जब जांच ही अधिकारों का उल्लंघन बन जाए

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नार्को टेस्ट और संविधान : अधिकार, नैतिकता और न्याय

– डॉ सत्यवान सौरभ

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनैच्छिक नार्को‑विश्लेषण परीक्षणों को पुनः असंवैधानिक करार देना भारतीय लोकतंत्र में संविधान की सर्वोच्चता की एक महत्वपूर्ण पुनःघोषणा है। यह निर्णय केवल आपराधिक जांच की किसी एक तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की दंडात्मक शक्ति, व्यक्ति की गरिमा और न्याय व्यवस्था की नैतिक दिशा पर गहरा प्रश्न उठाता है। आधुनिक आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि अपराध नियंत्रण के नाम पर भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता।

नार्को टेस्ट मूलतः एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें आरोपी या संदिग्ध व्यक्ति को विशेष रासायनिक दवाएँ देकर उसकी चेतन अवस्था को कमजोर किया जाता है, ताकि वह बिना प्रतिरोध के प्रश्नों के उत्तर दे सके। इसे अक्सर ‘सत्य निकालने’ की तकनीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। किंतु सत्य तक पहुँचने का कोई भी मार्ग यदि असंवैधानिक, अमानवीय और अवैज्ञानिक है, तो वह न्याय का मार्ग नहीं हो सकता। भारतीय संविधान ने राज्य और नागरिक के संबंधों को संतुलित करने के लिए स्पष्ट सीमाएँ तय की हैं, जिनका उल्लंघन किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

संविधान का अनुच्छेद 20(3) आत्म‑अभिशंसा से संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है। इसका आशय यह है कि किसी भी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। अनैच्छिक नार्को टेस्ट इस अधिकार का सीधा उल्लंघन है, क्योंकि इसमें व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध उससे जानकारी उगलवाने का प्रयास किया जाता है। सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010) के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग और पॉलीग्राफ जैसी तकनीकें यदि बिना सहमति के कराई जाती हैं, तो वे असंवैधानिक हैं। यह निर्णय केवल विधिक व्याख्या नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता की रक्षा का घोषणापत्र है।

अनुच्छेद 21, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, नार्को टेस्ट के संदर्भ में और भी व्यापक अर्थ ग्रहण करता है। जीवन का अधिकार केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा, मानसिक स्वायत्तता और निजता भी सम्मिलित हैं। किसी व्यक्ति के शरीर में रासायनिक पदार्थ डालकर उसकी चेतना पर नियंत्रण करना उसकी शारीरिक और मानसिक स्वतंत्रता का गंभीर अतिक्रमण है। सर्वोच्च न्यायालय ने समय‑समय पर अनुच्छेद 21 की व्याख्या करते हुए कहा है कि राज्य की प्रत्येक कार्रवाई ‘न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत’ होनी चाहिए। नार्को टेस्ट इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

न्यायिक प्रक्रिया के दृष्टिकोण से भी नार्को टेस्ट अनेक प्रश्न खड़े करता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत वही साक्ष्य स्वीकार्य होते हैं जो स्वेच्छा से और विश्वसनीय तरीके से प्राप्त किए गए हों। नार्को टेस्ट के दौरान दिए गए कथन न तो पूर्णतः स्वैच्छिक होते हैं और न ही वैज्ञानिक रूप से विश्वसनीय। दवाओं के प्रभाव में व्यक्ति की स्मृति, कल्पना और बाहरी सुझाव आपस में घुल‑मिल जाते हैं। ऐसी स्थिति में प्राप्त जानकारी को सत्य मान लेना न्यायिक त्रुटि को आमंत्रित करना है। इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे परीक्षणों के परिणामों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने से इंकार किया है।

एक और गंभीर संवैधानिक समस्या ‘सहमति’ की अवधारणा से जुड़ी है। समर्थक यह तर्क देते हैं कि यदि आरोपी सहमति दे, तो नार्को टेस्ट कराया जा सकता है। किंतु हिरासत की स्थिति में दी गई सहमति कितनी स्वतंत्र और स्वैच्छिक होती है, यह एक जटिल प्रश्न है। पुलिस हिरासत में शक्ति का असंतुलन स्वाभाविक होता है। भय, दबाव और भविष्य की अनिश्चितता के बीच दी गई सहमति को वास्तविक सहमति नहीं कहा जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना है कि हिरासत में प्राप्त सहमति की विश्वसनीयता संदिग्ध होती है।

