सबसे ‘तेज़’ बनने के चक्कर में ‘श्रद्धांजलि ‘ का पात्र बना ‘गोदी मीडिया’   

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                                 तनवीर जाफ़री

 अन्य करोड़ों लोगों की तरह मैं भीफ़िल्म जगत में ‘ही मैन’ के नाम से प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता धर्मेंद्र का बचपन से ही प्रशंसक हूँ। 1985-87 के मध्य इलाहाबाद में अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का अवसर मिला। उसी दौर में मुंबई आना जाना रहा। उन दिनों मुझे संजय ख़ान,दारा सिंह,रणजीत,देव कुमार उनकी सुपुत्री मिस इंडिया मनीषा कोहली सहित अन्य कई कलाकारों से व्यक्तिगत रूप से मिलने का अवसर मिला।  परन्तु इत्तेफ़ाक़ से दो बार कोशिशों के बावजूद धर्मेंद्र से इसलिये न मिल सका क्योंकि मेरे मुंबई के प्रवास के दौरान वे शूटिंग पर कहीं बाहर होते। बहरहाल उनसे मिलने व उनके साथ बैठने की हसरत दिल में ही रही। इत्तेफ़ाक़ से 2005 में जब मैं लोकसभा की कार्रवाई देखने के लिये दिल्ली गया था उसी दौरान संसद के मुख्य द्वार पर मेरी नज़र इस महान अभिनेता पर पड़ी। उस समय वे 2004 से 2009 के मध्य बनी 14वीं लोकसभा में राजस्थान के बीकानेर लोकसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी की ओर से निर्वाचित हुये सांसद थे। मैं उन्हें देखकर ज़ोर से बोल पड़ा –अरे …बीरु ..  और धर्मेंद्र ने मेरी तरफ़ दोनों हाथ बढ़ाते हुये ज़ोर से कहा –आ जा मेरी जान। मैं उनकी तरफ़ तेज़ी से बढ़ा ,उन्होंने बी आगे बढ़कर पूरी गर्मजोशी से मुझे दोनों हाथों से झप्पी डालते हुये इतनी ज़ोर से उठाया की मेरे दोनों पैर ज़मीन से ऊपर उठ गये। उस अविस्मरणीय क्षण को मैं आज भी भी याद करता हूँ।  

                     बहरहाल पिछले दिनों भारत के बदनाम ज़माना ‘गोदी मीडिया ‘ ने देश के उस हरदिलअज़ीज़ अभिनेता को उनके जीवनकाल में ही अपनी ‘ख़बरों’ में श्रद्धांजलि दे डाली। ग़ौर तलब है कि सांस लेने में दिक़्क़त होने के कारण उन्हें पिछले दिनों मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में उन्हें भर्ती कराया गया था। उनके अस्पताल में भर्ती होते ही टी आर पी के भूखे गोदी मीडिया ने अपने मुख्य वाक्य ‘सबसे तेज़’ को साकार करने के मक़सद से मोर्चा संभाल लिया। और 10-11 नवंबर के बीच अच्छे ख़ासे बोलते बात चीत करते इस लोकप्रिय अभिनेता की मौत की झूठी अफ़वाहें तेज़ी से फैला दीं। ऐसी अफ़वाहबाज़ी कि केंद्रीय रक्षा मंत्री  राजनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ,कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंहवी, तेलुगु सुपरस्टार चिरंजीवी,अभिनेत्री भाग्यश्री, गीतकार व पटकथा लेखक जावेद अख़्तर यहाँ कि ख़ुद गोदी मीडिया की ही एक चर्चित पत्रकार चित्रा त्रिपाठी तक ने इसी झूठी ख़बर पर विश्वास करते हुये धर्मेंद्र को श्रद्धांजलि व श्रद्धासुमन अर्पित कर डाले। बाद में इनमें से कई हस्तियों ने अपने ऐसे ट्वीट डिलीट भी किये ? यहाँ तक कि कई बड़े अख़बारों ने भी इसी गोदी मीडिया की इस झूठी ख़बर पर विश्वास हुये मुख्य पृष्ठ पर ख़बरें  प्रकाशित कर डालीं। उधर वही धर्मेंद्र अपनी मौत की झूठी ख़बर फैलने के अगले ही दिन यानी 12 नवंबर को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिए गए। अस्पताल से छुट्टी के बाद वे सजे संवरे सर पर हैट धारण किये अपने अभिनेता पुत्रों के साथ हँसते मुस्कुराते और उसी मीडिया का अभिवादन करते हुये अपने घर जाते नज़र आये।  

                परन्तु पहले भी इस तरह की अफ़वाह फैलाते रहने वाले गोदी मीडिया को इस बार कुछ ज़्यादा ही मुँह की खानी पड़ी। न केवल धर्मेंद्र के परिवार के सदस्यों ने बल्कि धर्मेंद्र के प्रशंसकों ने भी सोशल साइट्स पर गोदी मीडिया की धज्जियाँ उड़ाकर रख दीं। धर्मेंद्र की बेटी अभिनेत्री ईशा देओल ने सबसे पहले अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि “मीडिया हद से ज़्यादा सक्रिय है और झूठी ख़बरें फैला रहा है। मेरे पापा स्थिर हैं और रिकवर कर रहे हैं। परिवार को प्राइवेसी दें। पापा के जल्द ठीक होने की दुआओं के लिए शुक्रिया।” उसके फ़ौरन बाद अभिनेत्री पत्नी व सांसद हेमा मालिनी ने X (ट्विटर) पर ग़ुस्से में लिखा कि “जो हो रहा है वो अक्षम्य है! ज़िम्मेदार चैनल ऐसे व्यक्ति के बारे में झूठी ख़बरें कैसे फैला सकते हैं जो इलाज पर अच्छी प्रतिक्रिया दे रहा है और रिकवर कर रहा है? ये बेहद असम्मानजनक और ग़ैर -ज़िम्मेदाराना है। परिवार की प्राइवेसी का सम्मान करें।” बाद में अभिनेता पुत्र सनी देओल की टीम की ओर से आधिकारिक बयान जारी कर कहा गया कि “मिस्टर धर्मेंद्र स्थिर हैं और ऑब्ज़र्वेशन में हैं। वे अच्छी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। झूठी अफ़वाहें न फैलाएं, प्राइवेसी का सम्मान करें और जल्द स्वस्थ होने की दुआ करें।”

               इस अफ़वाहबाज़ गोदी मीडिया को सबसे अधिक ज़लालत व अपमान का सामना सोशल मीडिया में करना पड़ा। इतना आक्रोश तो उस समय भी देखना नहीं पड़ा था जब पहले भी कई बार यही ग़ैर ज़िम्मेदार और झूठ परोसने वाला मीडिया कभी अमिताभ बच्चन तो कभी राजिनीकांत कभी शाहरुख ख़ान तो कभी फ़रीदा जलाल कभी लता मंगेशकर,राजेश खन्ना,कॅटरीना कैफ़ व आयुष्मान खुराना जैसे कई कलाकारों को उनके जीवित रहते हुये भी ‘मारने की ख़बरें चलाता रहा है। इस बार तो धर्मेंद्र के प्रशंसकों ने व गोदी मीडिया को देश की पत्रकारिता पर कलंक समझने वाले देश के एक प्रबुद्ध वर्ग ने ऐसी पत्रकारिता ऐसे ऐंकरों व ‘ ऐंकराओं ‘ की तो धज्जियाँ उड़ाकर रख दीं। सीधे तौर पर धर्मेंद्र की मौत की झूठी ख़बर शोकपूर्ण भाव भंगिमा से पेश करने वाली गोदी मीडिया की उस बदनाम ‘ऐंकरा’ के चित्र पर ही माला डालकर उसी को श्रद्धांजलि अर्पित कर डाली। लाखों लोगों द्वारा ऐसी ग़ैर ज़िम्मेदाराना पत्रकारिता की घोर भर्तस्ना की गयी। कई मशहूर यू ट्यूबर पत्रकारों ने धर्मेंद्र की बीमारी के संबंध में तो नहीं परन्तु अफ़वाहबाज़ मीडिया द्वारा फैलाई गयी धर्मेंद्र संबंधी अफ़वाह को लेकर विशेष कार्यक्रम ज़रूर बनाये और ग़ैर ज़िम्मेदार गोदी मीडिया की जम कर धुलाई की।  

            आश्चर्य है कि पिछले दस वर्षों से घोर अपमान झेल रहा यह पक्षपाती,समाज में दुर्भावना फैलाने वाला,लोगों को झूठी ख़बरों से गुमराह करने वाला,सरकारी विज्ञापनों व पैसों की लालच में अपना ज़मीर बेचने वाला तथा अपनी इन्हीं ग़ैर ज़िम्मेदाराना हरकतों से देश व पत्रकारिता को कलंकित करने वाला अनियंत्रित  ‘गोदी मीडिया ‘ अभी भी झूठी,बेबुनियाद,उकसाऊ व अफ़वाहपूर्ण ख़बरों को प्रसारित करने से बाज़ नहीं आ रहा। यही वजह है कि धर्मेंद्र के सम्बन्ध में विश्वसनीय नहीं बल्कि ‘सबसे तेज़’ चैनल बनने के चक्कर में  मीडिया स्वयं ‘श्रद्धांजलि ‘ का पात्र बन बैठा।                                                    

     तनवीर जाफ़री  

राष्ट्रीय प्रेस दिवस : कलम आज उनकी जय बोल

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                                               बाल मुकुन्द ओझा                             

