मैडलिन स्लैड उर्फ मीरा बेन का जन्म 22 नवम्बर 1892 में इंग्लैंण्ड में हुआ था। वे एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी की बेटी थीं। इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गाँधी जी के सिद्धांतों से प्रभावित होकर खादी का प्रचार किया था। नि:स्वार्थ उनके आदर्शों पर चलकर खादी अपनाना, पहनना और उसका प्रचार-प्रसार करना किसी विदेशी द्वारा हो तो निश्चित ही सराहनीय है। गांधीजी को मीरा बेन एक बहन, एक बेटी, एक मित्र से भी बढ़कर मिलीं, उनका हर कदम पर साथ दिया और सहारा बनीं।
इनके पिता का नाम ‘ऐडमिरल सर ऐडमंड स्लेड’ था, जो मुम्बई में ‘ईस्ट इण्डिया स्क्वैड्रन’ में कार्यरत थे। मीरा बेन ने गाँधी जी के सिद्धांतों से प्रभावित होकर भारत में विभिन्न स्थानों पर जाकर खादी का प्रचार किया। मीरा बेन ने मानव विकास, गांधी जी के सिद्धांतों की उन्नति और स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। ऐसा करते देख गाँधी जी ने उन्हें मीरा बेन नाम दिया। यह नाम भगवान कृष्ण की भक्त मीरा बाई से मेल खाता था। गांधीजी के विचारों को मानने वाली मीरा बेन सादी धोती पहनती थीं, सूत कातती, गांव-गांव घूमतीं।
वह अंग्रेज़ थीं लेकिन हिंदुस्तान की आजादी के पक्ष में थीं। गांधी का अपनी इस विदेशी पुत्री पर विशेष अनुराग था। मैडलिन स्लैड जब साबरमती आश्रम में बापू से मिलीं तो उन्हें लगा कि जीवन की सार्थकता दूसरों के लिए जीने में ही है। वह गुजरात के साबरमती आश्रम में रहने लगीं।
बचपन से ही सादे जीवन से उन्हें प्यार था। वह प्रकृति से प्रेम करती थीं तथा संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। ‘बिथोवेन’ का संगीत उन्हें बहुत पसंद था। मैडलिन स्लैड बचपन में एकाकी स्वभाव की थीं, स्कूल जाना तो पसंद नहीं था लेकिन अलग-अलग भाषा सीखने में रुचि थी। उन्होंने फ्रेंच, जर्मन और हिंदी समेत अन्य भाषाएं सीखीं। गांधी पर लिखी गयी रोम्या रोलां की पुस्तक पढ़कर स्लैड को गांधी के विराट व्यक्तित्व के बारे में पता चला।
मीरा गांधी के नेतृत्व में लड़ी जा रही आजादी की लड़ाई में अंत तक उनकी सहयोगी रहीं। इस दौरान नौ अगस्त, 1942 को गांधी जी के साथ उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। आगा खां हिरासत केंद्र में मई, 1944 तक रखा गया। परंतु उन्होंने गांधी जी का साथ नहीं छोड़ा। 1932 के द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में वह महात्मा गांधी के साथ थीं। महात्मा गांधी के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में किये सुधारात्मक और रचनात्मक कार्यों में मीरा की अहम भूमिका थी। वे सेवा बस्तियों और पिछड़े वर्ग के लोगों में जाकर नि:संकोच स्वयं सफाई कार्य करतीं।
सेवाग्राम की ‘बापू कुटी’ देश की धरोहर है। देश-विदेश के सैकड़ों दर्शनार्थी यहां आते हैं। वे बापू के जीवन-दर्शन को समझते हैं। सेवाग्राम स्थित बापू की कुटी में महात्मा गांधी 1936 से 1946 तक रहे। शेगांव यानी सेवाग्राम में बापू कुटी का निर्माण मीराबेन ने किया। सेवाग्राम स्थित बापू की कुटी स्थापना के समय महात्मा गांधी का आसन, दफ्तर, भोजन कक्ष आदि कहां होना चाहिए इसी तरह की दिनचर्या के कामकाज की बातों को ध्यान में रखकर बापू की कुटी को वर्ष 1936 में साकार किया गया।
बुनियादी शिक्षा, अस्पृश्यता निवारण जैसे कार्यों में गांधी के साथ मीरा की अहम भूमिका रही।
बापू के निधन के बाद भी मीरा उनके विचार और कार्यों के प्रसार में जुटी रहीं, जिसके चलते 1982 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। भारत के प्रति मीरा बेन का लगाव इतना था कि वह भारत को अपना देश और इंगलैंड को विदेश मानती थीं। मीरा बेन के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए ‘इंडियन कोस्ट गार्ड’ ने नए गश्ती पोत का नाम उनके नाम पर रखा है।
गांधी जी की हत्या के बाद 18 जनवरी 1959 को मीराबेन भारत छोड़कर विएना चली गयीं। 20 जुलाई 1982 को उनका निधन हो गया।
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में आज रुपया 88.67 पर खुला और 82 पैसे गिरकर 89.50 के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। बाजार बंद होने के दौरान यह अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले 89.40 पर कारोबार करता दिखा। गुरुवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 20 पैसे गिरकर 88.68 पर बंद हुआ ।
घरेलू और वैश्विक शेयर बाजारों से नकारात्मक संकेतों के बीच शुक्रवार को कारोबार के दौरान रुपये में तीन महीने से अधिक समय में सबसे बड़ी एक दिन की गिरावट देखी गई। इस गिरावट के बाद रुपया पहली बार 89 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया। रुपये में 78 पैसे की गिरावट आई और यह 89.46 रुपये प्रति डॉलर पर कारोबार करता दिखा।
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 88.67 पर खुला और 82 पैसे गिरकर 89.50 के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। बाजार बंद होने के दौरान यह अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले 89.40 पर कारोबार करता दिखा। गुरुवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 20 पैसे गिरकर 88.68 पर बंद हुआ था।
दिल्ली। दुबई एयर शो में प्रदर्शन के दौरान शुक्रवार को एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। भारतीय तेजस विमान स्थानीय समयानुसार दोपहर करीब 2:10 बजे एक प्रदर्शन उड़ान के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हुआ ।
स्थानीय समय अनुसार दोपहर 2:10 बजे तेजस एम के-1 प्रदर्शन के दौरान डेमो उड़ान भर रहा था, तभी अचानक विमान अनियंत्रित हो गया और नीचे गिर कर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान के जमीन से टकराते ही जोरदार धमाका हुआ और कुछ ही पलों में काले धुएं का गुबार हवा में फैल गया। विमान के चालक के भी शहीद होने की सूचना है।
