एकांत का सौंदर्य और भीतर की यात्रा: बदलते समय में आत्मिक अनुशासन की आवश्यकता

0

बाहरी दुनिया की चकाचौंध के बीच भीतरी संसार को सँभालना ही जीवन का सबसे बड़ा संतुलन

— डॉ. प्रियंका सौरभ

आज का मनुष्य निरंतर दौड़ में है—लक्ष्य पाने की दौड़, दिखावे की दौड़, और दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करने की दौड़। इस भागदौड़ के बीच जो सबसे अधिक छूट गया है, वह है मनुष्य का अपना आंतरिक जगत। आधुनिक जीवनशैली ने हमें बाहरी दुनिया से इतना जोड़ दिया है कि हम स्वयं से मिलने का समय ही खो बैठे हैं। ऐसे समय में ‘एकांत’ कोई विलासिता नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। यही वह क्षण है जब जीवन हमें धीरे से कहता है—आंतरिक रूप से एकांत में रहिए, लक्ष्यहीन जीवन मत बिताइए, ध्यान कीजिए और अच्छी पुस्तकें पढ़िए।

जीवन की दिशा तभी स्पष्ट होती है जब मन के भीतर शांति हो। लक्ष्यहीन भटकाव केवल थकाता है, प्रेरित नहीं करता। आत्मिक यात्रा के लिए एकांत वह दीपक है जो मन की गहराइयों को रोशन करता है। ध्यान और अध्ययन उस गहराई को दिशा देने वाले दो मजबूत स्तंभ हैं। ध्यान व्यक्ति को स्थिरता देता है और अध्ययन उसे विस्तार प्रदान करता है। दोनों मिलकर जीवन में लक्ष्य, अनुशासन और सृजनात्मकता का संचार करते हैं।

यह आवश्यक नहीं कि मनुष्य समाज से कट जाए। मनुष्य सामाजिक प्राणी है—लोगों में थोड़ा घुलना–मिलना जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। किन्तु वास्तविक समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम लोगों में इतने खो जाते हैं कि स्वयं से मिलने का अवसर ही न बचे। इसलिए प्रतिदिन एक–दो घंटे अपने लिए निकालना केवल मानसिक स्वास्थ्य नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन का सबसे बड़ा मंत्र है। यही समय हमें सजग बनाता है, थकान को धोता है, और भीतर की ऊर्जा को पुनः भरता है। अलग रहिए, पर अपने अंतर में स्थित रहिए—यही आदर्श संतुलन है।

एकांत का आनंद उठाना किसी पलायन का नाम नहीं है। यह स्वयं को पुनः निर्मित करने की प्रक्रिया है। यह वह शांति है जो किसी कोने में बैठकर मन को उसकी मौलिक लय में वापस ले आती है। यह वह स्पेस है जहाँ जीवन के अनुत्तरित प्रश्न स्वयं उत्तर बनने लगते हैं। विचार निर्मल होते हैं, भावनाएँ संयमित होती हैं, और लक्ष्य स्पष्ट होने लगते हैं। इतने सारे लाभों के बावजूद लोग एकांत से डरते हैं, क्योंकि उन्होंने स्वयं के साथ बैठने का अभ्यास ही नहीं किया। लेकिन सच यही है—जो व्यक्ति स्वयं के साथ सुखी है, वही दूसरों को भी सुख दे सकता है।

किन्तु एकांत का आनंद लेने का अर्थ यह नहीं कि समाज से विमुख हो जाएँ। मनुष्य का व्यक्तित्व पूर्ण तब होता है जब वह एकांत और मेल–मिलाप के बीच संतुलन बनाए रखे। जब आप दूसरों से मिलें तो पूरे प्रेम और मित्रता के साथ मिलें। आपकी उपस्थिति लोगों के मन में सकारात्मकता भर दे, यह एक साधना है; और इस साधना का आधार भी एकांत ही है। जो व्यक्ति भीतर से स्थिर होता है, वही दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है। ऐसे व्यक्ति को देखकर लोग भूलते नहीं; वे याद रखते हैं कि वे एक ऐसी आत्मा से मिले थे जिसने उनके भीतर प्रसन्नता और प्रेम के बीज बोए।

आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लोगों के बीच रहते हुए भी लोग भीतर से अकेले हो गए हैं, और अकेले रहते हुए भी स्वयं से कटे हुए हैं। सोशल मीडिया की चमक, निरंतर सूचना के प्रवाह और बाहरी अपेक्षाओं का बोझ मन को ऐसा व्यस्त बनाए रहता है कि शांति का क्षण मिलना दुर्लभ हो जाता है। ऐसे माहौल में एकांत हमें उसी तरह बचाता है जैसे समुद्र में तैरते हुए किसी नाविक को तट बचाता है। जीवन की तेज़ हवाओं में यह हमारा एंकर बन जाता है।

एकांत जीवन को संतुलन देता है। ध्यान उसे गहराई देता है। अध्ययन उसे दिशा देता है। और प्रेम—वह जीवन को सार्थक बनाता है। जब यह चारों तत्व एक साथ मिलते हैं, तब जीवन केवल बाहरी उपलब्धियों का खेल नहीं रहता; वह अर्थपूर्ण यात्रा बन जाता है।

समाज को ऐसे ही व्यक्तियों की आवश्यकता है—जो भीतर से शांत हों और बाहर से करुणामय; जो अपनी अकेली सुबहों में आत्मा को मजबूत करते हों और अपनी भीड़ भरी दोपहरों में दुनिया को मुस्कान देते हों; जिनकी उपस्थिति लोगों को छोटा न करे बल्कि ऊँचा उठाए; जिनकी वाणी में विनम्रता हो, मन में करुणा हो और जीवन में दृढ़ता।

संदेश स्पष्ट है—अपने भीतर लौटिए। जीवन को दिशा दीजिए। कुछ देर अकेले बैठिए, पर जब दुनिया से मिलिए तो प्रेम और मित्रता के साथ मिलिए। ताकि लोग आपको इसलिए याद रखें कि आपने उनके हृदय में खुशी और आशा का एक छोटा सा दीप जला दिया था। यही एकांत का उद्देश्य है—पहले स्वयं को प्रकाशित करना और फिर उस प्रकाश से दुनिया को gently छू लेना।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

