केंद्रीय रेल, सूचना एवं प्रसारण, तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव और केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने आज जैसलमेर स्टेशन से नई जैसलमेर-दिल्ली (शकूर बस्ती) रेल सेवा की विशेष ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।
यह नई सेवा उन्नत चिकित्सा और शैक्षिक सुविधाओं तक आसान पहुँच प्रदान करेगी, प्रमुख पर्यटन स्थलों से संपर्क में सुधार लाएगी और आसपास के क्षेत्रों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देगी। एक विश्वसनीय और सुविधाजनक यात्रा विकल्प प्रदान करके यह ट्रेन निवासियों, पर्यटकों, छात्रों और व्यवसायों सभी को समान रूप से लाभान्वित करेगी और क्षेत्रीय गतिशीलता और विकास को मज़बूत करेगी।
श्री वैष्णव ने बताया कि 2014 से पहले राजस्थान के लिए वार्षिक बजट आवंटन केवल लगभग 680 करोड़ रुपये था जो अब बढ़कर लगभग 10,000 करोड़ रुपये हो गया है। पोकरण स्टेशन पर रेल सुविधाओं के बारे में उन्होंने कहा कि रामदेवरा-पोकरण वाया भैरव गुफा और कैलाश टेकरी नई रेल लाइन का निर्माण पूरा होने के बाद इस स्टेशन पर सभी ट्रेनें रुकेंगी। उन्होंने अधिकारियों को इस लाइन का काम त्वरित गति से करने के निर्देश भी दिए।
श्री वैष्णव ने जैसलमेर स्टेशन पर द्वितीय प्रवेश द्वार के निर्माण की भी घोषणा की। उन्होंने अधिकारियों को कोचिंग डिपो के निर्माण कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए ताकि जैसलमेर से और अधिक रेलगाड़ियाँ संचालित की जा सकें।
श्री वैष्णव ने जैसलमेर स्टेशन के पुनर्विकास के बारे में कहा कि इसका कायाकल्प 140 करोड़ रुपये की लागत से पूरा हो चुका है। उन्होंने कहा कि राजस्थान में लगभग 4,000 करोड़ रुपये के निवेश से 85 स्टेशनों का पुनर्विकास कार्य प्रगति पर है। राजस्थान में रेलवे के बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करने के लिए, छह जोड़ी वंदे भारत ट्रेनें और एक जोड़ी अमृत भारत ट्रेन सहित अन्य सेवाएँ संचालित की जा रही हैं और पिछले छह महीनों में इस ट्रेन सहित आठ नई ट्रेनें शुरू की गई हैं। उन्होंने जैसलमेर और जोधपुर के बीच ट्रैक नवीनीकरण कार्य को प्राथमिकता से करने के भी निर्देश दिए।
श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कार्यक्रम के दौरान श्री अश्विनी वैष्णव का आभार व्यक्त किया। इस कार्यक्रम में सांसद श्री उम्मेदा राम बेनीवाल, पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री श्री कैलाश चौधरी और विधायक श्री छोटू सिंह ने भी अपने संबोधन में नई रेल सेवा और रेलवे विकास कार्यों के लिए श्री अश्विनी वैष्णव का आभार व्यक्त किया।
ऑस्ट्रेलियाई पीएम एंथनी अल्बनीज ने दोबारा शादी रचाई है। इस पद पर रहते हुए शादी करने वाले वे ऑस्ट्रेलिया के पहले प्रधानमंत्री बने ।वैलेंटाइन डे पर जोडी हेडन के सामने प्रस्ताव रखने के यह शादी करीब एक साल बाद हुई। दोनों ने अपने खुद के लिखे वचन पढ़े और सिविल अधिकारी ने विवाह की औपचारिकताएं पूरी कराईं। 62 वर्षीय अल्बनीज और 46 वर्षीय हेडन ने राजधानी कैनबरा स्थित प्रधानमंत्री आवास द लॉज के बगीचे में एक निजी समारोह में शादी की।
इस समारोह में सिर्फ परिवार के सदस्य और कुछ करीबी दोस्त शामिल थे। शादी के बाद जारी बयान में अल्बनीज ने कहा, ‘हम बहुत खुश हैं। अपने परिवार और करीबी लोगों की मौजूदगी में हमने साथ रहने का वादा किया है।’
ऑस्ट्रेलियाई पीएम अल्बनीज ने सोशल मीडिया एक्स पर सिर्फ एक शब्द- विवाहित – लिखकर अपनी शादी की झलक साझा की। वीडियो में वे बो-टाई सूट में दिखाई दिए, जबकि हेडन सफेद शादी के गाउन में मुस्कुराती नजर आईं। जैसे ही दोनों ने हाथ पकड़ा, उन पर कंफेटी बरसी।
रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने युवा नागरिक सेवकों से राष्ट्रीय हितों की रक्षा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को समझने और वीर सैनिकों की तरह ही ऐसी कठिन परिस्थितियों के लिए सदैव तैयार रहने का आह्वान किया। रक्षामंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूरनागरिक-सैन्य समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां प्रशासनिक मशीनरी ने सशस्त्र बलों के साथ मिलकर महत्वपूर्ण सूचनाओं का संचार किया और जनता का विश्वास जीता। रक्षा मंत्री ने 29 नवंबर, 2025 को उत्तराखंड के मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (एलबीएसएनएए) में 100वें कॉमन फाउंडेशन कोर्स के समापन समारोह को संबोधित करते हुए यह विचार व्यक्त किए।
रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, सशस्त्र बलों ने संतुलित और बिना किसी उकसावे के जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान और पीओके में आतंकी शिविरों को नष्ट कर दिया, लेकिन पड़ोसी देश के दुर्व्यवहार के कारण ही सीमा पर स्थिति सामान्य नहीं हो पाई। उन्होंने सैनिकों की वीरता की सराहना की और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किए गए कार्यों की भी सराहना करते हए कहा कि उन्होंने महत्वपूर्ण सूचनाओं का संचार किया और देश भर में मॉक ड्रिल का सफल संचालन सुनिश्चित किया। रक्षा मंत्री ने वर्ष 2047 तक देश को विकसित भारत बनाने के लिए शासन और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच बेहतर समन्वय पर बल दिया।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ और ‘सुधार, प्रदर्शन एवं परिवर्तन’ के मंत्र का उल्लेख करते हुए, श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आत्मनिर्भर और विकसित भारत के लक्ष्य को गति देने में नागरिक सेवकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि जब वर्ष 2014 में हमारी सरकार बनी थी, तब आर्थिक आकार के मामले में भारत 11वें स्थान पर था। पिछले 9-10 वर्षों में, हम चौथे स्थान पर पहुंच गए हैं। यहां तक कि मॉर्गन स्टेनली जैसी अत्यधिक प्रतिष्ठित वित्तीय फर्म भी अब कहती है कि भारत अगले दो-तीन वर्षों में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। आप केवल आदर्शवादी संरक्षक नहीं, बल्कि लोगों के सेवक हैं। आप केवल प्रदाता ही नहीं, बल्कि सशक्तिकरण के सूत्रधार भी हैं। आपका चरित्र भ्रष्ट न हो। आपका आचरण सत्यनिष्ठा से परिपूर्ण होना चाहिए। आपको एक ऐसी संस्कृति बनानी होगी जहां सत्यनिष्ठा न तो कोई गुण हो और न ही अपवाद; बल्कि यह दैनिक जीवन का एक सामान्य हिस्सा हो। उन्होंने अधिकारियों से उत्तरदायी और सार्वजनिक जवाबदेही की भावना के साथ कार्य करने का आग्रह किया।
रक्षा मंत्री ने युवा नागरिक सेवकों से प्रौद्योगिकी-संचालित युग में नवोन्मेषी तरीके से कार्य करने और लोगों की समस्याओं का समाधान खोजने का आह्वान किया। उन्होंने प्रधानमंत्री जन-धन योजना, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन और आयकर विभाग की फेसलेस असेसमेंट योजना की सफलता का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रौद्योगिकी आज एक सक्षमकर्ता की भूमिका निभा रही है। रक्षा मंत्रालय की सम्पूर्ण पहल का उल्लेख करते हुए, उन्होंने बताया कि यह एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)-संचालित स्वचालन प्रणाली है जो रक्षा खरीद और भुगतान का पारदर्शी तरीके से विश्लेषण करती है। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी एक माध्यम होनी चाहिए, साध्य नहीं। रक्षा मंत्री कहा ने अधिकारियों से कहा कि आपको जन-पहुंच और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करना चाहिए। कल्याण को बढ़ावा देने और समावेशिता बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करना चाहिए।
श्री राजनाथ सिंह ने इस बात पर भी बल दिया कि नागरिक सेवकों के रूप में, प्रशिक्षुओं को प्रत्येक नागरिक के साथ सहानुभूति और समझदारी से पेश आना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब अधिकारी समाज के वंचित या कमज़ोर वर्गों के साथ संवाद करते हैं, तो उन्हें यह समझना चाहिए कि लोगों के संघर्ष न केवल उनके प्रयासों से, बल्कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से भी प्रभावित होते हैं। यही बात एक प्रशासक को वास्तव में जन-केंद्रित और करुणामय बनाती है।
रक्षा मंत्री ने सिविल सेवाओं में महिलाओं की निरंतर प्रगति को स्वीकार करते हुए कहा कि नवीनतम यूपीएससी परीक्षा में एक महिला ने शीर्ष स्थान प्राप्त किया है और शीर्ष पांच उम्मीदवारों में से तीन महिलाएं थीं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वर्ष 2047 तक, कई महिलाएं कैबिनेट सचिवों के पदों तक पहुंचेंगी और भारत की विकास यात्रा का नेतृत्व करेंगी।
श्री राजनाथ सिंह ने फाउंडेशन कोर्स को केवल एक प्रशिक्षण मॉड्यूल नहीं, बल्कि एक कुशल, सक्षम और संवेदनशील शासन प्रणाली के निर्माण की प्रतिबद्धता बताया। उन्होंने एलबीएसएनएए की व्यापक प्रशिक्षण व्यवस्था की सराहना की, जो इसे एक संपूर्ण संस्थाबनाती है और देश की प्रशासनिक क्षमताओं को मज़बूत बनाती है।
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की विरासत पर विचार व्यक्त करते हुए, रक्षा मंत्री ने कहा कि उनके नाम पर स्थापित अकादमी साहस, सरलता और सत्यनिष्ठा की प्रतीक है। उन्होंने 1965 के युद्ध में शास्त्री जी के नेतृत्व, हरित क्रांति में उनकी भूमिका और “जय जवान, जय किसान” के उनके संदेश को याद किया और अधिकारियों से उनके उदाहरण से प्रेरणा लेने का आग्रह किया। यूपीएससी के 100वें वर्ष के अवसर पर, उन्होंने कहा कि यूपीएससी और एलबीएसएनएए के बीच साझेदारी ने प्रशासकों की कई पीढ़ियों को आकार दिया है और यह भारत के शासन ढांचे को मज़बूत करती रहेगी।
इससे पहले, श्री राजनाथ सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को पुष्पांजलि अर्पित की। उन्होंने अकादमी परिसर में एक ओडीओपी मंडप का भी उद्घाटन किया।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष महमूद मदनी ने न्यायपालिका और सरकार पर अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन करने का आरोप लगाया। कहा कि अगर अत्याचार होगा, तो जिहाद होगा” कहकर विवाद खड़ा कर दिया। उनकी इस टिप्पणी पर भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है । उन पर मुसलमानों को भड़काने और संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देने का आरोप लगाया है। मदनी ने आरोप लगाया कि बाबरी मस्जिद और तीन तलाक के मामलों सहित हाल के अदालती फैसलों से पता चलता है कि न्यायपालिका “सरकारी दबाव में” काम कर रही है। उन्होंने दावा किया कि हाल के वर्षों में “ऐसे कई फैसले” सामने आए हैं जिन्होंने संविधान में अल्पसंख्यकों को दिए गए अधिकारों का खुलेआम उल्लंघन किया है।