वहां मौजूद सुरक्षा एजेंसियों ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया। बड़ी संख्या में लोग दुबई एयर शो देखने आए थे।भीड़ ने विमान को नीचे गिरते देखा और फिर अचानक उठते धुएं के कारण अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
दुबई की स्थानीय मीडिया के मुताबिक प्र हादसे के तुरंत बाद हेलिकॉप्टर्स और फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंच गए और आग पर काबू पाया गया। करीब 45 मिनट में पूरे घटनाक्रम को संभाल लिया गया। कार्यक्रम दोबारा शुरू होगा या नहीं, इस पर अभी स्पष्ट जानकारी नहीं है।
एयर शो अधिकारियों ने दुर्घटना वाले क्षेत्र को तुरंत सील कर दिया । सभी उड़ान कार्यक्रम अस्थायी रूप से रोक दिए। विमान दुर्घटना के कारणों का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी गई है। भारतीय पक्ष की ओर से भी संपर्क और जानकारी जुटाने की प्रक्रिया जारी है।
‘द फ्यूचर इज हियर’ थीम के तहत यह एयर शो 17 से 21 नवंबर तक दुबई वर्ल्ड सेंट्रल में आयोजित हो रहा है। यह दुबई एयर शो का 19वां संस्करण है। इस बार 200 से अधिक विमानों का रिकॉर्ड प्रदर्शन किया जा रहा। इसमें कमर्शियल, मिलिट्री, प्राइवेट जेट, यूएवी और नई पीढ़ी की एयरोस्पेस तकनीकें शामिल हैं। यह अब तक का सबसे बड़ा फ्लाइंग और स्टैटिक डिस्प्ले है। आयोजन में 148,000 ट्रेड विजिटर्स और 115 देशों से आए 490 सैन्य और नागरिक प्रतिनिधिमंडल भाग ले रहे हैं।
पूरी तरह स्वदेशी है ताकतवर तेजस हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा विकसित भारतीय वायुसेना का तेजस एम के-1 लड़ाकू विमान पूरी तरह भारत में निर्मित एक आधुनिक फाइटर जेट है। इसे हल्का, तेज और अधिक फुर्तीला बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। यह देश की स्वदेशी रक्षा क्षमता का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। इसके डिजाइन और संरचना में कई उन्नत तकनीकों का समावेश किया गया है।
तेजस 4.5 जनरेशन श्रेणी का विमान है।इसमें आधुनिक एवियोनिक्स, बेहतर हथियार प्रणाली और उत्कृष्ट मैनूवरिंग क्षमताएं शामिल हैं। यह छोटा और हल्का होने के बावजूद सुपरसोनिक गति से उड़ान भरने की क्षमता रखता है। इसकी गति, फुर्ती और तकनीकी विशेषताएं इसे भारतीय वायुसेना के बेड़े में एक शक्तिशाली और भरोसेमंद लड़ाकू विमान बनाती हैं।
आजकल देशभर में प्री-वेडिंग शूट का एक चलन बढ़ता ही जा रहा है। पिछले कुछ सालों में प्री वेडिंग शूट शादी की फोटो एल्बम बनाने से ज्यादा ज़रुरी बन चुके हैं। प्री वेडिंग देश में एक लक्जरी इंडस्ट्री के रूप में उभर रहा है जो अपने बजट के हिसाब से किसी पार्क, रमणिक स्थल या किसी खूबसूरत स्थान पर ये शूट किए जाने लगे हैं। इसके तहत भावी दूल्हा- दुल्हन अपने परिवारजनो की सहमति से शादी से पूर्व फ़ोटो ग्राफर के साथ देश के अलग-अलग स्थानों पर सैर सपाटा करते हैं, बड़े होटलो, हेरिटेज बिल्डिंगों, समुद्री बीच व अन्य ऐसी जगहों पर जहाँ सामान्यतः पति पत्नी शादी के बाद हनीमून मनाने जाते है, जाकर अलग- अलग और कम से कम परिधानों में एक दूसरे की बाहो में समाते हुए वीडियो शूट करवाते है। विवाह से पहले किया जाने वाला वह फोटो/वीडियो ग्राफी जिसमें होने वाले भावी दंपति अपने विवाह से पहले, एक प्रेमी जोड़े की भांति फोटो और वीडियो शूट करवाते हैं। जिसे वे मुख्य शादी वाले दिन बड़ी स्क्रीन पर एक शॉर्ट फिल्म के रूप में पेश करते हैं और सोशल मीडिया पर भी बड़े ही उत्साह के साथ पोस्ट करते हैं। इसे ही वीडियो शूट की संज्ञा दी जा रही है। इस प्रकार के आयोजन पर हजारों लाखों का खर्चा भी किया जाने लगा है। मीडिया ख़बरों के अनुसार विवाह से पहले इस प्रकार के प्रचलन से समाज में कई प्रकार की समस्याएं उभरने लगी हैं। बहुत से परिवार इस खर्चे को सहन करने की स्थिति में नहीं होते है मगर आपसी दवाब के आगे झुक जाते है। विभिन्न रिपोर्टों में प्री-वेडिंग शूट को निजता का उल्लंघन बताते हुए इसे अनावश्यक खर्च और पारिवारिक तनाव का कारण बताया जाकर लोगों को सावचेत किया जा रहा है। समाज इसे स्टेटस सिंबल के रूप में देखता है, जो मर्यादा को कम करता है। शादी को सादगी और भारतीय परंपराओं के अनुरूप मनाना चाहिए। कुछ जागरूक संगठनों ने प्री-वेडिंग शूट जैसी कुरीतियों को रोकने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि विवाह एक पवित्र बंधन है, जो दो परिवारों और आत्माओं का मिलन है न कि दिखावे का जरिया।
शादी से पहले प्री वेडिंग को लेकर हमारे समाज में तरह तरह की बातें सुनने को मिल रही है। वह भी एक समय था जब विवाह के दौरान फोटो खिंचवाकर उसे एल्बम में संजो कर रखते थे। इस एल्बम का क्रेज कुछ दिनों तक रहता और बाद में कहीं रखकर इसे भुला दिया जाता। समय बदला और अब हम डिजिटल युग में प्रवेश कर चुके है। कुछ समय पहले तक हम एल्बम के साथ वीडियो बनाकर अपने पास रख लेते थे। इस वीडियो को यदा कदा देख लेते थे। मगर अब हमारा डिजिटलीकरण हो चुका है और इसी के साथ प्री वेडिंग के नाम से एक नई प्रथा शुरू हो गई है। अब जमाना सोशल मीडिया का है। युवा अपनी हर घटना को सोशल मीडिया पर परोसने लगा है तो प्री वेडिंग कैसे पीछे रहता। अब प्री वेडिंग भी सोशल मीडिया पर देखी जाने लगी है। प्री वेडिंग के वीडियो और फोटो देखकर सामान्य परिवारों में काफी हलचल देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे पसंद कर रहे है तो कुछ ना पसंद कर रहे है। यहीं से इसके समर्थन और विरोध में आवाजें बुलंद होने लगी है। कुछ सामाजिक संगठन इसे देश की संस्कृति के खिलाफ बता कर विरोध जता रहे है।
