श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस पर, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज उनके अद्वितीय साहस और सर्वोच्च बलिदान को श्रद्धांजलि अर्पित की।
श्री मोदी ने कहा कि आस्था और मानवता की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर जी की शहादत हमारे समाज को सदैव आलोकित करती रहेगी।
एक्स पर एक पोस्ट में प्रधानमंत्री ने कहा:
“श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस पर, हम उनके अद्वितीय साहस और बलिदान को नमन करते हैं। आस्था और मानवता की रक्षा के लिए उनकी शहादत हमारे समाज को सदैव आलोकित करती रहेगी।”
डिजिटल पहचान की अंधी प्रतिस्पर्धा ने मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और वास्तविक अनुभवों को संकट में डाल दिया है।
सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव युवाओं के मानसिक संतुलन और जीवनशैली पर गहरा असर डाल रहा है। लाइक, व्यूज़ और फॉलोअर्स की प्रतिस्पर्धा ने उन्हें एक अदृश्य दबाव में धकेल दिया है, जहाँ डिजिटल मान्यता ही आत्मविश्वास का आधार बनती जा रही है। घंटों स्क्रोल करना, हर पल ऑनलाइन बने रहना और दूसरों से तुलना करना तनाव, अनिद्रा, चिंता और अकेलेपन को जन्म दे रहा है। वास्तविक रिश्ते, संवाद और अनुभव स्क्रीन के पीछे छूटते जा रहे हैं। समाधान डिजिटल अनुशासन, सीमित उपयोग, नोटिफिकेशन नियंत्रण और वास्तविक दुनिया को प्राथमिकता देने में है। संतुलन ही मानसिक शांति का आधार है।
-डॉ सत्यवान सौरभ
आज का भारतीय समाज एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रहा है जहाँ तकनीक अवसर भी दे रही है और संकट भी खड़ा कर रही है। सोशल मीडिया का तेजी से बढ़ता दायरा इस संक्रमणकाल का सबसे बड़ा प्रतीक है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स और अन्य प्लेटफॉर्म ने आम लोगों को वह मंच दिया है, जिसकी कल्पना कुछ दशक पहले संभव नहीं थी। लेकिन यह सशक्तिकरण जितनी उम्मीदें लेकर आया था, उतने ही उलझाव उसने मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्तर पर पैदा कर दिए हैं। युवा पीढ़ी लाइक, व्यूज़, फॉलोअर्स और डिजिटल सेलिब्रिटी बनने की सतही चाह में उलझकर मानसिक थकान और सामाजिक दूरी के ऐसे भंवर में फंसती जा रही है जो दिखाई तो नहीं देता, पर भीतर तक कमजोर कर रहा है। भारत में सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की संख्या 50 करोड़ पार कर चुकी है—यह दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल समुदायों में से एक है। यह संख्या जितनी विशाल है, उससे कहीं अधिक विशाल है वह दबाव, जो इसने युवाओं के मन पर डाला है। सुबह उठते ही फोन उठाकर रात को आंख बंद होने तक स्क्रीन पर स्क्रोल करते रहने की आदत आज सामान्य लगती है, लेकिन यह सामान्यता ही सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। लाइक-व्यूज़ के माध्यम से मान्यता पाने की चाह युवाओं को धीरे-धीरे वास्तविक जीवन से काट रही है।
सोशल मीडिया का सबसे आकर्षक और सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह एक समानांतर दुनिया रचता है—एक ऐसी दुनिया जहाँ आप अपनी इच्छानुसार छवि गढ़ सकते हैं, अपनी वास्तविकता से अलग व्यक्तित्व प्रदर्शित कर सकते हैं और अपनी जिंदगी को चमकदार फ्रेम्स में पिरो सकते हैं। लेकिन इस दुनिया में स्वीकृति की कीमत बहुत भारी है। कुछ सेकंड का ध्यान पाने के लिए लगातार नए पोस्ट, नई तस्वीरें, नए रील्स और नई अभिव्यक्तियाँ देनी पड़ती हैं। युवाओं में यह दबाव बढ़ रहा है कि यदि उनकी पोस्ट को पर्याप्त लाइक या व्यूज़ नहीं मिले, तो वे किसी अदृश्य प्रतियोगिता में पिछड़ गए हैं। यह डिजिटल पहचान की एक ऐसी प्रतिस्पर्धा है जिसमें न कोई स्पष्ट लक्ष्य है, न कोई अंत, और न ही कोई वास्तविक विजेता। हर युवा अपनी ही छवि की तुलना दूसरों से करता है। किसी और की मुस्कुराहट, जीवनशैली, शरीर, छुट्टियाँ, करियर, रिश्ते—सब कुछ तुलना का आधार बन जाता है। यह तुलना आत्म-सम्मान को चोट पहुंचाती है और धीरे-धीरे युवा महसूस करने लगते हैं कि वास्तविक जीवन में जितना वे पाते हैं, वह पर्याप्त नहीं है।
कई सर्वे बताते हैं कि 18–34 आयु वर्ग के 59% युवा स्वीकार करते हैं कि सोशल मीडिया उनके मानसिक संतुलन को प्रभावित कर रहा है। इनमें चिंता, तनाव, अनिद्रा, ओवरथिंकिंग, अत्यधिक उत्तेजना और आत्म-संदेह जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। युवाओं के दिमाग में हर समय दो सवाल घूमते रहते हैं—इस पोस्ट पर कितने लाइक आए? लोग मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे? इन सवालों का बोझ इतना बढ़ चुका है कि वास्तविक उपलब्धियाँ भी कई बार डिजिटल प्रतिक्रिया के बिना युवा को अधूरी लगती हैं। आत्मविश्वास की नींव खुद के मूल्य पर नहीं, बल्कि दूसरों की डिजिटल स्वीकृति पर टिकने लगती है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने वाले युवाओं में अवसाद और अकेलेपन की समस्या तेजी से बढ़ी है। बाहर से वे “कनेक्टेड” दिखते हैं, लेकिन भीतर वे अत्यधिक अलगाव महसूस करते हैं। वास्तविक बातचीत में कमी आने से भावनात्मक अभिव्यक्ति भी कमजोर हो गई है। आज कई परिवारों में यह आम दृश्य है कि भोजन की मेज पर बैठे सभी लोग मोबाइल स्क्रीन में झुके हैं। माता-पिता कभी समझ नहीं पाते कि बच्चे किस पोस्ट को बनाने में इतना वक्त लगा रहे हैं, या क्यों एक तस्वीर को कई बार परफेक्ट एंगल से लेना आवश्यक है। युवा पीढ़ी की भावनाएँ, संवाद शैली और प्राथमिकताएँ तेजी से डिजिटल स्वरूप में बदल रही हैं, जबकि बुजुर्ग अभी भी वास्तविक संवाद और संबंधों को महत्व देते हैं। इस पीढ़ीगत अंतर ने परिवारों को भावनात्मक रूप से दूर कर दिया है।