राष्ट्रीय प्रेस दिवस यानि भारतीय पत्रकारिता दिवस 16 नवम्बर को मनाया जाता है। पत्रकारिता दिवस पर आज राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की ‘कलम आज उनकी जय बोल’ कविता बड़ी शिद्दत से याद आ रही है। इसी कलम को लेकर आज तरह तरह की बातें सुनने को मिल रही है। कलम की ताकत से हर कोई परिचित है,  मगर यह कलम आज कहां खो गई है, उस पर स्वतंत्र भाव से चिंतन मनन की जरुरत है। प्रेस को आज चौतरफा खतरे का सामना करना पड़ रहा है। कहीं शासन के कोपभाजन का सामना करना पड़ता है तो कहीं राजनीतिज्ञों, बाहुबलियों और अपराधियों से मुकाबला करना पड़ता है। समाज कंटकों के मनमाफिक नहीं चलने का खामियाजा प्रेस को भुगतना पड़ता है। दुनिया भर में प्रेस को निशाना बनाया जा रहा है। रिपोर्टिंग के दौरान मीडियाकर्मी को कहीं मौत के घाट उतारा जाता है तो कहीं जेल की सलाखों की धमकियाँ दी जाती है। मीडिया पर भी आरोप है कि वह अपनी जिम्मेदारियों का सही तरीकें से निर्वहन नहीं कर पा रहा है। कहा जा रहा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हमारे सामाजिक सरोकारों को विकृत कर बाजारू बना दिया है। बाजार ने हमारी भाषा और रचनात्मक विजन को नष्ट भ्रष्ट करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। ऐसे में प्रेस की चुनौतियों को नए ढंग से परिभाषित करने की जरुरत है।

प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है। पत्रकारिता की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और नैतिक मूल्यों को बनाये रखने के लिए 1956 में प्रथम प्रेस आयोग स्थापित का निर्णय लिया गया था। तत्पश्चात 4 जुलाई 1966 को भारत में प्रेस परिषद की स्थापना की गई। इस परिषद ने 16 नवंबर, 1966 को पूर्ण रूप से कार्य करना शुरू किया। तब से लेकर हर वर्ष भारतीय प्रेस परिषद को सम्मानित करने के लिए 16 नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस यानि भारतीय पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। स्वतंत्र, निष्पक्ष और जिम्मेदार प्रेस की आवश्यक भूमिका का सम्मान करते हुए, हर साल 16 नवंबर को ‘राष्ट्रीय प्रेस हदवस’ मनाया जाता है। भारतीय प्रेस परिषद की ऑफिशियल वेबसाइट पर मौजूद एक नोटिफिकेशन के अनुसार, परिषद के अध्यक्ष के साथ ही कुल 28 सदस्य भी होंगे। परिषद का अध्यक्ष परिपाटी के अनुसार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे। वहीं 28 सदस्य में से 20 भारत में संचालित होने वाले मीडिया समूहों से संबंधित होते हैं। वहीं 5 सदस्य को संसद के दोनों सदनों से नामित किया जाता है। बाकी बचे 3 सदस्यों का नामांकन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारतीय विधिज्ञ परिषद और साहित्य अकादमी द्वारा किया जाता है।

आपातकाल को अपवाद के रूप में छोड़ दें तो भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को कभी कोई गंभीर आंच का सामना नहीं करना पड़ा। मगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उदय के बाद प्रेस की स्वतंत्रता पर अंगुली उठाई जाने लगी। पक्ष और विपक्ष के दो धड़ों के बीच मीडिया को निशाना बनाया जाने लगा। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (2024) की बात करें तो भारत को 180 देशों की सूची में 159वाँ स्थान प्राप्त हुआ है, जो विशेष रूप से विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में इसकी स्थिति को देखते हुए चिंताजनक है। हालाँकि भारत की रैंकिंग में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन यह सुधार देश की प्रगति के कारण नहीं बल्कि अन्य देशों में प्रेस स्वतंत्रता में गिरावट के कारण हुआ है।

प्रेस समाज का आइना होता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रेस की स्वतंत्रता बुनियादी जरूरत है। मीडिया की आजादी का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी राय कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर करने का अधिकार है। प्रेस के सामने पहले भी चुनौतियां थीं और आज भी हैं। पत्रकारिता में निर्भीकता एवं निष्पक्षता होनी चाहिए। यह एक गम्भीर व कठिन विषय माना जाता है। पत्रकारिता की मर्यादा बनाये रखना सबकी नैतिक जिम्मेदारी है। भय और पक्षपात रहित पत्रकारिता के मार्ग में बड़ी चुनौतियां है। यह जोखिम भरा मार्ग है जिस पर चलना तलवार की धार पर चलना है। आज पत्रकारिता पर कई प्रकार का दवाब है। निष्पक्ष पत्रकारिता खण्डे की धार हो गयी है।

सत्य और तथ्य को बेलाग उद्घाटित करना सच्ची पत्रकारिता है। कलम में बहुत ताकत होती है, आजादी के दौरान पत्रकारों ने अपनी कलम के बल पर अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। प्रेस सरकार और जनता के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में अपनी महती भूमिका का निर्वहन करता है। प्रेस की चुनौतियां लगातार बढ़ती ही जा रही है। प्रेस को आंतरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर संघर्ष करना पड रहा है। इनमें आंतरिक संघर्ष अधिक गंभीर है। प्रेस आज विभिन्न गुटों में बंट गया है जिसे सुविधा के लिए हम पक्ष और विपक्ष का नाम देवे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। जनमत निर्माण में मीडिया की सशक्त भूमिका है, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पहुँच घर घर में हो गई है। मगर लोग आज भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अपेक्षा प्रिंट मीडिया को अधिक विश्वसनीय मान और स्वीकार कर रहे है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

मनोरंजन ऐप्स की अंधी दौड़ और बढ़ती अश्लीलता 

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डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स तेज़ मुनाफ़े की दौड़ में कला, संवेदनशीलता और समाजिक मूल्यों को पीछे छोड़ते हुए अश्लीलता को नया ‘मनोरंजन’ बना रहे हैं — इसका दुष्प्रभाव विशेषकर युवाओं की मानसिकता पर गहरा और खतरनाक है।

– डॉ सत्यवान सौरभ

डिजिटल क्रांति ने जिस तेज़ी से दुनिया को बदला है, उतनी ही तीव्रता से उसने हमारे मनोरंजन के साधनों को भी प्रभावित किया है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सस्ते डेटा ने मनोरंजन को घरों से निकलकर सीधा हर व्यक्ति की जेब और हाथों तक पहुँचा दिया है। आज सैकड़ों एंटरटेनमेंट ऐप्स—वेब सीरीज़, शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया स्ट्रीमिंग और लाइव शो—हर सेकंड दर्शकों का ध्यान खींचने की होड़ में हैं। यह सुविधा जितनी शानदार लगती है, उतनी ही गहरी चिंताओं को भी जन्म देती है। क्योंकि इसी आसानी ने मनोरंजन की परिभाषा को खतरनाक रूप से बदल दिया है। अब मनोरंजन का अर्थ कला, संस्कृति, कहानी या संवेदनशीलता नहीं रह गया है—बल्कि तेज़ व्यूज़, वायरल कंटेंट और उत्तेजक दृश्यों की अंधी प्रतिस्पर्धा बन गया है।

आज स्थिति यह है कि अनेक ऐप्स जान-बूझकर अश्लीलता, फूहड़ हरकतों, भद्दे संवादों और उत्तेजक दृश्यों को परोस रहे हैं। यह सामग्री न तो किसी रचनात्मकता की मिसाल है और न ही इससे समाजिक चेतना का विस्तार होता है। इसके पीछे केवल एक लक्ष्य है—तेज़ी से अधिक दर्शक, और इन दर्शकों के माध्यम से विज्ञापन व सब्सक्रिप्शन से होने वाला मुनाफ़ा। मनोरंजन उद्योग ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहाँ कला और संस्कृति की प्रतिष्ठा आर्थिक लालच के सामने निरर्थक होती जा रही है।

कभी भारतीय सिनेमा, थियेटर और साहित्य समाज के जीवन-मूल्यों को सहेजने का माध्यम माने जाते थे। कहानी, संवाद, अभिनय और कल्पना की शक्ति दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती थी। आज डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स ने इसका बिल्कुल उल्टा माहौल तैयार कर दिया है। वेब सीरीज़ और शॉर्ट वीडियो में आपत्तिजनक भाषा, निर्बाध अश्लीलता और अनावश्यक अंतरंग दृश्यों को ऐसे दिखाया जा रहा है जैसे यही “आधुनिकता” या “यथार्थवाद” हो। जबकि सच्चाई यह है कि यह यथार्थ नहीं, बल्कि एक जानबूझकर पैदा किया गया भ्रम है—जिसमें दर्शक को उत्तेजना व सनसनी के माध्यम से बांधकर रखा जाए।

इस दौड़ की सबसे बड़ी कीमत युवा पीढ़ी चुका रही है। किशोरों के हाथ में मोबाइल है और मोबाइल के अंदर ऐसी दुनिया है जो बिना किसी रोक-टोक के उन्हें प्रभावित कर रही है। किशोरावस्था वह समय होता है जब व्यक्तित्व, सोच, नैतिकता और सामाजिक मूल्य बनते हैं। लेकिन इन ऐप्स पर उपलब्ध सामग्री उन्हें तेज़-तर्रार, उथला और अक्सर भ्रमित कर देने वाला दृष्टिकोण देती है। संबंधों के प्रति गलत धारणाएँ बनती हैं, महिलाओं के प्रति सम्मान घटता है, और जीवन को केवल शारीरिक आकर्षण, भौतिकता और दिखावे के रूप में समझने की प्रवृत्ति बढ़ती है।

आज का युवा जिस प्रकार की सामग्री रोज़ देख रहा है, वह उसके व्यवहार, शब्दों, संवेदनाओं और जीवन के आकलन को धीरे-धीरे बदल रही है। जिस चीज़ को वह “मनोरंजन” या “ट्रेंड” समझ रहा है, वह वास्तव में उनके भीतर मूल्यहीनता और अवसाद पैदा कर रही है। कई मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रकार का कंटेंट आँखों को आकर्षित भले करे, लेकिन दिमाग पर भारी बोझ डालता है। तेज़–तेज़ दृश्यों, अश्लील संवादों, अनियंत्रित भावनाओं और आक्रामक प्रस्तुतियों से किसी भी किशोर का मानसिक संतुलन प्रभावित होना स्वाभाविक है।

लेकिन समस्या का एक और पहलू भी है—कंटेंट निर्माता और ऐप कंपनियाँ ज़िम्मेदारी से बचने के लिए ‘यूज़र चॉइस’, ‘एडल्ट टैग’ या ‘व्यूअर डिस्क्रेशन’ जैसे शब्दों का सहारा लेती हैं। वे यह कहती हैं कि दर्शक स्वयं चयन करें कि वे क्या देखना चाहते हैं। यह तर्क पूरी तरह गलत नहीं, लेकिन अधूरा अवश्य है। क्योंकि जब कोई ऐप अपनी पूरी मार्केटिंग रणनीति ही उत्तेजक और भड़काऊ सामग्री पर आधारित रखता है, तब दर्शक का चुनाव स्वतंत्र कम और प्रभावित अधिक होता है। जिस सामग्री को लगातार प्रमोट किया जाएगा, वही अधिक देखी जाएगी।

नियामक तंत्र की स्थिति भी उतनी ही कमज़ोर है। भारत में फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड है, टीवी के लिए प्रसारण नियंत्रण है, लेकिन डिजिटल ऐप्स लगभग बिना किसी प्रभावी नियंत्रण के चल रहे हैं। दिशा-निर्देश तो बनाए गए हैं, पर उनका पालन न तो कठोर है और न ही नियमित। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को लगता है कि वे आम मीडिया कानूनों से ऊपर हैं। उनका तर्क है कि इंटरनेट एक “स्वतंत्र माध्यम” है। लेकिन क्या स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि समाजिक संतुलन को बिगाड़ने वाली सामग्री को खुली छूट दे दी जाए? क्या संस्कृति, नैतिकता और संवेदनाओं को नज़रअंदाज़ कर देना ही स्वतंत्रता है?

