आलोक पुराणिक गालिब शायरी के वह सूरज हैं, जिनके करीब के बड़े सितारों की चमक भी मद्धम दिखती है। जौक शायरी के ऐसे सितारे हैं, जिनकी चमक मद्धम दिखती है गालिब की रोशनी के सामने। पर जौक जौक हैं, उर्दू शायरी में अपना मुकाम रखते हैं, बल्कि जौक का मुकाम आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के दरबार में बहुत ऊंचा था। जफर जौक को अपना उस्ताद मानते थे। गालिब को कहीं ना कहीं यही बात चुभती थी। गालिब फब्ती कसते थे जौक पर कुछ इस तरह से-
हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता वगरना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है
चोट सीधी जौक पर थी, शाह का दरबारी हो गया है जौक, तो ही इज्जत है, वरना जौक को कौन पूछता है, यह कहना चाहते हैं गालिब। पर वक्त सबको खाक करता है दोनों शायर दिल्ली में खाक हुए। दोनों की शायरी वक्त के पार आकर हम तक पहुंचती है। कुछ शेर देखिये जौक के-
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से सुल्तानपुर मेट्रो स्टेशन पर महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य एवं कल्याण पर एक माह की दिल्ली मेट्रो अभियान की शुरुआत की। 10 दिसंबर से 10 जनवरी 2026 तक चलने वाले इस अभियान का उद्देश्य मेट्रो ट्रेनों और चुनिंदा स्टेशनों पर प्रदर्शित संदेशों के माध्यम से लाखों यात्रियों तक पहुंचना है। इन संदेशों में महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण के महत्व पर प्रकाश डाला गया है; डिजिटल विभाजन को कम करना; महिलाओं के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता की पहुंच में सुधार करना; प्रसवोत्तर रोग निवारण एवं बाल रोग निवारण और तपेदिक के बारे में जागरूकता फैलाना शामिल है।
इस अवसर पर केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलीला श्रीवास्तव ने कहा कि महिलाओं के स्वस्थ होने के बिना कोई भी परिवार या राष्ट्र सही मायने में प्रगति नहीं कर सकता। महिलाओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। दिल्ली मेट्रो के इस अभियान के माध्यम से हम इस संदेश को व्यापक जनसमुदाय तक पहुंचाना चाहते हैं। यह संदेश को सीधे लोगों तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम है।
उन्होंने यह भी बताया कि टीबी जागरूकता, डिजिटल विभाजन को कम करने, गर्भधारण पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसी एंड पीएनडीटी) अधिनियम, 1994 और अन्य प्रमुख मुद्दों पर संदेश मेट्रो के डिब्बों के अंदर और बाहर दोनों जगह प्रदर्शित किए गए हैं।
लिंग निर्धारण और चयन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकों की बढ़ती सुलभता पर बोलते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने कहा कि पहले लोग भ्रूण का लिंग निर्धारित करने के लिए अल्ट्रासाउंड पर निर्भर थे। अब इसी उद्देश्य के लिए नई तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। इन प्रथाओं को बंद करना होगा और लोगों को इसके प्रति जागरूक करना आवश्यक है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन, दक्षिण पूर्व एशिया की प्रभारी अधिकारी डॉ. कैथरीना बोहेम ने कहा कि इस मेट्रो स्टेशन पर कुछ यात्राएं समाप्त होती हैं और कुछ शुरू होती हैं। आज लैंगिक हिंसा के खिलाफ 16 दिनों के अभियान का अंतिम दिन है। और जैसे ही यह अभियान समाप्त होता है, एक नया अभियान शुरू होता है। हमें महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए दिल्ली मेट्रो अभियान शुरू करते हुए गर्व हो रहा है, जो दो सरल और चिरस्थायी सत्यों पर आधारित है: स्वस्थ महिलाएं = स्वस्थ राष्ट्र, और #क्योंकि वह महत्वपूर्णहै।
डॉ. बोहेम ने आगे कहा कि स्वस्थ महिलाएं एक स्वस्थ परिवार, समुदाय और एक स्वस्थ राष्ट्र के स्तंभ हैं। इसलिए महिलाओं और लड़कियों का स्वास्थ्य, जिसमें उनका मानसिक स्वास्थ्य भी शामिल है, न केवल उनके कल्याण के लिए, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण रूप से हमारे कल्याण के लिए भी महत्वपूर्ण है।
रत, स्वस्थ नारी सशक्त परिवार अभियान, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृव अभियान, मिशन शक्ति, निर्भया कोष और आयुष्मान भारत जैसी विभिन्न राष्ट्रीय पहलों के माध्यम से महिलाओं के स्वास्थ्य और सशक्तीकरण को लगातार मजबूत कर रहा है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की सचिव सुश्री पुण्य सलीला श्रीवास्तव ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी एजेंसियों के साथ मिलकर इस पहल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।
