योगी अथवा साधु संतों के भगवा पहनने की नहीं है भगवे रंग पर एतराज की है !

जो लोग यह मानते हैं कि भगवा रंग अशांति लाएगा , यह केवल उनके दिमाग का फितूर है !

संत परंपरा से जुड़ा भगवा भारतीय संस्कृति और सभ्यता का बड़ा हिस्सा है । अध्यात्म हमारी विरासत है और केसरिया हमारे राष्ट्रीय ध्वज का शिखर पर विराजमान है !

अभी दो दिन पूर्व हुई छठ पूजा पर व्रतधारी स्त्रियों की नाक से मांग तक भरा केसरिया भगवा ही तो था ? भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु ने तो मां से अपना चोला ही बसंती मांगा था । शिवाजी और महाराणा प्रताप केसरिया की आन बान और शान के लिए आजीवन लड़ते रहे । इस देश की सन्नारियां मांग में भगवा सिंदूर भरकर शत्रु पर टूट पड़ती थीं और घिर जाने पर भगवा जौहर सजाती थीं । भगवा इस देश की ऊंचाइयों का प्रतीक है । सच कहें तो भारत का प्रतिनिधि रंग है भगवा या केसरिया । यह गौरवशाली अतीत का परिचय है । भारत की शान का प्रतिबिंब है ।

न जानें लोग भगवा से क्यों चिढ़ते हैं । यह रंग भारत की उत्सवप्रियता को दर्शाता है । भारत सदा सर्वदा से रगों और रागों से परिपूर्ण रहा है । वह केसरिया पताका ही थी जिसकी महिमा को पहले ही युद्ध में सिकंदर ने पहचान लिया था । राजा पौरस को उसने हराया जरूर , पर समझ गया कि आर्यावर्त भारतवर्ष को जीतना उसके बस में नहीं है । सिकंदर समझ गया कि आगे बढ़ा तो जगह जगह केसरिया से मुकाबला होगा । राजा पौरुष ने पहले ही युद्ध में उसे बता दिया था कि भारत को समूचा जीतना नामुमकिन है । केसरिया की ताकत ने उसे वहीं से यूनान लौटा दिया ।

अच्छा हो यदि इस देश की सांस्कृतिक विरासत से खिलवाड़ बंद हो जाए । याद रखिए , इस देश में अब बहुत कुछ नहीं चलेगा और बहुत सारा चलेगा । जी हां , भगवा तो खूब चलेगा ।

,,,,,,,,कौशल सिखौला

शिक्षक नौकरी छोड़ रहे हैं – एक कड़वा सच

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– क्योंकि शिक्षक को शिक्षण कार्य नहीं करवा कर एक बहुद्देशीय कर्मचारी बना दिया गया है। जब शिक्षक को शिक्षण कार्य छोड़कर काग़ज़ों, रिपोर्टों और आयोजनों का भार दे दिया जाता है, तो शिक्षा अपनी आत्मा खो देती ह

– डॉ. प्रियंका सौरभ

देश की शिक्षा व्यवस्था एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ सबसे बुनियादी स्तंभ — शिक्षक — स्वयं डगमगाने लगा है।

कभी यह पेशा समाज में सम्मान, स्थिरता और प्रेरणा का प्रतीक था, पर आज वही शिक्षक काग़ज़ी औपचारिकताओं, तकनीकी दबाव और प्रशासनिक आदेशों के बीच खो गया है।

वह थक चुका है, निराश है, और अनेक शिक्षक अब यह पेशा छोड़ रहे हैं। यह कोई व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतावनी है — क्योंकि जब शिक्षक थक जाता है, तब शिक्षा मर जाती है।

आज भारतीय शिक्षा व्यवस्था एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ शिक्षक सबसे असहाय और अवमूल्यित स्थिति में पहुँच चुका है। कभी यह पेशा सम्मान, आदर्श और आत्मसंतोष का प्रतीक हुआ करता था। शिक्षक वह व्यक्ति था जो समाज की दिशा तय करता था, बच्चों के भीतर मूल्य और विवेक का बीजारोपण करता था। पर अब स्थिति यह है कि शिक्षण सेवा धीरे-धीरे एक प्रशासनिक बोझ में तब्दील हो गई है। शिक्षक का समय अब बच्चों से अधिक कागज़ों, रिपोर्टों और ऑनलाइन पोर्टलों पर बीतने लगा है। हर दिन नई योजना, नया निर्देश, नया ऐप और नए फॉर्म की मांग। शिक्षण अब नौकरी बन गया है, और नौकरी इतनी जटिल कि उसमें पढ़ाने का समय ही नहीं बचा। जब हर कार्य का प्रमाण मांगने वाला सिस्टम बन जाता है, तो भरोसा और रचनात्मकता दोनों समाप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि आज एक बड़ा वर्ग शिक्षक होने के बावजूद शिक्षण से कट गया है — और जो नई पीढ़ी है, वह अब इस पेशे को अपनाने में रुचि नहीं दिखा रही। वह देख रही है कि यह पेशा अब प्रेरणा नहीं, थकान और तनाव का प्रतीक बन चुका है।

तकनीक और प्रशासनिक निगरानी के नाम पर शिक्षा को जिस दिशा में धकेला जा रहा है, उसने शिक्षक को डेटा-कलेक्टर और इवेंट मैनेजर बना दिया है। हर महीने किसी न किसी दिवस का आयोजन — योग दिवस, मातृभाषा दिवस, साक्षरता दिवस — और हर आयोजन का फोटो, वीडियो, रिपोर्ट, लिंक… यह सब दिखावे की संस्कृति में बदल गया है। विद्यालय अब ज्ञान का केंद्र नहीं, बल्कि प्रदर्शन का मंच बन गए हैं। शिक्षक बच्चों को कम और कैमरे को ज़्यादा संबोधित करता दिखता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह बोझ और भी भारी है। दो या तीन शिक्षक सैकड़ों बच्चों के लिए जिम्मेदार हैं। मिड-डे मील, छात्रवृत्ति, यूनिफॉर्म, साइकिल वितरण, सर्वे, जनगणना — सब कुछ उसी के सिर पर। शिक्षा धीरे-धीरे प्रबंधन बन गई है, और शिक्षक एक सरकारी कर्मचारी जो सबका आदेश माने। इस स्थिति ने न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित किया है, बल्कि शिक्षक के भीतर की सृजनात्मकता और आत्मसम्मान को भी क्षीण कर दिया है।

इन परिस्थितियों का सबसे बड़ा प्रभाव शिक्षक की मानसिक स्थिति पर पड़ा है। निरंतर निगरानी, आंकड़ों की मांग, और हर कार्य का डिजिटल प्रमाण — इन सबने शिक्षा को मानवीयता से दूर कर दिया है। जो शिक्षक कभी अपने विद्यार्थियों के साथ भावनात्मक रिश्ता रखते थे, वे अब एक यंत्रवत भूमिका निभाने को विवश हैं। उनके पास न समय है, न अवसर कि वे किसी बच्चे की समस्या को समझ सकें, उसे प्रेरित कर सकें या उसके साथ संवाद कर सकें। परिणामस्वरूप, शिक्षक भावनात्मक रूप से थक रहे हैं, और विद्यार्थी भी उनसे दूर होते जा रहे हैं। छात्र अब शिक्षक को मार्गदर्शक नहीं, सेवा प्रदाता मानने लगे हैं। यह दृष्टिकोण शिक्षा की आत्मा को भीतर से तोड़ रहा है। सम्मान और भरोसे का जो रिश्ता कभी शिक्षा की नींव था, वह अब संदेह और औपचारिकता के बोझ तले दब गया है।