समस्या का एक सामाजिक आयाम भी है। परिवार अपने स्तर पर बच्चों को रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन डिजिटल दुनिया की जटिलता इतनी है कि पूरी तरह नियंत्रण लगभग असंभव है। विशेषकर मध्यम वर्गीय और ग्रामीण परिवारों में डिजिटल साक्षरता अभी विकसित नहीं हुई है। माता-पिता यह नहीं जानते कि कौन-सा कंटेंट बच्चों के लिए अच्छा है और कौन-सा हानिकारक। ऐप कंपनियाँ भी माता-पिता को मार्गदर्शन देने के बजाय उनका उपयोगकर्ता विस्तार करने में अधिक रुचि रखती हैं।

ऐसे समय में हमें यह समझना होगा कि समाधान केवल प्रतिबंधों में नहीं है। समाधान एक व्यापक सामाजिक जागरूकता, नैतिक उत्पादन नीति और कड़े नियमन के संतुलन में है। मनोरंजन कंपनियाँ स्वयं यह तय करें कि क्या दिखाना उचित है। वे कला और व्यावसायिकता के बीच संतुलन बनाएं। अश्लीलता के सहारे व्यूज़ पाने की आदत छोड़ें और रचनात्मक, भावनात्मक तथा सामाजिक रूप से उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करें।

साथ ही, सरकार को डिजिटल प्लेटफार्मों पर वैसा ही नैतिक नियंत्रण लागू करना होगा जैसा टीवी या फिल्मों पर होता है। पारदर्शी नियम, कठोर दंड और स्पष्ट श्रेणीकरण इस दिशा में आवश्यक कदम हो सकते हैं।

समाज का कर्तव्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अभिभावकों को डिजिटल साक्षरता दी जानी चाहिए। युवाओं को यह समझाया जाना चाहिए कि मनोरंजन और उत्तेजना में बहुत अंतर होता है। फूहड़ता से मिली त्वरित प्रसन्नता जीवन के गहरे अनुभवों और रचनात्मक आनंद का विकल्प नहीं हो सकती।

मनोरंजन का उद्देश्य केवल चौंकाना या उत्तेजित करना नहीं है; उसका उद्देश्य मन को संवेदनशील बनाना, सोच को गहराई देना और समाज को बेहतर दिशा देना है। लेकिन जब ऐप्स की दुनिया कला को छोड़कर अश्लीलता की ओर भागने लगे, तब संस्कृति और सभ्यता दोनों संकट में पड़ती हैं।

हमारे सामने आज यही प्रश्न है—क्या हम ऐसी डिजिटल दुनिया चाहते हैं जहाँ मनोरंजन का आधार रचनात्मकता, सांस्कृतिक मूल्य और सामाजिक ज़िम्मेदारी हो? या हम ऐसे युग में प्रवेश करने जा रहे हैं जहाँ उत्तेजना ही कला बन जाएगी और सनसनी ही मनोरंजन?

समय की मांग है कि हम स्पष्ट रूप से कहें: हमें मनोरंजन चाहिए—लेकिन ऐसा नहीं जो समाज को खोखला कर दे।

अगर डिजिटल दुनिया इस दिशा में नहीं बदली, तो आने वाली पीढ़ियाँ एक ऐसे सांस्कृतिक अंधकार में प्रवेश करेंगी, जहाँ मनोरंजन तो बहुत होगा, पर उसका कोई अर्थ नहीं बचेगा।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

आदिवासी समाज के प्रेरणास्रोत हैं भगवान बिरसा मुंडा

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जनजातीय गौरव दिवस

बाल मुकुन्द ओझा

देश में ऐसे बहुत कम लोग हुए जिन्हें लोगों ने भगवान का दर्ज़ा दिया। इनमें जनजाति अस्मिता के नायक बिरसा मुंडा का नाम सर्वोपरि है। देश आज भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती जनजातीय गौरव दिवस के तौर पर मनाने जा रहा हैं। पूरे देश में भगवान बिरसा मुंडा को महान क्रांतिकारी के रूप में याद किया जाता है। झारखंड के उलिहातु में 15 नवम्बर 1875 में उनका जन्म हुआ था। बिरसा मुंडा देश के इतिहास में ऐसे नायक थे जिन्होंने आदिवासी समाज की दिशा और दशा बदल कर रख दी थी। उन्होंने आदिवासियों को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त होकर सम्मान से जीने के लिए प्रेरित किया था। अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासी आंदोलन के लोकनायक थे बिरसा मुंडा। भगवान बिरसा मुंडा का जीवन किसी प्रेरणास्रोत से कम नहीं है। उनका पूरा जीवन देशवासियों को अदम्य साहस, संघर्ष और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध रहने का संदेश देता है। अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासी आंदोलन के लोकनायक थे बिरसा मुंडा। बिरसा मुंडा का 24 वर्ष की आयु में 9 जून 1900 को रांची की जेल में निधन हो गया था।

जनजाति समाज के भगवान माने जाने वाले बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर देश को आदिवासियों की दशा और दिशा पर स्वतंत्र चिंतन मनन की जरुरत है। आज़ादी के बाद से ही यह समुदाय पग पग पर छला गया और सियासत की ठगी का शिकार बना, मगर आज भी आर्थिक और सामाजिक प्रगति की बाट जोह रहा है यह समुदाय। चुनावों के दौरान आदिवासी सियासत को लेकर देश में गर्माहट और छटपटाहट देखने को मिलती है। सच तो यह भी है इनके साथ छल करने वाले और कोई नहीं अपितु इनके ही समुदाय के कथित नेता है जो सत्ता और वोटों के लालच में अपने लोगों को गिरवी रख देते है। सामाजिक बराबरी के लिए आज जल, जंगल, जमीन और प्रकृति के रखवाले आदिवासियों के आर्थिक सामाजिक और शैक्षिक विकास की जरुरत है। जनजातियों का भारत की स्वतंत्रता और समृद्धि में बहुत बड़ा योगदान है। दुनिया के लगभग 90 से अधिक देशों मे आदिवासी समुदाय की आबादी लगभग 37 करोड़ है। आज आदिवासियों की दशा और दिशा पर गहन चिंतन और मंथन की जरुरत है। आदिवासी समुदाय को प्रकृति का सबसे करीबी माना जाता है। इस समुदाय ने संसाधनों के आभाव में भी अपनी एक खास पहचान बनाई है। भारत में आदिवासी संस्कृति की अपनी विशिष्ट पहचान है। यह जनजाति लोगों का एक ऐसा समूह है, जिनकी भाषा, संस्कृति, जीवनशैली और सामाजिक-आर्थिक स्थिति भिन्न है। मगर देशभक्ति और राष्ट्र निर्माण की भावना उनमें कूट कूट कर भरी है। प्रकृति के सवसे करीब होने के साथ ही इस समुदाय का गीत, संगीत और नृत्‍य से सदा ही गहरा लगाव रहा है। वर्षो पूर्व जब अंग्रेज इस देश को गुलाम बनाकर शासन करने आये तो यहाँ के आदिवसियों ने ही सबसे पहले सशत्र विरोध कर स्वतन्त्रता संग्राम का बिगुल फूंका था। कालांतर में यह वर्ग देश की प्रगति और विकास से समान रूप से नहीं जुड़ पाया। आजादी के आंदोलन में आदिवासियों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो, सिद्धु-कान्हू नाम के दो भाईयों के नेतृत्व में 30 जून 1855 को संथाल परगना में सशत्र विद्रोह किया गया जिसमें अंग्रेजों को भारी क्षति पहुंची थी। इस लड़ाई ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये थे। अंग्रेजों से लड़ते हुए तकरीबन बीस हजार लोगों ने अपनी जान दे दी थी। इस विद्रोह को इतिहास में संथाल विद्रोह के रूप में जाना जाता है।

आजादी के बाद एक लम्बी जद्दोजहद के बाद भी यह तय नहीं हो पाया की हमारे देश में आदिवासी कौन है। साधारण रूप से कहा जाये तो वे लोग जो आधुनिक सभ्यता और प्रगति से दूर रहकर जंगलों में निवास करते है। जमीन होते हुए भी जमीन हीन है। आज भी उनका खाना मोटा है। जंगल के इलाकों में रहने के कारण सरकार संचालित विकास योजनाएं इन तक नहीं पहुंच पाती। केंद्र और राज्य सरकार की रोजगार गारंटी योजना सहित दूसरी योजनाओं से ये आदिवासी पूरी तरह दूर हैं। पौष्टिक भोजन के आभाव में कुपोषण और बीमारी इनके लिए जानलेवा साबित हो रही है। मानव की मूल जरुरत साफ पानी भी इन लोगों को उपलब्ध नहीं होता।

