अब देवभूमि बनेंगी नई परंपराएं

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प्रयागराज में पूर्ण कुंभ को महाकुंभ कहा हरिद्वार में अर्धकुंभ को कहा जाएगा पूर्ण कुंभ
अर्द्धकुंभ परम्परा का शास्त्रीय महत्व कोई नहीं
प्रयागराज और हरिद्वार में मनाया जाता है यह पर्व
नासिक और उज्जैन में अर्द्धकुंभ नहीं पड़ता
राजा हर्षवर्धन के दान से पड़ी अर्धकुंभ की परंपरा

उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है । सनातन जगत को यहभूमि ऋषि मुनियों के तप की ऊर्जा सदा प्रदान करती रही है । कुंभ आदि पर्व जन पर्व हैं । लेकिन नए निजाम में संत पर्व बनकर रह गए हैं । तो कल हरिद्वार में मुख्यमंत्री की उपस्थिति में संतों ने तय कर लिया कि 2027 में पड़ने वाले अर्धकुंभ को कुंभ कहा जाएगा । अर्धकुंभ पर पहली बार अखाड़ों के शाही स्नान भी होंगे ।

सभी जानते हैं बारह वर्ष बाद एक एक कर चारों कुंभ नगरों में पड़ने वाला पूर्ण कुंभ सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा वैदिक पर्व है । सनातन धर्म के पर्वों में कुंभ ही ऐसा एक मात्र पर्व है जिसका वर्णन अथर्ववेद और ऋग्वेद में उपलब्ध है । अन्य पर्वों का विवरण पौराणिक अधिक और वैदिक बहुत कम मिलता है । लेकिन वेद पुराणों में अर्धकुंभ तथा महाकुंभ का कोई विवरण उपलब्ध नहीं । सूर्य , बृहस्पति , चंद्रमा और शनि की युति 12 साल बाद कुंभ महापर्व को जन्म देती है । लेकिन इन ग्रहों की ऐसी एक भी युति नहीं है जो अर्धकुंभ पर पड़कर उसे शास्त्रीय बनाती हो ।

फिर भी प्रयागराज और हरिद्वार में अर्धकुंभ मनाया जाता है । प्रयागराज में नागा संन्यासी भी कुंभ की तरह अर्धकुंभ में भाग लेते हैं , लेकिन हरिद्वार अर्धकुंभ में कोई भी अखाड़ा स्नान या शिविर लगाने नहीं आता । वास्तव में अर्धकुंभ कोई पौराणिक महापर्व नहीं है , अपितु राजा हर्षवर्धन के दान से जुड़ा पर्व है । राजा हर्षवर्धन महादानी थे । वे प्रत्येक 6 वर्ष बाद प्रयागराज जाकर अपना सर्वस्व खजाना दान कर देते थे । उसे ही लेने के लिए हर छह वर्ष बाद देश भर से साधु संत प्रयागराज पहुंचते थे । वे अर्धकुंभ में भी सर्वस्व लुटा देते थे ।

उसी दान से प्रयाग में अर्धकुंभ शुरू हुआ । कालांतर में उसी की देखा देखी हरिद्वार में भी अर्धकुंभ भरने लगा । इसके अलावा एक भी कारण नहीं जो हरिद्वार में अर्धकुंभ की परंपरा को पुष्ट करे । हरिद्वार कुंभ 2021 में पड़ा था और अब 2027 में अर्धकुंभ पड़ेगा । आश्चर्य की बात है अर्धकुंभ को अब कुंभ का नाम देकर आकर्षण पैदा किया जा रहा है । इस सवाल का जवाब भी किसी के पास नहीं कि नासिक और उज्जैन में अर्द्धकुंभ क्यों नहीं भरता ? इस बात का भी कोई उत्तर नहीं कि हरिद्वार अर्धकुंभ में 13 अखाड़ों में से एक भी अखाड़ा अब तक स्नान करने क्यों नहीं आता था ।

कुंभ महापर्व प्रत्येक कुंभ नगर में 12 वर्ष बाद मुख्य रूप से बृहस्पति और सूर्य के कारण पड़ता है । हरिद्वार कुंभ में गुरु कुंभ राशि और सूर्य मेष राशि में आते हैं । सूर्य तो प्रत्येक वर्ष 14 अप्रैल को बैसाखी के अवसर पर एक महीने ले लिए मेषस्थ होते हैं , परंतु बृहस्पति 12 वर्ष के बाद एक वर्ष के लिए कुंभ राशि में आते हैं । सूर्य हर महीने राशि बदलते हैं जबकि बृहस्पति एक वर्ष में । फलस्वरूप कुंभ मेला बारह साल बाद भरता है । अब आश्चर्य की बात यह है कि छठे वर्ष जब बृहस्पति कुंभस्थ होते ही नहीं तो अर्द्धकुंभ कैसा ?

जाहिर है प्रयागराज के अर्धकुंभ का हरिद्वार में अनुसरण किया गया है । बगैर अखाड़ों के आए ही अर्धकुंभ सामान्य बैसाखी मेले की तरह बीत जाता था । यह भी आश्चर्य जनक है कि जिस प्रकार प्रयागराज कुंभ को बिना किसी शास्त्रीय आधार महाकुंभ नाम दे दिया गया , उसी प्रकार 2027 के हरिद्वार अर्धकुंभ को अब बिना किसी ज्योतिषीय अथवा शास्त्रीय आधार कुंभ नाम दिया गया है । प्रयागराज जाकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री। स्वयं यह घोषणा कर आए थे । अब अर्धकुंभ की बजाय कुंभ मनाने और चार शाही स्नान करने का फैसला विगत दिवस ले लिया गया ।
,,,,,कौशल सिखौला

स्वच्छ भूजल पर मंडराया धातु प्रदूषण का खतरा

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                                             बाल मुकुन्द ओझा

