3 से 5 नवम्बर को थानो (देहरादून) में होगा “स्पर्श हिमालय महोत्सव

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लेखक गाँव : शब्दों की साधना और सृजन का हिमालय

”3 से 5 नवम्बर 2025 को थानो (देहरादून) में होगा “स्पर्श हिमालय महोत्सव — जहाँ साहित्य, संस्कृति और प्रकृति का संगम रचेगा नई सृजनगाथा

– डॉ. सत्यवान सौरभ

उत्तराखंड की वादियों में बसा थानो गाँव आज साहित्य और संस्कृति की नई पहचान बन चुका है। यह वही भूमि है जहाँ शब्दों की साधना और सृजन की ऊर्जा एक साथ प्रवाहित हो रही है। यहाँ स्थापित देश का पहला ‘लेखक गाँव’ अब केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि एक आंदोलन बन चुका है — वह आंदोलन जो लेखकों, कवियों, विचारकों और कलाकारों को उनके सृजन के मूल स्रोत, अर्थात् प्रकृति और आत्मा से जोड़ता है।

🔹 शब्दों के मठ की परिकल्पना

लेखक गाँव का विचार जितना अनोखा है, उतना ही प्रेरणादायक भी। इस अवधारणा के प्रणेता हैं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, शिक्षाविद् और सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, जिन्होंने अपने जीवन में साहित्य और समाज दोनों को समान रूप से साधा है। उन्होंने यह अनुभव किया कि आज के लेखक, कवि और विचारक भागदौड़ और शोरगुल भरी दुनिया में वह सृजनात्मक एकांत नहीं पा पाते जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है।

इसी विचार से जन्म हुआ “लेखक गाँव” का — एक ऐसी जगह जहाँ शब्दों को सांस लेने की जगह मिले, विचारों को उड़ान मिले और रचनाकारों को आत्म-साक्षात्कार का अवसर।

देहरादून के समीप थानो गाँव को इस अनूठे प्रकल्प के लिए चुना गया। यह स्थान हिमालय की गोद में बसा है, जहाँ हरियाली, नदी, पर्वत और शांति की छाया है। यहाँ की प्राकृतिक सौंदर्यता लेखकों के भीतर सोई संवेदनाओं को जगाने का सामर्थ्य रखती है।

🔹 एक अद्भुत आयोजन : “स्पर्श हिमालय महोत्सव-2024”

अक्टूबर 2024 में जब स्पर्श हिमालय फाउंडेशन द्वारा “स्पर्श हिमालय महोत्सव” का आयोजन हुआ, तब थानो ने भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचा। यह केवल एक महोत्सव नहीं, बल्कि साहित्य, कला और संस्कृति का विराट संगम था।

इस पाँच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय आयोजन में 65 से अधिक देशों के लेखक, कवि, कलाकार और विचारक शामिल हुए। उन्होंने न केवल अपनी रचनाएँ और कलाकृतियाँ साझा कीं, बल्कि हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के प्रति अपनी भावनाएँ भी प्रकट कीं।

यह आयोजन इस बात का प्रमाण था कि हिंदी और भारतीय संस्कृति आज भी वैश्विक स्तर पर आकर्षण का केंद्र हैं। इस महोत्सव ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पुनः प्रतिष्ठित किया। साथ ही, यह तय किया कि हर वर्ष इसी स्थान पर साहित्यिक मंथन और सांस्कृतिक संवाद का यह महोत्सव आयोजित किया जाएगा।

🔹 3 से 5 नवम्बर 2025 : नए अध्याय की तैयारी

अब एक बार फिर साहित्य प्रेमी और रचनाकार उत्सुक हैं, क्योंकि 3 से 5 नवम्बर 2025 को लेखक गाँव, थानो में “स्पर्श हिमालय महोत्सव-2025” आयोजित होने जा रहा है।

इस बार महोत्सव का दायरा और भी व्यापक होगा — देश-विदेश से और अधिक लेखकों, कवियों, अनुवादकों, चित्रकारों, फिल्मकारों और संगीतकारों की भागीदारी होगी।

थीम तय की गई है – “शब्द से विश्व तक : संस्कृति का संवाद”। यह विषय अपने आप में साहित्य की वैश्विक भूमिका को रेखांकित करता है।

इस आयोजन में हिंदी भाषा और भारतीय साहित्य के अंतरराष्ट्रीय प्रसार पर विशेष सत्र होंगे। साथ ही युवा लेखकों और डिजिटल युग की रचनात्मकता पर भी विमर्श किया जाएगा। यह आयोजन न केवल अनुभवी लेखकों को बल्कि नई पीढ़ी के रचनाकारों को भी एक साझा मंच प्रदान करेगा।

🔹 रचनाकारों के लिए स्वर्ग समान वातावरण

लेखक गाँव की संरचना पूरी तरह साहित्यिक और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर की गई है। यहाँ स्थित “लेखक कुटीर” उन रचनाकारों के निवास हेतु बनाए गए हैं जो कुछ समय के लिए प्रकृति की गोद में रहकर अपने लेखन पर केंद्रित होना चाहते हैं।

हर कुटीर में आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ सादगी और पहाड़ी परंपरा की झलक मिलती है। इन कुटीरों के नाम प्रसिद्ध लेखकों और कवियों के नाम पर रखे जाने का प्रस्ताव है — ताकि आने वाले लेखक उनसे प्रेरणा ले सकें।

यहाँ निर्मित “हिमालयी पुस्तकालय” किसी मंदिर से कम नहीं। इसमें साहित्य, संस्कृति, इतिहास, भूगोल, दर्शन, राजनीति और विज्ञान से जुड़ी पुस्तकों का विशाल संग्रह है। विशेष रूप से हिमालयी राज्यों की लोककथाएँ, दुर्लभ पांडुलिपियाँ, सिक्के, मूर्तियाँ और पहाड़ी चित्रकला इस पुस्तकालय की पहचान होंगी।

यह पुस्तकालय पहाड़ी स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है—जहाँ खोली, छज्जा और तिवारी जैसी पारंपरिक संरचनाएँ स्थानीय पत्थर और लकड़ी से बनी हैं।

🔹 प्रकृति, संस्कृति और आत्मा का त्रिवेणी संगम

थानो का यह लेखक गाँव केवल भवनों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक पारिस्थितिकी तंत्र है। यहाँ की संजिवनी वाटिका और नक्षत्र-नवग्रह वाटिका रचनाकारों को प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ संवाद स्थापित करने की प्रेरणा देती हैं।

यह स्थान ध्यान, चिंतन और आत्मावलोकन के लिए आदर्श है। पहाड़ों की ताजी हवा, पक्षियों का मधुर कलरव और प्रकृति की नीरवता लेखक को भीतर तक झकझोर देती है, जिससे सृजन स्वतः प्रवाहित होने लगता है।

जो भी व्यक्ति यहाँ कुछ दिन बिताता है, वह स्वयं में एक नई ऊर्जा और दृष्टि लेकर लौटता है। यह स्थान मनुष्य के भीतर संवेदना, करुणा और सृजनशीलता के बीज बोता है — ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन काल में तपोवन साधना के केंद्र हुआ करते थे।

