पश्चिमी देशों की तरह हमारे मुल्क में भी जंक और फास्ट फूड का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इसे हासिल करने में जितने लाभ और सुविधाएँ तलाश की जा रही हैं, उससे ज्यादा इसके नुकसान सामने आ रहे हैं। इंसान रोजाना जो कुछ खाता पीता है, उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। स्वस्थ रहने के लिए अच्छा पोषण और नियमित व्यायाम जरूरी है। इसके विपरीत फास्ट फूड और जंक फूड का ज्यादा सेवन स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। खास ही नही, अब आम घरों में भी खाना बनाने का रिवाज कम होता जा रहा है। फास्ट फूड ऐसा भोजन है जो जल्दी तैयार हो जाता है और होटलों व रेस्टोरेंटों में कम समय में आसानी से सुलभ हो जाता है। मॉल, कंफेक्शनरी व किराना स्टोरों में मिलने वाले फास्ट फूड और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की बिक्री में दिन प्रतिदिन हो रही वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि मौजूदा नस्ल की घरों में भोजन बनाने में दिलचस्पी नहीं है। हालाँकि घर पर तैयार भोजन की अपेक्षा इन खानों में पौष्टिकता कम होती है और ये महंगे भी होते हैं, फिर भी लोगों का रुझान इसी ओर बढ़ रहा है। युवा पीढ़ी तो फास्ट फूड की दीवानी है ही, बुजुर्गों व बच्चों में भी घर बैठे ऑनलाइन खाना मंगवाना आधुनिकता की शान और सामाजिक प्रगति की पहचान समझा जा रहा है। अधिकतर लोग फास्ट फूड के नुकसान और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले इसके नकारात्मक प्रभावों से अनजान हैं। दफ्तर से वापसी या देर से घर लौटने, थकान होने या खाना बनाने को मन नहीं करने का बहाना बनाकर फास्ट फूड मंगाने को आसान विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। जंक फूड का ज्यादा इस्तेमाल जहां स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, वहीं बीमारियों का सबब भी बन रहा है। दरअसल, फास्ट फूड कम पोषक तत्व वाला वह भोजन है, जो जल्दी तैयार हो जाता है, जबकि जंक फूड खासतौर पर अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ होते हैं। इनमें चीनी, वसा, सोडियम और कृत्रिम तत्व अधिक होते हैं। इस बिना पर हर जंक फूड फास्ट फूड हो सकता है, लेकिन हर फास्ट फूड जंक फूड नहीं होता। बर्गर जैसे फास्ट फूड की शुरुआत 18वीं शताब्दी में अमेरिका से हुई थी। आरंभ में लोग खराब स्वाद के कारण इसे पसंद नहीं करते थे, लेकिन समय बीतने के साथ लोगों का ध्यान बर्गर और इसके विभिन्न रूपों की ओर जाने लगा। आज दुनिया भर में मैक्डॉनल्ड्स, स्टारबक्स, मिक्स आइसक्रीम एंड टी, सबवे, केएफसी और डोमिनोज पिज्जा, बर्गर किंग, लकन कॉफी, पिज्जा हट, क्रिप्सी क्रीमे, जॉली बी और डंकिन डोनट्स डंकिन आदि ब्रांड के फास्ट फूड उपलब्ध हैं। फास्ट फूड में अमेरिका का वार्षिक राजस्व करीब 7,01,598 करोड़ रुपये, ब्रिटेन का 1,44,257 करोड़, फ्रांस का 1,78,888 करोड़, मेक्सिको का 1,76,647 करोड़, दक्षिण कोरिया का 1,10,373 करोड़, चीन का 1,47,440 करोड़ और इटली का 1,62,685 करोड़ रुपये है। स्वीडन, ऑस्ट्रिया, ग्रीस और नॉर्वे भी फास्ट फूड के बड़े बाजार हैं। भारत में यह कारोबार 7,14,584 करोड़ रुपये से अधिक का है। द लांसेट की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2006 में हमारे देश में ऐसे खाद्य पदार्थों की बिक्री 0.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर (80,66,17,35,000 रुपये) थी, जो 2019 में बढ़कर 38 बिलियन अमेरिकी डॉलर (34,05,71,77,00,000 रुपये) हो गई है। फास्ट फूड के सेवन से पुरुषों और महिलाओं में मोटापा दोगुना हो गया है। पुरुषों में मोटापे की दर जहां 12 से 23 प्रतिशत हो गई, वहीं महिलाओं में यह दर 15 से 24 प्रतिशत तक बढ़ गई। ऐसे खाद्य एवं पेय पदार्थों में विटामिन, खनिज और फाइबर जैसे पोषक तत्वों की कमी होती है। फास्ट फूड को पुरुषों और महिलाओं में टाइप-2 डॉयबिटीज, रक्तचाप में वृद्धि, अवसाद, पाचन की खराबी, गुर्दों में तकलीफ, स्मृति हानि, हृदय रोग, यकृत की क्षति, कैंसर, चर्म रोग, प्रतिरोधक क्षमता में कमी और समय पूर्व मौत का कारण माना जा रहा है। वास्तविक पौष्टिकता से दूर इन खाद्य पदार्थों में चीनी, नमक, खराब तेल और बनावटी रंग आदि शामिल होते हैं। ऐसा करने से फास्ट फूड का स्वाद इतना बढ़ जाता है कि लोग इन्हें बार बार खाना पसंद करते हैं। हालांकि, ऐसा भोजन हमारी सेहत के लिए हानिकारक है, लेकिन बाजार में उपलब्ध बर्गर, पिज्जा, फ्रेंच फ्राइज, चाउमीन, मोमोज, सैंडविच, फ्राइड चिकन, हॉट डॉग, टिकोज, स्प्रिंग रोल, डोनट, चिप्स, कुरकुरे, नूडल्स, नगेट्स, टॉफी, चॉकलेट, आइस्क्रीम, कुकीज, पेस्ट्रीज, नमकीन, स्नैक्स, पास्ता समोसा, कबाब, पकौड़ा, ढोकला, बड़ा पाव, मंचूरियन, मैगी, बिरयानी, नाचूस, मिठाई, कोल्डड्रिंक्स, ब्रेकफास्ट और खाद्य उत्पादों का सेवन पुरुषों और महिलाओं के साथ बच्चे भी कर रहे हैं। विशेषज्ञों ने पैकेटबंद फूड का सेवन कम करने के लिए सख्त कदम उठाने की आवश्यकता बताई है। हालांकि जंक फूड का कभी कभार सेवन नुकसान नहीं देता, लेकिन नियमित सेवन के कारण मोटापे और स्थाई बीमारियों से बचना मुश्किल है। सोडियम की उच्च मात्रा सिरदर्द और माइग्रेन का कारण बनती है। अधिक कार्बोहाइड्रेट से मुंहासे और चीनी से दांतों में कैविटीज बनती हैं। तले खाद्य पदार्थों से रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ता है। स्वस्थ आहार के तहत विटामिन, खनिज, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट के अलावा, फल, सब्जियाँ, साबुत अनाज, प्रोटीन और मेवे फायदेमंद हैं। टमाटर, आलू और ब्रोकली सहित विभिन्न प्रकार की लाल, हरी और पत्तेदार सब्जियाँ भी लाभदायक हैं। वसा रहित या एक प्रतिशत वसायुक्त दूध में कैल्शियम और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा ज्यादा वसा वाले दूध से कम नहीं होती, इसलिए, बिना चिकनाई के दूध का उपयोग बेहतर है। प्रोटीन, खनिज, ओमेगा-3 और फैटी एसिड अधिक होने के कारण मछली को सप्ताह में लेना अच्छा है। पोषक तत्व प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं। चूंकि जंक और फास्ट फूड में प्राय आवश्यक पोषक तत्वों की कमी और कैलोरी अधिक होती हैं, इसलिए वजन और मोटापा बढ़ता है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा होती हैं। अतिरिक्त चीनी और ज्यादा कैलोरीज को नियंत्रित करने के लिए पेय पदार्थों के बजाय पानी पीना बेहतर है। पानी या बिना चीनी वाले पेय लेने से कैलोरीज काफी हद तक कम हो सकती है। स्वाद के लिए नींबू, तरबूज और मौसमी फलों का उपयोग बेहतर होता है। सेहतमंद आहार से ऊर्जा व पोषक तत्वों मिलते हैं, जो शारीरिक विकास में सहायक होने के अलावा हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसे रोगों के जोखिम को कम करने में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। इसलिए फास्ट फूड से परहेज सेहत के लिए अच्छा और दीर्घायु का आसान विकल्प है।
नींद की कमी धीरे-धीरे एक साइलेंट हेल्थ क्राइसिस बन चुकी है। पहले नींद को आराम या आदत माना जाता था, लेकिन अब शोध यह दिखाते हैं कि कम नींद का सीधा असर दिमाग, दिल, इम्यून सिस्टम और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य की उभरती हुई समस्या बताया है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार लगभग हर तीन में से एक वयस्क रोजाना पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहा। भारत में किए गए एक बड़े सर्वे में पाया गया कि युवा वर्ग में यह समस्या सबसे अधिक बढ़ी है, जहां रात देर तक फोन का इस्तेमाल, ओवरवर्क, तनाव और अनियमित दिनचर्या नींद का सबसे बड़ा दुश्मन बन चुके हैं। आजकल की खराब लाइफ स्टाइल, वर्क फ्रॉम होम, स्क्रीन से चिपटे रहने और काम के बढ़ते दबाव के कारण लोगों की दिनचर्या पूरी तरह बदल चुकी है। बदलते वर्किंग स्टाइल के कारण लोगों के पास पर्याप्त नींद लेने का समय भी नहीं बचता है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की रिसर्च बताती है कि जो लोग 5 घंटे से कम सोते हैं, उनमें हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा 30–40 फीसदी बढ़ जाता है। नींद की कमी शरीर में सूजन बढ़ा देती है, जिससे ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल गड़बड़ा सकते हैं। कई डॉक्टर बताते हैं कि नींद की कमी मोटापे को भी बढ़ाती है, क्योंकि देर से सोने पर भूख बढ़ाने वाला हार्मोन “घ्रेलिन” बढ़ जाता है और शरीर को गलती से कैलोरी की जरूरत महसूस होने लगती है। यही कारण है कि कम सोने वाले लोग रात में जंक फूड ज्यादा खाते हैं।