पिछले कुछ सालों से अनेक रिपोर्टों में यह स्वीकार किया गया कि भूजल में जहरीली धातुओं की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक पाई गई है, इसके बावजूद शुद्ध पानी के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया जो बेहद चिंताजनक है। यह भी स्वीकार किया है कि रसायनों या धातुओं का मानव शरीर और स्वास्थ्य पर बहुत गंभीर विषाक्त प्रभाव पड़ता है और स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा होता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की ग्राउंड क्वालिटी रिपोर्ट 2025 के मुताबिक देशभर में पंजाब में भूजल में यूरेनियम की मात्रा सर्वाधिक पाई गई है। इस प्रदेश में 62.50 सैम्पल सुरक्षित सीमा से अधिक मिले है, जो मानव जीवन के लिए खतरनाक है। पंजाब के बाद हरियाणा, दिल्ली, कर्नाटक और दिल्ली में भी यूरेनियम प्रदूषण तय मानक से अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार उत्तरपश्चिम भारत में पंजाब, हरियाणा  दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश यूरेनियम के हॉटस्पॉट के रूप में सामने आये है। वहीं फ्लोराइड प्रदूषण के मामलों में राजस्थान  देशभर में अव्वल है।

रिपोर्ट में बताया गया है यूरेनियम प्रदूषण के फलस्वरूप लोग पेयजल  सेवन से  बीमारियों के शिकार होते है जो बेहद चिंताजनक है। इससे पूर्व गत वर्ष  भारत सरकार ने संसद में स्वीकार किया था कि आज हम जो पानी पी रहे हैं वह जहर बन गया है। सरकार ने राज्यसभा में जो आंकड़े दिए थे वो न सिर्फ चौकाने वाले हैं बल्कि डराने वाले भी हैं। जहां भूजल में जहरीली धातुओं की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक पाई गई है। पानी में हानिकारक वस्तुओं के मिश्रण से ही जल प्रदूषित होता है। प्रदूषित जल का सबसे भयंकर प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सम्पूर्ण विश्व में प्रतिवर्ष एक करोड़ पचास लाख व्यक्ति प्रदूषित जल के कारण मृत्यु के शिकार हो जाते हैं तथा पांच लाख बच्चे मर जाते हैं। भारत में प्रति लाख लगभग 360 व्यक्तिओं की मृत्यु हो जाती है और अस्पतालों में भर्ती होने वाले रागियों में से 50 फसदी रोगी ऐसे होते है जिनके रोग का करण प्रदूषित जल होता है। अविकसित देशों की स्थिति और भी बुरी है। यहां 80 प्रतिशत रोगों की जड़ प्रदूषित जल है। 

हमारे देश के भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाईट्रेट, लोहा, कैडमियम, क्रोमियम, तांबा, निकल, सीसा, जस्ता व पारा जैसी भारी धातु का मिश्रण तेजी के साथ घुलता जा रहा है। जिससे जलजनित बीमारियां हमारे जीवन के लिए खतरा बन गई हैं। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की माने तो विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों और जल गुणवत्ता की निगरानी के दौरान केंद्रीय भूमि जल बोर्ड द्वारा तैयार भूमि जल गुणवत्ता के आंकड़े देश के विभिन्न राज्यों के भागों के अलग-अलग हिस्सों में भूमि जल संदूषण की पुष्टि कर रहे हैं। हालत यह हो गई है की लोग धीमे जहर वाले पानी को पीने के लिए विवश हैं। मंत्रालय का दावा है कि केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर इस चुनौती से निपटने के लिए संदूषित भूजल की समस्या और विशुद्ध जल के सेवन से प्रभावित नागरिकों के उपचार के लिए जागरूकता और जलजनित बीमारियों की रोकथाम के लिए योजनाएं भी चलाई जा रही हैं।

जल शक्ति मंत्रालय के एक दस्तावेज के अनुसार देश की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी को इसका पानी भूजल से मिलता है। दुनिया में उपलब्ध कुल जल में मात्र 0.6 फीसदी जल ही पीने योग्य है। यह पानी समुद्रों नदियों, तालाबों, झीलों और अन्य जल निकायों में मौजूद है। मानव सभ्यता के विकास के साथ हमारे जलस्रोत जबरदस्त प्रदूषण के शिकार हो रहे हैं। इनमें जल प्रदूषण मुख्य कारक है। जल प्रदूषण के कारण विभिन्न जलस्रोतों में जीवन के लिए जहर रूपी खतरनाक रसायनों के मिश्रण का घोल बन रहा है। हमारे देश में शुद्ध जल की प्राप्ति दूभर होती जा रही है। प्रदूषित के बाद संदूषित जल ने हमारे स्वास्थ्य और पाचन तंत्र को बिगाड़ कर रख दिया है। पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय की एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली द्वारा दिये आँकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 4 करोड़ ग्रामीण पीने के लिये धातु-संदूषित जल  का उपयोग करते हैं। जल में पाए जाने वाले प्रमुख भारी धातु फ्लोराइड, आर्सेनिक और नाइट्रेट हैं। आर्सेनिक संदूषण में बंगाल और राजस्थान शीर्ष पर हैं। जल जीवन का आवश्यक तत्व है। वनस्पति से लेकर जीव जन्तु अपने पोषक तत्वों की प्राप्ति जल के माध्यम से करते हैं। जीवन पानी पर निर्भर करता है। मनुष्य एवं प्राणियों के लिए पीने के पानी के स्त्रोत नदियाँ, सरिताएँ, झीलें, नलकूप आदि हैं। मानव पानी का उपयोग स्नान, धुलाई, उद्योग, सिंचाई, नेविगेशन, निर्माण कार्य आदि के लिए करता है यह हम सब जानते है। जल का दूषित होना मनुष्य के स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को  प्रभावित करता है ।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