संवैधानिक पहलुओं के साथ‑साथ नार्को टेस्ट गहरे नैतिक प्रश्न भी उठाता है। मानव गरिमा आधुनिक मानवाधिकार विमर्श का केंद्रीय तत्व है। किसी व्यक्ति को उसकी चेतन अवस्था से वंचित कर, रासायनिक रूप से नियंत्रित कर उससे जानकारी प्राप्त करना उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाता है। यह दृष्टिकोण व्यक्ति को एक ‘साधन’ में बदल देता है, जबकि संविधान व्यक्ति को ‘लक्ष्य’ मानता है। दार्शनिक दृष्टि से भी यह प्रक्रिया मानव को उसकी इच्छा और विवेक से अलग कर देती है, जो किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती।

वैज्ञानिक दृष्टि से नार्को टेस्ट की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न हैं। यह धारणा कि दवाओं के प्रभाव में व्यक्ति केवल सत्य ही बोलेगा, एक मिथक है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ऐसी दवाएँ व्यक्ति की निर्णय क्षमता को कमजोर कर देती हैं, जिससे वह काल्पनिक घटनाओं को भी वास्तविक समझकर बयान कर सकता है। कई बार पूछताछ करने वाले के प्रश्नों का प्रभाव उत्तरों को दिशा देता है, जिससे ‘सत्य’ नहीं बल्कि जांचकर्ता की अपेक्षा सामने आती है। इस प्रकार नार्को टेस्ट सत्य की खोज के बजाय भ्रम की सृष्टि कर सकता है।

चिकित्सीय नैतिकता के संदर्भ में भी नार्को टेस्ट गंभीर चिंता का विषय है। चिकित्सा पेशा ‘हानि न पहुँचाने’ के सिद्धांत पर आधारित है। जब कोई चिकित्सक बिना किसी उपचारात्मक उद्देश्य के, केवल जांच के लिए, किसी व्यक्ति को दवाएँ देता है, तो वह इस सिद्धांत का उल्लंघन करता है। इसके अतिरिक्त, नार्को टेस्ट के दौरान स्वास्थ्य जोखिम भी मौजूद रहते हैं, विशेषकर यदि व्यक्ति पहले से किसी शारीरिक या मानसिक रोग से ग्रस्त हो। ऐसे में चिकित्सकों की भूमिका और जिम्मेदारी पर भी प्रश्न उठते हैं।

नार्को टेस्ट के समर्थन में यह तर्क दिया जाता है कि गंभीर अपराधों, आतंकवाद या जटिल मामलों में यह जांच को दिशा देने में सहायक हो सकता है। किंतु यह तर्क संवैधानिक मूल्यों के सामने कमजोर पड़ जाता है। संविधान किसी भी परिस्थिति में मूल अधिकारों के निलंबन की अनुमति नहीं देता, सिवाय आपातकाल जैसी असाधारण स्थितियों के, वह भी सीमित दायरे में। अपराध की गंभीरता राज्य को मनमानी करने का अधिकार नहीं देती। यदि आज हम गंभीर अपराधों के नाम पर अधिकारों से समझौता करते हैं, तो कल यह दायरा सामान्य अपराधों तक भी फैल सकता है।

वास्तव में, नार्को टेस्ट जांच एजेंसियों की उस मानसिकता को दर्शाता है, जो त्वरित परिणामों की चाह में संवैधानिक रास्तों से भटक जाती है। यह जांच की अक्षमता को ढकने का एक आसान रास्ता बन जाता है। इसके विपरीत, आधुनिक आपराधिक न्याय व्यवस्था साक्ष्य‑आधारित, वैज्ञानिक और पेशेवर जांच पर बल देती है। डीएनए विश्लेषण, डिजिटल फॉरेंसिक, वित्तीय जांच और गवाह संरक्षण जैसी तकनीकें न केवल अधिक विश्वसनीय हैं, बल्कि अधिकारों के अनुरूप भी हैं।

पुलिस सुधार और प्रशिक्षण इस संदर्भ में अत्यंत आवश्यक हैं। जब तक जांच एजेंसियों को आधुनिक तकनीक, पर्याप्त संसाधन और संवैधानिक मूल्यों का प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा, तब तक वे ऐसे शॉर्टकट अपनाने के लिए प्रेरित होती रहेंगी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी हिरासत संबंधी दिशा‑निर्देश और पुलिस आधुनिकीकरण योजनाएँ इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं, किंतु इनके प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है।

न्यायपालिका की भूमिका भी केवल प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अदालतों को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी जांच प्रक्रिया में अधिकारों का उल्लंघन न हो। साथ ही, न्यायिक प्रशिक्षण में भी संवैधानिक नैतिकता और मानवाधिकारों पर विशेष बल दिया जाना चाहिए, ताकि निचली अदालतों में भी इन मूल्यों की रक्षा हो सके।