बताया जाता है प्री-वेडिंग शूट एक पाश्चात्य संस्कृति है। जो पिछले कुछ दशक से भारत में भी घर घर जगह बना रही है। प्री-वेडिंग शूट की कहानी भी बड़ी अजब गजब है। कई परिवारों में तनाव का एक कारण भी इसे बताया जा रहा है। शादी के पहले ही भावी दुल्हन और दूल्हा फिल्मी अंदाज में एक-दूसरे के साथ नजर आते हैं। वे स्वयं को एक अभिनेता और अभिनेत्री की भांति दिखाने की हर संभव कोशिश करते हैं। चाहे उन्हें अर्धनग्न वस्त्र ही क्यों ना पहनने पड़े। हालांकि कुछ जोड़ों ने अपने प्री-वेडिंग शूट को नया रूप देने के लिए धार्मिकता से भी जोड़कर बनाया है। यह भी देखा जाता है कि कुछ जोड़े प्री-वेडिंग शूट के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर भी शूट करवाते हैं। ऐसे दो मामलों में उनकी जान भी जा चुकी है। अपनी शादी को यादगार बनाने और उसे कैमरे में कैद कर सार्वजनिक स्थल में परोसने की प्रवृत्ति कहीं न कहीं भारतीय समाज में पारिवारिक रिश्तों को तार तार कर रही है। इस परंपरा को रोकना आवश्यक है ताकि विवाह के नाम पर युवक युवती द्वारा फूहड़ प्रदर्शन का विपरीत असर सभ्य समाज पर न पड़े। कुछेक मामलों में ये उल्टा पड़ जाता है जब किसी वजह से शादी ही टूट जाए, लेकिन आज की जेनरेशन ये रिस्क लेने के लिए तैयार लगती है। भारतीय परपराओं के अनुसार प्री वेडिंग शूट गलत है। विवाह से पहले प्री वेडिंग शूट के बहाने इस प्रकार युवक युवती का मिलना समाज के लिए कतई शोभनीय है।
विश्व हैपीनेस रिपोर्ट की सीमाएँ और भारत में सहानुभूति–ढाँचे की अनिवार्यता
विश्व हैपीनेस रिपोर्ट में भारत की निम्न रैंकिंग अक्सर वास्तविक कल्याण स्थिति से अधिक सांस्कृतिक तथा धारणा-आधारित पूर्वाग्रहों को दर्शाती है। सुख मापने की पद्धति में निहित सीमाओं को समझते हुए भारत को अपने सामाजिक, संवेदनात्मक और सामुदायिक ढाँचे में सहानुभूति-आधारित सुधारों को बढ़ाना चाहिए।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
विश्व हैपीनेस रिपोर्ट हर वर्ष किसी देश की सुख-संतुष्टि का आकलन प्रस्तुत करती है। किंतु भारत जैसे विशाल, विविध और सांस्कृतिक रूप से जटिल देश के लिए यह रिपोर्ट कई बार उस यथार्थ को उजागर नहीं कर पाती जो समाज के भीतर गहरे स्तर पर मौजूद है। भारत की रैंकिंग अक्सर सौ से ऊपर दिखाई देती है, जबकि इसी अवधि में भारत ने स्वास्थ्य, पोषण, सामाजिक सुरक्षा, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, संरचनात्मक सुधारों और गरीबी कमी जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ दर्ज की हैं। यह विरोधाभास एक नैसर्गिक प्रश्न खड़ा करता है—क्या किसी देश के “सुख” को केवल सर्वेक्षण-आधारित दृष्टिकोण से समझा जा सकता है? और क्या यह मापन भारतीय जीवन-मूल्यों और सामाजिक वास्तविकताओं को पकड़ने में सक्षम है?
विश्व हैपीनेस रिपोर्ट का आधार मुख्यतः स्व-आकलन है। सर्वेक्षणकर्ता उत्तरदाताओं से पूछते हैं कि वे जीवन को दस-स्तरीय सीढ़ी में कहाँ रखते हैं। यह “सीढ़ी-संबंधी मूल्यांकन” पश्चिमी मनोविज्ञान में प्रयुक्त उस विचार पर आधारित है जिसमें सुख को व्यक्तिगत प्राप्तियों और परिस्थितियों के आधार पर मापा जाता है। परन्तु भारतीय समाज में सुख की अवधारणा केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामुदायिक, आध्यात्मिक और पारिवारिक आयामों से भी गहराई से जुड़ी होती है। भारतीय संस्कृति में संतोष, कर्तव्य, परस्पर सहायता, संबंधों की स्थिरता और आध्यात्मिक संतुलन भी सुख का महत्वपूर्ण आधार माने जाते हैं। इसलिए जब एक भारतीय उत्तरदाता से पूछा जाता है कि वह दस में से अपने जीवन को कितने अंक देगा, तो उसके भीतर कई सांस्कृतिक कारक सक्रिय होते हैं—विनम्रता, शांत-स्वीकृति, परिस्थिति को भाग्य-नियति से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति, या समाज में शिकायत दिखाने से बचना। इसके परिणामस्वरूप अनेक भारतीय अपने जीवन को कम अंक दे सकते हैं, भले ही वे वस्तुतः अनेक स्तरों पर बेहतर स्थिति में हों।
सर्वेक्षण का नमूना आकार भी भारत के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। एक अरब से अधिक जनसंख्या वाले, शहरी और ग्रामीण विविधताओं से भरे देश के लिए मात्र लगभग एक हज़ार लोगों के उत्तर पर आधारित निष्कर्ष असंतुलित हो सकते हैं। भारतीय समाज क्षेत्रीय, भाषायी, आर्थिक तथा सामाजिक स्तरों पर अत्यंत विषम है; एक छोटे नमूने का उपयोग करके उस विविधता का प्रतिनिधित्व संभव नहीं। एक जिले के ग्रामीण किसान की जीवन-संतुष्टि की अवधारणा दिल्ली के शहरी पेशेवर व्यक्ति से भिन्न हो सकती है। फिर भी, दोनों को समान पैमाने पर रखकर किसी राष्ट्रीय “सुख-अंक” की व्याख्या करना वैज्ञानिक रूप से सीमित प्रतीत होता है।
इसके अतिरिक्त रिपोर्ट में प्रयुक्त सुख की अवधारणा भी सांस्कृतिक पक्षपात से प्रभावित है। पश्चिमी ढाँचा सुख को भौतिक उपलब्धियों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रत्यक्ष संतुष्टि से जोड़ता है, जबकि भारतीय समाज में अनेक बार सुख का अर्थ कठिनाइयों के बीच संतुलन बनाए रखना, भावनात्मक सहारा, सामुदायिक सहयोग या आध्यात्मिक शांति से भी जुड़ा होता है। यह अंतर सर्वेक्षणकर्ता की भाषा, शैली, शब्दों और उत्तरदाता के मनोभाव को प्रभावित करता है। अक्सर यह देखा गया है कि भारत के ग्रामीण या अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में उत्तरदाता “जीवन के अंक” को किसी ऐसे प्रश्न की तरह स्वीकार करते हैं जिसमें शिकायत या असंतोष दिखाना उचित नहीं लगता। इसी वजह से कई भारतीय वास्तविक अनुभव होने के बावजूद संतुष्टि को अपेक्षाकृत कम आंकते हैं, जिससे परिणाम और अधिक विकृत होते हैं।
इसके विपरीत, भारत ने बीते वर्षों में सामाजिक कल्याण में कई बड़े परिवर्तन किए हैं। करोड़ों लोगों तक निःशुल्क खाद्यान्न पहुँचाना, सर्वजन स्वास्थ्य बीमा जैसी योजनाओं के माध्यम से आधारभूत सुरक्षा सुनिश्चित करना, ग्रामीण आजीविका कार्यक्रमों में विस्तार, शिक्षा तथा महिला-शिशु पोषण कार्यक्रमों में बढोत्तरी—ये सब समग्र जीवन-गुणवत्ता को बढ़ाने वाले उपाय रहे हैं। किन्तु अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें इन संकेतकों को केवल सीमित रूप से जोड़ती हैं, क्योंकि उनका मूल केंद्र “अनुभूत संतुष्टि” पर आधारित है, न कि “वस्तुनिष्ठ कल्याण” पर। यही कारण है कि वस्तुनिष्ठ रूप से बेहतर होती सुविधाएँ भी रिपोर्ट में पर्याप्त रूप से उजागर नहीं हो पातीं। भारत में गरीबी में कमी और स्वास्थ्य-सेवाओं की पहुँच में वृद्धि ने जीवन को अधिक सुरक्षित और स्थिर बनाया है, परन्तु सुख-सर्वेक्षण इस सकारात्मक परिवर्तन को मापने में अक्षम रहते हैं।
