डंकी रूट से युवाओं के सपनों की तस्करी

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विदेश में सुनहरे भविष्य के लालच में, भारतीय युवा अवैध रास्तों के शिकार बन रहे हैं। एजेंटों का यह नेटवर्क न केवल कानून तोड़ रहा है, बल्कि परिवारों की उम्मीदों और देश के भविष्य को भी चुरा रहा है। 

‘डंकी रूट’ एक अवैध प्रवासन मार्ग है, जिसके ज़रिए भारतीय युवा बिना वीज़ा या वैध दस्तावेजों के अमेरिका या यूरोप पहुंचने की कोशिश करते हैं। यह रूट भारत से पाकिस्तान, ईरान, तुर्की, ग्रीस, इटली, फ्रांस और फिर मैक्सिको होते हुए अमेरिका तक जाता है। रास्ते में तस्कर, एजेंट और अपराधी गिरोह यात्रियों से पैसा ऐंठते हैं। कई बार लोग समुद्र में डूब जाते हैं या सीमा पार करते हुए पकड़े जाते हैं। हर साल सैकड़ों भारतीय इस खतरनाक यात्रा में मारे जाते हैं या गायब हो जाते हैं — और उनके परिवार कर्ज़ और दुःख की गहराई में डूब जाते हैं।

– डॉ सत्यवान सौरभ

भारत के अनेक इलाकों में, विशेषकर हरियाणा, पंजाब, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, एक नया और खतरनाक चलन तेज़ी से फैल रहा है — “डंकी रूट” के ज़रिये विदेश पहुंचने का सपना। यह शब्द ‘डंकी’ अंग्रेज़ी के donkey से लिया गया है, जिसका मतलब है ‘बिना अनुमति या अवैध रास्ते से जाना’। सुनने में यह किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है, पर हकीकत इससे कहीं ज़्यादा भयावह है। इस रूट ने न केवल युवाओं के भविष्य को निगल लिया है, बल्कि समाज और प्रशासन के सामने एक गंभीर मानवीय और आर्थिक संकट भी खड़ा कर दिया है।

भारत के ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों में ‘विदेश जाना’ अब सिर्फ़ एक आकांक्षा नहीं, बल्कि सफलता का प्रतीक बन गया है। नौकरी, मान-सम्मान, और बेहतर जीवन की तलाश में अनेक युवा अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। एजेंट उन्हें सुनहरे सपने दिखाते हैं — “बस कुछ दिनों में अमेरिका की जमीन पर खड़े होंगे”, “डॉलर में सैलरी मिलेगी”, “वहां का जीवन स्वर्ग जैसा है।”

पर सच यह है कि इन सपनों की कीमत कई बार ज़िंदगी होती है। डंकी रूट पर निकलने वाले अधिकांश युवाओं को यह नहीं बताया जाता कि यह यात्रा महीनों तक चल सकती है, जिसमें रेगिस्तान, समुद्र और खतरनाक जंगलों से होकर गुजरना पड़ता है। रास्ते में भूख, प्यास, ठंड और हिंसा का सामना करना पड़ता है। कई लोग तो इस सफ़र में लापता ही हो जाते हैं, जिनकी कोई खबर नहीं मिलती।

डंकी रूट का पूरा कारोबार एक संगठित नेटवर्क के तहत चलता है, जिसमें फर्जी ट्रैवल एजेंट, पासपोर्ट दलाल, स्थानीय मुखिया, और विदेशी गिरोह शामिल होते हैं। एक अनुमान के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 5000 से अधिक युवा अवैध रूप से विदेश जाने की कोशिश करते हैं, जिनसे एजेंट 15 से 25 लाख रुपये तक वसूलते हैं।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2019 से 2025 तक 3053 फर्जी ट्रैवल एजेंट गिरफ्तार किए गए। पर असल संख्या इससे कहीं अधिक है, क्योंकि अधिकांश पीड़ित डर या शर्म के कारण शिकायत ही नहीं करते। एजेंट अक्सर बेरोजगारी और गरीबी से जूझते परिवारों को निशाना बनाते हैं, जो यह सोचते हैं कि बेटा ‘विदेश में सेट हो जाएगा’। लेकिन परिणाम होता है कर्ज़, बर्बादी और टूटे सपने।

भारत से शुरू होकर यह रूट पाकिस्तान, ईरान, तुर्की, ग्रीस, इटली, फ्रांस, और अंततः मैक्सिको के रास्ते अमेरिका तक जाता है। इस सफर में लोग कई बार समुद्र में नावों में ठूंसे जाते हैं, मरुस्थल पार करते हैं, या बर्फ़ीले जंगलों में फंस जाते हैं। कई मानवाधिकार संगठनों ने रिपोर्ट दी है कि इस यात्रा में हर साल सैकड़ों भारतीय मारे जाते हैं या लापता हो जाते हैं।

फरवरी 2023 में गुजरात के दो युवकों की मौत तुर्की के पास हुई थी। वे यूरोप की सीमा पार करने की कोशिश में थे। ऐसी घटनाएं अब सामान्य बन चुकी हैं। यह न सिर्फ एक अपराध है बल्कि मानवता पर कलंक भी।

अवैध प्रवासन के मामलों में अमेरिका और यूरोपीय देशों ने अब निगरानी तेज़ कर दी है। 2022 के बाद अमेरिका ने भारत के साथ ‘डेटा शेयरिंग’ समझौता किया है, जिससे डंकी रूट से पहुंचने वाले लोगों की तुरंत पहचान हो सके। पकड़े जाने पर उन्हें डीपोर्ट (वापस भेजा जाना) किया जाता है, और कई बार महीनों जेल में रहना पड़ता है।

दूसरी ओर, यूरोपीय यूनियन ने भी सख्त वीज़ा और एंट्री नियम लागू किए हैं। इसका असर यह हुआ है कि अब एजेंट और भी खतरनाक रास्ते अपनाने लगे हैं — जैसे समुद्री मार्ग या जंगलों से पार करवाना, जिससे जान का खतरा और बढ़ गया है।

डंकी रूट सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी एक बड़ा बोझ है। युवा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा खेती और स्थानीय रोजगार से हटकर विदेश भागने के चक्कर में अपनी जमीन तक बेच देता है। गांवों में यह मानसिकता बन चुकी है कि “जो विदेश नहीं गया, वो सफल नहीं।”

इस प्रवृत्ति का परिणाम यह है कि गांवों की श्रमशक्ति घट रही है, परिवार कर्ज़ में डूब रहे हैं और युवाओं का विश्वास वैधानिक रोजगार प्रणालियों से उठ रहा है। यह स्थिति दीर्घकाल में भारत की जनसांख्यिकीय शक्ति को कमजोर करती है।

भारत सरकार ने ट्रैवल एजेंटों के लिए रजिस्ट्रेशन और सत्यापन को अनिवार्य किया है। विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर ई-माइग्रेट पोर्टल भी शुरू किया गया है, जहां से वैध एजेंटों की सूची देखी जा सकती है। इसके बावजूद जागरूकता की कमी और भ्रष्ट तंत्र के कारण फर्जी एजेंट अब भी सक्रिय हैं।

कानून मौजूद है — इमिग्रेशन एक्ट 1983 और पासपोर्ट एक्ट 1967 — पर इनकी प्रभावी क्रियान्विति नहीं हो पा रही। छोटे कस्बों में एजेंट खुलेआम “विदेश भेजने” के विज्ञापन लगा देते हैं, और पुलिस की नज़र उन पर तब पड़ती है जब कोई बड़ी दुर्घटना होती है।

मीडिया ने इस मुद्दे पर समय-समय पर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश की है। अमर उजाला जैसे अख़बारों ने यह दिखाया कि कैसे “डंकी रूट से लूट” का धंधा हरियाणा, पंजाब, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सैकड़ों गांवों में फैल चुका है।

पर इसके साथ समाज को भी आत्ममंथन करना होगा —

क्यों युवाओं को लगता है कि देश में रहकर वे सफल नहीं हो सकते?

क्यों विदेश जाना ही प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया है?

क्यों गांवों में वह वातावरण नहीं बन पा रहा जो युवाओं को यहाँ अवसर दे सके?