🔹 सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण

“लेखक गाँव” केवल आधुनिक साहित्यिक प्रयोगों का मंच नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का केंद्र भी है। यहाँ स्थित गंगा और हिमालय संग्रहालय में प्राचीन मूर्तियाँ, लोक कलाएँ, सिक्के, हस्तशिल्प, और दुर्लभ दस्तावेज़ प्रदर्शित किए जाएंगे।

यह संग्रहालय युवाओं को यह समझाने का माध्यम बनेगा कि हमारी संस्कृति केवल इतिहास की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान का आधार भी है।

इस स्थान का उद्देश्य है — “साहित्य के माध्यम से संस्कृति की रक्षा, और संस्कृति के माध्यम से मानवता का विकास।”

🔹 वैश्विक संदर्भ में हिंदी का विस्तार

स्पर्श हिमालय महोत्सव और लेखक गाँव की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि इसने हिंदी भाषा को वैश्विक स्तर पर सम्मान दिलाया है।

विदेशों से आए लेखकों ने न केवल हिंदी के साहित्य को समझा बल्कि उसे अपनी भाषा में अनुवादित करने का संकल्प भी लिया। इस प्रकार, ये लेखक अपने-अपने देशों में हिंदी के ब्रांड एम्बेसडर बन रहे हैं।

यह प्रयास भारत को सॉफ्ट पावर के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।

🔹 भविष्य की राह

थानो का लेखक गाँव आज एक मॉडल बन चुका है। आने वाले समय में ऐसे और गाँव देश के अन्य हिस्सों में भी विकसित किए जा सकते हैं—जैसे लेखक धाम या कला ग्राम।

ये स्थान न केवल पर्यटन को बढ़ावा देंगे, बल्कि सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेंगे।

लेखक, शोधकर्ता, विद्यार्थी और कला प्रेमी यहाँ आकर अपनी सृजनशीलता को नया आयाम दे सकेंगे।

🔹 शब्दों का हिमालय

थानो का “लेखक गाँव” वास्तव में सृजन की तपोभूमि है। यह वह स्थान है जहाँ शब्द साधना बन जाते हैं और लेखन पूजा का रूप ले लेता है।

यह गाँव हमें याद दिलाता है कि तकनीक और प्रगति के इस युग में भी साहित्य की जड़ें प्रकृति और आत्मा से जुड़ी हैं।

आने वाले 3 से 5 नवम्बर 2025 को जब एक बार फिर स्पर्श हिमालय महोत्सव का नया अध्याय आरंभ होगा, तब यह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं होगा, बल्कि भारत की साहित्यिक चेतना का उत्सव होगा — एक ऐसा उत्सव जो शब्दों को पर्वत की ऊँचाइयों तक ले जाएगा।

“लेखक गाँव” इस बात का प्रमाण है कि जब साहित्य और संस्कृति एक साथ चलते हैं, तो समाज केवल प्रगतिशील नहीं होता — वह प्रेरणास्रोत बन जाता है।

यह गाँव आने वाले समय में निश्चय ही भारत की सांस्कृतिक आत्मा का केंद्र बनेगा — जहाँ हर शब्द हिमालय की तरह अडिग, और हर विचार गंगा की तरह पवित्र होगा।

– डॉ. सत्यवान सौरभ📖

आंध्र प्रदेश वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर भगदड़, नौ मरे

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आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के काशीबुग्गा स्थित वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में एकादशी के दिन भगदड़ मच गई। इसमें नौ लोगों की मौत की खबर है। कई अन्य घायल हुए है। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने इस घटना पर दुख व्यक्त करते हुए मृतकों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की है। उन्होंने अधिकारियों को घायलों के इलाज के निर्देश दिए हैं।

। बताया जा रहा कि आज एकादशी के दिन काशीबुग्गा स्थित वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटी थी। इसी दौरान भगदड़ मच गई। इस घटना में कई लोगों के हताहत होने की खबर है। मंदिर का निर्माण अधूरा था और आने-जाने का एक ही रास्ता था। एकादशी के कारण 25,000 लोग आए थे, जबकि मंदिर की क्षमता 3,000 लोगों की ही थी। मृतकों के परिवारों के लिए मुआवजे की घोषणा की गई है।

चंद्रबाबू नायडू ने बताया त्रासदी

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने इस त्रासदी पर दुख व्यक्त करते हुए श्रद्धालुओं की मौत को “हृदय विदारक” बताया।

इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “श्रीकाकुलम जिले के काशीबुग्गा वेंकटेश्वर मंदिर में हुई भगदड़ से मुझे बहुत दुख हुआ। यह बहुत दुखद है कि इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में श्रद्धालुओं की मृत्यु हो गई। मैं पीड़ितों के परिवारों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूँ।”

हिंदी की प्रख्यात लेखिका प्रभा खेतान और उनके साहित्यिक योगदान

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हिंदी साहित्य के विस्तृत संसार में प्रभा खेतान का नाम एक ऐसी सशक्त और संवेदनशील लेखिका के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने अपने लेखन से स्त्री-मन, समाज और जीवन के यथार्थ को गहराई से अभिव्यक्त किया। वह न केवल एक प्रतिभाशाली लेखिका थीं, बल्कि एक समाजसेवी, व्यवसायी और अनुवादक के रूप में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। प्रभा खेतान का साहित्य स्त्री चेतना की वह गूंज है जो पारंपरिक सीमाओं को लांघकर आत्मस्वर में बदल जाती है।


प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

प्रभा खेतान का जन्म 1 नवंबर 1942 को राजस्थान के बीकानेर में हुआ था। बचपन से ही उनमें अध्ययन और चिंतन की प्रवृत्ति थी। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और बाद में अंग्रेज़ी साहित्य में डॉक्टरेट (Ph.D.) की उपाधि हासिल की। उनकी शिक्षा और संस्कारों ने उन्हें जीवन के गहरे अर्थों को समझने की दृष्टि दी।

प्रभा खेतान का जीवन राजस्थान के पारंपरिक सामाजिक परिवेश में बीता, जहां स्त्रियों पर अनेक प्रकार की सामाजिक मर्यादाएँ लागू थीं। लेकिन उन्होंने उन सीमाओं को तोड़ा और अपनी स्वतंत्र सोच व आत्मनिर्भरता के बल पर एक नई राह बनाई।


साहित्यिक यात्रा की शुरुआत

प्रभा खेतान का लेखन 1970 के दशक में शुरू हुआ। उन्होंने प्रारंभ में कविताएँ लिखीं, लेकिन धीरे-धीरे उनका रुझान उपन्यास और आत्मकथात्मक लेखन की ओर हुआ। उनका लेखन हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श की एक सशक्त आवाज़ के रूप में उभरा।

उनके लेखन की विशेषता यह है कि उन्होंने समाज की रूढ़ियों, स्त्री की आंतरिक जटिलताओं और उसकी भावनात्मक संवेदनाओं को बड़े ही सजीव और प्रखर ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने यह दिखाया कि स्त्री केवल परिवार या संबंधों का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र सत्ता रखती है।


प्रमुख कृतियाँ

प्रभा खेतान ने कई प्रसिद्ध उपन्यास और आत्मकथाएँ लिखीं। उनके प्रमुख उपन्यास हैं — “छिन्नमस्ता”, “पीली आंधी”, “आओ पेपे घर चलें”, “उपनिवेश”, और “अन्या से अनन्या”।