यह स्थिति केवल शिक्षकों की नहीं, बल्कि समाज के भविष्य की चिंता है। यदि शिक्षा का केंद्र शिक्षक और विद्यार्थी नहीं रहेंगे, तो विद्यालय केवल भवन बनकर रह जाएंगे। योजनाएँ, पोर्टल, और नीतियाँ तभी सार्थक हैं जब वे मानवीय जुड़ाव को बढ़ाएँ, न कि खत्म करें। हमें इस प्रश्न पर गंभीरता से सोचना होगा — क्या हम अपने शिक्षकों पर भरोसा करते हैं? क्या हम उन्हें वह स्वतंत्रता और सम्मान दे रहे हैं जिसकी शिक्षा को सबसे ज़्यादा आवश्यकता है? जब शिक्षक को केवल आदेश पालन करने वाला कर्मचारी बना दिया जाता है, तो वह प्रेरक नहीं रह जाता। और जब प्रेरणा खत्म होती है, तो शिक्षा का अर्थ भी समाप्त हो जाता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि शिक्षक ही वह केंद्र है जिसके इर्द-गिर्द पूरी शिक्षा व्यवस्था घूमती है। यदि वह निराश, उपेक्षित और थका हुआ है, तो आने वाली पीढ़ी भी वैसी ही बनेगी। अब समय है शिक्षक को दोबारा शिक्षा के केंद्र में लाने का — क्योंकि यदि शिक्षक चला गया, तो विद्यालय तो रह जाएगा, पर शिक्षा नहीं।

यह केवल शिक्षकों की समस्या नहीं, बल्कि समाज के भविष्य की चुनौती है। यदि शिक्षा से उसका आत्मीय तत्व — शिक्षक — कमजोर पड़ गया, तो आने वाली पीढ़ी का बौद्धिक और नैतिक विकास भी अधूरा रह जाएगा। नीतियाँ, योजनाएँ, ऐप और पोर्टल तभी उपयोगी हैं जब वे शिक्षक को सशक्त बनाएँ, न कि उसे बोझिल करें। हमें यह स्वीकार करना होगा कि शिक्षा का केंद्र शिक्षक और विद्यार्थी ही हैं — ना कि आंकड़े, फाइलें और फ़ोटो। शिक्षक को फिर से स्वतंत्रता, सम्मान और भरोसे का वातावरण देना होगा। वह केवल नौकरी नहीं कर रहा, वह भविष्य गढ़ रहा है। यदि उसे प्रेरणा और गरिमा नहीं मिली,

तो शिक्षा केवल भवनों और आंकड़ों में सीमित रह जाएगी।

हमें यह याद रखना चाहिए — जब शिक्षक चला जाएगा, विद्यालय तो रह जाएगा, पर शिक्षा नहीं।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

 योग  अभ्यास  के साथ योग निद्रा  भी जरूरी हैं 

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योग साधना का लक्ष्य सिर्फ़ अधिक अभ्यास करना नहीं, बल्कि विश्राम के माध्यम से निरोगी एवं ऊर्जावान बनना है। योग में विश्राम सक्रिय ऊर्जा पैदा करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

अधिक अभ्यास के क्रम में जब मांसपेशियों को बार-बार और केवल खिंचाव का अभ्यास दिया जाता है, तो उनकी स्वाभाविक स्मृति में संतुलन की जगह केवल तनाव अंकित हो जाता है।मांसपेशियों में बना यह निरंतर खिंचाव, विशेष रूप से उन लोगों में जो योग या व्यायाम के अभ्यास में भी  अधिक करने  को ही लक्ष्य मानते हैं, हृदय पर अतिरिक्त दबाव उत्पन्न करता है। दीर्घकाल में यह स्थिति हृदयघात (Heart Attack) जैसे गंभीर परिणाम ला सकती है। मैंने ऐसे अनेक योग  अभ्यासियों को देखा है, जो अत्यंत अनुशासित अभ्यास के बावजूद अचानक हृदय संबंधी समस्याओं से ग्रस्त हो जाते हैं।

अधिक निरंतर अभ्यास  अर्थात खिंचाव को ही साधना का उद्देश्य न मानें। वास्तविक साधना वहाँ है जहाँ मांसपेशियाँ अपने मूल, अपने भीतर के “शून्य बिंदु” — शिथिलता — की ओर लौट सकें। तभी वे न केवल शारीरिक संतुलन की ओर लौटेंगी, बल्कि हृदय को भी तनाव से मुक्त करके जीवन को दीर्घकालीन स्थिरता और शांति प्रदान करेंगी।

विशेषकर योग में, जहाँ अभ्यास को आध्यात्मिक विश्राम की ओर ले जाने का अवसर होना चाहिए, वहाँ भी यदि केवल प्रतियोगिता  ही प्राथमिक बन जाए, तो इसका परिणाम विनाशकारी हो सकता है।

संक्षेप में, योग हमें यह सिखाता है कि हम अपने शरीर और मन को इस तरह से संतुलित करें कि हम कम ऊर्जा खर्च करके भी अधिक शक्तिवान और जीवंत महसूस कर सकें। इसलिए, योग अभ्यास का अंतिम उद्देश्य  और अधिक आसन  करना ही  नहीं, बल्कि विश्राम के माध्यम से ऊर्जा का संचार करना है।

 शवासन ,योग निद्रा एक गहन विश्राम और निर्देशित ध्यान तकनीक है जिसे तनाव, चिंता और अनिद्रा को कम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह  लेटकर अभ्यास करने पर जागृति और नींद के बीच एक शांत, आरामदायक अवस्था में पहुँचाती है जो  प्रतिभागी को अधिक ऊर्जावान बनाती है । योग थकाने वाला नहीं ,और अधिक स्फूर्ति देने वाला,तरोताजा  करने वाला  होता हैं l