ऐसे में, प्रश्न यह उठता है कि भारत को अपने भीतर ऐसा क्या बदलना चाहिए जिससे समाज अधिक भावनात्मक रूप से सुरक्षित, सहानुभूतिपूर्ण और संतुलित बन सके। इसका उत्तर “सहानुभूति संरचना”—एक व्यापक सामाजिक ढाँचा है जिसमें राज्य, समाज, संस्थान और समुदाय मिलकर नागरिकों को भावनात्मक सुरक्षा, मानसिक सहारा, संवाद और सहायता प्रदान करें। इस ढाँचे का पहला स्तंभ मानसिक-स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार है। भारत में मानसिक-स्वास्थ्य को लेकर अभी भी कई भ्रम और कलंक मौजूद हैं। लोग सहायता लेने में संकोच करते हैं, और प्राथमिक चिकित्सा ढाँचे में मानसिक स्वास्थ्य की अनुपस्थिति समस्या को बढ़ाती है। यदि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रशिक्षित परामर्शदाता हों, दूरभाष-आधारित सेवाएँ व्यापक हों और विद्यालयों-कॉलेजों में मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध हो, तो समाज में भावनात्मक असुरक्षा घट सकती है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू समुदाय-आधारित सहयोग है। भारतीय संस्कृति में पड़ोस, परिवार और सामाजिक संबंधों की शक्ति अत्यधिक रही है, परन्तु शहरीकरण और व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा के कारण यह संरचना कमजोर हो रही है। यदि स्थानीय समुदायों में संवाद-चक्र, सहारा-समूह, वरिष्ठ नागरिक सहायता-केंद्र, महिलाओं के लिए सुरक्षित समुदाय-स्थल और युवाओं के लिए साझा सहयोग मंच विकसित किए जाएँ, तो सामाजिक एकांत कम हो सकता है। सहानुभूति तभी विकसित होती है जब लोग एक-दूसरे के जीवन में उपस्थिति का अनुभव करें।
सहानुभूति संरचना का तीसरा स्तंभ कार्यस्थल है। कार्यस्थलों पर तनाव, प्रतिस्पर्धा, लक्ष्य-दबाव और असुरक्षा बढ़ रही है, जिसके चलते कर्मचारियों का मानसिक संतुलन प्रभावित होता है। यदि संस्थान संवेदनशील नीति अपनाएँ—कार्य अवधि में लचीलापन, परामर्श सेवाएँ, साथी-सहयोग कार्यक्रम, नेतृत्व प्रशिक्षण में सहानुभूति-आधारित व्यवहार—तो यह वातावरण को स्वस्थ बना सकता है। एक सहानुभूतिपूर्ण संस्थागत संस्कृति न केवल कर्मचारी के मनोबल को बढ़ाती है बल्कि उत्पादकता भी बढ़ाती है।
चौथा आयाम विद्यालयों में भावनात्मक शिक्षा का है। बच्चों में सहानुभूति, अहिंसक संवाद, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सहयोगात्मक गतिविधियों को प्राथमिकता देना आवश्यक है। यदि बच्चे अपनी भावनाएँ समझना, व्यक्त करना और दूसरों की भावनाओं को पहचानना सीखें, तो समाज भविष्य में अधिक संवेदनशील बनेगा। शैक्षणिक ढाँचा केवल परीक्षा-आधारित न रहकर जीवन-आधारित होना चाहिए।
पाँचवाँ पक्ष तकनीकी सहारा है। यदि तकनीक का उपयोग मानसिक-स्वास्थ्य और भावनात्मक सहयोग के लिए किया जाए—जैसे परामर्श ऐप, संकट में सहायता, छात्रों और युवाओं के लिए डिजिटल संवाद केंद्र—तो यह सहानुभूति संरचना को व्यापक बना सकता है। तकनीक का जिम्मेदार उपयोग सामाजिक संवेदनशीलता को बढ़ावा दे सकता है, बशर्ते उसकी निगरानी और नैतिकता मजबूत हो।
अंततः, राज्य के प्रशासनिक ढाँचे में भी सहानुभूति की आवश्यकता है। जब सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों, परिवहन, सुरक्षा और न्याय-प्रणाली में कार्यरत लोग नागरिकों के प्रति अधिक करुणामय व्यवहार अपनाएँ, तो नागरिक-राज्य संबंध और भी मजबूत होते हैं। जनता की समस्याओं को सुनना, सम्मान देना और समाधान में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना किसी भी लोकतंत्र की मजबूती का आधार है।
इस प्रकार विश्व हैपीनेस रिपोर्ट में भारत की रैंकिंग उसे केवल नकारात्मक दृष्टिकोण से देखने के बजाय एक अवसर के रूप में समझा जाना चाहिए। यह अवसर भारतीय समाज को यह विचार करने का मार्ग देता है कि कैसे हम “सुख” को केवल व्यक्तिगत संतुष्टि के रूप में नहीं, बल्कि सामूहिक भावनात्मक सुरक्षा, सामाजिक भरोसा, संवेदनशील संवाद और मानसिक-स्वास्थ्य संरचना के रूप में विकसित कर सकते हैं। रिपोर्ट की पद्धति में चाहे जितनी सीमाएँ हों, यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि समाज किस दिशा में जाए। भारत यदि अपनी पारंपरिक सामुदायिक शक्ति को आधुनिक सामाजिक-कल्याण ढाँचे के साथ जोड़ दे, तो सहानुभूति-आधारित विकास की एक नई धारा स्थापित हो सकती है, जो वास्तविक सुख को और अधिक सुदृढ़ बनाएगी।
– डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालि
— स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली और भारतीय रिज़र्व बैंक की नई पहलें
रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण भारत को आर्थिक स्वायत्तता, भुगतान सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। इससे डॉलर पर निर्भरता घटती है, भुगतान बाधाएँ कम होती हैं और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घटता है। निर्यातकों को विनिमय दर से जुड़े जोखिम कम होते हैं, जबकि व्यापारिक साझेदारों के लिए भी स्थानीय मुद्रा में निपटान अधिक सरल व स्थिर होता है। स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली, त्वरित भुगतान तंत्र की वैश्विक पहुँच, तथा रुपये आधारित ऋण व्यवस्था जैसे कदम भारत को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अधिक प्रभावशाली भूमिका की ओर अग्रसर करते हैं।
– डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत आज उभरती वैशिक अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण केंद्र बन रहा है और इसी आकांक्षा के साथ वह अपनी मुद्रा—भारतीय रुपये—को अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में अधिक स्वीकार्य बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास कर रहा है। बदलते भू-राजनीतिक वातावरण, डॉलर-निर्भरता से जुड़ी अनिश्चितताओं तथा बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था के उभार ने यह अवसर प्रदान किया है कि भारत क्षेत्रीय और वैशिक व्यापार में रुपये के उपयोग को बढ़ाए। इसी संदर्भ में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली की शुरुआत और इसे अनेक देशों के साथ लागू करने की कोशिश रुपये को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत बनाने वाली निर्णायक पहल बनकर उभरी है।