“छिन्नमस्ता” : यह उपन्यास स्त्री की यौनिकता और सामाजिक पाखंड पर गहरा प्रहार करता है। इसमें उन्होंने एक ऐसी स्त्री की कहानी कही है जो अपनी इच्छाओं को दबाने से इनकार करती है।

“अन्या से अनन्या” : यह आत्मकथात्मक रचना है, जिसमें प्रभा खेतान ने अपने जीवन के अनुभवों को बेहद ईमानदारी से लिखा है। इस किताब में समाज की दोहरी मानसिकता, स्त्री की अस्मिता और आत्मसंघर्ष का मार्मिक चित्रण है।

“पीली आंधी” : यह उपन्यास उत्तर भारत के सामाजिक जीवन और उसमें नारी के संघर्षों को उजागर करता है।

इनके अलावा उन्होंने अनेक निबंध, कविताएँ और लेख भी लिखे जो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।


स्त्री विमर्श की सशक्त आवाज़

प्रभा खेतान का लेखन स्त्री विमर्श को हिंदी साहित्य में गहराई देने वाला माना जाता है। उन्होंने यह माना कि नारी मुक्ति का अर्थ केवल पुरुष विरोध नहीं है, बल्कि अपनी पहचान और आत्मसम्मान की स्थापना है। उनके पात्र प्रायः शिक्षित, संवेदनशील और आत्मचेतन स्त्रियाँ हैं जो सामाजिक बंधनों से टकराने का साहस रखती हैं।

उनकी रचनाओं में प्रेम, वासना, संबंधों की जटिलता, मातृत्व और आत्म-संघर्ष की गहरी पड़ताल मिलती है। वह उन विरली लेखिकाओं में से थीं जिन्होंने स्त्री-शरीर और उसकी इच्छाओं पर खुलकर लिखा, बिना किसी झिझक या सामाजिक भय के।


अनुवाद और सामाजिक योगदान

प्रभा खेतान ने लेखन के साथ-साथ अनुवाद के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने सिमोन द बोउवा (Simone de Beauvoir), पाउलो कोएलो, जीन पॉल सार्त्र और अन्य विश्व प्रसिद्ध लेखकों की कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया। उनके अनुवादों ने हिंदी पाठकों को विश्व साहित्य से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई।

वह एक सफल उद्यमी भी थीं — कोलकाता में उन्होंने “डॉ. प्रभा खेतान एंड कंपनी” नाम से व्यवसाय शुरू किया जो बाद में उनके सामाजिक कार्यों के लिए वित्तीय आधार बना।

उनकी स्थापना की हुई संस्था “प्रभा खेतान फाउंडेशन” आज भी साहित्य, संस्कृति और महिला सशक्तिकरण के लिए कार्य कर रही है। यह संस्था देश-विदेश में हिंदी साहित्य के प्रचार और भारतीय विचारधारा के प्रसार के लिए सेमिनार, चर्चा और पुस्तक विमोचन कार्यक्रम आयोजित करती है।


शैली और भाषा

प्रभा खेतान की भाषा सरल, प्रभावशाली और भावनात्मक है। वे अपने पात्रों के मनोभावों को बारीकी से उकेरने में सिद्धहस्त थीं। उनके लेखन में आत्मस्वीकृति की शक्ति और सामाजिक विद्रोह का स्वर दोनों साथ चलते हैं। वे भावनाओं को शब्दों में ढालने की ऐसी कला रखती थीं कि पाठक उनके पात्रों के दर्द और संघर्ष को महसूस कर सके।

उनका लेखन आत्मकथात्मक होते हुए भी सामूहिक अनुभवों का दर्पण बन जाता है। उन्होंने महिलाओं के अंतर्मन में झाँकने और उनके मौन को शब्द देने का कार्य किया।


सम्मान और विरासत

प्रभा खेतान को उनके योगदान के लिए अनेक साहित्यिक पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा गया। वे कोलकाता की उन चुनिंदा साहित्यिक हस्तियों में थीं जिनका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर था।

2008 में उनके निधन के बाद भी उनकी रचनाएँ नई पीढ़ी की लेखिकाओं को प्रेरित कर रही हैं। “प्रभा खेतान फाउंडेशन” के माध्यम से उनका साहित्यिक और सामाजिक कार्य आज भी जीवंत है।


निष्कर्ष

प्रभा खेतान हिंदी साहित्य की उन महान लेखिकाओं में से हैं जिन्होंने स्त्री के आत्मबोध, संघर्ष और संवेदना को गहराई से स्वर दिया। उन्होंने यह साबित किया कि स्त्री केवल प्रेरणा का विषय नहीं, बल्कि स्वयं रचना का केंद्र भी हो सकती है।

उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, यदि व्यक्ति में आत्मविश्वास और रचनात्मक दृष्टि है, तो वह समाज की धारणाओं को बदल सकता है। प्रभा खेतान का लेखन हिंदी साहित्य में उस दीपक की तरह है जो नारी चेतना के मार्ग को आज भी आलोकित कर रहा है।

गदर पार्टी के संस्थापक तारकनाथ दास

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तारकनाथ दास भारत के प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों में से एक गिने जाते हैं। अरविन्द घोष, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा चितरंजन दास इनके घनिष्ठ मित्रों में से थे। क्रान्तिकारी गतिविधियों के कारण इन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी, लेकिन बाद में पुन: अध्ययन प्रारम्भ कर इन्होंने पी.एच. डी. की उपाधि प्राप्त की थी। तारकनाथ दास पर अमेरिका में मुकदमा चला था, जहाँ इन्हें क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी।

तारकनाथ दास का जन्म 1884 में बंगाल में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। कलकत्ता के कॉलेज में भाग लेने के दौरान, उन्हें ब्रिटिश विरोधी समाज में भर्ती कराया गया। 1905 तक, उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी और एक भयानक छात्र के रूप में प्रच्छन्न भारत के आसपास भटक रहे थे और क्रांतिकारी संदेश फैल रहे थे। पुलिस द्वारा तलाश की थी, वह 1905 में जापान के एक साधु, या हिंदू तपस्वी के रूप में प्रच्छन्न होकर भाग गए। ब्रिटिश राजदूत ने प्रत्यर्पण की मांग करने के बाद दास, शरण की तलाश में यू.एस. से भाग गए। वह जुलाई, 1906 में सिएटल पहुंचे।

दास ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में नामांकित किया, और तुरंत भारतीय प्रवासियों के आयोजन के लिए काम किया। अपनी पढ़ाई और कार्यकर्ता राजनीति का समर्थन करने के लिए धन की आवश्यकता पडी तो दास ने यू.एस. इमिग्रेशन एंड नैचुरलाइजेशन सर्विस (आईएनएस) में एक दुभाषिए के रूप में सुरक्षित रोजगार लिया। उन्हें वैंकूवर, बीसी में तैनात किया गया था, जहां उनका काम यह सुनिश्चित करना था कि पूर्व भारतीय भारतीयों में से कोई भी उतर नहीं आया। अपने देशवासियों के साथ उनकी सहानुभूति ने उन्हें कनाडाई और अमेरिकी एजेंटों की पूछताछ में आप्रवासियों को प्रशिक्षित करने का मौका दिया।