भारत में नींद की कमी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। एक ऑनलाइन वैश्विक सर्वे की माने तो देश पर्याप्त नींद नहीं लेने के कारण स्वास्थ्य सम्बन्धी विकारों से जूझ रहा है। देश के लगभग 60 प्रतिशत लोग छह घंटे की नींद नहीं लेने के कारण विभिन्न बीमारियों की चपेट में आ रहे है। इनमें बड़ी संख्या में युवा भी शामिल है। सर्वे में भारत के 348 जिलों के 43 हज़ार लोगों को शामिल किया गया जिनमें 61 प्रतिशत पुरुष और 39 प्रतिशत महिलाएं थी। नींद की कमी का सामना कर रहे लोगों में 72 प्रतिशत वाशरूम का बार बार उपयोग करने सहित ख़राब लाइफ स्टाइल, स्क्रीन देखने, शराब सेवन और रात्रि में देर तक काम करने आदि बड़े कारण बताये गए है। सर्वे में बताया गया है पर्याप्त नींद नहीं लेने के कारण आँखों और ह्रदय से जुडी बीमारियां आम बात है। डायबिटीज और मोटापा की चपेट में भी लोग आ रहे है। सड़क दुर्घटनाओं को भी नींद का एक कारण बताया गया है।
नींद का असर न केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। जहाँ तक युवा भारत की बात है, आजकल युवाओं में तनाव की समस्या को लेकर देशवासी बेहद चिंतित है। तनाव की वजह से कम उम्र में ही युवा डिप्रेशन के शिकार होने लगे हैं। खासतौर से काम करने वाले युवा यानि को नौकरी कर रहे हैं उनके अंदर ठहराव, लगन और काम के लिए पैशन बहुत कम है। जरा-जरा सी बातों पर स्ट्रेस लेने लगते हैं। हाल की में हुई एक स्टडी में भी ऐसे ही आंकड़े सामने आए हैं। जिसमें 25 साल के युवा कर्मचारियों में से 90 प्रतिशत का मन और दिमाग बेचैन पाया गया है। जिसकी वजह से कई बार अपने आप को हानि पहुंचाने तक के ख्याल इनके मन में आने लगते हैं। तनाव और डिप्रेशन से बचना है तो सबसे पहले हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं। नींद की कमी के चलते कर्मचारियों की कार्य क्षमता भी प्रभावित हो रही है। रिसर्च से पता चला है कि नींद की कमी वाले कर्मचारी गलतियां करने की ज्यादा संभावना रखते हैं, उनकी एकाग्रता घट जाती है और उनकी समस्या सुलझाने की क्षमता भी कम हो जाती है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से बचने के लिए अच्छी नींद लेना बहुत जरूरी है। रात में 6-8 घंटे की नींद से कई विकारों को दूर किया जा सकता है।
आज की भागदौड़ भरी लाइफ स्टाइल में काम का दबाव और समय का प्रबंधन हम पर इस कदर हावी हो चुके हैं कि हमारा मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ा रहा है। सोशल मीडिया के बारे में यह कहा जाता है विशेषज्ञों ने अच्छी नींद के लिए कैफीन का कम सेवन करने, सोने का निश्चित समय तय करने, सोने से पहले मोबाइल, लैपटॉप और टीवी जैसी स्क्रीन का इस्तेमाल न करने की सलाह दी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है एक्सपर्ट्स का कहना है कि अपनी दिनचर्या में छोटे-छोटे बदलावों को अपनाकर लोग अपनी नींद की क्वालिटी सुधार सकते हैं और इससे उनकी तबीयत और उत्पादकता बेहतर हो सकती है।
जब प्रशासन बदलता है दिशा—क्यों भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के बच्चे उसी राह पर कम चलते हैं?
प्रतिष्ठा की चमक के पीछे छिपी कठोर सच्चाइयों और नई पीढ़ी की बदलती आकांक्षाओं का विस्तृत विश्लेषण
भारतीय प्रशासनिक सेवा को समाज में सम्मान और शक्ति का प्रतीक माना जाता है, परंतु इसके भीतर छिपी कठोर वास्तविकताएँ अक्सर परिवारों के जीवन को गहराई से प्रभावित करती हैं। तेज़ स्थानांतरण, राजनीतिक दबाव, सीमित निजी समय और निरंतर सार्वजनिक अपेक्षाएँ नई पीढ़ी को इस सेवा से दूर करती हैं। साथ ही, बच्चों को उपलब्ध व्यापक शिक्षा और वैश्विक अवसर उन्हें विविध करियर चुनने की स्वतंत्रता देते हैं। यही कारण है कि आज भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के बच्चे उसी राह पर कम चलते हैं और जीवन–संतुलन तथा रचनात्मक स्वतंत्रता आधारित नए करियर को प्राथमिकता देते हैं।
— डॉ प्रियंका सौरभ
भारत में प्रशासनिक सेवा को लंबे समय से शक्ति, प्रतिष्ठा और राष्ट्र-निर्माण के सर्वोच्च प्रतीकों में गिना जाता रहा है। समाज में आज भी “भारतीय प्रशासनिक सेवा” एक ऐसा नाम है जो सम्मान, अधिकार और सफलता की सम्मिलित छवि बनाता है। किंतु विडंबना यह है कि जिन परिवारों ने इस प्रतिष्ठा को बहुत निकट से देखा है, वही परिवार—विशेषकर भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के बच्चे—बहुत कम संख्या में उसी पेशे की राह अपनाते हैं। यह प्रश्न केवल सामाजिक जिज्ञासा भर नहीं है; यह प्रशासनिक जीवन की कठोर सच्चाइयों, बदलते समय और नई पीढ़ी की मनोवृत्ति का गहरा संकेत है।
सबसे पहले, भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के बच्चे उस सेवा की वास्तविक कठिनता को प्रतिदिन देखते हैं जिसे बाहरी दुनिया केवल प्रतिष्ठा के आवरण में देखती है। अनिश्चित और तेज़ स्थानांतरण, राजनीतिक दबाव, जनता की अपेक्षाओं का अंतहीन बोझ, अवकाश का अभाव और निरंतर संघर्ष—इन सभी का प्रभाव परिवार के जीवन पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। नई पीढ़ी जिसके लिए मानसिक स्वतंत्रता और कार्य–जीवन संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण है, वह ऐसी सेवा की ओर आकृष्ट नहीं होती जहाँ व्यक्तिगत समय और निजी जीवन लगभग समाप्त हो जाता है।
दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है—आर्थिक सुरक्षा। भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी अपने बच्चों को उच्च स्तरीय शिक्षा, उत्कृष्ट वातावरण और व्यापक अवसर प्रदान करने में सक्षम होते हैं। ऐसे में बच्चों के लिए सरकारी सेवा प्राप्त करने का संघर्ष किसी अनिवार्यता के स्थान पर एक अतिरिक्त बोझ जैसा प्रतीत होने लगता है। संघ लोक सेवा आयोग की कठिन, अनिश्चित और समयसाध्य परीक्षा उनके लिए आवश्यक विकल्प नहीं, बल्कि एक चुनौतीपूर्ण यात्रा जैसी लगती है। इसलिए उनकी राहें निजी क्षेत्र, तकनीकी क्षेत्र, अनुसंधान, विधि-विज्ञान या उद्यमिता की ओर अधिक मुड़ जाती हैं—जहाँ आय अधिक है, स्वतंत्रता अधिक है और स्थानांतरण या राजनीतिक दबाव जैसी चुनौतियाँ कम हैं।
तीसरी सच्चाई यह है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के भीतर की जो प्रशासनिक सीमाएँ हैं—फाइलों का व्यवहार, विवश निर्णय, भ्रष्ट तंत्र का दबाव—वे सब इन परिवारों के बच्चे प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करते हैं। जब वे देखते हैं कि उनके माता-पिता कई बार अपनी इच्छा के अनुसार निर्णय नहीं ले पाते, तो यह उनके भीतर प्रशासनिक सेवा की “शक्ति” को कम प्रभावी रूप में प्रस्तुत करता है। समाज इसे चाहे जितना सम्मानजनक माने, परिवार के भीतर इसका वास्तविक चित्र कई बार निराशाजनक होता है।
चौथा पहलू है—नई पीढ़ी की मूल्य-दृष्टि। आज की युवा पीढ़ी सरकारी पदों की स्थिरता से अधिक वैश्विक अवसरों, रचनात्मक स्वतंत्रता, डिजिटल माध्यमों पर आधारित करियर और नव–उद्यम संस्कृति की ओर आकर्षित है। वे जोखिम उठाने को तैयार हैं, परंतु बंधी-बंधाई व्यवस्था में रहना नहीं चाहते। भारतीय प्रशासनिक सेवा जैसी सेवा जहाँ नियम कठोर हैं, प्रक्रिया विस्तृत है और ऊर्जा का बड़ा भाग व्यवस्था को संचालित रखने में व्यतीत होता है—वहाँ उन्हें अपनी क्षमता का पूर्ण विस्तार नहीं दिखाई देता।
यह भी उल्लेखनीय है कि स्वयं अनेक भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी अपने बच्चों को इस सेवा में आने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते। वर्षों की थकान, संघर्ष और भारी दबाव के बाद वे अपने बच्चों के लिए अधिक संतुलित, स्वतंत्र और अपेक्षाकृत शांत जीवन की कल्पना करते हैं। यह माता-पिता की सहज मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है, और बच्चों के करियर चयन को गहराई से प्रभावित करती है।