दोस्तों के साथ घूमने जाना अब एक अनुभव नहीं, बल्कि कंटेंट बनाने का अवसर बन गया है। हर जगह “पोस्ट करने लायक” तस्वीर ढूंढना मानो एक अनिवार्य कार्य बन गया है। रिश्ते धीरे-धीरे वास्तविकता से हटकर प्रदर्शन के माध्यम बन रहे हैं। कई युवा स्वीकार करते हैं कि वे सोशल मीडिया पर दिखने वाले “परफेक्ट रिश्तों” से प्रभावित होकर अपने संबंधों को लेकर अनावश्यक उम्मीदें पाल लेते हैं, जो बाद में निराशा का कारण बनती हैं।
सोशल मीडिया की सबसे बड़ी समस्या है—हमेशा उपलब्ध रहने का दबाव। नोटिफिकेशन की लगातार झंकार, मैसेज का तुरंत जवाब देने की आदत, किसी नए ट्रेंड में पीछे न छूटने का डर, और हर समय अपडेटेड दिखने की चाह युवाओं की मानसिक ऊर्जा को धीरे-धीरे खत्म कर रही है। डिजिटल थकान आज एक वास्तविक समस्या बन चुकी है। कई युवा रात को देर तक नींद नहीं ले पाते क्योंकि उन्हें लगता है कि वे कुछ मिस कर देंगे। दिन में उनकी एकाग्रता भंग रहती है क्योंकि दिमाग हर समय स्क्रीन की ओर खिंचता रहता है। यह चक्र अंतहीन है और जितना समय बढ़ता है, उतनी थकान गहराती जाती है।
प्लेटफॉर्म्स का उद्देश्य सरल है—उपयोगकर्ता को जितना अधिक समय स्क्रीन पर रोके रखा जाए, उतना अधिक लाभ। एल्गोरिद्म इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि उपयोगकर्ता स्क्रोल करना बंद ही न करे। वीडियो एक के बाद एक चलते रहते हैं, नोटिफिकेशन लगातार आकर्षित करते रहते हैं और कंटेंट का चयन इस प्रकार किया जाता है कि उपयोगकर्ता को लगे—“बस थोड़ा और।” इस रणनीति का सबसे अधिक प्रभाव युवा दिमागों पर पड़ता है, जो अभी भावनात्मक और बौद्धिक रूप से परिपक्व हो रहे होते हैं। उन्हें यह समझ नहीं आता कि सोशल मीडिया की यह दुनिया उनके समय, ऊर्जा और आत्मसम्मान को लगातार प्रभावित कर रही है।
समस्या जितनी बड़ी है, उसका समाधान भी उतना ही व्यवहारिक है—डिजिटल अनुशासन। युवाओं को प्रतिदिन एक निश्चित समय तय करना चाहिए—इससे आदतें नियंत्रित होंगी और थकान कम होगी। अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करने से मन पर होने वाला दबाव कम होता है। खुद को दूसरों के बनाए ‘हाइलाइट रील’ से तुलना करना बंद करना जरूरी है। परिवार, दोस्तों, किताबों, प्रकृति, खेल और रचनात्मक गतिविधियों पर ध्यान देना सकारात्मक ऊर्जा देता है। स्कूलों-कॉलेजों में डिजिटल व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य पर पाठ्यक्रम जोड़ना समय की मांग है। अभिभावकों को भी बच्चों में मोबाइल उपयोग की आदतों पर संयमित और संवेदनशील निगरानी रखनी चाहिए।
युवाओं को यह समझने की आवश्यकता है कि उनकी वास्तविक प्रतिभा, भावनाएँ, रचनात्मकता और मेहनत किसी स्क्रीन पर आए आंकड़ों से अधिक मूल्यवान हैं। जीवन का अर्थ डिजिटल तालियों से नहीं, बल्कि वास्तविक अनुभवों, रिश्तों और आत्मविकास से बनता है। सोशल मीडिया ने दुनिया को छोटा जरूर बनाया है, लेकिन इसका उपयोग यदि संयमित न हो तो यह हमारे ही जीवन का दायरा छोटा कर देता है। समय आ गया है कि युवा इस मायाजाल से जागें, स्क्रीन से थोड़ी दूरी बनाएं और अपनी वास्तविक पहचान की ओर लौटें। क्योंकि लाइक-व्यूज़ की यह दौड़ अंतहीन है—और इसमें थकना निश्चित है। लेकिन जीवन की दौड़ के रास्ते अनंत हैं, अर्थपूर्ण हैं और सच्चे हैं।
– डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
राष्ट्रीय दुग्ध दिवस हर साल 26 नवम्बर को मनाया जाता है। यह दिवस भारत में श्वेत क्रांति के जनक डॉ. वर्गीज कुरियन की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। यह भारत की अर्थव्यवस्था और पोषण सुरक्षा में डेयरी क्षेत्र के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डालता है। राष्ट्रीय दुग्ध दिवस केवल दूध का उत्सव नहीं है अपितु यह उन लोगों और प्रक्रियाओं के लिए एक श्रद्धांजलि है जो इस आवश्यक भोजन को हमारी मेज तक लाते हैं। यह स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिरता और सांस्कृतिक परंपराओं को बढ़ावा देने में दूध की भूमिका को रेखांकित करता है। यह डेयरी किसानों की कड़ी मेहनत की सराहना करने और स्थायी उपभोग प्रथाओं के लिए प्रतिबद्ध होने का अवसर है। एक अधिकृत रिपोर्ट के अनुसार दूध के उत्पादन एवं उत्पादकता में स्वतंत्रता के बाद से सर्वाधिक वृद्धि हुई है। भारत दूध उत्पादन में दुनिया में अग्रणी बना हुआ है। भारत का दूध उत्पादन दुनिया की कुल सप्लाई का लगभग एक-चौथाई हिस्सा है। पिछले एक दशक में भारत के दूध उत्पादन में रिकॉर्ड ग्रोथ दर्ज की गई है। 2014-15 में उत्पादन 146.30 मिलियन टन था, जो 2023-24 में 239.30 मिलियन टन तक पहुँच गया। यह 63.56 प्रतिशत की वृद्धि है, यानी लगभग 5.7 प्रतिशत की औसत वार्षिक वृद्धि दर। यह ग्रोथ दर बताती है कि भारत ने लगातार डेयरी क्षेत्र को मजबूत बनाने पर काम किया है। भारत न केवल दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, बल्कि यहां की बड़ी आबादी की पोषण ज़रूरतें भी काफी हद तक दूध और उससे बने उत्पादों पर निर्भर करती हैं।