पुलिस के पीछे लग जाने पर युवा तारकनाथ 1905 ई. में साधु का वेश बनाकर ‘तारक ब्रह्मचारी’ के नाम से जापान चले गए। एक वर्ष वहाँ रहकर फिर अमेरिका में ‘सेन फ़्राँसिस्को’ पहुँचे। यहाँ उन्होंने भारत में अंग्रेज़ों के अत्याचारों से विश्व जनमत को परिचित कराने के लिए ‘फ़्री हिन्दुस्तान’ नामक पत्र का प्रकाशन आरंभ किया। उन्होंने ‘ग़दर पार्टी’ संगठित करने में लाला हरदयाल आदि की भी सहायता की। पत्रकारिता तथा अन्य राजनीतिक गतिविधियों के साथ उन्होंने अपना छूटा हुआ अध्ययन भी आरंभ किया और ‘वाशिंगटन यूनिवर्सिटी’ से एम. ए. और ‘जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी’ से पी-एच. डी. की उपाधि प्राप्त की।

प्रथम विश्वयुद्ध आरंभ होने पर वे शोध-कार्य के बहाने जर्मनी आ गए और वहाँ से भारत में ‘अनुशीलन पार्टी’ के अपने साथियों के लिए हथियार भेजने का प्रयत्न किया। इसके लिए उन्होंने यूरोप और एशिया के अनेक देशों की यात्रा की। बाद में जब वे अमेरिका पहुँचे तो उनकी गतिविधियों की सूचना अमेरिका को भी हो गई। इस पर तारकनाथ दास पर अमेरिका में मुकदमा चला और उन्हें 22 महीने की क़ैद की सज़ा भोगनी पड़ी।

इसके बाद तारकनाथ दास ने अपना ध्यान ऐसी संस्थाएँ स्थापित करने की ओर लगाया, जो भारत से बाहर जाने वाले विद्यार्थियों की सहायता करें। ‘इंडिया इंस्टिट्यूट’ और कोलम्बिया का ‘तारकनाथ दास फ़ाउंडेशन’ दो ऐसी संस्थाएं अस्तित्व में आईं। वे कुछ समय तक कोलम्बिया यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर भी रहे। लम्बे अंतराल के बाद 1952 में वे भारत आए और कोलकाता में ‘विवेकानंद सोसाइटी’ की स्थापना की। इस महान् देश-भक्त का 22 दिसंबर, 1958 को अमेरिका में देहांत हो गया।

बंगाली उत्साह को बढ़ावा देने के क्रम में शिवाजी के अलावा एक महानतम बंगाली नायक राजा सीताराम राय के उपलब्धियों की स्मृति में एक त्योहार की शुरूआत की गयी। 1906 के प्रारंभिक महीनों में, बंगाल की पूर्व राजधानी जेसोर के मोहम्मदपुर में सीताराम उत्सव की अध्यक्षता करने के लिए जब बाघा जतिन या जतिंद्र नाथ मुखर्जी को आमंत्रित किया गया तो उनके साथ तारक भी इसमें शामिल हुए. इस अवसर पर, एक गुप्त बैठक का आयोजन किया गया जिसमें तारक, श्रीश चंद्र सेन, सत्येन्द्र सेन और अधर चन्द्र लस्कर सहित जतिन भी उपस्थित थे: सभी को एक के बाद एक विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाना था। 1952 तक उस गुप्त बैठक के उद्देश्य के बारे में किसी को जानकारी नहीं थी, जब बातचीत के दौरान तारक ने इसके बारे में बताया। विशिष्ट उच्च शिक्षा के साथ, उन्हें सैन्य प्रशिक्षण और विस्फोटकों का ज्ञान प्राप्त करना था। उन्होंने विशेष रूप से भारत की स्वतंत्रता के फैसले के पक्ष में स्वतन्त्र पश्चिमी देशों के लोगों के बीच सहानुभूति का वातावरण बनाने का आग्रह किया।

1924 में उनके छूटने के बाद तारक ने लम्बे समय की दोस्त और दान करने वाली मेरी किटिंगे मोर्स से शादी की। वह नेशनल एसोसिएशन फॉर द एड्वांसमेंट ऑफ कलर्ड पिपुल और नेशनल वूमेन पार्टी संस्थापक सदस्य थी। उनके साथ, वे यूरोप की एक विस्तारित दौरे पर गए थे। उन्होंने अपनी गतिविधियों के लिए म्यूनिख को मुख्यालय बनाया। यह वहां था जहां उन्होंने भारत इंस्टिट्यूट की स्थापना की थी, जहां सराहनीय भारतीय छात्रों को जर्मनी में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रवृत्ति दी जाती थी।

रजनी कांत शुक्ला

पद्मिनी कोल्हापुरी,आज जिनका जन्मदिन है

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पद्मिनी कोल्हापुरी का जन्म 1 नवंबर 1965 को एक मराठी परिवार में हुआ था। वे एक भारतीय अभिनेत्री और गायिका हैं, जो मुख्यतः हिंदी और मराठी फिल्मों में काम करती हैं। कोल्हापुरी को 80 के दशक की अग्रणी अभिनेत्रियों में से एक माना जाता है। अपने चार दशक से ज़्यादा के करियर में, उन्होंने 75 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया है और तीन फिल्मफेयर पुरस्कारों सहित कई पुरस्कार प्राप्त किए हैं।

वे पेशेवर संगीतकार पंढरीनाथ कोल्हापुरी की पत्नी निरुपमा कोल्हापुरी की तीन बेटियों में दूसरे नंबर पर हैं। उनकी बड़ी बहन पूर्व अभिनेत्री शिवांगी कोल्हापुरी हैं, जो अभिनेता शक्ति कपूर की पत्नी और अभिनेत्री श्रद्धा कपूर और अभिनेता सिद्धांत कपूर की माँ हैं । उनकी छोटी बहन, तेजस्विनी कोल्हापुरी भी एक अभिनेत्री हैं।

उन्होंने 1972 में सात साल की उम्र में अपने अभिनय करियर की शुरुआत की, और उनकी शुरुआती फ़िल्मों में ज़िंदगी (1976) और ड्रीम गर्ल (1977) शामिल हैं। उन्हें फ़िल्म सत्यम शिवम सुंदरम (1978) से सफलता मिली, जिसमें उन्होंने युवा रूपा की भूमिका निभाई।

15 साल की उम्र में, कोल्हापुरी ने रिवेंज ड्रामा इंसाफ का तराजू (1980) में अपने प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता , और 17 साल की उम्र में, संगीतमय रोमांटिक ड्रामा प्रेम रोग (1982) के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता , इस प्रकार संबंधित श्रेणियों में पुरस्कार जीतने वाली दूसरी सबसे कम उम्र की अभिनेत्री बन गईं। उन्हें सौतन (1983) में उनकी भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए भी नामांकित किया गया था और उन्हें प्यार झुकता नहीं (1985 ) के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का नामांकन भी मिला था। कोल्हापुरी ने हिंदी सिनेमा में खुद को एक अग्रणी महिला के रूप में स्थापित किया, जिसमें आहिस्ता आहिस्ता (1981), विधाता ( 1982 ) , वो सात दिन ( 1983 ), दो दिलों की दास्तान ( 1985 ), उन्होंने चिमनी पाखर (2000), मंथन: एक अमृत प्याला (2005) और प्रवास (2020) जैसी मराठी फिल्मों में भी काम किया है ।