यह पूरा परिदृश्य एक व्यापक सामाजिक परिवर्तन की ओर संकेत करता है। वह समय अब समाप्त हो रहा है जब भारतीय प्रशासनिक सेवा को करियर का सबसे उत्कृष्ट विकल्प माना जाता था। आज अनेक प्रतिष्ठित और प्रभावी करियर उपलब्ध हैं जिनमें स्वतंत्रता, रचनात्मकता, सम्मान और आय—सब कुछ प्रचुर मात्रा में है। इस परिवर्तित परिदृश्य ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के आकर्षण को कुछ हद तक कम किया है, विशेष रूप से उन परिवारों में जिन्होंने इसकी चमक के पीछे की कठोर थकान को निकट से महसूस किया है।
फिर भी यह सत्य है कि यह रुझान प्रशासनिक सेवा की महत्ता को कभी समाप्त नहीं करता। भारतीय प्रशासनिक सेवा देश की प्रशासनिक रीढ़ है और इसमें आने वाले युवा राष्ट्र को दिशा देने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अंतर केवल इतना है कि अब इस सेवा की राह वही चुनता है जो इसे मन से अपनाना चाहता है—न कि वह जो सामाजिक दबाव या मजबूरी में प्रवेश करता है।
अंततः, भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के बच्चों का उसी सेवा में न जाना किसी प्रकार की असफलता का संकेत नहीं है, बल्कि बदलते भारत की सूक्ष्म मानसिकता का परिचायक है—एक ऐसा भारत जहाँ विकल्प अधिक हैं, अपेक्षाएँ नवीन हैं, और करियर का अर्थ केवल प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता भी है। यह परिवर्तन सकारात्मक है, क्योंकि यह दिखाता है कि नई पीढ़ी उस संसार का स्वप्न देखती है जहाँ पेशा शक्ति से नहीं, बल्कि संतुलन, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत संतोष से निर्धारित होता है।
तेजी से बदलते समय में संविधान हमें स्थिरता, दिशा और लोकतांत्रिक चेतना प्रदान करता है।
संविधान दिवस केवल एक औपचारिक तिथि नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। यह हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि क्या हम वास्तव में संविधान की भावना के अनुरूप समाज का निर्माण कर रहे हैं। संविधान हमें अधिकार भी देता है और जिम्मेदारी भी। यही दस्तावेज़ हमें स्वतंत्रता, समानता और न्याय की राह दिखाता है। बदलते समय में संविधान भारत की स्थिरता, प्रगतिशीलता और लोकतांत्रिक परंपरा का आधार बना हुआ है।
– डॉ सत्यवान सौरभ
भारत का संविधान केवल कानून का दस्तावेज़ नहीं है; यह वह जीवंत आत्मा है जो इस विविधताओं से भरे राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधती है। जब 26 नवम्बर 1949 को संविधान को स्वीकार किया गया और 26 जनवरी 1950 से यह प्रभावी हुआ, तभी भारत ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त किया। आज संविधान दिवस न सिर्फ एक तिथि का उत्सव है, बल्कि यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र की शक्ति नागरिकों की स्वतंत्रता, समानता और कर्तव्यों में निहित है।
भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत, समावेशी और प्रगतिशील संविधान माना जाता है। इसकी विशेषता यह है कि यह भारत की परंपराओं, विविधताओं और सांस्कृतिक बहुलता को आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ता है। संविधान यह सुनिश्चित करता है कि सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और नागरिक अधिकार किसी वर्ग, जाति या समुदाय पर निर्भर न रहें। यही वजह है कि संविधान केवल शासन का ढाँचा नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन भी है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान की आत्मा को समझाते हुए कहा था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी स्थिर रहेगा, जब सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र भी स्थापित होगा। यह विचार आज के भारत में और भी महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि हमारा देश बड़े सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी बदलावों के दौर से गुजर रहा है।
इक्कीसवीं सदी का भारत डिजिटल क्रांति, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, रोजगार के बदलते स्वरूप, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक तनाव जैसी नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन नई परिस्थितियों को देखते हुए संविधान का महत्व और भी बढ़ गया है, क्योंकि यही वह आधार है जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है और राज्य को जवाबदेह बनाता है।
संविधान की शक्ति उसकी लचीलापन क्षमता में छिपी है। परिस्थितियों के अनुसार संविधान कैसा व्यवहार करेगा, यह उसकी धारा, भावना और न्यायपालिका के निर्णय तय करते हैं। संविधान में अब तक अनेक संशोधन किए जा चुके हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह जड़ दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि समय के साथ स्वयं को बदल लेने वाला जीवंत ग्रंथ है।
लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं, बल्कि नागरिकों की निरंतर सहभागिता, पारदर्शिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संस्थाओं की मजबूती और विविध मतों का सम्मान है। लेकिन आज सोशल मीडिया और त्वरित प्रतिक्रियाओं के युग में संवाद की जगह शोर ने ले ली है। विचारधारात्मक विभाजन बढ़ रहा है और जनमत का स्वरूप तेज़, अस्थिर और कई बार भावनात्मक होता जा रहा है। ऐसे समय में संविधान हमें संयम की शिक्षा देता है और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की राह दिखाता है।
भारतीय न्यायपालिका संविधान की संरक्षिका है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स ने अनेक ऐतिहासिक निर्णयों से नागरिक अधिकारों की रक्षा की है—चाहे वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता हो, निजता का अधिकार हो, समानता का अधिकार हो या पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी व्याख्याएँ। न्यायपालिका ही वह स्तंभ है जो लोकतंत्र में संतुलन बनाए रखने का कार्य करती है और नागरिकों के विश्वास का आधार बनती है।
परंतु आज के समय में संविधान कई नए मोर्चों पर परीक्षा दे रहा है।
तेजी से बढ़ती तकनीक ने निजता और डेटा संरक्षण को बड़ा मुद्दा बना दिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल निगरानी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग से यह सवाल उठता है कि नागरिकों की स्वतंत्रता किस सीमा तक सुरक्षित है। दूसरी ओर, जलवायु परिवर्तन का खतरा इस बात की ओर संकेत करता है कि पर्यावरण अब केवल विकास का विषय नहीं, बल्कि जीवन के अधिकार से जुड़ा मूलभूत प्रश्न बन चुका है।
सामाजिक ध्रुवीकरण भी एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। विचारों की बहुलता भारतीय लोकतंत्र की शक्ति रही है, लेकिन हाल के वर्षों में विचारधारा के आधार पर खेमेबाज़ी बढ़ी है। संवाद कम हुआ है, तर्क कम हुए हैं और आरोप-प्रत्यारोप अधिक हो गए हैं। संविधान ऐसे समय में हमें बंधुत्व की शिक्षा देता है—एक ऐसा भाव जिसमें विचारों का मतभेद तो हो सकता है, लेकिन मन का वैमनस्य नहीं।
राजनीतिक जीवन में मर्यादाओं का क्षरण भी चिंता का विषय है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और शुचिता अनिवार्य है। संविधान इसकी आधारशिला रखता है और सभी संवैधानिक पदधारकों से अपेक्षा करता है कि वे जनहित को निजी स्वार्थ से ऊपर रखें।
नागरिकों के मौलिक कर्तव्य भी लोकतांत्रिक ढाँचे की मजबूती के लिए उतने ही आवश्यक हैं। संविधान नागरिकों को केवल अधिकार नहीं देता; वह उनसे अपेक्षा करता है कि वे संविधान का सम्मान करें, पर्यावरण की रक्षा करें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएँ, राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखें तथा समाज में सद्भाव का वातावरण निर्मित करें।
भारत की युवा पीढ़ी के लिए संविधान अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। यह युवा ऊर्जा अगर संविधानिक मूल्यों से प्रेरित होगी, तो अवसरों का नया युग शुरू हो सकता है। युवाओं को यह समझना होगा कि संविधान केवल कानून की किताब नहीं, बल्कि उनके सपनों को सुरक्षित रखने वाला दस्तावेज़ है।
संविधान दिवस हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछने का अवसर देता है—क्या हम संविधान की भावना के अनुरूप समाज बना रहे हैं? क्या नागरिक अधिकारों की रक्षा हो रही है? क्या हम विविधता को कमजोरियों के रूप में नहीं, बल्कि शक्ति के रूप में देख पा रहे हैं? क्या हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए हम लोकतंत्र की वही मजबूती छोड़ रहे हैं जो हमें विरासत में मिली थी?
