जब कानून और समाज आमने–सामने खड़े हों

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व्यक्ति की स्वतंत्रता, पारिवारिक मर्यादा और एक त्रासदी का गहन सामाजिक विश्लेषण

“स्वतंत्रता और परंपरा—दोनों अपने-अपने स्थान पर सही, पर जब टकराते हैं तो सबसे पहले टूटता है एक सामान्य परिवार। कानून अपना काम करता है, समाज अपनी जिद पर अड़ा रहता है, और बीच में पिस जाता है वह घर जिसने न विद्रोह किया, न अपराध—फिर भी वही सबसे बड़ा शिकार बन जाता है।”

– डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत जैसे विशाल और विविध सामाजिक ढाँचे वाले राष्ट्र में व्यक्ति के अधिकार और समाज की सामूहिक मर्यादाएँ एक-दूसरे से लगातार टकराती रहती हैं। संविधान व्यक्ति को स्वतंत्रता देता है, अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है, लेकिन सामाजिक परम्पराएँ यह स्वीकार नहीं कर पातीं कि कोई लड़की या लड़का परिवार की इच्छा और बिरादरी की मान्यताओं से अलग कोई जीवननिर्णय ले। यह संघर्ष नया नहीं है, लेकिन आज की जमीनी हकीकत में इसका तनाव कहीं अधिक विकराल रूप ले चुका है।

हाल ही की एक त्रासदी में यही टकराव खुलकर सामने आया, जब एक युवती ने अपने ही गाँव के युवक से विवाह कर लिया—ऐसा विवाह जो पूरी तरह कानूनी था, लेकिन समाज की दृष्टि में सर्वथा अस्वीकार्य। सामाजिक विरोध, पंचायत की मनाही, परिवार की पीड़ा और प्रतिष्ठा के दबाव के बीच लड़की शहर चली गई थी, पर कुछ समय बाद वापस अपने ही पैतृक गाँव में बहू बनकर लौट आई। यही वापसी समाज को चुनौती की तरह दिखाई दी और परिवार पर अत्यन्त तीव्र मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ा। वही दबाव परिस्थितियों को उस कगार तक ले गया जहाँ भाई ने अपनी ही बहन की हत्या कर दी। इस एक क्षण ने न केवल एक जीवन छीना, बल्कि पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया।

यह घटना सिर्फ मानवता पर एक चोट नहीं है, यह एक ऐसा दर्पण भी है जिसमें हम अपने समय की सबसे बड़ी विडंबना को साफ देख सकते हैं—कानून कुछ कहता है, समाज कुछ और। व्यक्ति की स्वतंत्रता एक दिशा में जाती है, जबकि परंपराएँ दूसरी दिशा में खींचती हैं। इन दोनों के बीच जो परिवार खड़ा होता है, वह अक्सर दोनों ओर से घायल होता है। कानून वयस्कता की उम्र तय कर देता है, पर वह ग्रामीण समाज की संवेदनात्मक संरचना, परिवार की प्रतिष्ठा, और सामुदायिक दबाव को नहीं समझता। वहीं समाज स्वतंत्रता के अधिकार को “अवज्ञा” या “विद्रोह” की तरह देखता है और परिवार पर ऐसी जिम्मेदारियाँ डाल देता है जिन्हें निभाना असंभव है।

परिवार ही इस संघर्ष का सबसे बड़ा पीड़ित बनता है। बेटी का गांव छोड़कर जाना, रिश्तेदारों की टिप्पणियाँ, पंचायत का दबाव, सामाजिक प्रतिष्ठा का संकट—ये सभी घटनाएँ एक घर को भीतर से हिलाकर रख देती हैं। कानून परिवार से लड़की को स्वीकार करने का संदेश देता है, जबकि समाज उसे अस्वीकार करने का दबाव डालता है। ये दोनों ताकतें परिवार को दो हिस्सों में चीर देती हैं—एक हिस्सा जिसे मन ने स्वीकार कर लिया है, और दूसरा हिस्सा जिसे समाज स्वीकार नहीं करने देता। ऐसे में विवेक धुंधला पड़ जाता है और भावनाएँ निर्णयों पर हावी होने लगती हैं।

इस घटना का सबसे भयावह पहलू यह था कि सोशल मीडिया पर 95 प्रतिशत टिप्पणियाँ इस हत्या को “सही” ठहरा रही थीं। यह केवल कुछ व्यक्तियों की राय नहीं, बल्कि समाज में पनप रही एक खतरनाक सामूहिक सोच का संकेत है। जब कोई समाज अपनी भावनाओं और परंपराओं के दबाव में हत्या जैसे अपराध को भी न्याय मानने लगे, तो यह किसी भी सभ्य व्यवस्था के लिए अत्यन्त गंभीर स्थिति है। कानून की शक्ति तभी तक है जब तक समाज उसे नैतिक समर्थन देता है। जब समाज हिंसा को नैतिक ठहराने लगे, कानून कमजोर नहीं, बल्कि अप्रासंगिक हो जाता है। और यही स्थिति किसी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी चेतावनी है।

विवाह की स्वतंत्रता का प्रश्न भी इस घटना में नए दृष्टिकोण से उभरता है। भारतीय कानून मानता है कि 18 और 21 वर्ष की उम्र में व्यक्ति परिपक्व और स्वतंत्र निर्णय लेने योग्य होता है। पर क्या वास्तव में यह उम्र जीवन का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय बिना परिवार के अनुभव, बिना सामाजिक समझ, बिना भविष्य की जिम्मेदारियों को समझे लेने के लिए पर्याप्त है? भारतीय परिवार व्यवस्था में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मामला नहीं होता, यह दो परिवारों, रिश्तों और समाजों का मामला होता है। ऐसे में कम आयु में किया गया आवेगपूर्ण निर्णय केवल व्यक्ति नहीं, पूरे परिवार को प्रभावित करता है।

यही कारण है कि कई लोग तर्क देते हैं कि विवाह के लिए माता-पिता की सहमति आवश्यक होनी चाहिए—कम से कम 30 वर्ष की आयु तक। यह विचार सामाजिक अनुभवों से उत्पन्न है, पर संवैधानिक दृष्टि से कठिन है। यदि माता-पिता की सहमति अनिवार्य कर दी जाए, तो यह युवाओं पर अत्यधिक दबाव और कई मामलों में दमन को भी जन्म दे सकता है। फिर भी यह भी सच है कि परिवार से विमुख होकर किए गए विवाहों के परिणामों का सबसे बड़ा बोझ परिवारों को ही उठाना पड़ता है। यह द्वंद्व इतना गहरा है कि कोई भी पक्ष न पूरी तरह सही ठहराया जा सकता है, न पूरी तरह गलत।

समाज अक्सर कहता है कि लड़की ने “परिवार की कई हत्याएँ कर दीं”—यह भाषा कानूनी नहीं, बल्कि भावनात्मक है। कानून भावनात्मक मृत्यु को अपराध नहीं मान सकता। पर परिवार इसे वास्तविक समझता है क्योंकि वे इसे प्रत्यक्ष जीते हैं। यही वह खाई है जिसे पाटना सबसे कठिन है। कानून कहता है निर्णय व्यक्तिगत है; समाज कहता है निर्णय सामूहिक है। और इन्हीं दो कथनों के बीच वह परिवार टूट जाता है जिसके इर्द-गिर्द इस तरह की घटनाएँ जन्म लेती हैं।