अंततः, नार्को टेस्ट का प्रश्न केवल एक तकनीक का नहीं, बल्कि उस दृष्टिकोण का है जिससे राज्य अपने नागरिकों को देखता है। क्या नागरिक केवल जांच के साधन हैं, या वे अधिकारों से युक्त गरिमामय व्यक्ति हैं? भारतीय संविधान ने स्पष्ट रूप से दूसरे विकल्प को चुना है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह अपराध से निपटते समय भी अपने मूल्यों से विचलित न हो।

निष्कर्षतः, सर्वोच्च न्यायालय का रुख यह स्मरण कराता है कि न्याय का उद्देश्य केवल दोषसिद्धि नहीं, बल्कि निष्पक्ष, मानवीय और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से सत्य तक पहुँचना है। नार्को टेस्ट जैसी विधियाँ इस उद्देश्य के विपरीत हैं। एक सशक्त लोकतंत्र वही है जो सबसे कठिन परिस्थितियों में भी मानव गरिमा और मौलिक अधिकारों की रक्षा करे। यही संवैधानिक चेतना भारत की न्याय व्यवस्था की आत्मा है।

– डॉ सत्यवान सौरभ

भारतीय रेल ने उर्वरक लोडिंग में 11.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की

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भारतीय रेल ने उर्वरक लोडिंग में 11.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है, जिससे देश भर के किसानों को निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित हुई है।चालू वित्त वर्ष में अब तक भारतीय रेल ने 17,168 उर्वरक रैक लोड किए हैं, जिससे ग्रामीण आजीविका और खाद्य सुरक्षा को मजबूती मिली है।

भारतीय रेल भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को सहयोग देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह पूरे देश में उर्वरकों की सुचारू और समय पर आवाजाही सुनिश्चित करता है। इस वर्ष 30 नवंबर तक उर्वरक की लोडिंग 17,168 रेक तक पहुंच गई। यह पिछले वर्ष की इसी अवधि के 15,369 रेक की तुलना में 11.7 प्रतिशत की वृद्धि है। यह वृद्धि रेलवे नेटवर्क के कुशल संचालन को दर्शाती है।

कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। किसानों को बुवाई के लिए समय पर उर्वरकों की आवश्यकता होती है। इसे ध्यान में रखते हुए, भारतीय रेल ने उर्वरक और खाद्यान्न ले जाने वाली ट्रेनों को प्राथमिकता दी है। इससे देश भर के राज्यों में निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित हुई है।

आवश्यक माल ढुलाई सेवाओं को मजबूत करके रेलवे लाखों किसानों की मदद कर रहा है। यह ग्रामीण आजीविका, खाद्य सुरक्षा और समग्र आर्थिक स्थिरता को भी बढ़ावा दे रहा है। यह प्रदर्शन भारतीय रेल की राष्ट्र निर्माण के प्रति संकल्‍प और भारत की कृषि आपूर्ति श्रृंखला को समर्थन देने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करता है। उर्वरक रैकों की प्राथमिकता के आधार पर आवाजाही करके, रेलवे किसानों को निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने में मदद करता है, जिससे वे बिना किसी देरी के कृषि कार्य कर सकें। समय पर आपूर्ति होने से फसलों की उत्पादकता बढ़ने के साथ-साथ खेती की आय में वृद्धि होती है और खाद्य सुरक्षा मजबूत होती है। रेल परिवहन कार्बन उत्सर्जन को कम करता है, राजमार्गों पर भीड़भाड़ कम करता है और एक पर्यावरण के अनुकूल तथा अधिक विश्वसनीय रसद समाधान प्रदान करता है।

मियाना रेलवे स्टेशन राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार से सम्मानित

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राष्ट्रपति ने पुरस्कार प्रदान किया

भारतीय रेल ने ऊर्जा संरक्षण के क्षेत्र में एक नया मुकाम हासिल किया है। राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस के अवसर पर, राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी ने मध्य प्रदेश के गुना स्थित मियाना रेलवे स्टेशन को राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार, 2025 प्रदान किया। यह पुरस्कार महिला एवं रेलवे स्टेशन की महाप्रबंधक श्रीमती शोभना बंदोपाध्याय ने ग्रहण किया। स्टेशन को परिवहन श्रेणी (रेलवे स्टेशन) में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली इकाई के रूप में मान्यता दी गई है।

ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) द्वारा दिया जाने वाला यह पुरस्कार ऊर्जा संरक्षण में उत्कृष्ट प्रयासों को मान्यता देता है। मियाना रेलवे स्टेशन को एलईडी लाइटिंग, बीएलडीसी पंखों और 30-70 प्रतिशत स्मार्ट लाइटिंग सर्किट संचालन प्रणालियों के प्रभावी इस्‍तेमाल के लिए चुना गया है। इन उपायों से स्टेशन को 9,687 यूनिट बिजली की बचत करने में मदद मिली है, जो ऊर्जा दक्षता और सतत विकास पर रेलवे के मजबूत फोकस को दर्शाता है।