28 नवंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएं:-

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आज का इतिहास


फर्डिनान्द मैगलन ने 1520 में प्रशांत महासागर को पार करने की शुरुआत की।
लंदन में द रॉयल सोसायटी का 1660 में गठन हुआ।
द टाइम्स ऑफ लंदन को 1814 में पहली बार स्वचालित प्रिंट मशीन से छापा गया।
पनामा ने 1821 में स्पेन से आजाद होने की घोषणा की।
डच सेना ने 1854 में बोर्नियो में चीनी विद्रोह को दबाया।
ब्रिटेन का खोजी वर्ने कैमरून 1875 में पश्चिमी अफ्रीका पहुँचा।
न्यूजीलैंड में राष्ट्रीय चुनाव में 1893 में पहली बार महिलाओं ने मतदान किया।
इस्माइल कादरी ने 1912 में तुर्की से अल्बानिया के आजाद होने की घोषणा की।
अमेरिका में जन्मी लेडी ऐस्टोर 1919 में हाउस ऑफ कऑमर्स की प्रथम महिला सदस्य चुनी गई।
फ्रांस और सोवियत संघ ने 1932 में अनाक्रमण समझौते पर हस्ताक्षर किया।
चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन-लाई 1956 में भारत दौरे पर आये।
मोरीटानिया ने 1960 में औपचारिक रुप से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की।
डोमनिकन रिपब्लिक ने 1966 में संविधान अपनाया।
वेस्टइंडीज के महान गेंदबाज माइकल होल्डिंग ने 1975 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट करियर का आगाज किया। इन्होंने 60 टेस्ट में 249 और 102 वनडे में 142 विकेट झटके।
कैप्टन इन्द्राणी सिंह 1996 में एयरबस ए-300 विमान को कमांड करने वाली पहली महिला बनीं।
28 नवंबर को जन्मे व्यक्ति:—-
प्रसिद्ध भारतीय चिकित्सक प्रमोद करण सेठी का जन्म 1927 में हुआ।
भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार व उपन्यासकार अमर गोस्वामी का जन्म 1945 में हुआ।
28 नवंबर को हुए निधन:—-
भारत के महान् विचारक, समाज सेवी तथा क्रान्तिकारी ज्योतिबा फुले का निधन 1890 में हुआ।
बास्केटबॉल के जनक जेम्स नैस्मिथ का निधन 1939 में हुआ।
महान भैतिकशास्त्री एनरिको फर्मी का निधन 1954 में हुआ।
बंगाल के प्रसिद्ध दृष्टिहीन गायक सी डे का निधन 1962 में हुआ।
हिन्दी के प्रसिद्ध नाटककार तथा सिनेमा कथा लेखक शंकर शेष का निधन 1981 में हुआ।
हिन्दी के प्रमुख उपन्यासकारों में से एक देवनारायण द्विवेदी का निधन 1989 में हुआ।
प्रसिद्ध मराठी फ़िल्म निर्माता-निर्देशक भालजी पेंढारकर का निधन 1994 में हुआ

निशान बचा है, नाम गायब है

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निशान बचा है, नाम गायब है
आलोक पुराणिक
वक्त क्या क्या दिखाता है साहब, एक वक्त के वीआईपी किसी दौर में इस कदर गुमनाम हो जाते हैं कि कोई नाम तक ना जानता।

हुमायूं टोंब के ठीक सामने एक मकबरानुमा भवन है, कोई दफन होंगे इसमें। कौन, नहीं पता।

निजामुद्दीन औलिया के आसपास जो भी दफन है, वह एक लेवल का वीआईपी ही रहा होगा, निजामुद्दीन की दरगाह के पास की जगह अपने अपने वक्तों के वीआईपी लोगों के लिए ही सुरक्षित थी। यूं यह वक्त का हिसाब रहा कि वीआईपी हज्जाम भी जगह पा गये इस इलाके में।

इस इलाके में कई छोटे बड़े मकबरे हैं, जिनमें दफन बंदों का कोई पता नहीं मिलता।

हुजूर आइये कभी घूम लीजिये इस इलाके में, बड़े बड़ों के नाम गायब हैं, काम में अगर दम है, तो वह जरुर आगे चला जाता है। शायरी बहुत लंबे वक्त तक आगे जाती है, शायर के नाम के साथ।

वाक ए दिल्ली की हेरिटेज-लिटरेचर वाक में सिर्फ इतिहास-लिटरेचर नहीं है, कुछ अध्यात्म है, कुछ उदासी है, कुछ बहुत कुछ है।

खैर नाम-निशां पर उस्ताद दाग का एक शेर सुनिये-

कोई नाम-ओ-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना
तख़ल्लुस ‘दाग़’ है वो आशिक़ों के दिल में रहते हैं

दाग़ देहलवी

-कासिद यानी पत्रवाहक

बात और भी हैं, वाक और भी हैं

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भुवनेश्वर में ओडिशा विधान सभा के सदस्यों को संबोधित किया

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उड़ीसा विधान सभा के सदस्यों के बीच राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ( फोटो पीबीआई)

भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने गुरूवार को भुवनेश्वर में ओडिशा विधान सभा के सदस्यों को संबोधित किया।राष्ट्रपति ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि ओडिशा तेज़ी से प्रगति कर रहा है। उन्होंने कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, जनजातीय और अन्य वंचित समूहों के विकास, आवास, आपदा प्रबंधन आदि क्षेत्रों में कई नई पहल करने के लिए ओडिशा सरकार की सराहना की। उन्हें यह जानकर खुशी हुई कि केंद्र और राज्य सरकारों के समन्वित प्रयासों से ओडिशा में औद्योगीकरण की प्रक्रिया एक नया आकार ले रही है।

ओडिशा विधानसभा के सदस्यों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति को पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। उन्होंने कहा कि कई वर्षों के बाद, इस जगह की पुरानी यादें ताज़ा हो गई हैं। एक विधायक के रूप में उन्होंने इस सदन में प्रश्न पूछे थे और एक मंत्री के रूप में उन्होंने विधायकों के प्रश्नों के उत्तर दिए थे।

राष्ट्रपति ने कहा कि ओडिशा ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस भूमि ने चंद्रशोक से धर्मशोक के रूप में परिवर्तन देखा है। उन्होंने आगे कहा कि ओडिशा के आदिवासी समुदायों ने विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष करके देश के लिए एक मिसाल कायम की है।

राष्ट्रपति ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ओडिशा में महिला सशक्तिकरण की एक प्राचीन परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि यह गर्व की बात है कि ओडिशा विधानसभा में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का एक लंबा इतिहास रहा है। आज़ादी से पहले और बाद में, ओडिशा में ऐसी कोई विधानसभा नहीं रही जहाँ महिलाओं का प्रतिनिधित्व न रहा हो। उन्होंने कहा कि ओडिशा की महिलाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करके देश को गौरवान्वित किया है।