इस शुभारंभ कार्यक्रम में महिलाओं के बैंड वेबहोर की प्रस्तुति भी शामिल थी, जो अभियान की सामूहिक भावना को दर्शाती है और महिलाओं के लचीलेपन, गरिमा और सशक्तीकरण का जश्न मनाती है। इसके बाद गणमान्य व्यक्तियों और प्रतिभागियों ने उद्घाटन अभियान की सवारी में भाग लिया, जो महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा, सम्मान और कल्याण को बढ़ावा देने की साझा जिम्मेदारी को दर्शाती है।
दिल्ली मेट्रो को पूरे शहर में इन सशक्त संदेशों को प्रसारित करने के लिए धन्यवाद देते हुए डॉ. बोहेम ने इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता पर बल दिया, “इस महत्वपूर्ण यात्रा में सहयात्री बनने के लिए मैं आप सभी का धन्यवाद करती हूं। इस संदेश को फैलाने में मदद करें और एकजुट हों क्योंकि स्वस्थ महिलाएं स्वस्थ राष्ट्रों का निर्माण करती हैं।”
स्वच्छ भारत मिशन–अर्बन 2.0के तहत कचरा प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए उत्तर प्रदेश में बायो गैस उत्पादन करने वाले अत्याधुनिक बायो-CNG प्लांट का प्रयागराज में शुभारंभ किया गया। यह देश के आधुनिक वेस्ट टू एनर्जी मॉडल्स में शामिल है। यह संयंत्र न केवल शहर को कचरा मुक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि स्वच्छ और ग्रीन ऊर्जा उत्पादन और स्थानीय किसानों को सशक्त करने का भी एक बड़ा माध्यम बन रहा है।
प्रयागराज में विकसित यह प्रोजेक्ट विविध प्रकार के कार्बनिक कचरे को संसाधित कर Bio-CNG उत्पन्न करने में सक्षम है। इस संयंत्र में प्रतिदिन कुल 343 टन ऑर्गेनिक वेस्ट को प्रोसेस करने की क्षमता है, जिससे लगभग 21 टन प्रतिदिन बायो-CNG का उत्पादन हो रहा है। कृषि अवशेष—जैसे कि धान की पुआल, गोबर और मुर्गी शाला के अवशेष से कंप्रेस्ड बायो-गैस उत्पादित हो रही है। नगर निगम प्रयागराज के इस सराहनीय कदम के फलस्वरूप वर्तमान में लगभग 125 मैट्रिक टन गीला कचरा उपलब्ध कराया जा रहा है जो शुरुआती दौर में मात्र 7-8 मीट्रिक टन ही था। इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता इसका मल्टी-फीडस्टॉक मॉडल है, जिसमें नगर निगम का ठोस कचरा, पुआल, गोबर और पोल्ट्री लिटर सभी का कुशलतापूर्वक उपयोग किया जाता है। इससे न केवल स्वच्छ ईंधन का उत्पादन हो रहा है, बल्कि पराली जलाने जैसी समस्याओं पर भी नियंत्रण रखा जा सकेगा। साथ ही, यह परियोजना प्रतिदिन 28 टन उच्च गुणवत्ता वाली कम्पोस्ट भी तैयार कर रही है। यह कम्पोस्ट स्थानीय किसानों को उपलब्ध करा, Regenerative Farming को भी बढ़ावा मिल रहा है।
पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत संचालित यह संयंत्र शहर के होटलों, रेस्टोरेंट्स, अपार्टमेंट और अन्य संस्थानों से उत्पन्न होने वाले थोक कचरे का समाधान प्रदान करता है। तैयार बायो-CNG को CBG-CGD Synchronization Scheme के तहत बिक्री की जा रहा है, जिसमें ईंधन कैस्केड रूट के माध्यम से वितरित किया जा रहा है। यह स्वच्छ ऊर्जा शहर के परिवहन में काम आ रहा है, एवं आगामी समय में 45,000 घरों को भी पाइपलाइन के माध्यम से गैस उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है। जिससे शहर में ईंधन पर निर्भरता कम होगी और कार्बन उत्सर्जन में 57000 MT वार्षिक उल्लेखनीय कमी आएगी।
इस बायो-CNG प्लांट की शुरुआत के साथ उत्तर प्रदेश ने हरित ऊर्जा और अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर स्थापित किया है। यह परियोजना न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक दूरदर्शी कदम है, बल्कि कचरे से कंचनबनाने के मिशन को भी साकार करती है।
काशी तमिल संगमम् 4.0 में तमिलनाडु से काशी आने वाले समूह का सिलसिला जारी है। तमिलनाडु से काशी तमिल संगमम् 4.0 में शामिल होने के लिए पांचवां दल विशेष ट्रेन से बनारस रेलवे स्टेशन पहुंचा। जिसमें बड़ी संख्या में पेशेवर और कारीगर शामिल थे। स्टेशन पर उतरते ही मेहमानों का पारंपरिक तरीके से डमरू वादन,पुष्प वर्षा और ‘हर-हर महादेव’ तथा ‘वणक्कम् काशी’ के उद्घोष से भव्य स्वागत किया गया। इन मेहमानों के स्वागत के लिए पुलिसकर्मी स्टेशन पर मौजूद रहे।
स्टेशन पर पारंपरिक स्वागत देखकर तमिल दल के सदस्यों में खासा उत्साह देखने को मिला। कई लोगों ने कहा कि काशी में मिल रही गर्मजोशी और आध्यात्मिक वातावरण उनके लिए अविस्मरणीय है। डमरू वादन की ध्वनि से पूरा परिसर शिवमय हो गया और काशी व तमिलनाडु की सांस्कृतिक एकता की झलक साफ दिखाई दी।
स दल में शामिल लोगों ने कहा कि काशी आध्यात्मिक नगरी है। यहां बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने के बाद हम लोग एकेडमिक कार्यक्रम में शामिल होंगे। वहां बहुत कुछ सीखने और जानने को मिलेगा। कुछ ऐसे भी डेलीगेट दिखे जो काशी की धरती पर उतरते ही दंडवत लेट गए उन्होंने कहा कि यह पवित्र धरती है यहां आकर बहुत खुशी हुई है दो राज्यों के संस्कृति और भाषा का मिलन हो रहा है यह प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की परिकल्पना एक भारत श्रेष्ठ भारत का मजबूत स्तंभ है।