उपासना स्थल अधिनियम, 1991 के बावजूद चल रहे मुकदमों का हवाला देते हुए, मदनी ने कहा कि इस तरह के घटनाक्रम संवैधानिक विचलन को उजागर करते हैं। उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट तभी तक ‘सर्वोच्च’ कहलाने का हकदार है जब तक वहाँ संविधान की रक्षा होती है। उन्होंने आगे कहा कि अगर ऐसा नहीं होता है, तो यह गैर-अवशेष अवस्था में भी सर्वोच्च कहलाने का हकदार नहीं है। मदनी ने भारत में मुसलमानों के प्रति जनभावना का भी आकलन किया । बताया कि 10 प्रतिशत लोग उनके समर्थक हैं, 30 प्रतिशत उनके ख़िलाफ़ हैं, जबकि 60 प्रतिशत लोग चुप हैं। उन्होंने मुसलमानों से इस खामोश बहुसंख्यक समुदाय के साथ सक्रिय रूप से जुड़ने का आग्रह किया।
उन्हें अपने मुद्दे समझाएँ। अगर ये 60 प्रतिशत लोग मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो गए, तो देश में बहुत बड़ा ख़तरा पैदा हो जाएगा। सार्वजनिक चर्चा में जिहाद को जिस तरह से पेश किया जाता है, उस पर आपत्ति जताते हुए मदनी ने मीडिया और सरकार पर एक पवित्र अवधारणा को विकृत करने का आरोप लगाया। उन्होंने लव जिहाद, थूक जिहाद और भूमि जिहाद जैसे लेबलों के इस्तेमाल की आलोचना करते हुए कहा कि ये सही अर्थ को गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं।
एपीडा क्रेता-विक्रेता बैठक, प्रथम पूर्वोत्तर भारत जैविक सप्ताह और चौथे आईएफओएएम विश्व जैविक युवा शिखर सम्मेलन (28 नवंबर- 1 दिसंबर 2025) के रूप में चार दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम का आज कोर्टयार्ड बाय मैरियट, शिलांग में औपचारिक उद्घाटन किया गया।
मेघालय सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा मेगनोलिया, एपीडा, आईएफओएएम-ऑर्गेनिक्स एशिया के सहयोग से तथा नेरामेक की सहायता से आयोजित इस कार्यक्रम में कई देशों के अंतर्राष्ट्रीय खरीदार, आयातक, जैविक विशेषज्ञ और युवा प्रतिनिधिमंडल एक साथ एकत्रित हो रहे हैं।
उद्घाटन समारोह में अनेक गणमान्य व्यक्तियों के साथ-साथ पूर्वोत्तर परिषद के सचिव श्री सतिंदर कुमार भल्ला, मेघालय सरकार के आयुक्त एवं सचिव डॉ. विजय कुमार डी, एपीडा के अध्यक्ष श्री अभिषेक देव, मेघालय सरकार के मुख्य सचिव डॉ. शकील पी. अहमद, मेघालय सरकार की उप सचिव श्रीमती सलोनी वर्मा, आईएफओएएम के सलाहकार ब्रेंडन होरे, आईएफओएएम एशिया की कार्यकारी निदेशक जेनिफर चांग, एनईआरएएमएसी के प्रबंध निदेशक श्री भास्कर बरुआ, एपीडा की महाप्रबंधक डॉ. सास्वती बोस, आईएफओएएम एशिया के अध्यक्ष मैथ्यू जॉन और क्रिसिल की एसोसिएट निदेशक श्रीमती प्रियंका उदय शामिल थे।
उद्घाटन समारोह में अपने संबोधन में, एपीडा के अध्यक्ष श्री अभिषेक देव ने पूर्वोत्तर भारत के जैविक उत्पादों की वैश्विक उपस्थिति को मज़बूत बनाने के महत्व का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर भारत जैविक सम्मेलन के पहले संस्करण ने 22 देशों के हितधारकों को एक साथ एक मंच पर जोड़ा है, जो इस क्षेत्र की जैविक क्षमता में उनकी गहरी अंतरराष्ट्रीय रुचि दर्शाता है। हमने मेघालय के जैविक उत्पादों की वैश्विक पहचान को बढ़ाने के उद्देश्य से राज्य सरकार, कृषि मंत्रालय, एनईसी और आईएफओएएम एशिया के साथ सहयोग किया है।
उन्होंने कहा कि इससे आगे बढ़ते हुए, हमारा लक्ष्य इसे एक वार्षिक आयोजन बनाना है, जिसका आयोजन हर वर्ष विभिन्न पूर्वोत्तर राज्यों द्वारा किया जाएगा ताकि दुनिया भर में क्षेत्रीय जैविक मूल्य श्रृंखलाओं को बढ़ावा दिया जा सके। हम मेघालय के किसानों, एफपीओ और हितधारकों को आगामी बायोफैच में भाग लेने के लिए भी प्रोत्साहित करते हैं, जहां भारत एक भागीदार देश है, ताकि वे अपनी उपज को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित कर सकें।
इस आयोजन का उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत के जैविक उत्पादों के लिए वैश्विक बाज़ार संबंधों को मज़बूत करना, सतत और पुनर्योजी कृषि को बढ़ावा देना एवं संवाद और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से युवा नेतृत्व को प्रोत्साहन देना है। बी2बी सत्रों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और क्षेत्रीय दौरों की योजना के साथ, यह आयोजन मेघालय और पूर्वोत्तर क्षेत्र की जैविक क्षमता को प्रदर्शित करने में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सिद्ध होगा।
कृषि मशीनरी, उपकरण और कृषि तकनीक समाधान पर 9वीं अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी और सम्मेलन ‘ईआईएमए एग्रीमैच इंडिया 2025’ का समापन आज भविष्य में हरित ईंधन आधारित कृषि मशीनरी पर फोकस करने के आह्वान के साथ हुआ। इसका आयोजन फिक्की और इतालवी कृषि उद्योग निकाय फेडरउनाकोमा ने कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के सहयोग से संयुक्त रूप से किया था।
नई दिल्ली में पूसा स्थित आईएआरआई मैदान में 27-29 नवंबर, 2025 को आयोजित इस प्रदर्शनी में उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और ओडिशा के लगभग 20,000 किसानों, 4000 से ज़्यादा घरेलू डीलरों और वितरकों, 180 से ज़्यादा घरेलू और विदेशी कंपनियों, और अल्जीरिया, नेपाल, श्रीलंका, केन्या, ओमान, मलेशिया, मोरक्को, नाइजीरिया, युगांडा, वियतनाम, ज़िम्बाब्वे, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड के 100 से ज़्यादा विदेशी खरीदारों ने हिस्सा लिया। इटली इस प्रदर्शनी का भागीदार देश था। नीदरलैंड, जापान, अमेरिका और पोलैंड ने भी इस प्रदर्शनी में भाग लिया।