दूध हर उम्र के लोगों के लिए अमृत समान है। दूध स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक और संपूर्ण आहार है। गर्म दूध के सेवन से कई फायदे मिलेंगे। दूध को गर्म करने से इसमें मौजूद पौष्टिक तत्व कई गुना बढ़ जाते हैं। आयुर्वेद में गर्म दूध के अनेक फायदे बताये गए है। विशेषकर सर्द मौसम में गर्म दूध का सेवन करना सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है। एक स्टडी के मुताबिक हर रोज एक गिलास गर्म दूध पीने से स्वास्थ्य बेहतर रहता है। दूध में लौंग अथवा हल्दी को मिलाकर पीने से कई लाभ हो सकते हैं। एक स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक दूध और लौंग कई सारे पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। दूध फॉस्फोरस, मैग्नशियिम, आयोडीन, वटिामनि ए, डी, के से भरपूर होते हैं तो वहीं लौंग में कॉर्बोहाइड्रेट, आयरन, सोडयिम की अच्छी मात्रा मौजूद होती है। आयुर्वेद के अनुसार हल्दी मिला दूध अपने एंटी बैक्टीरियल और एंटीसेप्टिक गुणों के कारण बैक्टीरिया को पनपने नहीं देता। साथ ही शरीर के दर्द में आराम देता है। हाथ पैर व शरीर के अन्य भागों में दर्द की शिकायत होने पर रात को सोने से पहले हल्दी वाले दूध का सेवन करें। अच्छी नींद, वजन कम, सर्दी-खांसी दूर ,ब्लड सर्कुलेशन आदि का कार्य भी करता है। लौंग वाले दूध के लिए बताया जाता है यह गले के लिए फायदेमंद, शरीर में एनर्जी, कब्ज की समस्या से राहत, मुंह की बदबू दूर करने में सहायक और दांतों के दर्द से राहत का काम करेगा।
इंटरनेशनल डेयरी जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक जो लोग रोजाना कम से कम एक ग्लास दूध पीते हैं वे हमेशा मानसिक और बौद्धिक तौर पर बेहतर स्थिति में होते हैं। शाकाहारी हो या मांसाहारी, बच्चा हो या बुर्जुग सभी वर्ग के लोग दूध सेवन कर सकते हैं। ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के अनुसार गाय का दूध और उससे बनी चीजें, जैसे पनीर, दही, मक्खन बड़ी मात्रा में कैल्शियम और प्रोटीन प्रदान करते हैं, जो संतुलित आहार के लिए जरूरी हैं। कैल्शियम और प्रोटीन के अलावा दूध में कई तरह के विटामिन पाए जाते हैं। यह विटामिन ए और डी का बेहतर स्रोत है। आयुर्वेद के अनुसार गाय का दूध सबसे अधिक पौष्टिक होता है। दूध आपकी भूख को शांत कर आपको मोटापे से भी छुटकारा दिलाने में बहुत सहायक होता है। दूध अपने आप में एक सम्पूर्ण आहार है। इससे हड्डियां मजबूत होती हैं और दिमाग तेज होता है इसीलिए घर के बड़े बुजुर्ग से लेकर डॉक्टर्स तक रोजाना दूध पीने की सलाह देते हैं
भारत का विश्व दुग्ध उत्पादन में 18 प्रतिशत हिस्सा है। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में कृषि के बाद डेयरी उद्योग की प्रमुख भूमिका है। आजादी के बाद से दूध उत्पादन में यह सबसे अधिक वृद्धि है। भारत में प्रत्येक वर्ष दूध उत्पादन 5.9 प्रतिशत से ज्यादा की दर से बढ़ रहा है, जबकि दुनिया में दूध की औसत वृद्धि दर मात्र दो प्रतिशत प्रतिवर्ष है। भारत के दूध की विदेशों में भी मांग बढ़ने लगी है। लगभग डेढ़ सौ देशों में भारत के डेयरी प्रोडक्ट की मांग है। पिछले वर्ष 65 लाख टन डेयरी प्रोडक्ट का निर्यात हुआ है। देश की अर्थव्यवस्था में डेयरी सेक्टर का पांच प्रतिशत का योगदान है। लगभग आठ करोड़ लोगों के रोजगार का साधन भी है। सरकार दूध की बढ़ती मांग को पूरा करने और डेयरी को अधिक लाभकारी बनाने के लिए प्रयासरत है। नई योजना से देसी नस्लों के पशुओं की संख्या और दूध की उपलब्धता में वृद्धि हो रही है।
1930 – जापान में एक ही दिन में भूकंप के 690 झटके रिकार्ड किये गये।
1936 – जर्मनी और जापान के बीच कोमिंटन (कम्युनिस्ट इंटरनेशनल) विरोधी समझौते पर हस्ताक्षर।
1937- फ्रांस की राजधानी पेरिस में विश्व मेले का समापन।
1948 – भारत में राष्ट्रीय कैडेट कोर की स्थापना हुई।
1949 – स्वतंत्र भारत के संविधान पर संवैधानिक समिति के अध्यक्ष ने हस्ताक्षर किये तथा इसे तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया।
1951 – अमेरिकी प्रान्त अल्बामा में ट्रेन दुघर्टना में 17 लोगों की मौत।
1952 – जार्ज मेनाय आस्ट्रेलियन फुटबाल लीग के अध्यक्ष चुने गये।
1960 – टेलीफ़ोन की एसटीडी व्यवस्था का भारत में पहली बार कानपुर और लखनऊ के बीच प्रयोग किया गया।
1974 – संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव ऊ थांट का बर्मा में निधन।
1998 – पाकिस्तान ने अंधेरे में भी प्रहार कर सकने में सक्षम ‘भक्तर शिकन’ नामक नव विकसित टैंक-भेदी प्रक्षेपास्त्र का सफल परीक्षण किया।
2001 – ‘अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद’ (आई.सी.सी.) ने भारत को निलंबन की धमकी दी, बेनजीर भुट्टो नई दिल्ली में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिलीं।
2002 – लुसियो गुटेरेज इक्वाडोर के राष्ट्रपति निर्वाचित।
2004 – पाक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ के कश्मीर फ़ार्मूले को पाक-कश्मीर समिति ने खारिज किया।
2006 – कोलंबो द्वारा भारतीय पंचायती मॉडल का अध्ययन प्रारम्भ।
2007 – पाकिस्तान में आम चुनाव के लिए पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने लरकाना से अपना पर्चा दाखिल किया।
2008-योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूबालिया ने वैश्विक मंदी के बावजूद भारत का विकास 9% रहने की सम्भावना व्यक्त की। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित व मालेगाँव के अन्य आरोपियों द्वारा एटीएस पर लगाये गये शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना के आरोपों के मद्देनज़र माकोका अदालत ने महाराष्ट्र सरकार से जबाव मांगा। बस्तर ज़िले में नक्सलों के ज़िला पुलिस जवानो को निशाना बनाकर किये गये बारूदी सुरंग हमले में 7 जवान शहीद हुए।