देश भर में लघु उद्यमों के प्रौद्योगिकी उन्नयन और डिजिटलीकरण के लिए कई योजनाएं कार्यान्वित

0

lसूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय देश भर में छोटे उद्यमों के प्रौद्योगिकी उन्नयन और डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाओं और पहलों को लागू कर रहा है। इनमें अन्य बातों के साथ-साथ सूक्ष्म और लघु उद्यम -क्लस्टर विकास कार्यक्रम (सामान्य सुविधा केंद्र), टूल रूम/प्रौद्योगिकी केंद्र, सूक्ष्म और लघु उद्यम – परिवर्तन के लिए हरित निवेश वित्तपोषण योजना, और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम चैंपियंस योजना शामिल हैं। ये पहल आधुनिकीकरण, कौशल और गुणवत्ता वृद्धि, उन्नत प्रौद्योगिकी पहुंच, हरित प्रौद्योगिकी अपनाने और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम की बेहतर प्रतिस्पर्धात्मकता में सहायता करती हैं। सरकार उद्यम पोर्टल, एमएसएमई चैंपियंस पोर्टल, सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जीईएम), ट्रेड रिसीवेबल्‍स डिकाउंटिंग सिस्‍टम (टीआरडीएस), एमएसएमई मार्ट, एमएसएमई संबंध और ऑनलाइन विवाद  समाधान पोर्टल जैसी पहलों के माध्यम से डिजिटलीकरण को आगे बढ़ा रही है

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) देश भर में 20 नए प्रौद्योगिकी केंद्रों (टीसी) और 100 विस्तार केंद्रों (ईसी) की स्थापना के लिए ‘नए प्रौद्योगिकी केंद्रों/विस्तार केंद्रों की स्थापना’ नामक एक स्‍कीम लागू कर रहा है। इसका उद्देश्य प्रौद्योगिकी, कुशल मानव संसाधन और सलाहकार सेवाओं के लिए एमएसएमई की स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार समाधान प्रदान करने हेतु प्रौद्योगिकी केंद्रों के नेटवर्क की भौगोलिक पहुंच को बढ़ाना है। इससे जमीनी स्तर पर एमएसएमई की प्रतिस्पर्धात्मकता और लाभप्रदता बढ़ेगी। इस स्‍कीम के तहत, नए प्रौद्योगिकी केंद्रों की स्थापना के लिए 20 स्थानों को मंजूरी दी गई है, जिनमें गया (बिहार) और बोकारो (झारखंड) जैसे आकांक्षी जिलों में दो स्थान शामिल हैं।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय ने अपने क्षेत्रीय संगठनों में 65 निर्यात सुविधा केंद्र (ईएफसी) स्थापित किए हैं, जिनमें एमएसएमई-विकास और सुविधा कार्यालय, एमएसएमई प्रौद्योगिकी केंद्र और एमएसएमई परीक्षण केंद्र शामिल हैं। इनका उद्देश्य एमएसएमई को उनकी निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए अपेक्षित मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करना है।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री सुश्री शोभा करंदलाजे ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

***

भय, भूख और भ्रष्टाचार के साये में मानवाधिकार

0

                                                   बाल मुकुन्द ओझा

मानव अधिकारों को पहचान देने और उसके हक की लड़ाई को ताकत देने के लिए हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। कहते है जब तक देश और दुनिया में  भय, भूख, भ्रष्टाचार, असमानता रहेगी तब तक मानवाधिकारों का हनन होता रहेगा। अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, दुनिया में 5 करोड़ लोग, आधुनिक दासता के शिकार हैं, जिसमें जबरन मज़दूरी, जबरन विवाह और यौन शोषण जैसी स्थितियाँ शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि जबरन श्रम से हर साल क़रीब 236 अरब डॉलर का मुनाफ़ा कमाया जाता है, जो मूल रूप से श्रमिकों का छीन लिया गया पारिश्रमिक है। इस वर्ष इस दिवस की थीम असमानताओं को कम करना और मानव अधिकारों को आगे बढ़ाना रखी गई है। यह थीम मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के महत्व पर प्रकाश डालती है और सभी देशों और लोगों को इन अधिकारों के संरक्षण के लिए अपने हिस्से का योगदान करने के लिए प्रोत्साहित करती है। मानवाधिकार, वे अधिकार हैं जो हर व्यक्ति को उसकी जाति, लिंग, धर्म, राष्ट्रीयता या सामाजिक स्थिति के दायरे की परवाह किए बिना, समान गरिमा और सुरक्षा के साथ जीवन जीने का अवसर देते हैं। 

मानव अधिकारों से हमारा अभिप्राय मौलिक अधिकार एवं स्वतंत्रता से है जिसके सभी  हकदार है। अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं के उदाहरण के रूप में जिनकी गणना की जाती है, उनमें नागरिक और राजनैतिक अधिकार सम्मिलित हैं जैसे कि जीवन और आजाद रहने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के सामने समानता एवं आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ ही साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार, भोजन का अधिकार काम करने का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार। सवा अरब से भी ज्यादा संख्या वाली एक विविधतापूर्ण आबादी के लिए मानवाधिकार सुनिश्चित करने की चुनौती होती है, जिनके विभिन्न गुटों और समुदायों के बीच अपने ही हित कई बार एक-दूसरे से टकराते हुए प्रतीत होते हैं। मानवाधिकारों के मामले में हमारी स्थिति उस विद्यार्थी जैसी है, जिसकी उपलब्धियां कम नहीं हैं, लेकिन अभी उसे लंबी यात्रा तय करनी है।

स्वतंत्रता और समानता से जीवन यापन करने के अधिकारों की रक्षा करना मानव के मूलभूत अधिकारों में निहित है। लोकतंत्र हमें मानव के सभी अधिकारों की रक्षा का वचन देता है मगर स्वतंत्रता  की आड़ में आतंकवादी और विध्वंशक गतिविधिया बर्दाश्त नहीं की जाती। यह निर्णय तो देशवासियों को करना है की हमारे अधिकार क्या है और उनकी रक्षा कैसे की  जाये। बहरहाल स्वतंत्रता के साथ शिक्षा और रोटी, कपडा और मकान का बुनियादी  अधिकार सभी के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है जिस पर चिंतन और मंथन की जरुरत है।