रुपये के प्रसार के पीछे कई प्रेरक कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है, क्योंकि डॉलर आधारित भुगतान तंत्र अनेक बार राजनीतिक तनाव, प्रतिबंधों और वैशिक वित्तीय अस्थिरता के समय जोखिम पैदा करता है। रूस–यूक्रेन संघर्ष के बाद भारत ने अनुभव किया कि डॉलर आधारित तंत्र के कारण कई लेनदेन बाधित हो जाते हैं और व्यापार प्रभावित होता है। यदि व्यापार सीधे स्थानीय मुद्राओं में हो, तो भुगतान अधिक सुगम और सुरक्षित हो सकता है तथा विदेशी मुद्रा भंडार पर भी अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता। साथ ही, कई देश अब अपने व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के प्रयोग की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे डॉलर-केंद्रित व्यवस्था धीरे-धीरे परिवर्तित हो रही है। भारत भी इस परिवर्तनशील प्रवृत्ति का स्वाभाविक हिस्सा है।
भारत की तीव्र आर्थिक वृद्धि और बढ़ते व्यापारिक संबंध भी रुपये-आधारित निपटान की आवश्यकता को बढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए, भारत–रूस व्यापार पिछले दो दशकों में कई गुना बढ़ा है, परन्तु इस व्यापार में रुपये का उपयोग सीमित है। मुद्रा-आधारित विकल्प बढ़ने से न केवल व्यापार गति पकड़ता है बल्कि भारतीय निर्यातकों को विनिमय दर के उतार–चढ़ाव और हेजिंग लागत से भी राहत मिलती है। दीर्घकाल में वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य मुद्रा भारत की आर्थिक शक्ति और राजनीतिक प्रभाव का संकेत भी बनती है। भारत के 30 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था और 1 खरब डॉलर के निर्यात लक्ष्य की दिशा में यह एक अनिवार्य कदम माना जा रहा है।
हालाँकि, रुपये के वैश्वीकरण के मार्ग में कई चुनौतियाँ भी हैं। अनेक देशों को अभी भी डॉलर या अपनी स्थानीय मुद्रा अधिक स्थिर विकल्प लगती है। कुछ देशों को रुपये की विनिमय दर की स्थिरता पर भरोसा कम है। व्यापारिक साझेदारों के साथ मूल्य-वृद्धि आधारित वस्तुओं का आदान–प्रदान सीमित होने से भी रुपये के व्यापक प्रयोग की संभावना घटती है। भारतीय निर्यातकों में भी रुपये आधारित निपटान के प्रति जागरूकता कम है, जिसके कारण वे इस विकल्प का पूरा लाभ नहीं उठा पाते। अंतरराष्ट्रीय भुगतान और संदेश प्रणाली की सीमित परस्पर संपर्कता भी रुपये की स्वीकार्यता को धीमा करती है, क्योंकि अभी भी बड़ी संख्या में देश पारंपरिक वैश्वीकरण संदेश तंत्र पर निर्भर हैं।
इन चुनौतियों के बीच भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली रुपये को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में बड़ा बदलाव लेकर आई है। इस प्रणाली के अंतर्गत भारत अब संयुक्त रूप से सहमत देशों के साथ सीधे रुपये में व्यापार कर सकता है। संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, मॉरीशस और मालदीव के साथ हुए समझौते इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इससे न केवल दोनों देशों के बीच व्यापार सुगम होगा बल्कि बैंकिंग लागत और भुगतान समय में भी कमी आएगी। इसके अतिरिक्त भारतीय रिज़र्व बैंक ने पड़ोसी देशों के बैंक एवं नागरिकों को रुपये में ऋण देने की अनुमति देकर नेपाल, भूटान और श्रीलंका जैसे देशों में रुपये के उपयोग को बढ़ावा दिया है।
भारत ने अपने त्वरित भुगतान तंत्र को कई देशों से जोड़कर एक नई वित्तीय संपर्क व्यवस्था विकसित की है। संयुक्त अरब अमीरात के साथ त्वरित भुगतान तंत्र का जुड़ना छोटे व्यापारियों, पर्यटकों और प्रवासी भारतीयों के लिए तत्काल भुगतान को सरल बनाता है, जिससे रुपये की उपयोगिता और स्वीकार्यता दोनों बढ़ती हैं। इसके साथ ही भारत अपनी वित्तीय संदेश प्रणाली को भी साझेदार देशों की प्रणालियों से जोड़ने की दिशा में कार्य कर रहा है, जिससे परंपरागत वैश्विक संदेश तंत्र पर निर्भरता कम होगी। यह व्यवस्था भुगतान प्रक्रिया को राजनीतिक तनावों से सुरक्षित रखेगी और रुपये की विश्वसनीयता बढ़ाएगी।
समग्र रूप से रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक आकांक्षा का आधार है। स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली, डिजिटल भुगतान संपर्क, द्विपक्षीय वित्तीय संवाद और निर्यातकों की जागरूकता—ये सभी घटक मिलकर रुपये को वैश्विक व्यापार में अधिक उपयोगी और स्वीकृत मुद्रा बना सकते हैं। चुनौतियाँ अवश्य हैं, परंतु बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत के पास अवसर भी विशाल है। यदि भारत अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ आपूर्ति श्रृंखला को गहरा करे, भुगतान तंत्र को सरल बनाए और रुपये की स्थिरता को मजबूत करे, तो आने वाले वर्षों में रुपये की वैश्विक भूमिका निश्चित रूप से विस्तार पाएगी।
संयुक्त राष्ट्र की ओर से हर साल 21 नवंबर को विश्व टेलीविजन दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें प्रेरित करता है कि हम इस शक्तिशाली माध्यम का सही उपयोग करें और इसे शिक्षा, मनोरंजन एवं जागरूकता के साथ स्वस्थ और सशक्त भारत के निर्माण का एक सशक्त स्रोत बनाएं। निश्चय ही टेलीविज़न ने दुनियाभर के लोगों को जोड़ने, शिक्षित और जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सोशल मीडिया के युग में भी इसकी महत्ता कम नहीं हुई है। बदलते अत्यधुनिक दौर में पारंपरिक टीवी से लेकर स्मार्ट टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक का शानदार सफर हमें इस माध्यम की प्रासंगिकता और महत्व को समझने का मौका देता है।