फ़िल्म ऐसा प्यार कहाँ (1986) में काम करते हुए, कोल्हापुरे की मुलाक़ात प्रदीप शर्मा उर्फ़ टूटू शर्मा से हुई, जो फ़िल्म के निर्माता थे।1986 में उन्होंने शादी कर ली। उनका एक बेटा है जिसका नाम प्रियांक शर्मा है, जिसका जन्म फरवरी 1990 में हुआ था। प्रियांक ने फ़िल्म निर्माता राजकुमार संतोषी को फ़िल्म फटा पोस्टर निकला हीरो में सहायक थे और सब कुशल मंगल (2020) में एक अभिनेता के रूप में काम किया है।

2022 में, उन्हें आउटलुक इंडिया की “75 सर्वश्रेष्ठ बॉलीवुड अभिनेत्रियों” की सूची में रखा गया था। उनके सह-अभिनेता अनिल कपूर ने अपने करियर का श्रेय उन्हें दिया और कहा, “यह इसलिए है क्योंकि वह वो सात दिन करने के लिए सहमत हुईं , इसलिए मैं आज जहाँ हूँ, वहाँ हूँ।”

1981 में, कोल्हापुरी ने राजा चार्ल्स तृतीय के गाल पर चुम्बन दिया था। इसने ब्रिटिश मीडिया में खूब चर्चा बटोरी थी। 2016 में, कोल्हापुरी एक डिज़ाइनर बन गईं और अपनी दोस्त सीता तलवलकर के साथ मिलकर अपना भारतीय और इंडो-वेस्टर्न परिधान ब्रांड शुरू किया। उनकी भतीजी श्रद्धा कपूर ने इस ब्रांड का अनावरण किया।

रविकांत शुक्ला

कथावाचक रामकिंकर उपाध्याय

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रामकिंकर उपाध्याय का जन्म 1 नवम्बर, 1924 में मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ था। वे भारत के मानस मर्मज्ञ, कथावाचक एवं हिन्दी साहित्यकार थे। उन्हें सन 1999 में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया था।

ये जन्म से ही होनहार व प्रखर बुद्धि के थे। इनकी शिक्षा-दीक्षा जबलपुर व काशी में हुई। रामकिंकर उपाध्याय स्वभाव से ही अत्यन्त संकोची एवं शान्त प्रकृति के बालक थे। ये बचपन से ही अपनी अवस्था के बच्चों की अपेक्षा कुछ अधिक गम्भीर हुआ करते थे। बाल्यावस्था से ही इनकी मेधाशक्ति इतनी विकसित थी कि क्लिष्ट एवं गम्भीर लेखन, देश-विदेश का विशद साहित्य अल्पकालीन अध्ययन में ही स्मृति पटल पर अमिट रूप से अंकित हो जाता था। प्रारम्भ से ही पृष्ठभूमि के रूप में रामकिंकर उपाध्याय पर अपने माता-पिता के धार्मिक विचार एवं संस्कारों का प्रभाव था।

वे रामचरित मानस का परम ज्ञाता थे जितनी बार बोलते हर बार नए अर्थ उद्घाटित करते।

रामकिंकर आचार्य कोटि के संत थे। सारा विश्व जानता है कि रामायण की मीमांसा जिस रूप में उन्होंने की वह अद्वितीय थी। परन्तु स्वयं रामकिंकर जी ने अपने ग्रंथों में, प्रवचनों में या बातचीत में कभी स्वीकार नहीं किया कि उन्होंने कोई मौलिक कार्य किया है। वे हमेशा यही कहते रहे कि मौलिक कोई वस्तु नहीं होती है भगवान जिससे जो सेवा लेना चाहते हैं वह ले लेते हैं वस्तु या ज्ञान जो पहले से होता है व्यक्ति को केवल उसका सीमित प्रकाशक दिखाई देता है, दिखाई वही वस्तु देती है जो होती है जो नहीं थी वह नहीं दिखाई जा सकती है। वह कहते हैं कि रामायण में वे सूत्र पहले से थे, जो लोगों को लगते हैं कि मैंने दिखाए या बोले, पर सत्य नहीं है। उनका वह वाक्य उनकी और ईश्वर की व्यापकता को सिद्ध करता है।

रामकिंकर आचार्य की ज्ञान-विज्ञान पथ में जितनी गहरी पैठ थी, उतना ही प्रबल पक्ष भक्ति साधना का उनके जीवन में दर्शित होता था। वैसे तो अपने संकोची स्वभाव के कारण इन्होंने अपने जीवन की दिव्य अनुभूतियों का रहस्योद्घाटन अपने श्रीमुख से बहुत आग्रह के बावजूद नहीं किया। पर कहीं-कहीं उनके जीवन के इस पक्ष की पुष्टि दूसरों के द्वारा जहाँ-तहाँ प्राप्त होती रही। उसी क्रम में उत्तराखण्ड की दिव्य भूमि ऋषिकेश में हनुमानजी महाराज का प्रत्यक्ष साक्षात्कार, निष्काम भाव से किए गए, एक छोटे से अनुष्ठान के फलस्वरूप हुआ। वैसे ही चित्रकूट धाम की दिव्य भूमि में अनेकानेक अलौकिक घटनाएँ परम पूज्य महाराजश्री के साथ घटित हुईं। जिनका वर्णन महाराजश्री के निकटस्थ भक्तों के द्वारा सुनने को मिला। वे अपने स्वभाव के अनुकूल ही इस विषय में सदैव मौन रहे।

एक शिष्य ने परमपूज्यपाद रामकिंकर जी से कहा… महाराज! मुझे यह भजन करना झंझट सा लगता है, मैं छोड़ना चाहता हूँ इसे! उदार और सहज कृपालु महाराजश्री उस शिष्य की ओर करुणामय होकर बोले… छोड़ दो भजन! मैं तुमसे सहमत हूँ। स्वाभाविक है कि झंझट न तो करना चाहिए और न ही उसमें पड़ना चाहिए पर मेरा एक सुझाव है जिसे ध्यान रखना कि फिर जीवन में कोई और झंझट भी मत पालना क्योंकि तुम झंझट से बचने की इच्छा रखते हो और कहीं भजन छोड़ कर सारी झंझटों में पड़ गए तो जीवन में भजन छूट जायेगा और झंझट में फँस जाओगे और यदि भजन नहीं छूटा तो झंझट भी भजन हो जाएगा तो अधिक अच्छा यह है कि इतनी झंझटें जब हैं ही तो भजन की झंझट भी होती रहे।

रामकिंकर उपाध्याय ने 9 अगस्त, 2002 को अपना पञ्च भौतिक देह का त्याग कर दिया। इस 78 वर्ष के अन्तराल में उन्होंने रामचरितमानस पर 49 वर्ष तक लगातार प्रवचन दिये थे।

रमाकांत शुक्ल

क्या वन्देमातरम को कांग्रेस ने छोटा किया था

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क्या वन्देमातरम को काटकर छोटा करने का काम कांग्रेस पार्टी ने किया था ? क्या ऐसा करने से ही देश के विभाजन की नींव पड़ी थी ? यह आरोप चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केवड़िया में सरदार पटेल की 150वीं जयंती के आयोजन में बोलते हुए लगाया तो मामला गंभीर है ।