मानव अधिकार वे अधिकार है जो किसी भी व्यक्ति के लिए सामान्य रूप से जीवन बिताने एवं उसके अस्तित्व के लिए आवश्यक है। मानवाधिकार का उद्देश्य है विश्व में किसी भी व्यक्ति, समाज या वर्ग को परेशान न किया जाये। सभी को जीवन जीने की आजादी एवं समान अधिकार मिले। मानवाधिकारों को सबसे ज्यादा चुनौती गरीबी से मिल रही है। विश्वभर में हर 8 में से 1 व्यक्ति भूख के साथ जी रहा है। दुनियां में 24 हजार व्यक्ति  रोजाना  भुखमरी के शिकार होकर अकाल मौत मर जाते है। ऐसे दौर में हम मानवाधिकारों की बात करते नहीं थकते यह सम्पूर्ण विश्व के लिए शर्मनाक है। मानवाधिकारों की बात करने वालों लिए यह किसी चुनौती से कम नहीं है। मानवाधिकार हर प्राणी के लिए मायने रखता है वह चाहे अमीर हो या गरीब। दुनियां के हर संपन्न व्यक्ति और देश को भूख से पीड़ित लोगों को पेटभर खाना खिला कर उनके मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आगे आना होगा तभी हमारा सही अर्थों में मानवाधिकार दिवस मानना सार्थक होगा। भूख और गरीबी से  लोगों के जीने का अधिकार खतरे में पड़ जाता है तो अन्य मानवाधिकारों, जैसे- समानता, विचार अभिव्यक्ति, धार्मिक स्वतंत्रता आदि के बारे में बातें करना बेमानी है। बाल मजदूरी, महिलाओं का यौन शोषण, धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न, जातिगत भेद-भाव, लूट-पाट, बलात्कार आदि सभी बातें मानवाधिकारों के खिलाफ जाती हैं ।

भारत में मानव अधिकार आयोग होने और उनके संरक्षण के लिए कारगर कानून होने के बावजूद बच्चों और महिलाओं पर अत्याचार, तस्करी, ऑनर किलिंग, अस्पृश्यता, गरीबी, महिलाओं के साथ घर या सार्वजनिक तौर पर होने वाली हिंसा आजादी के 7 दशक बीत जाने के बाद भी जारी है। इसलिए हमें सब कुछ सरकार पर न छोड़कर अपने स्तर पर भी अपने आसपास होने वाले इन अपराधों को रोकने के लिए मिलकर कदम उठाने होंगे। हमें अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल करना है तो यह तभी संभव होगा जब एक सभ्य समाज के नागरिक होने के नाते हम एक-दूसरे के दुःख  दर्द को समझें और एक-दूसरे के अधिकारों को बना रहने दें। इसकी सार्थकता तभी होगी जब हम एक दूसरे के प्रति सद्भाव बनाये रखते हुए मानवाधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित होंगे।

 बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

केंद्र की त्रिपुरा के 30 विशेष रूप से निर्बल जनजातीय समूह बस्तियों में संपर्क बढ़ाने के लिए 25 सड़क परियोजनाओं को मंजूरी

0

ग्रामीण विकास मंत्रालय ने पीएम-जनमन के सड़क संपर्क घटक के अंतर्गत त्रिपुरा के लिए 68.67 करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश के साथ 65.38 किलोमीटर लंबाई की 25 सड़क परियोजनाओं को मंजूरी दी है।

यह ऐतिहासिक पहल:

  • राज्य में 30 पीवीटीजी बस्तियों को बारहमासी सड़क संपर्क प्रदान करेगी।
  • राज्य में रहने वाले विशेष रूप से निर्बल जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार करेगी।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बढ़ाएगी, सुदूरवर्ती गांवों और शहरी केंद्रों के बीच की खाई को पाटेगी।
  • क्षेत्र में आर्थिक विकास, व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देगी।
  • स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और बाजार जैसी आवश्यक सेवाओं तक पहुंच में सुधार करेगी।
  • रोजगार के अवसर सृजित करेगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करेगी।
  • समृद्ध पूर्वोत्तर और विकसित भारत के सरकार के विजन के साथ संयोजित करेगी।

पीएम-जनमन के अंतर्गत परियोजनाओं का क्षेत्र पर परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ेगा, जिससे पूर्वोत्तर क्षेत्र में जनजातीय समूहों के विकास और समृद्धि में योगदान मिलेगा तथा समावेशी विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता सुदृढ़ होगी।

एनएमडीसी स्टील का नवंबर 2025 में रिकॉर्ड तोड़ परिचालन प्रदर्शन

0

एनएमडीसी स्टील लिमिटेड (एनएसएल), भारत के सबसे युवा एकीकृत इस्पात संयंत्र ने अपनी मूल्य-श्रृंखला में परिचालन माइलस्टोन के एक असाधारण सेट के साथ नवंबर 2025 का समापन किया। प्रक्रिया-स्थिरता में मजबूती, परिचालन उत्कृष्टता और बढ़ती क्षमता उपयोग का प्रदर्शन करते हुए एनएसएल ने कई प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ मासिक प्रदर्शन किया है।

नवंबर माह में कच्चे माल की हैंडलिंग प्रणाली (आरएमएचएस) ने 21 नवंबर, 2025 को दिन में सबसे अधिक यानी 616 वैगन की टिपलिंग के साथ रिकॉर्ड उपलब्धियां हासिल कीं। संयंत्र ने 5,18,886 टन का अब तक का सबसे अधिक मासिक बेस मिक्स उत्पादन भी हासिल किया।

सिंटर संयंत्र में एनएसएल ने दिन और मासिक सिंटर उत्पादन रिकॉर्ड के साथ अपनी विकास यात्रा जारी रखी, जो रेटेड क्षमता उपयोग के 105 प्रतिशत से अधिक पर परिचालन करते हुए 30 नवंबर, 2025 को एक दिन में 15,590 टन और माह में 4,14,271 टन तक पहुंच गया।