भारत का संविधान हमारी लोकतांत्रिक चेतना का केंद्र है। यह अतीत की विरासत भी है और भविष्य की दिशा भी। समय बदलता रहेगा, परिस्थितियाँ बदलती रहेंगी, तकनीक बदलती रहेगी, लेकिन संविधान की प्रासंगिकता कभी कम नहीं होगी। यह हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व किसी एक व्यक्ति या सरकार की देन नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की सामूहिक यात्रा है।
जब तक संविधान की आत्मा जीवित है—भारत विश्व की लोकतांत्रिक धड़कनों का प्रमुख केंद्र बना रहेगा।
– डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट
बात जब परिवारवाद की आती है तो सबसे पहला निशाना गांधी-नेहरू परिवार पर साधा जाता है। उसके बाद मुलायम सिंह यादव व लालू यादव जैसे नेताओं पर परिवारवादी राजनीति करने का आरोप लगाया जाता है। इन लोगों के ‘परिवारवाद ‘ का विरोध करने वाले विशेषकर भारतीय जनता पार्टी के नेता जनता को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि इस परिवार के लोग लोकतंत्र विरोधी हैं और अपने परिवार के लोगों को राजनैतिक विरासत के रूप में जनता पर थोपने की कोशिश करते हैं। जबकि वास्तव में नेहरू घराने से लेकर मुलायम सिंह व यादव,लालू यादव जैसे नेताओं की भारतीय राजनीति में अहम भूमिका रही है। निःसंदेह नेहरू -इंदिरा -राजीव ने देश को विकास व आधुनिकता की राह पर लाने,देश को आत्मनिर्भर बनाने व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को सम्मान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इसी तरह लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव को भी भारतीय राजनीति में मुख्य रूप से “मंडल राजनीति के दो सबसे बड़े चेहरे” और “उत्तर भारत में जातिगत गोलबंदी की राजनीति के जनक” के रूप में याद किया जाता है। इन दोनों ही नेताओं ने 90 के दशक में ओ बी सी विशेषकर यादव- दलित-मुस्लिम गठजोड़ को इतनी शक्ति दी कि उत्तर प्रदेश और बिहार में लंबे समय तक कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा दोनों को सत्ता से बाहर रखा। आज भी इन्हें मंडल क्रांति के नायक, सामाजिक न्याय के प्रतीक तथा भाजपा व कांग्रेस दोनों ही राष्ट्रीय दलों का विकल्प देने की क्षमता रखने वाले नेताओं के रूप में याद किया जाता है।
पूरे देश में नेहरू -इंदिरा परिवार ने और देश के दो सबसे बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश व बिहार में इन यादव घरानों ने धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी राजनीति की जो अमिट छाप छोड़ी है उसी ने भाजपा को लंबे समय तक सत्ता से दूर रखा। अपनी इसी कसक को भाजपा नेता ‘परिवारवाद ‘ के रूप में प्रचारित कर अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। जबकि इन परिवारों की वर्तमान पीढ़ियों में राहुल गांघी ने पहले हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, अमेरिका में पढ़ाई की बाद में रोलिंस कॉलेज, फ्लोरिडा, अमेरिका से स्नातक की डिग्री ली और ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी, ब्रिटेन से 95 में डेवलोपमेन्ट स्टडीज़ में एम फ़िल पूरी की। चार बार सांसद भी चुने जा चुके हैं। इसी तरह अखिलेश यादव ने भी सिविल/एनवायर्नमेंटल इंजीनियर की डिग्री व मास्टर्स डिग्री सिडनी विश्वविद्यालय ऑस्ट्रेलिया से हासिल की है। वे भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री व पांच बार सांसद होने का अनुभव रखते हैं। गोया यह लोग न अशिक्षित हैं न ही अनुभवविहीन न ही नक़ली डिग्री धारी। तेजस्वी यादव अशिक्षित ज़रूर हैं परन्तु उनके पास राजनीति का एक दशक से भी लंबे समय का अनुभव होने के साथ साथ पांच बार विधायक दो बार उपमुख्यमंत्री व नेता विपक्ष के पद पर रहने का अनुभव व लालू के कारण ही सही परन्तु भारी लोकप्रियता भी है।
सवाल यह है कि परिवारवाद का विरोध करने वाली भाजपा क्या ख़ुद भी परिवारवाद से दूर रहती है ? क्या उन क्षेत्रीय पार्टियों या नेताओं से पार्टी फ़ासला बनाकर रखती है जो परिवारवाद की राजनीति करते हैं ? इस समय वर्तमान नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में ही कम से कम 15 मंत्री ऐसे हैं जो परिवारवाद से जुड़े हैं या अपनी राजनीतिक विरासत आगे बढ़ा रहे हैं। भाजपा के कुल सांसदों में से लगभग 12% राजनैतिक विरासत से आते हैं। अनुराग ठाकुर,ज्योतिरादित्य सिंधिया,पीयूष गोयल,धर्मेंद्र प्रधान,किरेन रिजिजू,राव इंद्रजीत सिंह,रक्षा खड़से आदि ऐसे कई उदाहरण हैं जो परिवारवाद के चलते ही केंद्र में मंत्री पद तक पहुँच सके हैं। परन्तु जब विपक्ष भाजपाई परिवारवाद का यही दर्पण भाजपा को दिखाता है तो भाजपा दावा करती है कि इनका चयन योग्यता अर्थात ‘गुणवाद’ पर आधारित है, न कि परिवारवाद पर। इससे बड़ा पाखंड और क्या हो सकता है ?
अभी पिछले दिनों बिहार में जब नितीश कुमार मंत्रिमंडल ने शपथ ली तो उसमें भी भाजपा व उसके सहयोगी दलों का परिवारवाद टिकट वितरण से लेकर मंत्री मंडल में स्थान पाने तक सिर चढ़कर बोलता दिखाई दिया। यहाँ विधान सभा चुनाव में एन डी ए की ओर से 29 ऐसे विधायक जीतकर आये हैं जो परिवारवाद का प्रतीक हैं। जबकि 26 मंत्रियों में से 9 मंत्री भी परिवारवाद से जुड़े हैं। इनमें सबसे प्रमुख परिवार केंद्रीय मंत्री व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का है। जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को 2025 चुनाव में हिस्से में कुल 6 सीटें मिली थीं जिनमें से 5 पर उन्होंने अपने रिश्तेदारों को टिकट दे दिया। इस समय उनके परिवार के 7 सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं तथा 5 व्यक्ति सांसद,विधायक व मंत्री बने हैं। इनमें संतोष कुमार सुमन, जीतन राम मांझी के पुत्र हैं ये विधान पार्षद (एम एल सी )हैं तथा इन्हें इस बार तीसरी बार नितीश मंत्रिमंडल में जगह मिली है। इसके अतिरिक्त दीपा मांझी, जीतन राम की पुत्रवधू अर्थात संतोष (मंत्री जी )की पत्नी हैं।यह विधायक हैं। जीतन मांझी की भाभी ज्योति देवी विधायक हैं। प्रफुल्ल कुमार दामाद ,संतोष (मंत्री जी ) का साला विधायक है । एक अन्य रिश्तेदार देवेंद्र मांझी दामाद उपाध्यक्ष व बिहार SC आयोग का अध्यक्ष है। यह पूर्व में मुख्यमंत्री काल में मांझी के पी ए भी रह चुके हैं।
इसी तरह बिहार की एक और क्षेत्रीय पार्टी है राष्ट्रीय लोक मोर्चा।तुम्हारा है तो ‘परिवारवाद ‘ हमारा है तो ‘गुणवाद’?
भाजपा शासित अन्य कई राज्यों में भी इसी तरह के ‘परिवारवाद की पताका’ लहराती दिखाई देगी। परन्तु गत चार दशकों से इन्हें केवल विपक्षी दलों का ही परिवारवाद नज़र आता है। गोया तुम्हारा है तो ‘परिवारवाद ‘ हमारा है तो ‘गुणवाद’?