वास्तव में वन्देमातरम जैसे स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणा को बीच से काटकर छोटा करना जिन्ना एंड कंपनी के दबाव में हुआ । बाद में राष्ट्रीय स्वाभिमान से भरा यह राष्ट्रगीत आधे से भी कम रह गया । किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि वन्देमातरम जैसा राष्ट्र स्वाभिमानी गीत भी कभी भारत के बंटवारे की जड़ बन सकता है ।

वन्देमातरम मातृभूमि की वंदना का गीत है । यह गीत बंगाल के प्रसिद्ध राष्ट्रभक्त कवि साहित्यकार पंडित बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था । उन्होंने अपने विश्वविख्यात उपन्यास आनंदमठ में भी इसका प्रयोग किया । गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे बार बार गाया । बंगाल की कलाभूमि पर लिखा गया यह गीत बंगाल से निकलकर सारे देश में फैल गया । धीरे धीरे वन्देमातरम स्वाधीनता आंदोलन का पर्याय बन गया ।

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई हरेकजुबान पर वन्देमातरम सरस्वती बनकर बैठ गया । वन्देमातरम गाते देशवासी अंग्रेजों की लाठी गोलियां खाते , जेलों में यातनाएं झेलते और सूली पर चढ़ जाते ।
क्रांतिकारियों ने वन्देमातरम गा गाकर समर्पित युवाओं की फौज खड़ी कर दी । उसी दौर में जिन्ना और कुछ इस्लामिक इल्मियों को वन्देमातरम से हिन्दुत्व की बू आने लगी ।

बात बढ़ती गई । तब कांग्रेस ने 1937 के अधिवेशन में वन्देमातरम को काटकर मात्र एक छंद तक सीमित कर दिया । बाद में उतना ही राष्ट्रीय गीत कांग्रेस अधिवेशनों में गया जाने लगा , आंदोलनों में गाया जाने लगा और आजादी के बाद उतना ही आकाशवाणी तथा दूरदर्शन पर बजने लगा । बंकिम बाबू के गीत के टुकड़े कांग्रेस ने कर दिए ।

प्रधानमंत्री के अनुसार ऐसा करने से ही मुस्लिम लीग ने अलग पाकिस्तान की आवाज उठानी शुरू कर दी । यही आवाज आगे चलकर देश के विभाजन का कारण बनी । खैर ! जो हुआ सो हुआ । वन्देमातरम को राष्ट्रगान बनाने के बजाय राष्ट्रगीत बनाया , जन गण मन को राष्ट्रगान बनाया । काश ऐसा न हुआ होता । वन्देमातरम गीत आज भी देश की आत्मा है , सदा सर्वदा तक रहेगा भी ।
,,,,,,,,,कौशल सिखौला

“मेहनत, माटी अरमान — यही सै हरियाणा की पहचान”

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(हरियाणा — जां कर्म, धर्म अर हौंसले का परदेश सै, छोरियां तै लेकर खेतां तक — हरियाणा चमक रया सै) 

हरियाणा दिवस कोई सिरफ दिन ना सै, ये तो माटी का त्योहार सै — जिथे मेहनत ने भगवान माना जावै, अर पसीना इज्जत बन जावै। खेतां तै अखाड़ां तक, छोरे-छोरियां देश का नाम ऊंचा कर रै सै। ये धरती सै वीरां की, गीता के ज्ञान की, अर एकता के मान की। हरियाणा दिवस सिखावै सादगी, स्वाभिमान अर भाईचारे की बात — कि असली तरक्की तब सै, जब माणस अपने धरती तै प्यार करे अर कर्म सै ना हटे।

– डॉ. प्रियंका सौरभ

हरियाणा म्हारे लिए सिरफ एक राज्य ना सै, ये तो भावना सै, अपनापन सै, अर गर्व सै। 1 नवम्बर 1966 के दिन जब हरियाणा, पंजाब तै अलग होके एक नया परदेश बन्या, तै किसे ना पता था के ये छोटा सा इलाका एक दिन पूरे भारत मं अपनी पहचान छोड़ जावेगा। इब्ब देख लो, हरियाणा खेती तै लेके खेलां तक, फौज तै लेके कारोबार तक — हर जगह अपनी अलग छाप छोड़ै सै।

हरियाणा की मिट्टी मं कुछ बात सै भाई। यहीं कुरुक्षेत्र की धरती पर भगवान कृष्णा ने अर्जुन नै गीता का उपदेश दियो था — कर्म कर, फल की चिंता मत कर। इसी माटी की गोद मे पानीपत के रण लड़े गए, जां वीरां नै अपनी जान दाव पर लगा दी। हर कदम पर इतिहास बसै सै इस धरती का, अर इस धरती नै इतिहास रचण की आदत सै।

किसानां की बात करां त हरियाणा का किसान सबसे मेहनती सै। सूरज चढ़ण तै पहले खेत मं पहुंच जावै सै, अर सूरज डूबे तै बाद घर आवै सै। माटी नै सींचण की ताकद इब्ब भी इस परदेश के हाथां मं सै। दूध-दही की धरती कहे सै इस नै, अर सच मं, यहाँ के घर-घर मं घी की खुशबू, लस्सी की ठंडक अर सच्चाई की मिठास बसै सै।

हरित क्रांति में हरियाणा नै जो योगदान दियो, वो कोई भूल ना सकै। खेती मं नई तकनीक लाण, पानी की बचत करण अर जमीन नै उपजाऊ बनावण — ये सब इस राज्य की पहचान सै। किसान इब्ब सिरफ हल चलावण वाला ना रह्या, वो उद्यमी बन ग्या सै, तकनीक जाणन लाग्या सै, अर खेती नै इज्जत दिलावण लाग्या सै।

खेलां की बात आवै त हरियाणा सै ओ धरती, जां मिट्टी की खुशबू पसीने मं बदल जावे सै। बजरंग पूनिया, साक्षी मलिक, नीरज चोपड़ा, बबीता-विनेश फोगाट — ये सब नाम सिरफ पदक ना, परिश्रम की मिसाल सैं। गाँवां मं अखाड़े सै, पर वो सिरफ कुश्ती के मैदान ना, वो संस्कार के मंदिर सैं। छोरियां भी इब्ब कम ना — ओलंपिक तक का सफर तय कर री सैं।

पहले लोग कहतै थे “बेटा जरूरी सै”, इब्ब हरियाणा कहै सै — “छोरी भी कम ना सै।” “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” सिरफ नारा ना रह्या, इस नै समाज बदल दियो। हरियाणा की छोरियां आज पढ़ लिख के फौज मं, स्कूलां मं, खेलां मं, दफ्तरां मं, हर जगह नाम कमावै सैं। ओ साबित कर रई सैं के हरियाणा की माटी मं साहस सिरफ मर्दां का ना, नारी का भी सै।

संस्कृति की बात करां त हरियाणा का लोकजीवन सादा पर रंगीन सै। यहाँ तीज-त्योहारां का मेला लागै सै — फाग गाऊं, झंझ बजाऊं, ढोलक की थाप पे नाचू। हर गीत मं अपनापन सै, हर रागनी मं कहानी सै। हरियाणवी बोली भले कड़ी लागै, पर सच्चाई की मिठास सै इस मं। यहाँ का आदमी दिल का साफ सै — बोलन मं सीधा, करन मं सच्चा।