2012 – नाइजीरिया में एक चर्च के पास दो कार बम धमाकों में 11 की मौत, 30 घायल।
2013 – इराक की राजधानी बगदाद के कैफे में धमाके में 17 मरे, 37 घायल।
वीरेन्द्र सक्सेना का जन्म 25 नवंबर 1960 में उत्तर प्रदेश मथुरा, में हुआ। वे भारतीय थिएटर, फिल्म और टेलीविजन अभिनेता हैं। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व छात्र भी हैं। सक्सेना को उनके चरित्र अभिनय और अद्वितीय आवाज के लिए जाना जाता है। उन्होंने अपने फिल्मी करियर में 100 से ज्यादा फिल्में कीं। फिल्मी जगत से लेकर टीवी की दुनिया तक वीरेंद्र सक्सेना ने फैंस के दिलों में अपनी एक जगह बनाई. सिनेमा की दुनिया में उन्होंने अपने हुनर के बल पर अपनी एक पहचान बनाई।
कम उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया था, जिसके बाद से ही उन्होंने कमाना शुरू कर दिया था। सबसे पहले उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढाए, लेकिन बाद में वो दिल्ली आ गए और वहां राजा महेंद्र प्रताप के सेक्रेटरी, बने। जहां पर उन्हें चिट्ठी लिखनी पड़ती थी, लेकिन इसी बीच उनको एक छोटा रोल हासिल हो गया और फिर उनका मन फिल्मी दुनिया में लग गया हालांकि, स्ट्रगल के दौरान एक्टर ने पेंटिंग का भी काम किया।
वे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिल हुए और थिएटर शुरू कर दिया। कुछ वक्त के बाद वे मुंबई आ गए और उन्होंने टीवी सीरियल में काम किया, फिर उनकी लोगों के बीच पहचान बननी शुरू हुई।
उन्होंने 1975 में “उलझन” से फ़िल्मी करियर की शुरुआत की । लेकिन उन्हें पहली पहचान 1985 की फ़िल्म ” मैसी साहब ” से मिली । उन्होंने आशिकी (1990), धारावी (1992), दिलवाले (1994), कभी हां कभी ना (1994), स्प्लिट वाइड ओपन (1999), साथिया (2002), समय: व्हेन टाइम स्ट्राइक्स (2003), बंटी और बबली (2005), सरकार (2005), एक चालीस की लास्ट लोकल (2007),जैसी भारतीय फिल्मों में अभिनय किया है। वेडनसडे (2008), द स्टोनमैन मर्डर्स (2009) और नाम शबाना (2017), रब्बी (2017), सोनू के टीटू की स्वीटी (2018) और सुपर 30 (2019) और कुछ अंग्रेजी भाषा की फिल्में जैसे व्हाइट रेनबो , कॉटन मैरी और इन कस्टडी की हैं। उनके द्वारा अभिनीत प्रमुख टीवी धारावाहिकों में अजनबी और जस्सी जैसी कोई नहीं शामिल हैं ।
उन्होंने टेलीविजन तारिका समता से विवाह किया और अब दोनों मुम्बई में रहते हैं।
सक्सेना ने विभिन्न प्रमुख अभिनेताओं जैसे शाहरुख खान, आमिर खान, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, जॉन अब्राहम, ओम पुरी और अन्यों के साथ काम किया है और अपनी एक्टिंग को लेकर उन्होंने दर्शकों से काफी तारीफें बटोरी हैं।
500 वर्षों के संघर्ष और 7 वर्षों के निर्माण के बाद भगवान राम की अयोध्या में उनका मंदिर आज पूरा हुआ । जिस बाबरी ढांचे पर धर्म पताका फहराते हुए मुलायम सिंह यादव की पुलिस ने कोठारी बन्धुओं को गोलियों से भून डाला था , वहीं बने मंदिर के ऊंचे शिखर पर आज मंगलवार के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी धर्मध्वजा चढ़ाएंगे । गत वर्ष रामलला के मंदिर में भगवान के बालरूप की प्राण प्रतिष्ठा के बाद मंदिर अब संपूर्ण हो गया है ।
अशोक सिंहल , आचार्य गिरिराज किशोर , अटल जी , लालकृष्ण आडवाणी , कल्याण सिंह , बाबा रामचंद्र परमहंस , नृत्यगोपाल दास , स्वामी सत्यमित्रानंद , आचार्य धर्मेंद्र , साध्वी ऋतम्भरा , उमा भारती , डॉ मुरलीमनोहर जोशी , सुषमा स्वराज ,स्वामी परमानंद सरस्वती आदि असंख्य महापुरुषों के तपस्या आज पूरी हो जाएगी । हमारा सौभाग्य है कि एक पत्रकार के रूप में हमें भी दशकों तक इन महापुरुषों की नजदीकी कवरेज का मौका मिला । इस वर्ष के प्रारंभ में अयोध्या जाकर राम लला की शयन आरती में शामिल होना जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है ।
राम लला स्थापन समारोह में देश विदेश की विभिन्न हस्तियां आमंत्रित की गई थी । मंदिर न्यास में स्वयं बड़े बड़े नेताओं , उद्यमियों , खिलाड़ियों , संतों , अभिनेताओं को उनके घर जाकर निमंत्रण पत्र दिया था । उन अभागों का नाम भी हम आज नहीं लेना चाहते जिन्होंने न जाकर अवसर गंवा दिया । इस बार भी काफी बड़ी हस्तियों को बुलाया गया है । लेकिन वैसे चेहरों को नहीं जिनके चेहरे राम नाम सुनकर लटक जाते हैं । राम मंदिर पूरा होने के बाद अब काशी तथा मथुरा के मंदिरों के लिए काम शुरू करना चाहिए । भारत सरकार प्लेसेज ऑफ वरशिप एक्ट को भी किसान एक्ट की तरह निरस्त करे , सनातन जगत की यह मांग है ।
अयोध्या आज फिर सज गई । वैसे तो बारह महीने सजी ही रहती है । 2024 जनवरी में रामलला के विराजमान होने की छटा भी निराली थी और आज भी निराली है । ऐसा लगता है मानों वैकुंठ अयोध्या में उतर आया है या क्षीरसागर अयोध्या में उमड़ पड़ा है । वही अयोध्या जहां राम , लखन , भरत , शत्रुघ्न थे , जहां सीता , उर्मिला , मांडवी और श्रुतकीर्ति थीं , जहां दशरथ , कौशल्या , कैकेई , सुमित्रा थीं , जहां गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र थे , जहां मंथरा और प्रजा थी ।
जहां रामदरबार था रामराज्य था ।
वही अयोध्या , वही सरयू , वही दशरथ महल , वही जानकी महल , वही हनुमान गढ़ी और सम्पूर्ण राम मंदिर । कौशल्या के महल से बजने लगी राम लला की पद चाप ….