 भारत की जनगणना 1951 के अनुसार आदिवासियों की संख्या 1,91,11,498 थी जो 2001 की जनगणना के अनुसार 8,43,26,240 हो गई। वर्तमान में देश में लगभग 11 करोड़ आदिवासियों की आबादी है और विभिन्न आंकड़ों की मानें तो हर दसवां आदिवासी अपनी जमीन से विस्थापित है। बढ़ती जनसंख्या, नगरों के विकास और औद्योगिकीकरण के कारण आदिवासियों की जमीने छिन गईं, जिसके कारण इनकी परंपरागत जीवन पद्धति में भारी बदलाव आया है। धरती पर सबसे पहले सभ्य होने वाली यही जन-जातियां ही थीं। लेकिन, विडंबना यह है कि उनके बाद सभ्यता का मुंह देखने वाली जातियां आज उन्हें आदिवासी कहने लगी हैं। भारत के संविधान में आदिवासी समुदाय को जन जाति का दर्जा दिया गया है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी .32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

बच्चों में छिपा है देश का उज्ज्वल भविष्य

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बाल दिवस विशेष:

“बचपन को केवल देखा नहीं, समझा जाना चाहिए। हर मुस्कुराता बच्चा एक जीवित कविता है, जो हमें मानवता की सच्ची परिभाषा सिखाता है। बाल दिवस पर आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें — हर बच्चे की हँसी और हर सपने की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है।” 

✍️ — डॉ. प्रियंका सौरभ

हर वर्ष 14 नवम्बर को भारत में बाल दिवस बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह दिन स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की जयंती के रूप में समर्पित है। बच्चों के प्रति उनके गहरे प्रेम और स्नेह के कारण बच्चे उन्हें स्नेहपूर्वक चाचा नेहरू कहकर पुकारते थे। नेहरू जी का मानना था कि “आज के बच्चे कल का भविष्य हैं, उन्हें सही दिशा देना ही सच्ची राष्ट्र सेवा है।” उनका यह विश्वास था कि अगर बच्चों को उचित वातावरण, शिक्षा और अवसर मिले तो वे भारत को विश्व में गौरव की ऊँचाइयों तक पहुँचा सकते हैं।

नेहरू जी बच्चों में भारत के उज्ज्वल भविष्य की झलक देखते थे। उनका कहना था कि किसी भी राष्ट्र की असली पूँजी उसके बच्चे हैं — न कि उसकी सेना या संपत्ति। बच्चों में असीम ऊर्जा, कल्पनाशक्ति और सृजनात्मकता होती है, जिसे यदि सही दिशा दी जाए तो वही समाज की सबसे बड़ी ताकत बनती है। उन्होंने स्वतंत्र भारत के निर्माण के साथ-साथ बच्चों के विकास को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनके नेतृत्व में शिक्षा, विज्ञान और बाल कल्याण से जुड़ी कई योजनाएँ प्रारंभ की गईं। उन्होंने बच्चों के लिए ‘राष्ट्रीय बाल निधि’, ‘बाल भवन’, ‘शिशु कल्याण परिषद’ जैसी संस्थाओं की नींव रखी, जिनका उद्देश्य बच्चों की प्रतिभा को निखारना और उन्हें रचनात्मक मार्ग पर प्रेरित करना था।

बाल दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जो बच्चों को राष्ट्र के केंद्र में रखती है। इस अवसर पर हमें यह चिंतन करना चाहिए कि हमारे बच्चे आज किन परिस्थितियों में पल बढ़ रहे हैं। आधुनिक युग में तकनीकी क्रांति ने बच्चों के जीवन को कई मायनों में प्रभावित किया है। इंटरनेट, मोबाइल और सोशल मीडिया ने जहाँ ज्ञान के द्वार खोले हैं, वहीं बचपन की मासूमियत और संवाद की परंपरा को भी कमज़ोर किया है। बच्चे अब खेल के मैदान से अधिक स्क्रीन पर समय बिताते हैं। शिक्षा का स्वरूप भी अंकों की दौड़ में सिमट गया है, जहाँ नैतिकता और संवेदनशीलता पीछे छूटती जा रही है।

आज के बच्चे अपार संभावनाओं के धनी हैं, पर उन पर प्रतिस्पर्धा और सफलता का बोझ बहुत अधिक बढ़ गया है। माता-पिता और समाज दोनों ही उनसे अपेक्षाओं का पहाड़ खड़ा कर देते हैं। इस दबाव के कारण अनेक बच्चे मानसिक तनाव, अवसाद और भय से ग्रसित हो रहे हैं। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि स्वस्थ समाज की नींव तभी मजबूत होती है जब उसका बचपन खुश, स्वस्थ और सुरक्षित हो।

इस परिप्रेक्ष्य में बाल दिवस हमें यह याद दिलाता है कि बच्चे केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण समाज की धरोहर हैं। हर बच्चे के भीतर एक कलाकार, वैज्ञानिक, शिक्षक या नेता छिपा है। हमें केवल उसे पहचानने और प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। शिक्षा व्यवस्था को इस प्रकार रूपांतरित किया जाना चाहिए कि वह केवल परीक्षा आधारित न होकर अनुभव, मूल्य और सृजनशीलता पर आधारित हो। आज ज़रूरत है कि स्कूलों में खेल, संगीत, कला और साहित्य को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए ताकि बच्चे जीवन को सम्पूर्णता से जीना सीख सकें।

नेहरू जी ने जिस भारत का सपना देखा था, वह केवल आर्थिक या तकनीकी रूप से प्रगतिशील नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों से संपन्न भारत था। उन्होंने बच्चों को स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की भावना के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उनके लिए शिक्षा केवल ज्ञान का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की नींव थी। नेहरू जी ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए आईआईटी, आईआईएससी और नेशनल साइंस पॉलिसी जैसी संस्थाएँ स्थापित कीं, ताकि भावी पीढ़ी आधुनिक भारत के निर्माण में योगदान दे सके।

आज जब हम बाल दिवस मनाते हैं, तो यह हमारे लिए आत्ममंथन का समय भी है। क्या हमने नेहरू जी के आदर्शों के अनुरूप बच्चों के विकास के लिए उपयुक्त वातावरण बनाया है? क्या हर बच्चे को समान अवसर, शिक्षा और सुरक्षा मिल पा रही है? वास्तविकता यह है कि आज भी हमारे देश में करोड़ों बच्चे शिक्षा से वंचित हैं, अनेक बच्चे बाल श्रम और बाल शोषण के शिकार हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बाल सुरक्षा की स्थिति समान रूप से चिंताजनक है।

यदि हमें सच में बाल दिवस का अर्थ समझना है, तो हमें इन चुनौतियों का सामना करना होगा। समाज को यह स्वीकार करना होगा कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके बच्चों के कल्याण से जुड़ी है। बाल अधिकारों की रक्षा केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि संवेदनशील समाज के निर्माण से होगी। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बच्चा भूखा न सोए, कोई भी बच्चा भय में न जिए, और हर बच्चे को अपने सपनों को पूरा करने का अवसर मिले।

आधुनिक भारत में बाल अधिकारों की दिशा में सरकार और समाज दोनों ने प्रयास किए हैं। राष्ट्रीय बाल नीति (2013), समग्र शिक्षा अभियान, पोषण अभियान और बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) जैसी पहलें इस दिशा में सराहनीय कदम हैं। किंतु केवल नीतियाँ काफी नहीं हैं, जब तक उन्हें ज़मीनी स्तर पर सशक्त रूप से लागू न किया जाए। हर स्कूल, हर अभिभावक और हर नागरिक को इस दिशा में संवेदनशील बनना होगा।

बाल दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि बच्चों की हँसी सबसे पवित्र संगीत है। जब कोई बच्चा निडर होकर मुस्कुराता है, तो वह राष्ट्र की आत्मा की मुस्कान होती है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह मुस्कान कभी न बुझे। इसके लिए केवल सरकारी नीतियाँ नहीं, बल्कि सामाजिक सहयोग और पारिवारिक स्नेह आवश्यक है।

बच्चों को केवल जानकारी नहीं, बल्कि प्रेरणा चाहिए। उन्हें केवल किताबें नहीं, बल्कि उदाहरण चाहिए। यदि हम अपने जीवन में नैतिकता, संवेदना और करुणा को अपनाएँ, तो वही बच्चे उनसे सीखेंगे। परिवार बच्चों की पहली पाठशाला है, जहाँ उन्हें संस्कार, सहयोग और सामंजस्य का ज्ञान मिलता है।

आज का बाल दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा समाज बनाएँ, जहाँ वे भयमुक्त होकर सोच सकें, अपने सपनों को साकार कर सकें और अपनी सृजनात्मकता से भारत का भविष्य गढ़ सकें। नेहरू जी का सपना तभी साकार होगा जब हर बच्चा सुरक्षित, शिक्षित और प्रसन्न होगा।

बाल दिवस केवल बच्चों का उत्सव नहीं, बल्कि मानवता की नयी शुरुआत का प्रतीक है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि बचपन केवल उम्र का पड़ाव नहीं, बल्कि जीवन की वह सुंदर अवस्था है जिसमें आशा, ऊर्जा और प्रेम का सबसे शुद्ध रूप बसता है। हमें इस बचपन की रक्षा करनी है, इसे खिलने देना है, क्योंकि जहाँ बच्चे मुस्कुराते हैं, वहीं राष्ट्र खिलता है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