काशी तमिल संगमम् 4.0 का आयोजन 2 दिसंबर से हो रहा है। इस आयोजन में तमिलनाडु से अलग-अलग समूह काशी, प्रयागराज और अयोध्या का भ्रमण करेगा। इस दौरान तमिल समूह को विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों से रुबरु कराया जाएगा।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने दीपावली को आज यूनेस्को की अमूर्त विरासत सूची में शामिल किये जाने पर प्रसन्नता और गर्व व्यक्त किया।
यूनेस्को के हैंडल एक्स पर एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए श्री मोदी ने कहा:
‘‘भारत और दुनिया भर के लोग रोमांचित हैं।
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने दीपावली को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने के यूनेस्को के निर्णय पर प्रसन्नता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह वैश्विक मान्यता प्रत्येक भारतीय के लिए अत्यंत गौरव का क्षण है।
सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में उपराष्ट्रपति ने कहा कि दीपावली केवल एक त्यौहार नहीं है, बल्कि एक सभ्यतागत परंपरा है जो राष्ट्र को एकजुट करती है और विश्व भर में गूंजती है। उन्होंने कहा कि यह पर्व भारत की बहुसंस्कृतिवाद, विविधता और सामाजिक एकता का प्रतीक है, साथ ही आशा, सद्भाव और अंधकार पर प्रकाश तथा अधर्म पर धर्म की विजय का शाश्वत संदेश भी देता है।
हमारे लिए, दीपावली हमारी संस्कृति और लोकाचार से बहुत गहराई से जुड़ी हुई है। यह हमारी सभ्यता की आत्मा है। यह प्रकाश और धार्मिकता का प्रतीक है। दीपावली को यूनेस्को की अमूर्त विरासत सूची में शामिल करने से इस पर्व की वैश्विक लोकप्रियता और भी बढ़ेगी।
भारत में व्यापक रूप से मनाई जाने वाली जीवंत परंपराओं में से एक दीपावली को आज नई दिल्ली के लाल किले में आयोजित यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र के दौरान मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में अंकित किया गया है।
इस शिलालेख को केंद्रीय संस्कृति मंत्री श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, संस्कृति मंत्रालय के सचिव श्री विवेक अग्रवाल, संस्कृति मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और 194 सदस्य देशों के प्रतिनिधियों, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और यूनेस्को के वैश्विक नेटवर्क के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में अपनाया गया।
श्री शेखावत ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल को संबोधित करते हुए कहा कि यह शिलालेख भारत और विश्वभर के उन समुदायों के लिए अत्यंत गौरव का क्षण है जो दीपावली की शाश्वत भावना को जीवित रखते हैं। उन्होंने कहा कि यह त्योहार ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के सार्वभौमिक संदेश का प्रतीक है, जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की भावना को दर्शाता है और आशा, नवजीवन तथा सद्भाव का प्रतिनिधित्व करता है।
केंद्रीय मंत्री ने त्योहार की जीवंतता और जन-केंद्रित प्रकृति का उल्लेख करते हुए इस बात पर बल दिया कि दीपावली उत्सव के पीछे लाखों लोगों का योगदान होता है, जिनमें दीये बनाने वाले कुम्हार, उत्सव की सजावट करने वाले कारीगर, किसान, मिठाई बनाने वाले, पुजारी और सदियों पुरानी परंपराओं को निभाने वाले परिवार शामिल हैं। मंत्री ने कहा कि यह मान्यता उस सामूहिक श्रम को श्रद्धांजलि है जो इस परंपरा को कायम रखता है।
केंद्रीय मंत्री ने प्रवासी भारतीयों की जीवंत भूमिका को भी स्वीकार किया, जिनके दक्षिण पूर्व एशिया, अफ्रीका, खाड़ी देशों, यूरोप और कैरेबियन में मनाए जाने वाले दीपावली समारोहों ने दीपावली के संदेश को महाद्वीपों में फैलाया है और सांस्कृतिक सेतुओं को मजबूत किया है।
इस शिलालेख के साथ ही इस विरासत की रक्षा करने और इसे भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने की नई जिम्मेदारी भी आती है। केंद्रीय मंत्री ने नागरिकों से दीपावली की एकता की भावना को अपनाने और भारत की समृद्ध अमूर्त सांस्कृतिक परंपराओं का समर्थन जारी रखने का आग्रह किया।