ब्लास्ट फर्नेस ने 28 नवंबर, 2025 को 11,315 टन के रिकॉर्ड हॉट मेटल उत्पादन के साथ उल्लेखनीय दक्षता दर्ज की, जो रेटेड क्षमता उपयोग का 119 प्रतिशत है, और क्षमता उपयोग के 101 प्रतिशत को पार करते हुए 2,80,049 टन का मासिक उत्पादन किया। विशेष रूप से एनएसएल ने बर्डन में केवल सिंटर और अयस्क का उपयोग करके हॉट मेटल के 519 किलोग्राम प्रति टन की अपनी सबसे कम मासिक औसत ईंधन दर हासिल की, जो देश में सर्वोत्तम औसत में से है, और हॉट मेटल की 164 किलोग्राम प्रति टन की उच्चतम मासिक औसत पीसीआई दर हासिल की।

स्टील मेल्टिंग शॉप और थिन स्लैब कैस्टर-हॉट स्ट्रिप मिल ने भी अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन      किया। एनएसएल ने 2,03,356 टन का अपना सर्वाधिक मासिक एचआर कॉइल उत्पादन, 2,09,445 टन क्रूड इस्पात उत्पादन और 2,15,010 टन तरल इस्पात उत्पादन रिकार्ड किया, जिसमें क्षमता का उपयोग क्रमशः 84 प्रतिशत, 85 प्रतिशत और 86 प्रतिशत को पार कर गया। संयंत्र ने 4,799 हीट की अब तक की सबसे अच्छी कनवर्टर लाइनिंग लाइफ के साथ एक नया बेंचमार्क भी बनाया। दो नए ग्रेड – IS 2062 E450BR और IS 2062 E350C को सफलतापूर्वक वाणिज्यिक उत्पादन में परिवर्तित किया गया, जिससे निर्माण, आधारभूत सुविधाओं और भारी  ढांचे और भारी इंजीनियरिंग क्षेत्र के लिए कंपनी के उत्पाद पोर्टफोलियो में वृद्धि हुई।

एनएसएल ने ऑक्सीजन प्लांट में अनुकूलतंम प्रचालनों से अपनी लागत दक्षता को भी बेहतर बनाया और सिंगल प्लांट टर्नडाउन मोड में काम करके बिजली की लागत में लगभग 1.9 करोड़ रुपये की बचत की है। दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धियों में ब्लास्ट फर्नेस (पैकेज 05) और टर्बो ब्लोअर (पैकेज 10A) के पीजी टेस्ट का सफलतापूर्वक पूरा होना, साथ ही IS 2041:2024 और IS 2062 E450BR के लिए बीआईएस लाइसेंस हासिल करना शामिल है।

सभी इकाइयों में इस शानदार निष्पादन पर टिप्पणी करते हुए श्री अमिताभ मुखर्जी, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक ने कहा, ”सभी इकाइयों में लगातार रिकॉर्ड तोड़ उपलब्धियां हमारी टीम के समर्पण, अनुशासन और पक्के इरादे को दर्शाती हैं। भारत एक ग्लोबल स्टील पावरहाउस बनने की अपनी यात्रा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और एनएसएल प्रौद्योगिकी से संचालित दक्षता, बढ़ते प्रोडक्ट पोर्टफोलियो और राष्ट्र निर्माण की प्रतिबद्धता के साथ भारत की इस्पात यात्रा की प्रगति में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।”

महासागरों में भारत के 60 प्रतिशत भूभाग के बराबर खनिज, ऊर्जा और जैव विविधता मौजूद है: डॉ. जितेंद्र सिंह

0

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत के महासागरों को एक बड़े पैमाने पर अप्रयुक्त राष्ट्रीय संपत्ति कहा। उन्होंने कहा कि नीली अर्थव्यवस्था में देश के भविष्य के विकास का एक प्रमुख चालक बनने की क्षमता है, जो ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य आवश्यकताओं और रणनीतिक शक्ति में योगदान दे सकती है।

केंद्रीय मंत्री भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव के दौरान “नीली अर्थव्यवस्था, महासागर, ध्रुव, पृथ्वी और पारिस्थितिकी – सागरिका, पृथ्वी विज्ञान की कहानी” विषय पर आयोजित सत्र में मुख्य भाषण दे रहे थे।

सभा को संबोधित करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि महासागर भारत की सभ्यतागत समझ का केंद्र रहा है, उसका आर्थिक एवं वैज्ञानिक संभावनाओं का उपयोग करने के लिए व्यवस्थित प्रयास हाल के वर्षों में ही तेज हुआ है। उन्होंने कहा कि कि नीली अर्थव्यवस्था पर सरकार का ध्यान 2023 और 2024 में प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के संबोधनों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है जहां इसकी पहचान राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में की गई।

भारत के भौगोलिक लाभ पर प्रकाश डालते हुए, मंत्री ने कहा कि देश की तटरेखा 11,000 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी है और इसका विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र 23.7 लाख वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा है। उन्होंने कहा कि हमारे भू-भाग का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा समुद्र में है, फिर भी मूल्य सृजन में इसका योगदान अब तक सीमित रहा है। उन्होंने आगे कहा कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भूमि-आधारित संसाधनों से आगे देखना होगा।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि डीप ओशन मिशन भारत के महासागर-संबंधित अनुसंधान एवं आर्थिक गतिविधियों को संस्थागत रूप देने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि महासागरों में खनिजों, धातुओं, जैव विविधता और मत्स्य संसाधनों के भंडार मौजूद हैं और यह देश के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। नवीकरणीय विकल्पों का उल्लेख करते हुए, उन्होंने ऑफशोर पवन ऊर्जा, महासागर आधारित सौर ऊर्जा, ज्वारीय और लहर ऊर्जा, समुद्र के पानी में तापमान के अंतर से उत्पन्न तापीय ऊर्जा, और यहां तक कि लवणीय प्रवणता से  प्राप्त ऊर्जा पर चर्चा की।

साथ ही, उन्होंने उभरती चुनौतियों के बारे में चेतावनी दी, जिनमें जलवायु-संबंधी खतरों जैसे तटीय कटाव, समुद्री उष्ण तरंग और चक्रवात, साथ ही समुद्री कचरा और प्रदूषण जैसी गैर-जलवायु संबंधी समस्याएं शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इन चिंताओं से निपटने के लिए प्रभावी संसाधन मानचित्रण, उपयुक्त तकनीक का उपयोग और निजी क्षेत्र की ज्यादा भागीदारी आवश्यक है।