प्रदर्शनी में कृषि मशीनरी की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदर्शित की गई, जो हमारे देश के किसानों के लिए बेहद फायदेमंद हो सकती है। इसके अलावा, इस आयोजन ने कृषि क्षेत्र की संपूर्ण मूल्य श्रृंखला को पूरा करने वाले भारतीय और विदेशी दोनों ही प्रकार के उद्यमियों को बेहतरीन अवसर प्रदान किए।
उद्घाटन सत्र में मुख्य भाषण देते हुए, कृषि एवं किसान कल्याण सचिव डॉ. देवेश चतुर्वेदी ने उद्योग जगत से अनुरोध किया कि वे हरित ईंधन (पर्यावरण में कम से कम कार्बन उत्सर्जन करने वाला ईंधन) आधारित मशीनीकरण को प्राथमिकता देकर भारतीय कृषि क्षेत्र के 2047 के विजन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं और कार्यभार को कम करने के लिए महिला-पुरूष निरपेक्ष कृषि उपकरण बनाकर महिला किसानों के कठिन परिश्रम को कम करें।
डॉ. चतुवेदी ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा, “अगले 5-10 वर्षों में, हमें अपनी तकनीकों को हरित ईंधन पर आधारित कर देना चाहिए—चाहे वे विद्युत चालित ट्रैक्टर हों या ग्रामीण सीबीजी संयंत्रों के लिए उपलब्ध सीबीजी (संपीड़ित बायोगैस) पर चलने वाली मशीनें। इस बदलाव से किसानों के रखरखाव और संचालन लागत, दोनों में कमी आएगी। हमारी योजनाओं में हरित ईंधन आधारित तकनीकों को प्राथमिकता दी जाएगी। मैं अपने इतालवी उद्योग साथियों से इस क्षेत्र में सहयोग करने का आग्रह करता हूं।”
विजन 2047 को प्राप्त करने में महिला किसानों को महत्वपूर्ण बताते हुए, सचिव ने उद्योग जगत का ध्यान महिला-पुरुष समानता को बढ़ावा देने वाले बजट (जेंडर बजटिंग) की ओर आकर्षित किया और उनसे महिलाओं के अनुकूल उपकरणों के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया।
डॉ. चतुवेदी ने यह भी बताया कि संयुक्त राष्ट्र ने 2026 को अंतर्राष्ट्रीय महिला किसान वर्ष घोषित किया है। इसलिए, ऐसे उपकरण डिज़ाइन किए जाने चाहिए जो महिलाओं को कठिन परिश्रम से राहत दिलाने का काम करें। उन्होंने कहा कि अक्सर नीति निर्माता यह मान लेते हैं कि ‘जेंडर बजटिंग’ का मतलब केवल महिलाओं को मशीनरी का स्वामित्व देना है, लेकिन केवल इससे उनका कठिन परिश्रम कम नहीं होता। उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “अधिकांश कठिन कृषि कार्य महिलाएं करती हैं, और इसलिए हमें महिलाओं के अधिक अनुकूल उपकरणों की जरूरत है, चाहे वे मैनुअल हों या मोटर चालित, जो वास्तव में उनके कार्यभार को कम करें।”
भारत में इटली के राजदूत श्री एंटोनियो बार्टोली ने आशा व्यक्त की कि दोनों देशों के बीच कृषि क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत में इतालवी दूतावास में शीघ्र ही एक कृषि अताशे (एक ऐसा अधिकारी जो कृषि क्षेत्र का विशेषज्ञ हो और दो देशों के बीच कृषि संबंधों को मजबूत करने के विभिन्न पक्षों का ध्यान रखे) की नियुक्ति की जाएगी।
प्रदर्शनी का अंतिम दिन दौरा करने वाले कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में संयुक्त सचिव श्री अन्बलगन पी ने प्रदर्शनी एवं सम्मेलन की उपलब्धि पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में किसानों की भागीदारी तथा घरेलू एवं विदेशी कम्पनियों, डीलरों, वितरकों की प्रमुख उपस्थिति इस आयोजन की सफलता को दर्शाती है।
ईआईएमए एग्रीमैच इंडिया की आयोजन समिति के अध्यक्ष और टैफे के बोर्ड निदेशक एवं समूह अध्यक्ष श्री टी.आर. केसवन ने कृषि को सेवा के रूप में बढ़ावा देने की जरूरत पर बल दिया, क्योंकि किसानों को केवल कुछ दिनों के लिए इस्तेमाल होने वाला सीडर खरीदना महंगा पड़ेगा। उन्होंने कहा कि कृषि सेवा के रूप में सीडर मददगार साबित हो सकता है। इसलिए, हमें सेवा के रूप में कृषि का एक नया क्षेत्र बनाने की जरूरत है। उद्योग ने कृषि मंत्रालय के साथ इस पर चर्चा की है और इस दिशा में कुछ प्रगति भी हुई है।
कृषि क्षेत्र में भारत-इटली सहयोग के भविष्य को लेकर उत्साहित फेडेरुनाकोमा की महानिदेशक सुश्री सिमोना रापस्टेला ने कहा कि भारत पर इतालवी व्यापार एजेंसी (आईसीई) की रिपोर्ट के अनुसार, यह क्षेत्र 2023 में कुल 13.7 अरब अमेरिकी डॉलर का था और अगले दस वर्षों में इसमें उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है, जो 2033 में 31.6 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाएगा। इसकी वार्षिक वृद्धि दर लगभग 9 प्रतिशत होगी।
फिक्की राष्ट्रीय कृषि समिति के सह-अध्यक्ष और कॉर्टेवा एग्रीसाइंस के दक्षिण एशिया अध्यक्ष श्री सुब्रतो गीद ने कहा, “भारत के लिए अपने खाद्य भविष्य को सुरक्षित करने हेतु उत्पादकता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। हमें किसानों को उच्च-गुणवत्ता वाले बीजों और कृषि उपज बढ़ाने के साधनों जैसे सही सामाग्रियों तक पहुंच प्रदान करके शुरुआत करनी होगी। हमें ऐसे आधुनिक तरीकों की आवश्यकता है जो श्रम को कम करें और दक्षता में सुधार करें। मशीनीकरण इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे प्रौद्योगिकी और प्रगतिशील सुधारों से मदद प्राप्त है। इन सभी कदमों के साथ मिलकर, एक ऐसी सुदृढ़ कृषि प्रणाली का निर्माण किया जा सकता है जो किसानों और राष्ट्र दोनों के लिए लाभकारी हो।”