पुस्तक समीक्षा : अब जब बात निकली है

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यह पुस्तक हमारी वरिष्ठ साथी और सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग की पूर्व अतिरिक्त निदेशक अलका सक्सेना की बत्तीस वर्ष से अधिक की जनसम्पर्क यात्रा की केवल कहानी मात्र नहीं है अपितु लेखक की सेवा यात्रा, संघर्ष और उपलब्धियों का दस्तावेज भी है। अपनी बात बेबाकी से रखने का साहस हर किसी के बस की बात नहीं होती, मगर अलका ने इसे कर दिखाया है। प्रस्तुत पुस्तक में अलका ने सच को सच कहने की हिम्मत दिखाते हुए एक ऐसी कृति हमारे हाथों में दी है जो जनसंपर्क कर्मियों की नई पीढ़ी को ही नहीं बल्कि हम सब को भी जीने की राह दिखाएगी। जनसंपर्क पर सैद्धांतिक ज्ञान की बेशक अनेक किताबें पहले से उपलब्ध हैं पर जमीनी हकीकत बताने वाली और व्यवहारिक ज्ञान देने वाली यह किताब अपने आप में अनूठी साबित होगी। अलका ने बिना किसी लाग लपेट और बिना चाशनी लपेटे सब कुछ कितना खुल कर लिखा है। पुस्तक में अलका हमें अपने साथ अपनी पूरी राजकीय सेवा की यात्रा पर ले जाती हैं और जहाँ मिले अपने खट्टे मीठे, अच्छे बुरे, अनुकूल प्रतिकूल सारे अनुभव क्रम दर क्रम हमसे साझा करती जाती हैं। उन्होंने अपनी इस पूरी यात्रा का बेहद संजीदगी से और सयंमित भाषा में वर्णन किया है। अपनी किताब में वे बिना किसी झिझक और डर के राजकीय व्यवस्था के प्रति अपना गुस्सा भी जाहिर करती हैं। भ्र्ष्टाचार के विरुद्ध ज़ीरो टोलरेंस और महिला सशक्तिकरण का राग अलापने वाली सरकारों के प्रति भी उनके मन में जो आक्रोश उसे भी यहाँ लिखने से वे अपने आप को रोक नहीं पातीं।
यह किताब जनसम्पर्क का एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें जनसम्पर्क क्या है, क्यों जरूरी है ,कितने प्रकार का है, इसके क्या उपकरण हैं, इस क्षेत्र में काम करने वालों के लिए आने वाली चुनौतियां तथा समस्याएं और उनके निराकरण के लिए निकाले गए रास्ते, विधान सभा कवरेज ,जनादेश ,जनसम्पर्क और जमीनी हकीकत ,सत्ता परिवर्तन और जनसम्पर्क ,जनसंपर्क के क्षेत्र में महिलाओं के लिए चुनौतियां, जनसंपर्क अधिकारी की गिरती साख जैसे अनेक बिंदुओं को समेटने की कोशिश की गयी है।
लेखक ने पुस्तक में अपने पूरे जनसम्पर्क सफर की यादों को गागर में सागर की तरह भरने का सफल प्रयास किया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि वे हर दृष्टि से विलक्षण प्रतिभा की धनी हैं। वे उच्च कोटि की जनसम्पर्क कर्मी, संपादक, पत्रकार और प्रतिष्ठित संवादकर्मी के साथ हिंदी और अंग्रेजी की ज्ञाता हैं। निडरता, साहस, कार्य के प्रति समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा उनकी प्रमुख विशेषता है। आशा है यह पुस्तक सुधि पाठकों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी।
लेखक : अलका सक्सेना
प्रकाशक : साहित्यागार, जयपुर ।
पृष्ठ : 315
मूल्य : 500 रूपये
समीक्षक — वीना करमचंदानी
वरिष्ठ लेखक और जनसम्पर्ककर्मी

ज़ोहरान ममदानी के कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती

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एम. ए. कंवल जाफरी

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कड़े विरोध और धमकी के बावजूद ज़ोहरान ममदानी ने न्यूयॉर्क का मेयर बनकर इतिहास रचा। पिछली सदी के पहले मुस्लिम, पहले भारतीय मूल और सबसे कम उम्र के मेयर ममदानी 1 जनवरी 2026 को पद और गोपनीयता की शपथ लेंगे। इस जीत से अमेरिकी राष्ट्रपति और इजराइली प्रधानमंत्री को कोई खुशी नहीं हुई, लेकिन इसका सर्वत्र स्वागत किया गया। ज़ोहरान क्वामे ममदानी 2018 में अमेरिकी नागरिक बने। 2020 के विधानसभा चुनाव में चार बार की विधानसभा सदस्य अरावेला सिमोटाॅस को हराने और दूसरे कार्यकाल के लिए निर्विरोध निर्वाचित ज़ोहरान ममदानी के मेयर के अहम और मुश्किल चुनाव में जीत से साबित हो गया कि अमेरिका की राजनीति में मुसलमान, आप्रवासी और मजदूर वोट बैंक की कतारों से निकलकर प्रतिनिधित्व की पंक्ति में आ खड़े हुए हैं। चुनाव में सियासी दमखम, लोकतांत्रिक दृष्टिकोण, नारों की गूंज और वादों का बड़ा महत्व होता है। इस चुनाव में अहम मुद्दों के साथ जनकल्याणकारी वादे भी किए गए। अमेरिका में किराया संकट, परिवहन की बढ़ती दरें, आसमान छूती मंहगाई, रोजगार की अविश्वसनीयता, युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों की कमी, बच्चों की देखभाल का खर्च और पुलिस व्यवस्था में असमानता जैसे मुद्दे उठाए और चार बड़े वादे किए गए। वादों में किरायेदारों के लिए किराया स्थिर करना, मजदूरों और छात्रों के लिए मुफ्त बस सेवा, दैनिक उपभोग के ज़रूरी सामान के लिए सरकारी स्टोर और कामकाजी परिवारों केे बच्चों की देखभाल के लिए मुफ्त बाल केंद्र खोलना शामिल हैं। सस्ते आवासों का निर्माण, 30 डॉलर प्रतिघंटा मज़दूरी, एलजीबीटी अधिकार और पुलिस सुधार के वादों ने शहरी राजनीति को सार्वजनिक आवश्यकताओं की राजनीति में बदल दिया।
ज़ोहरान ममदानी का जन्म 18 अक्टूबर 1991 को युगांडा के शहर कंपाला में हुआ। मुंबई में पैदा उनके पिता और कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रोफेसर महमूद ममदानी का संबंध शिया मुस्लिम गुजराती परिवार से है, जबकि माँ अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म निर्माता मीरा नायर का ताल्लुक ओडिशा के राउरकेला के पंजाबी हिंदू परिवार से है। कुछ समय दक्षिण अफ्रीका में रहकर यह परिवार अमेरिका के प्रसिद्ध शहर न्यूयार्क में आबाद हो गया। ज़ोहरान ममदानी ने 2024 में न्यूयार्क के मेयर का चुनाव लड़ने की घोषणा की। यूं तो यह चुनाव स्थानीय निकाय चुनाव था, लेकिन ममदानी के धर्म और राष्ट्रपति ट्रंप के कड़े विरोध के कारण यह चुनाव दिलचस्प और दुनिया की तवज्जह का केंद्र बन गया। इज़राइल को अमेरिकी मदद रोकने के पक्षधर ममदानी (34) आरंभ से ही बढ़त बनाए रहे। चुनाव में 20 लाख (91 प्रतिशत) से अधिक वोट पड़े, जो 1969 के बाद सबसे अधिक है। उन्होंने आजाद उम्मीदवार और न्यूयॉर्क के पूर्व गवर्नर एंड्रयू कुओमो और रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार कर्टिस स्लिवा को हराया। ट्रंप की कुओमो के समर्थन की घोषणा कारगर साबित नहीं हुई। 26 अरबपतियों के 2.2 करोड़ से अधिक डॉलर खर्च कर भी ममदानी को नहीं रोका जा सका। ममदानी को 10,36,051 वोट (50.5 प्रतिशत) प्राप्त हुए, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी और ट्रम्प समर्थित कुओमो को 7,76,547 वोट (41.3 प्रतिशत) और स्लिवा को केवल 1,37,030 वोट (7.1 प्रतिशत) मिले। ममदानी 111 वर्षों में न्यूयॉर्क के 111वें और सबसे कम उम्र के मेयर बने। उन्हें करीब 67 प्रतिशत यहूदी वोट मिले। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा व बिल क्लिंटन और पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने उन्हें बधाई दी। ममदानी ने राष्ट्रपति ट्रम्प को आव्रजन पर चुनौती दी और राजनीतिक भाई-भतीजावाद समाप्त करने का आह्वान किया। कहा, दोस्तों! हमने राजनीतिक वंश को उखाड़ फेंका। हम एक ऐसी राजनीति को उलट रहे हैं जो कुछ लोगों की सेवा करती थी। हम इसलिए जीते क्योंकि न्यूयॉर्कवासियों ने खुद को यह विश्वास दिलाया कि असंभव को संभव बनाया जा सकता है। हम पर राजनीति थोपी नहीं जाएगी, बल्कि वह चीज़ होगी, जो हम खुद बनाएंगे। ट्रंप की राजनीति अमेरिका प्रथम, मुस्लिम पाबंदी, आप्रवासी विरोधी, घृणित बयानबाजी और धमकी पर आधारित थी। शालीनता की हदें पार कर ममदानी को पागल कम्यूनिस्ट और उसे वोट करने वाले यहूदियों को बेवकूफ और यहूदी विरोधी कहा गया। ज़ोहरन ममदानी की जीत पर न्यूयॉर्क की आर्थिक मदद रोकने की धमकी दी गई। मुस्लिम आप्रवासी का जीतना ट्रंप विचारधारा की प्रतीकात्मक हार है। यह जीत आप्रवासियों और मुस्लिम समुदायों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संकेत है। यह मुसलमानों और अल्पसंख्यकों को संकेत देती है कि वे अमेरिकी लोकतंत्र में मुख्यधारा के नेतृत्व तक पहुँच सकते हैं। यह जीत अमेरिकी राजनीति के बदलते स्वरूप का संकेत है। इसका अमेरिका, डेमोक्रेटिक पार्टी और डोनाल्ड ट्रंप पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। मेयर शहर का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है। उसके पास सभी एजेंसियों, विभागों और कर्मचारियों को नियंत्रित करने, बजट तैयार करने, प्रस्ताव देने व लागू करने का अधिकार होता है। उसे कई विभागों और मिशनों के प्रमुखों की नियुक्ति करने का हक भी है।
ज़ोहरान ममदानी न्यूयॉर्क को सिर्फ ऊँची इमारतों का शहर नहीं, बल्कि साझा ज़िंदगी के अनुभवों का शहर मानते हैं। उनका ताल्लुक ऐसे भारतीय-अफरीकी-अमेरिकी परिवार से है, जिसने तीन महाद्वीपों का अनुभव है। उनकी सियासत में मज़हब या नस्ल की बजाय शांति, न्याय और समानता नज़र आती है। इस जीत ने साबित कर दिया कि अब अब्दुल सिर्फ पंक्चर ही नहीं जोड़ता, बल्कि लोगों के दिल जोड़कर न्यूयॉर्क जैसे शहर का मेयर भी बन जाता है। मुसलमानों में मिसाइलमैन, वैज्ञानिक, गणितज्ञ और खगोलशास्त्री के साथ हर क्षेत्र के उच्च पदों पर पहुँचने की सलाहियत है। अमेरिका से बाहर पैदा होने के कारण ममदानी संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव तो नहीं लड़ सकते, लेकिन विधानसभा सदस्य और मेयर के रूप में जनसेवा ज़रूर कर सकते हैं। इस्लाम भेदभाव के बजाय समानता की तालीम देता है। उन्हें सबसे बड़े सेवक के तौर पर शहर के विकास और जन कल्याण के कार्य करने का अवसर मिला है। मतदाताओं ने ट्रंप की धमकियों के बावजूद उन्हें कामयाब किया है। अब ममदानी के पास लोगों के सपने पूरे करने का मौका है। ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि ज़ोहरान ममदानी के मेयर बनने के बाद वह न्यूयॉर्क के लिए आवश्यक संघीय धन को सीमित करेंगे, ताकि उनकी आर्थिक शक्ति कमजोर रहे और वह अपनी लोकप्रियता खो दें। कम्युनिस्ट के नेतृत्व में इस महान शहर की सफलता या समृद्धि की कोई संभावना नहीं है। वह न्यूयॉर्क को आर्थिक और सामाजिक अराजकता में धकेल देंगे और शहर के अस्तित्व को ख़तरा उत्पन्न हो जाएगा। राष्ट्रपति के विरोध और फंडिंग्स से हाथ खींचने की स्थिति में ममदानी का जनता की कसौटी पर खरा उतरना आसान नहीं है। उन्हें सीमित संसाधनों से राजनीतिक शतरंज की बिसात पर एक मंझे खिलाड़ी की तरह आगे बढ़ना होगा, ताकि चुनाव में किए गए वादों को पूरा कर शहर के विकास और जनसेवा को यकीनी बनाया जा सके।