राष्ट्रपति ने कहा कि ओडिशा के गठन की शताब्दी 2036 में मनाई जाएगी। यदि सभी हितधारक 2036 तक समृद्ध ओडिशा के निर्माण के लिए मिलकर काम कर सकें, तो यह 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने में ओडिशा का सबसे बड़ा योगदान होगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सभी लोग ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना के साथ काम करेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि विधायक जनता के प्रतिनिधि होते हैं। ओडिशा की जनता को उनसे अपार आशा और विश्वास है और उन्होंने उन्हें एक बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी है। सभी विधायकों का कर्तव्य है कि वे नागरिकों की उम्मीदों पर खरा उतरें, उनके सपनों को साकार करें और उनके चेहरों पर मुस्कान लाएँ।

राष्ट्रपति ने कहा कि प्रकृति ने ओडिशा को हर प्रकार की सम्पदा से नवाज़ा है। यहाँ प्रचुर मात्रा में खनिज भंडार, वन और जल संसाधन के साथ-साथ मानव संसाधन भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। ओडिशा का पर्यावरण कृषि, उद्योग और वाणिज्य के विकास के लिए अत्यंत अनुकूल है। इन सभी लाभों का लाभ उठाकर, ओडिशा को देश का अग्रणी राज्य बनाया जा सकता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि यह तकनीक का युग है। जनप्रतिनिधि होने के नाते, विधायकों के अनेक प्रशंसक और अनुयायी होते हैं। वे यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि वे क्या कहते हैं और क्या करते हैं। उनके शब्द और आचरण, दोनों ही अमूल्य हैं। विधायक सदन के अंदर और बाहर क्या कहते हैं और कैसे कहते हैं, यह सभी जानते हैं। उन्होंने कहा कि उनका आचरण और वचन ऐसे होने चाहिए कि उनका अनुसरण करके उनके प्रशंसक और अनुयायी समाज और राज्य के निर्माण में योगदान दे सकें।इस अवसर पर उन्होंने भुवनेश्वर परिसर स्थित राजभवन परिसर में नवनिर्मिर्त अथिति गृह कलंग अतिथि निवास का भी उदघाटन किया।

असम विधानसभा ने बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने वाला बिल पारित

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असम विधानसभा ने गुरुवार को बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने वाला बिल पास कर दिया। इसे असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025 नाम दिया गया। इस विधेयक के तहत दोषी को 10 साल तक की सजा हो सकती है। एसटी समुदाय और छठी अनुसूची क्षेत्र को इससे बाहर रखा गया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने दोबारा सीएम बनने पर यूसीसी लागू करने और फरवरी तक लव-जिहाद पर बिल लाने का भी वादा किया। मुख्यमंत्र ने इसे महिलाओं को सशक्त करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया । आश्वासन दिया कि अगर वह अगले कार्यकाल में फिर से मुख्यमंत्री बनते हैं तो राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) लागू किया जाएगा।

गुरुवार को पारित इस बिल में साफ किया गया है कि यह कानून सभी समुदायों पर लागू होगा। हालांकि, अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लोगों और छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। मुख्यमंत्री सरमा ने साफ कहा कि बिल किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है और इसका उद्देश्य सभी समाजों में समानता और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। बहस के दौरान सरमा ने कहा कि बहुविवाह सिर्फ मुस्लिम समाज तक सीमित नहीं है, हिंदू समाज में भी ऐसे मामले मिलते हैं और कानून सभी पर समान रूप से लागू होगा। उन्होंने कहा कि इसे इस्लाम-विरोधी बिल बताने वाली धारणाएं गलत हैं। सीएम ने विपक्ष से आग्रह किया कि वे संशोधन प्रस्ताव वापस लें ताकि पूरा सदन एकमत होकर महिलाओं की सुरक्षा के लिए मजबूत संदेश दे सके। सरकार की अपील के बावजूद एआईयूडीएफ और सीपीआई(एम) ने अपने संशोधन प्रस्ताव वापस नहीं लिए। वोटिंग के दौरान उनके प्रस्तावों को अल्पमत के कारण खारिज कर दिया गया। सरकार ने इसे महिलाओं के हित में लाया गया सामाजिक सुधार बताया, जबकि विपक्ष ने कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाए।

यूसीसी लागू करने का वादा
सरमा ने सदन में घोषणा की कि अगर अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद वह फिर मुख्यमंत्री बनते हैं तो नए कार्यकाल के पहले सत्र में ही यूसीसी बिल पेश किया जाएगा और उसे लागू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि बहुविवाह पर रोक यूसीसी की दिशा में एक मजबूत कदम है।

हम शांति चाहते हैं, लेकिन अपनी सीमाओं और नागरिकों की रक्षा के लिए तैयार हैंःराष्ट्रपति मुर्मु

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नई दिल्ली — राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए इसे भारत की सैन्य ताकत और आतंकवाद-रोधी रणनीति का एक निर्णायक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने न केवल भारत की सैन्य क्षमता और तत्परता को साबित किया है, बल्कि यह दिखाया है कि जब देश की संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा की बात हो, तो भारत दृढ़ता व जिम्मेदारी के साथ कार्रवाई करने में सक्षम है।राष्ट्रपति ने कहा, “हम शांति चाहते हैं, लेकिन अपनी सीमाओं और नागरिकों की रक्षा के लिए तैयार हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि हमारी कूटनीति, अर्थव्यवस्था और सशस्त्र बल — मिलकर एक ऐसा भारत प्रस्तुत करते हैं जो मजबूत, सुरक्षित और न्यायपूर्ण है।

राजधानी के मानेकशॉ सेन्टर में आयोजित चाणक्य डिफेंस डायलॉग 2025 के तीसरे संस्करण का बुधवार को राष्ट्राध्यक्ष द्रौपदी मुर्मू ने मुख्य अतिथि के रूप में भव्य उद्घाटन किया। इस मौके पर देश के शीर्ष सैन्य अधिकारी, रक्षा विशेषज्ञ, थिंक-टैंक, नीति आयोग, प्रशासनिक तथा स्थनीय प्रतिनिधि, अंतरराष्ट्रीय मेहमान तथा पत्रकार मौजूद थे — जिससे यह कार्यक्रम रक्षा एवं राष्ट्रीय सुरक्षा पर विचार-विमर्श का एक प्रमुख मंच बन गया।