मंत्री ने नीली अर्थव्यवस्था के रणनीतिक पहलू को भी उजागर किया और कहा कि समुद्री संसाधनों का सतत उपयोग बदलते वैश्विक क्रम में भारत की भू-राजनीतिक स्थिति को मजबूत करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि समुद्री परिवहन, गहरे समुद्र में खनन, जैव प्रौद्योगिकी और समुद्री जैव विविधता से नई औषधीय यौगिकों की खोज से नई आर्थिक अवसर प्रदान कर सकती हैं।

पैनल चर्चा में वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया जिसमें जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव और हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव शामिल थे। वैज्ञानिकों एवं प्रशासकों ने सरकार, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग के बीच समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने अपना वक्तव्य समाप्त करते हुए समुद्री संसाधनों का जिम्मेदारीपूर्वक अन्वेषण करने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि आज लिए गए निर्णय भारत के आर्थिक एवं पारिस्थितिक भविष्य को आकार देंगे।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने टीबी मुक्त भारत की दिशा में आगे बढ़ने के लिए राजस्थान के सांसदों के साथ बैठक की

0

“टीबी मुक्त भारत” के लिए राजनीतिक भागीदारी को और मज़बूत करने के निरंतर प्रयास में, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा ने आज संसद के चल रहे शीतकालीन सत्र के दौरान राजस्थान के सांसदों से मुलाकात की। यह सत्र विभिन्न राज्यों के सांसदों के साथ निरंतर चल रही ब्रीफिंग श्रृंखला का हिस्सा है जिसका उद्देश्य भारत में टीबी के विरुद्ध लड़ाई में सामूहिक नेतृत्व को मज़बूत करना है।

आज के सत्र में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री भागीरथ चौधरी, केंद्रीय रेल एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री श्री रवनीत सिंह बिट्टू और राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने वाले दोनों सदनों के सांसद नई दिल्ली स्थित संसद भवन एनेक्सी एक्सटेंशन में उपस्थित थे। विचार-विमर्श में टीबी, एक ऐसी बीमारी जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है, उन्मूलन की दिशा में भारत की तेज़ प्रगति में निर्वाचित प्रतिनिधियों की केंद्रीय भूमिका पर प्रकाश डाला गया।

 भारत में मोटापा एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभरा है और यह केवल एक सौंदर्य संबंधी समस्या नहीं है

0

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव (आईआईएसएफ) में “मोटापे पर चिकित्सक-वैज्ञानिक संवाद” विषय पर पैनल चर्चा में कहा, “मोटापा भारत में एक जन स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभरा है और यह केवल सौंदर्य संबंधी समस्या नहीं है। इस चुनौती का समाधान वैज्ञानिक सटीकता एवं नीतिगत अनुशासन के साथ करने की आवश्यकता है।”

इस सत्र का आयोजन नैदानिक ​​चिकित्सा, जैव चिकित्सा अनुसंधान और लोक नीति के प्रमुख विशेषज्ञों की उपस्थिति में किया गया। इस सत्र में भारत में बढ़ते चयापचय चुनौतियों पर एक बहु-विषयक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया। मंत्री ने आईआईएसएफ में खचाखच भरे दर्शकों को संबोधित करते हुए इस बात पर बल दिया कि कैसे सामाजिक व्यवहार, बाज़ार और गलत सूचनाओं ने भारत में मोटापे के परिदृश्य को जटिल बना दिया है। 

मंच पर भारत के वैज्ञानिक एवं चिकित्सा समुदाय के प्रमुख विशेषज्ञ उपस्थित थे, जिनमें एनएबीआई के कार्यकारी निदेशक डॉ. अश्वनी पारीक; डॉ. विनोद कुमार पॉल और डॉ. वी.के. सारस्वत, सदस्य नीति आयोग; प्रो. उल्लास कोल्थुर, सीडीएफडी के निदेशक; टीएचएसटीआई के कार्यकारी निदेशक डॉ. गणेशन कार्तिकेयन; और वरिष्ठ एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. संजय भदादा और डॉ. सचिन मित्तल शामिल थे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीय समाज में मोटापे को एक बीमारी के बजाय एक सौंदर्य संबंधी समस्या के रूप में देखा जाता है जिसके कारण इस पर वैज्ञानिक चर्चा में देरी हुई है। उन्होंने कहा, “दशकों से, हमारे चिकित्सा सम्मेलनों में मधुमेह एवं चयापचय संबंधी विकारों पर चर्चा होती रही है लेकिन मोटापे पर कभी नहीं हुई। पिछले 15 वर्षों में हमने इसे एक गंभीर चिकित्सा प्रासंगिकता वाला विषय के रूप में देखना शुरू किया है।”

मंत्री ने भारत की अनोखी शारीरिक विशेषताओं को उजागर किया। उन्होंने विशेष रूप से पूर्वी आबादी में केंद्रीय या आंतरिक मोटापे की उच्च व्यापकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीयों के लिए, कमर की माप वजन से ज्यादा महत्वपूर्ण कहानी बताती है और इस बात पर बल दिया कि यद्यपि समग्र शरीर का वजन सामान्य प्रतीत होता है, फिर भी आंतरिक वसा एक स्वतंत्र जोखिम कारक है।

जीएलपी-आधारित दवाओं का व्यापक और फैशनेबल उपयोग पर बात करते हुए, मंत्री ने विवेकपूर्ण उपयोग के साथ सावधानी बरतने का आग्रह किया और इस बात पर बल दिया कि कभी-कभी दीर्घकालिक प्रभाव कई वर्षों बाद स्पष्ट होते हैं। उन्होंने पिछले सार्वजनिक-स्वास्थ्य गलत निर्णयों को याद किया जैसे कि 1970 और 80 के दशक में रिफाइंड तेलों में अनियमित बदलाव, जिसने बाद में प्रतिकूल परिणाम सामने आए। उन्होंने कहा कि सही नैदानिक निष्कर्ष दशकों से परिणामों का अवलोकन करने से प्राप्त हो सकता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने तेजी से या दवा के माध्यम से वजन घटने से जुड़ी सार्कोपेनिया और ओज़ेम्पिक फेस जैसी उभरती चिंताओं का भी उल्लेख किया तथा कहा कि शारीरिक प्रभाव का पूरा स्पेक्ट्रम अभी भी पूरी तरह से समझा नहीं गया है।