इस मामले में सबसे अधिक नुकसान उसी परिवार का हुआ जिसने न अपराध चुना, न विद्रोह। लड़की की जान चली गई, भाई का जीवन जेल में समाप्त, माता-पिता ने एक बेटी और एक बेटे दोनों को खो दिया, घर की आर्थिक-सामाजिक नींव हिल गई, बच्चों का भविष्य अनिश्चित हो गया। जबकि समाज के लिए यह महज चर्चा का विषय रह गया, और सरकार के लिए सिर्फ एक केस फाइल।

प्रश्न यह है कि सरकार क्या कर सकती है? भागकर विवाह पर रोक समाधान नहीं है, पर इस प्रक्रिया में सुधारों की आवश्यकता है। विवादित विवाह से पहले अनिवार्य परामर्श, परिवार–युवा मध्यस्थता, पंचायतों के अधिकारों पर स्पष्ट सीमा, और स्कूल-कॉलेजों में सामाजिक जिम्मेदारी की शिक्षा—ये सभी कदम जरूरी हैं। न्यायिक और प्रशासनिक संस्थाओं को भी परिवार की सामाजिक पीड़ा को समझने की आवश्यकता है।

फिर भी सरकार और कानून दोनों अकेले समस्या हल नहीं कर सकते। जब तक समाज संवाद को हिंसा से ऊपर नहीं रखेगा, जब तक परिवार गुस्से से ऊपर संवाद को नहीं चुनेगा, और जब तक युवा आवेग को निर्णय का आधार बनाना बंद नहीं करेंगे—तब तक ऐसी त्रासदियाँ रुकने वाली नहीं हैं।

आज़ादी का अर्थ स्वेच्छाचार नहीं, और परंपरा का अर्थ दमन नहीं। दोनों के बीच संतुलन ही सभ्यता का आधार है।

अंततः यही समझना होगा कि कानून और समाज की लड़ाई में जीत किसी की नहीं होती—हार हमेशा एक इंसान और एक परिवार की ही होती है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

आर्य समाज नेता और सांसद प्रकाशवीर शास्त्री : धर्म, राष्ट्र और संस्कृति के तेजस्वी पुरोधा

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प्रकाशवीर शास्त्री भारतीय राजनीति, धर्म और समाज-सुधार की उन दुर्लभ विभूतियों में से थे जिन्होंने अपने व्यक्तित्व, विद्वता और तेजस्वी वाणी के बल पर न केवल आर्य समाज को नई दिशा दी, बल्कि भारतीय संसद में भी भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद की सशक्त आवाज बनकर उभरे। वे एक ऐसे नेता थे जिनका संपूर्ण जीवन वेद-मार्ग, राष्ट्र-सेवा और सामाजिक जागरण के लिए समर्पित रहा। विद्वान, संत, विचारक और कर्मयोगी — इन सभी विशेषणों को वे सही अर्थों में सार्थक करते थे।

प्रकाशवीर शास्त्री का जन्म 30 दिसंबर 1924 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के मवाना क्षेत्र के टिटोली गांव में हुआ। उनका मूल नाम प्रकाश चंद्र था। बचपन से ही उनमें अध्यात्म, अध्ययन और वाक्चातुर्य की अद्भुत प्रवृत्ति दिखाई देती थी। घर का वातावरण धार्मिक था और परिवार का झुकाव वैदिक परंपरा की ओर था। उन्हें संस्कृत और वेदों का अध्ययन कराने हेतु गुरुकुल भेजा गया, जहाँ उनकी प्रतिभा तेज़ी से निखरती चली गई। बाद में उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय और गुरुकुल कांगड़ी से उच्च शिक्षा प्राप्त की और संस्कृत साहित्य में “शास्त्री” की उपाधि के साथ वे एक सिद्धहस्त विद्वान के रूप में सामने आए।

आर्य समाज की सुधारवादी, तार्किक और वैदिक विचारधारा ने प्रकाशवीर शास्त्री को गहराई से प्रभावित किया। वे केवल अनुयायी नहीं रहे, बल्कि संगठन के अग्रणी चिंतक और प्रवक्ता बने।
उनकी प्रवचन शैली अत्यंत ओजस्वी थी। वेद, उपनिषद, संस्कृत साहित्य और तर्क—इन सभी विषयों पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि वे पूरे देश में आर्य समाज के सबसे प्रभावशाली वक्ताओं में गिने जाने लगे।

आर्य समाज के मंचों से उन्होंने—अस्पृश्यता के उन्मूलन,समानता, शिक्षा के प्रसार, नशाबंदी,स्वदेशी,और वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना जैसे मुद्दों पर प्रभावी अभियान चलाए। उनकी वाणी में सत्य और तर्क की ताकत थी, इसलिए वे आम लोगों से लेकर विद्वानों तक सब पर गहरा प्रभाव डालते थे।


सामाजिक सुधारों के योद्धा

प्रकाशवीर शास्त्री ने अपना अधिकांश जीवन समाज में व्याप्त कुरीतियों को चुनौती देने में लगाया। उन्होंने जाति-विभेद, अंधविश्वास, बाल-विवाह, पाखंड और वैदिक मार्ग से हटकर चली आ रही विकृतियों के खिलाफ लगातार आवाज उठाई।

उनका मानना था कि भारत की असली शक्ति उसकी संस्कृति है, और यह शक्ति तभी प्रकट होगी जब समाज शिक्षित, संगठित और नैतिक मूल्यों से संपन्न बनेगा।
वे युवाओं को वैदिक ज्ञान, वैज्ञानिक सोच और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा देने के लिए सदैव तत्पर रहते थे।

राजनीतिक जीवन का आरंभ

उनकी लोकप्रियता, विद्वत्ता और समाज में प्रभाव के कारण उन्हें राजनीति में आने का निमंत्रण मिला, परंतु वे सत्ता से ज्यादा सेवा को महत्व देते थे। फिर भी, जब महसूस हुआ कि संसद देश की निर्णायक संस्था है और वहां भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवादी विचारधारा की सशक्त आवाज की आवश्यकता है, तब उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा।वे 1967 में तीसरी लोकसभा के लिए चुने गए। शास्त्री जी आर्य समाज, वेद-धर्म और राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों पर संसद में अत्यंत तार्किक, प्रभावी और निर्भीक ढंग से अपनी बात रखते थे।उनके भाषण न सिर्फ तथ्यपूर्ण होते थे, बल्कि उनमें वैदिक संस्कृति का ओज भी होता था। यही कारण है कि शत्रु-दल के नेता भी उनका सम्मान करते थे।


प्रकाशवीर शास्त्री ने संसद में—धर्मांतरण रोकने, कश्मीर नीति, शिक्षा सुधार, भारतीय भाषाओं के संवर्धन,गौ-रक्षा,और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण जैसे मुद्दों पर अपनी प्रभावी आवाज उठाई।

वे हिंदी के प्रबल समर्थक थे। उनका मत था कि भारत की पहचान उसकी मातृभाषा से है और शासन-प्रशासन में भारतीय भाषाओं का उपयोग बढ़ाना आवश्यक है। संसद में कई बार उन्होंने संस्कृत और हिंदी के पक्ष में ऐतिहासिक भाषण दिए, जिन्हें आज भी विद्वान लोग उदाहरण के रूप में उद्धृत करते हैं।