गांव-गांव, कॉलेजों और पंचायतों के स्तर पर अवैध प्रवासन के खतरों पर अभियान चलाया जाना चाहिए। विदेश मंत्रालय, श्रम विभाग और मीडिया मिलकर यह सुनिश्चित करें कि कोई भी युवा बिना वैध प्रक्रिया के विदेश न जाए।

ग्रामीण युवाओं के लिए कौशल विकास, स्वरोजगार, और स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि विदेश जाने का आकर्षण घटे। फर्जी एजेंटों को केवल गिरफ्तार करना पर्याप्त नहीं; उनके वित्तीय नेटवर्क को तोड़ना ज़रूरी है। संपत्ति जब्ती और लंबी सजा जैसे प्रावधानों को सख्ती से लागू किया जाए।

समाज को यह समझना होगा कि सफलता केवल विदेशी ज़मीन पर कदम रखने से नहीं आती। देश में भी अवसर हैं — बस दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है। भारत को उन देशों से मिलकर काम करना चाहिए जहाँ ये नेटवर्क सक्रिय हैं, ताकि सीमा पार मानव तस्करी पर रोक लगे।

भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी है। यह जनसांख्यिकीय संपदा तभी वरदान बन सकती है जब उसे सही दिशा दी जाए। यदि यही युवा अवैध रास्तों में झोंक दिए गए तो यह राष्ट्र की अपार क्षति होगी।

डंकी रूट से बचने के लिए केवल कानून नहीं, बल्कि विचार और विवेक की ज़रूरत है। यह समझना होगा कि कोई भी सपना इतना बड़ा नहीं हो सकता जो इंसान की गरिमा, सुरक्षा और आत्मसम्मान से बड़ा हो।

डंकी रूट सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं, यह भारत के युवाओं की हताशा, बेरोजगारी और भ्रम की गाथा है। जब तक समाज और सरकार मिलकर युवाओं को वैधानिक, सुरक्षित और सम्मानजनक अवसर नहीं देंगे, तब तक ऐसे एजेंटों का धंधा फलता-फूलता रहेगा।

यह समय है कठोर कार्रवाई का, सच्ची जागरूकता का और उस सोच को बदलने का जो यह मानती है कि “विदेश जाना ही सफलता है।”

क्योंकि असली विकसित भारत वह होगा — जहाँ युवा अपने ही देश में अपने सपनों को साकार करें।

घटिया और नकली दवाओं का जानलेवा खेल : खतरे में है आमजन की सेहत

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बाल मुकुन्द ओझा

देश में बनने वाली अंग्रेजी दवाएं पिछले कुछ सालों से अपनी गुणवत्ता को लेकर सवालों के घेरे में हैं। देश में आये दिन घटिया और नकली दवाओं के जखीरे पकड़े जा रहे है जो साबित करते है आमजन का स्वास्थ्य खतरे में है। राजस्थान और मध्य प्रदेश सहित कुछ राज्यों में कफ सिरफ से बच्चों की मौत के बाद दवा बाजार को लेकर भूचाल उठ खड़ा हुआ था। मीडिया ख़बरों के मुताबिक अकेले राजस्थान में 20 हज़ार करोड़ के दवा बाजार में 500 से 600 करोड़ की दवाइयां अमानक अथवा नकली पाई गई थी। देशभर में आजकल घटिया, नकली और अमानन दवाओं का बाजार धड़ले से पनप रहा है। सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद देश में घटिया और नकली दवाओं पर पूरी तरह लगाम नहीं लगाई जा सकी है, जिसके कारण देश के लाखों लोगों की सेहत सुधरने के बजाय बिगड़ रही है। भारत में नकली, घटिया और अवैध दवाओं का धंधा तेजी से फैल रहा है, जिसकी वजह से रोगियों की जान जोखिम में है। विशेषज्ञों के मुताबिक जो दवाएं धोखाधड़ी से निर्मित या पैक की गई हैं, उन्हें नकली और घटिया दवाएं कहा जाता है क्योंकि उनमें या तो सक्रिय अवयवों की कमी होती है या गलत खुराक होती है।

हाल ही देश में नकली और घटिया दवाओं के बढ़ते मामलों पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने औषधि नियमों में नया प्रावधान जोड़ते हुए “एक फर्जी दस्तावेज एक प्रतिबन्ध नीति” लागू की है। इसके तहत अब नकली और घटिया दवाओं का निर्माण करने वाली कंपनियों का केंद्र सरकार सीधा लाइसेंस निरस्त या रद्द करेगी। सरकार ने औषधि नियम, 1945 में संशोधन किया है, जिसके तहत अगर कोई भी फॉर्मा कंपनी दवा निर्माण, बिक्री या पंजीकरण के लिए फर्जी दस्तावेजों या गलत जानकारी देती है, तो उसका लाइसेंस रद्द किया जाएगा।  संसोधन के पीछे मुख्य उद्देश्य दवा उद्योग में फर्जी दस्तावेज और गलत जानकारी देने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना है। सरकार का कहना है , पिछले कुछ सालों में कई ऐसी घटनाएं सामने आईं जिसमें कंपनियों ने दवा निर्माण या रजिस्ट्रेशन की झूठी जानकारी दी।  इससे न सिर्फ दवाओं की गुणवत्ता पर असर पड़ा बल्कि लोगों की सेहत पर भी खतरा हुआ। 

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक शीघ्र ही भारतीय दवा बाजार 60.9 अरब डालर के स्तर को पार कर जाएगा। ऐसे में अपने मुनाफे के लिए लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने वालों पर समय रहते सख्त कार्रवाई करनी होगी। आज के इस समय में नकली दवाइयां भी खूब मिलने लग गई हैं। ज्यादा पैसे कमाने के लालच में बाजार में नकली दवाइयों की बिक्री बढ़ गई है। बाजारों-अस्पतालों में घटिया और नकली दवाएं धड़ल्ले से बिक रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार नकली और घटिया दवाएं बनाने की सबसे अधिक कंपनियां हिमाचल प्रदेश में है। इनमें से बहुत सी ऐसी कंपनियां सरकारी अस्पतालों में दवा की सप्लाई का ठेका लेती हैं। नकली दवाओं का सेवन करने से आपके शरीर में कई गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। ऐसे में अगर आप मेडिकल स्टोर या ऑनलाइन वेबसाइट से दवाओं को खरीदते हैं तो इस स्थिति में आपको सावधान हो जाने की जरूरत है। घटिया और नकली दवाओं को बनाना-बेचना भ्रष्टाचार ही नहीं हमारी  सेहत के लिए एक बड़ा खतरा भी है। ऐसे में नियामकीय व्यवस्था को मजबूत बनाकर ही नकली और मिलावटी दवाओं से निजात मिलेगी।

गंभीर बीमारियों की छोड़िये, छोटी मोटी मौसमी बीमारियां जैसे सर्दी, जुखाम, खांसी, बुखार, एसीडीटी, रक्तचाप और गैस आदि भी यदि अंग्रेजी दवाओं से ठीक नहीं हो रही है तो आप सावधान हो जाइये क्योंकि इन दवाओं के नकली और घटिया होने का खतरा मंडरा रहा है। अनेक मीडिया रिपोर्ट्स में यह खुलासा किया गया है कि देशभर में नकली और घटियां दवाओं का धड़ल्ले से निर्माण हो रहा है जिसका पुख्ता प्रमाण सरकारी एजेंसियों की छापामारी से मिल रहा है। जाँच में ये दवाइयां नकली निकल रही है जो जनता के स्वास्थ्य से सरेआम खिलवाड़ है। आम आदमी जीवन रक्षक दवाओं में मिलावट की ख़बरों से खासा परेशान है। हमारे बीच यह धारणा पुख्ता बनती जा रही है कि बाजार में मिलने वाली अंग्रेजी दवाओं में कुछ न कुछ मिलावट जरूर है। लोगों की यह चिंता बेबुनियाद नहीं है। ये दवाएं नामी ब्रांडेड कंपनियों की पैकेजिंग में बेची जा रही हैं। देशभर में हर दूसरे या तीसरे दिन खबरें छपती रहती है कि इतने करोड़ की नकली दवाई पकड़ी गयी। इतनी दवाओं को नष्ट किया गया या सील किया गया। इसके बावजूद नकली दवाओं का धंधा बजाय कम होने के बढ़ता ही जा रहा है। नक़ली दवाएं या मिलावटी दवाएं वे होती हैं, जिनमें गोलियां, कैप्सूल या टीकों आदि में असली दवा नहीं होती, दवा की जगह चॉक पाउडर, पानी या महंगी दवा की जगह सस्ती दवा का पाउडर मिला दिया जाता है, इसके अलावा एक्सपायर हो चुकी दवाओं को दोबारा पैक करके बेचने का धंधा भी होता है।

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में नकली दवाओं के उत्पादन और प्रसार का बाजार करीब 35 हजार करोड़ रुपए का है। इसी से यह समझा जा सकता है की देश में किस प्रकार नकली दावों का व्यापार निर्विघ्न रूप से फल फूल रहा है। एसोचेम  का दावा है कि बाजार में बिकने वाली हर 4 में से 1 दवा नकली है। आम आदमी के लिए इनके असली या नकली होने की पहचान बहुत मुश्किल है। कहा ये भी जा रहा है बीमारियों से इतनी मौतें नहीं हो रही है जितनी नकली दवाओं के सेवन से हो रही है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