− स्वास्थय सेतु

हार्ट अटैक में सीपीआर की अहमियत

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हमारे शरीर का महत्वपूर्ण अंग हृदय खून को पंप कर बदन के हर भाग तक आॅक्सीजन और जरूरी पोषक तत्व पहंुचाने का कार्य करता है। इसलिए शरीर के सुचारू रूप से कार्य करने के लिए दिल का स्वस्थ होना बहुत जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा 1.80 करोड़ मौतें दिल की बीमारी से होती हैं। हर पांच में से चार व्यक्ति हार्ट अटैक और स्ट्रोक का शिकार होकर मौत के मुंह में समा जाते हैं। हार्ट अटैक तब आता है, जब दिल तक आॅक्सीजन लेकर जाने वाले खून की सप्लाई रुक जाती है। इसमें हृदय की मांसपेशियों को नुकसान पहुंच सकता है या उनके कार्य करना बंद करने और समय पर इलाज नहीं होने से जन हानि हो सकती है।
भारत में 98 प्रतिशत लोगों द्वारा सीपीआर का तरीका नहीं जानने के चलते हर साल दिल का दौरा पड़ने से करीब सात लाख लोग मौत का शिकार हो जाते हैं। अचानक हृदय रुकने की घटनाएं शहरों तक ही सीमित नहीं रहीं। इस किस्म की बढ़ती वारदातों से अब गांव भी अछूते नहीं रहे। आधुनिक जीवन शैली और खानेपीने के तरीकों में बदलाव के कारण मनुष्य खराब खनपान, पानी, तनाव, प्रदूषण, नीरसता और निष्क्रियता ने सूतरतहाल को और पैचीदा बना दिया है। इससे हृदयाघात की समस्याएं बढ़ी हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक एक तंदरुस्त शख्स के लिए रेटिंग हार्ट रेट 80 से 100 बीट प्रति मिनट होती है। इससे कम या अधिक बीमारी का लक्षण माना जाता है। दिल का दौरा पड़ने का अहसास होते ही चिकित्सक की मदद ली जानी चाहिए। दौरा पड़ने से पहले हमारा शरीर सिगनल देता है। अकारण दर्द या तकलीफ महसूस होना हार्ट अटैक का लक्षण हो सकता है। सीने में दर्द या दबाव अचानक शुरू हो सकता है और निरंतर रह सकता है। यह दर्द गर्दन, कंधों और कमर में भी हो सकता है। बाई बाहु में दर्द इसका खास लक्षण है। दिल का दौरा उस समय पड़ता है, जब दिल तक खून की सप्लाई रुक जाती है। यदि हृदय की गति रुकने के पांच मिनट पहले रोगी को साधारण तकनीक कार्डियो पल्मोनरी रिससिटेशन (सीपीआर) दिया जाए, तो उसकी जान बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। अचानक हृदयगति रुकने से जान गंवाने को महज इत्तेफाक कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। इसमें मानवीय संस्कार और सामाजिक विफलता की भी अहम भूमिका है। इसलिए जागरूक ही नहीं, आम लोगों को भी सीपीआर और उसे देने के तरीके से वाकिफ होना जरूरी है। जानकारी के अभाव में हमारे देश में केवल सात प्रतिशत रोगियों को समय पर सीपीआर मिल पाता है। हमारी सामान्य जानकारी और मामूली सजगता पीड़ित व्यक्ति की जान बचाने में मददगार हो सकती है। आंकड़े गवाह हैं कि मात्र दो प्रतिशत देशवासियों को सीपीआर देने का तरीका आता है। 49 गुना लोग इस साधारण सी तकनीक से पूरी तरह नावाकिफ हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि हमारे देश में हृदय रोग पहले से ही मौत का एक बड़ा कारण है। भविष्य में इस संकट के और गहराने की संभावना है। 2030 तक देश में 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों की संख्या 19.3 करोड़ को पार कर जाएगी। इनमें सार्वजनिक स्थानों पर सांस रुकने, बेहोश होकर गिरने और हर्ट अटैक के मामलों में वृद्धि होगी। ऐसी स्थिति में सीपीआर या आॅटोमेटेड एक्सटर्नल डिफिब्रिलेटर (एईडी) जैसे उपकरण जीवन बचाने में कारगर साबित हो सकते हैं। चूंकि, हमारे मुल्क में यह व्यवस्था बहुत सीमित है, इसलिए सीपीआर पर ही तवज्जह देना बेहतर विकल्प है। पीड़ित व्यक्ति में हृदयगति रुकने के बाद प्रत्येक मिनट की देरी से उसके जीवित रहने की संभावना 10 प्रतिशत तक कम हो जाती है। पांच मिनट का विलंब जान का जोखिम हो सकता है। सीपीआर एक साधारण सी तकनीक है। इसमें अपने दानों हाथों को मरीज की छाती के बीच में रखकर तेज और समान दबाव डालने के साथ मुंह पर मुंह रखकर सांस देना होता है, ताकि खून के प्रवाह को जारी रखकर मरीज के मस्तिष्क और हृदय तक आॅक्सीजन पहुंचाई जा सके। अधिकांश कार्यालयों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थनाों पर पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। स्कूल के पाठ्यक्रम में सीपीआर तो शामिल है, लेकिन प्रशिक्षण का अभाव है। नारवे और सिंगापुर जैसे देशों में स्कूली बच्चों और ड्राइविंग लाइसेंस धारकों के लिए सीपीआर का प्रशिक्षण अनिवार्य है। हमारे मुल्क के कई शहरों के अस्पतालों और निजी संस्थाओं में सीपीआर वर्कशाॅप शरू किए गए हैं, लेकिन गांवों में अभी इस प्रकार की सुविधाएं नहीं हैं। इस प्रक्रिया को तब तक जारी रखना चाहिए, जब तक चिकित्सीय सहायता रोगी तक न पहुंच जाए। इस तरह हम हृदयाघात के रोगी की जान बचाने में कामयाब हो सकते हैं। आजकल दिल से जुड़ी समस्याएं एक बड़ा सबब बन चुकी हैं। माना जाता है कि हार्ट अटैक या स्ट्रोक पर काबू पाना मुश्किल है, लेकिन वल्र्ड हार्ट फेडरेशन के मुताबिक साधारण सी आदतों का अनुपालन कर 80 प्रतिशत तक दिल की बीमारियों को रोका और हृदय को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है।
अमेरिका के विशेषज्ञ डाॅक्टर वास ने कुछ आसान और प्रभावी आदतें अपनाकर दिल की देखभाल आसानी से करने की सलाह दी है। इनमें रोजाना खाने के बाद 10-15 मिनट टहलना, तेल की गोलियों के स्थान पर ओमेगा-3 से भरपूर फूड्स लेना, अच्छी नींद को अहमियत देना, प्लास्टिक के स्थान पर कांच या स्टील की बोतलों का इस्तेमाल करना और नियमित रूप से स्वास्थ्य चेकअप कराना शामिल है। टहलने से ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है और दिल पर कम दबाव पड़ता है। सैल्मन, अख्रोट, अलसी या चिया सीड्स में पाया जाने वाला ओमेगाा-3 खून की खराब चर्बी को कम करने के अलावा नसें ब्लाॅकेज होने से बचाता है। दिल की सेहत के लिए कम से कम छह घंटे भरपूर नींद जरूरी है। गहरी नींद से ब्लड प्रेशर नियंत्रित और आर्टरीज रिलैक्स रहती हैं। प्लास्टिक की बोतलों और डिब्बों का प्रयोग न करें। इनमें मौजूद बीपीए जैसे रसायन हार्मोंस को बिगाड़कर दिल को प्रभावित कर सकते हैं। दिल की बीमारियों से ऐहतियात बरतने के लिए साल में एक या दो बार ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रोल और ब्लड प्रेशर की जांच जरूर कराएं, ताकि समय रहते आवश्यक बदलाव कर बड़ी परेशानी से बचा जा सके।

           एमए कंवल जाफरी

वरिष्ठ पत्रकार

 ‘झूठ की बिसात’ पर सत्ता की ‘कारगुज़ारियां’