वेद-धर्म और भारतीयता के प्रचारक

शास्त्री जी ने देश के कोने-कोने में जाकर वैदिक धर्म और संस्कृत साहित्य के पुनर्जागरण का अभियान चलाया। वे कहते थे—
“भारत की आत्मा वेदों में है; यदि हम वेदों से दूर हो गए तो हमारी संस्कृति खो जाएगी।”उनकी प्रवचन शैली लोगों के मन में वैदिक आस्था का संचार करती थी। वे logic-based spirituality के पक्षधर थे—जहां धर्म अंधविश्वास नहीं, बल्कि ज्ञान और अनुशासन का मार्ग है।

लेखन और विचारधारा

प्रकाशवीर शास्त्री केवल वक्ता ही नहीं, उच्चकोटि के लेखक भी थे।
उनकी कई पुस्तकें, निबंध और भाषण आज भी आर्य समाज और वैदिक साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथों में गिनी जाती हैं।

उनका लेखन—प्रखर तर्क,सरल भाषा, और गहरी राष्ट्रीय चेतना से भरा हुआ होता था।

असमय निधन पर शोक

1977 में अचानक उनका निधन हो गया। वे मात्र 52 वर्ष के थे। इतने कम जीवन में उन्होंने जितना काम किया, वह किसी बड़े आंदोलनकारी या आध्यात्मिक नेता के लिए भी प्रेरणा है। उनके जाने से भारतीय राजनीति, आर्य समाज और धर्म-सुधार आंदोलनों को अपूरणीय क्षति पहुँची।

प्रकाशवीर शास्त्री एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके व्यक्तित्व में धर्म, राष्ट्र, विद्या और सेवा चारों एक साथ प्रवाहित होती थीं।
वे आर्य समाज के अग्रणी नेता, तेजस्वी वक्ता, विद्वान संस्कृताचार्य, सामाजिक सुधारक और सशक्त सांसद थे।आज भी भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रवाद और वैदिक परंपराओं की चर्चा जब भी होती है, प्रकाशवीर शास्त्री का नाम सम्मानपूर्वक याद किया जाता है। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि स्पष्ट विचार, उच्च चरित्र और समर्पण से कोई भी व्यक्ति समाज और राष्ट्र के लिए महान कार्य कर सकता है। वे सचमुच भारत के तेजस्वी दीप थे, जिनकी ज्योति आज भी वैदिक सत्य और राष्ट्रभक्ति का प्रकाश फैलाती है।

भारतीय संगीत की मधुर आत्मा, पाश्र्वगायिका गीता दत्त

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भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णयुग में जो आवाज सबसे अलग, सबसे भावपूर्ण और सबसे जीवंत होकर उभरती है, वह गीता दत्त (जन्म 23 नवंबर 1930 – निधन 20 जुलाई 1972) की आवाज है। वह सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी कलाकार थीं जिन्होंने गीतों में भावनाओं का संचार अपने सहज और स्वाभाविक अंदाज़ से किया। बंगाल के फरीदपुर जिले में जन्मी गीता दत्त का बचपन संगीत के वातावरण में बीता। उनके पिता देबेंद्रनारायण राय चौधरी उन्हें उच्च शिक्षा के लिए मुंबई लाए और यहीं से उनके संगीत का सफर शुरू होता है।

मुंबई आने के कुछ समय बाद ही संगीतकार हनुमान प्रसाद ने गीता की मधुर आवाज सुनकर उन्हें 1946 की फिल्म भक्त प्रह्लाद में गाने का अवसर दिया। हालांकि यह शुरुआत छोटी थी, लेकिन असली पहचान मिली एस.डी. बर्मन के संगीत निर्देशन में बनी फिल्म दो भाई (1947) के गीत “मेरा सुंदर सपना बीत गया” से। यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि फिल्म संगीत जगत में गीता दत्त एक रात में मशहूर हो गईं। उस समय किशोर उम्र की इस लड़की की आवाज में जो दर्द, मासूमियत और सहजता थी, वह किसी भी स्थापित गायिका से कम नहीं थी।

गीता दत्त का गायन किसी औपचारिक तकनीकी जटिलता पर निर्भर नहीं था, बल्कि उनका अंदाज़ अत्यंत प्राकृतिक था। उनकी आवाज में रुआब भी था, नज़ाकत भी, दर्द भी और शरारत भी। रोमांटिक गीत हों तो वे पूर्ण कोमलता के साथ दिल में उतर जाते थे। भावपूर्ण गीतों में उनकी आवाज किसी जलधारा-सी बहती थी ।भक्ति गीतों में उनकी आस्था का गहरा रंग सुनाई देता । उनके गाने सुनते समय यह सहज लगता है कि वह गीत को जी रही हैं, गा नहीं रही।

1940 और 50 का दशक गीता दत्त के फिल्मी सफर का स्वर्णकाल माना जाता है। एस.डी. बर्मन, ओ.पी. नैयर, हेमंत कुमार, और मदन मोहन जैसे संगीतकारों ने गीता की आवाज का भरपूर उपयोग किया। 1950 के दशक में उनके कुछ गीत, जिन्होंने हिंदी सिनेमा में नई पहचान दी, ये हैं—

“बाज़ी” का तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले

“आर-पार” का बाबूजी धीरे चलना

“सीआईडी” का जाते हो जाते हो

“प्यासा” का जाने क्या तूने कही

इन गीतों में गीता दत्त की अदायगी ने उन्हें उस दौर की सबसे प्रिय पसारू गायिका बना दिया—यानी वह गायिका जिसकी आवाज हर तरह के भाव और सुरों में समान रूप से फैलती, बहती और असर छोड़ती।

प्यासा और गीता दत्त का अनंत योगदान

1957 में आई गुरु दत्त की फिल्म प्यासा ने गीता दत्त की कला को चरम सीमा पर दिखाया।
“जाने क्या तूने कही”, “आज सजन मोहे अंग लगा लो” जैसे गीत अनंत काल तक संगीत प्रेमियों के दिलों में रहेंगे। गीता दत्त की आवाज में दर्द, तड़प, प्रेम और अधूरी इच्छा—all blended perfectly.

यह वह दौर था जब गीता दत्त निजी जीवन के संघर्षों से भी गुजर रही थीं। पति गुरु दत्त के साथ संबंधों में तनाव और पारिवारिक उलझनों के बावजूद उनकी आवाज में जो भाव की गहराई आई, उसने उनके गायन को और अधिक परिपक्व बनाया।

गीता दत्त की शादी 1953 में फिल्म निर्देशक व अभिनेता गुरु दत्त से हुई थी। शुरुआत में यह रिश्ता बेहद खुशहाल रहा, पर बाद में गुरु दत्त और अभिनेत्री वहीदा रहमान के समीकरणों ने पारिवारिक व संगीत जीवन को प्रभावित किया। मानसिक तनाव, हुनर की बेइज्जती, असुरक्षा और टूटे पारिवारिक वातावरण ने गीता दत्त के मन को लगातार परेशान किया। इन स्थितियों का प्रभाव उनके स्वास्थ्य और पेशे पर भी पड़ा। शराब की ओर झुकाव और लगातार तनाव से उनका जीवन धीरे-धीरे अवसाद और बीमारी की ओर चला गया। संघर्षों के बावजूद उन्होंने कई यादगार गीत दिए 1960 के बाद जब उनका फिल्मी करियर प्रभावित होने लगा, तब भी बंगाली आधुनिक गीतों में उनका योगदान अद्भुत रहा।