गुरुग्राम, फरीदाबाद, पानीपत, हिसार — इब्ब उद्योग और शिक्षा के केंद्र बन चुके सैं। शहर चमक रए सैं, पर गाँवां की मिट्टी आज भी अपनापन ना छोड़ै सै। हरियाणा की प्रति व्यक्ति आमदनी देश मं सबसे ऊपर सै, अर ये मेहनत का नतीजा सै। पर चुनौतियाँ भी सैं — बेरोजगारी, प्रदूषण, पानी की कमी अर जात-पात की दीवार — इन नै मिटावण की जिम्मेदारी हम सबकी सै।

हरियाणवी लोग सीधे सैं, पर दिल के सच्चे सैं। झूठ नै नफरत करैं, मेहनत नै इबादत मानैं। ओ कहैं — “काम बोलै, आदमी ना बोलै।” यही सच्चाई इस परदेश की ताकत सै। यहाँ दिखावा ना सै, पर कर्म सै, सच्चाई सै, अर विश्वास सै।

देश की रक्षा में हरियाणा के जवान सदा आगे रहै सैं। सीमा पे खड़े होके ओ देश की आन-बान की रक्षा करैं सैं। खेत मं किसान, सीमा पे जवान, खेल मं खिलाड़ी — हर कोई इस मिट्टी का बेटा अपनी भूमिका निभा रह्या सै।

हरियाणा दिवस मनाण का मतलब सिरफ झंडा लगाण या भाषण देण ना सै, ये दिन याद करावै सै उस आत्मा नै, जां सादगी, मेहनत, अर एकता बसै सै। ये दिन याद करावै सै के हम सिरफ एक राज्य ना, पर एक परिवार सैं — जो कर्म, धर्म अर सच्चाई मं विश्वास राखै सै।

आज जरूरत सै के हम अपने गाँव, खेत, अर संस्कृति नै सहेज के रखां। आधुनिकता अपनावां, पर अपनी जड़ां नै ना भूलां। पर्यावरण बचावां, शिक्षा बढ़ावां, अर बेटां-बेटी मं फर्क मिटावां। हरियाणा नै स्वच्छ, शिक्षित, समृद्ध अर समान बनावां — यही सच्चा हरियाणा दिवस का संदेश सै।

चलो, आज के दिन सब मिलके प्रण लें —

हम इस मिट्टी की खुशबू नै ना मिटण देंगे,

हम मेहनत अर सच्चाई नै जिंदा रखांगे,

हम अपने हरियाणा नै ऐसे बनावांगे —

जां देख के दुनिया कहे —

“सच मं हरि का वास सै — हरियाणा परदेश!”

जय हरियाणा, जय भारत!

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

एक फैशन बन गया है संघ पर रोक लगाने की मांग

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बाल मुकुन्द ओझा

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर एक बार फिर प्रतिबंध लगाने की बात कही है। इससे पूर्व उनके बेटे और कर्नाटक के आईटी मंत्री प्रियंक खरगे भी ऐसी ही बात कह चुके है। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं द्वारा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग पर एकाएक ही देश की सियासत गरमा उठी है और परस्पर आरोप प्रत्यारोपों की राजनीति शुरू हो गई है। सियासी समीक्षकों का मानना है बिहार चुनावों के मधे नज़र कांग्रेस की ऐसी बेतुकी टिप्पणी पार्टी के लिए आत्मघाती हो सकती है, क्योंकि जब जब भी कांग्रेस सरकारों ने संघ पर प्रतिबन्ध लगाया है वह दुगुनी ताकत से उभरकर सामने आया।

खरगे बाप और बेटे दोनों संघ के खिलाफ लगातार जहर उगलते रहे है, यह किसी से छिपा नहीं है। हालांकि उन्होंने कहा कि मेरा व्यक्तिगत विचार है और मैं खुले तौर पर कहता हूं कि आरएसएस पर प्रतिबंध लगना चाहिए। सरदार पटेल का जिक्र करते हुए उन्होंने कही ये बात। कांग्रेस अध्यक्ष तो यहाँ तक कहते है वे मरने से पहले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ताच्युत करके रहेंगे। आरएसएस पर प्रतिबंध की मांग से जुड़े खरगे के बयान को आपत्तिजनक बताते हुए भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि उन्हें संघ के इतिहास के बारे में जानना चाहिए। गांधी जी की हत्या के बाद कपूर कमीशन ने आरएसएस को क्लीन चिट दी थी। भाजपा नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा है, लोकतंत्र में असहमति पर पूरे देश को जेलखाना बना देने वाली यह कांग्रेसी मानसिकता द्वारा संघ पर प्रतिबंध लगाने की बात करना कोई पहला अवसर नहीं है। पहले भी इन लोगों ने अपनी सत्ता और तुष्टिकरण की राजनीति को बचाए रखने के लिए संघ पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की है।

कांग्रेस की सरकारों ने तीन बार 1948 1975 व 1992 में इस पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन तीनों बार संघ पहले से भी अधिक मजबूत होकर उभरा। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों में माना है कि संघ एक सामाजिक, सांस्कृतिक संगठन है। आजादी के बाद से ही कांग्रेस के निशाने पर रहा है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। लाख चेष्टा के बावजूद कांग्रेस संघ को समाप्त करना तो दूर हाशिये पर लाने में सफल नहीं हुआ। संघ को खत्म करने के चक्कर में खुद कांग्रेस अपना वजूद समाप्त करने की ओर अग्रसर है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पहली विपदा महात्मा गांधी की हत्या के दौरान आई जब हत्यारे नाथूराम गोडसे को संघ का स्वयंसेवक बताकर संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। बाद में एक जांच समिति ने संघ पर लगे आरोपों को सही नहीं बताया तब संघ से प्रतिबन्ध हटा लिया गया और एक बार फिर संघ ने स्वतंत्र होकर अपना कार्य शुरू किया। संघ पर इस दौरान यह आरोप लगाया गया कि वह हिन्दू अधिकारों की वकालत करता है। मगर संघ का कहना है कि हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति है। भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है तो इसका कारण यह है कि यहाँ हिन्दू बहुमत में हैं। बताया जाता है कि 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान संघ के अप्रतिम सेवाभावी कार्यों से प्रभावित होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने 1963 में गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने का संघ को निमंत्रण दिया। दो दिन की अल्प सूचना के बाबजूद तीन हजार गणवेशधारी स्वयं सेवक उस परेड में शामिल हुए। यहाँ यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि संघ गांधी हत्यारा था तो पं. नेहरू ने उसे देशभक्त संगठन मानकर परेड में शामिल क्यों किया। संघ पर दूसरी विपदा 1975 में तब आई जब आपातकाल के दौरान उस पर प्रतिबन्ध लगाकर हजारों स्वयंसेवकों को कारागार में डाल दिया गया। आपातकाल के बाद संघ से प्रतिबन्ध हटाया गया और संघ ने पुनः अपना कार्य प्रारम्भ किया।