ध्वज में कोविदारा वृक्ष के साथ दीप्तिमान सूर्य और भगवान श्री राम की प्रतिभा और पराक्रम तथा राम राज्य के आदर्शों को दर्शाने वाला ‘ॐ’ अंकित है।
ध्वजारोहण श्री राम और माता सीता की विवाह पंचमी के अभिजीत मुहूर्त के साथ होगा।
प्रधानमंत्री सप्तमंदिर भी जाएंगे, जहां महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, देवी अहिल्या, निषादराज गुहा और माता शबरी से संबंधित मंदिर हैं।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी 25 नवंबर को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर जाएंगे, जो देश के सामाजिक-सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण अवसर होगा।
सुबह करीब 10 बजे प्रधानमंत्री सप्तमंदिर जाएंगे, जिसमें महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मिकी, देवी अहिल्या, निषादराज गुहा और माता शबरी से संबंधित मंदिर हैं। इसके बाद शेषावतार मंदिर के दर्शन होंगे।
सुबह लगभग 11 बजे प्रधानमंत्री माता अन्नपूर्णा मंदिर जाएँगे। इसके बाद वे राम दरबार गर्भगृह में दर्शन और पूजा करेंगे, जिसके बाद वे रामलला गर्भगृह के दर्शन करेंगे।
दोपहर लगभग 12 बजे, प्रधानमंत्री अयोध्या में पवित्र श्री राम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर भगवा ध्वज फहराएंगे, जो मंदिर निर्माण के पूर्ण होने और सांस्कृतिक उत्सव एवं राष्ट्रीय एकता के एक नए अध्याय की शुरुआत का प्रतीक होगा। इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री उपस्थित जनसमूह को भी संबोधित करेंगे।
यह कार्यक्रम मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की शुभ पंचमी को, श्री राम और माता सीता के विवाह पंचमी के अभिजीत मुहूर्त के साथ, दिव्य मिलन के प्रतीक दिवस के रूप में आयोजित होगा। यह तिथि नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर जी के शहीदी दिवस का भी प्रतीक है, जिन्होंने 17वीं शताब्दी में अयोध्या में 48 घंटे तक निरंतर ध्यान किया था, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
दस फुट ऊँचे और बीस फुट लंबे समकोण त्रिभुजाकार ध्वज पर भगवान श्री राम के तेज और पराक्रम का प्रतीक एक दीप्तिमान सूर्य की छवि अंकित है, जिस पर ‘ॐ’ अंकित है और कोविदारा वृक्ष की छवि भी अंकित है। यह पवित्र भगवा ध्वज राम राज्य के आदर्शों को साकार करते हुए गरिमा, एकता और सांस्कृतिक निरन्तरता का संदेश देगा।
ध्वज पारंपरिक उत्तर भारतीय नागर स्थापत्य शैली में निर्मित शिखर के ऊपर फहराया जाएगा, जबकि मंदिर के चारों ओर निर्मित 800 मीटर का परकोटा, जो दक्षिण भारतीय स्थापत्य परंपरा में डिजाइन किया गया है, मंदिर की स्थापत्य विविधता को प्रदर्शित करता है।
मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर की बाहरी दीवारों पर वाल्मीकि रामायण पर आधारित भगवान श्री राम के जीवन से जुड़े 87 जटिल रूप से तराशे गए पत्थर के प्रसंग और परिसर की दीवारों पर भारतीय संस्कृति से जुड़े 79 कांस्य-ढाल वाले प्रसंग अंकित हैं। ये सभी तत्व मिलकर सभी आगंतुकों को एक सार्थक और शिक्षाप्रद अनुभव प्रदान करते हैं, जिससे उन्हें भगवान श्री राम के जीवन और भारत की सांस्कृतिक विरासत की गहरी समझ मिलती है।
वीर और सुरुज ने दमदार कहानी और विश्वसनीयता से दिल जीता
दायरों से आगे, पहचान और स्वीकृति को समेटती बातचीत
मुंबई की धड़कन में जन्मी कोमल ट्रांसजेंड प्रेम कथा ‘लाला एंड पॉपी’ की टीम ने आज इफी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस फिल्म की यात्रा, इसकी सामाजिक अनुगूंज और ईमानदार निरूपण के लिए अपनी प्रतिबद्धता पर बेबाक बातचीत की। निर्देशक कैजाद गुस्ताद, निर्माता बॉबी बेदी तथा अदाकारों वीर सिंह और सुरुज राजखोवा ने चहारदीवारियों से प्रेम को, दोहरेपन से मानवता को और शोशेबाजी से प्रामाणिकता को ऊपर रखने का साहस दिखाने वाली अपनी इस फिल्म पर दिल खोल कर चर्चा की।
ईमानदार दास्तानगोईः इंसान पहले, लिंग भेद बाद में
बॉबी बेदी ने बातचीत की शुरुआत करते हुए बताया कि उन्होंने दशकों तक बड़ी फिल्में प्रोड्यूस करने के बाद इस प्रोजेक्ट से जुड़ने का फैसला क्यों किया। उन्होंने कहा कि हर बड़ी फिल्म दर्शकों के साथ से ही बड़ी बनती है। ईमानदारी और लगाव को अपने दिल में समेटे ‘लाला एंड पॉपी’ भी इसी दिशा में बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि भारत का समाज करवट ले रहा है। कानून ने ट्रांसजेंडर पहचानों को कबूल कर लिया है। लेकिन इन्हें आम सामाजिक मंजूरी अभी नहीं मिल सकी है। उनके अनुसार इस फिल्म का एक सीधासादा सा विश्वास है। इंसानियत पहले आती है, लिंग भेद बाद में। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर इंसान को आजाद रहने, प्रेम करने और भय के बिना जीने का हक है।
कैजाद गुस्ताद ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि उनका इरादा एक ऐसी ईमानदार फिल्म बनाने का था जो सिर्फ एक एलजीबीटीक्यू प्लस कहानी होने के बजाय समूचे विश्व से संवाद कर सके। वह एक ऐसी प्रेम कथा कहना चाहते थे जिससे दर्शक खुद को जोड़ सकें। इसका दो ट्रांसजेंडर के बीच होना तो बस एक संयोग है। वह जिस दुनिया की बात कह रहे हैं उसे वह शुरुआत में बहुत कम जानते थे। इसलिए कहानी को कागज पर उतारने से पहले उन्हें बरसों के शोध, ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ आत्मीय बातचीत और बारीकियों को सही ढंग से समझने की प्रतिबद्धता की दरकार थी।
वीर और सूरज की सफरनामा चर्चा के केंद्र में