कार्यक्रम के दौरान फिक्की-पीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट ‘फार्म मैकेनाइजेशन: द पाथ टुआर्ड्स फ्यूचर रेडी इंडिया’ भी जारी की गई।
इतालवी व्यापार एजेंसी की उप व्यापार आयुक्त सुश्री सबरीना मंगियालावोरी ने कहा कि भारतीय किसान आधुनिक यांत्रिक समाधानों, जैसे जुताई, बुवाई, सिंचाई, फसल संरक्षण और फसल के डंठल से अनाज या दानों को अलग करने की प्रक्रिया (थ्रेसिंग) को अपना रहे हैं।
इस आयोजन का 10वां संस्करण अगले वर्ष इटली में आयोजित किया जाएगा।
नीलगिरि श्रेणी (प्रोजेक्ट 17ए) का चौथा और मझगांव डॉक शिपबिल्डिंग लिमिटेड (एमडीएल) द्वारा निर्मित तीसरा जहाज, तारागिरि (यार्ड 12653), 28 नवंबर 2025 को एमडीएल, मुंबई में भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया । ये युद्धपोत डिजाइन और निर्माण में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। प्रोजेक्ट 17ए के फ्रिगेट बहुमुखी बहु-मिशन प्लेटफॉर्म हैं, जिन्हें समुद्री क्षेत्र में वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों का समाधान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
तारागिरी , पूर्व आईएनएस तारागिरी का एक नया रूप है, जो एक लिएंडर-श्रेणी का युद्धपोत था और 16 मई 1980 से 27 जून 2013 तक भारतीय नौसेना के बेड़े का हिस्सा रहा और जिसनेराष्ट्र को 33 वर्षों की शानदार सेवा प्रदान की। यह अत्याधुनिक युद्धपोत नौसेना के डिज़ाइन, स्टेल्थ, मारक क्षमता, स्वचालन और उत्तरजीविता में एक बड़ी छलांग को दर्शाता है, और युद्धपोत निर्माण में आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
युद्धपोत डिज़ाइन ब्यूरो (डब्ल्यूडीबी)द्वारा डिज़ाइन और युद्धपोत निरीक्षण दल (मुंबई) की देखरेख में निर्मित, पी17ए फ्रिगेट स्वदेशी जहाज़ डिज़ाइन, स्टेल्थ, उत्तरजीविता और युद्ध क्षमता में एक पीढ़ीगत छलांग को दर्शाते हैं। एकीकृत निर्माण के दर्शन से प्रेरित होकर, इस जहाज़ का निर्माण और वितरण निर्धारित समय-सीमा में किया गया।
P17A जहाज़ों में P17 (शिवालिक) श्रेणी की तुलना में उन्नत हथियार और सेंसर सूट लगे हैं। इन जहाजों में संयुक्त डीज़ल या गैस प्रणोदन संयंत्र लगे हैं, जिनमें एक डीज़ल इंजन और एक गैस टर्बाइन शामिल है जो प्रत्येक शाफ्ट पर एक नियंत्रणीय पिच प्रोपेलर (सीपीपी) और अत्याधुनिक एकीकृत प्लेटफ़ॉर्म प्रबंधन प्रणाली (आईपीएमएस) को चलाता है।
शक्तिशाली हथियार और सेंसर सूट में ब्रह्मोस एसएसएम, एमएफएसटीएआर और एमआरएसएएम कॉम्प्लेक्स, 76 मिमी एसआरजीएम, और 30 मिमी और 12.7 मिमी निकटरक्षा हथियार प्रणालियों का संयोजन, साथ ही पनडुब्बी रोधी युद्ध के लिए रॉकेट और टॉरपीडो शामिल हैं।
तारागिरीपिछले 11 महीनों में भारतीय नौसेना को सौंपा जाने वाला चौथा P17A जहाज है।पहले दो P17A जहाजों के निर्माण से प्राप्त अनुभव के आधार पर तारागिरी के निर्माण की अवधि को घटाकर 81 महीने कर दिया गया है, जबकि प्रथम श्रेणी (नीलगिरी) के निर्माण में 93 महीने लगे थे। प्रोजेक्ट 17A के शेष तीन जहाज (एक एमडीएल में और दो जीआरएसई में) अगस्त 2026 तक क्रमिक रूप से वितरित किए जाने की योजना है।
तारागिरी की डिलीवरी देश की डिज़ाइन, जहाज निर्माण और इंजीनियरिंग क्षमता को दर्शाती है, और जहाज डिज़ाइन और जहाज निर्माण दोनों में आत्मनिर्भरतापर भारतीय नौसेना के निरंतर ध्यान को दर्शाती है। 75% स्वदेशीकरण के साथ, इस परियोजना में 200 से अधिक एमएसएमई शामिल हैं और इसने लगभग 4,000 कर्मियों को प्रत्यक्ष रूप से और 10,000 से अधिक कर्मियों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार सृजन में सक्षम बनाया है।
56वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) के पुरस्कार समारोह में, दिग्गज अभिनेता रजनीकांत शाम के मुख्य आकर्षण रहे। उन्हें इस अवसर पर सिनेमा में उनके 50 उल्लेखनीय वर्षों के लिए सम्मानित किया गया। समारोह में उत्कृष्ट फिल्मों के लिए प्रतिष्ठित गोल्डन और सिल्वर पीकॉक पुरस्कारों के साथ-साथ उत्कृष्ट फिल्मों के लिए विशेष पुरस्कार भी प्रदान किए गए। समापन समारोह में सिनेमाई उत्कृष्टता का महोत्सव मनाया गया और साथ ही फिल्म जगत की प्रमुख हस्तियों के योगदान को श्रद्धांजलि दी गई।रजनीकांत को सिनेमा में उनके 50 वर्ष के उत्कृष्ट योगदान के लिए गोवा के मुख्यमंत्री श्री प्रमोद सावंत और सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन द्वारा सम्मानित किया गया।
सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री श्री एल. मुरुगन, गोवा के मुख्यमंत्री श्री प्रमोद सावंत, सूचना एवं प्रसारण सचिव श्री संजय जाजू और अभिनेता रणवीर सिंह ने महान अभिनेता श्री रजनीकांत को भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान और भारतीय सिनेमा में 50 स्वर्ण जयंती वर्ष पूर्ण करने के लिए सम्मानित किया।