टेलीविज़न का आविष्कार सबसे पहले 1927 में फिलो टेलर फ़ार्नस्वर्थ ने किया था। उस समय किसी को भी नहीं पता था कि टेलीविजन वैश्विक सूचना के प्रसार को बढ़ावा देने वाले अंतर्राष्ट्रीय दिवस का प्रतीक बन जाएगा। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1996 में विश्व टेलीविजन दिवस की शुरुआत की थी। संयुक्त राष्ट्र ने पहला विश्व टेलीविजन फोरम 21 और 22 नवंबर 1996 को आयोजित किया था, जहां प्रमुख मीडिया हस्तियों ने संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में आज की बदलती दुनिया में टेलीविजन के बढ़ते महत्व पर चर्चा करने और इस बात पर विचार करने के लिए मुलाकात की कि वे अपने आपसी सहयोग को कैसे बढ़ा सकते हैं। इसीलिए महासभा ने 21 नवंबर को विश्व टेलीविजन दिवस के रूप में घोषित करने का निर्णय लिया। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक टेलीविजन दुनिया में वैश्वीकरण और संचार के प्रतीक का प्रतिनिधित्व करता है। टेलीविजन ने लोगों का मनोरंजन करने के साथ-साथ परिवार को एक सूत्र में बांधे रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। टेलीविजन से परिवार के लोग एक दूसरे के करीब आ गए। दुनिया भर में अभी भी ऐसे बहुत से देश हैं, जहां लोगों को एक- दूसरे से जुड़ने में कई बाधाएं आती हैं। संचार में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए ही यह दिवस मनाया जाने लगा। टेलीविजन सूचना और शिक्षा का सशक्त माध्यम है। यह लोगों की निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित करता है। दुनिया में हो रहे विकास के साथ संघर्षों से लोगों को अवगत करता है। है। टेलीविजन अपने प्रारम्भ काल से से ही आम लोगों के जीवन में शिक्षा और मनोरंजन का महत्वपूर्ण स्थान है। टेलीविजन के माध्यम से लोग कई सालो से शिक्षा, समाचार, राजनीति, मनोरंजन और गपशप का आनंद लेते आ रहे हैं। विश्व टेलीविजन दिवस मनाने का उद्देश्य दुनियाभर में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से परे टेलीविजन के महत्व पर जोर देना है। टेलीविजन को सूचना, प्रणाली और जनमत को प्रभावित करने के लिए एक प्रमुख स्रोत के रूप में स्वीकार किया गया। टेलीविजन वर्तमान में संचार और वैश्वीकरण का प्रतिनिधित्व भी करता है।
भारत में पहली बार 15 सितंबर 1959 को टेलीविजन लॉन्च किया गया था। उस समय टेलीविजन ने देश को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस दौरान टेलीविजन पर ‘हम लोग, ‘बुनियाद, ‘रामायण’ और ‘महाभारत जैसे लोकप्रिय शो आते थे, जिन्हें देखने के लिए टीवी के सामने लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाया करती थी। हमारे देश में टेलीविजन को हिंदी भाषा को जन जन तक पहुँचाने का श्रेय दिया जा सकता है। आजादी के बाद प्रगति और विकास का सजीव माध्यम बना टेलीविजन । बड़े बड़े नेता और महत्वपूर्ण व्यक्ति अपनी बात टेलीविजन के माध्यम से देशवासियों के समक्ष रखते थे। प्रसारण का महत्वपूर्ण साधन होने से देश में इसकी महत्ता और स्वीकार्यता बढ़ी । मगर धीरे धीरे निजी क्षेत्र में प्रसारण माध्यम शुरू हुए। निजी चैनलों से चौबीसों घंटे समाचार और मनोरंजन की सामग्री प्रसारित होने लगी। टेलीविज़न ने देश में आमजन को एक दूसरे से जोड़ने के लिए शिक्षा और मनोरंजन के साधन के रूप में विकसित किया वहीं न्यूज चैनलों पर घृणा और नफरत की मारकाट मची है। जब से टीवी न्यूज चैनलों ने हमारी जिंदगी में दखल दिया है तब से हम एक दूसरे के दोस्त कम दुश्मन अधिक बन रहे है। समाज में भाईचारे के स्थान पर घृणा का वातावरण ज्यादा व्याप्त हो रहा है। प्रिंट मीडिया आज भी अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन कर रहा है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर हो रही बहस घृणास्पद और निम्नस्तरीय है। ऋषि मुनियों की इस पावन धरा को घृणा के विष बीज से मुक्ति नहीं मिली तो भारत को पतन के मार्ग पर जाने से कोई भी ताकत नहीं रोक पायेगी।
न्यूज चैनलों पर विभिन्न सियासी दलों के प्रतिनिधि जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग करते है उन्हें देखकर लगता नहीं है की यह गाँधी, सुभाष, नेहरू, लोहिया और अटलजी का देश है। देश की सर्वोच्च अदालत कई बार इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर नियामकीय नियंत्रण की कमी पर अफसोस ज़ाहिर कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नफरत फैलाने वाली बातें एक ‘बड़ा खतरा हैं और भारत में स्वतंत्र एवं संतुलित प्रेस की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि एंकरों और न्यूज़ चैनल के प्रबंधकों के खिलाफ कार्रवाई हो तो सब लाइन पर आ जाएंगे।
गैंग्स्टरर लॉरेंस बिश्नोई के भाई और उसके करीबी अनमोल बिश्नोई को अमेरिका से लौटने के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने गिरफ्तार कर लिया। अनमोल को अमेरिका ने मंगलवार को भारत डिपोर्ट कर दिया था। उसके दिल्ली पहुंचते ही एनआईए ने उसे पकड़ लिया। अनमोल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या के मामले में आरोपी है। उसके खिलाफ कई राज्यों में गंभीर अपराध के मामले दर्ज हैं।
एनआईए ने इस मामले की जांच के बाद माना कि अनमोल ने 2020-2023 की अवधि के दौरान देश में विभिन्न आतंकवादी कृत्यों को अंजाम देने में नामित आतंकवादी गोल्डी बरार और लॉरेंस बिश्नोई की सक्रिय रूप से सहायता की । मार्च 2023 में एनआईए ने अनमोल के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया था।
अनमोल ने बिश्नोई गिरोह के विभिन्न सहयोगियों के साथ मिलकर काम करते हुए लॉरेंस बिश्नोई गिरोह के लिए अमेरिका से आतंकवादी सिंडिकेट चलाया साथ ही आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देना जारी रखा। इसके लिए उसने जमीनी स्तर पर गुर्गों का इस्तेमाल किया। जांच से यह भी पता चला है कि अनमोल बिश्नोई ने गिरोह के शूटरों और गुर्गों को आश्रय और रसद सहायता प्रदान की थी। वह अन्य गैंगस्टरों की मदद से विदेशी धरती से भारत में जबरन वसूली भी कराता था।