ट्रांसजेंडर कलाकारों, वीर सिंह और सुरुज राजखोवा ने चर्चा को एक अंतरंग निजी रंग दे दिया। वीर ने कहा कि वह जब बड़े हो रहे थे उस समय परदे पर उन जैसे लोगों की मौजूदगी नहीं थी। उनकी तमन्ना थी कि वह अपने जैसे लोगों का प्रतिनिधि बनें। उन्होंने कहा, ‘‘मैं चाहता हूं कि मेरे जैसे लोग मुझे परदे पर देखें। वे सोचें कि अगर मैं यह सब कर सकता हूं तो उनके लिए भी ऐसा करना मुमकिन है। सूरज ने कहा कि बेशक, एलजीबीटीक्यू प्लस चरित्र भारतीय सिनेमा में लंबे समय से मौजूद रहे हैं। लेकिन उनका इस्तेमाल सिर्फ हास्य पैदा करने के लिए ही किया गया है। ‘लाला एंड पॉपी’ उन्हें परदे पर इंसानों की तरह जीने का मौका देती है जो अपनेआप में अभूतपूर्व है।
कहानी को मुख्यधारा में लाना
बॉबी बेदी से पूछा गया कि यह फिल्म एलजीबीटीक्यू प्लस दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाई गई है या मुख्यधारा को। इसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘‘यह समारोहों के लिए नहीं बल्कि अवाम के वास्ते बनाई गई फिल्म है।’’ उन्होंने कहा कि यह आम लोगों की फिल्म है। इसलिए वह इसे मुख्यधारा के समारोहों, सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स तक ले जाएंगे।
कैजाद ने इस बात को दोहराया कि ‘लाला एंड पॉपी’ कोई उपदेश देने वाली फिल्म नहीं है। वह जरूरत से ज्यादा नैतिकता का पाठ पढ़ाने के बजाय उम्मीद करते हैं कि फिल्म की भावनात्मक सचाई अपनी बात खुद बयान करेगी। उन्होंने कहा, ‘‘किसी भी फिल्म को अपने दर्शकों के साथ संवाद करना होता है। प्रेम लिंग भेद से पर है। इस सच के बारे में चीख कर बताने की नहीं, बल्कि इसे महसूस करने की जरूरत है।’’
दोनों अदाकारों, वीर सिंह और सुरुज राजखोवा के लिए यह फिल्म दुनिया के सामने गरिमामय मौजूदगी की उम्मीद है। यह एक ऐसी सिनेमाई यात्रा की शुरुआत है जिसमें ट्रांस लोग सिर्फ इंसान के तौर पर देखे जा सकते हैं। सूरज ने कहा, ‘‘यह इतिहास की तरह महसूस होता है।’’
बातचीत के अपने मुकाम तक पहुंचते-पहुंचते ‘लाला एंड पॉपी’ के संदेश की गूंज सुनी जा सकती थी। यह सिर्फ लिंग परिवर्तन के बारे में फिल्म नहीं है। यह प्रेम, साहस और जीने के हक के बारे में फिल्म है। मौजूदा समय में दुनिया बदलती पहचानों को कबूल करना सीख ही रही है। ऐसे में यह फिल्म याद दिलाती है कि प्रेम के सभी रूपों को खिलने के लिए मौके की दरकार होती है।
धर्मेंद्र का जाना सिर्फ एक अभिनेता का जाना नहीं, बल्कि एक युग का शांत हो जाना है। गाँव की मिट्टी से उठकर सिनेमा के आसमान तक पहुँचे इस कलाकार ने अपने अभिनय से नहीं, बल्कि अपनी सादगी और मानवीयता से करोड़ों दिल जीते। रोमांस से लेकर एक्शन और कॉमेडी तक—हर भूमिका में वे जीवन की सच्चाई लेकर आए। “शोले” का वीरू, “चुपके चुपके” का प्रोफेसर, “मेरा गाँव मेरा देश” का नायक—ये सारे सिर्फ किरदार नहीं, हमारी यादों का हिस्सा हैं। धर्मेंद्र चले गए, लेकिन उनका उजाला हमेशा रहेगा।
– डॉ. सत्यवान सौरभ
हिंदी सिनेमा ने अपने लंबे सफर में कई सितारों को जन्म दिया, पर उनमें कुछ ऐसे हैं जिनकी रोशनी समय के साथ कम नहीं होती, बल्कि हर पीढ़ी की आँखों में एक नई चमक लेकर जीवित रहती है। धर्मेंद्र उन्हीं दुर्लभ सितारों में से थे, जो सिर्फ अभिनेता नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज के भावनात्मक ताने-बाने का हिस्सा बन चुके थे। उनका जाना एक ऐसी खामोशी छोड़ गया है, जिसे शब्दों में बाँध पाना मुश्किल है। वे सिर्फ पर्दे पर दिखने वाली एक छवि नहीं थे; वे एक ऐसे इंसान थे, जिनकी गर्माहट और विनम्रता ने दर्शकों को अपने परिवारों के किसी सदस्य की तरह उनसे जोड़ दिया था।
धर्मेंद्र की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। पंजाब के एक छोटे से गांव नसराली से शुरू हुई यह यात्रा संघर्ष, मेहनत और सपनों की शक्ति का जीवंत उदाहरण है। एक साधारण किसान परिवार में जन्मा लड़का जब फिल्मों की दुनिया की चमक-दमक में पहुंचता है, तो आमतौर पर व्यक्ति अपनी मूल पहचान खो बैठता है, लेकिन धर्मेंद्र ऐसे नहीं थे। उन्होंने अपनी जड़ों को कभी नहीं छोड़ा। वही सादगी, वही देसीपन, वही अपनापन उनकी हर मुस्कान में दिखाई देता था। यही कारण है कि वे सिर्फ ‘स्टार’ नहीं बने, वे ‘दिलों का हीरो’ बने।
1960 के दशक में जब उन्होंने सिनेमा के परदे पर कदम रखा, तब दर्शकों ने यह अंदाज़ा नहीं लगाया होगा कि यह युवक अगले कई दशकों तक हिंदी फिल्मों का सबसे प्रिय चेहरा बनने वाला है। शुरुआत भले ही धीमी रही हो, पर उनकी आँखों में मौजूद मासूमियत और व्यक्तित्व में छिपा गहरा आत्मविश्वास बहुत जल्द ही लोगों के दिलों तक पहुँच गया। उनकी शुरुआती फिल्मों ने यह दिखाया कि उनमें संवाद की सरलता, भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति और अपने किरदार के प्रति ईमानदार दृष्टिकोण जैसी विशिष्ट खूबियाँ हैं।
समय के साथ धर्मेंद्र ने दिखा दिया कि वे सिर्फ एक रोमांटिक हीरो नहीं, बल्कि हर शैली में फिट बैठने वाले अभिनेता हैं। उन्होंने अभिनय के हर रंग को जीया—रोमांस की कोमलता, कॉमेडी की सहजता, एक्शन की तीव्रता और भावुक दृश्यों की गहराई। “अनुपमा” और “अनपढ़” में उनकी रोमांटिक छवि दर्शकों का दिल चुरा लेती थी, तो “मेरा गांव मेरा देश” और “शोले” में उनका एक्शननुमा अंदाज़ उन्हें ‘ही-मान’ की उपाधि दिलाता था। यह उपाधि किसी फैशन के कारण नहीं, बल्कि उनके स्वाभाविक दृढ़ व्यक्तित्व का प्रमाण थी।