ऋषभ शेट्टी को प्रसिद्ध यक्षगान कलाकार विद्या कोल्युर द्वारा सिर पर सम्मान स्वरूप साफा पहनाकर सम्मानित किया गया।सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन और सूचना एवं प्रसारण सचिव श्री संजय जाजू ने सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ वेब सीरीज के लिए पुरस्कार प्रदान किए।सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री श्री एल. मुरुगन ने करण सिंह त्यागी को “केसरी चैप्टर 2” के लिए सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक का पुरस्कार प्रदान किया।(सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री श्री एल. मुरुगन और सूचना एवं प्रसारण सचिव श्री संजय जाजू आनंद तिवारी को “बंदिश बैंडिट्स सीजन 2” के लिए सर्वश्रेष्ठ वेब सीरीज का पुरस्कार प्रदान किया।
सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन, गोवा के मुख्यमंत्री श्री प्रमोद सावंत, सूचना एवं प्रसारण सचिव श्री संजय जाजू, महोत्सव निदेशक शेखर कपूर और आईसी जूरी के अध्यक्ष ओमप्रकाश मेहरा ने आईएफएफआई समापन समारोह में फिल्म “स्किन ऑफ यूथ” के लिए निर्देशक ऐश मेफेयर और अभिनेत्री ट्रान क्वान को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का गोल्डन पीकॉक पुरस्कार प्रदान किया।एनएफडीसी के प्रबंध निदेशक श्री प्रकाश मगदुम ने आईएफएफआई समापन समारोह में “सेफ हाउस” फिल्म के लिए एरिक स्वेन्सन को आईसीएफटी यूनेस्को गांधी पदक प्रदान किया।
सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन, गोवा के मुख्यमंत्री श्री प्रमोद सावंत, सूचना एवं प्रसारण सचिव श्री संजय जाजू और महोत्सव निदेशक शेखर कपूर एवं ओमप्रकाश मेहरा ने आईएफएफआई समापन समारोह में फिल्म “माई फादर्स शैडो” के लिए अकिनोला डेविस जूनियर को विशेष जूरी पुरस्कार प्रदान किया।
भारत में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में हर साल लाखों की संख्या में लोग अपनी जान गवां देते हैं। सड़क दुर्घटनाओं के ग्राफ में तेजी से वृद्धि हो रही है। दुर्घटनाओं में मौतें और घायल होने के समाचार प्रतिदिन पढ़ने और देखने को मिल रहे हैं। सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद देश में सड़क हादसों में कमी नहीं आई है, बल्कि साल दर साल इसमें इजाफा हो रहा है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है जब तक समाज का सहयोग नहीं मिलेगा, मानवीय व्यवहार नहीं बदलेगा और कानून का डर नहीं होगा, तब तक सड़क हादसों पर अंकुश नहीं लगेगा। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी अपनी साफगोई के लिए जाने जाते है। गडकरी के अनुसार देश में हर साल औसतन 4.80 से 5 लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिसमें लगभग 1.80 लाख लोगों की मौत हो जाती है। इन दुर्घटनाओं से जीडीपी को 3 फीसदी का नुकसान होता है, जो किसी बीमारी या युद्ध से भी अधिक है। सभी दुर्घटनाओं में 66.4 फीसदी मौतें 18 से 45 साल के युवाओं की होती हैं, जो देश के भविष्य के लिए गंभीर चिंता है।
वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत में दुनिया के केवल एक फीसदी वाहन हैं इसके बावजूद पूरे विश्व में होने वाले हादसों का 11 फीसदी देश में ही घटित होते हैं। भारत ही नहीं विश्व भर में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या बहुत ज्यादा है। भारत में सड़कों और हाईवे की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। इसी के साथ हादसों की रफ्तार भी थमने का नाम नहीं ले रही। देश में सड़क दुर्घटनाओं के ग्राफ में तेजी से वृद्धि हो रही है। भारत में कोई दिन नहीं ऐसा नहीं जाता जब देश के किसी भाग में सड़क हादसा न होता हो। सड़क पर ट्रक पार्क करना दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण हैं और कई ट्रक लेन अनुशासन का पालन नहीं करते हैं। ऐसा लगता है जैसे सड़के आतंकी हो गयी है और हादसे थमने के नाम नहीं ले रहे है। देश में मोटर वाहन कानून 2019 लागू होने के बाद भले ही सरकार के राजस्व में वृद्धि हुई हो मगर दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों की संख्या में कमी नहीं आयी। सख्त कानून का उनपर कोई असर नहीं हुआ है। नीति आयोग की रिपोर्ट है कि सड़क हादसों के शिकार 30 प्रतिशत लोगों की मौत जीवन रक्षक उपचार नहीं मिल पाने के कारण होती है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के सड़क हादसों के आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे देश में लोग जान हथेली पर लेकर चलते है। देश में सड़कों और हाईवे की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। इसी के साथ हादसों की रफ्तार भी थमने का नाम नहीं ले रही। सड़क दुर्घटनाओं में पैदल चलने वाले लोग भी सुरक्षित नहीं है। इन सभी दुर्घटनाओं के पीछे शराब मादक पदार्थों का इस्तेमाल, वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करना, वाहनों में जरुरत से अधिक भीड़ होना, वैध गति से अधिक तेज गाड़ी चलाना और थकान आदि होना है। महानगरों और नगरों में किसी चौराहे पर लाल बत्ती को धता बताकर रोड पार कर जाना, गलत तरीके से ओवरटेकिंग, बेवजह हार्न बजाना, निर्धारित लेन में न चलना और तेज गति से गाड़ी चलाकर ट्रैफिक कानूनों की अवहेलना आज के युवकों का प्रमुख शगल बन गया है।