चाणक्य डिफेंस डायलॉग का यह संस्करण 27–28 नवंबर 2025 को “Reform to Transform – सशक्त, सुरक्षित एवं विकसित भारत” के थीम के साथ आयोजित किया गया है। इस मंत्र के अंतर्गत रक्षा व्यवस्थाओं में सुधार, आत्मनिर्भरता, भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए रणनीतिक बदलाव, आधुनिक युद्ध-तकनीक, इंडो-पैसिफिक सुरक्षा, साइबर व स्पेस रक्षा, थ्रेड कमांड संरचनाएं व संयुक्त ऑपरेशनल क्षमता आदि पर व्यापक चर्चा होगी।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने डायलॉग के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि यह डायलॉग राष्ट्र की रक्षा संरचनाओं तथा सामरिक दृष्टिकोण के विस्तार में अहम भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि “भारत अब केवल संध्यात्मक चुनौती नहीं देखता, बल्कि नए युद्ध, आतंकवाद, उग्रवाद, मानवीय तथा हाइब्रिड खतरों का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है।


डायलॉग में शामिल अधिकांश वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, रणनीतिक विश्लेषक, रक्षा विशेषज्ञ और नीति-निर्धारक इस अवसर पर उपस्थित थे। सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी सहित तीनों सेनाओं के उच्च अधिकारी एवं रक्षा सचिव, थिंक-टैंक प्रतिनिधि, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ एवं नीति आयोग के नेता डायलॉग के सत्रों में भाग ले रहे थे।

डायलॉग के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि आज की बदलती भू-राजनीतिक स्थिति, तकनीकी चुनौतियाँ, साइबर व स्पेस असब्यूरिटीज, सीमा संघर्ष, आतंकवाद व हाइब्रिड युद्धों जैसी चुनौतियों के बीच भारत को अपनी रणनीति, हथियार-प्रणाली, जानकारी एवं कूटनीतिक दृष्टिकोण को और मजबूत करना होगा। “रिफॉर्म से ही ट्रांसफॉर्मेशन संभव है” — यह इस डायलॉग का मूल संदेश रहा।

राष्ट्रपति ने सम्मानित सशस्त्र बलों की मौजूदगी की भी सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने हर चुनौती में पेशेवराना दक्षता, अनुशासन और देशभक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण दिया है — चाहे वह पारंपरिक युद्ध हो, आतंकवाद-रोधी अभियान हो या मानवीय सहायता।

द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन में वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत का दृष्टिकोण “वसुधैव कुटुंबकम” — अर्थात् सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानने — पर आधारित है। इसके बावजूद, देश को अपनी सीमाओं, स्वाभिमान और नागरिकों की रक्षा के प्रति सजग रहना होगा। ऑपरेशन सिंदूर ने यही दिखाया है कि भारत न केवल सुरक्षा की दृष्टि से मजबूत है, बल्कि शांति की उसकी प्रतिबद्धता भी स्पष्ट है।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की कूटनीति, अर्थव्यवस्था और सशस्त्र-बल मिलकर इसे 21वीं सदी का जिम्मेदार, मजबूत और विश्वस्तरीय सुरक्षा-निगमित देश बनाने की दिशा में अग्रसर कर रहे हैं।

चाणक्य डिफेंस डायलॉग 2025 में कई सत्र आयोजित होंगे जिनमें स्वदेशी रक्षा उत्पादन, हाइब्रिड व साइबर सुरक्षा, मल्टी-डोमेन थियेटर कमांड, इंडो-पीसिफिक रणनीति, सामरिक कूटनीति, संयुक्त रक्षा और बाह्य चुनौतियों पर भारत की तैयारियों पर चर्चा होगी। इसके अतिरिक्त, आतंकवाद-रोधी रणनीति, सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास व नागरिक सुरक्षा, मानवीय एवं राहत अभियानों में सशस्त्र बलों की भूमिका, और रक्षा संरचनाओं में लॉजिस्टिक-आधार, टेक्नोलॉजी एवं संयुक्तता जैसे विषय शामिल होंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस डायलॉग के बाद भारत की रणनीतिक दिशा और स्पष्ट होगी — जो न केवल भारत के रक्षा तंत्र को मजबूत करेगी, बल्कि उसे एक प्रतिस्पर्धात्मक, आधुनिक और जवाबदेह वैश्विक शक्ति की भूमिका में और मजबूती से स्थापित करेगी।

चाणक्य डिफेंस डायलॉग 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का संबोधन — विशेषकर ऑपरेशन सिंदूर को लेकर — भारत के लिए एक आत्म-विश्वास और दृढ़ संकल्प का संदेश रहा। यह बयान इस बात का संकेत है कि भारत अपनी रक्षा, सुरक्षा और विदेश नीति में अस्थिरता या डर के बजाय, रणनीति, तैयारी और नैतिक समर्पण के साथ आगे बढ़ रहा है।

इस डायलॉग से यह उम्मीद की जा रही है कि भारत न केवल आधुनिक आतंकवाद, हाइब्रिड चुनौतियों और भू-राजनीतिक उतार-चढ़ावों से निपटने में सक्षम बनेगा, बल्कि वैश्विक रूप से शांति, स्थिरता और जवाबदेही के साथ अपनी भूमिका को और मजबूती से निभाएगा।

जैन संतों की शिक्षाएं आज भी मानवता के लिए मार्गदर्शकःयोगी आदित्यनाथ

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पार्श्वनाथ जैन मंदिर गाजियाबाद में मुख्समंत्री योगी आदित्यनाथ


गाजियाबाद। पार्श्वनाथ जैन मंदिर परिसर सोमवार को उस समय भक्तिमय और उत्साहपूर्ण वातावरण से गूंज उठा, जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ “जीत” कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे। सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त, स्वागत नारों और जैन समुदाय के गरिमामय आयोजन के बीच मुख्यमंत्री योगी का आगमन पूरे क्षेत्र के लिए आकर्षण का केंद्र रहा। कार्यक्रम में प्रदेश के मंत्रियों, जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और बड़ी संख्या में जैन समाज के लोगों ने भाग लिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ

सुबह लगभग 11 बजे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पार्श्वनाथ जैन मंदिर पहुंचे, जहां जैन मुनियों ने उन्हें शाल ओढ़ाकर और मंगल सूत्र प्रदान कर विशेष स्वागत किया। मंदिर परिसर को रंग-बिरंगी सजावट, फूलों की बंदनवार और पवित्र प्रतीकों से सजाया गया था। “जीत” कार्यक्रम की शुरुआत नमस्कार महामंत्र और शांतिपाठ के साथ हुई, जिसमें सभी उपस्थितजनों ने सामूहिक रूप से सहभागिता की। इसके बाद जैन धर्माचार्यों ने कार्यक्रम की महत्ता और जैन दर्शन में ‘जीत’ यानी आत्मविजय की अवधारणा को विस्तृत रूप से समझाया।

मुख्यमंत्री योगी ने अपने संबोधन में जैन समुदाय द्वारा समाज के नैतिक उत्थान, अहिंसा, सत्य और संयम की परंपरा को विशेष रूप से सराहा। उन्होंने कहा कि जैन संतों की शिक्षाएं आज के समय में मानवता के लिए मार्गदर्शक हैं। योगी ने कहा कि “जैन समाज ने हमेशा राष्ट्र निर्माण, व्यापारिक ईमानदारी, शिक्षा और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आत्मविजय का मार्ग ही समाज को सही दिशा देता है, और यही संदेश ‘जीत’ कार्यक्रम पूरे देश को देता है।”

उन्होंने आगे कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार सबके लिए समान अवसर के सिद्धांत पर काम कर रही है। “हमारा संकल्प है कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था, विकास और अवसंरचना के क्षेत्र में ऐतिहासिक परिवर्तन लाया जाए। जिस प्रकार जैन समाज शुचिता और अनुशासन का पालन करता है, वही भावना यदि समाज के हर वर्ग में आए तो देश को विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता,” मुख्यमंत्री ने कहा।

मुख्यमंत्री योगी ने पार्श्वनाथ भगवान की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि जैन धर्म की अहिंसा और करुणा की शक्ति मानवता को जोड़ने का कार्य करती है। उन्होंने बताया कि जैन दर्शन में ‘जीत’ का अर्थ बाहरी प्रतिस्पर्धा से प्राप्त विजय नहीं बल्कि अपने अंदर के लोभ, मोह, क्रोध और अहंकार पर विजय पाना है। मुख्यमंत्री ने युवा पीढ़ी से आह्वान किया कि वे इस आध्यात्मिक संदेश को अपने जीवन में अपनाएं और समाज को सकारात्मक दिशा देने में योगदान दें।

उन्होंने जैन संतों से आशीर्वाद लेते हुए कहा कि सरकार धार्मिक स्थलों के संरक्षण और आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार कई धार्मिक केंद्रों को विकसित कर रही है ताकि भारत की संस्कृति और अध्यात्मिक धरोहर को विश्व स्तर पर पहचान मिले।

कार्यक्रम के दौरान जैन समाज ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को समाज के विभिन्न संगठनों की ओर से अभिनंदन पत्र और स्मृति चिह्न प्रदान किया। जैन समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी के कार्यकाल में प्रदेश में धार्मिक सौहार्द और विकास की गति मजबूत हुई है। कई वक्ताओं ने जैन समुदाय के हित में लिए गए निर्णयों के लिए मुख्यमंत्री का धन्यवाद किया।

कार्यक्रम में जैन समाज के युवा और महिला मंचों ने भी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं, जिनमें जैन धर्म की शिक्षाओं और भगवान पार्श्वनाथ के जीवन पर आधारित लघु प्रस्तुतियां शामिल थीं। मंदिर परिसर में लगाए गए प्रदर्शनी स्टॉल में जैन इतिहास, जैन साहित्य और पर्यावरण संरक्षण पर आधारित सामग्री को लोगों ने विशेष रुचि से देखा।

मुख्यमंत्री योगी ने इस अवसर पर गाजियाबाद को लेकर कई विकास योजनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में सड़क, स्वास्थ्य, जल प्रबंधन और यातायात सुधार को लेकर बड़े स्तर पर कार्य चल रहे हैं। उन्होंने बताया कि सरकार का लक्ष्य है कि गाजियाबाद को NCR का एक मॉडल जिला बनाया जाए जहां नागरिक सुविधाएं और सुरक्षा दोनों उच्च स्तर पर हों।

मुख्यमंत्री ने कहा कि “हमारी सरकार का फोकस बिना भेदभाव के विकास पर है। प्रदेश की प्रगति ही राष्ट्र की प्रगति है। जैन समाज जैसे अनुशासित और शांतिप्रिय समाज की भागीदारी से प्रदेश में सकारात्मक परिवर्तन निश्चित रूप से और भी तेजी से होगा।”

कार्यक्रम के अंत में जैन धर्माचार्यों ने मुख्यमंत्री योगी को शुभाशीर्वाद दिया और समाज के कल्याण के लिए प्रार्थना की। मुख्यमंत्री ने मंदिर में दर्शन कर प्रदेश की शांति, समृद्धि और सौहार्द की कामना की। “जीत” कार्यक्रम आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत सफल रहा और जैन समाज तथा स्थानीय नागरिकों के लिए यह दिन लंबे समय तक स्मरणीय रहेगा।

मधुशाला लिखकर अमर हो गए हरिवंश राय बच्चन

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हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के उन अमर कवियों में गिने जाते हैं जिन्होंने कविता की संवेदनशीलता, सौंदर्य और जीवन-दर्शन को एक नई ऊँचाई दी। उनकी कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि हृदय की अनुभूति, जीवन का संगीत और आत्मा का उभार है। वे हिंदी की प्रगतिशील और प्रयोगवादी काव्यधारा के अग्रणी स्तंभों में रहे। बच्चन की कृतियों में जहां एक ओर व्यक्तिगत पीड़ा और भावनाओं का गहन चित्रण मिलता है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक चेतना, जीवन की सच्चाइयाँ और मानव-मन की जद्दोजहद भी परिलक्षित होती है। उनकी साहित्यिक यात्रा एक ऐसे कवि की गाथा है जिसने हिंदी कविता को आम जन तक पहुँचाने के लिए सरल, मधुर और गीतात्मक भाषा का अनोखा प्रयोग किया।

हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर 1907 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के एक मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार में हुआ। उनका परिवार साधारण अवश्य था, लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न था। उनके पिता प्रताप नारायण श्रीवास्तव एक जागरूक और संवेदनशील व्यक्ति थे, जिनके संस्कारों ने बच्चन के व्यक्तित्व को गहराई प्रदान की। बच्चन ने प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालयों से प्राप्त की और आगे चलकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पूरी की। बचपन से ही वे साहित्य और कला के प्रति विशेष आकर्षित थे। वे अक्सर कविताएँ लिखते और मुशायरों तथा कवि-सम्मेलनों में भाग लेते थे।

हरिवंश राय बच्चन की प्रारंभिक कविताओं में व्यक्तिगत अनुभवों और प्रेम वेदना का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। प्रथम पत्नी श्यामा के असामयिक निधन ने उनके हृदय को गहराई से तोड़ा, जिसका असर उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही वजह है कि उनकी सुप्रसिद्ध रचना मधुशाला जन्म ले सकी। 1935 में प्रकाशित मधुशाला हिंदी साहित्य के इतिहास में एक क्रांतिकारी कृति साबित हुई। इसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि लोगों ने इसे केवल कविता के रूप में नहीं बल्कि जीवन-दर्शन के रूप में अपनाया। रचना में प्रयुक्त प्रतीकों—हाला, प्याला, साकी—के माध्यम से उन्होंने जीवन के आनंद, संघर्ष, मोह, त्याग और मृत्यु की गहरी व्याख्या की। यह रचना आज भी युगों-युगों तक जीवित है और हर पीढ़ी को नई व्याख्याएँ देती है।

बच्चन की प्रमुख कृतियों में मधुकलश, मधुबाला, खादी के फूल, निशा निमंत्रण, सतरंगिनी, प्रणय-पंचमी, आरती और अंगारे प्रमुख हैं। उनकी कविताओं में दर्शन, अनुभूति और भावनाओं का ऐसा सामंजस्य मिलता है जो पाठक के हृदय को सीधे स्पर्श करता है। वे छायावाद से प्रभावित अवश्य थे, लेकिन उन्होंने अपनी कविता को छायावाद की कल्पनाशीलता से आगे बढ़ाकर यथार्थ और आधुनिकता की राह पर डाला। यही कारण है कि उन्हें हिंदी कविता में “नवगीत” आंदोलन का अग्रदूत भी माना जाता है।

उनकी भाषा सरल, लयात्मक और प्रवाहमयी होती थी। बच्चन ने कविता को जटिल बनाने के बजाय सरल और गेय बनाया ताकि सामान्य व्यक्ति भी उसे समझ सके और आत्मसात कर सके। यही गुण उनकी लोकप्रियता का मुख्य आधार बने। उनकी कविता में संगीतात्मकता इतनी सहज है कि कई रचनाएँ स्वयं ही गीत का रूप ले लेती हैं। बच्चन स्वयं भी एक उत्कृष्ट पाठक थे; उनके कविता-पाठ कार्यक्रमों का आकर्षण पूरे देश में था।

साहित्यिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के साथ-साथ हरिवंश राय बच्चन शिक्षक और अनुवादक के रूप में भी अत्यंत सफल रहे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी साहित्य के लेक्चरर के रूप में वर्षों तक कार्य किया। साहित्य के छात्र उन्हें अत्यंत सम्मान और प्रेम से देखते थे। बाद में वे भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में राजनयिक पद पर भी कार्यरत रहे। इसके अलावा उन्होंने शेक्सपीयर की कई कृतियों का हिंदी अनुवाद किया, जिनमें हैमलेट, मैकबेथ और ओथेलो प्रमुख हैं। उनके अनुवाद न केवल साहित्यिक दृष्टि से श्रेष्ठ हैं, बल्कि मूल कृति की आत्मा को जीवंत रखते हुए हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का एक सफल प्रयास भी हैं।

हरिवंश राय बच्चन की निजी जिंदगी भी संघर्षों और अनुभवों से भरी रही। प्रथम पत्नी श्यामा के निधन के बाद 1941 में उन्होंने तेजस्विनी बच्चन से विवाह किया, जो अपने आप में एक शिक्षित, मजबूत और प्रेरणादायक व्यक्तित्व थीं। उनके दो पुत्र—अमिताभ बच्चन और अजिताभ बच्चन—भारत के जाने-माने व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं। प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन हरिवंश राय बच्चन को अपना सबसे बड़ा आदर्श मानते थे और अक्सर कहते थे कि उनके पिता ने उन्हें जीवन से प्रेम करना और संघर्ष से कभी न घबराना सिखाया।

बच्चन को उनके साहित्यिक योगदान के लिए कई महत्वपूर्ण पुरस्कार मिले। उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा साहित्य अकादमी पुरस्कार, Soviet Land Nehru Award और कई अन्य सम्मान उन्हें प्राप्त हुए। 1969 में प्रकाशित उनकी आत्मकथा क्या भूलूँ क्या याद करूँ ने उन्हें नई पहचान दी। यह आत्मकथा श्रृंखला चार भागों में है, और हिंदी साहित्य की श्रेष्ठ आत्मकथाओं में गिनी जाती है। इसमें केवल उनके जीवन का वर्णन नहीं, बल्कि उस समय के साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक माहौल का रोचक और सजीव चित्रण भी मिलता है।

बच्चन का जीवन 18 जनवरी 2003 को समाप्त हुआ, लेकिन उनका साहित्य सदैव जीवित रहेगा। उनकी कविताएँ समय की धारा को पार करती हुई आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके लिखे जाने के समय थीं। मधुशाला जैसी कृति अनंत काल तक हिंदी साहित्य के गौरव का प्रतीक बनी रहेगी। बच्चन ने साहित्य को आम जन के करीब लाया और कविता को जन-जन की भाषा बनाया। उनकी रचनाएँ हमें जीवन को समझने, महसूस करने और अपनाने की प्रेरणा देती हैं।