दीपावली को इसकी गहरी सांस्कृतिक महत्ता और विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों तथा वैश्विक भारतीय प्रवासी समुदाय में मनाए जाने वाले जन त्योहार के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह एकता, नवीनीकरण और सामाजिक सामंजस्य के सिद्धांतों का प्रतीक है। दीये जलाना, रंगोली बनाना, पारंपरिक शिल्पकला, अनुष्ठान, सामुदायिक समारोह और पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण जैसी इसकी विविध प्रथाएं त्योहार की शाश्वत जीवंतता और भौगोलिकता की सीमाओं के भीतर अनुकूलन करने की क्षमता को दर्शाती हैं।
संगीत नाटक अकादमी के माध्यम से संस्कृति मंत्रालय द्वारा तैयार किए गए इस नामांकन में भारतभर के कलाकारों, शिल्पकारों, कृषि समुदायों, प्रवासी समूहों, विशेष आवश्यकताओं वाले व्यक्तियों, ट्रांसजेंडर समुदायों, सांस्कृतिक संगठनों और परंपरा के वाहकों के साथ व्यापक राष्ट्रव्यापी परामर्श किया गया। उनके सामूहिक अनुभवों ने दीपावली के समावेशी स्वरूप, समुदाय-आधारित निरंतरता और कुम्हारों और रंगोली कलाकारों से लेकर मिठाई बनाने वालों, फूल विक्रेताओं और शिल्पकारों तक आजीविका के व्यापक इकोसिस्टम को उजागर किया।
यूनेस्को के शिलालेख में दीपावली को एक जीवंत विरासत के रूप में मान्यता दी गई है जो सामाजिक आपसदारी को मजबूत करती है। यह त्योहार पारंपरिक शिल्प कौशल का समर्थन करता है, उदारता और कल्याण के मूल्यों को सुदृढ़ करता है तथा आजीविका संवर्धन, लैंगिक समानता, सांस्कृतिक शिक्षा और सामुदायिक कल्याण सहित कई सतत विकास लक्ष्यों में सार्थक योगदान देता है।
संस्कृति मंत्रालय ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह शिलालेख भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के बारे में वैश्विक जागरूकता को बढ़ावा देगा तथा भावी पीढ़ियों के लिए समुदाय-आधारित परंपराओं की रक्षा के प्रयासों को सुदृढ़ करेगा।
बुलडोजर की गूंज एक बार फिर सुनाई देने लगी है। यूपी में खासी लोकप्रियता हासिल करने के बाद अब बिहार और गोवा में इसकी दहाड़ सुनाई दे रही है। बिहार चुनाव में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रचार के दौरान आई लव यू बुलडोजर बाबा के गायन ने धूम मचा दी थी। बिहार चुनाव जीतने के बाद नीतीश सरकार के गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने अपराधियों और भू माफिया के खिलाफ यूपी की तर्ज़ पर बुलडोज़र कार्यवाही की चेतावनी दे डाली और कई स्थानों पर बुलडोज़र का करिश्मा भी देखने को मिलने लगा है। बिहार में जब से नई सरकार का गठन हुआ है, तब से प्रशासन अपने कड़े रूप में नजर आ रहा है। बिहार के तमाम जिलों में अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोजर अभियान जारी है। वहीं बुलडोजर बिहार के बाद गोवा पहुँच गया है जहां नाइट क्लब में लगी भीषण आग के बाद सरकार ने वागाटोर इलाके में स्थित रोमियो लेन नाइट क्लब के एक हिस्से को बुलडोजर से ढहा दिया। नाइट क्लब में 7 दिसंबर को आग लग गई थी जिसमें 25 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी जबकि कई लोग बुरी तरह से झुलस भी गए थे। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, रोमिया लेन बीच नाइट क्लब का निर्माण सरकारी जमीन पर अवैध तरीके से किया गया है। इसीलिए इसका ध्वस्तीकरण किया जा रहा है।
बुलडोज़र की चर्चा इस समय देश के घर घर में हो रही है। चौक चौराहों पर लोगों की जुबान पर बुलडोज़र चढा हुआ है। बुलडोजर कार्रवाई सही है या फिर गलत। इस पर कानून के जानकारों का कहना है बुलडोजर संबंधी कार्रवाई अवैध संपत्तियों पर ही होती है। मूल रूप से इसके दो कारण सामने आते हैं। पहला यह कि संपत्ति सरकारी जमीन पर कब्जा करके बनाई गई हो। दूसरा यह कि कोई अपराधी फरार हो या सरेंडर ना कर रहा हो, तब उसकी संपत्ति पर कुर्की का आदेश दिया जाता है। बहरहाल बुलडोज़र यदि नियमानुसार अपनी कार्यवाही को अंजाम देता है तो अपराधी तत्व अपराध करने से पूर्व हज़ार बार सोचेगा। यह भी कहा गया कि बुलडोज़र केवल एक ही वर्ग के लोगों के घरों पर चलाया गया। सरकार ने इसका खंडन करते हुए कहा बुलडोज़र बिना जात – पांत और धर्म देखे उन सभी लोगों की सम्पतियों पर चलाया गया जिन्होंने अवैध ढंग से सम्पति खड़ी की। बुल्डोजर कानून के अंतर्गत चलता है। यूपी सहित कई प्रदेशों में आए दिन दुष्कर्म की कार्यवाही से लेकर अवैध निर्माणों को ढ़हाने में बुल्डोजर पहुंचता है। यूपी में बुलडोजर से संपत्ति ढहाने की कार्रवाई ‘उत्तर प्रदेश अर्बन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट 1973’ के तहत होती है। इसके तहत ही प्रशासन को अवैध संपत्तियों को ढहाने का अधिकार मिला हुआ है। संपत्ति गिराने की कार्रवाई तब ही होती है, जब ये सुनिश्चित कर लिया जाता है कि निर्माण अवैध है। यहाँ सवाल यह भी उठता है कि प्रभावी लोगों ने बिना नियमानुसार स्वीकृति के अवैध निर्माण कैसे खड़े कर लिए। प्रशासन की मिलीभगत के बिना ऐसा संभव नहीं है। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि बिना तय प्रक्रिया के किसी का घर तोड़ देना असंवैधानिक है। बुलडोज़र कहीं चलाया जाता है तो तय मानकों का पालन किया जाये।