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बिहार में गिरा ब्रिज

                                                                      निर्मल रानी

  बिहार में विधान सभा चुनावों की गहमागहमी के बीच चुनाव प्रचार तेज़ हो गया है। सत्ता और विपक्ष दोनों ही ओर से स्टार प्रचारकों द्वारा एक दूसरे को नीचा दिखाने व एक दूसरे पर लांछन लगाने का खेल जारी है। इसी मुहिम के तहत जनता के बीच भरपूर ‘झूठ’ भी परोसा जा रहा है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि ‘झूठ ‘ का सबसे गहरा रिश्ता राजनेताओं से ही है। मिसाल के तौर पर महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव ने हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वादा किया है। इसके अतिरिक्त सभी जीविका दीदियों की नौकरी को स्थाई करने व कम से कम 30,000 मासिक वेतन देने और जीविका योजना के तहत 2 साल बिना ब्याज़ ऋण दिए जाने का भी वादा किया है। इसके अतिरिक्त सभी संविदा, नियोजित और आउटसोर्सिंग कर्मचारियों को स्थायी करना,पुरानी पेंशन योजना को पुनः लागू करना,,महिलाओं को 2,500 मासिक सहायता ,हर परिवार को 200 यूनिट मुफ़्त बिजली,वृद्धजनों, विधवाओं और दिव्यांगों को ₹1,500 मासिक ,प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए फ़ॉर्म शुल्क मुआफ़ करने और परीक्षा केंद्र तक मुफ़्त यात्रा,किसानों को सभी फ़सलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी,जैसे अनेक ऐसे वादे किये गये हैं जिन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन तेजस्वी यादव का हवाई क़िला बता रहा है। क्योंकि राज्य का बजट इतने बड़े ख़र्च को उठा पाने की स्थिति में नहीं है। परन्तु ऐसे सवालों पर तेजस्वी फ़रमाते हैं कि “हम आउट ऑफ़ बॉक्स सोचते हैं”। गोया वादा करने वालों की नज़र में यह सोच ‘आउट ऑफ़ बॉक्स ‘ वाली है तो महागठबंधन  की नज़र में इस तरह के वादे झूठ बल्कि महाझूठ हैं । 

                अब देखिये बिहार चुनाव से जुड़ी सत्ता की बानगियाँ। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान खगड़िया में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुये कहा कि नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार जैसे नेताओं पर “चार आने का भी भ्रष्टाचार” का आरोप नहीं लगा है। उन्होंने राजग राज को  “विकास का राज” बताया और विपक्ष को “लठबंधन” का नाम दिया।  अमित शाह ने ज़ोर देकर कहा कि “केवल नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार, जिन पर चार आने का भी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है, बिहार का विकास कर सकते हैं।” इसके पहले भी कई बार स्वयं प्रधानमंत्री मोदी,गृह मंत्री व मुख्यमंत्री नितीश कुमार ‘भ्रष्टाचार मुक्त ‘ सरकार के दावे  हैं जबकि 20 वर्ष पुराने लालू राज को जनता को याद दिलाकर महागठबंधन के प्रति भय पैदा करने की कोशिश करते रहते हैं। परन्तु इनके भ्रष्टाचार मुक्त व सुशासन राज होने जैसे फ़र्ज़ी दावों की क़लई प्रमाण सहित प्रशांत किशोर अक्सर खोलते रहते हैं। याद कीजिये पिछले 5 वर्षों के भीतर इसी बिहार में और इसी मोदी-नितीश काल में एक दो नहीं बल्कि अनेक बड़े पुल ध्वस्त हो गये। कई निर्माणाधीन थे तो कई उद्घाटन की प्रतीक्षा में तो कई ऐसे जिनका कुछ समय पूर्व ही उद्घाटन किया गया था। भ्रष्टाचार का इससे बड़ा सुबूत और क्या चाहिये? जनता के टैक्स के हज़ारों करोड़ रूपये ऐसे भ्रष्ट निर्माण की भेंट चढ़ने के बावजूद यह दावा करना कि “केवल नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार, जिन पर चार आने का भी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है, इससे बड़ा झूठ और मज़ाक़ जनता के साथ और क्या हो सकता है ? बिहार में भ्रष्टाचार के ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं। 

                    इसी तरह बिहार चुनाव की बेला में ही रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव ने गत 18 अक्टूबर को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का दौरा किया और इस दौरान उन्होंने ट्रेन में यात्रियों से बातचीत भी की। ख़बरों के अनुसार उन्होंने यात्रियों को आश्वासन दिया कि दीपावली व छठ जैसे त्योहारों के दौरान कोई कमी नहीं होगी और रेलवे गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। इससे पहले सरकार द्वारा दावा किया गया था कि दीपावली और छठ पर 12,000 से अधिक विशेष रेलगाड़ी चलेंगी। इस ख़बर पर भी ख़ूब जगहंसाई हुई थी क्योंकि देश भर में इस समय चलने वाली कुल सवारी रेल गाड़ियों की संख्या 13,000 के लगभग है ऐसे में 12,000 से अधिक विशेष रेलगाड़ी चलाने का दावा,महाझूठ के सिवा और क्या कहा जा सकता है ?और यदि इन दावों में लेशमात्र भी सच्चाई होती तो  दीपावली व छठ के दौरान यू पी बिहार व झारखण्ड जैसे राज्यों में आने जाने वाले यात्रियों को कम से कम इसतरह का असहनीय व अकल्पनीय कष्ट तो न उठाना पड़ता ? रेल मंत्री द्वारा दिल्ली में पूर्व नियोजित तरीक़े से व पूर्ण सुरक्षा के साथ किसी ट्रेन में चढ़कर केवल चुनावी स्टंट व मीडिया में सुर्ख़ियां बटोरने की ग़रज़ से रेल यात्रियों से संवाद करना और बात है परन्तु सच्चाई तो यही है कि इन त्योहारों के दौरान ट्रेन में चढ़ना तो दूर रेल मंत्री महोदय बिना सुरक्षा के प्लेटफ़ॉर्म तक पर नहीं घूम सकते थे रेल यात्रियों की इस क़द्र अनियंत्रित भीड़ का आवागमन हो रहा था। ट्रेन के डिब्बों में चाहे वे ए सी हों या स्लीपर क्लास आरक्षित कोच,इन सब में यात्रियों को किन दुर्दशा के दौर से गुज़रना पड़ा है यह केवल यात्री या भुक्त भोगी ही बता सकते हैं। गोदी मीडिया की नज़रों में तो सरकारी सुनहरा पक्ष ही सत्य का सबसे बड़ा दस्तावेज़ है ?  

                    ऐसी ही एक ख़बर ने पिछले दिनों सरकार की बड़ी फ़ज़ीहत कर डाली। बिहार चुनाव के मद्देनज़र दिल्ली स्थित यमुना नदी के तट पर स्थित वासुदेव घाट पर छठ पूजा के अवसर पर पवित्र स्नान करने हेतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम बना। इस आयोजन के लिये वासुदेव घाट पर प्रधानमंत्री के स्नान के लिए एक “नक़ली यमुना” बनाई गई है। असली यमुना के साथ ही बनी इस “नक़ली यमुना” में कथित तौर पर वज़ीराबाद वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से फ़िल्टर किया गया पीने का पानी पाइपलाइन के माध्यम से पहुँचाया गया। क्योंकि असली यमुना का पानी ज़हरीला व रासायनिक झाग से भरा हुआ है। दिल्ली पॉल्यूशन कंट्रोल कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, यमुना का पानी स्नान के लिए अयोग्य है और इससे गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। परन्तु केवल बिहार के मतदाताओं को रिझाने के लिये यह नाटक रचा गया। विपक्ष ने इसे धार्मिक भावनाओं का अपमान,चुनावी स्टंट व  फ़र्ज़ीवाड़ा बताया। प्राप्त ख़बरों के अनुसार सोशल मीडिया पर इस फ़र्ज़ी यमुना की ख़बर के चलते हो रही फ़ज़ीहत के मद्देनज़र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का  वासुदेव घाट पर छठ पूजा स्नान कार्यक्रम रद्द हो गया। इस तरह के अनेक उदाहरण मिल जायेंगे जिनसे पता चलता है कि सत्ता की ‘कारगुज़ारियां वास्तविकता में कुछ और होती हैं जबकि ‘झूठ की बिसात’ पर ‘ कुछ और। 