ऐतिहासिक विजय: भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने रचा विश्व कप का नया इतिहास

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ऐतिहासिक विजय: भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने रचा विश्व कप का नया इतिहास

दक्षिण अफ्रीका को हराकर भारत बना विश्व विजेता

आज का दिन भारतीय खेल इतिहास के स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने दक्षिण अफ्रीका को हराकर अपना पहला विश्व कप जीत लिया है। यह जीत केवल एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि उस जज़्बे, संघर्ष और संकल्प की प्रतीक है जिसने वर्षों तक कठिनाइयों के बावजूद भारतीय महिलाओं को खेल के शिखर तक पहुँचाया। यह विजय हर उस बेटी को समर्पित है जो अपने सपनों के लिए समाज की बंदिशों से लड़ रही है।

— डॉ प्रियंका सौरभ

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने आज दक्षिण अफ्रीका को हराकर वह कर दिखाया जो दशकों से भारतीय खेल प्रेमियों का सपना था। क्रिकेट का यह संस्करण केवल खेल नहीं रहा—यह महिलाओं की आत्मनिर्भरता, साहस और नेतृत्व का प्रतीक बन गया है। इस जीत ने भारतीय महिला खिलाड़ियों को न सिर्फ़ विश्व पटल पर स्थापित किया है, बल्कि पूरे राष्ट्र को यह संदेश दिया है कि समर्पण और मेहनत किसी भी बाधा को मात दे सकते हैं।

भारत की कप्तान हरमनप्रीत कौर के नेतृत्व में टीम ने न केवल खेल कौशल दिखाया, बल्कि मानसिक दृढ़ता और रणनीतिक क्षमता का भी अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। जब दक्षिण अफ्रीका जैसी मज़बूत टीम के सामने भारत उतरा, तो पूरे देश की निगाहें इस मुकाबले पर थीं।

भारतीय महिला क्रिकेट का इतिहास संघर्षों से भरा रहा है। एक समय ऐसा भी था जब महिलाओं के मैचों में दर्शकों की संख्या सैकड़ों में भी पूरी नहीं होती थी। परंतु 2025 में यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई। घरेलू टूर्नामेंट्स, महिला आईपीएल (WPL), और युवा खिलाड़ियों के लिए बढ़ते अवसरों ने भारतीय टीम को एक नई ताकत दी। शेफाली वर्मा, स्मृति मंधाना, और दीप्ति शर्मा जैसी खिलाड़ियों ने न केवल मैदान पर कमाल किया, बल्कि नई पीढ़ी की प्रेरणा भी बनीं। आज की जीत में हर खिलाड़ी का योगदान महत्वपूर्ण रहा — चाहे वह अंतिम ओवर की गेंदबाजी हो या फील्डिंग में दिया गया असाधारण प्रदर्शन।

भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए लगभग 298 रन का मजबूत लक्ष्य रखा। पारी की शुरुआत शेफाली वर्मा और स्मृति मंधाना ने दमदार अंदाज में की। मंधाना की शतक जैसी पारी ने टीम को मजबूत नींव दी, वहीं कप्तान हरमनप्रीत कौर ने मध्य क्रम में टीम को स्थिरता प्रदान की। फाइनल के दबाव में भी भारतीय गेंदबाजों ने संयम नहीं खोया। दीप्ति शर्मा और रेणुका ठाकुर ने सटीक गेंदबाजी से दक्षिण अफ्रीका को लक्ष्य से दूर रखा। अंतिम ओवरों में जब जीत और हार के बीच की दूरी कुछ गेदों की रह गई थी, तब पूरी टीम ने जिस धैर्य से खेला, वह भारतीय क्रिकेट की परिपक्वता को दर्शाता है।

इस जीत का महत्व केवल खेल तक सीमित नहीं है। यह जीत समाज में महिलाओं की भूमिका के प्रति दृष्टिकोण को बदलने वाली घटना है। लंबे समय तक खेल को पुरुष प्रधान माना जाता रहा, लेकिन आज भारतीय बेटियों ने यह साबित कर दिया कि खेल का मैदान अब किसी एक लिंग तक सीमित नहीं। यह विजय देश के ग्रामीण इलाकों में खेलने वाली उन लड़कियों के लिए प्रेरणा है, जो अब खुद को किसी भी सीमा में बंधा हुआ महसूस नहीं करेंगी।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) और खेल मंत्रालय ने पिछले कुछ वर्षों में महिला क्रिकेट को सशक्त बनाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं — समान वेतन नीति, बेहतर कोचिंग सुविधाएँ, और महिला आईपीएल जैसे प्रावधानों ने खेल में समान अवसरों को सुनिश्चित किया है। अब आवश्यकता है कि इस गति को बनाए रखा जाए। महिला खिलाड़ियों को न केवल सम्मान बल्कि स्थायी सुरक्षा, सुविधाएँ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर प्रतिस्पर्धा के अवसर मिलते रहें।

इस जीत ने भारत को एक नई जिम्मेदारी भी दी है। आने वाले वर्षों में भारत को न केवल इस प्रदर्शन को दोहराना है, बल्कि खेल की जड़ों को और गहरा करना है। स्कूल स्तर से लेकर विश्वविद्यालय तक, खेल शिक्षा और महिला खिलाड़ियों के लिए बेहतर बुनियादी ढाँचा तैयार करना समय की माँग है। साथ ही, मीडिया और दर्शकों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि यह उत्साह केवल एक दिन या टूर्नामेंट तक सीमित न रहे।

आज भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने यह साबित कर दिया है कि “जहाँ इच्छा, वहाँ राह” कोई कहावत मात्र नहीं, बल्कि यथार्थ है। यह जीत केवल 11 खिलाड़ियों की नहीं, बल्कि पूरे भारत की है — उन परिवारों की, जिन्होंने अपनी बेटियों को सपने देखने की आज़ादी दी; उन कोचों की, जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी प्रतिभा को निखारा; और उन दर्शकों की, जिन्होंने हर गेंद पर टीम का हौसला बढ़ाया।

2025 का यह वर्ष भारतीय खेलों के लिए ऐतिहासिक बन गया है। अब भारत की बेटियाँ विश्व की नई मिसाल हैं — जिनकी जीत ने हर भारतीय के दिल में गर्व, प्रेरणा और उम्मीद की लौ जगा दी है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

मोबाइल की लत बच्चों के स्वास्थ्य के साथ पढाई के लिए भी खतरा

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बाल मुकुन्द ओझा

आज घर घर में बच्चे और युवा धड़ल्ले से मोबाइल पर स्क्रीनिंग कर रहे है। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है की यह उनके स्वास्थ्य और पढ़ाई के लिए कितना खतरनाक है। मीडिया में युवा पीढ़ी को मोबाइल लत के खतरे से लगातार आगाह किया जा रहा है। अनेक युवा इसके दुष्परिणामों के शिकार होकर अस्पतालों में अवसाद का इलाज़ करा रहे है। सेंसर टावर की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अपने देश में गत वर्ष मोबाइल पर 1.12  ट्रिलियन घंटे स्क्रीनिंग की गई जो दुनियाभर में सर्वाधिक आंकी गई है। इससे पता चलता है 18 वर्ष की आयु सीमा के 40 करोड़ बच्चे में से हर तीसरा बच्चा मोबाइल अवसाद का शिकार है, जिनकी संख्या 13 करोड़ से अधिक बताई जा रही है। इसी भांति एक अन्य नई रिसर्च के मुताबिक मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप जैसे गैजेट्स न केवल बच्चों के स्वास्थ्य अपितु उनके शैक्षिक जीवन के लिए भी खतरा बन रहे है। टेक्नोलॉजी के इस दौर में बच्चे मोबाइल फोन, टैबलेट से ही अपनी पढ़ाई कर रहे हैं। खासकर कोविड में ऑनलाइन पढ़ाई के बाद उनके बीच स्क्रीन टाइम बहुत बढ़ा है। पांच हजार से ज्यादा कनाडाई बच्चों पर साल 2008 से 2023 तक चली एक रिसर्च बताती हैं कि बढ़ते स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों में बेसिक मैथ्स और पढ़ने की समझ ठीक से विकसित नहीं हो पा रही है। यहां तक कि स्क्रीन टाइम की वजह से बच्चों के मार्क्स में 10 फीसदी तक कमी आई है। एक अन्य रिपोर्ट में यह सामने आया है कि 73 प्रतिशत स्कूली बच्चे अश्लील सामग्री देखते हैं। वहीं, 80 प्रतिशत बच्चे रोज़ाना सोशल मीडिया पर कम से कम 2 घंटे बिताते हैं। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई, सोचने-समझने की क्षमता और व्यवहार पर पड़ रहा है।मोबाइल आपका दोस्त है या दुश्मन। बिना विलंब किए इस पर गहनता से मंथन की जरुरत है। आजकल मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों को इंटरनेट एडिक्शन की तरफ ले जा रहा है। एक स्टडी रिपोर्ट में एक बार फिर मोबाइल के खतरे से सावचेत किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है पैरेंट्स बिना सोचे-समझे सिर्फ दो-ढाई साल के बच्चों के हाथ में मोबाइल थमा देते हैं। इसके बाद बिना मोबाइल यूज किए बच्चा खाना तक नहीं खाता है। हालांकि इंफॉर्मेशन, टेक्नॉलोजी और एआई के दौर में मोबाइल का इस्तेमाल जरूरी है। लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को मोबाइल देने की क्या जरूरत है? अगर आप भी मोबाइल एडिक्शन को सीरियसली नहीं ले रहे हैं, तो आपको बता दें कि सेलफोन आपके बच्चों का सबसे बड़ा दुश्मन बन रहा है। कच्ची उम्र में बच्चों को डिजिटल डिमेंशिया जैसी घातक बीमारी हो सकती है। ब्रिटेन में हुई स्टडी के मुताबिक दिन में 4 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम से वैस्कुलर डिमेंशिया और अल्जाइमर का जोखिम बढ़ जाता है। फोन पर घंटो स्क्रॉल करने पर ढेरों फोटोज, एप्स, वीडियोज सामने आते हैं जिससे आपके दिमाग के लिए सब कुछ याद रखना मुश्किल हो जाता है। परिणाम स्वरूप आपकी याद्दाश्त, कॉन्संट्रेशन और सीखने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है।