अयोध्या राम मंदिर में ध्वजारोहण पूरा हुआ। पीएम मोदी के बटन दबाते ही झंडा धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता हुआ मंदिर के शीर्ष पर विराजमान हो गया। जैसे-जैसे झंडा ऊपर चढ़ता गया पीएम मोदी टकटकी लगाए उसे देखते रहे। पीएम मोदी इन पलों में भावुक नजर आए। निर्धारित शुभ मुहूर्त में प्रधानमंत्री ने राम मंदिर के मुख्य शिखर पर धर्मध्वज फहराया। जैसे ही केसरिया ध्वज पवन के संग लहराया, पूरा परिसर ‘जय श्री राम’ के उद्घोष से गूँज उठा। क्षण भर में वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया और श्रद्धालुओं की भावनाएँ उमंग में बदल गईं।
धर्मध्वज फहराने से पहले वैदिक मंत्रोच्चार के बीच व्यापक पूजन-अर्चन सम्पन्न हुआ। यज्ञकुंडों से उठती आहुतियों की सुगंध और नगाड़ों की गूँज ने समारोह को भव्यता प्रदान की। पीएम ने ध्वजारोहण कर राष्ट्र को सनातन परंपरा की अखंडता, आस्था और सांस्कृतिक स्वाभिमान का संदेश दिया।
ध्वजारोहण के समय सामने की कतार में साधु-संत बैठे हुए थे। वह भी भावुकता में अपने आंसू पोछते हुए नजर आए। इस कार्यक्रम में देश-दुनिया के करीब आठ हजार लोग आमंत्रित किए गए थे।
शुभ मुहूर्त पर हुआ ध्वजारोहण निर्धारित शुभ मुहूर्त में प्रधानमंत्री ने राम मंदिर के मुख्य शिखर पर धर्मध्वज फहराया। जैसे ही केसरिया ध्वज पवन के संग लहराया, पूरा परिसर ‘जय श्री राम’ के उद्घोष से गूँज उठा। क्षण भर में वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया और श्रद्धालुओं की भावनाएँ उमंग में बदल गईं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार 25 नवंबर को विवाह पंचमी के अवसर पर राम मंदिर के ‘शिखर’ पर भगवा ध्वज फहराया। पीएम मोदी ध्वजारोहण समारोह में शामिल होने वाले उच्च-स्तरीय गणमान्य व्यक्तियों में शामिल थे, साथ ही यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भागवत भी अन्य उपस्थित थे। दस फीट ऊंचे और बीस फीट लंबे धर्म ध्वज पर भगवान श्री राम के तेज और पराक्रम के प्रतीक सूर्य की छवि अंकित है, जिस पर कोविदारा वृक्ष की छवि के साथ ‘ओम’ अंकित है।
पारंपरिक उत्तर भारतीय नागर स्थापत्य शैली में निर्मित श्री राम जन्मभूमि मंदिर शिखर पर भगवा ध्वज लहराते ही भक्त खुशी से झूम उठे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि श्री अयोध्या धाम में भगवान राम के भव्य मंदिर में ध्वजारोहण किसी यज्ञ की पूर्णाहुति नहीं, बल्कि एक नए युग का सूत्रपात है। मैं इस अवसर पर राम भक्तों की ओर से प्रधानमंत्री मोदी का आभार व्यक्त करता हूँ।
यह समारोह मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भगवान राम और देवी सीता के विवाह पंचमी के अभिजीत मुहूर्त के साथ संयोग से मनाया गया, जो दिव्य मिलन का प्रतीक है। यह दिन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर जी के शहादत दिवस का भी प्रतीक है, जिन्होंने 17वीं शताब्दी में अयोध्या में 48 घंटे तक ध्यान किया था, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
राम मंदिर के दर्शन से पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने सप्तमंदिर का भी दौरा किया, जहाँ महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, देवी अहिल्या, निषादराज गुहा और माता शबरी को समर्पित मंदिर हैं। मंदिर का शिखर पारंपरिक उत्तर भारतीय नागर शैली में बनाया गया है, जबकि आसपास का 800 मीटर का परिक्रमा परकोटा दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला के तत्वों को प्रदर्शित करता है, जो भारत की विविध मंदिर परंपराओं के सम्मिश्रण को दर्शाता है।
धर्मध्वज फहराने से पहले वैदिक मंत्रोच्चार के बीच व्यापक पूजन-अर्चन सम्पन्न हुआ। यज्ञकुंडों से उठती आहुतियों की सुगंध और नगाड़ों की गूँज ने समारोह को भव्यता प्रदान की। पीएम ने ध्वजारोहण कर राष्ट्र को सनातन परंपरा की अखंडता, आस्था और सांस्कृतिक स्वाभिमान का संदेश दिया।
स अवसर पर देश-दुनिया से आए संत-महंत, विशिष्ट अतिथि और हज़ारों श्रद्धालु मौजूद रहे। सुरक्षा के कड़े इंतज़ामों के बीच राम नगरी उत्सव के रंग में डूबी रही। मंदिर परिसर से लेकर सरयू तट तक हर ओर दीप, पुष्प और रंगोलियों से सजा माहौल इस ऐतिहासिक उत्सव का साक्षात अनुभव करा रहा था।
चार से पांच मिनट के संक्षिप्त ध्वजारोहण अनुष्ठान में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच प्रधानमंत्री ने बटन दबाकर ध्वज फहराया। सात हजार अतिथि समारोह के साक्षी बने।, जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, , धर्मगुरु, व्यापार जगत के प्रमुख नाम, दलित, वंचित, किन्नर और अघोरी समुदाय के प्रतिनिधि शामिल रहे।
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण के जरिए ‘संकल्प सिद्धि’ के लिए रामनगरी पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जोरदार स्वागत हुआ। जयश्रीराम, जय जय हनुमान के गगनभेदी नारों संग अयोध्यावासियों ने प्रधानमंत्री के काफिले पर पुष्पवर्षा भी की। श्रीराम की अयोध्या ने प्रधानमंत्री का पूरे रास्ते में अभूतपूर्व स्वागत किया। अयोध्यावासियों के एक हाथ में भगवा ध्वज तो दूसरे हाथ में तिरंगा फहरा रहा था। वहीं स्वागत से अभिभूत प्रधानमंत्री ने भी हाथ हिलाकर अयोध्यावासियों का अभिवादन किया। अयोध्या पहुंचने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने प्रधानमंत्री का स्वागत किया।
अयोध्यावासियों के एक हाथ में भगवा ध्वज तो दूसरे में तिरंगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार सुबह अयोध्या पहुंचे। साकेत महाविद्यालय पर उनका हेलीकॉप्टर उतरा। वहां से काफिले संग टेढ़ी बाजार होते हुए उन्होंने श्रीराम मंदिर परिसर में प्रवेश किया। इस दौरान अयोध्यावासियों ने जयश्रीराम, जय जय हनुमान के गगनभेदी नारों संग उनका स्वागत किया। अयोध्यावासी एक हाथ में भगवा ध्वज तो दूसरे हाथ में तिरंगा फहराते हुए प्रधानमंत्री का स्वागत करते रहे। प्रधानमंत्री ने भी पूरे रास्ते में हाथ हिलाकर अयोध्यावासियों का अभिवादन किया।
सप्त मंदिरों में झुकाया शीश, की पूजा-अर्चना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सप्त मंदिर में भी पूजा-अर्चना की। मंदिर परिसर में महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, देवी अहिल्या, निषादराज गुह्य और माता शबरी मंदिर में पहुंचकर प्रधानमंत्री ने शीश झुकाया। प्रधानमंत्री ने शेषावतार मंदिर व माता अन्नपूर्णा मंदिर में भी दर्शन-पूजन किया।
वर्षों में मानसिक गुलामी से मुक्ति दिलाकर रहेंगे-पीएम
पीएम ने अपने संबोधन में कहा कि धर्म ध्वजा पर कोविदार वृक्ष बना है। जब भरत अपनी सेना के साथ चित्रकूट पहुंचे, तब लक्ष्मण ने दूर से ही अयोध्या की सेना को पहचान लिया। इसका वर्णन वाल्मीकि जी ने किया है। लक्ष्मण कहते हैं कि सामने जो ध्वज दिख रहा है, वह अयोध्या का धर्म ध्वज है, जिस पर कोविदार वृक्ष बना है। यह वृक्ष अपने को याद दिलाता है कि जब हम इसे भूलते हैं, तब अपनी पहचान खो देते हैं। आज से 190 साल पहले 1835 में मैकाले नाम के एक अंग्रेज ने भारत में मानसिक गुलामी की नींव रखी। आने वाले 10 वर्षों में उसके 200 साल होने वाले हैं। हमने संकल्प लिया है कि आने वाले 10 वर्षों में हम मानसिक गुलामी की मानसिकता से मुक्ति दिलाकर रहेगें।
मानसिक गुलामी ने राम को भी काल्पनिक बता दिया
पीएम ने आगे कहा कि अभी गुलामी की इस मानसिकता ने डेरा डाला हुआ है। हमने नौसेना के ध्वज से गुलामी की मानसिकता को हटाया। ये गुलामी की मानसिकता ही है, जिसने राम को नकारा है। भारतवर्ष के कण-कण में भगवान राम हैं। लेकिन, मानसिक गुलामी ने राम को भी काल्पनिक बता दिया। आने वाले एक हजार वर्ष के लिए भारत की नींव तभी मजबूत होगी, जब आने वाले 10 साल में हम मैकाले की मानसिक गुलामी से छुटकारा पा लेंगे। 21वीं सदी की अयोध्या विकसित भारत का मेरुदंड बनकर उभर रही है।
उन्होंने कहा कि अयोध्या में आज शानदार रेलवे स्टेशन है। वंदे भारत और अमृत भारत जैसी ट्रेनें हैं। जब से रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई है, तब से 45 करोड़ श्रद्धालु यहां दर्शन को आ चुके हैं। इससे अयोध्या व आसपास के लोगों का आर्थिक विकास हुआ है। 21वीं सदीं का आने वाला समय काफी महत्वपूर्ण है। पिछले 11 साल में भारत विश्व की पांचवी अर्थव्यवस्था बन गया है। वह दिन दूर नहीं जब भारत जल्द ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था बन जाएगा।