बुलडोजर दरअसल एक खास तरह की मल्टी पर्पज मशीन है, जो इन दिनों खूब चर्चा में है। बुलडोजर का मतलब जबरस्ती करना होता है। इस तरह से बुलडोजिंग का मतलब रास्ते में आने वाली किसी भी बाधा को ताकत के जरिए पार करने से है। बुलडोजर मुख्यरूप से कंस्ट्रक्शन साइट्स पर ही नजर आता है, लेकिन आजकल अवैध निर्माण, अतिक्रमण, अपराधियों और माफियाओं के घरों को ध्वस्त करने में इसका बहुतायत से इस्तेमाल हो रहा है। यहां बुलडोजर और जेसीबी में फर्क करना भी जरुरी है। कई लोग बुलडोजर और जेसीबी को एक ही समझ लेते हैं। लेकिन, ऐसा है नहीं। बुलडोजर एक हेवी मशीन है और जेसीबी उसे बनाने वाली कंपनी का नाम। बुलडोज़र की कहानी उत्तर प्रदेश से हुई है। जुलाई 2020 में विकास दुबे की कोठी पर बुलडोजर चला दिया था। इसके बाद यूपी में अवैध निर्माण और अतिक्रमण करने वाले गुंडों और माफिया पर बुलडोज़र ने अपने हाथ आज़माने शुरू कर दिए। बदमाशों पर बुलडोज़र की कार्यवाही का जनता ने भी पुरजोर समर्थन किया। मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, बृजेश कुमार सिंह जैसे कुख्यात लोगों की अवैध सम्पतियों पर बुलडोज़र चलाया गया।
यूपी के बाद बिहार विधानसभा के चुनाव में बुलडोज़र काफी लोकप्रिय हुआ। बुलडोजर जुबान से उतरकर रैलियों के मंच के नीचे जगह पा गया है। भाजपा के चुनावी अभियान का सारथी बन गया। यूपी के मुख्यमंत्री बुलडोज़र बाबा के नाम से विख्यात हो गए। बुलडोज़र की कार्यवाही पर जनता का समर्थन नहीं मिलता तो यूपी बिहार में भाजपा चुनाव नहीं जीत ती।
भारतीय संसद में शीतकालीन सत्र 2025 के दौरान “वंदे मातरम” की 150वीं वर्षगांठ मनाने के लिए एक विशेष चर्चा आयोजित की गयी। ग़ौर तलब है कि संस्कृत और बांग्ला भाषा के मिश्रण से तैयार किया गया यह गीत पहली बार 1882 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित उनकी बांग्ला उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ था। 24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा ने इसी गीत अर्थात “वन्दे मातरम्” को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। आज देश में इस गीत को भी राष्ट्रगान अर्थात “जन गण मन” के ही समकक्ष सम्मान प्राप्त है। सभी सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में जब इसे गाया या बजाया जाता है, तो सभी लोग इसके सम्मान में खड़े होते हैं। परन्तु हमारे देश में मुस्लिम उलेमा का एक वर्ग ऐसा है जिनका मानना है कि धरती-माँ को इस तरह देवी के रूप में पूजना और उसके सामने सजदा करना इस्लाम विरोधी (शिर्क ) है। और अल्लाह के सिवा किसी को सजदा करना हराम है। इस विचारधारा का प्रतिनिधित्व ख़ासतौर पर देवबंदी अथवा जमाअत-ए-इस्लामी से सम्बंधित अतिवादी वर्ग के लोग ही करते हैं। जबकि अधिकांश मुस्लिम राष्ट्रप्रेम का हिस्सा मानते हुये इसे गाते भी हैं।
परन्तु राष्ट्रगान “जन गण मन” का विरोध करने वाले हिंदूवादी विचारधारा से जुड़े लोग ख़ासकर संघ व भाजपा वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस पार्टी पर मुस्लिम परस्त होने का इलज़ाम लगाती रहती है। यही कोशिश गत दिनों संसद में “वंदे मातरम” पर चर्चा के दौरान देखने को भी मिली। ख़ासकर इस चर्चा का ऐसे समय में होना जबकि अगले वर्ष बंगाल में चुनाव भी प्रस्तावित हैं, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों की तरफ़ इशारा करता है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने लोकसभा में “वंदे मातरम” पर बहस के दौरान सरकार पर तीखा प्रहार करते हुये यह कहा भी कि राष्ट्रगान पर बहस की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि यह पहले से ही राष्ट्रगान है। प्रियंका गांधी ने भी यही दावा किया कि यह चर्चा बंगाल चुनावों को ध्यान में रखकर जनता के मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास है। उन्होंने “वंदे मातरम” को भारत की आत्मा का हिस्सा बताया, जो ग़ुलामी से जागरण का प्रतीक है और आधुनिक राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति है। उल्टे प्रियंका गांधी ने संविधान सभा में दो छंद अपनाने पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विरोध न करने का ही सवाल उठा कर भाजपा को ही घेरने की कोशिश की। राजयसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी सत्ता से सवाल किया कि जब भाजपा के पुरखे श्यामा प्रसाद मुखर्जी, मुस्लिम लीग के साथ बंगाल में सरकार चला रहे थे, तब आपकी देशभक्ति कहां थी?