स्क्रीन टाइम ज्यादा होने का सबसे पहला असर बच्चों की आंखों की रोशनी पर पड़ रहा है। स्क्रीन को नजदीक और एकटक देखने से आंखें ड्राई होने लगती हैं यही हालात रहने पर आंखों की रोशनी कम होने लगती है। मोबाइल बच्चों का दोस्त है या दुश्मन। बिना विलंब किए अभिभावकों को इस पर गहनता से मंथन की जरुरत है। आजकल मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों को इंटरनेट एडिक्शन की तरफ ले जा रहा है। इस तरह के एडिक्शन से मानसिक बीमारियां पैदा होती हैं और ऐसे में बच्चे कोई न कोई गलत कदम उठा लेते हैं। आजकल के बच्चे इंटरनेट लवर हो गए हैं। इनका बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह डेटा के जंगल में गुम हो रहा है। पिछले कई सालों में सूचना तकनीक ने जिस तरह से तरक्की की है, इसने मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है बल्कि एक तरह से इसने जीवनशैली को ही बदल डाला है। बच्चे और युवा एक पल भी स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गंवारा नहीं समझते। इनमें हर समय एक तरह का नशा सा सवार रहता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर कहा गया है।

जब से इंटरनेट हमारे जीवन में आया है तबसे बच्चे से बुजुर्ग तक आभासी दुनियां में खो गए है। हम यहाँ बचपन की बात करना चाहते है। देखा जाता है पांच साल  का बच्चा भी आँख खोलते ही मोबाइल पर लपकता है। पहले बड़े इसे अपने काम के लिए करते थे। अब बच्चे भी इंटरनेट के शौकीन होते जा रहे हैं। बाजार ने उनके लिए भी इंटरनेट पर इतना कुछ दे दिया है कि वह पढ़ने के अलावा बहुत कुछ इंटरनेट पर करते रहे हैं। पेरेंट्स को बच्चों की ऐसी गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए और समय रहते उनकी ऐसी आदत को पॉजेटिव तरीके से दूर करना चाहिए।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32 मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

                                                                  

बिहार : अब ‘बेचारगी’ के नाम पर वोट की दरकार …

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                                                               तनवीर जाफ़री

 बिहार चुनाव की तिथि जैसे जैसे क़रीब आती जा रही है, वैसे वैसे बिहार में हो रहे चुनाव प्रचार में भी तरह तरह के रंग भरते देखे जा रहे हैं। बिहार की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की नीतीश सरकार ने सत्ता का पूरा लाभ उठाते हुये आदर्श आचार संहिता लागू होने से कुछ ही मिनट पहले कई ऐसी महत्वपूर्ण घोषणाएं और धन वितरण किए जिनसे वहां के मतदाताओं के एक वर्ग विशेषकर महिलाओं को लाभ पहुंचा। जैसे महिला उद्यमी योजना के तहत 10,000 रुपये की पहली क़िस्त 6 अक्टूबर 2025 यानी चुनाव की तारीख़ की घोषणा होने से  कुछ ही मिनट पहले हस्तांतरित की गयी । नितीश सरकार द्वारा यह दावा किया गया कि इससे 21 लाख महिलाएं लाभान्वित होंगी। इसके अतिरिक्त सामाजिक सुरक्षा पेंशन में वृद्धि,मासिक पेंशन ₹400 से बढ़ाकर ₹1,100 करने की आदि की घोषणा गई। इसी तरह विपक्षी महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव ने भी लोकलुभावन योजनाओं  का पिटारा खोल कर रख दिया है। राज्य के हर परिवार को एक सरकारी नौकरी सहित महिलाओं को लुभाने तक के लिए बड़ा ऐलान किया। उन्होंने वादा किया है कि सत्ता में आने पर जीविका दीदियों को 30,000 रुपये मासिक वेतन वाली सरकारी नौकरी मिलेगी। साथ ही, ब्याज़ -मुक्त लोन और अन्य सुविधाएं भी दी जाएंगी। ऐसी और भी कई लोकलुभावन घोषणाएं विपक्षी गठबंधन की ओर से की गयी हैं। बेशक ऐसी घोषणायें मतदाताओं को आकर्षित करने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हैं ।

            परन्तु सत्तारूढ़ राजग के बिहार विधानसभा के सबसे बड़े घटक दल भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं द्वारा चुनाव प्रचार में कुछ अलग ही रंग भरने की कोशिशें की जा रही हैं। बड़ा आश्चर्य है कि लगभग दो दशक से सत्ता में रहने वाला राजग आज भी बिहार वासियों को लालू राज के दौर का कथित जंगल राज याद दिला रहा है? ख़ासकर भाजपा के स्टार प्रचारक शोले फ़िल्म की तर्ज़ पर बिहार के मतदताओं को याद करा रहे हैं कि राजग गया तो प्रदेश में गुंडा राज स्थापित हो जायेगा। यह बात तब कही जा रही है जबकि आज भी बिहार में सरे आम अपहरण की घटनाएं हो रही हैं। इसी वर्तमान चुनाव में राजनैतिक लोगों की हत्याएं हो रही हैं। अस्पताल में अपराधियों द्वारा दिन दहाड़े भर्ती मरीज़ की हत्या की जा रही है। पूरे राज्य में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। शराब बंदी के बावजूद तीन चार गुने रेट पर शराब की होम डिलेवरी की जा रही है। परन्तु ऐसी अनेक नाकामियों के बाद भी वोट, लालू के 20 वर्ष पुराने कथित गुंडा राज को याद दिला कर मांगा जा रहा है ?

              इसके अलावा क्या प्रधानमंत्री तो क्या गृह मंत्री जैसे भाजपाई स्टार प्रचारक, सभी अपनी पार्टी का वही सधा सधाया विद्वेषपूर्ण राग अलाप रहे हैं। महागठबंधन पर  ‘तुष्टिकरण ‘ का आरोप लगा रहे हैं तो कभी उनपर ‘घुसपैठियों’ को संरक्षण देने का इलज़ाम लगा रहे हैं। बिहार की सत्ता में सबसे बड़ी भागीदारी निभाने के बावजूद आज भी जिस भाजपा के पास अपना कोई भी राज्य स्तरीय नेता तक न हो जिसने आज तक साफ़ शब्दों में अपना मुख्य मंत्री का चेहरा घोषित न किया हो वह पार्टी कभी नेहरू को कोस कर तो कभी भावनात्मक बातें कर राज्य के लोगों की शिक्षा,बेरोज़गारी,स्वास्थ्य व क़ानून व्यवस्था जैसे मूल मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही है। स्वयं जिस पार्टी के प्रदेश के सबसे बड़े नेता व बिहार के निवर्तमान उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की नक़ली डिग्री,उनपर बार बार अपना नाम बदलने यहाँ तक कि उनपर सामूहिक हत्याएं करने जैसे आरोप विरोधियों द्वारा संवाददाता सम्मेलन में लगाये जा रहे हों उस भाजपा के मंच से स्वयं प्रधानमंत्री मोदी लोगों को यह बता रहे हैं कि राहुल व तेजस्वी ज़मानत पर घूम रहे हैं ?