मुख्यमंत्री व गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने ध्वजारोहण समारोह में अपनी बातों का आगाज सियावर रामचंद्र भगवान, माता जानकी, सरयू मैया की जय, भारत माता की जय और हर हर महादेव के उद्घोष के साथ किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही समूचा मंदिर परिसर जय-जयकार से गूंज उठा।
आजु सफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू। सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू।
सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि ध्वजारोहण यज्ञ की पूर्णाहूति नहीं, बल्कि नए युग का शुभारंभ है। प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर 140 करोड़ भारतीयों की आस्था, सम्मान व आत्मगौरव का प्रतीक है। सीएम योगी ने भव्य मंदिर के निर्माण में योगदान देने वाले कर्मयोगियों का भी अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि आज का पावन दिन उन पूज्य संतों, योद्धाओं, श्रीरामभक्तों की अखंड साधना-संघर्ष को समर्पित है, जिन्होंने आंदोलन व संघर्ष के लिए जीवन को समर्पित किया। विवाह पंचमी का दिव्य संयोग इस उत्सव को और भी पावन बना रहा है।
मुख्यमंत्री-गोरक्षपीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर भगवा ध्वज के आरोहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत की उपस्थिति में अपने विचार रखे। सीएम योगी समेत सभी विशिष्टजनों ने झुककर भगवा ध्वज को प्रणाम निवेदित किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत को स्मृति चिह्न भी प्रदान किया।
धर्म का प्रकाश अमर और रामराज्य के मूल्य कालजयी हैं सीएम योगी ने कहा कि ध्वजारोहण उस सत्य का उद्घोष है कि धर्म का प्रकाश अमर है और रामराज्य के मूल्य कालजयी हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में जब नेतृत्व संभाला था, उसी दिन कोटि-कोटि भारतवासियों के मन और हृदय में जिस संभावना, संकल्प व विश्वास का सूर्योदय हुआ, आज वही तपस्या, अनगिनत पीढ़ियों की प्रतीक्षा आपके कर कमलों के माध्यम से साकार होकर भव्य राम मंदिर के रूप में भारतवासियों व सनातन धर्मावलंबियों के समक्ष है। श्रीराम मंदिर पर फहराता केसरिया ध्वज धर्म, मर्यादा, सत्य-न्याय व राष्ट्रधर्म का भी प्रतीक है। यह विकसित भारत की संकल्पना का प्रतीक है।
संकल्प का कोई विकल्प नहीं होता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि संकल्प का कोई विकल्प नहीं होता। सभी ने 11 वर्ष में बदलते भारत को देखा है। हम नए भारत का दर्शन कर रहे हैं, जहां विकास और विरासत का बेहतरीन समन्वय है। यह इसे नई ऊंचाई प्रदान कर रहा है। सीएम योगी ने कहा कि 80 करोड़ लोगों को राशन, 50 करोड़ लोगों को निःशुल्क स्वास्थ्य सुविधा, हर जरूरतमंद को आवास, हर व्यक्ति बिना भेदभाव शासन की योजनाओं का लाभ पा रहा है तो यह रामराज्य की वह उद्घोषणा है, जिसका आधार विकसित भारत है।
उत्सवों की वैश्विक राजधानी बन रही अयोध्या सीएम योगी ने कहा कि 500 वर्षों में साम्राज्य बदले, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन आस्था अडिग रही। आस्था न झुकी, न रुकी। जन-जन का विश्वास अटल था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन के हाथों में कमान आई तो हर मुंह से एक ही उद्घोष निकलता था कि ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। लाठी गोली खाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।‘ एक समय था, जब वैभवशाली अयोध्या संघर्ष, बदहाली का शिकार बन चुकी थी, लेकिन पीएम मोदी के मार्गदर्शन व नेतृत्व में अयोध्या उत्सवों की वैश्विक राजधानी बन रही है। यहां हर दिन पर्व है, हर दान प्रताप है और हर दिशा में रामराज्य की पुनर्स्थापना की दिव्य अनुभूति हो रही है।
रामलला की पावन नगरी आस्था व अर्थव्यवस्था के नए युग में कर चुकी है प्रवेश सीएम योगी ने कहा कि रामलला की पावन नगरी आस्था व आधुनिकता, आस्था व अर्थव्यवस्था के नए युग में प्रवेश कर चुकी है। यहां बेहतर कनेक्टिविटी है। धर्मपथ, रामपथ, भक्ति पथ, पंचकोसी और 14 कोसी के साथ 84 कोसी की परिक्रमा श्रद्धालुओं व भक्तों को नया मार्ग व आस्था को नया सम्मान प्रदान कर रही है। महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट कनेक्टिविटी की बेहतर सुविधा उपलब्ध करा रही है। पीएम मोदी के मार्गदर्शन में अयोध्या धाम में आस्था, आधुनिकता, आस्था और अर्थव्यवस्था का नया केंद्र दिख रहा है। देश की पहली सोलर सिटी-सस्टेनबल स्मार्ट रूप में नई अयोध्या का दर्शन हो रहा है। आज का दिन हर भारतवासी, सनातन धर्मावलंबी के लिए आत्मगौरव-राष्ट्रगौरव का दिन है।
इस अवसर पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास जी महाराज, राज्यपाल आनंदी बेन पटेल, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी जी महाराज आदि मौजूद रहे। सं
भारतीय धार्मिक कथा परंपरा में अनेक वक्ताओं ने अपनी वाणी, विद्वता और मनोहर प्रस्तुति से जन-मानस को प्रभावित किया है, लेकिन जिन कुछ नामों ने कथा-शास्त्र को नयी गरिमा और व्यापक लोकप्रियता प्रदान की, उनमें राधेश्याम कथावाचक का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने केवल कथा सुनाई नहीं, बल्कि उसे जीवंत कर दिया। उनके कथन में अध्यात्म की गहराई, भक्ति की सुवास, साहित्य की मधुरता और संस्कृति की जड़ों से निकली निष्कपट सरलता एक साथ दिखाई देती है। वे कथा को मनोरंजन या प्रवचन मात्र नहीं, बल्कि भाव-जागरण, सामाजिक सुधार और आत्म-चिंतन का माध्यम मानते थे। इसी दृष्टिकोण ने उन्हें अपने समय का अत्यंत प्रभावशाली कथावाचक बनाया।
राधेश्याम कथावाचक प्राचीन कथा परंपरा के समर्थक थे जिसमें रामायण, भागवत पुराण, शिवपुराण और देवी भागवत जैसी महान ग्रंथों का सरस वर्णन होता है। लेकिन उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे शास्त्रों की विद्वता को सरल भाषा में ढालकर आम जन तक पहुँचाने में सर्वथा सक्षम थे। सामान्य जन वेद-पुराणों के गूढ़ सिद्धांत आसानी से नहीं समझ पाते, परंतु राधेश्याम जी उन्हें रोज़मर्रा के उदाहरणों, जीवंत उपमाओं और सहज संवाद शैली में खोलकर प्रस्तुत करते थे। इसीलिए उनकी कथाओं में न केवल बुजुर्ग, बल्कि युवा वर्ग भी बड़ी संख्या में सम्मिलित होता था।
कथावाचन की कला में स्वर, भाव और पात्र-अभिनय अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। राधेश्याम कथावाचक इन तीनों तत्वों में निपुण थे। उनका स्वर इतना मधुर और भावपूर्ण था कि कथा की प्रत्येक घटना सुनने वालों के हृदय पर सीधी छाप छोड़ती थी। वे किसी प्रसंग को केवल पढ़ते नहीं थे, बल्कि उसे पूरी आत्मा से जीते थे। जब वे राम वनवास का दृश्य सुनाते, तो ऐसा लगता मानो अयोध्या का समूचा वातावरण श्रोता सभा में उतर आया है। जब वे कृष्ण की बाल लीलाएँ वर्णित करते, तो बच्चे तक मंत्रमुग्ध हो जाते। कथा के विभिन्न पात्रों—जैसे कौशल्या, जनक, सीता, हनुमान, पात्र, गोपियाँ—के संवाद वे अलग-अलग आवाज़ और भाव से प्रस्तुत करते, जिससे दर्शकों को ऐसा लगता मानो वे स्वयं उस दृश्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हों।
राधेश्याम कथावाचक की कथा का एक प्रमुख आकर्षण था उनका गहरी आध्यात्मिक अनुभूति से भरा हुआ दृष्टिकोण। वे केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करते थे, बल्कि उनके भीतर छिपे चिरंतन संदेश को उजागर करते थे। उदाहरण के लिए, रामायण के प्रसंगों में वे बताते कि राम का चरित्र एक आदर्श पुरुष के रूप में क्यों महत्वपूर्ण है, उनकी नीतियाँ आधुनिक जीवन में क्या संदेश देती हैं, और कैसे उनके आचरण से वर्तमान सामाजिक समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है। इसी प्रकार भागवत कथा में वे कृष्ण की लीलाओं में छिपे प्रेम, करुणा, समर्पण और धर्म-आधारित जीवन की शिक्षा पर विशेष बल देते थे। उनकी कथा में उपदेश नहीं, बल्कि अनुभूति होती थी; इसलिए लोग संदेश को सहज रूप से स्वीकार कर लेते थे।
कथावाचन में उनका एक महत्त्वपूर्ण योगदान यह भी था कि वे धार्मिक ग्रंथों को सामाजिक मूल्यों और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ते थे। उनका मानना था कि कथा का लक्ष्य केवल भक्ति जगाना नहीं, बल्कि समाज को सजग, नैतिक और संस्कारित बनाना भी है। इसलिए वे कथा के माध्यम से नशा-मुक्ति, शिक्षा, स्त्री-सम्मान, परिवार की एकता, युवा-सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों को भी सहजता से जोड़ देते थे। वे कहते थे कि धर्म वही है जो समाज को उन्नति की ओर ले जाए, और अध्यात्म वह है जो मनुष्य को विनम्र और संवेदनशील बनाए।