                                                                          निर्मल रानी

अमृत समानहै गाय का दूध, मूत्र और गोबर

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गोपाष्टमी पर्व

 बाल मुकुन्द ओझा

देश में हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी का त्योहार मनाए जाने की परंपरा है। इस साल गोपाष्टमी 30 अक्टूबर को है। भारत में गाय को मां कहा जाता है और उसकी पूजा की जाती है। घरों में आज भी पहली रोटी गौ माता को खिलाई जाती है। गौ वंश को लेकर इस समय देश की सियासत में गर्माहट है। महाराष्ट्र ने गाय को माता का दर्ज़ा घोषित कर दिया है और अन्य राज्य भी माता घोषित करने की प्रक्रिया में है। केंद्र सरकार से भी मांग की जा रही है कि वह पूरे देश में गाय को माता का दर्ज़ा प्रदान करें। हिंदू धर्म में गाय को मां का दर्जा दिया गया है, साथ ही गाय को बेहद पवित्र और पूजनीय माना गया है।

 गाय को छत्तीस कोटि देवी-देवताओं का वास माना जाता है। इस अवसर पर गौ माता की पूजा और सेवा करने का सनातनी विधान है। बताया जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने गोपाष्टमी पर ही गौ-चारण यानी गायों को चराना शुरू किया था। चूंकि श्रीकृष्ण स्वंय गायों की सेवा करते थे, इसलिए इस दिन गौ सेवा का विशेष महत्व बताया गया है। इस गोपाष्टमी के दिन गाय या गाय के बछड़े को हरा चारा खिलाना बहुत ही शुभ माना जाता है। ऐसा कहते हैं कि इस दिन गाय को हरा चारा खिलाने से दांपत्य जीवन में खुशहाली आती है।

यह त्योहार भगवान श्रीकृष्ण और गायों को समर्पित है। यह मथुरा, वृंदावन और अन्य ब्रज क्षेत्रों में गोपाष्टमी प्रसिद्ध त्योहार है। इस दिन गायों को उनके बछड़े के साथ सजाने और पूजा करने की परंपरा है। आज के दिन श्रीकृष्ण के पिता नंद महाराज ने श्रीकृष्ण को गायों की देखभाल की जिम्मेदारी दी थी और श्रीकृष्ण गायों को चराने वन ले गये थे। गोपाष्टमी पर प्रातः काल में ही धूप-दीप अक्षत, रोली, गुड़, आदि वस्त्र तथा जल से गाय का पूजन किया जाता है और आरती उतारी जाती है। इस दिन कई व्यक्ति ग्वालों को उपहार आदि देकर उनका भी पूजन करते हैं। गायों को खूब सजाया जाता है। इसके बाद गाय को चारा आदि डालकर परिक्रमा करते हैं। परिक्रमा करने के बाद कुछ दूर तक गायों के साथ चलते हैं। ऐसी आस्था है कि गोपाष्टमी के दिन गाय के नीचे से निकलने वालों को बड़ा ही पुण्य मिलता है।

गोपालन भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं। गाय को माता रूप में पूजने और उसके पालन में आमजन के साथ कई संस्थाएं भी लगी हैं जो देशभर में गौशालाएं संचालित करती है। महंगाई के जमाने में गोपालन के प्रति लोगों का मोह भंग सा हो चला था, लेकिन कोरोना काल के बाद देसी नस्ल की गाय के दूध और दुग्ध से बने उत्पादों की मांग फिर से बढ़ी है। मिलावटी खानपान से बचने और इम्युनिटी बढ़ाने के लिए शुद्ध दूध,छाछ, दही, घी आदि को लोग प्राथमिकता दे रहे हैं चाहे ये उत्पाद बाजार भाव से भले ही चार गुणा में ही क्यों ना उपलब्ध हो। गाय का दूध, गाय का घी, दही, छांछ यहाँ तक की मूत्र भी मनुष्य जाति के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं। गोबर का धुआं अपने आस-पास के वातावरण को भी शुद्ध रखता है। इसके धुएं से घर की सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि एवं पशुपालन का विशेष महत्व है। सकल घरेलू कृषि उत्पाद में पशुपालन का 28-30 प्रतिशत का योगदान सराहनीय है जिसमें दुग्ध एक ऐसा उत्पाद है जिसका योगदान सर्वाधिक है। भारत में विश्व की कुल संख्या का 15 प्रतिशत गायें है और देश के कुल दुग्ध उत्पादन का 43 प्रतिशत गायों से प्राप्त होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 19.91 करोड़ गायें है। गौसेवा हमारे देश की प्राचीन संस्कृति है। यह संस्कृति ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में भी सहायक होती है। परन्तु वर्तमान समय में हमारी यह संस्कृति धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। गाय कलियुग में संजीवनी स्वरूपा है, गाय मानव जीवन में माता की भूमिका का निर्वाह करती है। गाय का दूध अमृत के सामान होता है और मूत्र औषधि का काम करता है। पहले हर घर में गाय-भैंस का पालन होता था, जिसके कारण बच्चों को दूध के रूप में पौष्टिक आहार भी मिलता था। गौ पालन और पशुपालन से भारी मात्रा में लाभकारी रोजगार का सृजन हो सकता है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

   मो.-8949519406

वोट जरूर दीजिए, वोट सरकार बनाता है,गिराता है

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हमारे एक वोट से क्या होगा , चलिए शिमला चलते है “, यह कहना छोड़िए । आपके एक वोट से रेखा गुप्ता और योगी मुख्यमंत्री बन जाते हैं , मोदी प्रधानमंत्री बन जाते हैं । शास्त्री जी से लेकर अटल जी तक जितने प्रधानमंत्री बने , आपके एक वोट से ही बने । यह बात हम मनमोहन सिंह जी के लिए इसलिए नहीं कह रहे चूंकि वे तो राज्यसभा सदस्य रहते हुए दोनों बार पीएम बने या बनाए गए ।

केवल एक बार वे 1999 में दक्षिण दिल्ली लोकसभा चुनाव सीट से चुनाव लड़े थे , बीजेपी के वीके मल्होत्रा ने उन्होंने हरा दिया था । उसके बाद कभी लड़े ही नहीं लड़े । रही बात आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की तो वे तो 1951- 52 में हुए प्रथम संसदीय चुनाव से पूर्व ही 1947 में प्रधानमंत्री बन गए थे । चूंकि तब कोई विपक्षी दल था ही नहीं अतः बाद में हुए चुनावों में भी उनका बनना तय था ।

तो बात एक वोट से चली थी । एक वोट की कीमत तुम क्या जानो बाबू साहब ? बड़ा कीमती होता है एक वोट ? याद है न अटलजी की सरकार एक वोट से गिर गई थी ? यह बात और है कि पटेल के 13 वोटों के मुकाबले एक वोट लेकर नेहरूजी पहले प्रधानमंत्री बन गए थे । पर एक बात समझ लीजिए , वोट असली पड़ना चाहिए , नकली नहीं । वह वोट फर्जी पड़े वह बर्दाश्त नहीं ।