“तुमि जे आमार”

“ए बार जोदी जाएगो चुले”
आज भी बंगाल में गीता दत्त को उतनी ही श्रद्धा से सुना जाता है जैसे लता मंगेशकर और हेमंत कुमार को।

असमय मृत्यु, लेकिन अमर आवाज

1972 में मात्र 41 वर्ष की आयु में गीता दत्त इस दुनिया से चल बसीं। लेकिन उनकी आवाज, उनकी मधुरता, और गीतों में उतारा गया उनका भाव—आज भी उतना ही ताज़ा है जितना उनके जीवनकाल में था।

उनके गाए हुए गीत समय की सीमा को पार कर चुके हैं। वह गायिका, जिसने कभी तकनीक पर भरोसा नहीं किया, बल्कि दिल और आत्मा से गाया, उनकी आवाज भारतीय संगीत की आत्मा बन गई।

निष्कर्ष

गीता दत्त सिर्फ एक पसारू गायिका नहीं थीं, बल्कि भारतीय फिल्म संगीत की वह कशिश थीं जो सहजता, आत्मीयता और नारी-संवेदनाओं का अद्भुत मेल थीं। उनके गीत आज भी रेडियो, मंचों और स्मृतियों में उसी मिठास के साथ गूंजते हैं।

उनका जीवन भले संघर्षों से भरा रहा, पर उनकी कला—अमर, अविरल और अनुपम है। गीता दत्त हिंदी सिनेमा का वह अध्याय हैं जिसे पढ़ना मन को भीगे बिना संभव नहीं।

कोई बड़ी बात नही, कल फिर सिंध भारत में आ जाएः राजनाथ सिंह

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि सीमाएं कभी भी बदल सकती हैं और हो सकता है कि सिंध फिर भारत में लौट आए। एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने सिंध के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को याद किया।

 सिंध क्षेत्र 1947 के बंटवारे के बाद पाकिस्तान में चला गया था। वहां रहने वाले ज्यादातर सिंधी हिंदू भारत आ गए। राजनाथ सिंह ने कहा कि एलके आडवाणी ने अपनी किताब में लिखा है कि उनकी पीढ़ी के सिंधी आज भी सिंध के भारत से अलग होने को स्वीकार नहीं कर पाए हैं।

उन्होंने बताया कि भारत के हिंदुओं के लिए सिंधु नदी हमेशा पवित्र रही है और सिंध के कई मुसलमान भी इसकी पवित्रता को आब-ए-जमजम जितना पवित्र मानते थे।

इससे पहले, 22 सितंबर को मोरक्को में भारतीय समुदाय के साथ बातचीत में, राजनाथ सिंह ने पीओके पर भी विश्वास जताया था। उन्होंने कहा था कि भारत को कोई आक्रामक कदम उठाए बिना ही पीओके वापस मिल जाएगा, क्योंकि पीओके के लोग खुद ‘कब्जा करने वालों से आजादी’ की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘पीओके अपने आप हमारा होगा। पीओके में मांगें उठनी शुरू हो गई हैं, आपने नारे सुने होंगे।’

राजनाथ सिंह का यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल ही में भारत ने आतंकवादी ढांचे और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया था। इस दौरान कुछ रक्षा विशेषज्ञों ने सुझाव दिया था कि भारत को पीओके में आगे बढ़कर उस क्षेत्र को सुरक्षित कर लेना चाहिए जो भारत का है।

तृणमूल विधायक हुमायूं कबीर का छह दिसंबर को ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखने का ऐलान

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तृणमूल कांग्रेस विधायक हुमायूं कबीर ने छह दिसंबर को ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखने के ऐलान किया है। इस ऐलान से पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया भूचाल आ गया है। इस एलान को भाजपा ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ करार दे रही है। कांग्रेस और मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने भी इस बयान पर सवाल उठाते हुए राजनीतिक लाभ के लिए सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने का आरोप लगाया है।

तृणमूल कांग्रेस के विधायक हुमायूं कबीर के एक बयान ने घोषणा की है कि वह छह दिसंबर को पश्चिम बंगाल की मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा में एक ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखेंगे। यह तारीख अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस की 33वीं बरसी है।

विधायक कबीर ने ऐलान किया, ‘हम छह दिसंबर को बेलडांगा में बाबरी मस्जिद की नींव रखेंगे। इसे पूरा होने में तीन साल लगेंगे। इस कार्यक्रम में कई मुस्लिम नेता हिस्सा लेंगे।’ यह घोषणा तुरंत राजनीतिक और धार्मिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाओं का कारण बन गई।

जिलानी ने कहा, ‘टीएमसी नेता, खासकर हुमायूं कबीर, नफरत की राजनीति के लिए जाने जाते हैं। वह सिर्फ तुष्टिकरण के लिए राजनीति करते हैं। उन्हें पता है कि लोग उन्हें चुनावों में खारिज कर देंगे, इसलिए वे वोट बैंक बचाने के लिए सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।’

भारतीय जनता पार्टी ने टीएमसी विधायक के इस कदम की कड़ी आलोचना की है। भाजपा प्रवक्ता यासर जिलानी ने कबीर पर चुनावी फायदे के लिए जानबूझकर सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने का आरोप लगाया।

कांग्रेस पार्टी और ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन ने भी इस बयान पर आपत्ति जताई । कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने सवाल उठाया, ‘मस्जिद बनाना ठीक है, लेकिन ख़ास तौर पर ‘बाबरी मस्जिद’ ही क्यों? जो झगड़ा पहले ही सुलझ चुका था, उसे राजनीतिक लाभ के लिए फिर से खोला जा रहा है। हमारा रिश्ता बाबर से नहीं, बल्कि शिवाजी महाराज से है।’

कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने कहा, ‘मस्जिद कोई भी बना सकता है, उसका बाबरी से क्या लेना-देना है? अगर वे मस्जिद बनाना चाहते हैं, तो वे आगे बढ़कर बना सकते हैं।

ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने धार्मिक आधार पर जवाब देते हुए कहा कि एक बार किसी जगह पर मस्जिद बन जाने के बाद, वह हमेशा मस्जिद ही रहती है। भले ही भारत में बाबरी मस्जिद के नाम पर सैकड़ों मस्जिदें बन जाएं, लेकिन अयोध्या में असली बाबरी मस्जिद की अहमियत कभी खत्म नहीं हो सकती।’

साफ़ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं

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व्यंग्य



आलोक पुराणिक
चांदनी चौक जाना जैसे कई पीढ़ियों के इतिहास से गुजरना है। मनु कौशल और आलोक पुराणिक का बस चले, तो सुबह से रात तक सुनाते जायें दास्तान ए चांदनी चौक, गौरी शंकर टू गालिब टू दाग टू बेगम समरु टू इकबाल टू नादिर शाह टू अब्दाली टू जाने क्या क्या। कभी मनु कौशल और आलोक पुराणिक अपने अपने घरों से कई दिनों तक फरार पाये जायें और घरवाले ढूंढने आयें, तो पता लगेगा चांदनी चौक में बेगम समरु की हवेली में कई घंटों से दास्तान ए हवेली सुना रहे होंगे और लोगों की मुहब्बत कि लोग सुन रहे होंगे।