राधेश्याम जी की कथाओं की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहाँ भी उनका कार्यक्रम होता, वहाँ हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। ग्रामीण क्षेत्र हो या महानगर, मंदिर हो या मैदान—हर जगह उनकी कथा सुनने वालों का उत्साह एक जैसा रहता था। वे मंच पर आते ही अपनी मधुर वाणी और सौम्य व्यक्तित्व से ऐसा वातावरण बना देते थे कि लोग कथा समाप्त होने तक अपनी जगह से हिलना भी नहीं चाहते थे। उनकी कथा की विशेषता यह भी थी कि वे दर्शकों के साथ गहरा संवाद स्थापित करते थे। वे बीच-बीच में श्रोताओं से प्रश्न पूछते, उदाहरण साझा करते और उन्हें आत्म-मंथन के लिए प्रेरित करते।
उनके व्यक्तित्व का एक और अद्भुत पक्ष था उनकी सरलता और विनम्रता। लोकप्रियता के शिखर पर रहने के बावजूद वे स्वयं को एक साधारण कथाकार ही मानते थे। वे कहते थे कि “कथा मेरा नहीं, भगवान का काम है। मैं तो केवल माध्यम हूँ।” इस विनम्रता ने उन्हें और भी अधिक प्रिय बना दिया था। लोग उन्हें कथा-वाचक से अधिक एक सच्चे संत के रूप में देखते थे।
कथावाचन की परंपरा में राधेश्याम कथावाचक का स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने नई पीढ़ी के कथाकारों को प्रशिक्षित किया। वे अपने शिष्यों में कथा के शास्त्रीय स्वरूप के साथ-साथ उसकी सामाजिक और भावनात्मक संवेदना भरते थे। उनका जोर रहता था कि कथाकार केवल वक्ता न बने, बल्कि समाज के लिए एक पथ-प्रदर्शक हो। आज अनेक युवा कथाकार उनके मार्गदर्शन से प्रेरणा लेकर मंच पर सक्रिय हैं।
राधेश्याम कथावाचक की कथा का सबसे बड़ा आधार उनकी साधना और धार्मिक अनुशासन था। वे प्रतिदिन नियमित पूजा, ध्यान और शास्त्र अध्ययन करते थे। वे मानते थे कि कथाकार की वाणी तभी प्रभावशाली हो सकती है जब उसका जीवन भी उतना ही पवित्र और संयमित हो। उनके जीवन की यह अनुशासनप्रियता उनकी कथाओं में स्पष्ट दिखाई देती थी। यही कारण था कि वे कथा सुनाते समय केवल ज्ञान नहीं बाँटते थे, बल्कि अनुभव की गहराई भी साझा करते थे।
उनके जीवन की एक बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने कथा को आधुनिक तकनीक और मंचीय शैली के साथ भी जोड़ा। वे नई पीढ़ी की रुचियों को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुति शैली में छोटे-छोटे बदलाव लाते, लेकिन कथा की शास्त्रीयता से कभी समझौता नहीं करते थे। उनके प्रवचनों की वीडियो रिकॉर्डिंग, ऑनलाइन प्रसारण और डिजिटल संग्रह आज भी लाखों लोगों तक पहुँच रहे हैं।
राधेश्याम कथावाचक का जीवन इस बात का प्रमाण है कि कथा केवल कला नहीं, बल्कि एक साधना है। यह मनुष्य के भीतर छिपे दिव्य गुणों को जगाने का माध्यम है। उनकी कथाएँ सुनकर असंख्य लोगों के जीवन में परिवर्तन आया—किसी ने नशा छोड़ा, किसी ने परिवार को संभाला, किसी ने सेवा का मार्ग चुना और किसी ने धर्म का सही स्वरूप समझा। यही एक महान कथावाचक की पहचान है कि उसकी कथा मंच पर समाप्त नहीं होती, बल्कि लोगों के जीवन में उतरकर अपना प्रभाव छोड़ती है।
आज भी राधेश्याम कथावाचक की विद्वता, आत्मीयता और आध्यात्मिक गहराई कथाकारों के लिए आदर्श है। उन्होंने कथा-वाचन को एक नया आयाम दिया, उसे समाजोसुधारक शक्ति से जोड़कर उसे जीवंत बनाया। उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों तक प्रेरणा बनकर पहुँचेगा, क्योंकि उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि कथा केवल इतिहास का बयान नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण का मार्ग भी है।
इस प्रकार, राधेश्याम कथावाचक भारतीय कथा परंपरा के उन दुर्लभ रत्नों में से एक हैं जिन्होंने अपनी वाणी, सरलता, आध्यात्मिक शक्ति, सामाजिक चेतना और अनोखी प्रस्तुति शैली से कथा को नया जीवन दिया। उनका जीवन संदेश देता है कि जब वाणी साधना से जुड़ती है, तो वह केवल सुनने वालों को आनंद ही नहीं देती, बल्कि उन्हें आंतरिक रूप से बदल देती है। यही राधेश्याम कथावाचक की अमूल्य विरासत है, और यही उन्हें भारतीय अध्यात्म और कथा-साहित्य की दुनिया में अमर बनाती है।
पंडित राधेश्याम कथावाचक का जन्म 25 नवंबर, 1890 को उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में हुआ था। उनका जन्म बिहारीपुर मोहल्ले में हुआ था, उनके पिता का नाम पंडित बांकेलाल था।
उनके परिवार की आर्थिक स्थिति प्रारंभ में बहुत साधारण थी। उनके कच्चे घर में गरीबी थी, और बचपन में उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। हालांकि, उनके पिता को नाटकों, भजन-गायकियों की परंपरा की समझ थी, और इसी के चलते राधेश्याम को संगीत, गायन और नाटक की दुनिया में शुरुआती रूचि मिली।
बचपन से ही नाटकीय और लोक गायन-शैली के वातावरण में पले-बढ़े थे। बरेली में नाटक कम्पनियाँ (पारसी थिएटर कंपनियाँ) उनके इलाके के “चित्रकूट महल” नामक स्थान में रिहर्सल के लिए रुकती थीं, और राधेश्याम वहाँ के संगीत-रागों और गायन से काफी प्रभावित हुए।हारमोनियम बजाना और गायन उन्होंने अपने पिता और नाटक कंपनियों के कलाकारों से सीखा था।उनकी रामकथा (राधेश्याम रामायण) खास शैली में लिखी गई — लोक-नाट्य ढंग और “तर्ज़ राधेश्याम” नामक छंद में।उनकी लेखन शैली और संगीत समझ उनकी आत्म-अध्ययन, संगीत-अनुभव और लोक परंपरा के गहरे जुड़ाव से आई थी — वे मात्र कथावाचक नहीं, बल्कि नाटककार, पद्यकार और संगीतकार भी थे।
पंडित राधेश्याम कथावाचक का निधन 73 साल की आयु में 26 अगस्त, 1963 को हुआ था।राधेश्याम कथावाचक ने रामायण को खड़ी बोली में 25 खंडों में पद्य के रूप में लिखा, जिसे आज “राधेश्याम रामायण” के नाम से जाना जाता है और ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय हुआ।उनके लेखन, कथावाचन और नाट्यकला में पारसी रंगमंच शैली का बहुत बड़ा असर था। उन्होंने अपने जीवन में करीब 57 पुस्तकें लिखीं और अनेक पुस्तकों का संपादन किया। कथावाचन और मंचीय काम में उनका लगभग 45 वर्षों का सक्रिय योगदान रहा।
नारनौल। मनुमुक्त ‘मानव’ मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा भारतीय पुलिस सेवा के दिवंगत अधिकारी डॉ. मनुमुक्त ‘मानव’ की 43वीं जयंती पर विशाल वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय कवि-सम्मेलन ’43वीं जयंती : 43 देश, 43 कवि’ का आयोजन गत शाम किया गया, जिसमें छह महाद्वीपों और तेतालीस देशों के तेतालीस कवियों ने सहभागिता की। सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) के कुलपति तथा भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी डॉ. अशोककुमार गर्ग की अध्यक्षता में आयोजित इस कवि-सम्मेलन में भाषा आयोग, काठमांडू (नेपाल) के अध्यक्ष डॉ. गोपाल ठाकुर मुख्य अतिथि थे, वहीं विश्व बैंक, वाशिंगटन डीसी (अमेरिका) की वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ. एस. अनुकृति स्वागताध्यक्ष के रूप में उपस्थित रहीं। उद्योग विस्तार अधिकारी डॉ. सुनील भारद्वाज द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना-गीत के उपरांत ट्रस्टी डॉ. कांता भारती के प्रेरक सान्निध्य और डॉ. पंकज गौड़ के कुशल संचालन में सम्पन्न हुए इस कवि-सम्मेलन के प्रारंभ में चीफ ट्रस्टी डॉ. रामनिवास ‘मानव’ ने ट्रस्ट की गतिविधियों और उपलब्धियों का विवरण प्रस्तुत किया तथा दोहों के माध्यम से अपने दिवंगत पुत्र मनुमुक्त को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उनका एक दोहा था- पुत्र-शोक के बाद भी, करता हूँ उपभोग। मुझसे थे दशरथ भले, सह ना सके वियोग।। मुख्य अतिथि डॉ. गोपाल ठाकुर ने अपने संबोधन में मनुमुक्त-परिवार द्वारा अपने व्यक्तिगत दुख को वैश्विक सौहार्द और संपर्क का सेतु बनाने के प्रयास को अत्यंत सराहनीय और प्रेरणादायी बताया, वहीं डॉ. मनोजकुमार गर्ग ने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. मनुमुक्त के असामयिक निधन को देश और समाज के लिए अपूरणीय क्षति बताते हुए कहा कि एक प्रतिभाशाली और ऊर्जावान पुलिस अधिकारी का अल्पायु में निधन किसी हृदय-विदारक त्रासदी से कम नहीं है।