“शोले” का वीरू भारतीय सिनेमा के इतिहास का वह चरित्र है, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं। वीरू की मस्ती, दोस्ती, बेफिक्री और दिल की गहराई ने इस किरदार को अमर बना दिया। धर्मेंद्र कोई भूमिका निभाते नहीं थे, वे उसे जीते थे। यही कारण है कि वीरू आज भी दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान ला देता है। लेकिन धर्मेंद्र का जादू सिर्फ वीरू तक सीमित नहीं था। “चुपके चुपके” में उनकी गंभीर-स्वभाव वाली कॉमेडी यह साबित करती है कि हास्य अभिनय हमेशा उछल-कूद या अतिरंजना से नहीं आता; वह शालीनता और समयबद्ध संवादों से भी पैदा हो सकता है। धर्मेंद्र इस बात का जीता-जागता उदाहरण थे।
उनके अभिनय का आधार हमेशा ‘सच्चाई’ रहा। वे अभिनय नहीं करते थे, वे सत्य को अभिव्यक्त करते थे। यह सत्य कभी प्रेम की कोमलता के रूप में जागता था, कभी संघर्ष की तल्ख़ी के रूप में। आज के समय में जब अभिनय तकनीक और बाहरी सजावट पर अधिक निर्भर होता जा रहा है, धर्मेंद्र हमें याद दिलाते हैं कि अभिनय का सबसे बड़ा केंद्र ‘दिल’ होता है। यही वह विशेषता है, जिसने उनकी फिल्मों को समय की सीमाओं से मुक्त कर दिया।
धर्मेंद्र की एक और महानता थी—उनकी जमीन से जुड़ाव। उन्होंने कभी खुद को महान या बड़ा साबित करने की कोशिश नहीं की। सैकड़ों फिल्मों की सफलता, लाखों प्रशंसक और दशकों की लोकप्रियता के बाद भी वे एक साधारण ग्रामीण की तरह बात करते थे। उनकी विनम्रता किसी बनावटी विनम्रता का परिणाम नहीं थी; वह उनके स्वभाव का हिस्सा थी। यही कारण है कि वे उद्योग के भीतर और बाहर—दोनों जगह समान आदर के पात्र बने रहे।
धर्मेंद्र ने अपनी निजी और राजनीतिक जिंदगी में भी अपने मूल्यों को नहीं छोड़ा। वे वर्ष 2004 में लोकसभा के लिए चुने गए और अपने तरीके से जनता की सेवा की। हालाँकि वे राजनीति में गहराई से सक्रिय नहीं रहे, लेकिन यह साफ समझ आता है कि वे समाज के प्रति एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपनी भूमिका को समझते थे। उनका चरित्र उतना ही सीधा और स्पष्ट था जितना उनका अभिनय।
उनकी जीवनशैली की सादगी ने भी लोगों को हमेशा प्रभावित किया। मुंबई की भीड़भाड़ से दूर उनका फार्महाउस, धरती पर काम करना, खेतों को सींचना, पशुओं के साथ समय बिताना—ये सब उनकी आत्मा को सुकून देते थे। यह उस अभिनेता की तस्वीर है जो चमकते पर्दे से परे, असली जिंदगी में प्रकृति की गोद में अपने आप को पूरा महसूस करता था। यह गुण किसी अभिनेता में शायद ही देखने मिलता हो।
उनका योगदान सिर्फ उनके समय तक सीमित नहीं। आज की पीढ़ी भी धर्मेंद्र की फिल्मों में वही ताजगी, वही मानवीय संवेदना और वही संवादशक्ति महसूस करती है, जो 40-50 साल पहले दर्शक महसूस करते थे। यह बहुत कम कलाकारों के हिस्से आता है कि उनकी फिल्मों की ताकत पीढ़ियों की सीमाएँ लांघ जाए। धर्मेंद्र यह विरासत अपने साथ लेकर नहीं गए; वे इसे समाज में छोड़ गए हैं।
आज जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो उनके चेहरे की वह सहज मुस्कान तुरंत आँखों के सामने आ जाती है। ऐसा लगता है जैसे वह अभी भी किसी दृश्य की तैयारी कर रहे हों, या किसी इंटरव्यू में अपनी प्रसिद्ध विनम्रता के साथ कह रहे हों—“अरे, मैं कौन सा बड़ा कलाकार हूँ, बस अपनी कोशिश करता हूँ।” उनकी यह बात ही उन्हें बड़ा बनाती थी।
धर्मेंद्र का जाना भारतीय सिनेमा के लिए सिर्फ एक कलाकार की विदाई नहीं; यह एक युग का अवसान है। वह युग जिसमें सादगी, भावनाएँ और मानवीयता अभिनय की रीढ़ हुआ करती थीं। वह दौर जब सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज, परिवार और रिश्तों का आईना होता था। धर्मेंद्र उस आईने की सबसे चमकदार किरण थे।
लेकिन हर महान कलाकार की तरह धर्मेंद्र भी यह सिद्ध करके गए हैं कि शरीर भले चला जाए, कला कभी नहीं जाती। उनकी आवाज़, उनकी हँसी, उनकी आँखों की चमक, उनकी फिल्मों के दृश्य—यह सब कहीं न कहीं हमारे भीतर जीते रहेंगे। वह इसलिए नहीं कि उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने लोगों के दिलों में जगह बनाई। सिनेमा की असली शक्ति यही है—जब दर्शक अभिनेता को सिर्फ अभिनेता न मानकर परिवार का हिस्सा मानने लगें।
आज, जब हम श्रद्धांजलि देते हुए यह पंक्ति याद करते हैं—“अभी न जाओ छोड़ के…”—तो यह सिर्फ एक गीत की पंक्ति नहीं रह जाती। यह एक युग की पुकार जैसी लगती है। लेकिन महान कलाकार कभी सचमुच नहीं जाते। धर्मेंद्र भी नहीं गए। वे हमारे गीतों में हैं, संवादों में हैं, फिल्मों में हैं, और सबसे बढ़कर, हमारे दिलों में हैं।
भारतीय सिनेमा के उस ‘ही-मान’ को शत-शत नमन, जिसकी सादगी ने हमें इंसान होना सिखाया और जिसकी मुस्कान ने पीढ़ियों को जीवन की सुंदरता का एहसास कराया।
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र का 89 साल की उम्र में निधन हो गया है। वे कुछ दिनों से उम्र संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। सोमवार को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा ।
कई सेलेब्स उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए हैं।
उनके परिवार के लोग और उनके करीबी इस मौत से सदमे में हैं। आठ दिसंबर 1935 को जन्मे धर्मेंद्र कुछ दिन पहले ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती थे। कई दिनों तक अस्पताल में इलाज चला। इसके बाद उनका इलाज घर पर ही किया जाने लगा। लेकिन वक्त के साथ तबीयत नहीं सुधरी और आज सोमवार यानी 24 नवंबर 2025 को धर्मेंद्र का निधन हो गया।