अब देखिए न ! राजनैतिक आदर्शवाद का ज्ञान बिखेरने वाले प्रशांत किशोर उर्फ पीके खुद ही फर्जी वोटर निकले । बिहार के सासाराम में उनका वोट असली है । वे दिल्ली में रहते हैं , दिल्ली में उनका वोट नहीं है । उनका दूसरा वोट कालीघाट कोलकाता में है जो फर्जी है । यह वोट उन्होंने तब बनवाया जब वे बंगाल में ममता बनर्जी के चुनावी रणनीतिकार थे । मजेदार बात यह है कि बंगाल में उनका पता अभिषेक बनर्जी के निवास का निकला जो टीएमसी का कार्यालय भी है ।

ऐसे बनते हैं फर्जी वोट । देखा न आपने ! पीके के ही नहीं थे दो वोट । तेजस्वी यादव और पवन खेड़ा के भी दो दो निकले थे । दोनों ही पकड़े जाने पर चुनाव आयोग और केन्द्र सरकार पर वोट चोरी का आरोप मढ़ रहे थे , खुद वोट चोर निकले । एसआईआर के माध्यम से ऐसे ही वोट चोर लाखों की संख्या में पकड़े गए हैं ।

अब चूंकि पूरे देश की मतदाता सूची फ्रीज हो गई है तो बंगाल , यूपी , तमिलनाडु सहित 12 एसआईआर राज्यों में पकड़े जाएंगे । इनमें देसी भी होंगे और विदेशी भगोड़े भी । तो राज्यों का रोआराट सुनने को तैयार रहिए । राजनैतिक दलों की किलकारियां भी सुनाई देंगी । लेकिन एसआईआर के माध्यम से फर्जी वोट काटे जाएंगे , विदेशी नागरिकों को डिपोर्ट किया जाएगा । जिन दलों ने फर्जी वोट थोक के भाव बनवाए हैं , उनके चेहरों पर पड़े नकाब उतर जाएंगे ।
,,,,,,,,,,कौशल सिखौला

बनारस के लालजी पांडेय से अनजान बनने का सफर

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अनजान के नाम से प्रसिद्ध हुए लालजी पांडेय बनारस की तंग गलियों में जन्म लिया। पूरी दुनिया इस युवक को ‘अनजान’ के नाम से जानती है। लेकिन कम लोग जानते हैं कि जिनके शब्दों पर कभी अमिताभ बच्चन थिरकते थे, उन्होंने अपने शुरुआती दिनों में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर घर चलाया था। गणित के सवाल हल कराते-कराते जो शख्स हिंदी सिनेमा के इतिहास में सबसे चर्चित गीतकारों में शामिल हुआ, उसका जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था।

28 अक्टूबर 1930 को उत्तर प्रदेश के बनारस में जन्मे लालजी पांडेय के घर का माहौल कला और साहित्य से भरा था। उनके परदादा राजाराम शास्त्री संस्कृत के बड़े ज्ञाता थे, और यही ज्ञान व रचनात्मकता लालजी के खून में बहती थी। बचपन से ही उन्हें शब्दों से खेलने का हुनर आ गया था। पढ़ाई के साथ-साथ वे कविताएं लिखा करते और बनारस की गलियों में काव्य गोष्ठियों में भाग लेते। धीरे-धीरे उनकी कविताएं स्थानीय पत्रिकाओं में छपने लगीं।

उसी दौर में हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’ चर्चा में थी। लालजी ने उसकी पैरोडी ‘मधुबाला’ लिखी — और बनारस के नौजवानों में धूम मचा दी। यही वह वक्त था जब ‘अनजान’ नाम धीरे-धीरे बनारस के साहित्यिक मंचों से निकलकर मुंबई की ओर बढ़ने लगा।

बीमारी ने दी दिशा, और मुंबई ने संघर्ष

जिंदगी के इस मोड़ पर तकदीर ने करवट ली। अनजान को अस्थमा की गंभीर बीमारी हो गई। डॉक्टरों ने साफ कहा — “अगर ज़िंदा रहना है, तो नमी वाले शहर में रहो।” बस फिर क्या था, उन्होंने बनारस की गलियां छोड़ीं और समुद्र की नमी वाली मुंबई की ओर रुख किया। लेकिन यह सफर आसान नहीं था। न पैसे, न पहचान, न ठिकाना।

मुंबई पहुंचकर उनके पुराने मित्र शशि बाबू ने गायक मुकेश से मिलवाया। मुकेश ने उनकी कविताएं सुनीं और उन्हें फिल्मों के लिए गीत लिखने की सलाह दी। यहीं से बॉलीवुड के ‘अनजान’ की असली यात्रा शुरू हुई।

पहला मौका और पहला झटका

मुकेश के सहयोग से उन्हें अभिनेता प्रेमनाथ की फिल्म ‘प्रिजनर ऑफ गोलकुंडा’ के लिए गाने लिखने का मौका मिला। मेहनताना मिला—सिर्फ 500 रुपये। फिल्म चली नहीं, लेकिन उनके लिखे गीत लोगों को पसंद आए। उस दौर में अनजान को गुजर-बसर के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना पड़ता था। लेकिन वह जानते थे कि यही ट्यूशन उनके संघर्ष की सबसे बड़ी सीख है।

17 साल तक उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। आखिरकार 1963 में फिल्म ‘गोदान’ से उन्हें वह पहचान मिली जिसकी उन्हें तलाश थी। इसी फिल्म ने अनजान को सिनेमा की दुनिया में स्थायित्व दिया।

‘बंधन’ से ‘खइके पान बनारस वाला’ तक का सफर

‘गोदान’ के बाद उन्हें राजेश खन्ना और मुमताज की फिल्म ‘बंधन’ में गीत लिखने का मौका मिला। “*बिना बदरा के बिजुरिया” ने उन्हें दर्शकों के बीच लोकप्रिय बना दिया। इसके बाद अनजान ने **कल्याणजी-आनंदजी, **बप्पी लहरी, *लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आर.डी. बर्मन जैसे संगीतकारों के साथ काम किया।

और फिर आया वो दौर जब उनके शब्दों पर देश थिरक उठा —
खइके पान बनारस वाला… खुल जाए बंद अकल का ताला।”
डॉन, मुकद्दर का सिकंदर, लावारिस, नमक हलाल, शराबी, याराना — हर फिल्म में उनके गीतों ने अमिताभ बच्चन की छवि को और निखारा।

बनारस की मिठास और भोजपुरी की खुशबू

अमिताभ और अनजान – एक अद्भुत जोड़ी

बनारस के दो कलाकार – एक अभिनेता, दूसरा गीतकार – जब साथ आए तो इतिहास बन गया। अमिताभ बच्चन और अनजान की जोड़ी ने सिनेमा को वो गाने दिए जो आज भी अमर हैं —
तेरे जैसा यार कहां”, “छू कर मेरे मन को”, “गोरी हैं कलाईयां”, “इंतेहा हो गई इंतज़ार की”।
हर गीत में एक कहानी थी, हर पंक्ति में एक अहसास।

अनजान की विरासत और अधूरी चाहत

अपने जीवन में अनजान ने करीब 300 फिल्मों के लिए 1500 से ज्यादा गाने लिखे, लेकिन अफसोस, उन्हें कभी फिल्मफेयर अवॉर्ड नहीं मिला।
3 सितंबर 1997 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। लेकिन गीतकार अनजान की विरासत खत्म नहीं हुई। उनके बेटे समीर अनजान ने पिता की राह अपनाई और आज गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे ज्यादा गीत लिखने वाले गीतकार के रूप में दर्ज हैं।