*इन कवियों ने की सहभागिता :* इस अवसर पर दिवंगत मनुमुक्त को श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए टोक्यो (जापान) की डॉ. रमा पूर्णिमा शर्मा, सूवा (फीजी) की सुएता दत्त चौधरी, सिडनी (आस्ट्रेलिया) के प्रगीत कुँअर, ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) के रोहितकुमार ‘हैप्पी’, होचिमिन्स सिटी (वियतनाम) की साधना सक्सेना, बैंकाॅक (थाईलैंड) की शिखा रस्तोगी, मेडान (इंडोनेशिया) के आशीष शर्मा, सिंगापुर सिटी (सिंगापुर) की आराधना सक्सेना, तियान्जिन (चीन) के हरप्रीतसिंह पुरी, काठमांडू (नेपाल) के डॉ. पुष्करराज भट्ट, थिंपू (भूटान) की अर्चना ठाकुर, लाडनूँ (भारत) के डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’, कोलंबो (श्रीलंका) की डॉ. अंजलि मिश्रा, मस्कट (ओमान) की सिम्मी कुमारी, दुबई सिटी (दुबई) की अनु बाफना, शारजाह सिटी (शारजाह) की अंजू मेहता, आबूधाबी सिटी (आबूधाबी) के अंकुर रांका, दोहा (कतर) के डॉ. बैजनाथ शर्मा, कुवैत सिटी (कुवैत) की नाज़नीन अली ‘नाज़’, बेल रोज (माॅरिशस) की डॉ. सुरीति रघुनंदन, दार-ए-सलाम (तंजानिया) के अजय गोयल, लागोस (नाईजीरिया) की राखी बिलंदानी, अकरा (घाना) की मीनाक्षी सौरभ, जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) की झरना दीक्षित, मास्को (रूस) की श्वेतासिंह ‘उमा’, अंकारा (तुर्किये) के ऐमराह करकोच, सोफिया (बुल्गारिया) की डॉ. मोना कौशिक, स्टाॅकहोम (स्वीडन) के सुरेश पांडे, कोपनहेगन (डेनमार्क) की सविता जाखड़, बर्लिन (जर्मनी) की डॉ. योजना शाह जैन, आसन (नीदरलैंड) की डॉ. ऋतु शर्मा, ब्रुसेल्स (बैल्जियम) के कपिल कुमार, लक्जमबर्ग सिटी (लक्जमबर्ग) के मनीष पांडेय, वियना (आस्ट्रिया) की अमिता लुग्गर, मिलान (इटली) की उर्मिला चक्रवर्ती, मैड्रिड (स्पेन) की पूजा अनिल, लिस्बन (पुर्तगाल) के डॉ. शिवकुमार सिंह, लंदन (ब्रिटेन) के आशीष मिश्रा, बेलफास्ट (आयरलैंड) के डॉ. अभिषेक त्रिपाठी, टोरंटो (कनाडा) की डाॅ. शैलजा सक्सेना, वर्जीनिया (अमेरिका) की मंजू श्रीवास्तव, पोर्ट आॅफ स्पेन (ट्रिनिडाड) की आशा मोर और लैडिंग (सूरीनाम) की सुषमा खेदू के अतिरिक्त सिडनी (आस्ट्रेलिया) की डॉ. भावना कुँअर और भारत से अलवर के संजय पाठक तथा नारनौल के डॉ. जितेंद्र भारद्वाज, डॉ. पंकज गौड़ और डॉ. सुनील भारद्वाज ने उनकी स्मृति में मर्मस्पर्शी काव्य-पाठ किया, जिसे भरपूर सराहना मिली।
*इनकी रही उल्लेखनीय उपस्थिति :* लगभग तीन घंटों तक चले इस यादगारी कवि-सम्मेलन में वाशिंगटन डीसी (अमेरिका) के प्रो. सिद्धार्थ रामलिंगम, आॅकलैंड (न्यूजीलैंड) के बाबूलाल शर्मा, कोपनहेगन (डेनमार्क) के गजेंद्रसिंह जाखड़ तथा भारत से प्रो. विजयकुमार मिर्चे, सुरेंद्र कागद, रवि श्रीवास्तव, मुहम्मद आरिफ गौरी, महीपाल सिंह, डॉ. भीमसिंह सुथार, सुरेशचंद्र शर्मा, रंजीता वर्मा, डॉ. शर्मिला यादव, रिधु कँवर आदि साहित्य-प्रेमियों की गरिमापूर्ण उपस्थित उल्लेखनीय रही।
—डॉo सत्यवान सौरभ,
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,दिल्ली यूनिवर्सिटी,कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
भारतीय शास्त्रीय नृत्य के इतिहास में यदि किसी नाम ने परंपरा, तकनीक, ऊर्जा और सौंदर्य का अनूठा संगम रचा, तो वह नाम है सितारा देवी। उन्हें नृत्य की दुनिया में “कथक सम्राज्ञी” कहा जाता है। उन्होंने न केवल कथक को नया आयाम दिया, बल्कि इस नृत्य को विश्व मंच पर सम्मान भी दिलाया। उनके नृत्य में बनारस की शास्त्रीयता, लोक लय की मस्ती और व्यक्तिगत प्रतिभा की चमक हमेशा साथ रहती थी।
सितारा देवी का जन्म 8 नवम्बर 1920 को कोलकाता में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से बनारस का था और पीढ़ियों से संगीत एवं नृत्य की साधना में रचा-बसा हुआ था। उनके पिता पंडित सुखदेव महाराज स्वयं प्रसिद्ध कथक गुरु थे और संत कबीर के पदों तथा रामलीला के विश्लेषण में भी विशेष रुचि रखते थे। पारिवारिक वातावरण में संगीत और नृत्य स्वाभाविक रूप से बहता था, इसलिए छोटी उम्र से ही सितारा देवी की नृत्य प्रतिभा निखरने लगी।
जब वे महज दस साल की थीं, तभी मंच पर उनका पहला सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ। इस प्रस्तुति ने दर्शकों के साथ-साथ आलोचकों को भी चकित कर दिया। उनकी गति, भाव-प्रदर्शन, ताल की समझ और अभिव्यक्तियों ने सभी को प्रभावित किया। यह वह दौर था, जब समाज का बड़ा हिस्सा नृत्य को प्रतिष्ठित कला के रूप में स्वीकार नहीं करता था, परंतु सितारा देवी ने अपने आत्मविश्वास और दृढ़ निश्चय से इस सोच को बदलने की पहल की।
कथक नृत्य में तीन प्रमुख घराने—जयपुर, लखनऊ और बनारस—विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। सितारा देवी ने अपने पिता और परिवार के अन्य गुरुओं से विशेष रूप से बनारस घराने की शैली में प्रशिक्षण प्राप्त किया। बनारस घराना अपनी ऊर्जा, ठुमरी-आधारित अभिव्यक्तियों और मंच-प्रस्तुति की भव्यता के लिए जाना जाता है। सितारा देवी ने इस शैली को और अधिक समृद्ध करते हुए उसमें ऐसा आकर्षण जोड़ा कि उनकी शैली की नकल करने वाले अनेक शिष्य आगे चलकर स्वयं गुरु बने।
सितारा देवी का नृत्य केवल तकनीक तक सीमित नहीं था। उनमें अद्भुत अभिनय-शक्ति थी। कृष्ण-लीला, रामायण के प्रसंग, नायिका-भेद और ठुमरी की भावप्रवणता—इन सब में वे बेजोड़ थीं। कहते हैं कि जब वे किसी ठुमरी पर नृत्य करती थीं, तो दर्शकों को ऐसा लगता था मानो गीत की प्रत्येक पंक्ति जीवंत हो उठी हो। उनके पांवों की कठोरता और हाथों की लचीली मुद्राओं का संगम एक ऐसी लय पैदा करता था, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था।
उनका व्यक्तित्व अत्यंत स्वतंत्र और दृढ़ था। उन्होंने कथक को नारी शक्ति और आत्मसम्मान से जोड़ते हुए इसे सम्मानजनक मंच दिया। वे कहती थीं कि नृत्य साधना है, आत्मिक ऊर्जा का प्रकट रूप है, और यह किसी भी प्रकार के बंधन को स्वीकार नहीं करता। इस दृष्टि से वे आधुनिक भारतीय नृत्य की अग्रणी हस्ती थीं।
भारतीय सिनेमा से भी उनका गहरा जुड़ाव था। 1930 और 40 के दशक में उन्होंने कई फिल्मों में नृत्य निर्देशन किया और स्वयं भी मंच-नृत्य प्रस्तुतियों के माध्यम से फिल्मों के कलाकारों को प्रेरणा दी। राज कपूर से लेकर महादेवी वर्मा जैसे साहित्यकार भी उनके प्रशंसकों में शामिल थे। मशहूर निर्देशक मेहबूब खान ने उन्हें “भारतीय नृत्य की जीवित देवी” कहा था।
सितारा देवी के योगदान को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1969 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और भारत सरकार सहित अनेक सांस्कृतिक संस्थाओं ने सम्मानित किया। बाद में उन्हें पद्म भूषण देने का निर्णय हुआ, परंतु उन्होंने इसे यह कहकर स्वीकार नहीं किया कि उनका योगदान इससे कहीं अधिक है और वे उच्चतम सम्मान की अधिकारी हैं। यह घटना उनके स्वाभिमान और उनके कला-गौरव का परिचायक है।
उनकी नृत्य यात्रा सात दशकों से भी अधिक चली। वे वृद्धावस्था तक नृत्य सिखाती रहीं। मुंबई में उनका निवास कलाकारों और शिष्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत था। उन्होंने हजारों विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया और कथक को नई पीढ़ियों तक पहुँचाया। 25 नवंबर 2014 को वे इस दुनिया से विदा हो गईं, लेकिन उनकी नृत्य-धारा अब भी जीवित है।
सितारा देवी की विरासत केवल नृत्य तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय कला संस्कृति की आत्मा में दर्ज हो चुकी है। उन्होंने कथक को एक नवीन पहचान दी, इसे समाज और वैश्विक मंच पर गौरव दिलाया और आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश दिया कि कला केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान, स्वतंत्रता और सौंदर्य की अनंत साधना है।
आज भी जब कथक की चर्चा होती है, तो सितारा देवी का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। वे न केवल एक महान नृत्यांगना थीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की एक अद्भुत प्रतिनिधि थीं। उनकी साधना, ऊर्जा और जीवन-दृष्टि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।
श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस पर, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज उनके अद्वितीय साहस और सर्वोच्च बलिदान को श्रद्धांजलि अर्पित की।
श्री मोदी ने कहा कि आस्था और मानवता की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर जी की शहादत हमारे समाज को सदैव आलोकित करती रहेगी।
एक्स पर एक पोस्ट में प्रधानमंत्री ने कहा:
“श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस पर, हम उनके अद्वितीय साहस और बलिदान को नमन करते हैं। आस्था और मानवता की रक्षा के लिए उनकी शहादत हमारे समाज को सदैव आलोकित करती रहेगी।”