खैर जी चांदनी चौक वाक में दाग साहब के बहुत शेर सुनाये जायेंगे, उनकी बहुत दास्तानें सुनायी जायेंगी, फिर भी कई दास्तानें और कई शेर रह ही जायेंगे। दाग साहब कमाल के शायर थे इस अर्थ में वह एक साथ क्लासिक और सहज शायर थे। गालिब क्लासिक शायर हैं, पर सहज नहीं हैं। गालिब बहुत कांपलेक्स शायर हैं। सहज या कांपलेक्स होना अलग मसला है, हर शायर का रंग और ढंग अलग होता है। एक ही वाक में हम दोनों को याद करते हैं, यूं उस दौर के मोमिन भी कमाल शायर हैं, उन्हे याद करने के लिए कहीं और लेकर जायेंगे वाक ए दिल्ली की हेरिटेज-लिटरेचर वाक।

दाग साहब कमाल थे और उनकी मां भी कमाल थीं। उनकी मां का लिटरेचर कनेक्शन भी काबिले जिक्र है। खैर अभी तो यह सुनिये –

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं –उज्र यानी आपत्ति

बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं –मुलाकात खत्म करने का कारण बताते भी नहीं

क्या कहा फिर तो कहो हम नहीं सुनते तेरी

नहीं सुनते तो हम ऐसों को सुनाते भी नहीं

ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं

साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

देखते ही मुझे महफ़िल में ये इरशाद हुआ

कौन बैठा है उसे लोग उठाते भी नहीं

ज़ीस्त से तंग हो ऐ ‘दाग़’ तो जीते क्यूँ हो

जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं

वाक और भी हैं, बात और भी हैं

शेख हसीना को मृत्युदंड: दक्षिण एशियाई कूटनीति में भारत की नई चुनौती

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बांग्लादेश के न्यायिक संकट और भारत का कूटनीतिक संतुलन

 शेख हसीना को सुनाई गई मृत्युदंड की सजा के बाद दक्षिण एशियाई राजनीति में उभरते नए समीकरणों का विश्लेषण

बांग्लादेश के विशेष न्यायाधिकरण द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सुनाई गई मृत्युदंड की सजा ने दक्षिण एशिया की राजनीति को गहरे तक झकझोर दिया है। यह फैसला न केवल बांग्लादेश की लोकतांत्रिक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि भारत को भी अभूतपूर्व कूटनीतिक दुविधा में डालता है। भारत को हसीना की सुरक्षा, प्रत्यर्पण की मांग, सीमा-सुरक्षा, आर्थिक हितों, और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन के बीच अत्यंत संवेदनशील चालन करना होगा। यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि घरेलू राजनीतिक संकट किस प्रकार पड़ोसी देशों के लिए बहुआयामी रणनीतिक चुनौती बन जाता है।

-डॉ. सत्यवान सौरभ

बांग्लादेश की राजनीति में अभूतपूर्व उथल-पुथल के बीच पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश के न्यायाधिकरण द्वारा मृत्युदंड सुनाया जाना केवल एक अदालती फैसला नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई भू-राजनीतिक परिदृश्य को हिला देने वाला ऐतिहासिक घटना-क्रम है। यह सजा उस समय सुनाई गई जब हसीना पहले से ही भारत में राजनीतिक शरण जैसी स्थिति में रह रही थीं और बांग्लादेश में उनकी सरकार के विरोध में विस्तृत जन-आक्रोश तथा हिंसक आंदोलनों की पृष्ठभूमि मौजूद थी। इस फैसले ने बांग्लादेश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता, न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और शासन की स्थिरता को तीव्र विवाद के केंद्र में ला दिया है। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह स्थिति भारत को किस प्रकार गहरे कूटनीतिक द्वंद्व में धकेल रही है, जहाँ हर कदम क्षेत्रीय समीकरणों और द्विपक्षीय हितों पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

भारत के लिए सबसे पहली चुनौती यह है कि वह इस फैसले पर कैसी आधिकारिक प्रतिक्रिया दर्ज करे। भारत बांग्लादेश का सबसे नजदीकी और सबसे बड़ा साझेदार देश है, जिसके साथ सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा, सीमा-प्रबंधन, कनेक्टिविटी और सांस्कृतिक अन्तःसंबंध जैसे अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्र जुड़े हुए हैं। इसलिए भारत किसी भी प्रकार की खुली निंदा या समर्थन का जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं है। भारत को लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकार, न्यायिक निष्पक्षता और राजनीतिक स्थिरता के सिद्धांतों को भी साथ में लेकर चलना है, जो उसे क्षेत्रीय नेतृत्व के मानक पर कसते हैं। इसके साथ ही बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप-नही-करने की नीति भी भारत के लिए अनिवार्य वास्तविकता है। यही कारण है कि भारत के कूटनीतिक वक्तव्यों का स्वर अत्यंत संयत, सावधान और संतुलित रहा है।

भारत के सामने दूसरी बड़ी चुनौती शेख हसीना की सुरक्षा और उनके प्रत्यर्पण की संभावित मांग है। हसीना लंबे समय से भारत में सुरक्षित हैं और बांग्लादेश की नई सत्ता-व्यवस्था व न्यायाधिकरण द्वारा उनका प्रत्यर्पण माँगा जाना लगभग निश्चित है। लेकिन भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि में राजनीतिक अपराध अपवाद का स्पष्ट उल्लेख है, जो भारत को कानूनी आधार देता है कि वह हसीना को बांग्लादेश भेजने से इनकार कर सके। इसके अतिरिक्त, यदि भारत उन्हें प्रतिपक्षीय हिंसा या पक्षपातपूर्ण मुकदमे का शिकार मानता है, तो प्रत्यर्पण देना भारत के मानवाधिकार और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध होगा। किंतु इससे बांग्लादेश सरकार के साथ तनाव बढ़ सकता है, और भारतीय कूटनीति को इसे अत्यंत सावधानी से संभालने की आवश्यकता है।

भारत को इस स्थिति का तीसरा बड़ा आयाम क्षेत्रीय स्थिरता के संदर्भ में देखना आवश्यक है। भारत और बांग्लादेश लगभग चार हजार किलोमीटर लंबी साझा सीमा साझा करते हैं, जहाँ अशांति फैलने या राजनीतिक हिंसा बढ़ने से सीमा सुरक्षा, सीमा-पार अपराध, अवैध आवागमन, शरणार्थी प्रवाह और कट्टरपंथी समूहों की गतिविधियों में वृद्धि की आशंका है। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मिज़ोरम और असम जैसे राज्यों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। बांग्लादेश की स्थिरता भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी अन्य राष्ट्रीय रणनीति के लिए। इसलिए भारत चाहता है कि बांग्लादेश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया, सामाजिक शांति और प्रभावी शासन जितनी जल्दी बहाल हो सके, उतना बेहतर है।