              और अब चुनाव क़रीब आते आते तो प्रधानमंत्री मोदी ने अपना चिरपरिचित ‘बेचारगी ‘ दिखाने वाला कार्ड भी खेलना शुरु कर दिया है। विधानसभा चुनाव के दौरान, दरभंगा में कांग्रेस के मंच से उनकी दिवंगत माँ के विरुद्ध किसी व्यक्ति के द्वारा बेहद अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया। इसी बात को याद दिलाकर मोदी ने बिहार की एक सभा में भावुक होकर कहा कि “जो गालियां उनकी मां को दी गई हैं, असल में वो देश की हर मां का अपमान है।” उन्होंने बार-बार इस अपमान का जिक्र किया और इसे चुनावी मुद्दा बनाते हुये वोट मांगे। इसी तरह मोदी पहले भी विभिन्न राज्यों में अपने अपमानों की पूरी सूची का ब्यौरा जनसभाओं में पेश करते रहे हैं। जैसे कब उन्हें ‘मौत का सौदागर’, बताया गया तो कब उन्हें ‘नीच’, ‘हिटलर’ या ‘गंदी नाली का कीड़ा’ ‘चोर’ या ‘रावण’ कहा गया। और यह अपमान की सूची गिनाने के साथ ही वे कहना नहीं भूलते कि जनता इन अपमानों का जवाब देगी।

             उधर विपक्ष ख़ासकर कांग्रेस के पास भी मोदी व अन्य भाजपा नेताओं द्वारा की गयी बदज़ुबानियों की लंबी सूची है परन्तु कांग्रेस कम से कम वोट भुनाने के लिये जनसभाओं में उन शब्दावलियों को नहीं दोहराती कि कब मोदी ने 50 करोड़ की गर्ल फ्रेंड कहा तो कब ‘कांग्रेस की विधवा’ जैसा अशोभनीय शब्द इस्तेमाल किया। न ही कांग्रेस कभी इंदिरा गाँधी व राजीव गाँधी की शहादत पर वोट मांगती है। न ही वोट की ख़ातिर जनता को बार बार यह याद दिलाती है। परन्तु आज भी भाजपा की ओर से इसी तरह की अपमानजनक बातें की जा रही हैं। जैसे कि गत 30 अक्टूबर को ही इसी बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान लखीसराय की एक रैली में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि “इतने ग़ुस्से से बटन दबाना कि करंट ‘इटली’ तक पहुंचे” यही बात इसी अंदाज़ में अमित शाह पहले भी असम व छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्यों की चुनावी सभाओं में करते रहे हैं। गोया भाजपा के नेताओं के भाषणों में मुख्यतः नफ़रत ,विद्वेष, दूसरों को भयभीत करना जैसे यह (कांग्रेस) सत्ता में आये तो तुम्हारी भैंस खोल ले जायेंगे,तुम्हारा मंगलसूत्र लेकर बेच डालेंगे, दूसरे धर्म के लोगों की जनसँख्या बढ़ जाएगी  जैसी बातें करते रहते हैं। परन्तु आश्चर्य तो तब होता है जबकि कभी मंच से ही अपना 56 इंच का सीना बताने वाले मोदी को ‘बेचारगी’ के नाम पर वोट की दरकार होती है। कहना ग़लत नहीं होगा कि बेचारगी के नाम पर वोट माँगना दरअसल मतदाताओं का ध्यान मूल मुद्दों से भटकाकर उनसे भावनात्मक व बेचारगी भरी बातें कर उनसे वोट झटकने का एक अभिनयपूर्ण तरीक़ा मात्र ही है इसके सिवा और कुछ भी नहीं।       

                                                                       

     तनवीर जाफ़री  

वरिष्ठ पत्रकार

विकसित भारत 2047 : करुणा, सह-अस्तित्व और पर्यावरणीय नैतिकता का नया घोष

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भारत का विकास केवल मनुष्य के हित तक सीमित न रहे, बल्कि सभी जीवों के प्रति करुणा और नैतिक ज़िम्मेदारी को अपनाकर ही सच्चे अर्थों में “विकसित” बन सकता है।

विकसित भारत 2047 का सपना तभी साकार होगा जब विकास का अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि तक सीमित न रहकर सभी जीवों के कल्याण, सह-अस्तित्व और पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ा हो। पशु कल्याण को नीति और विकास के केंद्र में लाना भारत की प्राचीन करुणामय परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है। करुणा, संवेदना और स्थायित्व पर आधारित यह दृष्टिकोण न केवल पारिस्थितिक संतुलन को मजबूत करेगा बल्कि भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित करेगा जो “सर्वभूत हिताय” के आदर्श को जीवन में उतारता है।

— डॉ प्रियंका सौरभ

भारत जब अपने स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष 2047 की ओर बढ़ रहा है, तो यह केवल आर्थिक विकास का लक्ष्य नहीं, बल्कि एक नैतिक, संतुलित और मानवीय समाज के पुनर्निर्माण का संकल्प भी है। परंतु यह संकल्प तभी सार्थक होगा जब विकास का आधार केवल मनुष्य नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के कल्याण पर टिका हो। आज जब “विकसित भारत” की बात होती है, तो उसका दायरा उद्योग, प्रौद्योगिकी, अवसंरचना और आय वृद्धि तक सीमित दिखाई देता है। परंतु एक सच्चा विकसित राष्ट्र वह होगा, जहाँ करुणा, सह-अस्तित्व और दया जैसे मानवीय गुण नीतियों और योजनाओं की आत्मा बनें।

भारत का संविधान इस दृष्टि का पथप्रदर्शक है। अनुच्छेद 48(क) राज्य को पर्यावरण और वन्य जीवों की रक्षा करने का निर्देश देता है, जबकि अनुच्छेद 51(क)(छ) प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य बताता है कि वह जीवित प्राणियों के प्रति करुणा रखे। ये प्रावधान केवल क़ानूनी नियम नहीं, बल्कि उस सभ्यतागत विचारधारा की पहचान हैं जो अहिंसा, दया और “वसुधैव कुटुम्बकम्” के सिद्धांतों पर आधारित है। भारत की संस्कृति सदियों से यह सिखाती आई है कि सृष्टि में हर जीव का अपना सम्मान, उद्देश्य और अधिकार है।

फिर भी, आधुनिक विकास की दौड़ में पशु कल्याण का स्थान कहीं पीछे छूट गया है। औद्योगिकीकरण, नगरीकरण और अंधाधुंध उपभोग की होड़ ने न केवल प्राकृतिक संसाधनों को प्रभावित किया है, बल्कि असंख्य पशु प्रजातियों के अस्तित्व को भी संकट में डाल दिया है। गिद्धों की घटती संख्या, हाथियों और तेंदुओं के आवासों का सिकुड़ना, समुद्री जीवों पर प्रदूषण का प्रभाव — ये सब इस असंतुलन के द्योतक हैं। जब किसी पारिस्थितिकी तंत्र से एक भी प्रजाति विलुप्त होती है, तो उसका प्रभाव पूरे पर्यावरण और मानव जीवन पर पड़ता है।

विकास के नाम पर जब हम जंगलों को काटते हैं, नदियों को प्रदूषित करते हैं और जानवरों के प्राकृतिक निवास को नष्ट करते हैं, तो यह केवल प्रकृति का नुकसान नहीं बल्कि स्वयं मानवता की जड़ों को कमजोर करना है। इसलिए आवश्यक है कि भारत का “विकसित भारत 2047” का दृष्टिकोण केवल मनुष्य की भौतिक समृद्धि पर न टिके, बल्कि सभी प्राणियों के कल्याण को अपना मूल ध्येय बनाए।

पशु कल्याण को भारत के विकास दृष्टिकोण में शामिल करना केवल संवेदनशीलता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह स्थायी विकास की शर्त है। भारत के ग्रामीण जीवन में पशुधन अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। करोड़ों परिवार पशुओं से प्राप्त दूध, ऊन, अंडे और अन्य उत्पादों पर निर्भर हैं। यदि इन पशुओं की देखभाल, आहार, स्वास्थ्य और व्यवहारिक सम्मान का ध्यान रखा जाए, तो उत्पादकता बढ़ेगी और ग्रामीण आय में स्थायित्व आएगा।

मानवीय पशुपालन और संसाधनों के संतुलित उपयोग से भूमि की उर्वरता, जल की गुणवत्ता और पर्यावरण की स्थिरता को भी लाभ होता है।

इसके साथ ही, पशु कल्याण का संबंध जनस्वास्थ्य से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। कोविड महामारी और निपाह वायरस जैसी घटनाओं ने यह प्रमाणित किया है कि पशु स्वास्थ्य, मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण — ये तीनों एक दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। यदि किसी एक क्षेत्र में असंतुलन होता है, तो उसका प्रभाव बाकी दोनों पर पड़ता है। इसीलिए आवश्यक है कि पर्यावरण, कृषि और स्वास्थ्य मंत्रालय मिलकर “एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण” की भावना को नीति स्तर पर लागू करें।