भारतीय रेलवे ऊर्जा बचत, किफायती और पर्यावरण के अनुकूल संचालन के लिए प्रतिबद्ध है तथा मियाना रेलवे स्टेशन अपने प्रभावी कार्यान्वयन और सतत विकास के एक मॉडल के रूप में उभर रहा है।

सबसे बड़े डिजिटल पेंशन प्लेटफॉर्म ‘स्पर्श’ पर 31.69 लाख रक्षा पेंशनभोगी पंजीकृत

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देश के सबसे बड़े डिजिटल पेंशन प्लेटफॉर्म ‘स्पर्श’ पर 31.69 लाख रक्षा पेंशनभोगी पंजीकृत हुए।स्पर्श’ देश की सबसे बड़ी एकीकृत पेंशन प्रणाली है और रक्षा कर्मियों के लिए एकमात्र पूर्णतः एकीकृत डिजिटल पेंशन समाधान है। यह पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के लिए सम्मान, देखभाल और समय पर सहायता सुनिश्चित करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।पुराने विवादों के 94.3 प्रतिशत मामले सुलझा लिए गए; शिकायतों के निवारण का औसत समय 56 दिनों से घटकर 17 दिन हो गया।

प्रयागराज स्थित पीसीडीए (पेंशन) के माध्यम से रक्षा लेखा विभाग (डीएडी) द्वारा संचालित ‘स्पर्श’ ने नवंबर, 2025 तक भारत और नेपाल में 31.69 लाख रक्षा पेंशनभोगियों को अपने साथ जोड़ा है। यह 45 हजार से अधिक एजेंसियों द्वारा पहले प्रबंधित खंडित प्रणाली को एक एकीकृत, पारदर्शी और जवाबदेह डिजिटल ढांचे से प्रतिस्थापित करता है।पिछली प्रणाली से स्थानांतरित किए गए 6.43 लाख विसंगतिपूर्ण मामलों में से 6.07 लाख मामलों को पेंशनभोगियों के अधिकारों को प्रभावित किए बिना सामान्य कर दिया गया है। देश में 284 ‘स्पर्श’ पहुंच कार्यक्रम और 194 रक्षा पेंशन समाधान कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। चालू वित्त वर्ष में आयोजित इन कार्यक्रमों के दौरान 8 हजार से अधिक शिकायतों का मौके पर ही समाधान किया गया।

 पेंशनभोगी अब अपनी पेंशन की पूरी जानकारी ऑनलाइन देख सकते हैं और आसानी से सुधार संबंधी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं। शिकायतों के निवारण का औसत समय अप्रैल, 2025 में 56 दिन से घटकर नवंबर, 2025 में 17 दिन हो गया है। प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार रक्षा लेखा विभाग  ने 73  प्रतिशत  संतुष्टि अंक प्राप्त किया है जिससे यह मंत्रालयों/विभागों में 5 वें स्थान पर है।

  • क्षा एवं पेंशनभोगी विभाग (डीओपी एंड पीडब्ल्यू) के राष्ट्रव्यापी डिजिटल जीवन प्रमाण-पत्र (डीएलसी) 4.0 अभियान (1-30 नवंबर, 2025) के अंतर्गत रक्षा लेखा विभाग ने 202 कार्यालयों, 4.63 लाख सामान्य सेवा केंद्रों और 15 भागीदार बैंकों को सक्रिय किया है  जिन्हें 27 नोडल अधिकारियों का सहयोग प्राप्त है। 30 नवंबर, 2025 तक रक्षा पेंशनभोगियों के लिए 20.94 लाख डिजिटल जीवन प्रमाण-पत्र जारी किए जा चुके हैं, जो सभी विभागों में सबसे अधिक है।
  • वितरण : वित्त वर्ष 2024-25 में, रक्षा पेंशन बजट के अंतर्गत 1,57,681 करोड़ रुपये का वितरण ‘स्‍पर्श’ के माध्यम से वास्तविक समय के आधार पर किया गया। जुलाई, 2024 में लागू वन रैंक वन पेंशन-III के अंतर्गत मात्र 15 दिनों में 20.17 लाख लाभार्थियों को 1,224.76 करोड़ रुपये का त्वरित वितरण संभव हुआ।

संसद में एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया बिल, 2025 पेश किया