बापू की हत्या के आरोप सहित कई बार प्रतिबन्ध की मार झेल चुका यह संगठन आज भी लोगों के दिलों में बसा है और यही कारण है की इसका एक स्वयं सेवक प्रधान मंत्री की कुर्सी पर काबिज है और अनेक स्वयं सेवक राज्यों के मुख्यमंत्री है। संघ विचारकों का मानना है कि डॉ. राममनोहर लोहिया और लोक नायक जय प्रकाश नारायण सरीखे देश भक्तों ने कभी संघ का विरोध नहीं किया और समय-समय पर संघ कार्यों की प्रशंसा की। विभिन्न गुटों में बंटे उनके कथित समाजवादी अनुयायी अपने राजनैतिक लाभों को हासिल करने के लिए उनका विरोध करते हैं। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी भी संघ के नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेकर कांग्रेस को झटका दे चुके है। उन्होंने संघ के संस्थापक हेडगेवार को बड़ा देशभक्त बताया था।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

मो.- 9414441218

नहीं रहे पदमश्री राम दरश मिश्र

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शताब्दी पुरुष हमारे साहित्यिक पुरखे रामदरश मिश्र जी नहीं रहे। प्रोफेसर स्मिता मिश्र की पोस्ट के अनुसार 102 वर्ष का जीवन जीने वाले हिंदी के जाने-माने साहित्यकार प्रो रामदरश मिश्र नहीं रहे।

पिछली होली के बाद से वे बीमार चल रहे थे और द्वारका नई दिल्ली स्थित बेटे शशांक के घर पर उपचार में थे। 1924 में 15 अगस्त को डुमरी, गोरखपुर में जन्मे रामदरश मिश्र ने बीएचयू में उच्च शिक्षा पाई । गुजरात में कई वर्ष रहे, दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया।

वे हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार थे। ये जितने समर्थ कवि थे उतने ही समर्थ उपन्यासकार और कहानीकार भी थे। रामदरश मिश्र की लंबी साहित्य-यात्रा समय के कई मोड़ों से गुजरी और नित्य नूतनता की छवि को प्राप्त होती गई। कविता की कई शैलियों जैसे गीत, नई कविता, छोटी कविता, लंबी कविता में उनकी सर्जनात्मक प्रतिभा ने अपनी प्रभावशाली अभिव्यक्ति के साथ-साथ ग़ज़ल में भी उन्होंने अपनी सार्थक उपस्थिति रेखांकित की। इसके अतिरिक्त उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रावृत्तांत, डायरी, निबंध आदि सभी विधाओं में उनका साहित्यिक योगदान बहुमूल्य है।

इनकी शिक्षा हिन्दी में स्नातक, स्नातकोत्तर तथा डॉक्टरेट रही। सन् 1956 में सयाजीराव गायकवाड़ विश्वविद्यालय, बड़ौदा में प्राध्यापक के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। सन् 1958 में ये गुजरात विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हो गये और आठ वर्ष तक गुजरात में रहने के पश्चात् 1964 में दिल्ली विश्वविद्यालय में आ गये। वहाँ से 1970 में प्रोफेसर के रूप में सेवामुक्त हुए।

रामदरश मिश्र की साहित्यिक प्रतिभा बहुआयामी है। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना और निबंध जैसी प्रमुख विधाओं में तो लिखा ही है, आत्मकथा- सहचर है समय, यात्रा वृत्त तथा संस्मरण भी लिखे। यात्राओं के अनुभव ‘तना हुआ इन्द्रधनुष, ‘भोर का सपना’ तथा ‘पड़ोस की खुशबू’ में अभिव्यक्त हुए हैं। उन्होंने अपनी संस्मरण पुस्तक ‘स्मृतियों के छन्द’ में उन अनेक वरिष्ठ लेखकों, गुरुओं और मित्रों के संस्मरण दिये हैं जिनसे उन्हें अपनी जीवन-यात्रा तथा साहित्य-यात्रा में काफ़ी कुछ प्राप्त हुआ है। रामदरश मिश्र रचना-कर्म के साथ-साथ आलोचना कर्म से भी जुड़े रहे।

उन्होंने आलोचना, कविता और कथा के विकास और उनके महत्वपूर्ण पड़ावों की बहुत गहरी और साफ़ पहचान की। ‘हिन्दी उपन्यास : एक अंतर्यात्रा, ‘हिन्दी कहानी : अंतरंग पहचान’, ‘हिन्दी कविता : आधुनिक आयाम’, ‘छायावाद का रचनालोक’ उनकी महत्त्वपूर्ण समीक्षा-पुस्तकें हैं।

उनकी रचनाओं के अंग्रेजी सहित कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुए। राजकमल प्रकाशन से पेपरबैक सीरीज में उनकी “प्रतिनिधि कहानियां” और “प्रतिनिधि कविताएं” प्रकाशित हुए है। सर्वभाषा ट्रस्ट प्रकाशन Sarv Bhasha Trust ने उनके चुनिंदा निबंधों का संग्रह “लौट आया हूं मेरे देश” छापा। अमन प्रकाशन ने उनका संग्रह “समवेत” प्रकाशित किया तो प्रलेक से उनकी पुस्तक “स्मृतियों के छंद” के नए संस्करण सहित मिश्र जी के जीवन और साहित्य पर “रामदरश मिश्र:एक शिनाख्त” पुस्तक भी प्रकाशित की।

रामदरश मिश्र अपनी लंबी रचना-यात्रा में किसी वाद, किसी आन्दोलन के झंडे के नीचे नहीं आये किन्तु वे अपने समय और समाज की वास्तविकताओं तथा चेतना से लगातार जुड़े रहे। समय-यात्रा में बदलता हुआ यथार्थ उनके अनुभव और दृष्टि में समाकर उनकी रचनाओं में उतरता रहा। परिवर्तनशील समय का सत्य उनकी सर्जना को सतत कथ्य की नयी आभा और शिल्प की सहज नवीनता प्रदान करना रहा किन्तु उनकी बुनियाद उनका गांव रहा। गांव को भी वे लगातार उसके परिवर्तनशील रूप में पकड़ने की कोशिश करते रहे। समग्रत: उनके सारे सर्जनात्मक लेखन में अपने कछार अंचल की धरती की पकड़ रही। मूल्य-दृष्टि की जड़ें उनके गांव में ही थीं जिसे उन्होंने अपने जीवन के प्रारंभिक काल में भरपूर जिया था।

उन्हें मिले सम्मान और पुरस्कार निम्न हैं-उदयराज सिंह स्मृति पुरस्कार (2007), व्यास सम्मान (2011), साहित्य अकादमी पुरस्कार हिन्दी (2015) में मिला। यह उनके 99 वें जन्मदिन का साल उनकी उपलब्धियों का साल रहा जब 27 जून को उन्हे के के बिरला फाउंडेशन द्वारा सर्वोच्च सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया गया।

आज उनकी विदाई पर उनके लिखे एक गीत की पंक्तियों याद आती हैं।-

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे

खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरे

किसी को गिराया न खुद को उछाला

कटा ज़िन्दगी का सफ़र धीरे-धीरे

जहाँ आप पहुँचे छलाँगें लगाकर

वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे-धीरे

पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी

उठाता गया यों ही सर धीरे-धीरे

गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया

गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे

जमीं खेत की साथ लेकर चला था

उगा उसमें कोई शहर धीरे-धीरे

न रोकर,न हँस कर किसी में उड़ेला

पिया ख़ुद ही अपना ज़हर धीरे-धीरे

मिला क्या न मुझको,ऐ दुनिया तुम्हारी

मुहब्बत मिली है अगर धीरे-धीरे

उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।