पशु कल्याण के दृष्टिकोण को शिक्षा, शहरी नियोजन, और उद्योग में भी स्थान मिलना चाहिए। विद्यालयों के पाठ्यक्रम में यदि सभी जीवों के प्रति करुणा और सह-अस्तित्व के मूल्य सिखाए जाएँ, तो आने वाली पीढ़ियाँ स्वभावतः संवेदनशील बनेंगी। शहरी योजनाओं में वन्यजीव गलियारे, सड़कों पर पशु-पार मार्ग और आवारा पशुओं के लिए मानवीय व्यवस्था शामिल की जानी चाहिए। दिल्ली-मुंबई राजमार्ग पर वन्यजीवों के लिए बनाए गए मार्ग इस दिशा में प्रेरक उदाहरण हैं।

भारत को अपने पुराने पशु संरक्षण कानूनों को भी अद्यतन करना चाहिए। “पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960” को समयानुकूल संशोधन की आवश्यकता है ताकि दंडात्मक प्रावधान कठोर हों और उनका प्रभाव वास्तविक रूप से दिखाई दे। इसके अतिरिक्त, पशु चिकित्सा सेवाओं का विस्तार और वैज्ञानिक देखरेख से पशुधन की गुणवत्ता में सुधार संभव है।

तकनीकी नवाचार भी इस क्षेत्र में सहायक हो सकते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, उपग्रह मानचित्रण और इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा प्रणालियाँ वन्यजीव संरक्षण में क्रांतिकारी भूमिका निभा रही हैं। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में ई-निगरानी प्रणाली ने शिकार की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी की है। यह इस बात का प्रमाण है कि विज्ञान और करुणा का संयोजन हमारे पर्यावरण और जीवों के संरक्षण में सबसे प्रभावी उपाय बन सकता है।

पशु आधारित उद्योगों — जैसे दुग्ध, चमड़ा और वस्त्र — में “क्रूरता रहित उत्पादन” को बढ़ावा देने से न केवल नैतिक व्यापार को प्रोत्साहन मिलेगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी। उपभोक्ताओं के बीच भी यह जागरूकता फैलानी होगी कि नैतिक उत्पादों का चयन एक सामाजिक उत्तरदायित्व है।

भारतीय दर्शन “अहिंसा परमो धर्मः” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” केवल धार्मिक वाक्य नहीं हैं, बल्कि स्थायी जीवन का सूत्र हैं। “मिशन जीवनशैली” (जो पर्यावरण-अनुकूल जीवन अपनाने पर बल देता है) के साथ यदि पशु कल्याण को भी जोड़ा जाए, तो भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभरेगा जो विकास को करुणा के साथ जोड़ता है।

विकसित भारत का अर्थ तब ही सार्थक होगा जब विकास के पैमाने में केवल उत्पादन या आय नहीं, बल्कि नैतिकता, संवेदनशीलता और सह-अस्तित्व भी शामिल हों। हमें यह स्वीकार करना होगा कि इस पृथ्वी पर मनुष्य अकेला स्वामी नहीं है। हर जीव, चाहे छोटा हो या बड़ा, जीवन की शृंखला का एक आवश्यक हिस्सा है।

“सर्व भूत हित” की भावना — अर्थात् सभी प्राणियों के कल्याण की भावना — भारत की आत्मा में सदैव विद्यमान रही है। इसी भावना को आधुनिक नीति, प्रौद्योगिकी और शिक्षा में एकीकृत करने की आवश्यकता है।

जब भारत इस दिशा में आगे बढ़ेगा, तभी वह न केवल समृद्ध, बल्कि सच्चे अर्थों में सभ्य और संवेदनशील राष्ट्र कहलाएगा। विकसित भारत 2047 का वास्तविक अर्थ यही होगा — एक ऐसा भारत जो प्रगति के साथ करुणा को, विज्ञान के साथ संवेदना को, और विकास के साथ नैतिकता को लेकर चले। यही होगा उस स्वर्णिम युग का आरंभ, जहाँ हर प्राणी सुरक्षित, सम्मानित और सुखी होगा।

विकसित भारत का स्वप्न तभी साकार होगा जब हम यह समझेंगे कि विकास का असली पैमाना करुणा और नैतिकता है। जब भारत अपने विकास के पथ पर सभी प्राणियों को साथ लेकर चलेगा, तभी वह “विश्वगुरु” कहलाने का अधिकार पाएगा।

-प्रियंका सौरभ 

अलका सक्सेना की पुस्तक का विमोचन

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पुस्तक केवल एक जीवनी नहीं है, बल्कि एक दृष्टि और एक दर्शन है
अलका सक्सेना की पुस्तक ‘अब जब बात निकली है’ का विमोचन
जयपुर। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग की पूर्व अतिरिक्त निदेशक और लेखिका
अलका सक्सेना की पुस्तक ‘अब जब बात निकली है’ का विमोचन शनिवार को झालाना
डूंगरी स्थित राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति, जयपुर के सभागार में संपन्न
हुआ। विमोचन समारोह के मुख्य अतिथि पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव राकेश
वर्मा, विशिष्ट अतिथि, मुख्यमंत्री के विशेषाधिकारी गोविन्द पारीक और
पूर्व जनसम्पर्क आयुक्त सुनील शर्मा तथा वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा थे।
अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार गुलाब बत्रा ने की। यह अवसर साहित्य और
सृजनधर्मिता के उत्सव की तरह सजीव हो उठा, जहाँ जनसम्पर्क, पत्रकारिता और
साहित्य जगत की कई प्रतिष्ठित हस्तियाँ शामिल हुईं।
पुस्तक पर अपने विचार रखते हुए अतिथि वक्ताओं ने कहा कि यह कृति न केवल
संवेदनशील अभिव्यक्तियों का संकलन है, बल्कि इसमें जीवन के गहरे अनुभवों
की झलक मिलती है। साथ ही मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने को प्रेरित करती
हैं। वक्ताओं ने लेखिका के रचनात्मक और प्रेरणादायक कार्य की सराहना करते
हुए कहा, यह कृति केवल एक जीवनी नहीं है, बल्कि एक दृष्टि और एक दर्शन
है। उन्होंने कहा जीवन हमें यह सिखाता है कि जनसम्पर्क केवल पुस्तकों तक
सीमित ज्ञान नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कला है। जनसंपर्क ऐसी
प्रक्रिया है, जो सम्पूर्ण सत्य एवं ज्ञान पर आधारित सूचनाओं के
आदान-प्रदान के लिए की जाती हैं। अतिथियों ने पुस्तक लेखक अलका सक्सेना
को बधाई देते हुए कहा, यह पुस्तक न केवल ज्ञानवर्धक है,बल्कि हमें सोचने
के लिए प्रेरित करती है।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि राकेश वर्मा ने जनसम्पर्क निदेशक के अपने
कार्यकाल के दिनों को याद करते हुए कहा जन संपर्क विभाग एक ऐसा विभाग है
जो सरकार की छवि निखारने के साथ उसे एक नई ऊर्जा और शक्ति प्रदान करता
है। इस विभाग में काम करना निश्चय ही एक ऑपर्चुनिटी है। उन्होंने आशा
व्यक्त की कि यह पुस्तक पाठकों के लिए रुचिकर होगी। उन्होंने लेखिका की
लेखनी को प्रेरणास्पद बताया। जनसम्पर्क विभाग के पूर्व आयुक्त सुनील
शर्मा ने पुस्तक को शुद्ध लेखन की संज्ञा दी। उन्होंने कहा अलका सक्सेना
का अंग्रेजी और हिंदी पर समानाधिकार था। मुख्यमंत्री के विशेषाधिकारी
गोविन्द पारीक ने जनसम्पर्क के कार्यों को चुनौतीपूर्ण बताया। कार्यक्रम
की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार गुलाब बत्रा ने जनसम्पर्क विभाग से
पत्रकारों के  संबंधों की चर्चा करते हुए कहा लेखिका ने बेबाकी के साथ
अपने जनसम्पर्क के अनुभवों को साझा करते हुए अपने मन की बात लिखी है।
उन्होंने कहा जनसम्पर्क सरकार के दिल की धड़कन है। राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण
समिति के अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र बोड़ा ने धन्यवाद ज्ञापित
करते हुए  कहा यह पुस्तक जनसम्पर्क विधा का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
जनसम्पर्क विभाग के उप निदेशक रजनीश शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किये।
साहित्यकार वीणा करमचंदानी ने पुस्तक की सारगर्भित समीक्षा प्रस्तुत की।
प्रारम्भ में लेखिका अलका सक्सेना ने राकेश वर्मा और सुनील शर्मा की
कार्यप्रणाली की चर्चा करते हुए विस्तार से पुस्तक विषयक जानकारी दी। इस
शुरू में आगंतुक सभी अतिथियों का पौधा भेंट कर स्वागत किया गया।