बहरहाल,इसी तरह के मुद्दों को उठाकर कांग्रेस को मुस्लिम परस्त बताने व हमेशा ही कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाने वाली भाजपा को कम से कम देश को एक बात यह भी बतानी चाहिये कि जिस दारुल उलूम देवबंद व जमाअत-ए-इस्लामी ने वंदे मातरमका विरोध किया था, जिस जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने 1937-39 में जारी अपने फ़तवे में वंदे मातरम को गाना ‘हराम’ बताया था। उसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाली अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार से तो भारत बेहतर रिश्ते बनाने की तरफ़ आगे बढ़ रहा है ? गत अक्टूबर माह में ही अफ़ग़ानिस्तानके कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी आमिर ख़ान मुत्तक़ी ने भारत का छह-दिवसीय दौरा किया। इस दौरे के दौरानमुत्तक़ी ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाक़ात की, जिसमें द्विपक्षीय व्यापार, मानवीय सहायता, शिक्षा और आर्थिक सहयोग पर चर्चा हुई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति से संभव यह यात्रा भारत-अफ़ग़ानिस्तानसंबंधों को मज़बूत करने का संकेत मानी गई। मुत्तक़ीने अपने भारत प्रवास के दौरान केवल राजकीय यात्रा मात्र ही नहीं की बल्कि इस दौरान उन्होंने 11 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले में स्थित दारुल उलूम देवबंद अर्थात अपने ‘वैचारिक प्रेरणा केंद्र’ का भी दौरा किया। यह वही दारुल उलूम देवबंद तो है जिसने वंदे मातरम के एक हिस्से को गाने का विरोध किया था ?
मुत्तक़ी ने अपने भारत दौरे के बीच दारुल उलूम देवबंद पहुंचकर व देवबंदी मसलक से जुड़े दारुल उलूम के उलेमा, छात्रों और अफ़ग़ानछात्रों से मिकर केवल अपनी अतिवादी वैचारिक प्रतिबद्धता ही नहीं दोहराई बल्कि उन्होंने दिल्ली में ही आयोजित अपनी पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस में महिलाओं को प्रवेश न देकर भी यह साबित कर दिया कि महिलाओं के प्रति इस सोच विचार के लोग कितनी असहिष्णुता का भाव रखते हैं। परन्तु आश्चर्य है कि भाजपा सरकार वंदे मातरम गायन का विरोध करने व इसे हराम बताने वाली विचारधारा व इसके रहनुमाओं को तो गले से लगाती है। इनके स्वागत में लाल क़ालीन बिछाती है परन्तु कांग्रेस पर वंदे मातरम विरोधी होने का आरोप मढ़ती है ? परन्तु जब कांग्रेस संविधान सभा में इस गीत के दो छंद अपनाने पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विरोध न करने का सवाल उठाती है तो भाजपा बग़लें झाँकने लगती है ?
आज देश बेरोज़गारी व मंहगाई से बुरी तरह जूझ रहा है। डॉलर के मुक़ाबले रूपये की क़ीमत रसातल तक पहुँच गयी है। 2012-13 के मध्य जब डॉलर के मुक़ाबले भारतीय रुपये की कीमत 60-68 के बीच लुढ़क रही थी। उस समय नरेंद्र मोदी ने यूपीए सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुये कहा था कि “हमारी मुद्रा मृत्युशैया पर है, यह टर्मिनल स्टेज पर है और इसे तुरंत डॉक्टर की ज़रूरत है”। उसी समय मोदी ने ज़ोर देकर यह भी कहा था कि रुपये की गिरावट से प्रधानमंत्री की इज़्ज़त गिरती है, क्योंकि रुपया केवल काग़ज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा होता है। उस समय मोदी ने इसे तत्कालीन यू पी ए सरकार की आर्थिक नाकामी क़रार दिया था। परन्तु आज तो 1 डॉलर के मुक़ाबले भारतीय मुद्रा 90 के क़रीब पहुँच चुकी है। आज देश की संसद में इसपर चर्चा क्यों नहीं होती ?