अनजान ने अपने जीवन के आखिरी दिनों में अपनी कविताओं की किताब ‘गंगा तट का बंजारा’ प्रकाशित की, जिसका विमोचन खुद अमिताभ बच्चन ने किया था। शायद इसीलिए आज भी जब कोई “खइके पान बनारस वाला” गुनगुनाता है, तो बनारस की गलियां जैसे मुस्कुरा उठती हैं।

फूहड़ शब्दों का ग्लैमर और वर्चुअल समाज की विडंबना

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(भाषा के पतन से लोकप्रियता के उत्कर्ष तक की कहानी) 

सोशल मीडिया पर अब केवल तस्वीरें या वीडियो नहीं, शब्द भी बिकने लगे हैं। फूहड़ता और अपशब्दों ने अभिव्यक्ति की मर्यादा को पीछे छोड़ दिया है। लाइक, कमेंट और शेयर की भूख ने भाषा को बाजार में बदल दिया है। समाज का वही वर्ग जो संस्कारों की बातें करता है, वही इन पोस्टों पर तालियाँ बजाता है। यह प्रवृत्ति केवल भाषा का पतन नहीं, सोच की गिरावट भी है। सभ्यता की पहली पहचान भाषा होती है—जब भाषा गिरती है, तो समाज भी गिर जाता है।

– डॉ प्रियंका सौरभ

कुछ समय पहले तक मुझे यह गलतफहमी थी कि सोशल मीडिया पर केवल रील्स और वीडियोज़ में वल्गर या बेहूदा कंटेन्ट ही ज्यादा देखा जाता है। सोचती थी कि शायद यह दृश्य माध्यम का प्रभाव है—जहाँ चमक, शरीर और शोर ही बिकता है। पर हाल के दिनों में कुछ लम्बी पोस्टें पढ़कर भ्रम टूटा। अब केवल दृश्य नहीं, भाषा भी बिकाऊ हो गई है। फूहड़पन अब सिर्फ कैमरे के सामने नहीं, कलम की नोक पर भी नाच रहा है।

इन पोस्टों में विषय तो वही पुराने और ‘ट्रेंडिंग’ हैं—पुरुषों को कोसना, संबंधों में स्त्री की पीड़ा या समाज की संकीर्णता। पर इन सबके बीच सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन विचारों को जिस भाषा में व्यक्त किया जा रहा है, वह भाषा नहीं, गाली का उत्सव लगती है। लाइक्स और कमेंट्स की बरसात होती है, और भीड़ ताली बजाती है—मानो फूहड़ता अब किसी नई ‘साहित्यिक विधा’ का नाम बन चुकी हो।

कभी कहा जाता था कि लिखना, दिखने से कठिन होता है। लिखना मतलब सोचना, मनन करना, किसी विषय पर आत्मा से उतरकर बोलना। शब्द कभी भीड़ को लुभाने का नहीं, समाज को सजग करने का माध्यम होते थे। लेकिन आज इस संतुलन को एक नई भूख ने निगल लिया है—लोकप्रियता की भूख। अब जो सबसे तेज़, सबसे तीखा और सबसे विवादित लिखेगा, वही सबसे ज्यादा देखा जाएगा।

‘क्लिक’ और ‘कमेंट’ की इस दौड़ ने शब्दों की गरिमा को लगभग निचोड़ कर रख दिया है। अब भाषा का अर्थ अभिव्यक्ति नहीं, उत्तेजना रह गया है। और यह प्रवृत्ति केवल अनपढ़ या असंवेदनशील वर्ग तक सीमित नहीं—कई बार वही लोग, जो समाज में सुधार, परिवार में संस्कार और रिश्तों में मधुरता की बातें करते हैं, इन पोस्टों पर टूट पड़ते हैं। वे न केवल इन्हें पढ़ते हैं, बल्कि ‘लाइक’, ‘हार्ट’ और ‘फायर इमोजी’ भेजकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं—जैसे यह कोई सांस्कृतिक आंदोलन हो।

यह सवाल सबसे ज्यादा चुभता है—आखिर इस फूहड़ता में आकर्षण क्या है? क्या लोग वास्तव में इन विचारों से सहमत हैं, या बस भीड़ में शामिल हो जाने की मजबूरी है? मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सोशल मीडिया ने व्यक्ति को ‘अदृश्य पहचान’ दी है। अब वह जो कहना, करना या दिखाना असल ज़िंदगी में नहीं कर सकता, उसे वह वर्चुअल दुनिया में निर्भीक होकर कर सकता है। यह आज़ादी धीरे-धीरे अराजकता में बदल गई है। भाषा की मर्यादा, सामाजिक संवेदना और दूसरों की गरिमा—सब पर खुली छूट मिल गई है।

किसी का अपमान करना, समूहों को उकसाना, व्यंग्य में विष घोलना—यह सब अब ‘क्रिएटिविटी’ कहलाता है। फूहड़ भाषा को ‘निर्भीक अभिव्यक्ति’ बताया जा रहा है, और सभ्य संवाद को ‘पाखंड’। विचारों की जगह शब्दों का शोर छा गया है।

विडंबना यह है कि यही समाज घर में बच्चों को मर्यादा, संस्कार और आदर का पाठ पढ़ाता है, मगर वर्चुअल मंच पर वही लोग अपशब्दों की पोस्ट पर हंसते हुए इमोजी भेजते हैं। यानी हमारी वास्तविक और वर्चुअल नैतिकता में ज़मीन-आसमान का अंतर है। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स ने हमें संवाद का अवसर दिया था, पर हम उसे विवाद का अखाड़ा बना बैठे। जहाँ पहले विचारों की टकराहट होती थी, वहाँ अब शब्दों की लाठियाँ चलती हैं।

यह प्रवृत्ति केवल भाषा की समस्या नहीं, सामाजिक संस्कृति के क्षरण का संकेत है। क्योंकि जब शब्द दूषित होते हैं, तो विचार भी विकृत हो जाते हैं। और जब विचार विकृत होते हैं, तो समाज में असहिष्णुता पनपती है। आज यही हो रहा है—हर वर्ग अपने पक्ष को ‘एकमात्र सत्य’ मानने लगा है, और जो असहमत है, उसके लिए अपशब्द तैयार रखे हैं।

कला, चाहे लेखन हो या अभिनय—समाज से संवाद का माध्यम है। लेकिन संवाद और प्रहार में फर्क होता है। जो शब्द किसी की गरिमा को चोट पहुँचाएँ, वे अभिव्यक्ति नहीं, आक्रोश का प्रदर्शन हैं। और जब यह आक्रोश लोकप्रियता के रास्ते का शॉर्टकट बन जाए, तब समाज को आत्ममंथन करना चाहिए।

जरूरत इस बात की है कि हम लोकप्रियता और गरिमा के बीच अंतर समझें। लिखना सिर्फ ‘लोग क्या कहेंगे’ के लिए नहीं होना चाहिए, बल्कि ‘मैं क्या कहना चाहता हूँ’ के लिए होना चाहिए। सच्चा लेखक भीड़ से नहीं, विवेक से संवाद करता है। लेकिन अफसोस, आज सोशल मीडिया ने साहित्य को मनोरंजन और विचार को व्यापार बना दिया है।