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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज संसद में सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया बिल, 2025  पेश किया। यह बिल भारत के परमाणु ऊर्जा को नियंत्रित करने वाले कानूनी तंत्र को अपडेट करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और परमाणु क्षति के लिए नागरिक जिम्मेदारी अधिनियम, 2010 को रद्द करना और उन्हें भारत की वर्तमान एवं भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं के अनुरूप एक एकल, व्यापक कानून में परिवर्तित करना है।

विधेयक के साथ संलग्न उद्देश्यों एवं कारणों के विवरण के अनुसार, निरंतर अनुसंधान एवं विकास के माध्यम से भारत को परमाणु ईंधन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को जिम्मेदारी के साथ संचालित करने में सक्षम बनाया है। इस अनुभव के आधार पर, सरकार स्वच्छ ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा देने एवं डेटा केंद्रों और भविष्य के लिए तैयार अनुप्रयोगों जैसी उभरती आवश्यकताओं के लिए चौबीसों घंटे विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति प्रदान करने के लिए परमाणु ऊर्जा की स्थापित क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करने की संभावना देखती है।

प्रस्तावित विधेयक भारत के दीर्घकालिक ऊर्जा एवं जलवायु लक्ष्यों से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। यह 2070 तक कार्बन न्यूनीकरण के लिए देश की रूपरेखा और 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता प्राप्त करने के लक्ष्य को रेखांकित करता है। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, विधेयक स्वदेशी परमाणु संसाधनों का पूर्ण उपयोग करने और सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देता है, साथ ही भारत को वैश्विक परमाणु ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र में योगदानकर्ता के रूप में स्थापित करता है।

यह विधेयक परिचालन स्तर पर परमाणु ऊर्जा के उत्पादन या उपयोग में शामिल निर्दिष्ट व्यक्तियों के लिए लाइसेंस और सुरक्षा प्राधिकरण का प्रावधान करता है, साथ ही निलंबन या रद्द करने का स्पष्ट आधार भी बताता है। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा, खाद्य एवं कृषि, उद्योग एवं अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में परमाणु और विकिरण प्रौद्योगिकियों के उपयोग को विनियमित करना है जबकि अनुसंधान, विकास एवं नवाचार गतिविधियों को लाइसेंसिंग आवश्यकताओं से छूट प्रदान की गई है।

इस बिल में परमाणु क्षति के लिए एक संशोधित एवं व्यावहारिक नागरिक दायित्व तंत्र का भी प्रस्ताव है, यह परमाणु ऊर्जा विनियामक बोर्ड को वैधानिक स्थिति प्रदान करता है, और सुरक्षा, सुरक्षा उपाय, गुणवत्ता आश्वासन एवं आपातकालीन तैयारी से संबंधित तंत्र को मजबूत करता है। यह नए संस्थागत व्यवस्थाओं के निर्माण का प्रावधान करता है, जिसमें एक परमाणु ऊर्जा शिकायत सलाहकार परिषद का गठन, दावा अधिकारियों की नियुक्ति और गंभीर परमाणु क्षति से संबंधित मामलों के लिए एक परमाणु क्षति दावा आयोग शामिल हैं, जिसमें विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण अपीलीय प्राधिकरण के रूप में काम करेगा।

इस विधेयक पेश करके, सरकार ने संकेत दिया है कि वह भारत के ऊर्जा परिवर्तन, तकनीकी प्रगति एवं अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप नाभिकीय शासन को आधुनिक बनाने का सोच रखती है। प्रस्तावित कानून नाभिकीय ऊर्जा के विस्तार को सुरक्षा, जवाबदेही एवं सार्वजनिक हित के साथ संतुलित करने का प्रयास है, और नाभिकीय ऊर्जा को ऊर्जा सुरक्षा और कम कार्बन उत्सर्जन वाले भविष्य की दिशा में राष्ट्रीय प्रयास को व्यापक बनाता है।

तीन देशों के राजदूतों ने राष्ट्रपति मुर्मु को अपने परिचय पत्र प्रस्तुत किए

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राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु 16 से 22 दिसंबर, 2025 तक कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना का दौरा करेंगी।

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने आज (15 दिसंबर, 2025) राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में ईरान, ब्रुनेई दारुस्सलाम और माइक्रोनेशिया के राजदूतों के परिचय पत्र स्वीकार किए।उधर राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु 16 से 22 दिसंबर, 2025 तक कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना का दौरा करेंगी।

1 इस्लामी गणराज्य ईरान के राजदूत, डॉ. मोहम्मद फथली

ब्रुनेई दारुस्सलाम की उच्चायुक्त, श्रीमती सिटी अरनीफरिज़ा हाजी मोहम्मद जैनी

माइक्रोनेशिया संघीय राज्यों के राजदूत जॉन फ्रिट्ज

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु 16 से 22 दिसंबर, 2025 तक कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना का दौरा करेंगी।