दरअसल मोदी सरकार ने अपनी पूरी ताक़त देश का साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में झोंक रखी है। ख़ासकर चुनावों के समय ऐसी कोशिशों में और भी तेज़ी आ जाती है। बड़ा आश्चर्य है कि स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राष्ट्रगान तक का विरोध करने वाले,गांधी की हत्या पर जश्न मनाने व मिठाइयां बांटने वाले,भारतीय संविधान को न पचा पाने वाले लोग आज सत्ता में आने के बाद बड़े ही शातिर तरीक़े से स्वयं को महान देशभक्त व धर्म के ‘अभिरक्षक ‘ बनने की कोशिश कर रहे हैं। और देश के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाते हुये फांसी के फंदे पर झूलने व अंग्रेज़ों की यातनायें झेलने वाली कांग्रेस को वंदे मातरम विरोधी तो कभी मुस्लिम परस्त तो कभी पाक परस्त बातकर मुद्रा पतन से लेकर मंहगाई बेरोज़गारी जैसे मूल मुद्दों से ध्यान भटकने की कोशिश करती रहती है। गत दिनों संसद में वंदे मातरम पर हुई चर्चा भी जनहितकारी मुद्दों से ध्यान भटकने की ऐसी ही एक कोशिश थी जिसमें वंदे मातरम को लेकर भाजपा की नीति और नीयत का अंतर साफ़ नज़र आया।
पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने आंध्र प्रदेश सहित देश के सभी बंदरगाहों पर बंदरगाह प्रक्रियाओं में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए “एक राष्ट्र एक बंदरगाह प्रक्रिया” (ओ एन ओ पी ) ढाँचा शुरू किया है। देश के सभी बंदरगाहों पर जहाज-संबंधी सभी सूचनाओं के निर्बाध इलेक्ट्रॉनिक कार्यों और प्रसंस्करण के लिए राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स पोर्टल (सागर सेतु) को उन्नत करने हेतु किए गए उपायों में ओएनओपी ढाँचे को संरेखित करना शामिल है। इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का अनुपालन करना और बंदरगाह प्राधिकरणों, सीमा शुल्क, आव्रजन, बंदरगाह स्वास्थ्य संगठनों, पोत परिवहन महानिदेशालय जैसे प्रमुख हितधारकों को एक एकीकृत मंच पर लाना है। इसके कार्यान्वयन से दस्तावेज़ीकरण में 33% की कमी आने की उम्मीद है जिससे दक्षता में वृद्धि होगी और लागत एवं समय में कमी आएगी।
यह जानकारी केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में दी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज माइक्रोसॉफ्ट के अध्यक्ष और सीईओ श्री सत्या नडेला के साथ एक उपयोगी चर्चा के बाद कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भारत की नेतृत्व क्षमता को लेकर आशा व्यक्त की।
माइक्रोसॉफ्ट ने घोषणा की है कि वह एशिया में अपना अब तक का सबसे बड़ा निवेश भारत में करेगा, प्रधानमंत्री ने माइक्रोसॉफ्ट की इस घोषणा का स्वागत किया और कहा कि यह नवाचार और प्रौद्योगिकी में देश की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करता है।
प्रधानमंत्री ने श्री सत्य नडेला के एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
“जहां तक एआई का सवाल है, दुनिया भारत के प्रति आशावादी है!
श्री सत्या नडेला के साथ बहुत उपयोगी चर्चा हुई। यह देखकर खुशी हुई कि माइक्रोसॉफ्ट एशिया में अपना अब तक का सबसे बड़ा निवेश भारत में करेगा।
भारत के युवा इस अवसर का उपयोग; नवाचार करने और बेहतर दुनिया के लिए एआई की शक्ति का लाभ उठाने में करेंगे।”
भारतीय साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया में मंगलेश्वर डबराल जी, जिन्हें साहित्य जगत में मंगलेश डबराल के रूप में अधिक पहचाना जाता है, एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने साधारण जीवन, जमीनी संघर्ष, और संवेदनात्मक अनुभवों को अपनी लेखनी में अद्भुत सहजता के साथ व्यक्त किया। वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि जनपक्षीय पत्रकार और विचारशील साहित्यकार भी थे। आधुनिक हिंदी कविता में सरलता, गहराई और संवेदना की त्रयी को प्रतिष्ठित करने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
मंगलेश्वर डबराल जी का जन्म उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल क्षेत्र में हुआ। पहाड़ों की कठोर ज़िंदगी, प्रकृति की निर्मलता और ग्रामीण समाज के संघर्ष ने उनके मन में बचपन से ही संवेदनाओं की एक गहरी धारा प्रवाहित की। यही वजह है कि उनकी कविताओं में पहाड़ की आत्मा, उसकी खुशबू, उसकी पीड़ा और उसका अकेलापन साफ़ दिखाई देता है। वे मानते थे कि कविता मनुष्यता का सबसे स्वाभाविक स्वर है—और इसी मान्यता के कारण उनकी रचनाएँ हर पाठक को अपनी-सी लगती हैं।