एमए कंवल जाफरी

निठारी कांड के निर्णय पर उठते सवाल

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अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

निठारी हत्याकांड के दोषी ठहराए गए सुरेंद्र कोली को सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह बेहद दुख की बात है कि लंबी जांच के बावजूद निठारी के जघन्य हत्याकांड के असली अपराधी की पहचान कानूनी मानकों के अनुरूप स्थापित नहीं हो पाई। अपराध जघन्य थे और परिवारों की पीड़ा अथाह थी। सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा के निठारी हत्याकांड से जुड़े अंतिम लंबित मामले में सुरेंद्र कोली को बरी करते हुए यह टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने फैसले में कहा, आपराधिक कानून अनुमान या पूर्वधारणा के आधार पर दोषसिद्धि की अनुमति नहीं देता। खुदाई शुरू होने से पहले घटनास्थल को सुरक्षित नहीं किया गया था, खुलासे को उसी समय दर्ज नहीं किया गया। रिमांड दस्तावेज में विरोधाभासी विवरण थे और कोली को समय पर अदालत की ओर से निर्देशित चिकित्सा जांच के बिना लंबे समय तक हिरासत में रखा गया। अदालत ने कोली की सजा को रद्द करते हुए कहा कि अगर वह किसी और मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए। यह फैसला उन परिवारों और कानूनी हलकों के लिए अहम है, जो पिछले 18 वर्षों से इस मामले पर नजर रखे हुए थे। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष सुरेंद्र कोली के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश नहीं कर पाया। अदालत ने माना कि जांच के दौरान कई गंभीर प्रक्रियागत खामियां रहीं, इसके चलते दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को सिर्फ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उम्रकैद या फांसी नहीं दी जा सकती।

इससे  पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के नोएडा के चर्चित निठारी कांड के 12 केस के आरोपी सुरेंद्र कोली और दो केस में फंसी की सजा पाए कोठी डीएस−5  के मालिक मनिंदर सिंह पंढेर को  भी ने बरी कर दिया है।  

  न्यायालय ने इन्हें   दोष मुक्त तो  करार दे दिया, किंतु  ये न्याय एक तरफा है।  अधूरा  है। निठारी कांड तो हुआ है। चर्चित निठारी कांड में निचली अदालत से कोली को एक दर्जन से अधिक मामलों में फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। निठारी गांव के कोठी डीएस−5  के मालिक मनिंदर सिंह पंढेर को दो  केस में  फंसी की सजा हो  चुकी है। अब जब की ये निचली अदालत से फांसी की सजा पाए ये दोनों आरोपी हाईकोर्ट ने बरी कर दिए तो व्यवस्था को यह तो  बताना  ही होगा कि फिर इस कांड के आरोपी कौन हैं? किसने  इस कांड  की 19 घटनाओं को अंजाम दिया।  कांड  तो  हुआ ही है। ये  दोनों  आरोपी इसलिए बरी हो गए कि इनके विरूद्ध सुबूत नही थे, किंतु पीड़ित परिवार को भी तो  न्याय  चाहिए। उनके परिवार की युवतियों, बेटियों और बच्चों  पर जुल्म करने  वाला,  उनसे  व्यभिचार कर उन्हें काटकर खाने वाला कोई तो होगा? किसी ने तो  ये कांड किया होगा?  उसे  कानून की जद में लाकर सजा कौन दिलाएगा? ये निर्दोष थे तो फिर इनकी कोठी के पास नाले में  किसने मारकर इनको  डाला?

29 दिसंबर 2006 को उत्तर प्रदेश के नोयडा  में मोनिंदर सिंह पंढेर के घर के पीछे नाले से 19 बच्चों और महिलाओं के कंकाल मिले। मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली गिरफ्तार  किया। आठ फरवरी 2007 को कोली और पंढेर को 14 दिन की सीबीआई हिरासत में भेजा गया। मई 2007 को सीबीआई ने पंढेर को अपनी चार्जशीट में अपहरण, दुष्कर्म और हत्या के मामले में आरोप मुक्त कर दिया था। दो माह बाद अदालत की फटकार के बाद सीबीआई ने उसे मामले में सह अभियुक्त बनाया। 13 फरवरी 2009 को विशेष अदालत ने पंढेर और कोली को 15 वर्षीय किशोरी के अपहरण, दुष्कर्म और हत्या का दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई। ये पहला फैसला था। इसके बाद 11 केस में दोनों को सजा हुई।

पुलिस ने इस मामले में कहा था कि कम से कम 19 युवा महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था, उनकी हत्या कर दी गई थी और उनके शवों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए थे। पुलिस ने उस समय कहा था कि ये हत्याएं पंढेर के घर के अंदर हुई थीं, जहां कोली नौकर के तौर पर काम करते थे। पुलिस ने आरोप लगाया कि जिन बच्चों के अवशेष बैग में छिपे हुए पाए गए थे, उन्हें कोली ने मिठाई और चॉकलेट देकर लालच देकर मार डाला था।पुलिस का कहना था कि जांच के दौरान कोली ने नरभक्षण और नेक्रोफिलिया (शवों के साथ संबंध बनाने) की बात कबूल की थी। बाद में उन्होंने अदालत में अपना कबूलनामा ये कहते हुए वापस ले लिया कि उनसे जबरन ये बयान दिलवाया गया था। सीबीआई ने सुरेंदर कोली और पंढेर के खिलाफ़ 19 मामले दर्ज किए थे। जहां कोली पर हत्या, अपहरण, बलात्कार, सबूतों को मिटाने जैसे आरोप थे तो वहीं पंढेर पर अनैतिक तस्करी का आरोप था। इस मामले की गूंज कई सालों तक देश गूंजती रही थी। लोगों ने पुलिस पर लापरवाही बरतने के आरोप लगाए थे। स्थानीय लोगों ने उस समय कहा था कि पुलिस इस मामले में इसलिए भी कार्रवाई नहीं कर सकी क्योंकि लापता होने वालों में से अधिकतर गरीब परिवार के थे।

न्यायालय ने निर्णय में ये माना कि आरोपियों के विरूद्ध  सबूत नही हैं।  न्यायालय ने ये नही कहा कि कांड  हुआ ही नही। उसने माना कि कांड तो  हुआ। 19 महिलाओं  और बच्चियों के कंकाल कोठी डीएस−5  के  सामने  नाले से मिले। अब प्रश्न यह है कि ये नही तो किसी और ने ये कांड किया है। जिसने कांड किया उसे सजा  दिलाने की किसकी जिम्मेदारी है? किंतु   लगता है कि न्यायालय ने इस केस के आरोपी के बरी हो  जाने के बाद ये  केस व्यवस्था  की कबाड़ की फाइल में चला  जाएगा। 2006 से न्याय  की आशा में बैठे  पीडित परिवार को रो पीट कर चुप हो बैठना पड़ेगा । इस निर्णय के बाद पीड़ितों के माता पिता और परिवार वालों का दुख और गहरा हो गया। अपनों को खोने वालों ने कहा कि 19 साल बाद भी हम लोगों को न्याय नहीं मिला। निठारी कांड में अपने बच्चों को खोने वाले पैरंट्स का लगभग एक ही सवाल है कि अगर पंढ़ेर और कोली निर्दोष हैं तो उनके बच्चों को किसने मारा है?