इलियाना डी ‘क्रूज़,आज जिनका जन्मदिन है

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इलियाना डी ‘क्रूज़ का जन्म एक नवम्बर 1986 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ। वे एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री हैं, जो मुख्य रूप से तेलुगु भाषा की फिल्मों में अभिनय करती हैं। उन्होंने अपना कैरियर एक मॉडल के रूप में शुरू किया और 2006 में वाय.वी.एस. चौधरी की तेलुगू फिल्म देवदासु से अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत की। उसके बाद उन्होंने व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म पोक्किरी (2006), जलसा (2008) और किक में अभिनय किया और अपने आप को तेलुगू सिनेमा की अग्रणी अभिनेत्रियों में स्थापित किया। 2017 में बादशाहो में काम कर चुकी है।

इलियाना अपनी माता-पिता की दूसरी संतान हैं। उनके पिता गोवा के एक कैथोलिक हैं, जबकि उनकी माता ईसाई हैं जो कि इस्लाम से धर्मांतरित हुई हैं। उनके तीन भाई-बहन हैं, सबसे बड़ी बहन का नाम फराह है, एक छोटा भाई रीस और एक छोटी बहन एरिन है। उनका पहला नाम ग्रीक पुराण से आता है। बचपन में वे कई वर्षों तक गोवा में रहती थीं।

इलियाना को राकेश रोशन द्वारा निर्देशित फेयर एंड लवली की विज्ञापन फिल्म में देखकर पहली फिल्म का प्रस्ताव मिला था। आलोचकों ने उनकी काफी प्रशंसा की थी, विशेष रूप से उनकी शारीरिक रचना की और चेहरे की।

देवदासु के मुख्य अभिनेता राम ने भी अपनी एक्टिंग कैरियर की शुरुआत इसी से की थी, जो साल की प्रथम प्रमुख कमर्शियल हिट बनी और जिसने अंततः ₹ 14 करोड़ की कमाई की, यद्यपि इलियाना को इस फिल्म के लिए फिल्मफेयर अवार्ड फॉर बेस्ट फिमेल दिया गया। उनकी अगली फिल्म एक्शन फ्लिक पोक्किरी थी जिसके मुख्य कलाकार महेश बाबू थे, इस फिल्म में इलियाना ने एक एरोबिक्स शिक्षक का रोल किया था जो एक भ्रष्ट पुलिस द्वारा उत्पीड़ित है। इस फिल्म को वित्तीय आधार पर काफी सफलता प्राप्त हुई और उस समय तक की वह सर्वाधिक लाभ अर्जित करने वाली तेलुगु फिल्म बनी, साथ ही साथ यह इलियाना के लिए अब तक की सबसे बड़ी कमर्शियल हिट फिल्म रही।

बाद में उसी वर्ष उन्होंने केडी (2006) से तमिल भाषा की फिल्म में अपनी शुरुआत की। हालाँकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उतनी अच्छी नहीं रही, फिर भी डी ‘क्रूज़ इतनी व्यस्त थीं कि उन्हें कई फिल्मों की पेशकश को अस्वीकार करना पड़ रहा था। उनकी तेलुगू फिल्म खतरनाक (2006) जिसमें उन्होंने रवि तेजा के साथ अभिनय किया, उतनी अच्छी नहीं रही जितनी कि उम्मीद की जा रही थी, फिर भी उनके ग्लैमर भरे प्रदर्शन के लिए उन्हें श्रेय दिया गया और उनकी पहचान दर्शकों में बनी रही। बाद में उनके कैरियर में एक बड़ा झटका तब लगा जब उनकी फिल्म राखी (2006) और मुन्ना (2007) गंभीर और आर्थिक रूप से असफल साबित हुई।

डी ‘क्रूज़’ का कैरियर एक बार फिर अच्छे मोड़ पर तब आया जब 2007 में उनकी फिल्म अता को सराहा गया, इसमें उन्होंने सिद्धार्थ के साथ अभिनय किया। सत्या के रूप में अपने अभिनय के लिए उन्हें काफी सराहा गया, जो कि एक कॉलेज छात्रा हैं और गृह मंत्री के कुटिल बेटे से भागती फिरती है और उसके निशाने पर तब आती हैं जब वे उसके अपराध के लिए सजा माँगने के लिए मोर्चा करती है।

2008 में उन्होंने जलसा में पवन कल्याण के साथ मुख्य भूमिका निभाई। वर्तमान में वे दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में सर्वाधिक महँगी अभिनेत्री मानी जाती हैं, जिन्हें यथा 2008, पारिश्रमिक के रूप में ₹ 1.75 करोड़ दिया जाता है। उनकी रवि तेजा के साथ 2009 की फिल्म जिसका शीर्षक किक था, को बॉक्स ऑफिस पर हिट घोषित किया गया। उसके बाद 2009 में उन्होंने विष्णु मंचु के साथ रेचिपो और वाय.वी.एस.चौधरी की सलीम में अभिनय किया, दोनों ही फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल रही। इलियाना ने हाल ही में शक्ति की शूटिंग समाप्त की है, जहाँ उन्होंने जूनियर एन.टी.आर. के साथ काम किया है, इससे पहले वे राखी में इनके साथ काम कर चुकी हैं। उन्होंने कन्नड फिल्म हुडुगा हुडुगी के लिए एक आइटम गीत भी किया है जिसके बोल हैं “इलियाना इलियाना”।

इलियाना हिन्दी फिल्म 3 इडियट्स के तेलूगू और तमिल रूपान्तर में हैं, जहाँ उन्होंने करीना कपूर की भूमिका निभाई। एस॰ शंकर इसका निर्देशन करेंगे।

सम्मान पुरस्कारों में फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट फिमेल डेब्यू (दक्षिण) – देवदासु (2006)
संतोषम सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार – जलसा (2008)
और नामांकन फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड्स साउथ
2008: सर्वश्रेष्ठ तेलुगू अभिनेत्री – जलसा
2009: सर्वश्रेष्ठ तेलुगू अभिनेत्री – किक (2009)

भारतीय फिल्म अभिनेत्री रूबी भाटिया

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भारतीय मनोरंजन जगत में रूबी भाटिया (Ruby Bhatia) एक ऐसा नाम है, जिसने मॉडलिंग, टेलीविजन प्रस्तुति और फिल्मों के माध्यम से अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई। 1990 के दशक में जब भारतीय टेलीविजन और सिनेमा की दुनिया तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ रही थी, उस दौर में रूबी भाटिया ने अपनी अलग अदा, स्टाइल और व्यक्तित्व से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। वह उन चुनिंदा कलाकारों में रही हैं जिन्होंने एंकरिंग से लेकर अभिनय तक हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा साबित की।

प्रारंभिक जीवन

रूबी भाटिया का जन्म कनाडा में हुआ था। वह भारतीय मूल की हैं, लेकिन उनका पालन-पोषण कनाडा में ही हुआ। बचपन से ही उनमें कला और प्रस्तुति की विशेष प्रतिभा दिखाई देती थी। उन्होंने शिक्षा पूरी करने के बाद भारत आने का निर्णय लिया, क्योंकि उन्हें भारतीय संस्कृति, संगीत और सिनेमा से गहरा लगाव था। यही लगाव उन्हें मुंबई की ओर खींच लाया — वह शहर जो हर कलाकार के सपनों का केंद्र माना जाता है।

मॉडलिंग और एंकरिंग से शुरुआत

रूबी भाटिया ने अपने करियर की शुरुआत मॉडलिंग से की। अपने आकर्षक व्यक्तित्व और आत्मविश्वास भरे अंदाज़ के कारण उन्हें जल्दी ही पहचान मिलने लगी। 1994 में उन्होंने “Miss India Canada” प्रतियोगिता जीती, जिसने उनके लिए बॉलीवुड और भारतीय टेलीविजन के दरवाज़े खोल दिए।

भारत लौटने के बाद उन्होंने “MTV India” में बतौर वीडियो जॉकी (VJ) काम करना शुरू किया। उस समय MTV भारत में नया था और युवा दर्शकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा था। रूबी की संवाद शैली, उनकी अंग्रेज़ी-हिंदी मिश्रित भाषा और आत्मीय हावभाव ने उन्हें युवाओं का चहेता चेहरा बना दिया। वह 1990 के दशक की शुरुआती MTV प्रजेंटरों में शामिल थीं जिन्होंने भारतीय टेलीविजन के युवा मनोरंजन कार्यक्रमों को नई दिशा दी।