हर लाइक, हर कमेंट, हर शेयर—केवल एक बटन नहीं, एक नैतिक निर्णय है। जब हम किसी फूहड़ पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हैं, तो हम अनजाने में उस प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का एल्गोरिदम तो वही दिखाता है जो अधिक देखा जाता है। इसलिए असभ्य कंटेन्ट तभी बढ़ता है जब हम उसे बढ़ाते हैं। दर्शक अगर जिम्मेदार बन जाएँ, तो निर्माता भी सुधरने को मजबूर होंगे। संवेदनशील और सुसंस्कृत समाज वही होता है जहाँ लोकप्रियता का मापदंड शब्दों की गरिमा हो, न कि शब्दों की उत्तेजना।

सोशल मीडिया अब किसी एक व्यक्ति का नहीं, पूरे समाज का दर्पण है। यहाँ जो लिखा, कहा और साझा किया जा रहा है—वही हमारी सामूहिक सोच बन रहा है। अगर हम चाहते हैं कि समाज में शालीनता और संवेदना बनी रहे, तो हमें वर्चुअल व्यवहार में भी वही अनुशासन अपनाना होगा जो वास्तविक जीवन में अपनाते हैं। फूहड़ शब्दों की लोकप्रियता अल्पकालिक है, पर उनका प्रभाव गहरा और दीर्घकालिक। विचारों की ताकत शब्दों की मर्यादा में ही बसती है, न कि उनकी अशालीनता में।

इसलिए अब वक्त है कि हम ठहरकर सोचें—क्या हम वाकई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहे हैं, या बस असभ्यता की स्वतंत्रता का जश्न मना रहे हैं? और अगर जवाब दूसरा है, तो हमें याद रखना चाहिए—सभ्यता की पहली पहचान भाषा होती है, और जब भाषा गिरती है, तो समाज भी गिर जाता है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

बिहार में फिर गूंजा परिवारवाद का शंखनाद

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बाल मुकुन्द ओझा

बिहार में परिवारवाद का भूत एक बार फिर हिलोरे लेने लगा है। राज्य की चुनावी सियासत इन दिनों परिवार और परिवारवाद के इर्द-गिर्द घूम रही है। राजनीतिक पार्टियों में परिवारवाद पर सियासी संग्राम छिड़ गया है। एक दूसरे पर परिवारवादी होने के आरोप जड़े जाने लगे है। साथ ही स्वयं को पाक साफ़ बताकर दूसरों पर दोषारोपण किया जा रहा है। कई राजनीतिक विश्लेषक परिवारवाद और वंशवाद की परिभाषा अलग अलग बताते है। इन लोगों की मान्यता के अनुसार यदि संघर्ष के रास्ते कोई भाई अपनी जगह सियासत में बनाकर आता है तो उसे परिवारवाद का दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। वहीँ दूसरे पक्ष के विश्लेषक मानते है कि परिवार के सहारे आगे बढ़ना अनुचित है। भारत के लोकतंत्र को समझने वाले लोगो का एक दृष्टिकोण ये भी है की इस देश में वंशवाद और राजशाही को लोकतंत्र का जामा ओढ़ाया गया है। राजशाही के जमाने में और लोकतंत्र में फर्क सिर्फ इतना है कि तब राजा ही अपने बेटे को उत्तराधिकारी घोषित करता था अब वो जनता से घोषित करवाता है। बहरहाल आम जनता की नजर में परिवारवाद और वंशवाद में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। लोकतंत्र के लिए यह हितकारी नहीं है।

विधानसभा चुनाव में 42 उम्मीदवार ऐसे हैं, जिनके परिवारवाले पहले सांसद या विधायक रह चुके हैं। सबसे चौंकाने वाली चर्चा पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा की हो रही है। जीतन राम मांझी ने अपने हिस्से की छह में से पांच सीटों पर बहू, समधन, दामाद, भतीजे को चुनावी मैदान में उतार दिया है। परिवारवाद की खिलाफत करने वाली भाजपा के 101 में से 11 उम्मीदवार किसी न किसी राजनीतिक परिवार से जुड़े हैं। जेडीयू ने 101 सीटों में से 5 पर परिवारवादी उम्मीदवार उतारे हैं। चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ने 29 में से 8 टिकट अपने परिवार या करीबी रिश्तों वालों को दिए हैं। महागठबंधन में सबसे ज्यादा परिवारवाद का असर राजद में नजर आ रहा है। लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव तो पहले से सक्रिय हैं, लेकिन इस बार पार्टी ने करीब 10 ऐसे उम्मीदवार उतारे हैं जो किसी न किसी राजनीतिक परिवार से आते हैं।

बिहार में परिवारवाद को लेकर ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के मुताबिक , बिहार में कुल 27 प्रतिशत मौजूदा सांसद-विधायक वंशवादी पृष्ठभूमि से आते हैं। यानी लगभग हर चौथा जनप्रतिनिधि किसी राजनीतिक घराने से है। देशभर के 5,203 सांसदों और विधायकों में 1,106 (21 प्रतिशत ) परिवारवाद से जुड़े हैं। इस सूची में बिहार तीसरे स्थान पर है। बिहार में 360 मौजूदा सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों में से 96 (27 प्रतिशत) वंशवादी पृष्ठभूमि से हैं। बिहार विधानसभा के मौजूदा जनप्रतिनिधियों में 27 प्रतिशतवंशवादी हैं। वहीं, 40 लोकसभा सांसदों में से 15 सांसद (37.5 प्रतिशत ) और राज्यसभा में 16 में से 1 सांसद राजनीतिक परिवार से आते हैं। यह डाटा साबित करता है कि टिकट बांटते समय नेताओं को कार्यकर्ताओं से ज्यादा परिवार के सदस्यों की याद आती है।

चुनाव आते ही नेताओं के बेटा बेटी और रिश्तेदार सत्ता में संभावित बंटवारे के लिए सक्रीय हो जाते है। इसके लिए पार्टी की टिकट जरुरी है। यही टिकट उन्हें अपने परिवार के सहारे सत्ता की सीढ़ियों तक पहुँचाने का काम करती है। बिहार विधानसभा चुनाव की दुंदुभी बज चुकी है। प्रधान मंत्री सहित सभी पार्टियों के नेताओं का चुनाव प्रचार शुरू हो गया है। इस प्रदेश में परिवारवाद महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बन चुका है। सभी पार्टियां परिवारवाद की धमक से उबल रही है। एनडीए हो या इंडिया उर्फ़ महागठंबंधन कोई भी परिवारवाद से अछूता नहीं है। सभी सियासी पार्टिया एक-दूसरे पर परिवारवाद के बहाने हमला भी कर रहे हैं, लेकिन खास बात यह है कि शायद ही कोई राजनीतिक दल इससे अछूता है। बिहार की राजनीति में परिवारवाद की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं। आरजेडी,  भाजपा, लोक जनशक्ति, जेडी यू, हम और कांग्रेस पार्टी आदि सभी दलों में परिवारवाद का बोलबाला है।

भारत का लोकतंत्र भी अजब निराला है। मतदाता चाह कर भी जाति और क्षेत्र की राजनीति के भंवर से आजादी के 78 वर्षों के बाद भी निकल नहीं पाए है। लोकतंत्र ने आज पूरी तरह परिवारतंत्र का जामा पहन लिया है। बड़े बड़े आदर्शों की बात करने वाले नेता परिवारमुखी होगये है। देश वंशवाद से कब मुक्त होगा यह बताने वाला कोई नहीं है। इस गंभीर और संक्रामक बीमारी का इलाज केवल देश का मतदाता ही कर सकता है।

 बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32 मॉडल टाउन, जगतपुरा रोड

जयपुर राजस्थान