एक बात और हाईकोर्ट ने कहा कि शवों की मेडिकल रिपोर्ट के  आधार पर जांच  नही हुई। ये  रिपोर्ट मानव तस्करी की और इशारा कर रही थी। दोनों  न्यायधीश ने जांच  पर नाखुशी जताते हुए ये भी कहा कि जांच  बेहद खराब है। सुबूत जुटाने की मौलिक प्रक्रिया का पूरी तरह उल्लंघन किया गया। जांच एसेंसियों की नाकामी जनता के विश्वास के साथ धोखा  है। हाईकोर्ट ने  कहा कि जांच एजेंसियों ने अंग व्यापार के गंभीर पहलुओं की जांच किए बिना एक गरीब नौकर को खलनायक की तरह पेश किया।  हाईकोर्ट ने माना कि  ऐसी गंभीर चूक के कारण मिलीभगत सहित कई गंभीर निष्कर्ष  संभव है। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि  दोनों  आरोपियों के खिलाफ कोई  सुबूत नही हैं। सुबूत के अभाव में दोनों आरोपियों को लगभग  19 साल जेल में रहना  पड़ा। अकारण जेल में बिताए  इनके इन सालों के लिए कौन जिम्मेदार है?

इस केस में  शुरूआत से ही पुलिस पर आरोप  लगते रहते  हैं कि वह इस मामले में रूचि नही ले रही। उसीके बाद मामला सीबीआई को गया। अब सीबीआई की जांच पर भी सवाल उठा  है तो  सीबीआई  को अपनी जांच और प्रक्रिया पर भी  सोचना  और बदलाव करना  होगा। क्योंकि देश में उसका बहुत सम्मान है। प्रत्येक प्रकार के टिपिकल मामले में उसी से जांच कराने की बात आती है।  अब उसकी भी  जांच  ऐसी ही निम्न स्तरीय होगी,तो फिर उसे  सोचना तो  होगा ही।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

ashokmadhup@gmail.com

बाल दिवस पर लाएं बच्चों के चेहरे पर मुस्कान

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बाल मुकुन्द ओझा

बाल दिवस हर साल 14 नवम्बर को मनाया जाता है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिवस के अवसर पर बाल दिवस के दौरान विविध कार्यक्रमों के जरिये बच्चों के अधिकार और विकास पर चर्चा की जाती है। पं. जवाहर लाल नेहरू को ‘चाचा नेहरू’ कहा जाता था और उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था। बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए ‘बाल दिवस’ स्कूलों तथा अन्य संस्थाओं में धूमधाम से मनाया जाता है। बच्चे जवाहर लाल नेहरू को चाचा इसलिए कहते थे क्योंकि बच्चों को चाचा जितना प्यारा कोई नहीं होता।

कहा जाता है कि पंडित नेहरू बच्चों से बेहद प्यार करते थे इसलिए बाल दिवस मनाने के लिए उनका जन्मदिन चुना गया। असल में बाल दिवस की नींव 1925 में रखी गई थी, जब बच्चों के कल्याण पर विश्व कांफ्रेंस में बाल दिवस मनाने की सर्वप्रथम घोषणा हुई। 1954 में दुनिया भर में इसे मान्यता मिली। संयुक्त राष्ट्र ने यह दिन 20 नवंबर के लिए तय किया लेकिन अलग अलग देशों में यह अलग दिन मनाया जाता है। कुछ देश 20 नवंबर को भी बाल दिवस मनाते हैं। 1950 से बाल संरक्षण दिवस यानि 1 जून भी कई देशों में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन इस बात की याद दिलाता है कि हर बच्चा खास है और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए उनकी मूल जरूरतों और पढ़ाई लिखाई की जरूरतों का पूरा होना बेहद जरूरी है. यह दिन बच्चों को उचित जीवन दिए जाने की भी याद दिलाता है।,

चाचा नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री थे और तीन मूर्ति भवन प्रधानमंत्री का सरकारी निवास था। एक दिन तीन मूर्ति भवन के बगीचे में लगे पेड़-पौधों के बीच से गुजरते हुए घुमावदार रास्ते पर नेहरू जी टहल रहे थे। उनका ध्यान पौधों पर था। वे पौधों पर छाई बहार देखकर खुशी से निहाल हो ही रहे थे तभी उन्हें एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। नेहरू जी ने आसपास देखा तो उन्हें पेड़ों के बीच एक-दो माह का बच्चा दिखाई दिया जो दहाड़ मारकर रो रहा था। नेहरूजी ने मन ही मन सोचा- इसकी माँ कहाँ होगी? उन्होंने इधर-उधर देखा। वह कहीं भी नजर नहीं आ रही थी। चाचा ने सोचा शायद वह बगीचे में ही कहीं माली के साथ काम कर रही होगी। नेहरूजी यह सोच ही रहे थे कि बच्चे ने रोना तेज कर दिया। इस पर उन्होंने उस बच्चे की माँ की भूमिका निभाने का मन बना लिया।

आज भी चाचा नेहरू के इस देश में लगभग 5 करोड़ बच्चे बाल श्रमिक हैं। जो चाय की दुकानों पर नौकरों के रूप में, फैक्ट्रियों में मजदूरों के रूप में या फिर सड़कों पर भटकते भिखारी के रूप में नजर आ ही जाते हैं। इनमें से कुछेक ही बच्चे ऐसे हैं, जिनका उदाहरण देकर हमारी सरकार सीना ठोककर देश की प्रगति के दावे को सच होता बताती है। यही नहीं आज देश के लगभग 53.22 प्रतिशत बच्चे शोषण का शिकार है। इनमें से अधिकांश बच्चे अपने रिश्तेदारों या मित्रों के यौन शोषण का शिकार है। अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञता व अज्ञानता के कारण ये बच्चे शोषण का शिकार होकर जाने-अनजाने कई अपराधों में लिप्त होकर अपने भविष्य को अंधकारमय कर रहे हैं।, बचपन आज भी भोला और भावुक ही होता है लेकिन हम उन पर ऐसे-ऐसे तनाव और दबाव का बोझ डाल रहे हैं कि वे कुम्हला रहे हैं। उनकी खनकती-खिलखिलाती किलकारियाँ बरकरार रहें इसके ईमानदार प्रयास हमें ही तो करने हैं। देश के ये गुलाबी नवांकुर कोमल बचपन की यादें सहेजें, इसके लिए जरूरी है कि हम उन्हें कठोर और क्रूर नहीं बल्कि मयूरपंख सा लहलहाता बचपन दें।, चाचा नेहरू को दो बातें बहुत पसंद थी पहली वे अपनी शेरवानी की जेब में रोज गुलाब का फूल रखते थे और दूसरी वे बच्चों के प्रति बहुत ही मानवीय और प्रेमपूर्ण थे। यह दोनों ही बातें उनमें कोमल हृदय है इस बात की सूचना देते हैं। बच्चों को वैसे ही लोग प्रिय है, जो गुलाब या कमल के समान हो।,

हर वर्ष बचपन की यादों को ताजा करने के लिए बाल दिवस का आयोजन किया जाता है। यह दिन हमें सिखाता है कि एक निर्दोष और जिज्ञासु बच्चे की तरह हमें सदैव खुश रहना चाहिए और हमेशा सीखने की कोशिश करते हुए मुस्कुराते रहना चाहिए। यह बच्चों के लिए उल्लास में डूब जाने का दिन है। स्कूलों में भी यह दिन बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। संपूर्ण भारत में इस दिन स्कूलों में प्रश्नोतरी, फैंसी परिधान प्रतियोगिता और बच्चों की कला प्रदर्शनियों जैसे कई विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

                                                        

जिग्मे सिंगये वांगचुक : भूटान के आधुनिक निर्माण के शिल्पकार

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भूटान के पूर्व राजा जिग्मे सिंगये वांगचुक (K4) ने अपने दूरदर्शी नेतृत्व से देश को आधुनिकता, लोकतंत्र और सांस्कृतिक संरक्षण के संतुलन पर खड़ा किया। उन्होंने सकल राष्ट्रीय सुख को विकास का मूल दर्शन बनाया और भारत के साथ जलविद्युत कूटनीति के माध्यम से आर्थिक आत्मनिर्भरता की नींव रखी। भारत-भूटान संबंधों को उन्होंने पारस्परिक विश्वास और सुरक्षा सहयोग पर आधारित मॉडल साझेदारी में रूपांतरित किया। उनके शासन ने सिद्ध किया कि छोटे राष्ट्र भी संतुलित नीतियों, पर्यावरणीय चेतना और पड़ोसी सहयोग के माध्यम से समृद्ध, स्थिर और सशक्त बन सकते हैं।

दूरदर्शी नेतृत्व जिसने सकल राष्ट्रीय सुख को विकास का आधार बनाया, जलविद्युत कूटनीति से आत्मनिर्भरता दी, और भारत-भूटान संबंधों को स्थायी सुरक्षा-सहयोग की नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

– डॉ सत्यवान सौरभ

भूटान का इतिहास एक ऐसे अद्भुत शासक की गवाही देता है जिसने न केवल अपने देश को आधुनिकता के मार्ग पर अग्रसर किया, बल्कि उस आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को भी सुरक्षित रखा जिसने उसे एक विशिष्ट राष्ट्र के रूप में पहचान दी। यह शासक थे चतुर्थ राजा जिग्मे सिंगये वांगचुक (K4), जिन्होंने 1972 से 2006 तक शासन किया। उन्होंने ऐसे समय में राजगद्दी संभाली जब भूटान एक सीमित संसाधनों वाला, आंतरिक रूप से बंद और बाहरी दुनिया से अपेक्षाकृत दूर देश था। परंतु उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने इस छोटे हिमालयी राष्ट्र को स्थिर, समृद्ध और आत्मनिर्भर लोकतंत्र में बदल दिया।

राजा जिग्मे सिंगये वांगचुक की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने विकास को केवल आर्थिक प्रगति से नहीं जोड़ा, बल्कि उसे मानवीय, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संतुलन से परिभाषित किया। उन्होंने “सकल राष्ट्रीय सुख (Gross National Happiness)” की अवधारणा दी, जिसने भूटान के शासन, नीति निर्माण और सामाजिक जीवन का मूल दर्शन बनकर कार्य किया। इस विचार में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि विकास का मापदंड केवल धन-संपत्ति नहीं, बल्कि लोगों का मानसिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संतुलन भी होना चाहिए। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि भूटान के आधुनिकीकरण की गति परंपराओं को निगल न जाए, बल्कि उनसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़े।