मंत्री के संबोधन का एक बड़ा हिस्सा गलत सूचनाओं से उत्पन्न खतरे पर केंद्रित रहा। उन्होंने चेतावनी दी कि अयोग्य चिकित्सक एवं स्वयंभू आहार विशेषज्ञ भारत के चयापचय संकट को और बदतर बना रहे हैं। उन्होंने कहा, “भारत में चुनौती जागरूकता की कमी नहीं बल्कि भ्रामक सूचनाओं का तेज़ी से बढ़ना है। प्रत्येक कॉलोनी में एक आहार विशेषज्ञ तो है लेकिन उनकी योग्यता की जांच करने की कोई व्यवस्था नहीं है। अनियंत्रित सलाह और बिना जांचे-परखे नुस्खे मोटापे से भी ज़्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं।” उन्होंने नीति निर्माताओं से ऐसे उपाय तैयार करने का आग्रह किया जो मरिजों भ्रामक हस्तक्षेपों से सुरक्षित रखें।

उन्होंने भारत में चयापचय संबंधी जटिलताओं के बढ़ते दायरे की भी बात की। उन्होंने कहा, “पहले ओपीडी में आने वाले हर तीसरे मरीज़ को मधुमेह का पता ही नहीं चलता था; आज हर तीसरे मरीज़ को फैटी लिवर है। यह दायरा बढ़ रहा है, और हमें इससे निपटने के लिए कहीं ज़्यादा वैज्ञानिक एवं विनियमित तंत्र की आवश्यकता है।”

अपने भाषण का समापन मार्क ट्वेन के अर्थशास्त्र पर प्रसिद्ध उद्धरण से तुलना करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, “मोटापा जैसा गंभीर विषय केवल एंडोक्राइनोलॉजिस्टों के लिए छोड़ने लायक नहीं है। यह एक सामाजिक समस्या है जो संस्कृति, आदतों, बाजार और गलत जानकारी से उत्पन्न होती है और इसके दायरे को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है।”

सत्र का समापन भारत में तेजी से विकसित हो रही चयापचय स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए चिकित्सकों, शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं और जनता से गहन सहयोग की अपील के साथ हुआ।

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव (आईआईएसएफ) में “मोटापे पर चिकित्सक-वैज्ञानिक संवाद” विषय पर पैनल चर्चा में कहा, “मोटापा भारत में एक जन स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभरा है और यह केवल सौंदर्य संबंधी समस्या नहीं है। इस चुनौती का समाधान वैज्ञानिक सटीकता एवं नीतिगत अनुशासन के साथ करने की आवश्यकता है।”

इस सत्र का आयोजन नैदानिक ​​चिकित्सा, जैव चिकित्सा अनुसंधान और लोक नीति के प्रमुख विशेषज्ञों की उपस्थिति में किया गया। इस सत्र में भारत में बढ़ते चयापचय चुनौतियों पर एक बहु-विषयक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया। मंत्री ने आईआईएसएफ में खचाखच भरे दर्शकों को संबोधित करते हुए इस बात पर बल दिया कि कैसे सामाजिक व्यवहार, बाज़ार और गलत सूचनाओं ने भारत में मोटापे के परिदृश्य को जटिल बना दिया है। 

मंच पर भारत के वैज्ञानिक एवं चिकित्सा समुदाय के प्रमुख विशेषज्ञ उपस्थित थे, जिनमें एनएबीआई के कार्यकारी निदेशक डॉ. अश्वनी पारीक; डॉ. विनोद कुमार पॉल और डॉ. वी.के. सारस्वत, सदस्य नीति आयोग; प्रो. उल्लास कोल्थुर, सीडीएफडी के निदेशक; टीएचएसटीआई के कार्यकारी निदेशक डॉ. गणेशन कार्तिकेयन; और वरिष्ठ एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. संजय भदादा और डॉ. सचिन मित्तल शामिल थे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीय समाज में मोटापे को एक बीमारी के बजाय एक सौंदर्य संबंधी समस्या के रूप में देखा जाता है जिसके कारण इस पर वैज्ञानिक चर्चा में देरी हुई है। उन्होंने कहा, “दशकों से, हमारे चिकित्सा सम्मेलनों में मधुमेह एवं चयापचय संबंधी विकारों पर चर्चा होती रही है लेकिन मोटापे पर कभी नहीं हुई। पिछले 15 वर्षों में हमने इसे एक गंभीर चिकित्सा प्रासंगिकता वाला विषय के रूप में देखना शुरू किया है।”

मंत्री ने भारत की अनोखी शारीरिक विशेषताओं को उजागर किया। उन्होंने विशेष रूप से पूर्वी आबादी में केंद्रीय या आंतरिक मोटापे की उच्च व्यापकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीयों के लिए, कमर की माप वजन से ज्यादा महत्वपूर्ण कहानी बताती है और इस बात पर बल दिया कि यद्यपि समग्र शरीर का वजन सामान्य प्रतीत होता है, फिर भी आंतरिक वसा एक स्वतंत्र जोखिम कारक है।

जीएलपी-आधारित दवाओं का व्यापक और फैशनेबल उपयोग पर बात करते हुए, मंत्री ने विवेकपूर्ण उपयोग के साथ सावधानी बरतने का आग्रह किया और इस बात पर बल दिया कि कभी-कभी दीर्घकालिक प्रभाव कई वर्षों बाद स्पष्ट होते हैं। उन्होंने पिछले सार्वजनिक-स्वास्थ्य गलत निर्णयों को याद किया जैसे कि 1970 और 80 के दशक में रिफाइंड तेलों में अनियमित बदलाव, जिसने बाद में प्रतिकूल परिणाम सामने आए। उन्होंने कहा कि सही नैदानिक निष्कर्ष दशकों से परिणामों का अवलोकन करने से प्राप्त हो सकता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने तेजी से या दवा के माध्यम से वजन घटने से जुड़ी सार्कोपेनिया और ओज़ेम्पिक फेस जैसी उभरती चिंताओं का भी उल्लेख किया तथा कहा कि शारीरिक प्रभाव का पूरा स्पेक्ट्रम अभी भी पूरी तरह से समझा नहीं गया है।