अभिनय करियर

एंकरिंग के बाद रूबी भाटिया ने टेलीविजन धारावाहिकों और फिल्मों की ओर रुख किया। उन्होंने कुछ लोकप्रिय टीवी शोज़ में काम किया, जिनमें “Chandrakanta” और “Kya Hadsaa Kya Haqeeqat” जैसे धारावाहिक शामिल हैं। उनकी अभिनय शैली में एक आधुनिकता थी, जो उन्हें पारंपरिक अभिनेत्री से अलग बनाती थी।

रूबी भाटिया ने बॉलीवुड में भी कई फिल्मों में काम किया। इनमें “Hero Hindustani” (1998), “Main Prem Ki Diwani Hoon” (2003), और “Chori Chori Chupke Chupke” (2001) जैसी फिल्में उल्लेखनीय हैं। हालांकि वह मुख्य नायिका के रूप में नहीं दिखीं, लेकिन उनकी उपस्थिति हमेशा प्रभावशाली रही। उनकी अभिव्यक्ति में पश्चिमी और भारतीय संस्कृति का अद्भुत मिश्रण झलकता था, जो उन्हें अन्य अभिनेत्रियों से अलग बनाता था।

व्यक्तिगत जीवन

रूबी भाटिया का निजी जीवन भी कई कारणों से चर्चा में रहा। उन्होंने गायक और संगीतकार ए. आर. रहमान के करीबी सहयोगी, अजीत सूरी से विवाह किया था, लेकिन यह विवाह ज्यादा समय तक नहीं चल सका। बाद में उन्होंने अभिनेता और निर्देशक अरशद वारसी से भी नज़दीकी संबंध बनाए थे, हालांकि वह रिश्ता भी विवाह तक नहीं पहुंचा। निजी उतार-चढ़ावों के बावजूद रूबी भाटिया ने हमेशा खुद को मजबूत और आत्मनिर्भर महिला के रूप में प्रस्तुत किया।

सांस्कृतिक प्रभाव

रूबी भाटिया का व्यक्तित्व भारतीय और पश्चिमी संस्कृतियों का सुंदर संगम था। जब भारत में ग्लोबल कल्चर की शुरुआत हो रही थी, उस समय वह उस परिवर्तन की प्रतीक बनकर उभरीं। MTV जैसी चैनलों के माध्यम से उन्होंने भारतीय युवाओं को आत्मविश्वास, फैशन और अभिव्यक्ति की नई भाषा सिखाई। वह उस दौर की पहली महिलाओं में से थीं जिन्होंने बिना किसी संकोच के अपने विचार स्पष्ट रूप से रखे।

उनकी प्रस्तुति शैली आज भी कई एंकर और टीवी होस्ट के लिए प्रेरणा बनी हुई है। उन्होंने यह साबित किया कि भारतीय मनोरंजन जगत में सफलता पाने के लिए सिर्फ अभिनय ही नहीं, बल्कि व्यक्तित्व और आत्मविश्वास भी उतने ही जरूरी हैं।

बाद के वर्ष और सामाजिक योगदान

रूबी भाटिया ने धीरे-धीरे ग्लैमर की दुनिया से दूरी बना ली और सामाजिक कार्यों में भी रुचि दिखानी शुरू की। उन्होंने युवाओं के लिए प्रेरणादायक सत्रों में भाग लिया और महिला सशक्तिकरण के विषय पर भी अपनी राय दी। हालांकि वह अब फिल्मों और टीवी पर कम दिखाई देती हैं, लेकिन सोशल मीडिया और विशेष आयोजनों के माध्यम से वह अब भी अपने प्रशंसकों से जुड़ी रहती हैं।

निष्कर्ष

रूबी भाटिया भारतीय मनोरंजन जगत की एक बहुआयामी हस्ती हैं। उन्होंने मॉडलिंग, एंकरिंग और अभिनय — तीनों क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई। वह 1990 के दशक के उस दौर की प्रतीक रहीं जब भारत वैश्विक मनोरंजन संस्कृति से जुड़ना शुरू कर रहा था। उनका आत्मविश्वास, स्वतंत्र सोच और आधुनिक दृष्टिकोण आज भी प्रेरणादायक है।

रूबी भाटिया ने यह दिखाया कि एक कलाकार केवल कैमरे के सामने अभिनय करने वाला नहीं होता, बल्कि वह समाज के बदलते मूल्यों और विचारों का प्रतिनिधि भी होता है। भारतीय सिनेमा और टेलीविजन के इतिहास में उनका नाम एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में दर्ज रहेगा जिसने सीमाओं को तोड़ा, परंपराओं को चुनौती दी और भारतीय महिला को एक नए आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया।

ऐश्वर्या राय ,आज जिनका जन्मदिन है

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ऐश्वर्या राय का जन्म एक नवम्बर 1973 को मैंगलूर, कर्नाटक, भारत में हुआ था। ऐश्वर्या के पिता का नाम कृष्णराज राय जो पेशे से मरीन इंजीनियर है और माता का नाम वृंदा राय है जो एक लेखक हैं। उनका एक बडा़ भाई है जिसका नाम आदित्य राय है।

ऐश्वर्या राय की मातृ-भाषा तुलु है, इसके अलावा उन्हें कन्नड़, हिन्दी, मराठी, अंग्रेजी और तमिल भाषाओं का भी ज्ञान है। ऐश्वर्या राय की प्रारंभिक शिक्षा (कक्षा सात तक) हैदराबाद, आंध्र प्रदेश में हुई। बाद में उनका परिवार मुंबई आकर बस गया। मुंबई में उन्होने शांता-क्रूज स्थित आर्य विद्या मंदिर और बाद में डी जी रुपारेल कालेज, माटूंगा में पढा़ई की। पढा़ई के साथ-साथ उन्हें मॉडलिंग के भी प्रस्ताव आते रहे और उन्होने में मॉडलिंग भी की।

उनको मॉडलिंग का पहला प्रस्ताव कैमलिन कंपनी की ओर से तब मिला जब वो नवीं कक्षा की छात्रा थीं। इसके बाद वो कोक, फूजी और पेप्सी के विज्ञापन में दिखीं। और 1994 में मिस वर्ल्ड बनने के बाद उनकी माँग काफी बढी़ और उन्हें कई फिल्मों के प्रस्ताव मिले।

उनकी पहली फिल्म इरुवर तमिल में बनी जिसे मणिरत्नम ने निर्देशित किया। 2000 में राजीव मेनन द्वारा बनी एक फिल्म कंडूकोंडिन कंडूकोंडिन काफी मशहूर हुई। हिन्दी में उनकी पहली फिल्म और प्यार हो गया थी, हिन्दी फिल्मों में उनका सिक्का संजय लीला भंसाली द्वारा बनायी गयी फिल्म हम दिल दे चुके सनम से जमा और तब से उनकी फिल्में ज्यादातर हिन्दी में ही बनी। 2002 में संजय लीला भंसाली द्वारा बनाई फिल्म देवदास में भी उन्होने काम किया। इसके अलवा उन्होंने कुछ बांग्ला फिल्में की हैं। सन 2004 में ही पहली बार उन्होंने गुरिंदर चड्ढा की एक अंग्रेजी फिल्म ब्राइड ऐंड प्रेज्यूडिस में काम किया। 2006 में उनकी प्रमुख फिल्मे रही मिसट्रेस ऑफ स्पाइसेस, धूम २ और उमराव जान।

आज ऐश्वर्या भारतीय सिनेमा की सबसे मँहगी अभिनेत्रियों में से एक है और भारत की सबसे धनी महिलाओं में शामिल हैं। दुनिया भर में उनके चाहने वालों ने ऐश्वर्या को समर्पित लगभग 17,000 इंटरनेट साइट बना रखे हैं और उनकी गिनती दुनिया के सबसे खूबसूरत महिलाओं में की जाती है। टाईम पत्रिका ने वर्ष 2004 में उन्हें दुनिया की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में भी शुमार किया है।

वर्ष 1999 में, राय ने बॉलीवुड सितारे सलमान ख़ान के साथ डेटिंग की, उनका सम्बन्ध मीडिया में भी तब तक छाया रहा जब तक 2001 में वो एक दूसरे से अलग नहीं हो गये। ऐश्वर्या राय ने साल 2007 में अभिषेक बच्चन से शादी कर ली थी। वहीं साल 2011 में दोनों प्यारी सी बेटी आराध्या बच्चन के पैरेंट्स बने थे।

ऐश्वर्या राय के पास कुल संपत्ति ₹800 करोड़ रुपए है। वह हरेक फिल्म के लिए 10 से 12 करोड़ रुपए तक चार्ज करती हैं। इसकी सालाना इनकम ₹80 करोड़ से ₹90 करोड़ तक है।

रमाकांत शुक्ला