राजा वांगचुक ने भूटान को पूर्ण राजतंत्र से लोकतांत्रिक संवैधानिक शासन में रूपांतरित करने की ऐतिहासिक प्रक्रिया शुरू की। उन्होंने 2001 में भूटान का संविधान तैयार करवाया, जो 2008 में लागू हुआ। यह दुनिया में दुर्लभ उदाहरण है जब किसी राजा ने स्वयं अपने अधिकार सीमित कर लोकतांत्रिक संस्थाओं को शक्ति सौंपी। 2006 में उन्होंने स्वेच्छा से अपने पुत्र जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक के पक्ष में सिंहासन छोड़ दिया, यह दिखाते हुए कि सत्ता का वास्तविक उद्देश्य जनकल्याण है, न कि अधिकारों का संचय। इस परिवर्तन ने भूटान को एक स्थायी लोकतंत्र, पारदर्शी शासन और संस्थागत जवाबदेही की दिशा में अग्रसर किया।

आर्थिक दृष्टि से भी जिग्मे सिंगये वांगचुक का काल भूटान के इतिहास में परिवर्तनकारी रहा। उन्होंने देश के सीमित संसाधनों को सही दिशा में उपयोग कर विकास का आत्मनिर्भर मॉडल तैयार किया। भूटान ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क संपर्क जैसी बुनियादी सेवाओं में उल्लेखनीय सुधार किए। भारतीय सीमा सड़क संगठन (Border Roads Organisation) के सहयोग से भूटान के दुर्गम इलाकों में सड़कें और पुल बने, जिससे न केवल व्यापार और आवागमन बढ़ा बल्कि सीमाई सुरक्षा भी सुदृढ़ हुई। यह भूटान के ग्रामीण विकास और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की दिशा में एक निर्णायक कदम था।

परंतु K4 का सबसे उल्लेखनीय योगदान रहा भारत-भूटान संबंधों का सुदृढ़ीकरण। उन्होंने यह समझा कि भूटान की भौगोलिक स्थिति—भारत और चीन के बीच—एक रणनीतिक संवेदनशीलता का क्षेत्र है। अतः उन्होंने भारत के साथ पारस्परिक विश्वास और सहयोग पर आधारित संबंधों को प्राथमिकता दी। भूटान की विदेश नीति का प्रमुख स्तंभ बना भारत के साथ “विश्वास आधारित साझेदारी”, जो आज भी दक्षिण एशिया में द्विपक्षीय संबंधों का आदर्श उदाहरण मानी जाती है।

इसी साझेदारी का सबसे प्रभावी रूप रहा जलविद्युत कूटनीति (Hydropower Diplomacy)। भूटान की प्राकृतिक संपदा में सबसे बड़ा संसाधन उसकी नदियाँ हैं, जिनमें अपार जलविद्युत क्षमता निहित है। राजा वांगचुक ने बहुत पहले यह पहचान लिया था कि यही संसाधन भूटान की आत्मनिर्भरता और भारत-भूटान आर्थिक साझेदारी की रीढ़ बन सकता है। इस सोच के परिणामस्वरूप भारत और भूटान ने मिलकर कई प्रमुख परियोजनाएँ शुरू कीं—चुखा (1988), कुरिचू (2001), ताला (2006)—जो भारत द्वारा वित्तपोषित और तकनीकी रूप से सहयोगित थीं। इन परियोजनाओं से उत्पन्न बिजली भारत को निर्यात की गई और उसी राजस्व से भूटान ने अपने सामाजिक विकास कार्यक्रम चलाए।

इस प्रकार जलविद्युत कूटनीति ने दोनों देशों को आर्थिक रूप से एक-दूसरे से जोड़ दिया। भारत को स्वच्छ ऊर्जा का विश्वसनीय स्रोत मिला और भूटान को स्थायी आय का साधन। यह संबंध केवल आर्थिक नहीं था, बल्कि राजनीतिक विश्वास और भौगोलिक स्थिरता का भी प्रतीक था। आज भी भूटान की राष्ट्रीय आय का लगभग 25% हिस्सा जलविद्युत निर्यात से आता है और इसका अधिकांश भारत को जाता है। इस मॉडल ने दिखाया कि क्षेत्रीय साझेदारी केवल व्यापारिक हित नहीं, बल्कि सतत विकास और पर्यावरणीय संतुलन के माध्यम से भी आगे बढ़ सकती है।

जिग्मे सिंगये वांगचुक की नीतियों ने भारत-भूटान सुरक्षा सहयोग को भी नई गहराई दी। भूटान की उत्तरी सीमाएँ चीन से लगती हैं, जहाँ कई बार सीमा विवाद और घुसपैठ की घटनाएँ हुई हैं। K4 ने इस संभावित खतरे को समय रहते भाँप लिया और भारत के साथ सामरिक सहयोग को सुदृढ़ किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि भूटान कभी भी किसी तीसरे देश के लिए भारत विरोधी गतिविधियों का अड्डा न बने। 2003 में उन्होंने भारतीय विद्रोही संगठनों — ULFA, NDFB और KLO — के ठिकानों के खिलाफ ‘ऑपरेशन ऑल क्लियर’ चलाया और उन्हें भूटान से बाहर कर दिया। यह एक साहसिक कदम था जिसने भूटान की संप्रभुता और भारत के प्रति उसकी निष्ठा को प्रमाणित किया।

सुरक्षा क्षेत्र में यह सहयोग केवल सैन्य नहीं बल्कि रणनीतिक भी था। भारत ने भूटान की सेना को प्रशिक्षण, उपकरण और बुनियादी ढाँचा प्रदान किया। सीमा इलाकों में संयुक्त निगरानी और खुफिया साझेदारी ने दोनों देशों को क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में मदद की। यह सहयोग बाद के वर्षों में डोकलाम (2017) जैसे संकटों में और अधिक महत्वपूर्ण साबित हुआ, जब दोनों देशों ने एक-दूसरे के रणनीतिक हितों की रक्षा में एकजुट होकर कार्य किया।

राजा वांगचुक की दूरदर्शिता ने यह भी सुनिश्चित किया कि भूटान की विदेश नीति “संतुलन” पर आधारित रहे — जहाँ भारत प्राथमिक साझेदार है, वहीं भूटान ने अपनी सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विशिष्टता को भी सुरक्षित रखा। उन्होंने अपने शासनकाल में चीन के साथ संवाद के कुछ सीमित प्रयास किए, परंतु भारत के हितों को कभी भी हानि नहीं पहुँचने दी। यह संतुलन आज भी भूटान की विदेश नीति की पहचान है।

उनकी नीतियों के कारण भारत और भूटान के बीच केवल सरकार-से-सरकार का नहीं, बल्कि “जन-से-जन संबंध (People-to-People Relations)” का भी विस्तार हुआ। भूटान में भारत शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, जलविद्युत और आईटी जैसे क्षेत्रों में सबसे बड़ा विकास सहयोगी बना। भूटान के युवा भारत में शिक्षा प्राप्त करते हैं, और दोनों देशों के लोगों में सांस्कृतिक निकटता का भाव है।

भूटान के लोकतांत्रिक संक्रमण के बाद भी K4 की भूमिका परामर्शदाता और मार्गदर्शक के रूप में बनी रही। वर्तमान राजा जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक (K5) ने अपने पिता की नीतियों को आगे बढ़ाते हुए भारत के साथ संबंधों को और गहरा किया। 2025 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भूटान के दौरे पर गए, तो उन्होंने K4 के 70वें जन्मदिन समारोह में भाग लिया — यह इस संबंध की गहराई और निरंतरता का प्रतीक है।

आज जब भारत अपने “पड़ोसी प्रथम (Neighbourhood First)” नीति के तहत क्षेत्रीय साझेदारी को प्राथमिकता दे रहा है, भूटान इसके केंद्र में है। भारत के लिए भूटान न केवल रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में उस दुर्लभ पड़ोसी का उदाहरण है जहाँ विश्वास, समानता और आपसी सम्मान के आधार पर संबंध कायम हैं।

भूटान के लिए भी भारत केवल एक आर्थिक भागीदार नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और सुरक्षा गारंटी का प्रतीक है। जलविद्युत कूटनीति के माध्यम से जहाँ आर्थिक परस्परता मजबूत हुई, वहीं सुरक्षा सहयोग के कारण सीमाई स्थिरता बनी रही। इस संतुलन ने भूटान को एक “सॉफ्ट पावर” राष्ट्र के रूप में पहचान दी, जिसने विकास और आध्यात्मिकता को जोड़कर दुनिया के सामने एक वैकल्पिक विकास मॉडल प्रस्तुत किया।

राजा जिग्मे सिंगये वांगचुक ने यह सिद्ध किया कि छोटे देश भी यदि दूरदृष्टि, स्थिर नेतृत्व और संतुलित कूटनीति अपनाएँ तो वे न केवल आत्मनिर्भर बन सकते हैं बल्कि अपने बड़े पड़ोसियों के साथ समानता पर आधारित संबंध भी स्थापित कर सकते हैं। भूटान का लोकतांत्रिक और आर्थिक उत्थान इसी नेतृत्व की विरासत है।

अंततः कहा जा सकता है कि K4 ने भारत-भूटान संबंधों को “विकास और सुरक्षा साझेदारी (Development-Security Partnership)” में रूपांतरित किया। जहाँ जलविद्युत परियोजनाएँ आर्थिक समृद्धि का आधार बनीं, वहीं रक्षा और सीमाई सहयोग ने राजनीतिक स्थिरता को सुनिश्चित किया। उनका शासन इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता और परंपरा, लोकतंत्र और राजतंत्र, आत्मनिर्भरता और साझेदारी — सभी एक साथ अस्तित्व में रह सकते हैं यदि नेतृत्व में दूरदर्शिता और निस्वार्थता हो।

आज भूटान दुनिया का एकमात्र “कार्बन-ऋणात्मक (Carbon Negative)” देश है, जहाँ विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना हुआ है। यह उस सोच का परिणाम है जो K4 ने दशकों पहले बोई थी। उन्होंने न केवल भूटान की भौगोलिक सीमाओं को सुरक्षित किया, बल्कि उसकी आत्मा को भी संरक्षित रखा। भारत-भूटान संबंधों की यह जीवंत परंपरा, उनकी दी हुई विरासत है—विश्वास, सहयोग और साझा समृद्धि की अमिट कहानी।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,