मंत्री के संबोधन का एक बड़ा हिस्सा गलत सूचनाओं से उत्पन्न खतरे पर केंद्रित रहा। उन्होंने चेतावनी दी कि अयोग्य चिकित्सक एवं स्वयंभू आहार विशेषज्ञ भारत के चयापचय संकट को और बदतर बना रहे हैं। उन्होंने कहा, “भारत में चुनौती जागरूकता की कमी नहीं बल्कि भ्रामक सूचनाओं का तेज़ी से बढ़ना है। प्रत्येक कॉलोनी में एक आहार विशेषज्ञ तो है लेकिन उनकी योग्यता की जांच करने की कोई व्यवस्था नहीं है। अनियंत्रित सलाह और बिना जांचे-परखे नुस्खे मोटापे से भी ज़्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं।” उन्होंने नीति निर्माताओं से ऐसे उपाय तैयार करने का आग्रह किया जो मरिजों भ्रामक हस्तक्षेपों से सुरक्षित रखें।

उन्होंने भारत में चयापचय संबंधी जटिलताओं के बढ़ते दायरे की भी बात की। उन्होंने कहा, “पहले ओपीडी में आने वाले हर तीसरे मरीज़ को मधुमेह का पता ही नहीं चलता था; आज हर तीसरे मरीज़ को फैटी लिवर है। यह दायरा बढ़ रहा है, और हमें इससे निपटने के लिए कहीं ज़्यादा वैज्ञानिक एवं विनियमित तंत्र की आवश्यकता है।”

अपने भाषण का समापन मार्क ट्वेन के अर्थशास्त्र पर प्रसिद्ध उद्धरण से तुलना करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, “मोटापा जैसा गंभीर विषय केवल एंडोक्राइनोलॉजिस्टों के लिए छोड़ने लायक नहीं है। यह एक सामाजिक समस्या है जो संस्कृति, आदतों, बाजार और गलत जानकारी से उत्पन्न होती है और इसके दायरे को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है।”

सत्र का समापन भारत में तेजी से विकसित हो रही चयापचय स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए चिकित्सकों, शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं और जनता से गहन सहयोग की अपील के साथ हुआ।

सरकार का युवाओं के कौशल, नेतृत्व और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान फोकस

0

युवा मामले विभाग, मेरा युवा भारत (माई भारत) और राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के ज़रिए युवा विकास कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करता है, जो विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व विकास, कौशल विकास, नागरिक सहभागिता और अनुभवात्मक शिक्षा के अवसर प्रदान करते हैं।

माई भारत के अंतर्गत, वित्त वर्ष 2023-24 और 2024-25 के दौरान आयोजित प्रमुख कार्यक्रमों में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व के दिवसों का पालन, विकसित भारत एम्बेसडर – युवा कनेक्ट, माई भारत-विकसित भारत@2047 भाषण प्रतियोगिता, राष्ट्रीय युवा संसद नेतृत्व कार्यक्रम महोत्सव (जिसे विकसित भारत युवा नेता संवाद के रूप में दोबारा डिज़ाइन किया गया है), विकसित भारत युवा संसद शामिल हैं।

इसके अलावा, माई भारत पोर्टल 18-29 वर्ष की उम्र के युवाओं में उद्यमिता और कौशल विकास को बढ़ावा देने के लिए पुलिस, डाक सेवाओं, जन औषधि केंद्रों और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में अनुभवात्मक शिक्षण कार्यक्रम (ईएलपी) भी प्रदान करता है। वार्षिक कार्य योजना 2025-26 के तहत व्यावसायिक प्रशिक्षण- सफलता के लिए कौशल का मकसद युवाओं का आत्म-सम्मान बढ़ाना और उन्हें सार्थक रोज़गार या स्व-रोज़गार के लिए उच्च-स्तरीय सॉफ्ट स्किल्स, संचार कौशल और जीवन कौशल प्राप्त करने हेतु मार्गदर्शन प्रदान करना है। राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान (आरजीएनआईवाईडी) जीवन कौशल, नेतृत्व, क्षमता निर्माण, शैक्षणिक कार्यक्रमों और प्लेसमेंट ड्राइव में वार्षिक प्रशिक्षण आयोजित करता है।

सरकार एनएसएस और माई भारत जैसे मंचों के ज़रिए युवाओं और स्वयंसेवकों को जोड़ती है, जो देश भर के युवाओं को विभिन्न विकासात्मक, सामाजिक और सामुदायिक गतिविधियों के लिए प्रेरित करते हैं। ये मंच विकासात्मक पहलों में व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए युवा क्लबों, स्थानीय हितधारकों और स्वयंसेवकों के साथ सहयोग करते हैं।

सरकार ने रोज़गार के अवसर बढ़ाने और रोज़गार क्षमता में सुधार लाने के लिए कई राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम लागू किए हैं। इनमें प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी), महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (एमजीएनआरईजीएस), दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना (डीडीयू-जीकेवाई), ग्रामीण स्वरोज़गार एवं प्रशिक्षण संस्थान (आरएसईटीआई), दीनदयाल अंन्त्योदय योजना- राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन(डीएवाई-एनयूएलएम) और प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई) शामिल हैं। स्किल इंडिया मिशन (एसआईएम) के तहत, युवाओं को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई), जन शिक्षण संस्थान (जेएसएस), राष्ट्रीय शिक्षुता संवर्धन योजना (एनएपीएस) और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के ज़रिए शिल्पकार प्रशिक्षण योजना (सीटीएस) के ज़रिए कौशल प्रशिक्षण प्राप्त होता है। बजट 2024-25 में घोषित सरकार के प्रधानमंत्री पैकेज में पाँच योजनाएँ और पहल शामिल हैं, जो पाँच वर्षों में 4.1 करोड़ युवाओं के लिए रोज़गार और कौशल के अवसर प्रदान करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। राष्ट्रीय करियर सेवा (एनसीएस) पोर्टल नौकरी मिलान, करियर परामर्श, व्यावसायिक मार्गदर्शन और कौशल विकास पाठ्यक्रमों की जानकारी प्रदान करता है। इसके अलावा, एस्पायर योजना आजीविका व्यवसाय इन्क्यूबेटरों के ज़रिए कृषि क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा देती है और ग्रामीण युवाओं, महिलाओं और बेरोजगार व्यक्तियों को कौशल विकास प्रशिक्षण प्रदान करती है।