सड़क सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है, आम जनता में खासतौर से नये आयु वर्ग के लोगों में अधिक जागरुकता लाने के लिये इसे शिक्षा, सामाजिक जागरुकता आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों से जोड़ा गया है। सड़क दुर्घटना, चोट और मृत्यु आज के दिनों में बहुत आम हो चला है। सड़क पर ऐसी दुर्घटनाओं की मुख्य वजह लोगों द्वारा सड़क यातायात नियमों और सड़क सुरक्षा उपायों की अनदेखी है। गलत दिशा में गाड़ी चलाना, सड़क सुरक्षा नियमों और उपायों में कमी, तेज गति, नशे में गाड़ी चलाने आदि । सड़क हादसों की संख्या को घटाने के लिये उनकी सुरक्षा के लिये सभी सड़क का इस्तेमाल करने वालों के लिये सरकार ने विभिन्न प्रकार के सड़क यातायात और सड़क सुरक्षा नियम बनाये हैं। हमें उन सभी नियमों और नियंत्रकों का पालन करना चाहिये जैसे रक्षात्मक चालन की क्रिया, सुरक्षा उपायों का इस्तेमाल, गति सीमा को ठीक बनायें रखना, सड़क पर बने निशानों को समझना आदि।
भारतीय संविधान नागरिकों को धर्म का पालन, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, परंतु यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है। विशेषकर उन सेवाओं में, जहाँ सामूहिक अनुशासन, पदानुक्रम, आज्ञापालन और इकाई-एकजुटता ही अस्तित्व की शर्तें हैं, वहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दायरा स्वाभाविक रूप से सीमित हो जाता है। भारतीय सशस्त्र बल इसी श्रेणी में आते हैं, जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा, युद्धक क्षमता और सामूहिक मनोबल किसी भी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद या धार्मिक व्याख्या से कहीं ऊपर रखे जाते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक सैन्य अधिकारी की बर्खास्तगी को उचित ठहराया जाना इस बात का प्रमाण है कि ‘‘आवश्यक धार्मिक आचरण’’ और ‘‘व्यक्तिगत धार्मिक व्याख्या’’ में स्पष्ट अंतर किया जाएगा, और वर्दी में रहते हुए यह अंतर और अधिक कठोर हो जाता है। यह निर्णय यह संकेत भी देता है कि सैन्य सेवा का मूल स्वर ‘‘सैकुलर यूनिट-कल्चर’’ पर आधारित है, जहाँ किसी भी धर्म की मान्यताएँ सम्मानित हैं, किंतु किसी एक धर्म की निजी व्याख्या रेजिमेंटल परंपराओं, आदेशों या सैन्य अनुशासन पर प्रभाव नहीं डाल सकती।
भारत जैसे बहुधर्मी समाज में सेना का चरित्र हमेशा से विशिष्ट रूप से धर्मनिरपेक्ष रहा है। एक ही पलटन में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और अन्य धर्मों के सैनिक कंधे से कंधा जोड़कर लड़ते हैं। उनकी एकता का आधार ‘‘धर्म’’ नहीं, बल्कि ‘‘रक्त संबंधी बंधुत्व’’ और ‘‘राष्ट्र के प्रति साझा निष्ठा’’ है। यही कारण है कि भारतीय सेना की रेजिमेंटल परंपराओं में धार्मिक रंग तो दिखते हैं, पर उनका उद्देश्य किसी विशेष धर्म का प्रचार नहीं, बल्कि सैनिक भावना, युद्धक मनोबल और ऐतिहासिक गौरव की निरंतरता को बनाए रखना होता है। उदाहरणस्वरूप कई रेजिमेंट अपने पारंपरिक युद्ध-नाद या शुभ प्रतीकों का उपयोग करती हैं, जो उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और युद्धों में प्रदर्शित वीरता की गवाही देते हैं।
किसी सैनिक के लिए धार्मिक आस्था उसका व्यक्तिगत अधिकार अवश्य है, पर जब वह वर्दी धारण करता है, तो वह व्यक्ति नहीं, राष्ट्र का प्रतिनिधि बन जाता है। सेना किसी सैनिक को किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान को त्यागने या नया अपनाने के लिए बाध्य नहीं करती, किंतु यह अपेक्षा अवश्य करती है कि भीतर की किसी निजी व्याख्या को सैनिक अपने कर्तव्यों, आदेशों या इकाई-परंपराओं से ऊपर न रखे। सर्वोच्च न्यायालय ने इसी संदर्भ में स्पष्ट किया कि क्या कोई धार्मिक ग्रंथ वास्तव में किसी विशेष क्रिया को प्रतिबंधित करता है या यह केवल व्यक्ति की निजी धारणा है—यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘‘आवश्यक धार्मिक आचरण’’ वही होता है जो धर्म के मूलभूत स्वरूप का अंग हो, जिसे त्याग देने पर धर्म का स्वरूप ही बदल जाए। इसके विपरीत यदि कोई आचरण केवल व्यक्तिगत व्याख्या पर आधारित है, तो उसे सेवा-आवश्यकताओं से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि यदि किसी सैनिक को आदेश दिया जाए कि वह किसी आधिकारिक कार्यक्रम या परेड में भाग ले, और वह ‘‘धार्मिक कारणों’’ का हवाला देते हुए मना करे, तो उसकी इस असहमति के दो स्तरों की जाँच होगी—पहला यह कि क्या वह आचरण सचमुच धर्म-आवश्यक है? और दूसरा यह कि क्या उसका पालन रेजिमेंटल अनुशासन या सामूहिक मनोबल को प्रभावित करता है? यदि कोई सैनिक आदेश का पालन नहीं करता, तो वह केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता—वह पूरी संरचना के अनुशासन को चुनौती देने का कार्य बन जाता है। सेना में एक भी अस्वीकार उदाहरण चेन-ऑफ-कमांड को कमजोर करने का कारण बन सकता है, क्योंकि युद्धकालीन या संकट की परिस्थितियों में आदेशों का तुरंत पालन ही जीवन और मृत्यु का अंतर तय करता है।