89 साल की उम्र में भी धर्मेंद्र एक्टिंग में सक्रिय थे। अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा की आगामी फिल्म ‘इक्कीस’ इस दिग्गज अभिनेता की आखिरी फिल्म होगी। फिल्म ‘इक्कीस’ की कहानी एक यंग आर्मी ऑफिसर अरुण खेतरपाल की है। महज 21 साल की उम्र में देश के लिए इस सैन्य अधिकारी ने बलिदान दिया था। फिल्म में अभिनेता धर्मेंद्र ने आर्मी ऑफिसर के पिता का किरदार निभाया। वहीं अरुण खेतरपाल के रोल में अगस्त्य नंदा नजर आएंगे। यह फिल्म 25 दिसंबर को रिलीज होने वाली है
ऐसे में धर्मेंद्र के फैंस उनके परिवार के बारे में जानना चाहते हैं।धर्मेंद्र के निधन से बॉलीवुड में शोक की लहर दौड़ पड़ी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और पीएम मोदी से लेकर बॉलीवुड के कई सेलेब्स ने दिग्गज अभिनेता को श्रद्धांजलि दी है। धर्मेंद्र का परिवार बॉलीवुड के सबसे बड़े परिवारों में से एक है। उन्होंने दो शादियां की थीं और उनके कुल छह बच्चे हैं।धर्मेंद्र ने दो शादियां की थी। 19 साल की उम्र में उन्होंने 1954 में प्रकाश कौर के साथ पहली शादी की थी। तब धर्मेंद्र ने बॉलीवुड में अपनी शुरुआत नहीं की थी। प्रकाश कौर से धर्मेंद्र के 2 बेटे और 2 बेटियां हुईं। यानी वह चार बच्चों के पिता बन गए।धर्मेंद्र के इन चारों बच्चों के नाम सनी देओल, बॉबी देओल, विजेता देओल और अजीता देओल है। सनी देओल और बॉबी देओल बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता हैं। उनकी दोनों बहनें विजेता देओल और अजीता देओल लाइमलाइट से दूर रहती हैं। धर्मेंद्र और उनकी पहली पत्नी के बच्चे सेटल हैं।
धर्मेंद्र ने प्रकाश कौर से तलाक लिए बिना 1980 में अभिनेत्री हेमा मालिनी से शादी कर ली थी। हेमा मालिनी उनसे 13 साल छोटी हैं। एक्ट्रेस के साथ सात फेरे लेने के बाद कपल की दो बेटियां हुईं। इन दोनों के नाम एशा देओल और अहाना देओल है।
धर्मेंद्र, जिन्हें दुनियाभर के सिनेमाप्रेमी प्यार से ही-मैन ऑफ बॉलीवुड कहते हैं। अपनी सादगी, सहज अभिनय, आकर्षक व्यक्तित्व और बहुमुखी कला के कारण धर्मेंद्र भारतीय फिल्म उद्योग के सबसे प्रिय और प्रभावशाली अभिनेताओं में गिने जाते हैं। छह दशक से भी अधिक के लंबे करियर में उन्होंने एक्शन, रोमांस, कॉमेडी और ड्रामा—हर शैली में अपनी छाप छोड़ी।
धर्मेंद्र का जन्म 8 दिसंबर 1935 को पंजाब के लुधियाना जिले के नसराली गाँव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम धरम सिंह देओल है। पिता स्कूल टीचर थे, इसलिए शिक्षा का माहौल मिला, परंतु धर्मेंद्र की रुचि हमेशा फिल्मों की दुनिया में थी। बचपन से ही दिलीप कुमार और सुरैया जैसी हस्तियों की फिल्में देखकर वह बड़े पर्दे पर आने का सपना संजोते रहे।1958 में फिल्मफेयर मैगज़ीन द्वारा आयोजित टैलेंट सर्च प्रतियोगिता में धर्मेंद्र चुने गए और यही उनके करियर का मोड़ साबित हुआ। आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत और धैर्य के बल पर मुंबई में जगह बनाई।
फिल्मी करियर की शुरुआत
1960 में आई फिल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे धर्मेंद्र की पहली फिल्म थी। शुरुआत में उन्हें एक रोमांटिक हीरो के रूप में पहचान मिली। उनकी कोमल अदाकारी, गंभीर संवाद शैली और मासूम चेहरा दर्शकों को तुरंत पसंद आने लगा। 1960 के दशक में अनपढ़, हासिल, काजल, आन मिलो सजना जैसी फिल्मों ने उन्हें लोकप्रियता की ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया। धीरे-धीरे वह ऐसे कलाकार के रूप में पहचाने जाने लगे जो हर तरह की भूमिका को निभाने की क्षमता रखते हैं ।1970 के दशक में धर्मेंद्र का करियर अपने स्वर्णिम दौर में था। इस दशक ने उन्हें ऐसी प्रतिष्ठित फिल्मों का हिस्सा बनाया, जिनका भारतीय सिनेमा पर अमिट प्रभाव है। इनमें सबसे खास है—शोले (1975)।वीरू के किरदार में धर्मेंद्र ने रोमांस, ह्यूमर, एक्शन और भावुकता—सब कुछ इतने सहज रूप में निभाया कि यह भूमिका आज भी उनके सर्वोत्तम अभिनय में गिनी जाती है। उनकी और हेमा मालिनी की ऑन-स्क्रीन कैमिस्ट्री, जैसे सीता औरगीता, शोले, ड्रीम गर्ल, दिल्लगी आदि फिल्मों में देखने को मिलती है, दर्शकों के दिलों में आज भी ताज़ा है।
धर्मेंद्र ने सिर्फ रोमांटिक और कॉमिक भूमिकाएँ ही नहीं निभाईं बल्कि एक्शन फिल्मों के भी वह राजा माने जाते हैं। उनके मजबूत व्यक्तित्व, दमदार संवाद और मर्दाना छवि ने उन्हें बॉलीवुड का पहला ‘ही-मैन’ बना दिया। यादों की बारात, प्रतिज्ञा, धर्मात्मा, चुपके चुपके, शालीमार जैसी फिल्मों में उनका अभिनय उनके बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण है।
धर्मेंद्र ने 2004 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के टिकट पर राजस्थान के बीकानेर से लोकसभा चुनाव जीता और सांसद बने। हालांकि राजनीति में वह सक्रिय रूप से अधिक समय नहीं दे पाए, परंतु जनता से उनके निकट संबंध हमेशा चर्चा में रहे।
पुरस्कार और सम्मान
धर्मेंद्र को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए कई सम्मान प्राप्त हुए—
फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
पद्म भूषण (भारत सरकार द्वारा)
अन्य कई राज्य और राष्ट्रीय स्तर के सम्मान
उनका नाम “सर्वाधिक सफल अभिनेताओं” की सूची में अक्सर शामिल होता है। फिल्मों में उनकी लोकप्रियता और लंबे करियर ने उन्हें भारतीय सिनेमा के महानतम दिग्गजों में स्थान दिया है। नई पीढ़ी के दर्शक भी धर्मेंद्र को उतना ही सम्मान देते हैं जितना पुराने समय के लोग। उन्होंने हाल के वर्षों में यमला पगला दीवाना, अपने, चरणजीत, और रॉकी और रानी की प्रेम कहानी जैसी फिल्मों में काम किया। उम्र के इस पड़ाव में भी उनकी ऊर्जा, सकारात्मकता और स्क्रीन प्रेज़ेंस वही पुरानी करिश्माई चमक बिखेरती है।