एक अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि बांग्लादेश की राजनीति में अस्थिरता से भारत-बांग्लादेश आर्थिक संबंधों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। दोनों देशों के बीच व्यापक व्यापारिक विनिमय, औद्योगिक सहयोग, बिजली और गैस पाइपलाइन परियोजनाएँ, बंदरगाह विकास समझौते, सीमा-पार रेल और सड़क कनेक्टिविटी, और कई आर्थिक गलियारे चल रहे हैं। यदि बांग्लादेश में राजनीतिक संकट लंबा खिंचता है, तो इन परियोजनाओं की गति धीमी पड़ सकती है, निवेश वातावरण प्रभावित हो सकता है और व्यापार बाधित हो सकता है। यह विशेष रूप से उस समय और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है जब क्षेत्रीय शक्तियाँ—विशेषतः चीन—बांग्लादेश में सक्रिय रूप से अपनी उपस्थिति बढ़ा रही हों।

चीन-बांग्लादेश संबंध भारत के लिए लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं। चीन ने बांग्लादेश में बड़े-बड़े बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं, समुद्री समझौतों और सामरिक ठिकानों के माध्यम से अपने प्रभाव का विस्तार किया है। यदि राजनीतिक अस्थिरता के दौरान भारत-बांग्लादेश संबंध कमजोर पड़ते हैं, तो यह चीन को एक बड़ा अवसर प्रदान कर सकता है। इसलिए भारत को ऐसी किसी भी स्थिति से बचना होगा जहाँ उसकी तटस्थता या हसीना के प्रति सहानुभूति को नई बांग्लादेशी सत्ता भारत-विरोधी या अपना-नुकसान समझने लगे। भारत के लिए यह पूर्णतः रणनीतिक चुनौती है: उसे लोकतंत्र और न्यायिक निष्पक्षता का समर्थन भी करना है और अपनी क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा व सामरिक हितों की रक्षा भी।

अमेरिका और पाकिस्तान जैसे देशों की नीतियाँ भी इस घटनाक्रम को और जटिल बनाती हैं। अमेरिका ने कई बार बांग्लादेश में चुनावी पारदर्शिता और मानवाधिकार उल्लंघन पर चिंता जताई है, जबकि पाकिस्तान बांग्लादेश के राजनीतिक उद्देश्यों को भारत-विरोधी दिशा में मोड़ने की कोशिश कर सकता है। भारत इस त्रिकोणीय दबाव के बीच संतुलन साधते हुए एक ऐसी रणनीति अपना रहा है जिसमें वह न तो क्षेत्रीय शक्ति-नीतियों में पीछे हटे और न ही किसी प्रत्यक्ष विवाद में उलझे। भारत का यह संतुलन उसके व्यापक दक्षिण एशिया दृष्टिकोण को भी परिभाषित करता है।

लोग-से-लोग संपर्कों और सांस्कृतिक जुड़ावों पर भी इस घटनाक्रम का असर पड़ सकता है। लाखों बांग्लादेशी भारत में कार्यरत हैं, पढ़ते हैं, आते-जाते हैं और सांस्कृतिक विनिमय करते हैं। यदि बांग्लादेश की नई सत्ता भारत के रुख से असंतुष्ट होती है तो इन लोगों पर दबाव बढ़ सकता है, जो दोनों देशों के सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण को अस्थिर कर सकता है। वहीं भारत में रहने वाले बांग्लादेशी शरणार्थियों को भी अधिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

सार रूप में देखा जाए तो शेख हसीना को सुनाई गई मृत्युदंड की सजा बांग्लादेश के भीतर गहरा राजनीतिक-न्यायिक संकट है, लेकिन इसका प्रभाव केवल वहीं सीमित नहीं रहता; यह पूरे दक्षिण एशिया के कूटनीतिक, आर्थिक, सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करता है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि बांग्लादेश में स्थिरता, लोकतंत्र और न्यायपूर्ण शासन की दिशा में सकारात्मक प्रगति हो। भारत की कूटनीति को धैर्य, सूझबूझ और उच्चतर संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ना होगा।

अंततः, यह घटनाक्रम भारत को यह याद दिलाता है कि पड़ोसी देशों की घरेलू राजनीति कभी अकेली नहीं होती; वह सीमाओं से परे प्रभाव डालती है और शक्ति-संतुलन की नई सिरों पर प्रश्न उठाती है। भारत को ऐसे समय में वही भूमिका निभानी है जिसकी उम्मीद एक जिम्मेदार, लोकतांत्रिक और क्षेत्रीय नेतृत्वकर्ता शक्ति से की जाती है—संवेदनशील लेकिन दृढ़, संतुलित लेकिन सिद्धांतनिष्ठ, और तटस्थ लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से समृद्ध।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

भारत सरकार के श्रम सुधारों के नए युग में पत्रकार क्यों छूट गए पीछे ?

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भारत सरकार द्वारा श्रम कानूनों में किए गए व्यापक नीतिगत बदलावों से देश के 40 करोड़ से अधिक श्रमिकों के जीवन में नई उम्मीद जगी है। चार नई श्रम संहिताओं—वेतन, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध एवं व्यावसायिक स्वास्थ्य—को लागू करते हुए केंद्र सरकार ने दावा किया है कि इससे कार्यस्थलों पर पारदर्शिता आएगी, श्रमिकों का सामाजिक सुरक्षा कवच मजबूत होगा, और महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिल सकेगा। एक राष्ट्र—एक वेतन ढांचा, नियुक्ति पत्र की अनिवार्यता, मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा, ओवरटाइम का दोगुना वेतन, एक वर्ष की नौकरी पर ग्रेच्युटी, तथा संविदा और असंगठित श्रमिकों को पीएफ के दायरे में लाने जैसे बदलाव निश्चित रूप से ऐतिहासिक हैं। एक राष्ट्र—एक वेतन ढांचा, नियुक्ति पत्र की अनिवार्यता, मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा, ओवरटाइम का दोगुना वेतन, एक वर्ष की नौकरी पर ग्रेच्युटी, तथा संविदा और असंगठित श्रमिकों को पीएफ के दायरे में लाने जैसे बदलाव निश्चित रूप से ऐतिहासिक हैं।

यह कदम ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य के अनुरूप है और श्रमिकों की दशकों पुरानी समस्याओं को हल करने की दिशा में महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है। नया ढांचा न सिर्फ व्यवस्था को सरल करता है, बल्कि उसे अधिक मानवीय और न्यायसंगत भी बनाता है। सरकार और उद्योग—दोनों के लिए यह एक बड़ी नीतिगत उपलब्धि है।