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नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) के नेता बाबा सिद्दीकी की 12 अक्तूबर 2024 को मुंबई के बांद्रा स्थित कार्यालय के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मुंबई पुलिस इस मामले में अब तक 26 आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है। चार्जशीट में अनमोल को ‘मुख्य साजिशकर्ता’ बताया गया है और उसे वांछित आरोपियों की सूची में रखा गया है। पुलिस के अनुसार कई गिरफ्तार आरोपियों के फोन से मिले वॉइस क्लिप्स की जांच करने पर उनकी आवाज अनमोल की रिकॉर्डिंग से मेल खाती पाई गई थी
जांच में यह सामने आया था कि अनमोल ने विदेश में रहते हुए हत्या की योजना को दिशा दी। बरामद ऑडियो क्लिप्स में वह कथित तौर पर अपने सहयोगियों को हत्या करने के निर्देश देता सुना गया है। जांच एजेंसियों का मानना है कि उसने विदेश से ही घटनाक्रम को नियंत्रित किया । पूरी साजिश को अंजाम दिलाया। इन प्रमाणों को पुलिस ने चार्जशीट में शामिल किया है।
कभी देश के प्रधानमंत्री के पद के नज़दीक पहुंचे लालू प्रसाद यादव का सियासी परिवार अब बिखरने के कगार पर है। बिहार चुनाव में करारी हार के बाद लालू परिवार की एकता छिन्न भिन्न हो गई है। बिहार में परिवारवाद कोई नया मुद्दा नहीं है मगर सबसे शक्तिशाली परिवार में अंदरूनी झगड़ा खुलकर सामने आ गया है। लालू परिवार में जयचंदों को लेकर भी सियासत गर्म हो रही है। चुनाव से पहले बड़े बेटे तेज प्रताप को परिवार से निकाल बाहर कर दिया गया था। चुनाव के बाद हार की जिम्मेदारी तय करने के मामले में लालू को किडनी देने वाली बेटी रोहिणी आचार्य ने रोते हुए घर छोड़ दिया और परिवार से नाता तोड़ने और राजनीति छोड़ने का ऐलान किया। उन्होंने आरोप लगाया था कि चुनाव हारने के बाद उनके भाई तेजस्वी यादव और उनके दो करीबी सहयोगी संजय यादव और रमीज ने उन्हें अपमानित किया है। रोहिणी ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें चप्पल उठा कर मारने की भी कोशिश की। कल एक बेटी, एक बहन, एक शादीशुदा महिला, एक मां को जलील किया गया, गंदी गालियां दी गयीं, मारने के लिए चप्पल उठाया गया, मैंने अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया, सच का समर्पण नहीं किया, सिर्फ और सिर्फ इस वजह से मुझे बेइज्जती झेलनी पड़ी। कल एक बेटी मजबूरी में अपने रोते हुए मां-बाप बहनों को छोड़ आयी, मुझसे मेरा मायका छुड़वाया गया. मुझे अनाथ बना दिया गया। आप सब मेरे रास्ते कभी ना चलें, किसी घर में रोहिणी जैसी बेटी – बहन पैदा ना हो ।
देश में उत्तर से लेकर दक्षिण तक राजनीतिक परिवारों में सियासी फूट और कलह का लंबा इतिहास रहा है। देश में अनेक सियासी परिवार जहां फले फुले है वहां अनेक परिवार टूट फूट का शिकार होकर दरकते भी गए है। इस समय देश में डेढ़ दर्ज़न परिवार राजनीति में सक्रीय है। इनमें अनेक बड़े परिवार समय के साथ फलते फूलते और बिखरते रहे। देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित नेहरू गांधी परिवार में भी स्व. संजय गांधी की पत्नी मेनका और बेटे वरुण गांधी ने परिवार से अलग राह पकड़कर भाजपा का दामन थाम रखा है। दूसरा बड़ा परिवार पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल का है जिसकी चौथी पीढ़ी इस समय सियासी समर में संघर्षरत है। हरियाणा में देवीलाल की विरासत की जंग में परिवार बिखर गया। देवीलाल के बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री स्व.ओपी चौटाला के दोनों बेटों ने सियासत की अलग अलग पगडंडियां पकड़ रखी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के निधन के बाद उनका परिवार भी बिखर गया है। बेटे और भाई ने अलग अलग राह पकड़ रखी है। इसी भांति यूपी में सोने लाल पटेल के परिवार के सदस्यों की राह भी जुदा जुदा है। इनमें एक सदस्य मोदी मंत्री मंडल में शामिल है तो दूसरा मोदी विरोधी धड़े के साथ है। कल तक मुलायम सिंह यादव का परिवार भी अलग थलग था। भाई शिवपाल और बेटे अखिलेश की राह अलग अलग थी मगर शिवपाल फिर अपने भतीजे के साथ हो गए है मगर परिवार के एक बहू अपर्णा आज भी भाजपा खेमे से जुडी है। आंध्र में पूर्व मुख्यमंत्री रामाराव का परिवार भी बिखरा हुआ है। महाराष्ट्र में बाल ठाकरे ने अपने भतीजे राज ठाकरे के स्थान पर अपने बेटे उद्धव को पार्टी की सत्ता सौंप दी थी। भतीजे राज ने अपने चाचा से बगावत कर अलग पार्टी बना ली थी। शरद पवार का उदहारण भी हमारे सामने है। उन्होंने अपने भाई के स्थान पर बेटी को तरजीह दी थी। राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले शरद पवार के भतीजे अजीत ने अपने चाचा को पटकनी देकर भाजपा सरकार में उप मुख्यमंत्री का पद संभाल परिवार को तोड़ दिया था ।
आंध्र प्रदेश में वाईएस राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद परिवार में भाई जगनमोहन रेड्डी और बहन वाईएस शर्मिला में भी टकराव हुआ। 2021 में बहन शर्मिला ने अपनी अलग पार्टी बनाई। इसके बाद उन्होंने लोकसभा चुनाव से पहले अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया। KCR के नाम से चर्चित के. चंद्रशेखर राव की पार्टी में कलह खुलकर सामने आ चुकी है। पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी के. कविता को भाइयों के खिलाफ आवाज उठाने का खामियाजा भुगतना पड़ा है। एच.डी. देवेगौड़ा के परिवार के भीतर सत्ता और टिकट वितरण को लेकर समय-समय पर मतभेद सामने आते रहे हैं। खासकर उनके बेटे एच.डी. कुमारस्वामी और एच.डी. रेवन्ना के बीच कई बार सार्वजनिक मंचों पर भी असहमति देखी गई है। तमिलनाडू में एम. करुणानिधि के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत के लिए परिवार में घमासान हुआ। करुणानिधि के दो बेटों एम.के. स्टालिन और एम.के. अलागिरी के बीच पार्टी के उत्तराधिकार को लेकर लंबे समय तक विवाद रहा। करूणानिधि ने बड़े बेटे अलागिरी को पार्टी से अलग कर स्टालिन को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। पिता के इस एक्शन से बड़ा बेटा राजनीति के बियावान में खो गया। अंत में अलागिरी को पार्टी और परिवार से बाहर का रास्ता दिखाया गया।