हरिवंश राय बच्चन वास्तव में उन महान कवियों में से हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य को एक नई पहचान, नई दिशा और नया स्वरूप दिया। उनकी कविता केवल लिखी नहीं जाती, वह गाई जाती है, जी जाती है और महसूस की जाती है। यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है, और यही कारण है कि वे हिंदी साहित्य के ‘अमर गायक कवि’ कहे जाते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हैदराबाद में स्काईरूट के इन्फिनिटी कैंपस का उद्घाटन किया

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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हैदराबाद, तेलंगाना में स्काईरूट के इन्फिनिटी कैंपस का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि आज देश अंतरिक्ष क्षेत्र में एक अभूतपूर्व अवसर का साक्षी बन रहा है और इस बात पर प्रकाश डाला कि निजी क्षेत्र की बढ़ती लोकप्रियता के साथ भारत का अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र एक बड़ी छलांग लगा रहा है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि स्काईरूट का इन्फिनिटी कैंपस भारत की नई सोच, नवाचार और युवा शक्ति को दर्शाता है, और इस बात पर ज़ोर दिया कि देश के युवाओं का नवाचार, जोखिम उठाने की क्षमता और उद्यमशीलता नई ऊँचाइयों को छू रही है। श्री मोदी ने कहा कि आज का कार्यक्रम इस बात का प्रतिबिंब है कि आने वाले समय में भारत वैश्विक उपग्रह प्रक्षेपण पारिस्थितिकी तंत्र में कैसे एक अग्रणी के रूप में उभरेगा। उन्होंने श्री पवन कुमार चंदना और श्री नागा भरत डाका को अपनी शुभकामनाएँ दीं और कहा कि ये दोनों युवा उद्यमी देश भर के अनगिनत युवा अंतरिक्ष उद्यमियों के लिए प्रेरणा हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि दोनों ने खुद पर भरोसा रखा, जोखिम लेने से पीछे नहीं हटे और परिणामस्वरूप आज पूरा देश उनकी सफलता का गवाह बन रहा है, और देश उन पर गर्व महसूस कर रहा है।

श्री मोदी ने इस बात का ज़िक्र किया कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा सीमित संसाधनों के साथ शुरू हुई थी, लेकिन इस बात पर ज़ोर दिया कि देश की महत्वाकांक्षाएँ कभी सीमित नहीं रहीं। उन्होंने कहा कि साइकिल पर रॉकेट के पुर्जे ढोने से लेकर दुनिया के सबसे विश्वसनीय प्रक्षेपण यान विकसित करने तक, भारत ने साबित कर दिया है कि सपनों की ऊँचाई संसाधनों से नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प से तय होती है। प्रधानमंत्री ने कहा, “इसरो ने दशकों से भारत की अंतरिक्ष यात्रा को नए पंख दिए हैं और इस बात पर ज़ोर दिया है कि विश्वसनीयता, क्षमता और मूल्य ने इस क्षेत्र में भारत की विशिष्ट पहचान स्थापित की है।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत के पास अंतरिक्ष क्षेत्र में ऐसी क्षमताएँ हैं जो दुनिया के कुछ ही देशों के पास हैं। इसमें विशेषज्ञ इंजीनियरों की मौजूदगी, उच्च-गुणवत्ता वाला विनिर्माण तंत्र, विश्व-स्तरीय प्रक्षेपण स्थल और नवाचार को प्रोत्साहित करने वाली मानसिकता शामिल है।” उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भारत की अंतरिक्ष क्षमता लागत-प्रभावी और विश्वसनीय दोनों है, यही वजह है कि दुनिया को देश से बहुत उम्मीदें हैं। उन्होंने कहा कि वैश्विक कंपनियाँ भारत में उपग्रहों का निर्माण करना चाहती हैं, भारत से प्रक्षेपण सेवाएँ प्राप्त करना चाहती हैं और भारत के साथ तकनीकी साझेदारी करना चाहती हैं, इसलिए इस अवसर का भरपूर लाभ उठाने पर ज़ोर दिया।

प्रधानमंत्री ने हर युवा, हर स्टार्टअप, वैज्ञानिक, इंजीनियर और उद्यमी को भरोसा दिलाया कि सरकार हर कदम पर उनके साथ मजबूती से खड़ी है। उन्होंने एक बार फिर पूरी स्काईरूट टीम को बधाई दी और भारत की अंतरिक्ष यात्रा को नई गति देने वाले सभी लोगों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने अंत में सभी से 21वीं सदी को भारत की सदी बनाने का आह्वान किया, चाहे वह धरती पर हो या अंतरिक्ष में।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री श्री जी किशन रेड्डी सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

पृष्ठभूमि

भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप स्काईरूट का इन्फिनिटी कैम्पस एक अत्याधुनिक सुविधा है। इसमें लगभग 200,000 वर्ग फुट का कार्यक्षेत्र है, जिसमें बहु-प्रक्षेपण वाहनों के डिजाइन, विकास, एकीकरण और परीक्षण के लिए हर महीने एक कक्षीय रॉकेट बनाने की क्षमता है। 

स्काईरूट भारत की अग्रणी निजी अंतरिक्ष कंपनी है, जिसकी स्थापना पवन चंदना और भरत ढाका ने की है, जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के पूर्व छात्र और इसरो के पूर्व वैज्ञानिक हैं और अब उद्यमी बन गए हैं। नवंबर 2022 में, स्काईरूट ने अपना सब-ऑर्बिटल रॉकेट, विक्रम-एस, लॉन्च किया, जिससे वह अंतरिक्ष में रॉकेट लॉन्च करने वाली पहली भारतीय निजी कंपनी बन गई।

निजी अंतरिक्ष उद्यमों का तेजी से उदय पिछले कुछ वर्षों में सरकार द्वारा किए गए परिवर्तनकारी सुधारों की सफलता का प्रमाण है, जिससे एक आत्मविश्वासी और सक्षम वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति के रूप में भारत का नेतृत्व मजबूत हुआ है।