16 दिसंबर को राष्ट्रपति कर्नाटक में मांड्या जिले के मालवल्ली में आदि जगद्गुरु श्री शिवरात्रिश्वर शिवयोगी महास्वामीजी के 1066वें जयंती समारोह का उद्घाटन करेंगी।

17 दिसंबर को राष्ट्रपति तमिलनाडु में वेल्लोर स्थित स्वर्ण मंदिर में दर्शन और आरती करेंगी। इसके बाद वे शीतकालीन प्रवास के लिए सिकंदराबाद के बोलारम स्थित राष्ट्रपति निलयम पहुंचेंगी।

19 दिसंबर को राष्ट्रपति हैदराबाद में तेलंगाना लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों के राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करेंगी।

20 दिसंबर को राष्ट्रपति हैदराबाद में ‘भारत का शाश्वत ज्ञान: शांति और प्रगति के मार्ग’ विषय पर एक सम्मेलन को संबोधित करेंगे। इस सम्मेलन का आयोजन ब्रह्मा कुमारीज़ शांति सरोवर अपनी 21वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में कर रहा है।

डिजिटल माध्यमों पर प्रतिबंध का विमर्श

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बाल-सुरक्षा और तकनीकी समाधानवाद : डिजिटल युग में सामाजिक माध्यमों पर प्रतिबंध का विमर्श

ऑस्ट्रेलिया का प्रस्ताव है सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सामाजिक माध्यमों पर पूर्ण प्रतिबंध हो। निजता पर खतरा, व्यवहारिक असफलता और मूल मनो-सामाजिक कारणों की अनदेखी। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के माध्यम से अधिकार-आधारित सुरक्षा।अभिभावकीय सहमति, बच्चों की निगरानी और लक्षित विज्ञापनों पर प्रतिबंध।  कानून, डिजिटल साक्षरता, पारिवारिक सहभागिता और मंचों की जवाबदेही का संतुलन। 

– डॉ प्रियंका सौरभ

डिजिटल युग में बच्चों और किशोरों का जीवन केवल भौतिक संसार तक सीमित नहीं रह गया है। सामाजिक माध्यम, ऑनलाइन मंच और आभासी समुदाय आज उनके सीखने, अभिव्यक्ति, पहचान और सामाजिक संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि इन मंचों पर बच्चों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया द्वारा सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सामाजिक माध्यमों पर पूर्ण प्रतिबंध का प्रस्ताव इसी चिंता से उत्पन्न हुआ है। परंतु इस कदम को लेकर यह आलोचना भी सामने आई है कि यह एक जटिल मनो-सामाजिक समस्या का अत्यधिक सरलीकृत, तकनीक-आधारित समाधान है, जिसे ‘तकनीकी समाधानवाद’ कहा जा रहा है।

तकनीकी समाधानवाद का अर्थ है यह मान लेना कि सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं को केवल तकनीकी नियमों, प्रतिबंधों या उपकरणों के माध्यम से हल किया जा सकता है। बच्चों के संदर्भ में यह दृष्टिकोण विशेष रूप से सीमित प्रतीत होता है, क्योंकि बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य, आत्मसम्मान, सामाजिक तुलना, ऑनलाइन उत्पीड़न, अकेलापन और व्यवहारिक परिवर्तन केवल मंच तक पहुँच रोक देने से समाप्त नहीं होते। ये समस्याएँ परिवार, विद्यालय, सहपाठी समूह, सामाजिक वातावरण और व्यापक सांस्कृतिक प्रवृत्तियों से गहराई से जुड़ी होती हैं। ऑस्ट्रेलिया का प्रस्ताव इन जटिल कारणों की बजाय सीधे निषेध पर केंद्रित दिखाई देता है।

ऑस्ट्रेलिया के प्रस्तावित कानून के अनुसार, सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सामाजिक माध्यमों का उपयोग प्रतिबंधित किया जाएगा और आयु-सत्यापन की अनिवार्य व्यवस्था लागू की जाएगी। पहली दृष्टि में यह कदम बच्चों की सुरक्षा के लिए कठोर और निर्णायक लगता है, किंतु व्यवहारिक स्तर पर इसके कई प्रश्नचिह्न हैं। आयु-सत्यापन के लिए व्यापक व्यक्तिगत जानकारी एकत्र करनी पड़ सकती है, जिससे बच्चों और उनके अभिभावकों की निजता पर खतरा उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त, तकनीकी उपायों को आभासी निजी नेटवर्क, फर्जी पहचान या नए, कम नियंत्रित मंचों के माध्यम से आसानी से दरकिनार किया जा सकता है। इससे न केवल कानून की प्रभावशीलता कम होती है, बल्कि बच्चे अधिक जोखिमपूर्ण डिजिटल स्थानों की ओर भी जा सकते हैं।