लेकिन इस उजाले के बीच एक बड़ा वर्ग आज भी अंधेरे में खड़ा है—देश का पत्रकार समुदाय। विडंबना यह है कि जिन पत्रकारों ने श्रम सुधारों के इन दावों और उपलब्धियों को जनता तक पहुँचाया, वही पत्रकार स्वयं इन सुविधाओं और अधिकारों से अक्सर वंचित हैं।
पत्रकारों की स्थिति—श्रमिकों से भी बदतर है। भारत के बड़े मीडिया घरानों में काम करने वाले पत्रकारों की आर्थिक स्थिति दिन-ब-दिन दयनीय होती जा रही है।
समस्या की जड़ें बेहद गहरी हैं: 1. नियुक्ति पत्र तक नहीं दिया जाता जबकि नए श्रम कानूनों में हर श्रमिक को नियुक्ति पत्र देना अनिवार्य है, लेकिन बड़े मीडिया संस्थानों में हजारों पत्रकार बिना नियुक्ति पत्र के काम कर रहे हैं। नियुक्ति पत्र न होने का मतलब— कोई श्रम सुरक्षा नहीं, कोई कानूनी दावा नहीं, कोई न्यूनतम वेतन सुनिश्चित नहीं।
पत्रकार खुद अपना अधिकार मांगने पर भी कमजोर पड़ जाते हैं क्योंकि दस्तावेजी रूप से वे ‘कर्मचारी’ ही नहीं होते। वेतन संहिता पत्रकारों पर लागू नहीं होती। जिन संस्थानों से सरकार की नीतियों की खबरें निकलती हैं, वही संस्थान वेतन संहिता की धज्जियां उड़ाते हैं। तय वेतन नहीं, ओवरटाइम का कोई हिसाब नहीं, समय पर भुगतान की गारंटी नहीं, पत्रकारों के लिए यह स्थिति किसी असंगठित मजदूर से कम नहीं। स्वास्थ्य सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। नए कानूनों में श्रमिकों के लिए मुफ्त वार्षिक स्वास्थ्य जांच, जोखिम क्षेत्रों में सौ प्रतिशत सुरक्षा, और स्वास्थ्य सुविधाओं की अनिवार्यता तय की गई है। लेकिन पत्रकार—जो कई बार खतरनाक परिस्थितियों में काम करते हैं—स्वास्थ्य बीमा तक से वंचित रहते हैं।
पत्रकारों को ‘एजेंसी’ मान लेने का नया खेल। कई बड़े मीडिया हाउस अब पत्रकारों को फुल-टाइम कर्मचारी नहीं, बल्कि ‘कॉन्ट्रैक्ट एजेंसी’ या ‘फ्रीलांसर’ के रूप में दर्ज कर रहे हैं। जिसका नतीजा यह होता है कि न पीएफ, न ईएसआई, न छुट्टियों का अधिकार, न ग्रेच्युटी, न नौकरी की सुरक्षा। यह व्यवस्था श्रम कानूनों से बचने का आधुनिक तरीका है।
श्रम सुधार—पत्रकारों के लिए क्यों साबित हो रहे हैं खोखले?
सरकार दावा कर रही है कि चार श्रम संहिताएँ 40 करोड़ से अधिक श्रमिकों को सुरक्षा प्रदान करेंगी। परंतु पत्रकार, जो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की रीढ़ हैं, सुधारों की इस श्रृंखला में शामिल ही नहीं दिखते। जब श्रमिकों को—समान वेतन, स्वास्थ्य सुरक्षा, रात्रि पाली में महिला श्रमिकों की स्वतंत्रता, भेदभाव पर रोक, ओवरटाइम का दोगुना वेतन, नौकरी के पहले साल में ही ग्रेच्युटी —जैसे अधिकार मिल रहे हैं, तब पत्रकार समुदाय आज भी बुनियादी रोजगार सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। क्या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ असंगठित मजदूरों से भी कमजोर हो चुका है?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि:
पत्रकार बिना सुरक्षा के फील्ड में काम कर
ते हैं। हर आर्थिक संकट में मीडिया संस्थान सबसे पहले कर्मचारियों की छंटनी करते हैं। पत्रकार यूनियनें कमजोर हो चुकी हैं। न्याय पाने के रास्ते बंद हैं, क्योंकि औपचारिक रोजगार संबंध ही स्थापित नहीं होता। ऐसे में पत्रकारों की स्थिति एक असंगठित दिहाड़ी मजदूर से भी अधिक असुरक्षित हो जाती है।
यदि सरकार का लक्ष्य वास्तव में देश के
 40 करोड़ श्रमिकों में नई ऊर्जा भरना है, तो मीडिया क्षेत्र को इस दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता। पत्रकार लोकतंत्र का प्रहरी हैं—और प्रहरी का कमजोर होना लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है। सरकार, श्रम मंत्रालय और मीडिया नियामक संस्थानों को इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे:पत्रकारों के लिए विशिष्ट श्रम सुरक्षा प्रावधान। मीडिया हाउसों में नियुक्ति पत्र की अनिवार्यता। पत्रकारों के लिए न्यूनतम वेतन ढांचा। स्वास्थ्य बीमा और सुरक्षा प्रोटोकॉल। छंटनी पर नियंत्रण और पारदर्शिता। जब तक यह न होगा, तब तक श्रम सुधार सिर्फ पोस्टर और प्रेस कॉन्फ्रेंस का हिस्सा बने रहेंगे।

नवीन चौहान , हरिद्वार

बिहार के बाद बंगाल में भी भाजपा ने फूंका चुनावी बिगुल

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बाल मुकुन्द ओझा

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की बंफर जीत से भाजपा उत्साहित है। भाजपा नेताओं ने ‘बिहार के बाद अब बंगाल की बारी’ का नारा दिया है। बंगाल के किले को भेदने के लिए भाजपा ने मजबूत रणनीति बनाकर उसपर तेजी से अमल शुरू कर दिया है। पार्टी ने बंगाल में चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव, त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देव और आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय को सौंपी है। वहीं पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल पिछले तीन वर्षों से राज्य में पार्टी संगठन को मजबूत करने में लगे हैं। साथ ही बंगाल को पाँच बड़े जोन में विभाजित करते हुए छह राज्यों के संगठन मंत्रियों और छह वरिष्ठ नेताओं की तैनाती कर दी है। ये सभी नेता आगामी पाँच महीनों तक बंगाल में ही डेरा डालकर चुनावी मशीनरी को मजबूत करेंगे। बिहार की जीत के बाद पार्टी मुख्यालय पर कार्यकर्ताओं को अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि गंगाजी बिहार से होकर बंगाल तक जाती है। बंगाल में जीत भाजपा का एक बड़ा सपना है। फिलहाल बंगाल में भी वोटर लिस्ट सुधार कार्यक्रम चल रहा है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और उसकी मुखिया ममता बनर्जी वोटर सुधर का विरोध कर रही है। बंगाल में अगले छह माह में चुनाव होने है जिसके लिए सभी सियासी पार्टियों ने अपनी कमर कास ली है।

पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के सियासी नगाड़े बजने शरू हो गए है। विधान सभा चुनावों की सरगर्मियां अभी से तेज़ हो गई है। यह चुनाव भाजपा के लिए करो या मरो साबित होंगे, इसमें कोई  संशय नहीं है। चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं वैसे वैसे भाजपा और टीएमसी के बीच सियासी टकराव बढ़ता ही जा रहा हैं। भाजपा ने  चुनाव की सियासी जंग फतह करने के लिए अपना एजेंडा सेट कर लिया है तो टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी अपनी सत्ता को बचाए रखनी की कवायद में है। देश की सत्ता पर भाजपा तीसरी बार काबिज है, लेकिन बंगाल में अभी तक कमल नहीं खिल सका है। नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को बंगाल में उम्मीद की किरण दिखाई दी है, जिसके चलते 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी के सियासी दुर्ग में भाजपा अपनी सियासी बेस को बनाने की एक्सरसाइज शुरू कर दी है। बंगाल में एनडीए का मतलब भाजपा और इंडिया गठबंधन का अर्थ टीएमसी है। बंगाल में लोकसभा और विधान सभा में कांग्रेस और कम्युनिष्टों का सूपड़ा साफ़ हो चुका है। ममता इंडिया में जरूर है मगर बंगाल के चुनाव में किसी भी सहयोगी पार्टी को पास फटकने नहीं दे रही है। एनडीए में भाजपा को छोड़कर किसी सहयोगी दल का अस्तित्व नहीं है। ऐसे में भाजपा और टीएमसी में सीधा मुकाबला होगा। ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है तो भाजपा ममता की चालों को धराशाही करने के लिए कमर कस ली है। बंगाल का चुनाव बेहद दिलचस्प और धूम धड़ाके वाला होगा और पूरे देश की निगाह इस पर टिकी होंगी। 

बंगाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष  कराना चुनाव आयोग के सामने बड़ी चुनौती है। यहाँ रक्तरंजित चुनाव से इंकार नहीं किया जा सकता। प्रमुख दलों ने अभी से बड़ी बड़ी रैलियों का आगाज कर  प्रचार शरू कर दिया है। पार्टियों में रोज ही मारकाट होती है। एक दूसरे पर हमले हो रहे है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी ने बीजेपी के हिंदुत्व पॉलिटिक्स के सामने मां, माटी और मानुष के भरोसे सियासी जंग फतह करने में कामयाब रहीं। बीजेपी 2026 के चुनाव में जिस तरह हिंदुत्व के मुद्दे को धार देने में जुटी है, उसके चलते माना जा रहा है कि ममता बनर्जी फिर से बंगाल अस्मिता वाले हथियार का इस्तेमाल कर सकती हैं।

ममता बनर्जी ने पिछले चुनाव को ‘बंगाली बनाम बाहरी’ की लड़ाई का सियासी रंग दिया थ। ममता बनर्जी ने खुद को बंगाली और बीजेपी नेताओं को बाहरी कहकर बंगाल की जनता को आगाह करने की कोशिश करती नजर आईं थी। ममता ने कहा कि बंगाल गुजरात या यूपी नहीं है। बंगाल, बंगाल है। कुछ बाहरी गुंडे यहां आ रहे हैं। टीएमसी फिर कह रही है कि 2026 विधानसभा चुनाव के दौरान विकास के अलावा बंगाली अस्मिता हमारा मुख्य चुनावी मुद्दा होगा। बंगाली अस्मिता केवल बंगालियों के बारे में नहीं है इसमें सभी भूमि पुत्रों के लिए अपील है। ऐसे में साफ है कि बीजेपी के हिंदुत्व को काउंटर करने के लिए ममता बनर्जी बंगाल अस्मिता के मुद्दे को फिर से उठा सकती हैं।

बाल मुकुन्द ओझा

  वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी  32, मॉडल टाउन

मालवीय नगर, जयपुर

व्यंग्यः जब कुकर में खीर बनी

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अस्सी का दशक था। बाजार में सीटी बजाने वाला प्राणी आया। इसको नाम मिला कुकर। मोहल्ले में खबर हो गई… कुकर आ रहा है। पड़ोस की बहन बोली.. “बहन जी! क्या मंगवा रही हो? सुना है, आपके यहां कुकर आ रहा है?”

-जी बहन। लल्ला ला रहा है? सुना है, सब जल्दी पका देता है?

शुभ घड़ी आ गई। मुहूर्त बताने वाले तब पंडित नहीं थे। महिलाएं खुद बता देती थीं..कब क्या करना है। लल्ला बाजार गए। कुकर लाए। कुकर का ऐसे स्वागत हुआ जैसे कोई बच्चा आया हो। जिसको पता चला, वही देखने आने लगा। मिठाई मांगने लगा।

थोड़ी देर में साइकिल से कंपनी का बंदा आया। उसने समझाया। कितनी सीटी पर क्या पकेगा।

यह इसलिए जरूरी था ताकि आप सीटी न मारते रहो। चाय पीकर बंदा गया। अब कुकर की बारी थी।

पहली बार आया है। कुछ मीठा होना चाहिए। देखा। जीजी चावल बीन रहीं थी। कुकर के अति-शोभनीय देह पुंज पर संस्कारों की मुट्ठी पड़ी। सवा मुट्ठी। यह कम रही। देह पुंज में बिखर गई। तभी पड़ोस की ताई बोली..सवा पांच या ग्यारह मुट्ठी डाल दो। यह भी शुभ होता है।

जीजी ने ग्यारह डाल दी। कुकर की देह फूल गई। चावल यानि अक्षत निकाले गए। ताई जी! दूध कितना डालूं? एक टेक्नीशियन की भांति ताई जी बोलीं.. जितने मुट्ठी चावल, उससे दोगुना दूध?

और चीनी?

वो भी इतनी।

तब अंगीठी थी। गैस आ गई थी। लेकिन लल्ला लाया नहीं। उसने सोचा, पहले कुकर ले लूं। फिर गैस आ जाएगी।

सब कुछ कुकर के निर्मल कंचन काया में समा चुका था। चावल, चीनी और दूध। अब शुभ घड़ी का इंतजार था। मन मंदिर की घंटियां बजने लगीं ( जैसे आज जयमाला पर बजती हैं)।

“ठहरो! बहन ठहरो! तुमने सतिया तो बनाया नहीं?” कुकर पर सतिया बना। उमंग और तरंग के बीच ढक्कन लगा। खीर चढ़ गई।

“ताई जी! कितनी सीटी लगेंगी?”

-तीन तो लगेंगीं। चावल देर से पकते हैं।

अंगीठी की आग नर्म नर्म देह सुख ले रही थी। घर पर उत्सव का माहौल था। सब खीर खाना चाह रहे थे। तभी एक सीटी बजी। सब ताली बजाने लगे। खीर कुकर का तन फाड़कर बाहर निकलने लगी। फिर दूसरी सीटी बजी। वही नजारा। तीसरी सीटी में कुकर से धुआं उठने लगा?

कुकर से धुआं उठेगा। यह किसी ने नहीं बताया था। चतुर जीजी ने कुकर को अंगीठी से उतारा। आपदा में अवसर तलाशा। पानी डाला। कुकर की आग उगलती देह शांत पड़ी।

“लगता है, बहन खीर पक गई?” पड़ोस की बहन बोली।

जीजी ने ढक्कन खोला। अरे यह क्या? न दूध, न चीनी न चावल? कुकर खीर पी चुकी थी। कुछ जले भुने चावल बता रहे थे..हां हां यहां खीर पकी थी।

दुख में कोई साथ नहीं देता। खीर बिखरते ही पड़ोसी बारी-बारी अपने घर चले गए। लल्ला भागा भागा दुकान पर गया..”यह कैसा कुकर दिया है? उसमें खीर तो बनी नहीं?”

बाबू जी! खीर इसमें नहीं बनती। बनानी थी तो एक सीटी मारते। ( यानी उसको भी नहीं पता था। वह ड्रा मैच खेल रहा था)।

खीर तो बिखर गई। लेकिन कुकर का महत्व समझ में आया। जीवन कुकर की तरह है। इसमें समय के हिसाब से सीटी देनी पड़ती है। हर चीज कुकर में पकने के लिए नहीं होती। तब कुकर फटते थे। स्टोव फटते थे। बहुएं जलती थीं। (जलाई जाती थीं)।

आज वही कुकर है। वहीं चावल। वही दूध। सब खीर खाते हैं। कुकर कसमसाता रहता है। उसकी सीटी बज गई। अब न वो रोता है। न फटता है। वक्त ने सीटी बजाना सिखा दिया।

नारी तकनीकी शास्त्र का पहला अध्याय समाप्त हुआ। बोलो, सत्यनारायण भगवान की जय।

सूर्यकांत