माई भारत और एनवाईकेएस जिलों, ब्लॉकों और गांवों के विविध और वंचित पृष्ठभूमि के युवाओं को जोड़ते हैं। एनएसएस राष्ट्रीय एकता शिविरों, गणतंत्र दिवस परेड शिविरों, राष्ट्रीय युवा संसद, राष्ट्रीय युवा महोत्सव और गावों को गोद लेने के कार्यक्रमों के ज़रिए ग्रामीण और वंचित युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करता है, ताकि युवा स्थानीय विकास में योगदान दे सकें।

युवा मामले विभाग, एनएसएस, माई भारत और अन्य कार्यक्रमों के ज़रिए युवाओं में जागरूकता और कल्याण को बढ़ावा देता है। ये मंच अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस, ब्लॉक और जिला स्तर पर खेल आयोजन, ध्यान सत्र और स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम जैसी गतिविधियों का आयोजन करते हैं। एनएसएस युवाओं और समुदायों में जागरूकता पैदा करने और मानसिक कल्याण को बढ़ावा देने के लिए आयुष्मान भारत और टेली-मानस हेल्पलाइन जैसी पहलों को भी एकीकृत करता है। माई भारत के ज़रिए युवा मामले विभाग ने व्यक्तियों और परिवारों पर नशीली दवाओं की लत और मादक द्रव्यों के सेवन के हानिकारक प्रभाव को पहचाना और वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान पूरे देश में नशीली दवाओं की लत और मादक द्रव्यों के सेवन पर जागरूकता और शिक्षा कार्यक्रम आयोजित किए।

इसके अलावा, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तथा सेवाएँ प्रदान करने के दौरान ऐसे व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा, प्रोत्साहन, पूर्ति तथा उससे जुड़े मामलों के लिए एक अधिनियम है। हालाँकि, मानसिक विकारों की समस्या से निपटने के लिए, भारत सरकार देश में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (एनएमएचपी) लागू कर रही है।

इसके अलावा, सरकार ने देश में गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य परामर्श और देखभाल सेवाओं तक पहुँच को और बेहतर बनाने के लिए 10 अक्टूबर 2022 को एक “राष्ट्रीय टेली मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम” शुरू किया है। सरकार ने एक व्यापक मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म, टेली मानस, भी लॉन्च किया है, जिसे मानसिक स्वास्थ्य से लेकर मानसिक विकारों तक, सभी प्रकार के मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों पर सहायता प्रदान करने के लिए विकसित किया गया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने देश की पहली राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति भी तैयार की है।

यह जानकारी युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।

यूपीआई को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम माना; ग्लोबल ट्रांजैक्शन में 49% हिस्सेदारी

0


पीआईडीएफ-समर्थित इंफ्रास्ट्रक्चर, भीम-यूपीआई इंसेंटिव और रूपे-यूपीआई विस्तार जैसे लक्षित उपायों से पूरे भारत में डिजिटल पेमेंट अपनाने में तेज़ी आ रही है

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की जून 2025 की रिपोर्ट ‘ग्रोइंग रिटेल डिजिटल पेमेंट्स (द वैल्यू ऑफ इंटरऑपरेबिलिटी)’ में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) को ट्रांजैक्शन वॉल्यूम के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा रिटेल फास्ट-पेमेंट सिस्टम (एफपीएस) माना गया है। इसके अलावा, एसीआई वर्ल्डवाइड की 2024 की रिपोर्ट ‘प्राइम टाइम फॉर रियल-टाइम’ के अनुसार, यूपीआई की ग्लोबल रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में लगभग 49% हिस्सेदारी है।

यूपीआई की वर्तमान स्थिति और अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय रियल-टाइम पेमेंट प्लेटफॉर्म की तुलना में मार्केट शेयर का विस्तृत तुलनात्मक विवरण नीचे दी गई तालिका में दिया गया है।

यूपीआई सहित डिजिटल पेमेंट सिस्टम को अपनाने में छोटे व्यापारियों की मदद करने के लिए, सरकार, भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) और नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (एनपीसीआई) ने समय-समय पर कई पहल की हैं। इनमें कम वैल्यू वाले भीम-यूपीआई ट्रांजैक्शन को बढ़ावा देने के लिए इंसेंटिव स्कीम, और पेमेंट्स इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (पीआईडीएफ) शामिल हैं, जो टियर-3 से 6 केंद्रों में डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे पीओएस  टर्मिनल और क्यूआर कोड) लगाने के लिए बैंकों और फिनटेक कंपनियों को अनुदान सहायता प्रदान करता है। 31 अक्टूबर, 2025 तक, पीआईडीएफ के माध्यम से टियर-3 से 6 केंद्रों में लगभग 5.45 करोड़ डिजिटल टच पॉइंट लगाए गए हैं। इसके अलावा, वित्त वर्ष 2024-25 तक, लगभग 6.5 करोड़ व्यापारियों को कुल 56.86 करोड़ क्यूआर कोड दिए गए।

सरकार,  भारतीय रिज़र्व बैंक और एनपीसीआई ने पूरे देश में सार्वजनिक सेवाओं, परिवहन और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म सहित सभी बिज़नेस में रूपे और यूपीआई के ज़रिए डिजिटल ट्रांजैक्शन को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है।

अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय रीयल-टाइम भुगतान प्लेटफार्मों के मुकाबले यूपीआई की स्थिति

देशलेन-देन की मात्रा(अरबों में)वैश्विक रीयल-टाइम भुगतान प्लेटफ़ॉर्म का % हिस्सा
भारत129.349%
ब्राज़ील37.414%
थाईलैंड20.48%
चीन17.26%
दक्षिण कोरिया9.13%
अन्य52.820%
कुल266.2100%