पत्रकारिता में उनका प्रवेश भी साहित्यिक दृष्टि से प्रभावित था। उन्होंने अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कार्य किया और हमेशा जनहित, समाज के हाशिये पर रह रहे लोगों और असमानताओं के मुद्दों को प्रमुखता दी। उनकी रिपोर्टिंग का दृष्टिकोण वस्तुनिष्ठ होते हुए भी संवेदनात्मक था। वे समाचारों के भीतर छिपे जीवन के सच को उजागर करने में सहज थे। उनके लेखन में किसी प्रकार का प्रदर्शन नहीं, बल्कि सादगी और नैतिक साहस की झलक स्पष्ट मिलती है।
डबराल जी ने कविता को जनता की भाषा और जनता के सरोकारों का माध्यम बनाया। उनकी काव्यधारा में रोमांच या आडंबर नहीं, बल्कि आंतरिक शांति, आत्मीयता और जीवन की बारीकियों का सूक्ष्म अवलोकन मिलता है। उनकी प्रसिद्ध काव्य-पंक्तियाँ और रचनाएँ आज भी नए लेखकों और पाठकों को सोचने और संवेदित होने की प्रेरणा देती हैं। वे शब्दों में सादगी रखते हुए भी गहनतम भावों को इस प्रकार व्यक्त करते थे कि कविता सीधे हृदय में उतर जाती थी।
उनकी कविता में व्यक्ति का अकेलापन, समय की निरंतरता, जीवन की छोटी-छोटी खुशियाँ, सामाजिक विडंबनाएँ और मनुष्य का संघर्ष एक साथ दिखाई देते हैं। वे मानते थे कि कविता आत्मा की भाषा है और इसी कारण उनकी रचनाओं में कृत्रिमता का कोई स्थान नहीं था। डबराल जी की कविताएँ आधुनिक समय के द्वंद्व को ऐसे चित्रित करती हैं जैसे कोई सामान्य व्यक्ति अपने जीवन का साधारण विवरण दे रहा हो, लेकिन वह साधारण विवरण ही असाधारण संवेदना में बदल जाता है।
मंगलेश्वर डबराल जी का व्यक्तित्व एक शांत, सरल और विनम्र कवि का था। वे साहित्यिक स्पर्धाओं या मंचीय प्रतिष्ठा से दूर रहे। उनका विश्वास था कि सच्चा साहित्य वही है जो समाज को संवेदित करे, उसे सोचने पर मजबूर करे और मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का कार्य करे। वे साहित्य को सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा मानते थे, किसी व्यक्तिगत उपलब्धि का नहीं।
पत्रकारिता में रहते हुए भी उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। वे सत्ता के विरुद्ध और सच के पक्ष में निर्भीक होकर लिखते थे। उनके लेखन का उद्देश्य जागरूकता पैदा करना था, विवाद खड़ा करना नहीं। उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी सशक्त टिप्पणियों के माध्यम से पाठकों का ध्यान आकर्षित किया। उनका लेखन संतुलित, गहन और अध्ययन आधारित होता था।
डबराल जी को साहित्य के क्षेत्र में कई सम्मान मिले, जिनमें साहित्य अकादमी सम्मान विशेष उल्लेखनीय है। यह सम्मान उन्हें उनकी कृति हम जो देखते हैं पर प्राप्त हुआ। किंतु उनके लिए सम्मान पुरस्कारों से अधिक महत्वपूर्ण पाठकों का विश्वास और प्रेम था। वे कहा करते थे कि कवि को पुरस्कार नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता को बढ़ाने वाला मार्ग तैयार करना चाहिए।
उनके व्यक्तित्व का सबसे प्रखर पक्ष था—उनकी जनपक्षीय सोच। वे गरीबों, मजदूरों, प्रवासियों और ग्रामीण समाज के दुखों को अपनी कविताओं का केंद्र बनाते थे। उन्होंने शहरों के कृत्रिम चमक-दमक के पीछे छिपी संवेदनहीनता पर भी तीखे शब्दों में टिप्पणी की। उनके लेखन ने पहाड़ के संघर्ष और शहर की व्यस्त भागदौड़, दोनों को ही समान संवेदना के साथ सामने रखा।
मंगलेश्वर डबराल जी का जीवन, कविता और पत्रकारिता एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही धारा के विभिन्न रूप थे। वे जिस समाज में रहते थे, उसी समाज की धड़कनों को सुनकर लिखते थे। उनके शब्दों में पहाड़ की ऊँचाई, नदी की विनम्रता और जनजीवन की सच्चाई—सब कुछ दिखाई देता है। वे उस परंपरा के कवि थे जो कविता को केवल साहित्यिक प्रयोग नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का साधन मानते थे।
उनका निधन हिंदी साहित्य और पत्रकारिता दोनों की दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति थी। उन्होंने लेखनी की जो परंपरा स्थापित की, वह आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करती रहेगी। वे हमें सिखाते हैं कि साहित्य केवल सुन्दर शब्दों का खेल नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाइयों को महसूस करना और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी है।