बिहार चुनाव परिणाम आ चुके हैं। परिणामों को लेकर तरह तरह से समीक्षाएँ की जा रही हैं। विपक्ष तो इस चुनाव को जनादेश के बजाये ‘ज्ञानादेश ‘ कहकर चुनाव आयोग की निष्पक्षता व विश्वसनीयता पर ही सीधा सवाल खड़ा कर रहा है। कुछ समीक्षकों की नज़रों में धर्म निरपेक्ष मतों के विभाजन के कारण ऐसे परिणाम आये तो कुछ का आंकलन है कि महिला मतों ने चुनाव में निर्णायक भूमिका अदा की। मगर सच तो यह है कि जिसतरह के चुनाव परिणाम आये हैं उसका अंदाज़ा स्वयं भारतीय जनता पार्टी को भी नहीं था क्योंकि गृह मंत्री अमितशाह ने भी ‘अब की बार 160’ की विजय सीमा निर्धारित की थी जबकि 202 सीटों पर ‘राजग’ ने फ़तेह हासिल की। महिलाओं द्वारा राजग के पक्ष में किये गए बंपर मतदान को लेकर यही कहा जा रहा है कि जिस समय चुनाव की घोषणा के दिन आचार संहिता का सरेआम उल्लंघन करते हुये बिहार में लगभग 1 करोड़ 51 लाख महिलाओं के खाते में 10000 रुपये डाले गए थे उसी समय से यह अंदाज़ा लगाया जाने लगा था कि चुनाव का रुख़ नितीश सरकार के पक्ष में जा सकता है। कहा यह भी जा रहा है कि विश्व बैंक से किसी अन्य परियोजना के लिए प्राप्त धनराशि को केंद्र सरकार ने बिहार विधानसभा चुनाव के लिए ‘डायवर्ट’ किया और उन्हीं पैसों को राज्य की महिला मतदाताओं में बांट दिया गया। यही पैसे लगभग डेढ़ करोड़ महिला मतदाताओं के खाते में 10,000 रुपये प्रति खाते की दर से हस्तानांतरित कर दिये गये। गोया लगभग 40 हज़ार करोड़ रुपयों की भारी अनुमानित रक़म रेवड़ियों की तरह बाँट दी गयी। चुनाव पूर्व ‘रेवड़ी आवंटन’ का यही फ़ार्मूला जिसे सीधे शब्दों में पैसे देकर वोट ख़रीदना भी कहा जा सकता है, पूर्व में मध्य प्रदेश,हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली में विभिन्न योजनाओं के नाम पर और अब बिहार में नक़द वितरण के रूप में सफलता पूर्वक आज़माया जा चुका है। चुनाव घोषित होने के बावजूद आचार संहिता का सरेआम उल्लंघन करते हुये सरकारी ख़ज़ाने से लोगों के खातों में बड़ी राशि डालने का सीधा अर्थ है वोट ख़रीदना। और चिंताजनक यह है कि यह अनैतिक व ग़ैर क़ानूनी काम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,भाजपा व उनके सहयोगी दलों द्वारा खुले तौर पर किया गया।
सवाल यह है की पूर्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘रेवड़ी बांटने’ के इस चलन को लेकर दिये गये ‘प्रवचन ‘ क्या केवल विपक्ष के लिये ही थे स्वयं उनकी भाजपा या राजग दलों के लिये नहीं ? याद कीजिये जब जुलाई 2022 को लखनऊ में एक कार्यक्रम में मोदी जी फ़रमाते हैं कि “ये रेवड़ी बाँटने की संस्कृति देश के लिए बहुत ख़तरनाक है। जो रेवड़ी बाँट रहे हैं, वो आपके बच्चों का हक़ मार रहे हैं। यह रेवड़ी संस्कृति देश के विकास को खा जाएगी। फ़्री की रेवड़ी बांटकर वोट लेने की होड़ देश को दीवालिया बना देगी। यह आने वाली पीढ़ियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय है।” प्रधानमंत्री तो मुफ़्त के रेवड़ी कल्चर से इतना आहत थे कि 15 अगस्त 2022 को लाल क़िले से अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में भी उन्हें इसका ज़िक्र करते हुये कहना पड़ा था कि हमें “रेवड़ी कल्चर से बचना होगा जो देश को तबाह कर देगा। उस समय उन्होंने राज्य सरकारों विशेषकर विपक्ष शासित राज्यों पर निशाना साधते हुए कहा था कि मुफ़्त बिजली, मुफ़्त पानी,मुफ़्त बस यात्रा आदि जैसी योजनाएँ चुनावी लाभ के लिए लाई जा रही हैं, जो राज्यों की आर्थिक स्थिति को कमज़ोर कर रही हैं।” उनकी यह टिप्पणी ख़ासतौर पर उस समय की दिल्ली, पंजाब, पश्चिम बंगाल आदि की ग़ैर बीजेपी सरकारों की मुफ़्त योजनाओं के संदर्भ में की गई थी।
परन्तु उपरोक्त योजनाएं जिसे प्रधानमंत्री ‘रेवड़ी ‘ बता रहे थे इसमें बिजली पानी बस यात्रा जैसी सुविधाएँ तो थीं परन्तु बिहार की तरह 10 हज़ार रूपये बिना किसी योजना के बैंक खतों में डालना, जिसे सीधे तौर पर पैसे देकर वोट ख़रीदने के सिवा और क्या कहा जा सकता है ऐसी कोई योजना नहीं थी ? फिर मोदी जी का रेवड़ी संस्कृति को लेकर लाल क़िले तक से रुन्दन करना आख़िर बिहार में कहाँ चला गया ? क्या केवल विपक्षी दलों के लिये ही प्रधानमंत्री की ये नसीहत थी ? और इन सबसे बड़ा सवाल अब भविष्य के चुनावों के लिए खड़ा हो गया है कि क्या अब भविष्य के चुनाव का आधार भी चुनाव पूर्व नक़द वितरण ही हुआ करेगा ? क्या बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ, क़ानून व्यवस्था व भ्रष्टाचार जैसे अनेक जनहितकारी मुद्दे अब चुनावी मुद्दे नहीं हुआ करेंगे ? नैतिक रूप से तो क़र्ज़ मुआफ़ी मुफ़्त बिजली, मुफ़्त पानी, मुफ़्त बस यात्रा जैसी सुविधाएँ देना भी मुनासिब नहीं परन्तु आश्चर्य तो यह है कि प्रधानमंत्री को इस तरह की योजनायें रेवड़ी नज़र आ रही थीं तो बिहार में चुनाव के दौरान ही बिना किसी योजना के नक़द पैसे बांटकर सीधे तौर पर वोट ख़रीदना कहाँ की नैतिकता है ? बिहार में सरकार तो ज़रूर बन गयी है परन्तु सरकार बनाने के लिये मुफ़्त बांटे गये लगभग 40 हज़ार करोड़ रुपयों के बाद राज्य की आर्थिक स्थिति पर क्या फ़र्क़ पड़ेगा, क्या रेवड़ी बांटने वालों द्वारा इसका भी आंकलन किया गया है ? और चुनाव आयोग द्वारा मूक दर्शक बनकर इस अनैतिक व ग़ैर क़ानूनी काम को देखते रहना क्या सीधे तौर पर यह सन्देश नहीं देता कि यह सारा खेल सत्ता व चुनाव आयोग की सामूहिक मर्ज़ी से रचा गया ?
बिहार के चुनावों में हुई इसतरह की मुफ़्त रेवड़ी बाँट ने भविष्य के चुनावों के लिये एक ऐसा ख़तरा पैदा कर दिया है जो न केवल देश की अर्थव्यवस्था को संकट में डाल सकता है बल्कि विश्व के उस सबसे बड़े लोकतंत्र के लिये भी ख़तरा व शर्मिन्दिगी का कारक है जिस पर प्रत्येक भारतवासी नाज़ करता है। यही भारतीय चुनाव हैं जिसकी व्यापक प्रक्रिया को देखने के लिये प्रायः दुनिया के नेता व अधिकारी आते रहते हैं। क्या अब हम दुनिया को यही बातयेंगे कि भारत में चुनाव नीतिगत आधार पर नहीं होते बल्कि यहाँ वोट ख़रीदे जाते हैं ? और क्या अब कुर्सी से चिपके रहने के सत्ता की चुनाव पूर्व ‘ नक़द रेवड़ी वितरण’ नीति बिहार की ही तरह पूरे देश में शुरू होगी?