पूर्ण प्रतिबंध का एक और गंभीर पक्ष यह है कि यह बच्चों को सामाजिक माध्यमों से मिलने वाले सकारात्मक अवसरों से भी वंचित कर सकता है। आज अनेक बच्चे इन्हीं मंचों के माध्यम से शैक्षिक सामग्री प्राप्त करते हैं, रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेते हैं, सामाजिक मुद्दों पर जागरूक होते हैं और मानसिक स्वास्थ्य सहायता समूहों से जुड़ते हैं। विशेष रूप से ग्रामीण, पिछड़े या सामाजिक रूप से हाशिये पर खड़े बच्चों के लिए डिजिटल मंच कई बार अभिव्यक्ति और सहयोग का एकमात्र साधन होते हैं। ऐसे में पूर्ण प्रतिबंध सामाजिक असमानताओं को और गहरा कर सकता है। यह दृष्टिकोण यह भी संकेत देता है कि समस्या का मूल बच्चों या तकनीक में है, जबकि वास्तव में समस्या उस सामाजिक ढाँचे में है जिसमें बच्चों का डिजिटल समाजीकरण हो रहा है।

भारत ने इसी संदर्भ में एक भिन्न और अपेक्षाकृत संतुलित मार्ग अपनाया है। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष निषेध के बजाय अधिकार-आधारित और डेटा-केंद्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह अधिनियम यह स्वीकार करता है कि बच्चों को डिजिटल संसार से अलग-थलग करना न तो संभव है और न ही वांछनीय। इसके स्थान पर, यह आवश्यक है कि डिजिटल मंचों को उत्तरदायी बनाया जाए और बच्चों के अधिकारों की रक्षा की जाए। इस कानून के अंतर्गत बच्चों के व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण के लिए सत्यापित अभिभावकीय सहमति को अनिवार्य किया गया है, जिससे परिवार की भूमिका सुदृढ़ होती है।

डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह बच्चों के व्यवहारिक निगरानी, व्यक्तित्व-आधारित वर्गीकरण और लक्षित विज्ञापनों पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाता है। इससे बच्चों को उपभोक्ता के रूप में शोषण से बचाने का प्रयास किया गया है। साथ ही, यह अधिनियम बच्चों को डेटा तक पहुँच, उसमें सुधार, उसे हटाने और शिकायत दर्ज कराने जैसे अधिकार प्रदान करता है। यह दृष्टिकोण बच्चों को केवल संरक्षण की वस्तु न मानकर उन्हें अधिकार-संपन्न नागरिक के रूप में देखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इसके अतिरिक्त, भारत में एक स्वतंत्र डेटा संरक्षण बोर्ड की व्यवस्था की गई है, जो नियमों के उल्लंघन पर दंड निर्धारित कर सकता है। इस प्रकार, मंचों और डेटा का प्रसंस्करण करने वाली संस्थाओं पर जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है, बिना यह कहे कि बच्चों को डिजिटल मंचों से बाहर कर दिया जाए। यह मॉडल यह भी दर्शाता है कि कानून के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता, डिजिटल साक्षरता, विद्यालयों में ऑनलाइन सुरक्षा शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार अनिवार्य है। केवल कानून बनाकर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती, बल्कि एक समग्र सामाजिक प्रयास की आवश्यकता होती है।

ऑस्ट्रेलिया और भारत के दृष्टिकोणों की तुलना करने पर स्पष्ट होता है कि जहाँ एक ओर नियंत्रण और निषेध पर आधारित नीति है, वहीं दूसरी ओर संतुलन, सहभागिता और सशक्तिकरण पर आधारित ढाँचा। ऑस्ट्रेलिया का प्रस्ताव त्वरित समाधान का आभास देता है, किंतु दीर्घकाल में यह व्यवहारिक, संवैधानिक और सामाजिक चुनौतियों से घिर सकता है। इसके विपरीत, भारत का मॉडल धीमा और जटिल अवश्य है, परंतु यह बच्चों की स्वायत्तता, निजता और विकास के साथ बेहतर सामंजस्य स्थापित करता है।

अंततः, बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा का प्रश्न केवल यह नहीं है कि उन्हें किससे दूर रखा जाए, बल्कि यह भी है कि उन्हें किस प्रकार सशक्त बनाया जाए। डिजिटल युग में बाल-सुरक्षा का अर्थ बच्चों को तकनीक से अलग करना नहीं, बल्कि उन्हें तकनीक के साथ सुरक्षित, जागरूक और जिम्मेदार बनाना है। सरल तकनीकी समाधान जटिल मानवीय समस्याओं का स्थान नहीं ले सकते। इस संदर्भ में भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण ढाँचा यह संकेत देता है कि संतुलित नियमन, अभिभावकीय सहभागिता, मंचों की जवाबदेही और सामाजिक समर्थन के माध्यम से ही बच्चों के लिए एक सुरक्षित और समावेशी डिजिटल भविष्य का निर्माण संभव है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