सैन्य अनुशासन केवल बाहरी नियमों का पालन नहीं है; यह मनोवैज्ञानिक एकजुटता और मानसिक तैयारी की वह अवस्था है जिसमें प्रत्येक सैनिक स्वयं को इकाई का अभिन्न घटक मानता है। धार्मिक आधार पर स्वयं को अलग करना या रेजिमेंटल परंपराओं से दूरी बनाना उस भावना को कमजोर कर सकता है। इसलिए न्यायालय और सैन्य नेतृत्व दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ‘‘व्यक्तिगत विश्वास’’ और ‘‘व्यक्तिगत व्याख्या’’ का सम्मान तो किया जा सकता है, पर ‘‘व्यक्तिगत धार्मिक औचित्य’’ देकर सैन्य आदेशों का उल्लंघन न तो स्वीकार्य है, न ही वह किसी भी प्रकार ‘‘धर्म के अधिकार’’ के अंतर्गत आता है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि सेना किसी सैनिक को दूसरे धर्म के अनुष्ठानों में ‘‘भाग लेने’’ के लिए बाध्य नहीं करती, बल्कि केवल ‘‘उपस्थिति’’ या ‘‘प्रोटोकॉल’’ पूरा करने की अपेक्षा करती है। उदाहरणस्वरूप—यदि किसी कार्यक्रम में किसी देवी-देवता की प्रतिमा लाई जाती है या आशीर्वाद की औपचारिक प्रार्थना होती है, तो सैनिक को ‘‘उपस्थित’’ रहना होता है, ‘‘पूजा’’ करना अनिवार्य नहीं होता। यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सेना किसी की अंत:करण-स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं करती। सैनिक चाहे तो मन ही मन अलग विश्वास रख सकता है, पर वह सार्वजनिक रूप से असहमति दिखाकर अनुशासन को चुनौती नहीं दे सकता।
सवाल यह है कि क्या सेना ‘‘उचित समायोजन’’ (Reasonable accommodation) कर सकती है? हाँ, पर इसकी सीमा वही है जहाँ तक वह सामूहिक हितों को प्रभावित न करे। कई बार सैनिकों को उनके धार्मिक त्यौहारों, पूजा-पद्धतियों या आहार-मान्यताओं के अनुसार उचित छूट दी जाती है। सेना में गुरुद्वारा, मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि के लिए स्थान भी निर्धारित होते हैं। पर यह ‘‘धर्म-आधारित सुविधाएँ’’ तभी तक संभव हैं जब तक वे ‘‘सेवा के मूल कार्य’’ या ‘‘युद्धक आवश्यकताओं’’ से संघर्ष न करें। यदि किसी व्यक्तिगत आस्था का पालन इकाई की गतिविधियों, युद्ध-तैयारी या आदेशों में अवरोध डालता है, तो उसका समायोजन संभव नहीं होता।
सैन्य अधिकारी के लिए दायित्व और भी अधिक कठोर हो जाते हैं। अधिकारी केवल आदेश का पालन करने वाला सैनिक नहीं होता—उसे दूसरों के लिए उदाहरण बनना होता है। यदि वह स्वयं आदेश मानने से इनकार करता है, और वह भी व्यक्तिगत धार्मिक कारणों का हवाला देकर, तो उसके अधीनस्थों का मनोबल प्रभावित होता है और अनुशासन के टूटने की संभावना बढ़ती है। इसलिए न्यायालय ने इसे ‘‘सबसे गंभीर प्रकार की अनुशासनहीनता’’ माना। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि कोई अधिकारी निजी धार्मिक व्याख्या को सेवा के ऊपर रखता है, तो वह स्पष्ट रूप से यह प्रदर्शित करता है कि वह वर्दी की माँगों के अनुरूप स्वयं को ढालने में असमर्थ है।
धर्म और सैन्य अनुशासन के संबंध में एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न है—क्या ‘‘धार्मिक स्वतंत्रता’’ सैनिक की पहचान है या उसकी प्राथमिक पहचान ‘‘राष्ट्र-सेवक’’ होना है? भारतीय सेना का चरित्र सदैव ‘‘धर्म-निरपेक्ष पेशेवरिता’’ पर आधारित रहा है। सैनिक का प्राथमिक धर्म ‘‘कर्तव्य’’ है—‘‘धर्मनिष्ठा’’ नहीं। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके व्यक्तिगत धार्मिक जीवन को दबा दिया जाए; बल्कि यह है कि वर्दी में रहते हुए उसका धर्म ‘‘राष्ट्र-धर्म’’ बन जाता है। व्यक्तिगत आस्था उसकी निजी सीमा में सुरक्षित रहती है, और सेना यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी सैनिक अपने धर्म के कारण न तो उपेक्षित महसूस करे, न ही उसे विशिष्ट विशेषाधिकार मिले।
इस पूरे विषय का सार यह है कि ‘‘व्यक्तिगत धार्मिक भावना’’ और ‘‘सैन्य अनुशासन’’ के बीच संतुलन तो आवश्यक है, पर यह संतुलन सदैव सैन्य आवश्यकताओं के पक्ष में झुकता है। क्यों? क्योंकि सेना की विफलता किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि राष्ट्र को प्रभावित करती है। यदि युद्धभूमि पर कोई सैनिक कहे कि धार्मिक कारणों से वह आदेश का पालन नहीं कर सकता, तो उसके परिणाम घातक हो सकते हैं। इसीलिए सैन्य नेतृत्व और न्यायपालिका, दोनों इस सिद्धांत को दोहराते हैं कि—‘‘वर्दी में रहते हुए व्यक्ति निजी नहीं रहता, वह राष्ट्र का संरक्षक बन जाता है।’’
सेना में धार्मिक आचरण की स्वतंत्रता ‘‘अनुमति-आधारित’’ होती है, ‘‘पूर्ण अधिकार’’ नहीं। यह स्वतंत्रता सेवा-नियमों और संचालन-हितों के अधीन होती है। आवश्यक धार्मिक आचरण का सम्मान किया जा सकता है, पर यदि वही आचरण अनुशासन, आदेश-पालन या इकाई-एकजुटता को क्षति पहुँचाए, तो वह संरक्षित नहीं रहेगा। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय इसी सिद्धांत को सुदृढ़ करता है—कि सैन्य जीवन में ‘‘धर्म’’ का स्थान है, पर ‘‘धर्म-आधारित अवज्ञा’’ का नहीं।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारतीय सेना अपने सैनिकों की व्यक्तिगत आस्था का सम्मान करती है, उनकी धार्मिक पहचान को संरक्षित भी करती है, और जहाँ तक संभव हो ‘‘उचित समायोजन’’ भी प्रदान करती है। परंतु वह किसी भी परिस्थिति में सेवा-नियमों, आदेशों, रेजिमेंटल परंपराओं और सामूहिक कर्तव्य को व्यक्तिगत धार्मिक तर्कों के कारण कमजोर नहीं होने देती। यही कारण है कि जब आस्था और सैन्य अनुशासन के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है, तो न्यायपालिका और सैन्य नेतृत्व दोनों का रुख स्पष्ट होता है—‘‘राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता प्राप्त है; व्यक्तिगत धार्मिक आचरण उन्हीं सीमाओं के भीतर मान्य है जहाँ तक वह सैन्य सेवा की अनिवार्यताओं से टकराव न पैदा करे।’’
– डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,