नरेंद्र मोदी का जॉर्डन के अम्मान में विशेष स्वागत

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प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी अम्मान पहुंच गए हैं। दोनों देशों के बीच घनिष्ठ संबंधों के प्रतीक के रूप में एक विशेष भाव के तहत, अम्मान हवाई अड्डे पर पहुंचने पर प्रधानमंत्री का जॉर्डन के प्रधानमंत्री डॉ. जाफर हसन ने गर्मजोशी से स्वागत किया और समारोहपूर्वक उनका अभिवादन किया।

यह जॉर्डन, इथियोपिया और ओमान की उनकी तीन देशों की यात्रा का पहला पड़ाव है। जॉर्डन की यह पूर्ण द्विपक्षीय यात्रा 37 साल के अंतराल के बाद हो रही है। प्रधानमंत्री की यह यात्रा दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ के साथ-साथ हो रही है।

हनुमान घाट पर आध्यात्मिक समूह ने किया स्नान

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काशी तमिल संगमम् 4.0 के अंतर्गत तमिलनाडु से आए आध्यात्मिक दल ने सोमवार को हनुमान घाट पहुंचकर गंगा स्नान किया। इस दौरान सभी सदस्यों ने मां गंगा की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगा। गंगा स्नान के उपरांत समूह ने घाट पर स्थित प्राचीन मंदिरों में दर्शन-पूजन किया। श्रद्धालुओं को मंदिरों की दिव्यता, भव्यता और ऐतिहासिक महत्व की जानकारी दी गई।

इसके बाद तमिल प्रतिनिधिमंडल हनुमान घाट स्थित महाकवि सुब्रह्मण्य भारती के घर पहुंचा, जहां उन्होंने उनके परिवार के सदस्यों से मुलाकात की। समूह के लोगों में इतिहास जानने की विशेष जिज्ञासा देखने को मिली। उन्होंने सुब्रमण्यम भारती के घर के समीप स्थित पुस्तकालय का भी भ्रमण किया और वहां से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त कीं।

सुब्रह्मण्य भारती के घर के भ्रमण के उपरांत यह समूह कांची मठ पहुंचा, जहां उन्हें मठ के इतिहास से अवगत कराया गया। काशी में दक्षिण भारतीय मंदिरों को देखकर साहित्यिक और आध्यात्मिक दल अत्यंत उत्साहित नजर आया।

तमिलनाडु से आए इस प्रतिनिधिमंडल का अंदाज कुछ अलग ही दिखाई दे रहा था। आध्यात्मिक समूह अपने-अपने तरीके से काशी की व्याख्या कर रहा था। कोई अपने पूर्वजों को याद कर रहा था तो कोई संस्कृति की एकता को रेखांकित करते हुए ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना को साकार होता हुआ देख रहा था।

समूह में शामिल वी.के. रमन ने बताया कि हमने विभिन्न मंदिरों का भ्रमण किया और यह देखकर आश्चर्य हुआ कि काशी और तमिलनाडु की संस्कृति में गहरी समानता है। यहां की संस्कृति हमारी संस्कृति जैसी ही है। इस तरह के आयोजन लगातार होने चाहिए, ताकि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के सपने को साकार किया जा सके।

बीएचइएल ने भारत सरकार को 109 करोड़ रुपये से अधिक का लाभांश चेक सौंपा

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भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (बीएचईएल) के लिए लाभांश वितरण समारोह 15 दिसंबर, 2025  को आयोजित किया गया। इस अवसर पर केंद्रीय भारी उद्योग एवं इस्पात मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में भारी उद्योग मंत्रालय के सचिव, संयुक्त सचिव, बीएचईएल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और कार्यकारी निदेशक भी शामिल हुए।\मारोह के दौरान, केंद्रीय भारी उद्योग और इस्पात मंत्री को 109.98 करोड़ रुपये का लाभांश चेक सौंपा गया। वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए लाभांश भुगतान वर्ष 2023-24 के भुगतान की तुलना में 100 प्रतिशत अधिक है।

केंद्रीय भारी उद्योग एवं इस्पात मंत्री ने सरकार की प्रमुख पहलों के माध्यम से विकसित भारत के निर्माण में भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का आग्रह किया। एक अग्रणी भारी इंजीनियरिंग और विनिर्माण कंपनी के रूप में, उन्होंने भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड को ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की भी सलाह दी।